top of page
OUR BLOGS


मन का मौसम
जीवन भी ऋतुओं की तरह निरंतर बदलता रहता है। कभी सफलता की धूप खिलती है, कभी कठिनाइयों की वर्षा होती है और कभी निराशा की ठंड हमें घेर लेती है। परिस्थितियां सदैव हमारे अनुसार नहीं होतीं, किंतु उनके प्रति अपना दृष्टिकोण चुनना हमारे हाथ में होता है।
स्वस्थ शरीर, प्रसन्न मन और सकारात्मक सोच हो, तो हर ऋतु सुंदर और हर परिस्थिति शिक्षाप्रद बन जाती है। आनंद बाहर के मौसम में नहीं, बल्कि हमारे भीतर के मौसम में बसता है।
डॉ. कृष्णकांत श्रीवास्तव
6 days ago6 min read


दहेज की दीवार
अन्याय के सामने मौन रहना भी पीड़ित की वेदना बढ़ा सकता है। इसलिए सही समय पर सही बात कहने का साहस आवश्यक है। साथ ही, प्रायश्चित का अर्थ किसी दूसरे व्यक्ति पर अपना निर्णय थोपना नहीं; अपनी गलती स्वीकार करना, क्षमा मांगना और सुधार का मार्ग चुनना है। विवाह प्रेम, समानता और स्वतंत्र सहमति का संबंध है—सौदेबाजी का नहीं।
डॉ. शन्नो तिवारी
Oct 1912 min read


नादान दोस्त
माँ को हँसी आ गई। मगर केशव को कई दिनों तक अपनी ग़लती पर अफ़सोस होता रहा। अंडों की हिफ़ाज़त करने के जोग में उसने उनका सत्यानाश कर डाला। इसे याद कर वह कभी-कभी रो पड़ता था।
दोनों चिड़ियाँ वहाँ फिर न दिखाई दीं।
प्रेमचंद
Oct 176 min read


सोच की उड़ान
यदि आज साधन सीमित हैं तो निराश मत होइए। यदि शुरुआत छोटी है तो उसे कमजोरी मत समझिए। और यदि परिस्थितियाँ आपके अनुकूल नहीं हैं, तब भी अपने सपनों की सीमा परिस्थितियों को तय मत करने दीजिए। आज आपकी थाली छोटी हो सकती है, लेकिन आपकी सोच छोटी नहीं होनी चाहिए।
डॉ. कृष्णकांत श्रीवास्तव
Oct 108 min read


लोभ का अथाह कुआँ
आवश्यकताओं की पूर्ति जीवन का स्वाभाविक हिस्सा है, लेकिन अधिक पाने की इच्छा जब विवेक, आत्मसम्मान और मानवीय मूल्यों पर हावी होने लगे, तब वही इच्छा बंधन बन जाती है। संतोष का अर्थ प्रयास छोड़ देना नहीं है। उसका अर्थ है—प्रयास करते हुए भी यह पहचान बनाए रखना कि किस उपलब्धि के लिए हमें क्या मूल्य चुकाना पड़ रहा है। क्योंकि लोभ के कुएँ से बाहर निकलने की पहली सीढ़ी है, यह स्वीकार करना कि हम उसमें उतर रहे हैं।
डॉ. कृष्णकांत श्रीवास्तव
Oct 89 min read


अंतिम यात्रा से पहले
जीवन की अनिश्चितता हमें याद दिलाती है कि हमारे पास वास्तव में केवल वर्तमान क्षण है। जीवन की सार्थकता केवल उसकी लंबाई में नहीं, बल्कि उसमें समाहित प्रेम, करुणा, कृतज्ञता और सद्कर्मों में भी होती है।
डॉ. कृष्णकांत श्रीवास्तव
Oct 67 min read


सूरदास की झोंपड़ी
रात के दो बजे होंगे कि अकस्मात् सूरदास की झोंपड़ी से ज्वाला उठी। लोग अपने-अपने द्वारों पर सो रहे थे। निद्रावस्था में भी उपचेतना जागती रहती है। दम-के-दम में सैकड़ों आदमी जमा हो गए। आसमान पर लाली छाई हुई थी, ज्वालाएँ लपक-लपककर आकाश की ओर दौड़ने लगीं। कभी उनका आकार
प्रेमचंद
Sep 2311 min read


ज़रीन खान: चकाचौंध से परे एक जीवन
प्रसिद्धि समय के साथ बदल सकती है। पेशे बदल सकते हैं। जीवन की परिस्थितियाँ भी हमेशा एक जैसी नहीं रहतीं। लेकिन किसी व्यक्ति ने दूसरों के जीवन को किस प्रकार छुआ, यह बात उसके जाने के बाद भी स्मृतियों में बनी रह सकती है। ज़रीन खान अब हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनका रचनात्मक कार्य, परिवार के साथ उनका जीवन और उनसे जुड़ी स्मृतियाँ उनके जीवन की कहानी को आगे बढ़ाती रहेंगी। क्योंकि किसी जीवन की पूरी कहानी उसके अंतिम दिन पर समाप्त नहीं होती; उसका एक हिस्सा उन लोगों के हृदय में आगे भी लिखा
सुजाता सिंह
Sep 194 min read


श्रद्धा से प्रकट हुए महादेव
भक्ति में दिखावे से अधिक भाव का महत्त्व है और शक्ति की वास्तविक शोभा विनम्रता में है। जिस हृदय में श्रद्धा और समर्पण का प्रकाश होता है, वहाँ साधारण वस्तु भी ईश्वर-स्मरण का माध्यम बन सकती है।
डॉ. कृष्णा कांत श्रीवास्तव
Sep 166 min read


