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बस स्टैंड की वह बच्ची…

  • 2 days ago
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ललित सिंह

बस स्टैंड पर शाम उतर रही थी। लोगों की भीड़, चाय की भाप, हॉर्न की आवाज़ें और भागते कदमों के बीच मैं अपनी बस का इंतज़ार कर रहा था। बस अभी आई नहीं थी। मैं बेंच पर बैठा मोबाइल में खबरें स्क्रॉल कर रहा था—देश-दुनिया की बड़ी-बड़ी बातें, अरबों के सौदे, राजनीति, अर्थव्यवस्था…

तभी एक हल्की-सी आवाज़ ने मेरा ध्यान खींचा—

“अंकल जी… पेन ले लो। दस के चार दे दूंगी… बहुत भूख लगी है… कुछ खा लूंगी…”

मैंने सिर उठाया। लगभग दस साल की एक दुबली-सी बच्ची थी। चेहरे पर धूल, आँखों में मासूम चमक। उसके साथ एक छोटा-सा लड़का खड़ा था—शायद उसका भाई।

मैंने सहज ही कहा—“मुझे पेन नहीं चाहिए।”

वो पल भर को चुप हुई। फिर मासूमियत से बोली—“तो फिर हम कुछ खाएंगे कैसे?”

उसकी आवाज़ में शिकायत नहीं थी… बस सीधी-सी सच्चाई थी।

मेरे बैग में दो बिस्कुट के पैकेट थे। मैंने निकालकर एक-एक दोनों के हाथ में रख दिया।

“लो… ये खा लो।”

मैंने सोचा था वे खुशी से दौड़ पड़ेंगे। पर जो हुआ, उसने मुझे भीतर तक हिला दिया। बच्ची ने एक पैकेट वापस मेरी ओर बढ़ा दिया—“अंकल जी, एक ही काफी है… हम बाँट लेंगे।”

मैं स्तब्ध रह गया। भूख से तड़पती दो नन्ही जानें… और फिर भी संतोष?

मैंने कहा—“अरे रख लो दोनों, कोई बात नहीं।”

तभी उसने मेरी आँखों में देखते हुए पूछा—“तो फिर आप क्या खाओगे?”

बस… वही पल था जब जैसे समय ठहर गया। जिस दुनिया में लोग अपने हिस्से से ज्यादा लेने की होड़ में लगे हैं…जहाँ करोड़ों कमाने वाले भी और चाहते हैं…

जहाँ उन्नति के नाम पर इंसानियत को कुचल दिया जाता है… वहाँ एक भूखी बच्ची मुझे सिखा रही थी—“दूसरे के हिस्से का मत छीनो।”

मैंने दोनों पैकेट उनके हाथ में रख दिए। और मुस्कुराकर कहा—“मेरे पास और है… तुम निश्चिंत होकर खाओ।”

वे दोनों पास ही सीढ़ियों पर बैठकर बिस्कुट तोड़ने लगे—पहले छोटे भाई को दिया, फिर खुद खाया।

उनकी आँखों में संतोष था। और मेरी आँखों में… नमक घुल चुका था। उस दिन मुझे समझ आया—गरीबी पेट की होती है, लोभ मन का। और जो मन से तृप्त हो, वो सचमुच अमीर होता है। हम अक्सर सोचते हैं कि हम जरूरतमंदों की मदद कर रहे हैं… पर कई बार वही हमें इंसानियत का असली अर्थ समझा जाते हैं।

लोभ में इतना मत लो कि किसी और का हिस्सा भी छीन लो। क्योंकि असली संपत्ति धन नहीं, वो संवेदना है… जो भूख में भी बाँटना जानती है।

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