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लड़की हूँ,
वो गुलशन जो, खाद-धूप को,
पाकर भी, गुलज़ार नहीं हूँ
मैं वो सपना, जो आँखों में,
आकर भी साकार नहीं हूँ
जो देखा, जो जाना,
जो महसूस किया, लफ़्ज़ों में ढाला
मैने अपनी, बात कही बस,
मैं कोई, फ़नकार नहीं हूँ
हुस्न, मौसिकी, रंग, नज़ारे,
सब कुछ ही संसार हैं उसका
आँचल सक्सैना
Feb 261 min read


एहसास एक अनुभूति
पति पत्नी का प्रेम वहीं तक
जब तक एक दूजे का साथ निभाया।
एक ने भी गर दामन छोड़ दिया
तो यह रिश्ता भी हो जाता पराया।
बबिता चौधरी "राही"
Feb 251 min read


सपनों के सौदागर
यदि सपनों के सौदागर होते
हम होते नील गगन में,
मन की बातें, मन की चाहें
पूरी हो जातीं इक पल में,
हम भी बड़े महल में होते
राजकुमारी होते।
यदि सपनों के सौदागर होते
सपनों में ही रहते,
कुटिया के बर्तन भी फिर तो
सोने की सब होते,
पेड़ों पर रसगुल्ले होते
तोड़ तोड़ कर खाते।
साची सेठ
Feb 231 min read


अंजाने रिश्ते
डॉ मंजु सैनी एक अनजाना सा रिश्ता मन का मीत बना और फिर बिछुड़ गया एक नश्तर बन मेरे जीवन में साथ निभाने की जो बातें हुईं छोड़ गया यूँ ही क्षण भर में आज नश्तर से चुभते हैं नासूर बन छोड़ गए चिह्न जीवंत हूँ तो टीसता हैं वो दर्द नजर अंदाज करती हूँ फिर भी खामोश रह जाती हूं सोचकर शायद यही किस्मत में लिखा है बस गया था सांसों में मानो रह नही पाऊँगी उस बिन पर चल रही हैं जिंदगी यूं ही अकेले सफर में चलते चलते ही रह गया हैं मात्र यादो का कारवां शायद कभी होगा मेरी यादों को उसका सही मुकाम मुक
डॉ मंजु सैनी
Feb 221 min read


असमय की एक कविता
आजकल एकदम खाली हूँ
इतना खाली कि मेरे हिस्से
कोई काम ही नहीं बचा,
कभी समय मुझ पर हँसता है
कभी मैं समय पर
और यह भी क्या इत्तेफाक़ है
मेरा समय सापेक्ष होना
मुझे निरपेक्षता का सिद्धान्त समझा रहा है
संदीप तोमर
Feb 192 min read


कवि का दुख
मेरा यह लघुतम जीवन
जो किसी के किसी काम का नहीं
जिसे पाकर मैंने पाए हैं
अनगिनत दु:ख और किन्चित सुख भी।
दु:खों की श्रृंखला की पहली कड़ी
कौन सी थी ठीक से याद नहीं
यह भी नहीं कि किसका
विस्तार कितना था
और गहराई में अधिक कौन था
यह याद है
जो भी आया उसने चमकाया मुझे
नींबूमँजे बर्तनों की तरह।
धोया मुझे श्वेताभ तरल से वह
अकसर कटाक्ष के बाण पर
सवार होकर आता था
और छेद जाता था
मेरे स्नेहिल हृदय का मुख।
मैंने हरदम ढकेला इसे अदम्य साहस
और धैर्य धना हि साधव:
सूक्ति के बलपर
प्रियंवदा पाण्डेय
Jan 61 min read


अरमान
मेरी हर बात का वो
मान बहुत रखता है
उसपे ये भी कि मेरा
ध्यान बहुत रखता है
मेरी हर फिक्र को
ले जाएगा अपने माथे
यानी वो ज़िंदगी
आसान बहुत रखता है
उसके अरमान कई,
अब भी अधूरे हैं मगर
देखिए फिर भी वो
अरमान बहुत रखता है
दिल के बाहर,
वो सजा रखता है गुलशन
लेकिन दिल के अंदर,
वो बयाबान बहुत रखता है।
जीत कुमारी
Jan 41 min read


बिछुड़न
मिलना और बिछुड़ना दोनों
जीवन की मजबूरी है।
उतने ही हम पास रहेंगे,
जितनी हममें दूरी है।।
शाखों से फूलों की बिछुड़न
फूलों से पंखुड़ियों की।
आँखों से आँसू की बिछुड़न
होंठों से बाँसुरियों की।।
तट से नव लहरों की बिछुड़न
पनघट से गागरियों की।
सागर से बादल की बिछुड़न
बादल से बीजुरियों की।।
जंगल जंगल भटकेगा ही
जिस मृग पर कस्तूरी है।
सोनी शुक्ला
Jan 31 min read


अपनों के बीच
कई बार
लौटते-लौटते
बहुत देर हो जाती है।
इतनी देर कि
हम खुद को भी
पहचान नहीं पाते।
अपना पता भी
ढूंढ़ नहीं पाते।
अपना शहर, अपनी गलियां
भूल चुकी होती हैं हमें।
खत्म हो चुके होते हैं
जाने कितने जन्म,
जाने कितने रिश्ते।
और इस तरह
हमारा लौटना,
लौटना नहीं होता।
हम सिर्फ आ जाते हैं
अनचाहे और अनजाने से
उन अपनों के बीच,
जिन्होंने कभी
हमारे लौट आने की
जाने कितनी दुआएं मांगी थीं
करुणा शंकर अवस्थी
Jan 1, 20261 min read


