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शिक्षक दिवस
इस तरह अम्रतकाल में,
शिक्षक दिवस मनाएं,
राष्ट्र का गौरव बढ़ाएं,
आओ शिक्षक दिवस मनाएं !
अशोक कुमार बाजपेई
Sep 51 min read


नींव का पत्थर
नींव का पत्थर हूँ, दिखाई नहीं देता
इमारत की बुलंदी का मज़ा भरपूर लेता।
गहराई विचारों की, व्यक्तित्व की,
लम्हों की तो कभी अपनत्व की,
कहते सब हैं, समझते कम हैं,
गुजरते तो सब हैं पर कहते कम हैं।
साची सेठ
Aug 211 min read


मैं पुनर्जन्म हूँ शबरी की
हे! राम करो कल्याण मेरा, मैं धूल अयोध्या नगरी की।
मुझको तो ऐसा लगता है, मैं पुनर्जन्म हूँ शबरी की।।
वर्षा श्रीवास्तव
Jun 111 min read


समर्पण
पलक उठते ही अलौकिक चेतना में
दिव्य छवि का भव्य सौरभ दीखता है।
इस अवर्णित दिव्य छवि को ले हृदय में
इस अपावन देह का उद्धार कर लो।
चिर व्यथा के........।।
राहुल द्विवेदी 'स्मित'
Jun 81 min read


जगन्नाथ भगवान
सबके मन में आस लगी है ।
पूरन हों जाय सबके काम
दे दो ऐसा प्रभु वरदान
तुम्हरी महिमा बड़ी महान
जय जय जगन्नाथ भगवान
डा अर्चना सिंह चौहान
May 81 min read


चोरी के गीत
जब कविता में घुस गए, नंगे धंधेबाज।
आदर कम रखने लगा, इसके लिए समाज।।
रॉबिनहुड
Apr 171 min read


औरतें
एक बार खुद को फिर सुलगाना चाहती है
अपनी बासी होती जिंदगी में आग लाने के लिए
उस आग में जलकर दमकने के लिए
फीकी पड़ने लगी जिंदगी के रंग को
सुर्ख करके थोड़ा और जी लेने के लिए
फिर जवान होने लगती हैं औरतें।
अनु चक्रवर्ती
Apr 72 min read


वो नारी
कितना कुछ करती हैं सिर्फ एक रिश्ते के लिए,
बेवकूफ़ होती हैं सच्ची औरतें,
उस एक रिश्ते में स्वयं बँध जाती हैं,
और अपेक्षा की चंद ख्वाहिशों में,
जीते जी स्वयं मर जाती हैं।
डॉ रीमा सिन्हा
Apr 31 min read


रिश्ता रूह का
रात के तीसरे पहर में
तुम अपना सर रख कर विश्राम कर लेना यहाँ
क्योंकि अगले पहर
संसार का सूरज तुम्हें इसकी आज्ञा न दे शायद
और फिर
मेरी पीठ में नम पड़ते हुए
तमाम सूरज भी तो
अपने उगने की प्रतीक्षा में रहेंगे...
है ना....!!!
श्याम मुकर्जी
Mar 272 min read


लड़की हूँ,
वो गुलशन जो, खाद-धूप को,
पाकर भी, गुलज़ार नहीं हूँ
मैं वो सपना, जो आँखों में,
आकर भी साकार नहीं हूँ
जो देखा, जो जाना,
जो महसूस किया, लफ़्ज़ों में ढाला
मैने अपनी, बात कही बस,
मैं कोई, फ़नकार नहीं हूँ
हुस्न, मौसिकी, रंग, नज़ारे,
सब कुछ ही संसार हैं उसका
आँचल सक्सैना
Feb 261 min read


एहसास एक अनुभूति
पति पत्नी का प्रेम वहीं तक
जब तक एक दूजे का साथ निभाया।
एक ने भी गर दामन छोड़ दिया
तो यह रिश्ता भी हो जाता पराया।
बबिता चौधरी "राही"
Feb 251 min read


सपनों के सौदागर
यदि सपनों के सौदागर होते
हम होते नील गगन में,
मन की बातें, मन की चाहें
पूरी हो जातीं इक पल में,
हम भी बड़े महल में होते
राजकुमारी होते।
यदि सपनों के सौदागर होते
सपनों में ही रहते,
कुटिया के बर्तन भी फिर तो
सोने की सब होते,
पेड़ों पर रसगुल्ले होते
तोड़ तोड़ कर खाते।
साची सेठ
Feb 231 min read


अंजाने रिश्ते
डॉ मंजु सैनी एक अनजाना सा रिश्ता मन का मीत बना और फिर बिछुड़ गया एक नश्तर बन मेरे जीवन में साथ निभाने की जो बातें हुईं छोड़ गया यूँ ही क्षण भर में आज नश्तर से चुभते हैं नासूर बन छोड़ गए चिह्न जीवंत हूँ तो टीसता हैं वो दर्द नजर अंदाज करती हूँ फिर भी खामोश रह जाती हूं सोचकर शायद यही किस्मत में लिखा है बस गया था सांसों में मानो रह नही पाऊँगी उस बिन पर चल रही हैं जिंदगी यूं ही अकेले सफर में चलते चलते ही रह गया हैं मात्र यादो का कारवां शायद कभी होगा मेरी यादों को उसका सही मुकाम मुक
डॉ मंजु सैनी
Feb 221 min read


असमय की एक कविता
आजकल एकदम खाली हूँ
इतना खाली कि मेरे हिस्से
कोई काम ही नहीं बचा,
कभी समय मुझ पर हँसता है
कभी मैं समय पर
और यह भी क्या इत्तेफाक़ है
मेरा समय सापेक्ष होना
मुझे निरपेक्षता का सिद्धान्त समझा रहा है
संदीप तोमर
Feb 192 min read


कवि का दुख
मेरा यह लघुतम जीवन
जो किसी के किसी काम का नहीं
जिसे पाकर मैंने पाए हैं
अनगिनत दु:ख और किन्चित सुख भी।
दु:खों की श्रृंखला की पहली कड़ी
कौन सी थी ठीक से याद नहीं
यह भी नहीं कि किसका
विस्तार कितना था
और गहराई में अधिक कौन था
यह याद है
जो भी आया उसने चमकाया मुझे
नींबूमँजे बर्तनों की तरह।
धोया मुझे श्वेताभ तरल से वह
अकसर कटाक्ष के बाण पर
सवार होकर आता था
और छेद जाता था
मेरे स्नेहिल हृदय का मुख।
मैंने हरदम ढकेला इसे अदम्य साहस
और धैर्य धना हि साधव:
सूक्ति के बलपर
प्रियंवदा पाण्डेय
Jan 61 min read
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