एक चुटकी ईमानदारी
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रमाकांत चतुर्वेदी
रामू काका का नाम पूरे गाँव में आदर से लिया जाता था। न कोई ऊँची आवाज़, न किसी से छल — बस सरलता, स्नेह और अटूट ईमानदारी। लोग कहते थे, “अगर इंसानियत का चेहरा देखना हो, तो रामू काका को देख लो।”
एक दिन काका ने अपने पुराने मित्रों को घर पर भोजन के लिए बुलाया। ऐसी बैठकों में सिर्फ भोजन नहीं बनता था — यादें पकती थीं, हँसी परोसी जाती थी और दोस्ती का स्वाद घुल जाता था। आँगन में चूल्हा जल चुका था, बातें पकने लगी थीं। तभी अचानक काका को याद आया — नमक तो सुबह ही खत्म हो गया था।
वे उठे, फिर ठिठक गए और अपने बेटे को आवाज़ दी।
“बेटा, ज़रा बाज़ार से एक पुड़िया नमक ले आ।”
बेटा पैसे लेकर चल पड़ा ही था कि काका ने फिर पुकारा — “सुन, नमक ठीक दाम पर ही लेना। न ज़्यादा देना, न कम।” बेटा हैरान रह गया।
“पिताजी, ज़्यादा दाम न दूँ — ये तो समझ में आता है। पर अगर मोलभाव करके कम में ले आऊँ तो बुरा क्या है? चार पैसे बच ही जाएँगे।” काका की आँखों में एक गहरी गंभीरता उतर आई।
“नहीं बेटा, ऐसा करना हमारे गाँव को खोखला कर सकता है।”
आँगन में बैठे मित्र भी अब ध्यान से सुनने लगे।
एक ने मुस्कराकर पूछा — “अरे भाई, कम दाम में नमक लेने से गाँव कैसे बर्बाद हो जाएगा?”
काका ने धीमे स्वर में कहा — “सोचो, कोई अपनी मेहनत की चीज़ कम दाम पर कब बेचता है? तभी न, जब उसे पैसों की बहुत सख्त ज़रूरत हो। और जो उसकी मजबूरी का फायदा उठाता है। वह उस मजदूर के पसीने का अपमान करता है।”
कुछ क्षण के लिए सब चुप हो गए। फिर काका ने आगे कहा — “समाज एक दिन में बेईमान नहीं होता। हम सब उसमें रोज़-रोज़ एक-एक चुटकी बेईमानी मिलाते जाते हैं। और सोचते हैं — ‘इससे क्या फर्क पड़ेगा?’
फर्क पड़ता है मित्रों, इतना कि एक दिन हम सब मिलकर भी एक चुटकी ईमानदारी को तरस जाते हैं।” उनकी बात हवा में नहीं, सीधे दिलों में उतर गई।
दोस्तों : ईमानदारी बड़ी घटनाओं से नहीं, छोटे फैसलों से जन्म लेती है। जब हम दूसरों की मजबूरी का लाभ उठाना छोड़ देते हैं — तभी समाज सच में मजबूत बनता है।
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