विचार स्नान
मैं सुंदर हो गया हूँ।
त्याग कर मनमैल।
मैं निर्मल हो गया हूँ।
मैं फिर सुंदर हो गया हूँ।।
कितना सुघड़ है ये पात्र खाली
कितना मधुर संगीत इसका।
डॉ. जहान सिंह ‘जहान’
Dec 28, 20251 min read


जीवन गणित
सन्दीप तोमर जिंदगी के गणित में तुमने रेखागणित को चुना और मैं, मैं खुद बना रहा एलजेब्रा मान लेता अचर को कोई चर और सुलझा लेता उलझी हुई समीकरणों को, एक रोज जब मैंने चाहा जिंदगी का हल तब तुम बोली- रेखागणित सी इस दुनिया में मैं और .... और तुम दो समांतर रेखाएँ जैसे नदी के दो तीर, सिर्फ साथ चल सकते हैं, दूर से एक-दूसरे को देख सकते हैं, शायद महसूस भी कर सकते हैं लेकिन, अगर गलती से मिल गये तो अपना अस्तित्व समाप्त, मैंने कहना चाहा प्रतिउत्तर में- तिर्यक रेखाएँ भी उसी रेखागणित का हिस्
संदीप तोमर
Nov 21, 20251 min read


जनता को मूर्ख बनाते हैं
रमेश चंद शर्मा सावधान जनता समझ रही है स्वदेशी के गीत गाते थे, स्वदेशी नाम से ललचाते थे, स्वदेशी आन्दोलन चलाते थे, सड़कों पर नजर आते थे, अफवाह, झूठ खूब फैलाते हैं, अब क्या कर रहे हो भाई।। बिना बुलाए आते थे, झूठा संवाद चलाते थे, झूठी कसमें खाते थे, नारे खूब लगाते थे, सत्ता के लिए छटपटाते थे, सत्ता कैसे भी पाते है।। जनता को मूर्ख बनाते है, ढोंग खूब रचाते है, वादे नहीं निभाते है, जुमले उन्हें बताते है, अपने को भगत कहलाते हैं, अब चेहरा सामने आया है।। सत्ता जब से हाथ आई, स्व
रमेश चंद शर्मा
Nov 20, 20252 min read


सिर्फ तेरे लिए
काजल शर्मा वो चूड़ियाँ जो सिर्फ़ तेरे लिए पहनी थी! कहाँ शौक था मुझे, सजने-सवरने का। नैनो में काला काजल, तो माथे पे बिंदिया लगाने का। तुझे देख पलकें झुकाने, और मुस्कुराने शर्माने का। कहाँ शौक था मुझे, खुद को एक युवती बनाने का। हाथों में चूड़ी, पैरों में पायल छनकाने का। केशों को खुला छोड़, ज़ुल्फों को पीछे हटाने का। कहाँ शौक था मुझे, खुद में शार्मो हया लाने का। हाँ! ये चूड़ियाँ सिर्फ़ तेरे लिए पहनी थी, अंदाज़ था मेरा तुझे इशारों में बुलाने का। दुपट्टे को सलीके से ओढ़, इस दफा
काजल शर्मा
Nov 19, 20251 min read


रक्षाबंधन
ब्रिज उमराव भाई बहन का प्यार, यह राखी का त्योहार। बहना दूर से चलकर आई, कम न हो अपना प्यार।। प्रेम प्यार सुचिता का संगम, न हो मलाल मन...
ब्रिज उमराव
Sep 23, 20251 min read


अधर बावरे जिह्वा पागल
डॉ देवेंद्र तोमर अधर बावरे जिह्वा पागल कहने को कुछ भी कह जाऍं तुम्हीं कहो क्या कह सकता हूँ तुमसे मुझको प्यार नहीं है। एक नहीं अनगिन...
डॉ देवेंद्र तोमर
Jul 4, 20251 min read


बच्चों से क्षमा मांगो
प्रो.पुनीत शुक्ला तुम अपने उन बच्चों से तुरन्त क्षमा माँगो जिनको तुमने केवल इस बात पर पीट दिया क्योंकि उन्होंने तुम्हारी बात नहीं...
प्रो.पुनीत शुक्ला
Jul 4, 20251 min read


घुलते हुए दो जिस्म
सन्दीप तोमर सीने पर जो चाँद तुम टांक गई थी, वो रफ्ता-रफ्ता बढ़ता जाता है, जैसे मेंरे तुम्हारे बीच पनप रहा एहसास हो, जो बदल जाता है पूनम...
संदीप तोमर
Feb 13, 20251 min read


कहानी कैसे लिखूँ?
आदित्य नारायण शुक्ला ओस से लिखूँ या अश्कों से लिखूँ मैं दिल की कहानी कैसे लिखूँ...?? फूलों पे लिखूँ या हाथों पे लिखूँ होंठों की ज़बानी...
आदित्य नारायण शुक्ला
Feb 10, 20251 min read


देर रात घर लौटते हैं
रजनीश सचान वे ऐसे नहीं चलते जैसे हत्या के लिए नौकरी पर रखे गए सैनिक चलते हैं वे ऐसे नहीं चलते जैसे पहलू खान के पीछे चलते गौ-रक्षक वे...
रजनीश सचान
Jan 11, 20251 min read
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