बबलू की मम्मी की अनोखी शादी की सालगिरह
Updated: Sep 15
एक अनोखा फंक्शन
निरजंन धुलेकर
बबलू की मम्मी से पास-दूर का कोई भी रिश्तेदार ख़ास ख़ुश नहीं था। वजह थी उनकी अजीबोगरीब आदतें और एक तकिया कलाम। आज बबलू की मम्मी अपनी शादी की तीसवीं सालगिरह के फंक्शन में मिले व्योहार का ब्यौरा डायरी में लिख रहीं थीं। एक-एक लिफाफा और पार्सल पैकेट खुलता जा रहा था। उनकी रँनिंग कमेंट्री भी चलने लगी।
“एल्लो, कानपुर वाली जिज्जी ने दस-दस के नोट के कुल पाँच सौ रुपये पकड़ा दिए हैं। इन्हें कौन बताए कि रेट ग्यारह सौ का चल रहा है आजकल। उस दिन इनके स्टेशन से आने पर ऑटो को देने के लिए खुले नहीं थे हमारे पास। सो, उन्हें ही देने पड़े थे। हद हो गई!”
रिश्तेदारों की अनोखी भेंटें
“हें, ये क्या है चश्मे का फ्रेम? छोटे जीजा की चश्मे की दुकान है, तो वो यही पकड़ा रहे व्योहार में। मेरा आंख का नम्बर ले कर फ्रेम में काँच लगा कर भेजते तो कोई बात होती। हद हो गई!”
“हाय राम! जिठानी जी ने फिर तौलिए दे दिए? जब आयीं थीं यहाँ, उस दिन नहाते वक्त एक भी तौलिया सूखा नहीं था। उसी का बदला निकाल रहीं। अब मैं भी इनके डब्बू की शादी में साबुन बट्टी दूंगी। हद हो गई!”
“अरे! इनकी परम प्रिय भाभी जी ने गुलदान दिया है। हमें क्या ब्लडी फूल समझ रखा है? इसे अपने घर में यूज करती थीं, देखा था मैंने। हद हो गई!”
“अब जे देखो। बुआ जी ने स्कॉच ब्राइट के दस पैकेट दिए हैं। पिछली बार आयीं थीं तो किचन की सफाई को लेकर कितनी नौटंकी की थी। रुको, इनकी बेटी की शादी में मैं भी फिनायल की बोतल ही दूंगी। हद हो गई!”
अजीब उपहारों की सूची
“हे भगवान! जे फूफा भी न। कान के ईयर बड के पैकेट भेजे हैं। पिछली बार मुँह से निकल गया था कि कान मत खाइए मेरे बस। तो कोई ये भेजता है क्या? हद हो गई!”
“जे लो, बड़े जीजाजी ने मोबाइल की बैटरी भेजी है। तीन बार उन्होंने कॉल किया था और तीनों बार मेरे मोबाइल की बैटरी लो होने से कॉल लुप्त हो गया। जे नहीं की नया मोबाइल ही भेज देते। हद हो गई!”
“धन्य हो गई, सासु जी ने भी कुछ दिया है। देखूं तो ज़रा। सत्यानाश हो! ये पेट सफा भी कोई गिफ्ट करने की चीज है? हाँ, मुझे थोड़ी देर लगती है अंदर पर उन्हें भी देरी की आदत डालनी चाहिए न तीस सालों में। हद हो गई!”
पति और बहू के उपहार
“आआहा, पतिदेव का पार्सल? देखें भाई, क्या तोहफा भेजा है मेरे लिए। हें, सेरिडोन की गोलियाँ? इन्हें मालूम है न, मैं डिस्प्रीन लेती हूँ। एक काम ठीक से नहीं होता इनसे, कसम से। तभी तो हम हर वक़्त माथे पर पट्टी बांधे पड़े रहते। हद हो गई!”
“अरे वाह! बहुरानी का पार्सल? देखें तो हमारी बहु को हमसे कितना प्यार है? हे राम, जे क्या? नींद की गोलियाँ, वो भी पूरे हजार का बंडल? बबलू, एक बात सुनो। तुम लोग रात भर इतनी खटर-पटर मचाए रखते हो। हमें सारी रात उठकर टोकना पड़ता है। सोते क्यों नहीं? बहु को भेज यहाँ ये सारी, उसी को दे दूंगी। आ तो गए चिक्की डब्बू, अब तो चैन सोने दो मुझे। हद हो गई!”
उपहारों का महत्व
इन उपहारों के पीछे की भावनाएँ अक्सर अनकही होती हैं। रिश्तेदारों की भेंटें कभी-कभी हमें हंसाने के लिए होती हैं, कभी-कभी हमें सोचने पर मजबूर करने के लिए। लेकिन क्या हम इन उपहारों को सिर्फ़ वस्तुओं के रूप में देखते हैं? क्या हमें यह नहीं समझना चाहिए कि हर उपहार के पीछे एक कहानी होती है?
जब हम इन उपहारों को खोलते हैं, तो हमें उन रिश्तों की याद आती है जो हमें जोड़ते हैं। चाहे वो तौलिए हों, चश्मे का फ्रेम हो, या फिर मोबाइल की बैटरी। हर चीज़ में एक भावना छिपी होती है।
रिश्तों की मिठास
रिश्तों की मिठास कभी-कभी इन छोटी-छोटी बातों में छिपी होती है। हमें इन उपहारों को केवल एक वस्तु के रूप में नहीं देखना चाहिए। बल्कि, हमें यह समझना चाहिए कि ये उपहार हमें एक-दूसरे के करीब लाते हैं।
इस तरह की घटनाएँ हमें यह याद दिलाती हैं कि रिश्ते कितने महत्वपूर्ण होते हैं। चाहे वो रिश्तेदार हों या दोस्त, हर कोई अपने तरीके से हमें प्यार और समर्थन देता है।
निष्कर्ष
बबलू की मम्मी की शादी की सालगिरह का यह फंक्शन सिर्फ़ एक समारोह नहीं था। यह एक ऐसा अवसर था जहाँ रिश्तों की मिठास और अजीबोगरीब उपहारों के माध्यम से हम सभी ने एक-दूसरे के साथ अपने संबंधों को और मजबूत किया।
इस तरह की कहानियाँ हमें यह सिखाती हैं कि जीवन में छोटी-छोटी बातें कितनी महत्वपूर्ण होती हैं। हमें इनसे सीखना चाहिए और अपने रिश्तों को और भी मजबूत बनाना चाहिए।



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