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अपना बचपन

शंकर पांडे

  

पुराने चौक चौबारे
मुहब्बत से बुलाते हैं।
चलो न गाँव को हम फिर
से वापस लौट जाते हैं।
जहाँ पर छोड़ आए थे
वो कच्चे आम की डाली।
वहीं रातों में अक्सर
अब भी जुगनू जगमगाते हैं।
करौंदे तोड़ कर लाएं
चलो छुप कर के माली से
वहीं बरगद की छाँव में
कोई झूला लगाते हैं।
वहीं उस पास वाले
हाट ओ बाज़ार जाएंगे।
वो चूल्हे वाली लज़्ज़्त
आज मिलकर संग उठाते हैं।
वो जर्जर सी पुरानी
पाठशाला की कोई कक्षा
पुराने पल वो बचपन में
ज़रा सा लौट जाते हैं।
चलो आषाढ़ की इक
दोपहर में माँ से लुक-छुप कर
बगीचे से किसी के फिर
कोई लीची चुराते हैं।
रहा हर रंग ही फ़ीका
शहर की होलियों का अब
चलो अब गाँव की मिट्टी से
मिलकर रंग बनाते हैं।
बड़ी मुद्दत हुई "सन्दल" हैं
तरसे इक तबस्सुम को
चलो फिर बचपने में
जा के थोड़ा मुस्कुराते हैं।

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