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बेटी की योग्यता

  • 1 day ago
  • 3 min read

डॉ. कृष्णकांत श्रीवास्तव

राजकिशोर जी के घर इन दिनों जैसे वसंत उतर आया था। आंगन में रखे गमलों के फूल भी जैसे कुछ अधिक खिले-खिले लगते थे और घर की दीवारें भी मुस्कुरा रही थीं। आखिर मुस्कुराएँ भी क्यों न - इकलौती बेटी के लिए एक सुयोग्य, सरकारी अफसर दामाद जो मिल रहा था, वह भी बिना किसी लेन-देन के। शादी सादगी से होनी थी, खर्च की चिंता नहीं, समाज में प्रतिष्ठा अलग से।

राजकिशोर जी को लगता था जैसे उन्होंने जीवन की सबसे बड़ी जिम्मेदारी सहज ही पूरी कर ली हो। वे जहां भी जाते, छाती गर्व से चौड़ी हो जाती - “हमारी बेटी की शादी एक अफसर से तय हुई है।” रिश्तेदारों के फोन, बधाइयाँ, तैयारियों की चर्चाएँ… घर में हर दिन एक छोटे से उत्सव जैसा था।

धीरे-धीरे शादी की तारीख पास आने लगी। दोनों परिवारों का आना-जाना बढ़ गया। कभी लड़के वाले चाय पर आते, कभी राजकिशोर जी बेटी के साथ वहाँ जाते। हंसी-मजाक, भविष्य की योजनाएँ, शादी की सूची - सब कुछ सुचारु रूप से चल रहा था। अब तो बस एक महीना ही शेष था।

उसी शाम, जब राजकिशोर जी ऑफिस से लौटकर थके कदमों से सोफे पर बैठे ही थे और पत्नी ने चाय का कप उनके हाथ में थमाया था, तभी मोबाइल की घंटी बजी। स्क्रीन पर नाम चमका - “राम श्रेष्ठ जी।

उन्होंने मुस्कुराते हुए फोन उठाया - “नमस्कार समधी जी!”

औपचारिक बातें हुईं, पर अगले ही क्षण जो शब्द उनके कानों में पड़े, उन्होंने जैसे उनके पैरों तले से जमीन खींच ली। चेहरा पीला पड़ गया, हाथ कांपने लगे, चाय का कप मेज पर रखते-रखते छलक गया।

राम श्रेष्ठ जी की आवाज़ में कठोरता कम, गंभीरता अधिक थी -

“समधी जी, हमें यह रिश्ता आगे बढ़ाना उचित नहीं लग रहा…”

राजकिशोर जी को लगा शायद उन्होंने गलत सुना है।

“क्या कह रहे हैं आप? कोई भूल हुई क्या?”

उधर से शांत किंतु स्पष्ट स्वर आया -

“आपने हमें बेटी की शैक्षणिक योग्यता के प्रमाणपत्र दिखाए, हमें खुशी भी हुई। पर हम केवल डिग्री नहीं, संस्कार भी देखना चाहते थे। पिछले दो महीनों में मैं तीन-चार बार आपके घर अलग-अलग समय पर आया। कभी सुबह, कभी दोपहर, कभी शाम। हर बार मैंने समधन जी को घर के कामों में व्यस्त पाया - कभी रसोई में, कभी कपड़े धोते, कभी झाड़ू-पोंछा करते। कभी-कभी वे थकी हुई भी दिखीं।

लेकिन… मैंने आपकी बेटी को कभी उनकी मदद करते नहीं देखा।”

कुछ क्षणों की चुप्पी के बाद वे आगे बोले -

“समधी जी, हमें अपने घर के लिए बहू चाहिए, कोई सजावटी गुड़िया नहीं। हमें ऐसी लड़की चाहिए जो हमारे परिवार का हिस्सा बने, सास को मां माने, घर की जिम्मेदारियों को समझे। जो लड़की अपनी मां का बोझ हल्का नहीं कर सकती, वह हमारे घर में आकर कैसे निभा पाएगी? हमें डर है कि आपकी बेटी हमारे वातावरण में स्वयं को ढाल नहीं पाएगी। इसलिए हम यह रिश्ता यहीं समाप्त करना चाहते हैं।”

फोन कट गया।

कमरे में सन्नाटा छा गया। पत्नी ने घबराकर पूछा -

“क्या हुआ?”

राजकिशोर जी के पास शब्द नहीं थे। उनकी आंखों के सामने जैसे वर्षों की परवरिश घूमने लगी - बेटी को कभी कोई काम न करने देना, “पढ़ाई पर ध्यान दो”, “तुम्हें इन सब में पड़ने की जरूरत नहीं”, “हम हैं न” - इन वाक्यों की गूंज उनके भीतर उठने लगी।

वे समझ गए थे कि उन्होंने अपनी बेटी को डिग्रियाँ तो दीं, पर जीवन का व्यावहारिक पाठ नहीं सिखाया। उसे हर सुविधा दी, पर जिम्मेदारी का एहसास नहीं कराया।

उस रात घर में किसी ने भोजन ठीक से नहीं किया। बेटी भी सब समझ चुकी थी। उसकी आंखों में आंसू थे - शायद पहली बार उसे एहसास हुआ कि जीवन केवल सजने-संवरने, पढ़-लिख लेने और ऊँचे सपने देखने का नाम नहीं; जीवन साझेदारी, सहानुभूति और जिम्मेदारी का भी नाम है।

दोस्तों, यह कहानी केवल राजकिशोर जी के घर की नहीं, हमारे समाज के अनेक घरों की सच्चाई है। हम अपनी बेटियों को पढ़ाते हैं, उन्हें आत्मनिर्भर बनाते हैं - जो नितांत आवश्यक है - परंतु साथ ही हमें उन्हें जीवन-कौशल, सहानुभूति, परिवार की समझ और सहभागिता का भी पाठ पढ़ाना चाहिए।

बेटी हो या बेटा - घर के छोटे-बड़े कामों में हाथ बंटाना, बड़ों का सम्मान करना, जिम्मेदारियों को समझना - ये गुण ही व्यक्ति को संपूर्ण बनाते हैं।

अत्यधिक लाड़-प्यार कभी-कभी बच्चों को जीवन की वास्तविकताओं से दूर कर देता है। इसलिए हर माता-पिता से निवेदन है - अपनी संतान से प्रेम अवश्य करें, पर उसे इतना सक्षम भी बनाएं कि वह जहां जाए, वहां केवल अपने सपनों को ही नहीं, रिश्तों को भी निभा सके।

क्योंकि जीवन में केवल योग्यताएँ नहीं, संस्कार ही स्थायी सम्मान दिलाते हैं।

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