सबसे बड़ा धन
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रामकिशोर वर्मा
एक समृद्ध गाँव में एक सेठ रहता था। हवेली ऊँची, तिजोरियाँ भरी हुई, नौकर-चाकरों की कतार लगी रहती थी। धन की कोई कमी नहीं थी। लेकिन उस सेठ के जीवन में एक बड़ी कमी थी—परिश्रम की। वह इतना आलसी था कि पानी का गिलास भी खुद उठाकर नहीं पीता था। सुबह देर तक सोना, दिन भर बिस्तर पर पड़े रहना, रात को दावतें और ऐशो-आराम—बस यही दिनचर्या थी।
उसे गर्व था—“मेरे पास पैसा है। मैं सब खरीद सकता हूँ। लोग मेरे लिए काम करने को तैयार हैं। मुझे मेहनत की क्या जरूरत?”
धीरे-धीरे उसका शरीर भी उसकी सोच जैसा हो गया—ढीला, बोझिल और निष्क्रिय। कहते हैं, प्रकृति देर से ही सही, लेकिन जवाब जरूर देती है। कुछ वर्षों बाद सेठ को महसूस होने लगा कि उसका शरीर साथ छोड़ रहा है। हाथ-पैरों में जकड़न… चलने में तकलीफ… साँस फूलना… वह घबरा गया। तुरंत शहर से बड़े-बड़े डॉक्टर बुलाए गए। दवाइयाँ आईं, इंजेक्शन लगे, जाँचें हुईं। तिजोरी खुलती गई, पर सेहत नहीं लौटी।
अब सेठ की आँखों में डर था—“धन है, पर शरीर साथ नहीं दे रहा… तो इस दौलत का क्या अर्थ?”
उसी समय एक दिन गाँव से एक साधु गुजर रहे थे। उन्होंने सेठ की बीमारी के बारे में सुना। साधु ने सेठ के नौकर से कहा—“कह दो अपने मालिक से, यदि वह चाहे तो मैं उसका उपचार कर सकता हूँ।”
नौकर भागा-भागा सेठ के पास पहुँचा। सेठ ने तुरंत संदेश भेजा—“साधु महाराज को आदर सहित यहाँ लाओ।”
पर उत्तर आया—“यदि सेठ को स्वस्थ होना है, तो उसे स्वयं मेरे पास आना होगा।”
यह सुनकर सेठ सन्न रह गया। वह तो ठीक से चल भी नहीं सकता था। पर जब कोई और उपाय न बचा, तो उसने हिम्मत जुटाई। नौकरों के सहारे, लाठी टेकते हुए, बड़ी कठिनाई से साधु के बताए स्थान पर पहुँचा। पर वहाँ कोई नहीं था। निराश होकर वह लौट आया। अगले दिन फिर संदेश आया—“कल आना।”
सेठ फिर गया—साधु फिर नहीं मिले।
यह सिलसिला रोज़ चलने लगा।
साधु बुलाते, सेठ जाता—और खाली हाथ लौट आता।
पहले तो उसे क्रोध आया। फिर निराशा हुई। फिर… आदत हो गई। धीरे-धीरे तीन महीने बीत गए। और एक दिन सेठ को एहसास हुआ—उसके कदम अब पहले से मजबूत हैं। हाथ-पैर कम जकड़े हुए लगते हैं। साँस कम फूलती है। वह अब सहारे के बिना कुछ दूर चल लेता था। उसी दिन साधु सामने आ खड़े हुए।
मुस्कुराकर बोले—“कैसा है शरीर अब?”
सेठ ने झुककर प्रणाम किया।
“महाराज… मैं समझ गया। आपने मुझे दवा नहीं दी, चलना सिखाया है। आपने मुझे परिश्रम की औषधि दी।”
साधु बोले—“बेटा, धन से सब कुछ खरीदा जा सकता है—पर स्वास्थ्य नहीं। तिजोरी में रखे सिक्के शरीर को शक्ति नहीं देते। परिश्रम ही असली दवा है।
याद रखो—स्वस्थ शरीर से बड़ा कोई धन नहीं होता।”
उस दिन के बाद सेठ बदल गया। वह अब सुबह सूर्योदय के साथ उठता, टहलता, खेतों में जाता, काम में हाथ बँटाता। तिजोरी पहले भी भरी थी—पर अब जीवन भी भरा हुआ था।
शिक्षा : मित्रों, धन कमाना बुरा नहीं है। पर यदि शरीर ही साथ न दे, तो धन व्यर्थ है। इसलिए कमाइए जरूर—पर अपने स्वास्थ्य की कीमत पर नहीं। क्योंकि पैसा पूंजी हो सकता है, पर स्वस्थ शरीर ही असली संपत्ति है।
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