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मूर्ख साधू और ठग
किसी अजनबी की चिकनी चुपड़ी बातों में आकर ही उस पर विश्वास नहीं कर लेना चाहिए।
विष्णु शर्मा
Jun 112 min read


सच्चा कुबेर
पृथ्वी पर तीन ही रत्न हैं। जल,अन्न और सुभाषित। मूर्ख लोग ही पत्थर के टुकड़ों हीरे,मोती माणिक्य आदि को रत्न कहते हैं..!!
लोकेश कुमार शर्मा
Jun 82 min read


कर्म का सिद्धांत
समय बदलता रहता है। जब भगवान् को लेना होता है तो वह कुछ भी नहीं छोड़ते, और जब देना होता है तो छप्पर फाड़ कर देते हैं। और एक बार भगवान् चाहे माफ कर दे, परंतु कर्म माफ नहीं करते।
डॉ. कृष्णा कांत श्रीवास्तव
Jun 64 min read


ब्लैकमेल
बंटी नाम का अतीत का, काला पन्ना, आरोही की जिंदगी में से हमेशा-हमेशा के लिये बंद हो गया था। उसकी आँखों में योगेश के साथ, विवाह करके, विवाहित जीवन बिताने के इंद्रधनुषी सपने झिलमिला रहे थे।
राजेश त्रिपाठी
Jun 63 min read


पूस की रात
दोनों फिर खेत के डाँड़ पर आए। देखा, सारा खेत रौंदा पड़ा हुआ है और जबरा मड़ैया के नीचे चित लेटा है, मानो प्राण ही न हों।
दोनों खेत की दशा देख रहे थे। मुन्नी के मुख पर उदासी छायी थी, पर हल्कू प्रसन्न था।
मुन्नी ने चिंतित होकर कहा—अब मजूरी करके मालगुजारी भरनी पड़ेगी।
हल्कू ने प्रसन्न मुख से कहा—रात को ठंड में यहाँ सोना तो न पड़ेगा।
प्रेमचंद
Jun 58 min read


लैला
लैला के स्वर-लालित्य की कल्पना करनी हो, तो उस घंटी की अनवरत ध्वनि की कल्पना कीजिए जो निशा की निस्तब्धता में ऊंटों की गरदनों में बजती हुई सुनायी देती हैं, या उस बांसुरी की ध्वनि की जो मध्यान्ह की आलस्यमयी शांति में किसी वृक्ष की छाया में लेटे हुए चरवाहे के मुख से निकलती है।
प्रेमचंद
Jun 523 min read


माँ का सम्मान
माँ का सम्मान तब कम नहीं होता जब बहुएँ उनका सम्मान नहीं करतीं, बल्कि माँ का सम्मान तब कम होता है जब बेटे अपनी माँ का सम्मान नहीं करते या उनके काम में सहयोग नहीं करते। माता-पिता से जुड़ा नाता जन्म से होता है, और उनका सम्मान करना हमारी प्राथमिक जिम्मेदारी है।
डॉ. कृष्णकांत श्रीवास्तव
May 292 min read


एक रुपये का सिक्का
विवेकानन्द जी और उनकी पत्नी के चेहरे की खुशी देखते बन रही थी पर स्क्रीन के एक कोने में चुपचाप खड़ी दिख रही रंजीता की आंखों ने खुशी के आंसुओ को छिपाने से जैसे इनकार कर दिया था। पहले तो ऐसा मायका और अब ससुराल में ऐसे अनोखे परिवार को पाकर वो स्वयं को दुनिया की सबसे भाग्यशाली महिला समझ रही थी।
डॉ. कृष्णकांत श्रीवास्तव
May 273 min read


हद हो गयी
बहुरानी का पार्सल? देखें तो हमारी बहु को हमसे कितना प्यार है? हे राम जे क्या? नींद की गोलियाँ वो भी पूरे हज़ार का बंडल? बबलू एक बात सुनो। तुम लोग रात भर इतनी खटर पट्टर मचाये रखते हो हमे सारी रात उठ उठ कर टोकना पड़ता है, सोते क्यूँ नही? बहु को भेज यहाँ ये सारी उसी को दे दूंगी। आ तो गए चिक्की डब्बू, अब तो चैन सोने दो मुझे, हद हो गई।
निरंजन धुलेकर
May 82 min read


एक पुरुष ऐसा भी
विवान पढ़ाई में अत्यंत मेधावी थे। मध्यमवर्गीय परिवार से संबंध रखने वाले विवान का व्यक्तित्व जितना आकर्षक था, उतना ही सादगीपूर्ण भी। लंबा कद, मजबूत शरीर, चेहरे पर गम्भीरता और आँखों में एक अलग ही आत्मविश्वास—कॉलेज की न जाने कितनी लड़कियाँ उन पर मोहित थीं, पर विवान ने कभी किसी की ओर विशेष ध्यान नहीं दिया। वह अपने लक्ष्य और अपने सिद्धांतों में ही खोए रहते थे।
दीपक सिंह
May 77 min read


वाणी, चरित्र का प्रतिबिंब है।
मनुष्य जितना ही प्रिय भाषण का उच्चारण एवं श्रवण करेगा, उतना ही शारीरिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त करेगा। इसके विपरीत खोटे वचन, खोटे सिक्कों के समान कार्य करते हैं। वह आप जिसको भी देंगे, वह आपको सूद समेत लौटा देगा। अतः मीठी वाणी में ही आनंद और माधुर्य है।
डॉ. कृष्णा कांत श्रीवास्तव
Apr 205 min read


