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एक पुरुष ऐसा भी

May 7
7 min read

दीपक सिंह

मैं और विवान, दोनों देहरादून में रहते थे। हम दोनों JBIT Dehradun से बी.टेक कर रहे थे और यह हमारा अंतिम सेमेस्टर था।

विवान पढ़ाई में अत्यंत मेधावी थे। मध्यमवर्गीय परिवार से संबंध रखने वाले विवान का व्यक्तित्व जितना आकर्षक था, उतना ही सादगीपूर्ण भी। लंबा कद, मजबूत शरीर, चेहरे पर गम्भीरता और आँखों में एक अलग ही आत्मविश्वास—कॉलेज की न जाने कितनी लड़कियाँ उन पर मोहित थीं, पर विवान ने कभी किसी की ओर विशेष ध्यान नहीं दिया। वह अपने लक्ष्य और अपने सिद्धांतों में ही खोए रहते थे।

बी.टेक समाप्त होते ही कॉलेज कैंपस प्लेसमेंट में हम दोनों का चयन हो गया। मुझे और विवान को बंगलोर कार्यालय के लिए नियुक्त किया गया। यह हमारे जीवन का एक नया अध्याय था—नई जगह, नए सपने और नई शुरुआत।

बंगलोर जैसे महानगर में किराए पर घर ढूँढ़ना किसी चुनौती से कम नहीं था। बहुत प्रयासों के बाद मैंने एक पेइंग गेस्ट में साझा कमरे पर दस हजार रुपये मासिक किराए में एक बेड ले लिया। विवान भी पास ही किसी बॉयज़ हॉस्टल में रहने लगे।

धीरे-धीरे हम दोनों ने एक ही कार्यालय में साथ काम करना शुरू किया। पहले केवल औपचारिक बातचीत होती थी, लेकिन समय के साथ हमारी मुलाकातें बढ़ने लगीं। कार्यालय के बाद की शामें अब अक्सर हम साथ बिताने लगे थे। कभी चाय की छोटी-सी दुकान, कभी शहर की शांत सड़कें, तो कभी किसी पार्क की बेंच—हमारी बातें घंटों चलती रहतीं।

समय बीतता गया और अनजाने में ही मेरा मन विवान के और करीब आता चला गया। उनकी सादगी, उनका शांत स्वभाव, दूसरों के प्रति सम्मान, आँखों की गहराई और होंठों पर सजी हल्की-सी मुस्कान—सब कुछ मुझे भीतर तक छूने लगा था। उनका मजबूत और सधा हुआ व्यक्तित्व ऐसा था कि कई बार मन करता, बस उनकी बाँहों में सिमटकर सारी दुनिया भूल जाऊँ।

धीरे-धीरे मैंने विवान से विवाह की बात करनी शुरू कर दी। शुरुआत में वह हर बार मुस्कुराकर बात टाल देते, लेकिन शायद वह भी मेरे मन की भावनाओं को समझने लगे थे। कुछ समय बाद उन्होंने भी इस रिश्ते के लिए अपनी सहमति दे दी।

फिर एक दिन, दोनों परिवारों की रज़ामंदी और आशीर्वाद के साथ, हम दोनों विवाह के पवित्र बंधन में बंध गए। उस दिन ऐसा लगा मानो जीवन ने मेरी हर अधूरी इच्छा पूरी कर दी हो।

यूरोप में पंद्रह दिनों तक अपने जीवन के सबसे खूबसूरत पलों को साथ बिताने के बाद हम दोनों वापस देहरादून लौट आए। वहाँ कुछ दिन हमने अपने माता-पिता और परिवार के साथ बिताए। उन दिनों घर में मानो खुशियों का उत्सव सा छाया रहता था। शादी की नई चमक, रिश्तों की गर्माहट और भविष्य के सुनहरे सपने—सब कुछ किसी सुंदर कहानी जैसा लग रहा था।

लगभग पंद्रह दिन परिवार के साथ बिताने के पश्चात हम दोनों पुनः बंगलोर लौट आए और अपने-अपने कार्यों में व्यस्त हो गए।

बंगलोर पहुँचने के कुछ समय बाद ही विवान ने हम दोनों की सैलरी के आधार पर बैंक से होम लोन स्वीकृत करवा लिया। फिर हमने अपने सपनों का एक छोटा-सा आशियाना खरीदा—तीन बेडरूम का सुंदर-सा घर, जहाँ हमारी नई जिंदगी ने सचमुच आकार लेना शुरू किया।

मैंने विवान को कई बार समझाने का प्रयास किया कि घर के लिए लोन लेने की आवश्यकता नहीं है। मैंने उनसे कहा कि मैं अपने पिता से सहायता ले सकती हूँ, क्योंकि जो कुछ उनका है, वह मेरा भी तो है। लेकिन विवान ने बड़ी विनम्रता और आत्मसम्मान के साथ मेरी बात ठुकरा दी।

वह हमेशा कहते थे—

“अपना घर अपनी मेहनत से बनाना ही सबसे बड़ी खुशी होती है।”

