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कैसे करूँ मैं कन्यादान
आज विदाई की बेला में,
समझ नहीं आता मुझको,
कैसे निकाल दूँ शरीर से,
अपने ही दिल को?
चाहती हूँ भूलना अतीत,
पर भुला नहीं पाती हूँ,
अनजाने ही अतीत की यादों में खो जाती हूँ।।
घर बाहर का टेंशन गुस्सा,
तुम पर ही तो उतारती थी,
पर मुस्कुराती थी तभी मैं
डॉ० शन्नो तिवारी
3 days ago2 min read


दो अदृश्य रत्न
याद रखिए—समय से बड़ा कोई हीरा नहीं, धैर्य से बड़ा कोई मोती नहीं। जिसने दोनों का मूल्य समझ लिया, उसके लिए कोई सपना बहुत बड़ा नहीं।
डॉ. कृष्णकांत श्रीवास्तव
3 days ago7 min read


सूरदास की झोंपड़ी
रात के दो बजे होंगे कि अकस्मात् सूरदास की झोंपड़ी से ज्वाला उठी। लोग अपने-अपने द्वारों पर सो रहे थे। निद्रावस्था में भी उपचेतना जागती रहती है। दम-के-दम में सैकड़ों आदमी जमा हो गए। आसमान पर लाली छाई हुई थी, ज्वालाएँ लपक-लपककर आकाश की ओर दौड़ने लगीं। कभी उनका आकार
प्रेमचंद
6 days ago11 min read


नरेंद्र का प्रश्न
अपने समाधान में विफल नरेंद्र फिर कोलाहलयुक्त महानगरी के एक कोने में स्थित अपने घर लौट आए। महर्षि के इस उत्तर से उनकी जिज्ञासा नहीं मिटी। इसके बाद दूसरे किसी धर्मगुरु के समक्ष भी उन्होंने यही एक प्रश्न रखा- क्या आपने भगवान् को देखा है?" किंतु सभी मौन रहे। किसी के पास भी नरेंद्र के प्रश्न का उत्तर नहीं था।
मुकेश ‘नादान’
6 days ago2 min read


ज़रीन खान: चकाचौंध से परे एक जीवन
प्रसिद्धि समय के साथ बदल सकती है। पेशे बदल सकते हैं। जीवन की परिस्थितियाँ भी हमेशा एक जैसी नहीं रहतीं। लेकिन किसी व्यक्ति ने दूसरों के जीवन को किस प्रकार छुआ, यह बात उसके जाने के बाद भी स्मृतियों में बनी रह सकती है। ज़रीन खान अब हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनका रचनात्मक कार्य, परिवार के साथ उनका जीवन और उनसे जुड़ी स्मृतियाँ उनके जीवन की कहानी को आगे बढ़ाती रहेंगी। क्योंकि किसी जीवन की पूरी कहानी उसके अंतिम दिन पर समाप्त नहीं होती; उसका एक हिस्सा उन लोगों के हृदय में आगे भी लिखा
सुजाता सिंह
Sep 194 min read


मुस्कान के उस पार
पटना के पुराने मोहल्लों की अपनी एक अलग दुनिया है। वहाँ घर केवल ईंट और पत्थरों से नहीं बने होते, बल्कि एक-दूसरे से जुड़ी स्मृतियों, रिश्तों और अनकही कहानियों से भी बने होते हैं। संकरी गलियाँ, एक-दूसरे से सटी दीवारें और कुछ ही फुट की दूरी पर बनी छतें—जहाँ पड़ोसियों की बातचीत के साथ कभी-कभी दिलों की धड़कनें भी एक-दूसरे तक पहुँच जाती हैं।
दीपा शर्मा
Sep 1912 min read


श्रद्धा से प्रकट हुए महादेव
भक्ति में दिखावे से अधिक भाव का महत्त्व है और शक्ति की वास्तविक शोभा विनम्रता में है। जिस हृदय में श्रद्धा और समर्पण का प्रकाश होता है, वहाँ साधारण वस्तु भी ईश्वर-स्मरण का माध्यम बन सकती है।
डॉ. कृष्णा कांत श्रीवास्तव
Sep 166 min read


प्रतीक्षा
उसकी मित्रता मेरे लिए अनोखी थी, मेरी आवश्यकता बन गई थी। आज तीन वर्ष के क़रीब हो गए… आज भी जब कभी फोन बजता है तो मैं "हाय प्रीति, क्या कर रही हो?" सुनने के लिए दौड़ पड़ती हूं। क्या फिर कभी वह फोन करेगा? पता नहीं वह ज़िंदा भी है या… पता नहीं, मन में ये अपशकुन क्यों आता है? मैं इंतज़ार करूंगी। कभी तो उसे मेरी याद आएगी… शायद यह कहानी पढ़कर, यदि किसी तरह यह उस तक पहुंच जाए, वह जान सकेगा कि मैं उसके फोन का कितनी बेसब्री से इंतज़ार कर रही हूं।
संगीता शर्मा
Sep 1510 min read


सपनों की उड़ान
इन छोटी बातों को लेकर अब आप किसी को भी मरने पर मजबूर नहीं कर सकते। अब हमारे पंखों को भी उड़ान मिल चुका है। अब न्याय मिलना किसी की बपौती नहीं, न ही कोई यह कह सकता है कि तुम पर सिर्फ मेरा अधिकार है,इसलिये अपनी पद प्रतिष्ठा को ध्यान में रखते हुए केवल गाँव की भलाई सोचिए– कहते हुए आशा ने अपना बैग उठाया और आत्मविश्वास के साथ उड़ान भरने की दिशा में कदम बढ़ा दिया।
वीणा कुमारी
Sep 152 min read


