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Posts (4)

Feb 18, 20262 min
असमय की एक कविता
आजकल एकदम खाली हूँ इतना खाली कि मेरे हिस्से कोई काम ही नहीं बचा, कभी समय मुझ पर हँसता है कभी मैं समय पर और यह भी क्या इत्तेफाक़ है मेरा समय सापेक्ष होना मुझे निरपेक्षता का सिद्धान्त समझा रहा है

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Nov 20, 20251 min
जीवन गणित
सन्दीप तोमर   जिंदगी के गणित में तुमने रेखागणित को चुना और मैं, मैं खुद बना रहा एलजेब्रा मान लेता अचर को कोई चर और सुलझा लेता उलझी हुई समीकरणों को, एक रोज जब मैंने चाहा जिंदगी का हल तब तुम बोली- रेखागणित सी इस दुनिया में मैं और .... और तुम दो समांतर रेखाएँ जैसे नदी के दो तीर, सिर्फ साथ चल सकते हैं, दूर से एक-दूसरे को देख सकते हैं, शायद महसूस भी कर सकते हैं लेकिन, अगर गलती से मिल गये तो अपना अस्तित्व समाप्त, मैंने कहना चाहा प्रतिउत्तर में- तिर्यक रेखाएँ भी उसी रेखागणित का हिस्सा है, साथ चलते...

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Feb 12, 20251 min
घुलते हुए दो जिस्म
सन्दीप तोमर   सीने पर जो चाँद तुम टांक गई थी, वो रफ्ता-रफ्ता बढ़ता जाता है, जैसे मेंरे तुम्हारे बीच पनप रहा एहसास हो, जो बदल जाता है पूनम...

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संदीप तोमरसंदीप तोमर

संदीप तोमर

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