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मैं न चुप हूँ न गाता हूँ
न मैं चुप हूँ न गाता हूँ
सवेरा है मगर पूरब दिशा में
घिर रहे बादल
रूई से धुंधलके में
मील के पत्थर पड़े घायल
ठिठके पाँव
ओझल गाँव
जड़ता है न गतिमयता
अटल बिहारी वाजपेयी
Oct 171 min read


मेरी याद
तब याद करना तुम सफ़र में किसी मुझे,
मैं हमसफ़र बनके मिलूँगी तुम्हे!!
जब यूँ ही एक दिन मेरी याद आ जाये!
आँखें मूँद लेना, तुझमें ही हँसूँगी मैं!!
संगीता शर्मा
Oct 101 min read


She Carries Both
She simply continues—
quiet, steady, unseen.
Because carrying both
has become her way of life
Dr. Shanno Tiwari
Oct 82 min read


छोटी बह्र में एक ग़ज़ल !!
अश्के-नदामत से क्या कोई
पाप भी अपने धो सकता है
शाइर को ये सहूलत है वो
शे’र में दर्द पिरो सकता है
उसको ही मिलता है रब जो
“मधुमन” ‘मैं ‘ को खो सकता है
मधु मधुमन
Oct 51 min read


कैसे करूँ मैं कन्यादान
आज विदाई की बेला में,
समझ नहीं आता मुझको,
कैसे निकाल दूँ शरीर से,
अपने ही दिल को?
चाहती हूँ भूलना अतीत,
पर भुला नहीं पाती हूँ,
अनजाने ही अतीत की यादों में खो जाती हूँ।।
घर बाहर का टेंशन गुस्सा,
तुम पर ही तो उतारती थी,
पर मुस्कुराती थी तभी मैं
डॉ० शन्नो तिवारी
Sep 262 min read


रिश्ता रूह का
रात के तीसरे पहर में
तुम अपना सर रख कर विश्राम कर लेना यहाँ
क्योंकि अगले पहर
संसार का सूरज तुम्हें इसकी आज्ञा न दे शायद
और फिर
मेरी पीठ में नम पड़ते हुए
तमाम सूरज भी तो
अपने उगने की प्रतीक्षा में रहेंगे...
है ना....!!!
श्याम मुकर्जी
Mar 272 min read


लड़की हूँ,
वो गुलशन जो, खाद-धूप को,
पाकर भी, गुलज़ार नहीं हूँ
मैं वो सपना, जो आँखों में,
आकर भी साकार नहीं हूँ
जो देखा, जो जाना,
जो महसूस किया, लफ़्ज़ों में ढाला
मैने अपनी, बात कही बस,
मैं कोई, फ़नकार नहीं हूँ
हुस्न, मौसिकी, रंग, नज़ारे,
सब कुछ ही संसार हैं उसका
आँचल सक्सैना
Feb 261 min read


एहसास एक अनुभूति
पति पत्नी का प्रेम वहीं तक
जब तक एक दूजे का साथ निभाया।
एक ने भी गर दामन छोड़ दिया
तो यह रिश्ता भी हो जाता पराया।
बबिता चौधरी "राही"
Feb 251 min read


सपनों के सौदागर
यदि सपनों के सौदागर होते
हम होते नील गगन में,
मन की बातें, मन की चाहें
पूरी हो जातीं इक पल में,
हम भी बड़े महल में होते
राजकुमारी होते।
यदि सपनों के सौदागर होते
सपनों में ही रहते,
कुटिया के बर्तन भी फिर तो
सोने की सब होते,
पेड़ों पर रसगुल्ले होते
तोड़ तोड़ कर खाते।
साची सेठ
Feb 231 min read


असमय की एक कविता
आजकल एकदम खाली हूँ
इतना खाली कि मेरे हिस्से
कोई काम ही नहीं बचा,
कभी समय मुझ पर हँसता है
कभी मैं समय पर
और यह भी क्या इत्तेफाक़ है
मेरा समय सापेक्ष होना
मुझे निरपेक्षता का सिद्धान्त समझा रहा है
संदीप तोमर
Feb 192 min read


