कोफ्ता-करी
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संगीता अग्रवाल
"आज फिर देरी हो गई, अरे ये भी फिर से टूट गई" स्कूल में सफाई कर्मचारी का काम करती है सुमित्रा, हमेशा की तरह जल्दी में चलती हुई आ रही थी कि उसकी चप्पल टूटी गई। फिर क्या! उसने फिर एक पिन अपने मंगलसूत्र से निकालकर चप्पल में लगा दी।
"क्या रे सुमित्रा और कितने पिन टोचेगी इस चप्पल को? माफ़ कर दे अब उसे, बहुत सेवा करली तेरी उसने" स्कूल के वॉचमेन सुरेश ने कहा।
"अगली पगार में पक्का ले लूंगी रे सुरेश, चल मैं चलती हूँ बहुत देर हो गई पहले ही।" बोलते हुए सुमित्रा हड़बड़ाहट में आगे बड़ी ही थी कि स्टाफ रूम में जा रही कोमल मिस से टकरा गई। टक्कर इतनी तेज़ थी कि दोनों के हाथ में जो खाने का बैग था उसमें से डब्बे बाहर आ गये, ये देखने कहीं हमारे मालिक को कुछ हुआ तो नहीं। खैरे जल्दबाजी और हड़बड़ाहट में सुमित्रा ने कोमल से माफी मांगते हुए डब्बे बैग में रख दिये। सुमित्रा अपने काम में लग गई और कोमल ने ना डब्बे का हाल देख ना खैरीयत देखी, वो चल दी अपनी क्लास की तरफ।
दोपहर में लंच की घंटी बजी तो सारे टीचर पहुँच गये स्टाफ रूम।
"कोमल मिस आ जाईये यहाँ, मैंने आपका लंच बैग ले लिया है" चंचल मिस बोली
"जी आप शुरू कीजिये मैं हाथ धोकर आती हूँ।" बोलते हुए कोमल हाथ धोने चली गई।
"कोमल क्या लंच लाई हो यार, कमाल हो गया। वाह!" बोलते हुए चंचल जी ने कोमल के डब्बे पर हाथ की सफाई शुरु कर दी थी। खाने की खुशबू से स्टाफ रुम महक रहा था। साथ खा रहे टीचर भी कोमल के डब्बे के स्वाद से खुद को वंचित नहीं रखना चाहते थे।
"क्या चंचल मिस आप भी! मैं तो हमेशा की तरह सबजी रोटी लाई हूँ और आप हैं कि" बोलते हुए कोमल की नज़र जैसे ही अपने डब्बे पर पड़ी वो चौंक गई।
"ये मेरा लंच नहीं है। ये शायद सुमित्रा का है जो मुझसे सुबह टकरा गई थी और तभी शायद डिब्बों की अदला बदली हो गई।"
"जो भी हो पर ये कोफ्ता-करी खाकर मजा आ गया कसम से, क्यों?" चंचल ने बाकी टीचर से पूछा, सबने हां में हां मिलाई। तुम क्या खाने को निहार रही हो, लो खाओ भाई।"
"पर वो सुमित्रा बेचारी!"
"उसे आज तुम्हारे हाथ की भिंडी परवल नसीब हुई है, खुशकिस्मत है सुमित्रा। ज्यादा मत सोचो"
कोमल ने भी एक कौर जैसे ही मुंह में रखा, आँखों में चमक आ गई। लंच का डिब्बा पूरा साफ कर दिया था।
"क्या रे सुमित्रा बड़ी कोफ्ता-करी लाऊंगी बोली थी, और ये क्या भिंडी !"
"अरे सुरेश सच में मैं कोफ्ता-करी ही लाई थी, सुबह मेरे डिब्बे की अदला बदली हो गई कोमल मिस से। अभी जब स्टाफ रूम में अपना डिब्बा लेने गई तब तक सभी खाना शुरू कर चुके थे। तब मैं क्या करती बोल"
"अपनी किस्मत में ये भिंडी ही है, चल तू भी खा।"बोलकर सुरेश खाना खाने लगा पर सुमित्रा ने जो स्टाफ रूम में कोमल कें चेहरे की संतुष्टि देखी उसका पेट तो उसी में भर चुका था।
शाम को स्कूल की छुट्टी होने बाद स्टाफ रूम में सुमित्रा अपना डिब्बा लेने आई।
"सॉरी सुमित्रा आज तुम्हारा लंच मैं खा गई और तुम्हें मेरा बोरिग लंच खाना पड़ा। पर सच बोलूं तो अरसे बाद पेट के साथ साथ आत्मा को भी संतुष्टि मिली। थैंक्यू सो मच सुमित्रा एंड वंस अगेन सॉरी।"
"अरे क्या आप भी कोमल मिस सॉरी सॉरी बोल रहे, कुछ नहीं होता। और वैसे भी दाने दाने पर लिखा है खाने वाले का नाम। चलो अब मैं चलती हूँ।"
"अरे सुमित्रा आज थोड़ा घर आ पाओगी क्या। बहुत दिनों से सफाई नहीं हुई ठीक से घर की।"
"आ जाउंगी ना, ५ बजे चलेगा?"