विवान का स्वाभिमान मुझे हमेशा भीतर तक छू जाता था। उन्होंने शादी भी अत्यंत सादगीपूर्ण ढंग से कोर्ट में की थी। हालाँकि बाद में दोनों परिवारों ने मिलकर विवाह का भव्य स्वागत समारोह आयोजित किया, लेकिन विवान और उनके परिवार ने दहेज के नाम पर कुछ भी स्वीकार करने से साफ़ इंकार कर दिया। उन्होंने केवल शुभकामनाओं और स्नेह के प्रतीक स्वरूप मिले उपहार ही स्वीकार किए।

मध्यमवर्गीय परिवार से होने के बावजूद विवान दिल के बेहद अमीर इंसान थे। उनके भीतर आत्मसम्मान भी था और अपनों के लिए अथाह प्रेम भी।

शादी को अभी डेढ़ वर्ष ही बीते थे कि हमारे जीवन में एक और नई खुशी ने दस्तक दी—हमारे बेटे का जन्म हुआ। उस दिन विवान की आँखों में जो चमक थी, उसे शब्दों में बाँध पाना शायद संभव नहीं।

वह घंटों हमारे बेटे को अपनी बाँहों में लेकर उससे बातें करते रहते। कभी उसे सीने से लगाए मुस्कुराते, तो कभी उसकी छोटी-छोटी उँगलियों को पकड़कर खो जाते। कई बार ऐसा होता कि बेटे को सीने पर सुलाते-सुलाते विवान स्वयं भी उसी के साथ सो जाते।

उन दिनों हमारा घर सचमुच प्रेम, हँसी और सुकून से भरा हुआ था। ऐसा लगता था मानो जिंदगी ने हमें हर वह खुशी दे दी हो, जिसकी हमने कभी कल्पना की थी।

उस दिन भी सब कुछ बिल्कुल सामान्य था। रोज़ की तरह हम दोनों सुबह तैयार होकर अपने छोटे-से बेटे को क्रैच में छोड़ने गए और फिर कार्यालय के लिए निकल पड़े। जाते समय घर को हमेशा की तरह ताला लगाकर बंद कर दिया था। हमें क्या पता था कि हमारी अनुपस्थिति में जिंदगी हमारे लिए एक भयानक मोड़ लेकर खड़ी है।

हमारे ऑफिस पहुँचने के कुछ ही समय बाद अचानक फोन आया कि हमारे घर में आग लग गई है। शायद किसी बिजली के शॉर्ट सर्किट के कारण, या फिर किसी और वजह से देखते ही देखते पूरा घर आग की लपटों में घिर गया था।

आस-पास रहने वाले लोगों ने तुरंत फायर ब्रिगेड को सूचना दी। बड़ी मुश्किल से घर का ताला तोड़कर आग पर काबू पाया गया। हमें भी तत्काल घर बुला लिया गया।

जब मैं वहाँ पहुँची, तो मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई। हमारा घर… हमारा सपना… हमारी मेहनत… सब कुछ राख में बदल चुका था। कमरे धुएँ से काले पड़ चुके थे, दीवारों पर जलन के निशान थे और घर का अधिकांश सामान राख बन चुका था।

मैं वहीं खड़ी सब कुछ देखती रही। ऐसा लग रहा था जैसे किसी ने मेरी पूरी दुनिया मेरी आँखों के सामने जला दी हो।

उस घर का एक-एक कोना हमने कितनी मेहनत, कितने संघर्ष और कितने सपनों से सजाया था। मेरी कितनी बड़ी इच्छा थी कि मैं अपने सास-ससुर के साथ उसी घर में रहूँ, उनकी बहू नहीं बल्कि बेटी बनकर उनकी सेवा करूँ। लेकिन एक पल में ऐसा लगा जैसे मेरे सारे अरमान धुएँ में उड़ गए हों।

घर, गाड़ी—सब कुछ लोन पर था। ऊपर से अनजान शहर, नए लोग और यह टूटा-बिखरा घर… समझ ही नहीं आ रहा था कि अब कहाँ जाएँ, किससे मदद माँगें। वह घर, जो कभी हमारा सबसे प्यारा आशियाना था, अब मुझे किसी उजड़े हुए खंडहर जैसा लगने लगा था।

मैंने घबराकर विवान से कहा—

“इस मुश्किल समय में मम्मी-पापा को बता देते हैं… उनसे मदद मांग लेते हैं।”

मेरे पिता रिटायर्ड कर्नल थे। उनकी अच्छी स्थिति थी, पैसों की कोई कमी नहीं थी। मुझे लगा शायद अब वही हमारा सहारा बन सकते हैं।

लेकिन विवान…

उनके चेहरे पर ज़रा-सी भी शिकन नहीं थी। होंठों पर वही पुरानी शांत मुस्कान थी। वह लगातार मुझे हिम्मत बँधा रहे थे।

उन्होंने बहुत धीरे से मेरा हाथ पकड़कर कहा—

“रितिका, चिंता मत करो… सब ठीक हो जाएगा। बस थोड़ा धैर्य रखना पड़ेगा। कुछ सामान दोबारा ठीक हो जाएगा, और जो नहीं होगा, उसे फिर से खरीद लेंगे। माता-पिता को इस परेशानी में क्यों घबराना? धीरे-धीरे सब संभल जाएगा।”