सिरफिरा हाथी
हमें दूसरों कि बात का अनुसरण तो जरुर करना चाहिए मगर विशेष परिस्थिति में अपने विवेक का प्रयोग करने से नहीं चूकना चाहिए। परिस्थितियों के अनुसार निर्णय को परिवर्तित करने में ही बुद्धिमानी है।
डॉ. कृष्णकांत श्रीवास्तव
Apr 203 min read


अजब प्रेम की गजब कहानी
इसके बाद वह लड़की बीमार होने के बावजूद सुमित से काफी देर तक लिपटी रही और फिर सो गयी। उसे ढंग से लिटाकर सुमित भी वहीं पास में ही एक खाली बेड पर सो गया।
वह सुबह बड़ी ही मनहूस थी। सुमित तो उठ गया पर वह नहीं उठी। सदा के लिए सो गयी। सुमित ने उसे जगाने की बहुत कोशिश की थी पर उसने आँखे नहीं खोली। खोलती भी तो कैसे? वह इस संसार को, सुमित को छोड़कर इस दुनिया से जा चुकी थी। सुमित को रोता बिलखता छोड़कर।
शिवनाथ
Apr 179 min read


अंतिम बार
वो ऊँट के मुँह में जीरा का फोरन जैसा साबित हो रहा है। तुम जल्दी कुछ करो। नहीं तो मैं बच्चों को लेकर अपने मायके चली जाऊँगी।" और यही सोचकर अवधेश ने ये फैसला किया था, कि अब और इंतजार करना मूर्खता के सिवाय कुछ नहीं है। हो सकता है सालों कोरोना खत्म ना हो।तब तो सालों उसका इंस्टीटयूट बंद रहेगा। रमा ठीक कहती है। मुझे अपना इंस्टीटयूट बंद करके कोई और काम करना चाहिए।नहीं तो घर कैसे चलेगा? और यही सोचकर उसने एक जरूरत मंद संस्था को बहुत कम कीमत पर अपना फर्नीचर बेचने का फैसला किया था।
महेश कुमार केशरी
Apr 165 min read


बदरंग जिंदगी
उसके बगल वाला कमरा उसकी बेटी प्रीती का है। पापा के आने की आहट पाकर उसने जल्दी से अपने कमरे की बत्ती बंद कर ली। लेकिन, दामोदर के दिमाग में एक नई दुश्चिंता ने घर करना शुरू कर दिया। आखिर इस साल प्रीति का पच्चीसवाँ लगने वाला है। आखिर कबतक जवान लड़की को कोई घर में रखेगा। कल को कहीं कुछ ऊँच-नीच हो गई तो! तमाम दुश्चिंताओं के बीच दामोदर रात भर करवटें बदलता रहा। लेकिन, उसे नींद नहीं आई।
महेश कुमार केशरी
Apr 168 min read


अर्धांगिनी
आत्मविश्वास भरे लहजे में उसने पति की तस्वीर से कहा, "प्रिय, आपसे वादा करती हूँ कि इस तरह रो कर मैं अपना जीवन बर्बाद नहीं करूँगी। आपकी तरह मैं भी देश के लिए शहीद हो जाना चाहती हूँ। आखिर, आपकी अर्धांगिनी जो हूँ।"
वह तैयार होकर सेना में भर्ती के लिए आवेदन करने निकलने लगी। जाते समय उसने अपना चेहरा आईने में फिर से देखा।
इसबार आईना मुस्कुरा कर उसे 'जय जवान' कह रहा था।
संगीता द्विवेदी
Apr 132 min read


हर घर की कहानी....
दोस्तों ये किसी एक घर की कहानी नहीं बल्कि हर घर की यही कहानी है, हमारे देश के समाज में शादी होते ही लड़कियों की प्राथमिकताएं बदल दी जाती हैं। अपना परिवार अपना घर ही पराया हो जाता है और उसे वहाँ जाने के लिए उसे दूसरों की आज्ञा लेनी पड़ती है। अगर हो सके तो इस लेख को पढ़कर आप सब भी इस पर गौर जरूर फरमाइयेगा। और हो सके तो बहु को उसके माता-पिता के घर आने-जाने की आज़ादी जरूर दिजियेगा।
डॉ. कृष्णकांत श्रीवास्तव
Apr 124 min read


धब्बा
धब्बा वो नहीं जो मेरे चेहरे पर है, धब्बा हैं तो ऐसी विकृत मानसकिता वाले लोग और धब्बो को इनकी सही जगह जेल ले जाने के लिए पुलिस अभी आती ही होगी। अब दहेज जेल में मांगे जुर्म में जेल के धब्बे साफ करना दोनो बाप- बेटा।" कह अपना पिता के गले लग गई थी सुरुचि, व न जाने कितनी सुरुचियों की प्रेरणा स्रोत बन चुकी थी।
अदिति महाजन
Apr 122 min read


संगत का प्रभाव
अपने बच्चों को उच्चशिक्षा के साथ साथ अच्छे संस्कार भी दीजिए ताकि वो जहां भी जाये सबका समान करे और अपने आचरण से खुद के साथ परिवार का नाम भी रोशन करे।
डॉ. कृष्णकांत श्रीवास्तव
Apr 122 min read


अतिथि सत्कार
वह मेरा नित्य अपमान करता है तो भी मैंने उसे सौ साल तक सहा, किंतु तुम एक दिन भी न सह सके।" भगवान अंतर्धान हो गए और महात्मा जी की भी आँखें खुल गई।
डॉ. कृष्णा कांत श्रीवास्तव
Apr 81 min read
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