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धूम्रपान- एक आह्वान
निराशा को दूर कर
आशा की किरण दिखाता
अरे मूढ़! पीले मेरा धुआं,
हृदयसात् करले मुझे
मेरा अक्स तेरे दिल पर,
पड़े बिना नहीं रह सकता।
तब कहना
हाय! हाय!
साची सेठ
Sep 121 min read


शिक्षक दिवस
इस तरह अम्रतकाल में,
शिक्षक दिवस मनाएं,
राष्ट्र का गौरव बढ़ाएं,
आओ शिक्षक दिवस मनाएं !
अशोक कुमार बाजपेई
Sep 51 min read


नींव का पत्थर
नींव का पत्थर हूँ, दिखाई नहीं देता
इमारत की बुलंदी का मज़ा भरपूर लेता।
गहराई विचारों की, व्यक्तित्व की,
लम्हों की तो कभी अपनत्व की,
कहते सब हैं, समझते कम हैं,
गुजरते तो सब हैं पर कहते कम हैं।
साची सेठ
Aug 211 min read


मैं पुनर्जन्म हूँ शबरी की
हे! राम करो कल्याण मेरा, मैं धूल अयोध्या नगरी की।
मुझको तो ऐसा लगता है, मैं पुनर्जन्म हूँ शबरी की।।
वर्षा श्रीवास्तव
Jun 111 min read


समर्पण
पलक उठते ही अलौकिक चेतना में
दिव्य छवि का भव्य सौरभ दीखता है।
इस अवर्णित दिव्य छवि को ले हृदय में
इस अपावन देह का उद्धार कर लो।
चिर व्यथा के........।।
राहुल द्विवेदी 'स्मित'
Jun 81 min read


जगन्नाथ भगवान
सबके मन में आस लगी है ।
पूरन हों जाय सबके काम
दे दो ऐसा प्रभु वरदान
तुम्हरी महिमा बड़ी महान
जय जय जगन्नाथ भगवान
डा अर्चना सिंह चौहान
May 81 min read


चोरी के गीत
जब कविता में घुस गए, नंगे धंधेबाज।
आदर कम रखने लगा, इसके लिए समाज।।
रॉबिनहुड
Apr 171 min read


औरतें
एक बार खुद को फिर सुलगाना चाहती है
अपनी बासी होती जिंदगी में आग लाने के लिए
उस आग में जलकर दमकने के लिए
फीकी पड़ने लगी जिंदगी के रंग को
सुर्ख करके थोड़ा और जी लेने के लिए
फिर जवान होने लगती हैं औरतें।
अनु चक्रवर्ती
Apr 72 min read


वो नारी
कितना कुछ करती हैं सिर्फ एक रिश्ते के लिए,
बेवकूफ़ होती हैं सच्ची औरतें,
उस एक रिश्ते में स्वयं बँध जाती हैं,
और अपेक्षा की चंद ख्वाहिशों में,
जीते जी स्वयं मर जाती हैं।
डॉ रीमा सिन्हा
Apr 31 min read


जनता को मूर्ख बनाते हैं
रमेश चंद शर्मा सावधान जनता समझ रही है स्वदेशी के गीत गाते थे, स्वदेशी नाम से ललचाते थे, स्वदेशी आन्दोलन चलाते थे, सड़कों पर नजर आते थे, अफवाह, झूठ खूब फैलाते हैं, अब क्या कर रहे हो भाई।। बिना बुलाए आते थे, झूठा संवाद चलाते थे, झूठी कसमें खाते थे, नारे खूब लगाते थे, सत्ता के लिए छटपटाते थे, सत्ता कैसे भी पाते है।। जनता को मूर्ख बनाते है, ढोंग खूब रचाते है, वादे नहीं निभाते है, जुमले उन्हें बताते है, अपने को भगत कहलाते हैं, अब चेहरा सामने आया है।। सत्ता जब से हाथ आई, स्व
रमेश चंद शर्मा
Nov 20, 20252 min read


संस्कार
ब्रिज उमराव जन्म प्रक्रिया से शूदक हो, संस्कार से होता पावन। प्रेम प्यार स्नेह समर्पण, अन्तर्मन होता उत्प्लावन।। संस्कार से सेवित...
ब्रिज उमराव
Oct 30, 20241 min read


ज़िंदगी अरमान बनके गुनगुनाई
शंकर शैलेंद्र ज़िंदगी अरमान बनके गुनगुनाई एक नई पहचान बनके मुस्कुराई तुम रहे आकाश को ही देखते। जब समझ पाए न तुम उसका इशारा नाम लेकर...
शंकर शैलेंद्र
Aug 30, 20241 min read


एक पेड़ हमने लगाया
अशोक कुमार बाजपेई अब गति आगे बढ़ाओ एक पेड़ हमने लगाया एक तुम लगाओ पंक्ती को बनाओ पांति को सजाओ एक पेड़ हमने लगाया एक तुम लगाओ यहां से...
अशोक कुमार बाजपाई
Jun 15, 20241 min read


मोबाइल पर मुन्ना
अशोक कुमार बाजपाई मोबाइल पर मुन्ना बतलाता बाबा जी को बहुत सुहाता सुनता नहीं काम की बातें मोबाइल में कटती रातें। जाने कहां की बातें लाता...
अशोक कुमार बाजपाई
Apr 11, 20241 min read


My Lovely Son
Jyoti Sriram My Lovely Son The tapestry of life woven with incredible happiness and love Bestowed on me by a sweet bundle of joy; a part...
Jyoti Sriram
Mar 6, 20241 min read


अंतिम ऊँचाई
कुँवर नारायण कितना स्पष्ट होता आगे बढ़ते जाने का मतलब अगर दसों दिशाएँ हमारे सामने होतीं, हमारे चारों ओर नहीं। कितना आसान होता चलते चले...
कुँवर नारायण
Feb 25, 20241 min read


महंगाई की मार
मुदित अग्रवाल महंगाई की मार जनता हो रही है बरवाद इसको कौन बचाएगा महंगाई की बढ़ रही मार जीवन कैसे कट पायेगा। महंगाई तो बढ़ती जा रही बढ़ते...
मुदित अग्रवाल
Feb 2, 20241 min read


परिंदे की दास्तां
धीरज सिंह उड़ जा पंछी दूर गगन में वो ही तेरा बसेरा है, इस धरती पर और इस जग में कोई नहीं अब तेरा है। आसमां तुझे हाथ फैला कर पल भर में अपना...
धीरज सिंह
Feb 2, 20241 min read


नगाड़ों में तूती-नाद
सत्येंद्र तिवारी स्वतंत्र हो गए हैं हम स्वतंत्र हो गए, खुदगर्ज मकसद का प्रजातंत्र हो गए। हर गांव की डगर-डगर शहरों की हर गली माता-पिता बहन...
सत्येंद्र तिवारी
Feb 2, 20241 min read
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