उनकी आवाज़ में इतना विश्वास, इतना अपनापन था कि मैं खुद को रोक नहीं पाई। मेरी आँखें आँसुओं से भर आईं, गला रुंध गया।

शायद विवान मेरे टूटते हुए मन को समझ गए थे। उन्होंने मुझे अपनी बाँहों में भर लिया। उनके सीने से लगते ही ऐसा लगा जैसे सारी बेचैनी धीरे-धीरे शांत होने लगी हो।

उस पल मुझे एहसास हुआ—घर सिर्फ ईंटों और दीवारों से नहीं बनता…

घर उस इंसान से बनता है, जो हर टूटन में आपका हाथ थामे खड़ा रहे।

और विवान… मेरे लिए वही घर थे।

उस कठिन समय में मैंने पहली बार सचमुच महसूस किया कि एक पुरुष केवल घर चलाने वाला व्यक्ति नहीं होता, बल्कि वह उस मजबूत स्तम्भ की तरह होता है, जिसके कंधों पर पूरे परिवार की छत टिकी होती है।

वह स्वयं धूप, बारिश, सर्दी और थकान सह लेता है, लेकिन अपने परिवार तक किसी तकलीफ़ की आँच नहीं आने देना चाहता।

वह उस विशाल वृक्ष के समान होता है, जिसकी छाँव में पूरा परिवार सुकून से जीवन बिताता है, जबकि वह स्वयं हर मौसम की मार चुपचाप सहता रहता है।

उसे अपने आराम, अपने भोजन या अपनी इच्छाओं की उतनी चिंता नहीं होती, जितनी अपने परिवार की होती है। उसकी सबसे बड़ी फिक्र होती है—अपने माता-पिता, पत्नी और बच्चों की, उन लोगों की जिन्होंने उसे प्यार, संस्कार और जीवन दिया होता है।

धीरे-धीरे उस दुखद घटना के घाव भी भरने लगे। समय ने हमारे टूटे हुए जीवन को फिर से संभालना शुरू कर दिया। हमारा बेटा भी अब पाँच वर्ष का हो चुका था। उसकी मासूम हँसी ने घर में फिर से खुशियों की रोशनी भर दी थी।

विवान की अथक मेहनत, लगन और प्रतिभा का परिणाम यह हुआ कि कंपनी ने हमें अमेरिका के एक बड़े प्रोजेक्ट के लिए चयनित कर लिया। इसी के साथ विवान का प्रमोशन भी हो गया।

अमेरिका पहुँचने के बाद हमारी जिंदगी ने एक नया मोड़ लिया। वहाँ हमने एक सुंदर-सा शानदार बंगला खरीदा। विवान ने दो गाड़ियाँ भी लीं—एक अपने लिए और दूसरी मेरी सुविधा के लिए।

आज विवान रोज़ ऑफिस जाते हैं और मैं घर से अपना कार्य करती हूँ। सबसे बड़ी खुशी यह है कि अब मम्मी-पापा भी हमारे साथ रहते हैं।

मैं अपनी सामर्थ्य के अनुसार उनकी सेवा करने का प्रयास करती हूँ। सच कहूँ तो मुझे कभी यह महसूस ही नहीं हुआ कि मैं केवल उनकी बहू हूँ। मैं उन्हें अपने माता-पिता की तरह मानती हूँ। उनकी देखभाल करके मुझे एक अद्भुत आत्मिक शांति और संतोष मिलता है। शायद इसलिए भी, क्योंकि विवान हमेशा हमारे लिए हर जिम्मेदारी प्रेम से निभाते आए हैं।

अब हमारा बेटा भी दस वर्ष का हो चुका है। दादा-दादी के साथ रहते-रहते वह उनके इतना करीब हो गया है कि कई बार लगता है जैसे उसे हमारी तुलना में उनका साथ अधिक प्रिय हो। दादा-दादी तो उसे प्यार से “छोटा विवान” कहकर बुलाते हैं।

घर में जब उसकी खिलखिलाहट गूँजती है और मम्मी-पापा के चेहरे पर मुस्कान आती है, तब लगता है कि जीवन की असली खुशियाँ धन-दौलत में नहीं, बल्कि परिवार को साथ लेकर चलने में हैं।

सुख तो बिखरने में नहीं, जुड़कर रहने में है।

जब परिवार के लोग एक-दूसरे का हाथ थामकर, कंधे से कंधा मिलाकर जीवन की राह पर चलते हैं, तब जीवन की कठिन से कठिन यात्रा भी बेहद सुंदर बन जाती है।

आज जब मैं पीछे मुड़कर देखती हूँ, तो महसूस करती हूँ कि हर स्त्री के जीवन में विवान जैसा जीवनसाथी होना सचमुच एक सौभाग्य है—

ऐसा पुरुष, जो केवल अपने लिए नहीं, बल्कि पूरे परिवार को साथ लेकर जीना जानता हो।

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