top of page
OUR BLOGS


डोर
“नंदिता! प्रतियोगी परीक्षाओं के फॉर्म भरे कि नहीं? फॉर्म पास है या ले आऊँ?"
“ग्रेजुएशन के बाद से ही किसी बड़े व्यवसाई घराने में ब्याह हो जाए, बस इतना ही ख्वाब है मेरे माता पिता का। मैं किसी को पसंद न आई, तभी पढ़ाई पूरी हो पाई”, उदास मुस्कान आकर ठहर गई।
“ऐसा न कहिए, नंदिता! आप कॉलेज की शान हैं, एक खूबसूरत, व्यवहारिक, टॉपर लड़की का सपना सिर्फ किसी सेठ जी की बहू बनना कैसे हो सकता है?” नाटकीय अंदाज़ में उसने पूछा।
नीना सिन्हा
Jan 82 min read


दण्ड
संध्या का समय था। कचहरी उठ गयी थी। अहलकार चपरासी जेबें खनखनाते घर जा रहे थे। मेहतर कूड़े टटोल रहा था कि शायद कहीं पैसे मिल जायें। कचहरी के बरामदों में सांडों ने वकीलों की जगह ले ली थी। पेड़ों के नीचे मुहर्रिरों की जगह कुत्ते बैठे नजर आते थे। इसी समय एक बूढ़ा आदमी, फटे-पुराने कपड़े पहने, लाठी टेकता हुआ, जंट साहब के बंगले पर पहुंचा और सायबान में खड़ा हो गया। जंट साहब का नाम था मिस्टर जी0 सिनहा। अरदली ने दूर ही से ललकारा—कौन सायबान में खड़ा है? क्या चाहता है।
प्रेमचंद
Jan 816 min read


ईदगाह
रमज़ान के पूरे तीस रोज़ों के बाद ईद आई है। कितना मनोहर, कितना सुहावना प्रभात है। वृक्षों पर अजीब हरियाली है, खेतों में कुछ अजीब रौनक़ है, आसमान पर कुछ अजीब लालिमा है। आज का सूर्य देखो, कितना प्यारा, कितना शीतल है, यानी संसार को ईद की बधाई दे रहा है। गाँव में कितनी हलचल है। ईदगाह जाने की तैयारियाँ हो रही हैं। किसी के कुरते में बटन नहीं है, पड़ोस के घर में सुई-तागा लेने दौड़ा जा रहा है। किसी के जूते कड़े हो गए हैं, उनमें तेल डालने के लिए तेली के घर पर भागा जाता है। जल्दी-जल्दी
प्रेमचंद
Jan 818 min read


पिता का आशीर्वाद
जब मृत्यु का समय न्निकट आया तो पिता ने अपने एकमात्र पुत्र धनपाल को बुलाकर कहा कि “बेटा मेरे पास धन-संपत्ति नहीं है कि मैं तुम्हें विरासत में दूं। पर मैंने जीवनभर सच्चाई और प्रामाणिकता से काम किया है। तो मैं तुम्हें आशीर्वाद देता हूं कि, तुम जीवन में बहुत सुखी रहोगे और धूल को भी हाथ लगाओगे तो वह सोना बन जायेगी।”
डॉ. कृष्णा कांत श्रीवास्तव
Jan 74 min read


स्वप्न
नरेंद्र अकसर कलकत्ता में अपने घर में बैठकर सुदूर दक्षिणेश्वर में श्रीरामकृष्ण के ध्यान में निमग्न श्रीमूर्ति का दर्शन किया करते थे। एक दिन उन्होंने स्वप्न में देखा कि श्रीरामकृष्ण उनके निकट आकर कह रहे हैं, “चल, मैं तुझे ब्रज-गोपी श्रीराधा के समीप ले जाऊँगा।”
मुकेश ‘नादान’
Jan 73 min read


बैंक की सीख
जिले की सबसे बड़ी अफसर डीएम नुसरत की माँ, साधारण कपड़ों में एक बड़े सरकारी बैंक में पैसे निकालने गईं। वहाँ बैंक के सभी अफसरों ने उन्हें भिखारिन समझकर अपमानित किया। कोई सोच भी नहीं सकता था कि यह साधारण सी महिला असल में जिले की डीएम मैडम की माँ है। सभी ने उन्हें तिरस्कार की नजरों से देखा और सोचने लगे कि ऐसी औरत इतने बड़े बैंक में क्या करने आई है।
वह महिला धीरे-धीरे काउंटर की ओर बढ़ी। वहाँ कल्पना नाम की एक सुरक्षा गार्ड बैठी थी। महिला ने कहा, “बेटी, मुझे बैंक से पैसे निकालने ह
अरविन्द जायसवाल
Jan 77 min read


