दगाबाज़ तीतर
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डॉ. कृष्णकांत श्रीवास्तव
एक दिन शहर के भीड़भाड़ वाले बाज़ार में एक चिड़ीमार अपने पिंजरों के साथ बैठा था। उसके सामने लोहे की जाली वाले बड़े बक्से में कई तीतर ठुंसे पड़े थे — डरे हुए, सहमे हुए, मानो अपनी आज़ादी की आख़िरी उम्मीद भी खो चुके हों।
लेकिन सबकी नज़र बार-बार बगल में रखे एक छोटे से बक्से पर जा टिकती थी, जिसमें सिर्फ एक नन्हा-सा तीतर अकेला बैठा था — शांत, स्थिर, और अजीब-सी निर्भीकता के साथ।
एक ग्राहक ने पास आकर पूछा, “भाई, ये तीतर कितने के हैं?”
चिड़ीमार ने बेपरवाही से जवाब दिया, “एक तीतर चालीस रुपये का।”
ग्राहक की जिज्ञासा उस छोटे बक्से पर अटक गई। “और वो जो अकेला तीतर है? उसकी कीमत क्या है?”
चिड़ीमार का चेहरा अचानक गंभीर हो गया। “उसे मैं बेचना नहीं चाहता… लेकिन अगर ज़िद करोगे तो पाँच सौ रुपये लगेंगे।”
“पाँच सौ?” ग्राहक चौंक गया, “इसमें ऐसा क्या खास है?”
चिड़ीमार मुस्कराया — एक ठंडी, निर्दयी मुस्कान। “ये मेरा पालतू है… मेरा साथी।
असल में यही मेरे लिए बाकी तीतरों को फँसाता है। जंगल में इसे छोड़ देता हूँ — ये जोर-जोर से पुकारता है, और इसके साथी तीतर भरोसा करके इसके पास चले आते हैं। बस… फिर मेरा जाल काम कर जाता है। काम पूरा होने पर इसे इसकी मनपसंद दाना-पानी देता हूँ… और ये फिर खुश होकर अगली शिकार की तैयारी करता है।”
यह सुनकर आसपास खड़े लोगों के चेहरे सख्त हो गए। भीड़ में खड़े एक समझदार आदमी ने बिना कुछ कहे पाँच सौ रुपये निकाले, चिड़ीमार के हाथ पर रखे, और वह छोटा तीतर खरीद लिया।
सब सोच रहे थे — शायद वह उसे आज़ाद कर देगा। लेकिन अगले ही पल उसने पूरे बाज़ार के सामने उस तीतर की गर्दन मरोड़ दी। भीड़ सन्न रह गई।
किसी ने काँपती आवाज़ में पूछा, “आपने ऐसा क्यों किया? उसे उड़ जाने देते…!”
उस आदमी की आँखों में आग थी। वह बोला — “आज़ादी का हक़ हर जीव को है। पर उस गद्दार को नहीं, जो अपने ही साथियों को धोखा देकर मौत के मुंह में धकेल दे। जो अपने लाभ के लिए अपने समाज को बेच दे — उससे बड़ा अपराधी कोई नहीं।”
बाज़ार में कुछ क्षण के लिए सन्नाटा छा गया। मानो हर व्यक्ति अपने भीतर झाँकने लगा हो।
दोस्तों : दुश्मन से बचना आसान है, पर अपनों के भेष में छिपे विश्वासघातियों से नहीं। कभी-कभी सबसे बड़ा खतरा बाहर से नहीं, भीतर से आता है।
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