स्कूल का गार्ड
- Jan 4
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सपना रानी
एक दिन स्कूल में सुबह-सुबह कदम रखते ही गार्ड के मुरझाए और उदास चेहरे की ओर अचानक से ध्यान चला गया। लगभग 65-70 के बुजुर्ग को इस उम्र में अपना और परिवार का खर्च चलाने के लिए तीन शिफ्ट की ड्यूटी पूरी मुस्तैदी के साथ करनी पड़ती है। उस पर से न ढंग का भोजन, न कोई सुविधा और ना ही पदाधिकारियों का अच्छा बात-व्यवहार।
सच में मुझे बहुत बुरा लगा, जब उस दिन गार्ड द्वारा गलती से एक बाहरी पदाधिकारी को सैल्युट नहीं किया गया। स्कूल के ही एक पदाधिकारी द्वारा उन्हें खूब खरी-खोटी सुनाई गयी। मैं सब देख और सुन रही थी। मैं चाहकर भी कुछ नहीं कर सकती थी। मैं तो खुद ही संविदा पर कार्य करती थी, जिसका कोई निश्चित भविष्य नहीं होता।
मैंने गार्ड जी को स्कूल के मेन गेट पर कड़ी धूप और उमस में पूरी मुस्तैदी के साथ ड्युटी करते पाया। मॉर्निंग एसेंबली के बाद सभी कर्मी अपने-अपने कार्य में लग गये। मैं स्टाफ रुम से अटेंडेंस रजिस्टर लेने गई तो अपना लंच बॉक्स भी साथ में ले लिया। स्कूल का मेन गेट बंद हो चुका था। देर से आनेवाले बच्चों को सज़ा के रूप में बाहर ही धूप में खड़ा कराया गया था। मैं गार्ड रुम में गई तो गार्ड जी एक टूटी हुई कुर्सी पर बैठकर खिड़की से बाहर के बच्चों को देख रहे थे। वे पसीने से तरबतर थे। मुझे देखते ही वे खड़े हो गये।
मैंने उन्हें बैठने का संकेत करते हुए पूछा- "गार्ड अंकल, इस कमरे में तो पंखा भी नहीं है। उसपर से यह एस्बेस्टस तो गरमी में और तप रहा है। आप इसमें कैसे ड्युटी करते हैं?? "गार्ड जी ने अपने माथे का पसीना पोछते हुए कहा - "केतना दिन से खराब है? सर से कहते हैं ठीक करवाने को, तो कौनो नहीं सुनता है। जैसे-तैसे ड्युटी कर लेते हैं?
दिक्कत त बहुत है। पर का करें?? केहू सुनता ही नहीं है। "मैंने अपनी बात रखी- "आप कल से ड्युटी कर रहे हैं। दूसरे गार्ड कब आएँगे? "गार्ड जी ने थके स्वर में बात रखी- "सहूलियत के लिए तीन शिफ्ट का 24 घंटे का ड्युटी कर लेते हैं। बाकी दूसरा गार्ड आएगा तब न जाएँगे घरे। उसको आठे बजे आना था। आ देखिए पौने नौ बज रहा है। हम का करें??"
मैंने उनसे पूछा- "गार्ड जी, मान लीजिए कि दूसरा गार्ड 12 बजे आए तो??" गार्ड जी निरुत्तर हो गये? मैंने फिर पूछा- "आप कुछ खाये हैं कि नहीं? "उन्होंने निराशा में कहा- "नहीं मैडम? कल्ले आठ बजे रात को सतुआ आ पियाज खाये थे।
"मैंने कहा- "गार्ड अंकल, इस थैला में मेरा लंचबॉक्स है और पेपर में लपेटकर ठंडा पानी की बोतल रखा हुआ है। लंचबॉक्स में रोटी और सब्जी होगी। आपको जितनी भूख हो खा लीजिए और ठंडा पानी पी लीजिएगा"
गार्ड अंकल संकोच में पड़ गये? मैंने उनके कंधे पर हाथ रखते हुए कहा- "आप मेरे पिता समान हैं? जब आप ही भूखे रहेंगे मैं कैसे अपनी ड्युटी निभा पाऊँगीं?? थोड़ा भी संकोच मत कीजिएगा।"
मेरी क्लास खाली जा रहा थी। संयोग से टीचर इंचार्ज का ध्यान उस क्लास की ओर अब तक नहीं गया था, नहीं तो म़ुझे उनका कोप भाजन बनना पड़ता। मैं तेजी से अपने क्लास की ओर बढ़ चली।
11 बजे अवकाश हुआ तो मैं ग्राउंड में बच्चों की निगरानी में आकर खड़ी हो गई। गार्ड अंकल तेज कदमों से मेरे पास आए और बोले- "मैडम, बुरा त नहीं मानिएगा न?? एगो बात कहना था।"
मैंने कहा-"नहीं मानूँगीं। क्या बात है बताइए??
"उन्होंने अपनी बात रखी- "मेडम, हमको बहुत जोर का भूख लगा था। सो हम सब रोटी-सब्जी खा गये हैं... और पानी भी सब पी गये।
"मैंने कहा- "तो क्या हो गया?? आपकी भूख मिटी न??
"गार्ड अंकल मुस्कुराने लगे।
मुस्कुराते हुए बोले-"मैडम, ई स्कूल में भांति-भांति का लोग है। बाकी अपने के सबसे अलग हैं। भगवान आपको बहुत बड़ा आदमी बनाएँगे एक दिन। आपने बहुत पुण्य का काम किया है
मैडम, हम आपके लंचबॉक्स आ बोतल सरफ से साफ करके थैला में स्टाफ रुम में आपके टेबल पर रख दिए हैं। दूसर गार्ड आ गये हैं। हम घरे जा रहे हैं? परनाम मैडम!"
मुझे प्रणाम करते हुए गार्ड जी तेज़ कदमों से अपनी साइकिल पर सवार होकर मेन गेट से बाहर चले गये। मैं उन्हें तब तक देखती रही जब तक कि मेरी आँख से वे ओझल न हो गये।
स्कूल से छुट्टी के समय मुझे बहुत ज़ोर की भूख लगी। ठंडा पानी पीकर किसी तरह आधा घंटा स्कूल में बिताने के बाद जब घर पर आई और मम्मी जी को थैला थमाते हुए कहा- "बहुत ज़ोर की भूख लगी है! खाना लगा दो! "मम्मी जी किचेन से ही बोली- "फिर किसी को आज का खाना खिला दिया क्या? मेरी दानी-महात्मा? तभी मैं कहूँ कि तुझको भूख कैसे लग गयी? तू तो आते-आते कभी खाती नहीं??"
मम्मी जी के इस प्रश्न का कोई उत्तर मेरे पास नहीं था। उसके सामने एक विनम्र,आज्ञाकारी बच्चे की तरह पेश होकर मैंने कहा- "वो बुजुर्ग गार्ड अंकल न, कल से भूखे थे। मेरा मन नहीं माना। सब दे दिया उन्हें खाने के लिए.....
"मम्मी जी कुछ देर चुप रहीं। फिर चुप्पी तोड़ते हुए बोली- "तभी तो तेरे पापा कहते हैं कि मेरी बेटी लाखों में एक है। सच में बेटी तू बहुत ही अच्छी इंसान हैं! तू बैठ, मैं खाना लगाती हूँ।"
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