गुरू की सीख
गुरु रामदास विद्यालय में हिंदी शिक्षक के रूप में कार्य करते थे। गुरु रामदास बड़े दिनों बाद आज शाम को घर लौटते वक़्त अपने दोस्त गोपाल जी से मिलने उसकी दुकान पर गए। गोपाल जी शहर में कपड़े का व्यापार करते थे। इतने दिनों बाद मिल रहे दोस्तों का उत्साह देखने लायक था। दोनों ने एक दुसरे को गले लगाया और दुकान पर ही बैठ कर गप्पें मारने लगे।
डॉ. कृष्णा कांत श्रीवास्तव
Jan 64 min read


कवि का दुख
मेरा यह लघुतम जीवन
जो किसी के किसी काम का नहीं
जिसे पाकर मैंने पाए हैं
अनगिनत दु:ख और किन्चित सुख भी।
दु:खों की श्रृंखला की पहली कड़ी
कौन सी थी ठीक से याद नहीं
यह भी नहीं कि किसका
विस्तार कितना था
और गहराई में अधिक कौन था
यह याद है
जो भी आया उसने चमकाया मुझे
नींबूमँजे बर्तनों की तरह।
धोया मुझे श्वेताभ तरल से वह
अकसर कटाक्ष के बाण पर
सवार होकर आता था
और छेद जाता था
मेरे स्नेहिल हृदय का मुख।
मैंने हरदम ढकेला इसे अदम्य साहस
और धैर्य धना हि साधव:
सूक्ति के बलपर
प्रियंवदा पाण्डेय
Jan 61 min read


एक्स्ट्रा टिफिन
मै जैसे ही ऑफिस से निकला मुझे याद आया, मुझे अपने टिफिन का खाना फेंकना था। अगर खाना टिफिन में चला गया तो बीबी किच किच करेगी। आज टिफिन में लौकी की सब्ज़ी जो आई थी।
लौकी… उफ़्फ़ बेस्वाद सी सब्ज़ी, जो मुझे पसन्द नहीं आती। पता नहीं क्यों बीवी सेहत का ख्याल रखने पर तुली हुई है, लौकी की सब्ज़ी मेरे मुँह का स्वाद मार देती है और भूख मर जाती है मेरी।
सपना रानी
Jan 43 min read


अरमान
मेरी हर बात का वो
मान बहुत रखता है
उसपे ये भी कि मेरा
ध्यान बहुत रखता है
मेरी हर फिक्र को
ले जाएगा अपने माथे
यानी वो ज़िंदगी
आसान बहुत रखता है
उसके अरमान कई,
अब भी अधूरे हैं मगर
देखिए फिर भी वो
अरमान बहुत रखता है
दिल के बाहर,
वो सजा रखता है गुलशन
लेकिन दिल के अंदर,
वो बयाबान बहुत रखता है।
जीत कुमारी
Jan 41 min read


स्कूल का गार्ड
एक दिन स्कूल में सुबह-सुबह कदम रखते ही गार्ड के मुरझाए और उदास चेहरे की ओर अचानक से ध्यान चला गया। लगभग 65-70 के बुजुर्ग को इस उम्र में अपना और परिवार का खर्च चलाने के लिए तीन शिफ्ट की ड्यूटी पूरी मुस्तैदी के साथ करनी पड़ती है। उस पर से न ढंग का भोजन, न कोई सुविधा और ना ही पदाधिकारियों का अच्छा बात-व्यवहार।
सपना रानी
Jan 44 min read


जीवन की सच्ची पूंजी
एक बार एक शक्तिशाली राजा दुष्यंत घने वन में शिकार खेल रहा थे। अचानक मौसम बिगड़ गया। आकाश में काले बादल छा गए और मूसलाधार वर्षा होने लगी। धीरे-धीरे सूर्य अस्त हो गया और घना अंधेरा छा गया। अँधेरे में राजा अपने महल का रास्ता भूल गये और सिपाहियों से अलग हो गये। भूख प्यास और थकावट से व्याकुल राजा जंगल के किनारे एक ऊंचे टीले पर बैठ गये। थोड़ी देर बाद उन्होंने वहाँ तीन अबोध बालकों को खेलते देखा।
डॉ. कृष्णकांत श्रीवास्तव
Jan 33 min read


