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कवि का दुख
मेरा यह लघुतम जीवन
जो किसी के किसी काम का नहीं
जिसे पाकर मैंने पाए हैं
अनगिनत दु:ख और किन्चित सुख भी।
दु:खों की श्रृंखला की पहली कड़ी
कौन सी थी ठीक से याद नहीं
यह भी नहीं कि किसका
विस्तार कितना था
और गहराई में अधिक कौन था
यह याद है
जो भी आया उसने चमकाया मुझे
नींबूमँजे बर्तनों की तरह।
धोया मुझे श्वेताभ तरल से वह
अकसर कटाक्ष के बाण पर
सवार होकर आता था
और छेद जाता था
मेरे स्नेहिल हृदय का मुख।
मैंने हरदम ढकेला इसे अदम्य साहस
और धैर्य धना हि साधव:
सूक्ति के बलपर
प्रियंवदा पाण्डेय
Jan 61 min read


अरमान
मेरी हर बात का वो
मान बहुत रखता है
उसपे ये भी कि मेरा
ध्यान बहुत रखता है
मेरी हर फिक्र को
ले जाएगा अपने माथे
यानी वो ज़िंदगी
आसान बहुत रखता है
उसके अरमान कई,
अब भी अधूरे हैं मगर
देखिए फिर भी वो
अरमान बहुत रखता है
दिल के बाहर,
वो सजा रखता है गुलशन
लेकिन दिल के अंदर,
वो बयाबान बहुत रखता है।
जीत कुमारी
Jan 41 min read


अपनों के बीच
कई बार
लौटते-लौटते
बहुत देर हो जाती है।
इतनी देर कि
हम खुद को भी
पहचान नहीं पाते।
अपना पता भी
ढूंढ़ नहीं पाते।
अपना शहर, अपनी गलियां
भूल चुकी होती हैं हमें।
खत्म हो चुके होते हैं
जाने कितने जन्म,
जाने कितने रिश्ते।
और इस तरह
हमारा लौटना,
लौटना नहीं होता।
हम सिर्फ आ जाते हैं
अनचाहे और अनजाने से
उन अपनों के बीच,
जिन्होंने कभी
हमारे लौट आने की
जाने कितनी दुआएं मांगी थीं
करुणा शंकर अवस्थी
Jan 1, 20261 min read


विचार स्नान
मैं सुंदर हो गया हूँ।
त्याग कर मनमैल।
मैं निर्मल हो गया हूँ।
मैं फिर सुंदर हो गया हूँ।।
कितना सुघड़ है ये पात्र खाली
कितना मधुर संगीत इसका।
डॉ. जहान सिंह ‘जहान’
Dec 28, 20251 min read


बच्चों से क्षमा मांगो
प्रो.पुनीत शुक्ला तुम अपने उन बच्चों से तुरन्त क्षमा माँगो जिनको तुमने केवल इस बात पर पीट दिया क्योंकि उन्होंने तुम्हारी बात नहीं...
प्रो.पुनीत शुक्ला
Jul 4, 20251 min read


कहानी कैसे लिखूँ?
आदित्य नारायण शुक्ला ओस से लिखूँ या अश्कों से लिखूँ मैं दिल की कहानी कैसे लिखूँ...?? फूलों पे लिखूँ या हाथों पे लिखूँ होंठों की ज़बानी...
आदित्य नारायण शुक्ला
Feb 10, 20251 min read


सबसे प्रेम किया
नवीन रांगियाल मैं उन सीढ़ियों से भी प्रेम करता हूँ जिन पर चलकर उससे मिलने जाया करता था और उस खिड़की से भी जिसके बाहर देखती थीं उसकी उदास...
नवीन रांगियाल
Jul 16, 20241 min read


मातृभाषा की मौत
जसिंता केरकेट्टा माँ के मुँह में ही मातृभाषा को क़ैद कर दिया गया और बच्चे उसकी रिहाई की माँग करते-करते बड़े हो गए। मातृभाषा ख़ुद नहीं मरी...
जसिंता केरकेट्टा
Jul 14, 20241 min read


