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हीरे की पहचान

  • 2 days ago
  • 4 min read

रामकुमार वर्मा

एक बार एक महान राजा का भव्य दरबार लगा हुआ था। सर्दियों का मौसम था, इसलिए दरबार महल के खुले प्रांगण में लगाया गया था, जहाँ हल्की-हल्की सुनहरी धूप सबको सुखद गर्माहट दे रही थी। राजसिंहासन के सामने एक शानदार शाही मेज़ सजी हुई थी, जिस पर कई कीमती वस्तुएँ रखी थीं। दरबार में मंत्री, दीवान, पंडित, सेनापति और राज्य के अनेक गणमान्य लोग उपस्थित थे। राजा के परिवार के सदस्य भी उस सभा में बैठे थे। पूरा वातावरण गरिमा और शांति से भरा हुआ था।

उसी समय दरबार के द्वार पर एक अजनबी व्यक्ति ने प्रवेश की अनुमति माँगी। अनुमति मिलने पर वह आत्मविश्वास से भरा हुआ अंदर आया और राजा को प्रणाम कर बोला—

“महाराज, मैं कई राज्यों की यात्रा करता हूँ और अपने साथ दो अनोखी वस्तुएँ लेकर चलता हूँ। मैं जहाँ भी जाता हूँ, वहाँ के राजा और विद्वानों के सामने इन वस्तुओं को रखता हूँ और उनसे इनकी पहचान करने की चुनौती देता हूँ। आज तक कोई भी इनकी सही पहचान नहीं कर पाया। इस प्रकार मैं अनेक राज्यों से विजेता बनकर लौट चुका हूँ। अब मैं आपके राज्य में आया हूँ, यह देखने के लिए कि यहाँ कोई इनकी परख कर पाता है या नहीं।”

राजा को यह सुनकर उत्सुकता हुई। उन्होंने मुस्कराते हुए कहा,

“बताओ, वे वस्तुएँ क्या हैं?”

उस व्यक्ति ने धीरे से अपनी पोटली खोली और दोनों वस्तुएँ शाही मेज़ पर रख दीं। दरबार के सभी लोग ध्यान से देखने लगे। वे दोनों वस्तुएँ आकार, रंग, चमक और रूप में बिल्कुल एक जैसी थीं। कोई भी अंतर पहचानना असंभव प्रतीत हो रहा था।

राजा ने कुछ देर देखने के बाद कहा—

“ये तो दोनों एक जैसी ही लगती हैं।”

वह व्यक्ति मुस्कराया और बोला—

“महाराज, दिखने में दोनों एक जैसी हैं, लेकिन वास्तव में एक बहुत कीमती हीरा है और दूसरी केवल साधारण काँच का टुकड़ा। आज तक कोई भी यह नहीं बता पाया कि इनमें से कौन सा हीरा है और कौन सा काँच। यदि आपके दरबार में कोई सही पहचान कर ले, तो मैं यह हीरा आपकी राज्य-तिजोरी में भेंट कर दूँगा। लेकिन यदि कोई पहचान न पाया, तो आपको इस हीरे के बराबर धनराशि मुझे देनी होगी।”

यह सुनकर पूरे दरबार में सन्नाटा छा गया। राजा ने एक-एक करके अपने मंत्रियों, दीवानों और विद्वानों की ओर देखा। सबने वस्तुओं को ध्यान से देखा, परंतु किसी में भी इतना साहस नहीं था कि निश्चित रूप से कुछ कह सके। दोनों वस्तुएँ इतनी समान थीं कि अंतर करना असंभव लगता था।

दीवान ने विनम्रता से कहा—

“महाराज, हम यह परख नहीं कर सकते। दोनों वस्तुएँ बिल्कुल एक जैसी दिखाई दे रही हैं।”

राजा भी असमंजस में पड़ गए। राज्य में धन की कमी नहीं थी, परंतु यदि वे हार जाते तो उनकी प्रतिष्ठा को ठेस पहुँचती। इसलिए दरबार में एक विचित्र चिंता का वातावरण बन गया।

तभी सभा के पीछे थोड़ी हलचल हुई। एक अंधा व्यक्ति, हाथ में लाठी लिए धीरे-धीरे खड़ा हुआ। उसने कहा—

“मुझे महाराज के पास ले चलो। मैंने सारी बात सुनी है। यदि अनुमति हो, तो मैं भी एक बार इन वस्तुओं को परखना चाहता हूँ।”

लोगों को आश्चर्य हुआ। जो विद्वान और ज्ञानी व्यक्ति पहचान नहीं पाए, वहाँ एक अंधा व्यक्ति कैसे पहचान पाएगा? फिर भी उसे राजा के सामने लाया गया।

उसने विनम्रता से कहा—

“महाराज, मैं जन्म से अंधा हूँ। मैं इन वस्तुओं को देख नहीं सकता, पर यदि अनुमति दें तो मैं इन्हें छूकर पहचानने का प्रयास करना चाहता हूँ। यदि सफल हुआ तो अच्छा, और यदि असफल हुआ तो वैसे भी आप सब हार ही चुके हैं।”

राजा को उसकी बात में सरलता और आत्मविश्वास दोनों दिखाई दिए। उन्होंने अनुमति दे दी।

दोनों वस्तुएँ उसके हाथ में दी गईं। उसने उन्हें कुछ क्षण छुआ… फिर शांत स्वर में बोला—

“महाराज, यह हीरा है… और यह काँच का टुकड़ा।”

दरबार में एकदम सन्नाटा छा गया। सभी की निगाहें उस यात्री पर टिक गईं जो चुनौती लेकर आया था। वह व्यक्ति तुरंत उठकर उस अंधे के चरणों में झुक गया और बोला—

“आपने सही पहचान लिया। मैं अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार यह कीमती हीरा आपके राज्य की तिजोरी में अर्पित करता हूँ।”

दरबार में खुशी की लहर दौड़ गई। राजा और सभी दरबारी उस अंधे व्यक्ति की बुद्धिमत्ता से चकित थे।

राजा ने जिज्ञासा से पूछा—

“तुमने यह कैसे पहचान लिया कि कौन सा हीरा है और कौन सा काँच?”

अंधा व्यक्ति मुस्कराया और बोला—

“महाराज, हम सब धूप में बैठे हैं। मैंने दोनों को छुआ। जो वस्तु ठंडी रही, वह हीरा थी… और जो जल्दी गरम हो गई, वह काँच था।”

उसकी सरल बुद्धि के आगे बड़े-बड़े विद्वान भी नतमस्तक हो गए।

फिर वह शांत स्वर में बोला—

“महाराज, यही बात जीवन में भी लागू होती है।

जो व्यक्ति छोटी-छोटी बातों में तुरंत गरम हो जाए, क्रोधित हो जाए, उलझ जाए— वह काँच के समान है।

लेकिन जो कठिन परिस्थितियों में भी शांत और स्थिर बना रहे— वही सच्चा हीरा होता है।”

उस दिन राजा के दरबार में केवल हीरे की ही नहीं, बल्कि मानव-स्वभाव की सच्ची पहचान भी हो गई।

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