सियार और ढोल
एक बार एक जंगल के निकट दो राजाओं के बीच घोर युद्ध हुआ। एक जीता दूसरा हारा। सेनाएं अपने नगरों को लौट गईं। बस, सेना का एक ढोल पीछे रह गया। उस ढोल को बजा-बजाकर सेना के साथ गए भाट व चारण रात को वीरता की कहानियां सुनाते थे।
पंचतंत्र की कहानी
Jan 32 min read


बन्दर और लकड़ी का खूंटा
एक समय शहर से कुछ ही दूरी पर एक मंदिर का निर्माण किया जा रहा था। मंदिर में लकड़ी का काम बहुत था इसलिए लकड़ी चीरने वाले बहुत से मज़दूर काम पर लगे हुए थे। यहां-वहां लकड़ी के लठ्टे पडे हुए थे और लठ्टे व शहतीर चीरने का काम चल रहा था। सारे मज़दूरों को दोपहर का भोजन करने के लिए शहर जाना पड़ता था, इसलिए दोपहर के समय एक घंटे तक वहां कोई नहीं होता था। एक दिन खाने का समय हुआ तो सारे मज़दूर काम छोड़कर चल दिए। एक लठ्टा आधा चिरा रह गया था। आधे चिरे लठ्टे में मज़दूर लकड़ी का कीला फंसाकर चले गए।
पंचतंत्र की कहानी
Jan 32 min read


बिछुड़न
मिलना और बिछुड़ना दोनों
जीवन की मजबूरी है।
उतने ही हम पास रहेंगे,
जितनी हममें दूरी है।।
शाखों से फूलों की बिछुड़न
फूलों से पंखुड़ियों की।
आँखों से आँसू की बिछुड़न
होंठों से बाँसुरियों की।।
तट से नव लहरों की बिछुड़न
पनघट से गागरियों की।
सागर से बादल की बिछुड़न
बादल से बीजुरियों की।।
जंगल जंगल भटकेगा ही
जिस मृग पर कस्तूरी है।
सोनी शुक्ला
Jan 31 min read


पिता की दौलत
यह कहानी एक गहरी भावनात्मक और जीवन-मूल्य से भरी सामाजिक सच्चाई को उजागर करती है। कहानी की शुरुआत एक गांव में अकेले रह रहे बूढ़े पिता की मृत्यु से होती है। उनके दोनों बेटे, जो रोज़गार और भविष्य के लिए अलग-अलग शहरों में बस चुके थे, पिता के अंतिम संस्कार के लिए गांव आते हैं। सारे धार्मिक और सामाजिक कर्मकांड पूरे हो जाते हैं। गांव के कुछ लोग जा चुके होते हैं और कुछ अभी बैठे होते हैं, तभी बड़े भाई की पत्नी अपने पति के कान में कुछ फुसफुसाती है।
इसके बाद बड़े भाई अपने छोटे भाई को भी
श्रद्धा पटेल
Jan 23 min read


कफ़न
प्रेमचंद की प्रसिद्ध कहानी “कफ़न” भारतीय ग्रामीण समाज की कठोर सच्चाइयों, गरीबी, संवेदनहीनता और सामाजिक व्यवस्था की विडंबना को उजागर करती है। कहानी के मुख्य पात्र घीसू और माधव हैं, जो बाप–बेटा हैं और अत्यंत निर्धन तथा कामचोर स्वभाव के हैं। वे समाज के हाशिए पर जीवन जीते हैं और मेहनत से दूर भागते हैं।
यह कहानी गरीबी से उपजे नैतिक पतन, सामाजिक अन्याय और मानवीय मूल्यों के क्षरण पर तीखा व्यंग्य करती है।
पूरी कहानी जानने के लिए पढ़ें : प्रेमचंद की लिखी कहानी कफ़न ?
प्रेमचंद
Jan 210 min read