स्त्री की हत्या
अदनान कफ़ील दरवेश कुर्सियाँ उल्टी पड़ी हैं तंदूर बुझ चुका है आस-पास पानी गिरने से ज़मीन काफ़ी हँचाड़ हो गई है पत्तलों के ऊढे़ लगे हुए हैं...
अदनान कफ़ील दरवेश
Jul 3, 20242 min read


क्या कुछ बदला
सन्दीप तोमर क्या कुछ बदला मेरे होने या न होने से धरती आज भी उसी रफ्तार से घूम रही है चाँद भी उसी तरह अपनी चाँदनी बिखेर रहा है ध्वल रोशनी...
सन्दीप तोमर
May 13, 20241 min read


संभावनाएँ
कुँवर नारायण लगभग मान ही चुका था मैं मृत्यु के अंतिम तर्क को कि तुम आए और कुछ इस तरह रखा फैलाकर जीवन के जादू का भोला-सा इंद्रजाल कि लगा...
कुँवर नारायण
May 11, 20241 min read


नर हो, न निराश करो मन को
मैथिलीशरण गुप्त नर हो, न निराश करो मन को कुछ काम करो, कुछ काम करो जग में रह कर कुछ नाम करो यह जन्म हुआ किस अर्थ अहो समझो जिसमें यह व्यर्थ...
मैथिलीशरण गुप्त
Apr 10, 20241 min read


एक व्यक्ति
विनोद कुमार शुक्ल हताशा से एक व्यक्ति बैठ गया था व्यक्ति को मैं नहीं जानता था हताशा को जानता था इसलिए मैं उस व्यक्ति के पास गया मैंने हाथ...
विनोद कुमार शुक्ल
Mar 29, 20241 min read


यादों के झरोखे से…
डॉ. जहान सिंह “जहान” कोई यहां रहता था। वैसे इस रास्ते से कम गुजरता हूं। डरता हूं मेरे चेहरे पर उसका कोई नाम ना पढ़ ले। बस्तियों का क्या...
डॉ. जहान सिंह “जहान”
Feb 25, 20242 min read


जिंदगी
सुरेंद्र गुप्त सीकर मेरे संग आगे-आगे जाती हुई लड़की मेरे संग पीछे-पीछे आती हुई लड़की रोती हुई रूठी और मनाती हुई लड़की पल-पल मृदु मुस्काती...
सुरेंद्र गुप्त सीकर
Feb 2, 20241 min read


समर्पण
प्राची मिश्रा आराधन तुम प्रियवर मेरा हियवंदन नित करते जाना जीवन का तुम आधार प्रिये तृण तृण हमको ढलते जाना। किस ओर चला ये मन मेरा किसने...
प्राची मिश्रा
Feb 2, 20241 min read


अपना बचपन
शंकर पांडे पुराने चौक चौबारे मुहब्बत से बुलाते हैं। चलो न गाँव को हम फिर से वापस लौट जाते हैं। जहाँ पर छोड़ आए थे वो कच्चे आम की डाली।...
शंकर पांडे
Feb 1, 20241 min read


ख्वाब
डॉ. कृष्णा कांत श्रीवास्तव रोटी की भाग दौड़ में मैं, प्यार जताना भूल गया। सिर पर कामों का बोझ लाद, मैं दिन भर फिरता रहता था। जीवन की...
Rachnakunj .
Jan 22, 20241 min read


किस घर की बेटी
अनजान (एक कवि नदी के किनारे खड़ा था। तभी वहाँ से एक लड़की का शव नदी में तैरता हुआ जा रहा था। तो तभी कवि ने उस शव से पूछा ----) कौन हो तुम...
Rachnakunj .
Jan 6, 20241 min read


इंकलाब लिखता हूँ।
अमरेन्द्र मैं जो भी लिखता हूँ, इंकलाब लिखता हूँ। किसी के दुख-दर्द से, जुड़ा सवाल लिखता हूँ। मैं तो बस इतना ही, काम करता हूँ। हर अन्याय के...
Rachnakunj .
Nov 1, 20231 min read
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