सपनों की उड़ान
इन छोटी बातों को लेकर अब आप किसी को भी मरने पर मजबूर नहीं कर सकते। अब हमारे पंखों को भी उड़ान मिल चुका है। अब न्याय मिलना किसी की बपौती नहीं, न ही कोई यह कह सकता है कि तुम पर सिर्फ मेरा अधिकार है,इसलिये अपनी पद प्रतिष्ठा को ध्यान में रखते हुए केवल गाँव की भलाई सोचिए– कहते हुए आशा ने अपना बैग उठाया और आत्मविश्वास के साथ उड़ान भरने की दिशा में कदम बढ़ा दिया।
वीणा कुमारी
Sep 152 min read


इशारा
आज पिंकी के माता-पिता को गए पन्द्रह दिन हो गए थे और अमित का घर एकदम सुचारू रूप से चल रहा था। उनके बूढ़े माँ-बाप बिल्कुल आराम से घर में रह रहे थे । सुबह शाम गृह सहायिका आ कर घर के कामों में हाथ बंटाती थी और पिंकी सास ससुर व पति का अच्छे से ख्याल रखती, क्योंकि वो अमित का दिया हुआ इशारा समझ गई थी कि यदि उसने फिर कोई गड़बड़ की तो....ठीक नहीं होगा।
शुभम गुप्ता
Sep 124 min read


कोफ्ता-करी
पर वो सिर्फ इस मकान में ही नहीं दुनिया में भी अकेली ही थी। बचपन में ही माता पिता की मृत्यु के बाद दादी ने पाला। चाचा चाची ने भी अपनी जिम्मेदारी अच्छे से निभाई, किसी चीज़ की कमी नहीं होने दी केवल एक माता पिता के प्रेम के अलावा जो वे अपने बच्चों से करते। मासूम बच्ची कोमल अपने बनाये कोकून में सिमटकर रह गई।
संगीता अग्रवाल
Sep 65 min read


ईदगाह
बुढ़िया का क्रोध तुरंत स्नेह में बदल बच्चे में कितना त्याग, कितना सद्भाव और कितना विवेक है! दूसरों को खिलौने लेते और मिठाई आकर इसका कितना ललचाया होगा? वहाँ इसे अपनी बुढ़िया दादी याद बनी रही। वहाँ भी इसे अपनी बुढ़िया दादी की याद बनी रही। अमीना का मन गद्गद हो गया।
वह रोने लगी। दामन फैलाकर हामिद को दुआएँ देती जाती थी और आँसू की बड़ी-बड़ी बूँदें गिराती जाती थी।
प्रेमचंद
Aug 219 min read


उम्मीद का चिराग
”सबसे बड़ा सबक यह है कि कभी हिम्मत ना हारो। हालात कितने भी मुश्किल हों, अगर आप अपने रब पर भरोसा रखें और मेहनत जारी रखें, तो कोई ताकत आपके ख्वाब दफन नहीं कर सकती।”
तालियां बजने लगीं। समीना ने दिल ही दिल में दुआ की कि उसकी कहानी दूसरों के लिए उम्मीद का चिराग बने।
राम प्रसाद वर्मा
Jul 275 min read


शतरंज के खिलाड़ी
वाजिद अली शाह का समय था। लखनऊ विलासिता के रंग में डूबा हुआ था। छोटे-बड़े, अमीर-ग़रीब, सभी विलासिता में डूबे हुए थे। कोई नृत्य और गान की मजलिस सजाता था, तो कोई अफ़ीम की पीनक ही में मज़े लेता था। जीवन के प्रत्येक विभाग में आमोद-प्रमोद का प्राधान्य था।
प्रेमचंद
Jul 2613 min read


असली कमाई
बाहर बोर्ड के नीचे लिखा है—”Powered by People, Not Just Profit”। रामू काका आसमान की ओर देखते हैं—”भाग्य नहीं बदला, नियत बदल गई, और सब बदल गया।”
अशोक कुमार
Jul 133 min read


ब्लैकमेल
बंटी नाम का अतीत का, काला पन्ना, आरोही की जिंदगी में से हमेशा-हमेशा के लिये बंद हो गया था। उसकी आँखों में योगेश के साथ, विवाह करके, विवाहित जीवन बिताने के इंद्रधनुषी सपने झिलमिला रहे थे।
राजेश त्रिपाठी
Jun 63 min read


पूस की रात
दोनों फिर खेत के डाँड़ पर आए। देखा, सारा खेत रौंदा पड़ा हुआ है और जबरा मड़ैया के नीचे चित लेटा है, मानो प्राण ही न हों।
दोनों खेत की दशा देख रहे थे। मुन्नी के मुख पर उदासी छायी थी, पर हल्कू प्रसन्न था।
मुन्नी ने चिंतित होकर कहा—अब मजूरी करके मालगुजारी भरनी पड़ेगी।
हल्कू ने प्रसन्न मुख से कहा—रात को ठंड में यहाँ सोना तो न पड़ेगा।
प्रेमचंद
Jun 58 min read


लैला
लैला के स्वर-लालित्य की कल्पना करनी हो, तो उस घंटी की अनवरत ध्वनि की कल्पना कीजिए जो निशा की निस्तब्धता में ऊंटों की गरदनों में बजती हुई सुनायी देती हैं, या उस बांसुरी की ध्वनि की जो मध्यान्ह की आलस्यमयी शांति में किसी वृक्ष की छाया में लेटे हुए चरवाहे के मुख से निकलती है।
प्रेमचंद
Jun 523 min read
bottom of page

