top of page

लोहे का तराजू

Mar 30
2 min read

ललित कुमार

एक बार एक व्यापारी को व्यापार के सिलसिले में परदेस जाना था और उसके लिए उनको पैसों की जरूरत थी। वह एक साहूकार के पास गया और उससे पैसे उधार लेने के लिए अपनी लोहे की तराजू गिरवी रख दी।

व्यापारी परदेस से वापस आने के बाद, साहूकार के घर गया और उधार लिए पैसे वापस देकर उससे अपनी तराजू मांगा। लालची साहूकार ने बोला, “मेरी दुकान में बहुत सारे चूहे हैं तुम्हारी तराजू को तो चूहे खा गये।”

व्यापारी समझ चुका था कि साहूकार झूठ बोल रहा है पर उसने साहूकार से कोई बहस नहीं किया। व्यापारी ने कहा, “कोई बात नहीं। मैं तुम्हारे लिए रेशम के कपड़े की कुछ थान लाया हूं। तुम अपने बेटे को मेरे साथ भेज दो। वह कपड़ों के थान को लेकर वापस आ जाएगा।” साहूकार खुश हो गया और उसने अपने बेटे को व्यापारी के साथ भेज दिया।

व्यापारी ने साहूकार के बेटे को एक गुफा में लेकर गया और बोला, “मेरे कपड़ों के थान इस गुफा में रखे हुए है । अंदर जाकर दो थान निकाल लो।” जैसे ही लड़का अंदर गया, व्यापारी ने गुफा का दरवाजा बंद कर दिया । व्यापारी अकेला ही साहूकार के पास गया तो साहूकार ने पूछा, “मेरा बेटा कहां है?”

व्यापारी ने दुख के साथ कहा, “मुझे माफ करना, क्या बताऊ एक चील जोर से उड़ता हुआ आया और उसने तुम्हारे बेटे को अपने पंजे में दबाकर उड़ गया।”

साहूकार गुस्से में होकर बोला, “ऐसा कैसे हो सकता है? मैं तुम्हारी शिकायत गांव के बड़े बुजुर्ग से करूंगा।” कुछ ही देर मे गांव के बड़े बुजुर्ग भी आ गये। बुजुर्गों ने व्यापारी से लड़के को वापस करने को कहा तो व्यापारी बोला, “जब लोहे के तराजू को चूहा खा सकता है, तो लड़के को चील कैसे नहीं उठा सकता?”

तब लोगों ने व्यापारी से पूरा मामला क्या है, बताने को कहा। व्यापारी ने लोगों को पूरा मामला बताया तो, व्यापारी की बात सुनकर बुजुर्गों ने साहूकार को तराजू वापस देने को कहा।

शिक्षा : जैसी करनी वैसी बरनी, जैसा बीज बोओगे, वैसी फसल काटोगे।

******

Comments


bottom of page