"हां ठीक है।"
बोलकर दोनों अपने अपने रास्ते चल दिये।
शाम को कोमल के घर की घंटी बजी। कोमल ने दरवाज़ा खोला तो सामने सुमित्रा एक छोटी बच्ची के साथ (यही कोई ૪-५ साल की) खड़ी थी।
"आओ आओ सुमित्रा, मैं तुम्हारा ही इंतज़ार कर रही थी। ये सुरेश दादा की बेटी है ना?"
"हां मिस, मीनू नाम है इसका।"
"अरे सुमित्रा कितनी बार कहा है ये मिस विस सब स्कूल में, घर पर मुझे दीदी कहा करो।"
सुमित्रा एक हाथ से कान पकड़ते हुए "सॉरी दीदी"
"चलो तुम पहले हॉल की सफाई कर लो, मैं हम दोनों के लिये चाय बना लेती हूँ" कहकर कोमल किचन की तरफ चली गई।
थोड़ी देर बाद कोमल दो कप चाय, एक कप में दूध और कुछ बिस्कुट लेकर बाहर आ गई। सुमित्रा ने भी लगभग हॉल की सफाई पूरी कर ली थी।
मीनू बिस्कुट खाने में मगन थी।
"अच्छा सुमित्रा , ये सुरेश दादा तुम्हारे कोई रिश्तेदार है?"
"नहीं दीदी" सुमित्रा ने चाय की चुस्की लेते हुए कहा।
"तो तुम्हारे पति के?"
"नहीं नहीं, वो तो मेरा फ्रेंड है।"
"फ्रेंड?"
"हां, फ्रंड, दोस्त, मित्र। आप इतनी हैरान क्यों हो गई दीदी? क्या हम सिर्फ दोस्त नहीं हो सकते?" चाय का कप समेटती सुमित्रा कहते हुए मुस्कुरा दी।
"अच्छा सुनना सुमित्रा आज तेरा लंच वाकई कमाल का था तो अगले हफ्ते जो स्टाफ की पिकनिक जा रही है उसके लिये बना लायेगी? तु चिंता मत कर जो भी खर्चा होगा बता देना तेरी मेहनताने के साथ, हम सब मिलकर दे देंगे"
"अरे दीदी वो मैने नहीं हमारे मोहल्ले की सुधा माई ने बनाया था। बेचारी अकेले रहती है, खुद का खर्चा उठाने के लिये लोगों को डब्बा बनाकर देती है और चार पैसे कमा लेती है। पर आप चिंता मत करो माई आप लोगों का भी ऑर्डर पूरा कर देगी। इसी बहाने बेचारी चार पैसे ज्यादा कमा लेगी।"
"पक्का ना?"
"हां दीदी पक्का, अच्छा चलो दीदी बाकी घर की सफाई कल आकर करती हूँ, मीनू को लेने सुरेश भी मेरे घर आता ही होगा।"
"मीनू की माँ?" धीरे से कोमल ने जानने की कोशिश की।
"वो बेचारी तो कोरोना में"
"ओह हां, सुना था मैनें, ध्यान ही नहीं रहा। तो अब सिर्फ सुरेश ही इसे पाल रहा है?"
"हां दीदी, वैसे हम सारे मोहल्ले वाले है ना, ये हम सबकी बेटी है। है ना मीनू?" प्यार से मीनू को दुलारती सुमित्रा बोल पड़ी।
सुमित्रा और मीनू चले जाने बाद कोमल का घर फिर खाली चार दीवारों की इमारत जहाँ बस तब रौशनी होती है। जब कोमल का खास दोस्त और सामने की स्कूल मे ही शिक्षक कुशाल उसके घर, ना ना! मकान में आता। कोमल तो अकेले इस शहर के विद्यालय में टीचर बनकर आयी थी। बिल्कुल शांत स्वभाव, धीमी आवाज़, कम शब्दों में कहा जाये तो शालीनता और खूबसूरती का सुंदर संगम।
पर वो सिर्फ इस मकान में ही नहीं दुनिया में भी अकेली ही थी। बचपन में ही माता पिता की मृत्यु के बाद दादी ने पाला। चाचा चाची ने भी अपनी जिम्मेदारी अच्छे से निभाई, किसी चीज़ की कमी नहीं होने दी केवल एक माता पिता के प्रेम के अलावा जो वे अपने बच्चों से करते। मासूम बच्ची कोमल अपने बनाये कोकून में सिमटकर रह गई।
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