धब्बा
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अदिति महाजन
"लड्डू खाओ भाई लड्डू। "जगदीश बाबू ने पड़ोसी रामेश्वर के मुंह में लगभग लड्डू ठूस्ते हुए कहा। खा लेंगे भाईसाहब, पहले ये तो बताओ बात क्या है? “अपनी सुरुचि का रिश्ता पक्का हो गया है। लडका बहुत ऊँचे पद पर कार्यरत है।" कहते हुये जगदीश बाबू के चेहरे की ख़ुशी देखेंने लायक थी। सर्वगुण सम्पन्न, नौकरी पेशा, मधु भाषी सुरुचि के रिश्ते की बात कई जगह चला गई थी, परंतु बनते बनते रह जाती थी। कारण था उसके चेहरे पर चेचक के धब्बे। समय के साथ बाकी धब्बे तो हल्के हो चले थे, परंतु बाएँ गाल के नीचे की ओर एक सेंटीमीटर का एक धब्बा माता पिता की नींदें उड़ाए हुए था। खैर, विवाह की तैयारी के बीच वह शुभ दिन आखिर आ ही गया। जयमाला तो ठीक-ठाक संपन्न हो गई परंतु फेरों के ऐन वक़्त पर लड़के के पिता ने कार की मांग रख दी व कहा कि कन्या की विदाई तभी होगी जब गाड़ी के अग्रिम भुगतान की धनराशि दी जाएगी।
अब तक उड़ते उड़ते ये बात मंडप से सुरुचि के कानों तक पहुंच चुकी थी। घुंघट उतार, जयमाला फेंक अब वह लडके वालो के सम्मुख थी।
"किस अधिकार से आप मेरे पिता से यह अनैतिक मांग कर रहे हैं?"
"अनैतिक! अनैतिक कहां है सुरुचि? और अधिकार पूछती हो तो सुनो- ये कीमत है तुम्हारे चेहरे के इस धब्बे की - "ढिठाई से हँसते हुए सुरुचि का भावी पति वीर बोला।
'तड़ाक!' एक जोरदार थप्पड़ रसीद करते हुए सुरुचि ने अपना फ़ोन दिखाते हुए वहां उपस्थित सभी लोगो से मुखातिब होते हुए कहा, "ये घट्नाक्रम जो आप लोगो ने अभी यहां देखा, सैकड़ो लोग अपने फोन पर लाइव देख रहे है। धब्बा वो नहीं जो मेरे चेहरे पर है, धब्बा हैं तो ऐसी विकृत मानसकिता वाले लोग और धब्बो को इनकी सही जगह जेल ले जाने के लिए पुलिस अभी आती ही होगी। अब दहेज जेल में मांगे जुर्म में जेल के धब्बे साफ करना दोनो बाप- बेटा।" कह अपना पिता के गले लग गई थी सुरुचि, व न जाने कितनी सुरुचियों की प्रेरणा स्रोत बन चुकी थी।
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