अपनों के बीच
कई बार
लौटते-लौटते
बहुत देर हो जाती है।
इतनी देर कि
हम खुद को भी
पहचान नहीं पाते।
अपना पता भी
ढूंढ़ नहीं पाते।
अपना शहर, अपनी गलियां
भूल चुकी होती हैं हमें।
खत्म हो चुके होते हैं
जाने कितने जन्म,
जाने कितने रिश्ते।
और इस तरह
हमारा लौटना,
लौटना नहीं होता।
हम सिर्फ आ जाते हैं
अनचाहे और अनजाने से
उन अपनों के बीच,
जिन्होंने कभी
हमारे लौट आने की
जाने कितनी दुआएं मांगी थीं
करुणा शंकर अवस्थी
Jan 1, 20261 min read


कृतज्ञता
इस वक्त कौन हो सकता है। अचानक किसी ने जोर से दरवाजा खटखटाया और लगातार खटखटाता रहा। "इस वक्त कौन हो सकता है?" प्रिया ने सोचा और बगल में सो रहे अपने पति हर्ष को जगाया। हर्ष भी इतनी जोर से दरवाजा खटखटाने की आवाज से जगा - जगा सा तो हो ही गया था और प्रिया के हिलाने से तुरंत उठकर बैठ गया और घबराई हुई नजरों से प्रिया की ओर देखा।
शंकर लाल वर्मा
Jan 1, 20262 min read


कड़वी बहु
जानकी के बहु बेटे शहर में बस चुके थे लेकिन उसका गाँव छोड़ने का मन नहीं हुआ इसलिए अकेले ही रहती थी। वह रोजाना की तरह मंदिर जा कर आ रही थी। रास्ते मे उसका संतुलन बिगड़ा और गिर पड़ी।
गाँव के लोगों ने उठाया, पानी पिलाया और समझाया 'अब इस अवस्था में अकेले रहना उचित नहीं। किसी भी बेटे के पास चली जाओ।' जानकी ने भी परिस्थिति को स्वीकार कर बेटे बहुओं को ले जाने के लिए कहने हेतु फोन करने का मन बना लिया।
रमेश चंद्रा
Jan 1, 20262 min read


देवांगना
आज से ढाई हज़ार वर्ष पूर्व गौतम बुद्ध ने अपने शिष्यों को ब्रह्मचर्य और सदाचार की शिक्षा देकर बहुत जनों के हित के लिए, बहुत जनों के सुख के लिए, लोक पर दया करने के लिए, देव-मनुष्यों के प्रयोजन-हित सुख के लिए संसार में विचरण करने का आदेश दिया। वह 44 वर्षों तक, बरसात के तीन मासों को छोड़कर विचरण करते और लोगों को धर्मोपदेश देते रहे। उनका यह विचरण प्रायः सारे उत्तर प्रदेश और सारे बिहार तक ही सीमित था। इससे बाहर वे नहीं गये। परन्तु उनके जीवनकाल में ही उनके शिष्य भारत के अनेक भागों म
आचार्य चतुरसेन
Dec 29, 20253 min read


इन्द्रजाल
विन्ध्याचल के गहन कानन के बीच कान्तार-गामिनी युवती के बढ़ते हुए पद इस मर्मस्पर्शी सम्बोधन-स्वर को सुनते ही सहसा स्तम्भित हो गए। उसने चकित होकर चतुर्दिश पर्यालोचन किया तो पादुका-विहीन पद-चिह्नों से अकित मालुधान तुल्य क्षीण कान्तार की अपेक्षा उसे और कुछ दृष्टिगत न हुआ ।
रघुनाथ सिंह
Dec 29, 20252 min read


विचार स्नान
मैं सुंदर हो गया हूँ।
त्याग कर मनमैल।
मैं निर्मल हो गया हूँ।
मैं फिर सुंदर हो गया हूँ।।
कितना सुघड़ है ये पात्र खाली
कितना मधुर संगीत इसका।
डॉ. जहान सिंह ‘जहान’
Dec 28, 20251 min read


बदलाव
बूढ़े दादा जी को उदास बैठे देख बच्चों ने पूछा, “क्या हुआ दादा जी, आज आप इतने उदास बैठे क्या सोच रहे हैं?”
“कुछ नहीं, बस यूँही अपनी ज़िन्दगी के बारे में सोच रहा था।”, दादा जी बोले।
“जरा हमें भी अपनी लाइफ के बारे में बताइये न।”, बच्चों ने ज़िद्द्द की।
डॉ. कृष्णकांत श्रीवास्तव
Dec 28, 20252 min read
bottom of page