विचार स्नान
- Dec 28, 2025
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डॉ. जहान सिंह जहान
मैं सुंदर हो गया हूँ।
त्याग कर मनमैल।
मैं निर्मल हो गया हूँ।
मैं फिर सुंदर हो गया हूँ।।
कितना सुघड़ है ये पात्र खाली
कितना मधुर संगीत इसका।
मैं फिर से सब का मनमीत हो गया हूँ।।
जला दी आज मैंने दूषित बिचारों की अर्थी।
राख कर दी अहम की खोखली हस्ती।
तोड़ दी अपनी बनाई मायाजाल की बस्ती।।
इस मलबे को प्रवाहित कर आया हूँ।
साथ कुछ नहीं लाया हूँ।।
त्याग कर सब ज्ञान की सरिता में नहाकर आया हूँ।
कितना बदसूरत था ऐ सोचकर मैं हत प्रत हुआ।
कितना सरल हूँ। मन मेरा प्रफुल्लित हुआ।।
मैं फिर से सुंदर हो गया हूँ।।
आपनी मां की गोद का बच्चा हो गया हूँ ।।
त्याग कर मन मैल।
मैं फिर निर्मल हो गया हूँ।।
मैं सुन्दर हो गया हूँ।।
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