धूम्रपान- एक आह्वान
निराशा को दूर कर
आशा की किरण दिखाता
अरे मूढ़! पीले मेरा धुआं,
हृदयसात् करले मुझे
मेरा अक्स तेरे दिल पर,
पड़े बिना नहीं रह सकता।
तब कहना
हाय! हाय!
साची सेठ
Sep 121 min read


इशारा
आज पिंकी के माता-पिता को गए पन्द्रह दिन हो गए थे और अमित का घर एकदम सुचारू रूप से चल रहा था। उनके बूढ़े माँ-बाप बिल्कुल आराम से घर में रह रहे थे । सुबह शाम गृह सहायिका आ कर घर के कामों में हाथ बंटाती थी और पिंकी सास ससुर व पति का अच्छे से ख्याल रखती, क्योंकि वो अमित का दिया हुआ इशारा समझ गई थी कि यदि उसने फिर कोई गड़बड़ की तो....ठीक नहीं होगा।
शुभम गुप्ता
Sep 124 min read


कोफ्ता-करी
पर वो सिर्फ इस मकान में ही नहीं दुनिया में भी अकेली ही थी। बचपन में ही माता पिता की मृत्यु के बाद दादी ने पाला। चाचा चाची ने भी अपनी जिम्मेदारी अच्छे से निभाई, किसी चीज़ की कमी नहीं होने दी केवल एक माता पिता के प्रेम के अलावा जो वे अपने बच्चों से करते। मासूम बच्ची कोमल अपने बनाये कोकून में सिमटकर रह गई।
संगीता अग्रवाल
Sep 65 min read


एक चुटकी ईमानदारी
ईमानदारी बड़ी घटनाओं से नहीं, छोटे फैसलों से जन्म लेती है। जब हम दूसरों की मजबूरी का लाभ उठाना छोड़ देते हैं - तभी समाज सच में मजबूत बनता है।
डॉ. कृष्णा कांत श्रीवास्तव
Sep 62 min read


शिक्षक दिवस
इस तरह अम्रतकाल में,
शिक्षक दिवस मनाएं,
राष्ट्र का गौरव बढ़ाएं,
आओ शिक्षक दिवस मनाएं !
अशोक कुमार बाजपेई
Sep 51 min read


नींव का पत्थर
नींव का पत्थर हूँ, दिखाई नहीं देता
इमारत की बुलंदी का मज़ा भरपूर लेता।
गहराई विचारों की, व्यक्तित्व की,
लम्हों की तो कभी अपनत्व की,
कहते सब हैं, समझते कम हैं,
गुजरते तो सब हैं पर कहते कम हैं।
साची सेठ
Aug 211 min read


ईदगाह
बुढ़िया का क्रोध तुरंत स्नेह में बदल बच्चे में कितना त्याग, कितना सद्भाव और कितना विवेक है! दूसरों को खिलौने लेते और मिठाई आकर इसका कितना ललचाया होगा? वहाँ इसे अपनी बुढ़िया दादी याद बनी रही। वहाँ भी इसे अपनी बुढ़िया दादी की याद बनी रही। अमीना का मन गद्गद हो गया।
वह रोने लगी। दामन फैलाकर हामिद को दुआएँ देती जाती थी और आँसू की बड़ी-बड़ी बूँदें गिराती जाती थी।
प्रेमचंद
Aug 219 min read


चरित्र की दृढ़ता
नरेंद्रनाथ चले गए। वह युवती भी हतबुद्धि होकर उन मित्रों के निकट लौटकर बोली, "एक साधू को लुभाने के लिए भेजकर आप लोगों ने खूब मजाक किया।" यह घटना एक ओर जिस प्रकार नरेंद्रनाथ के चरित्र की दृढ़ता दिखाती है, दूसरी ओर प्रमाणित करती है कि उनका मनोबल कितना दृढ़ था।
मुकेश ‘नादान’
Aug 132 min read


उम्मीद का चिराग
”सबसे बड़ा सबक यह है कि कभी हिम्मत ना हारो। हालात कितने भी मुश्किल हों, अगर आप अपने रब पर भरोसा रखें और मेहनत जारी रखें, तो कोई ताकत आपके ख्वाब दफन नहीं कर सकती।”
तालियां बजने लगीं। समीना ने दिल ही दिल में दुआ की कि उसकी कहानी दूसरों के लिए उम्मीद का चिराग बने।
राम प्रसाद वर्मा
Jul 275 min read


शतरंज के खिलाड़ी
वाजिद अली शाह का समय था। लखनऊ विलासिता के रंग में डूबा हुआ था। छोटे-बड़े, अमीर-ग़रीब, सभी विलासिता में डूबे हुए थे। कोई नृत्य और गान की मजलिस सजाता था, तो कोई अफ़ीम की पीनक ही में मज़े लेता था। जीवन के प्रत्येक विभाग में आमोद-प्रमोद का प्राधान्य था।
प्रेमचंद
Jul 2613 min read


ध्यानपरायणता
उसी समय युवक भक्तों ने बहुत हिसाबी गृहस्थों के श्रीरामकृष्ण के कमरे में प्रवेश पर रोक लगा दी। अतः सुरेंद्र, राम आदि सभी रामकृष्ण के दर्शन से वंचित हो गए। अंत में श्रीरामकृष्ण की मध्यस्थता से इस विवाद का समाधान हुआ।
मुकेश ‘नादान’
Jul 262 min read
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