कवि का दुख
मेरा यह लघुतम जीवन
जो किसी के किसी काम का नहीं
जिसे पाकर मैंने पाए हैं
अनगिनत दु:ख और किन्चित सुख भी।
दु:खों की श्रृंखला की पहली कड़ी
कौन सी थी ठीक से याद नहीं
यह भी नहीं कि किसका
विस्तार कितना था
और गहराई में अधिक कौन था
यह याद है
जो भी आया उसने चमकाया मुझे
नींबूमँजे बर्तनों की तरह।
धोया मुझे श्वेताभ तरल से वह
अकसर कटाक्ष के बाण पर
सवार होकर आता था
और छेद जाता था
मेरे स्नेहिल हृदय का मुख।
मैंने हरदम ढकेला इसे अदम्य साहस
और धैर्य धना हि साधव:
सूक्ति के बलपर
प्रियंवदा पाण्डेय
Jan 61 min read


अरमान
मेरी हर बात का वो
मान बहुत रखता है
उसपे ये भी कि मेरा
ध्यान बहुत रखता है
मेरी हर फिक्र को
ले जाएगा अपने माथे
यानी वो ज़िंदगी
आसान बहुत रखता है
उसके अरमान कई,
अब भी अधूरे हैं मगर
देखिए फिर भी वो
अरमान बहुत रखता है
दिल के बाहर,
वो सजा रखता है गुलशन
लेकिन दिल के अंदर,
वो बयाबान बहुत रखता है।
जीत कुमारी
Jan 41 min read


अपनों के बीच
कई बार
लौटते-लौटते
बहुत देर हो जाती है।
इतनी देर कि
हम खुद को भी
पहचान नहीं पाते।
अपना पता भी
ढूंढ़ नहीं पाते।
अपना शहर, अपनी गलियां
भूल चुकी होती हैं हमें।
खत्म हो चुके होते हैं
जाने कितने जन्म,
जाने कितने रिश्ते।
और इस तरह
हमारा लौटना,
लौटना नहीं होता।
हम सिर्फ आ जाते हैं
अनचाहे और अनजाने से
उन अपनों के बीच,
जिन्होंने कभी
हमारे लौट आने की
जाने कितनी दुआएं मांगी थीं
करुणा शंकर अवस्थी
Jan 1, 20261 min read


विचार स्नान
मैं सुंदर हो गया हूँ।
त्याग कर मनमैल।
मैं निर्मल हो गया हूँ।
मैं फिर सुंदर हो गया हूँ।।
कितना सुघड़ है ये पात्र खाली
कितना मधुर संगीत इसका।
डॉ. जहान सिंह ‘जहान’
Dec 28, 20251 min read


बच्चों से क्षमा मांगो
प्रो.पुनीत शुक्ला तुम अपने उन बच्चों से तुरन्त क्षमा माँगो जिनको तुमने केवल इस बात पर पीट दिया क्योंकि उन्होंने तुम्हारी बात नहीं...
प्रो.पुनीत शुक्ला
Jul 4, 20251 min read


कहानी कैसे लिखूँ?
आदित्य नारायण शुक्ला ओस से लिखूँ या अश्कों से लिखूँ मैं दिल की कहानी कैसे लिखूँ...?? फूलों पे लिखूँ या हाथों पे लिखूँ होंठों की ज़बानी...
आदित्य नारायण शुक्ला
Feb 10, 20251 min read


सबसे प्रेम किया
नवीन रांगियाल मैं उन सीढ़ियों से भी प्रेम करता हूँ जिन पर चलकर उससे मिलने जाया करता था और उस खिड़की से भी जिसके बाहर देखती थीं उसकी उदास...
नवीन रांगियाल
Jul 16, 20241 min read


मातृभाषा की मौत
जसिंता केरकेट्टा माँ के मुँह में ही मातृभाषा को क़ैद कर दिया गया और बच्चे उसकी रिहाई की माँग करते-करते बड़े हो गए। मातृभाषा ख़ुद नहीं मरी...
जसिंता केरकेट्टा
Jul 14, 20241 min read


स्त्री की हत्या
अदनान कफ़ील दरवेश कुर्सियाँ उल्टी पड़ी हैं तंदूर बुझ चुका है आस-पास पानी गिरने से ज़मीन काफ़ी हँचाड़ हो गई है पत्तलों के ऊढे़ लगे हुए हैं...
अदनान कफ़ील दरवेश
Jul 3, 20242 min read
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