ईश्वर की कृपा
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डॉ. कृष्णकांत श्रीवास्तव
एक आश्रम में संतों की विशाल सभा लगी हुई थी। भजन, प्रवचन और शांति का वातावरण चारों ओर फैला था। किसी श्रद्धालु ने प्रेम से एक नया मिट्टी का घड़ा लाकर उसमें गंगाजल भर दिया और सभा के बीच रख दिया, ताकि जब भी किसी संत को प्यास लगे, वह गंगाजल ग्रहण कर सकें।
सभा के बाहर खड़ा एक व्यक्ति उस घड़े को बड़े ध्यान से देख रहा था। उसके मन में विचारों की लहरें उठने लगीं—“वाह! कितना भाग्यशाली है यह घड़ा! न किसी तालाब का पानी, न किसी कुएँ का… इसमें तो गंगाजल भरा है। और वह भी संतों की सेवा के लिए! कितनी ऊँची किस्मत है इसकी… काश! मेरा जीवन भी ऐसा होता।”
उसके मन की बात मानो घड़े ने सुन ली। और अचानक जैसे वह बोल पड़ा—“बंधु, जिस भाग्य की तुम प्रशंसा कर रहे हो, उसकी कहानी सुनोगे तो चौंक जाओगे।”
व्यक्ति विस्मित रह गया। घड़ा अपनी कथा कहने लगा—“मैं कभी यूँ पूजनीय नहीं था। मैं तो बस मिट्टी था… पैरों तले रौंदी जाने वाली, किसी काम की नहीं समझी जाने वाली मिट्टी। एक दिन कुम्हार आया। उसने फावड़े से मुझे खोदा। मुझे लगा—यह कैसा अन्याय! शांति से पड़ा था, क्यों उखाड़ दिया? फिर उसने मुझे गधे पर लादा। धूल, धूप, झटके—सब सहता हुआ मैं उसके घर पहुँचा।
वहाँ उसने मुझे रौंदा… पानी डालकर गूंथा… चाक पर चढ़ाकर तेज़ी से घुमाया। मेरा सिर काटा, थपकी देकर आकार दिया। मैं चीख भी नहीं सकता था, बस सहता रहा। पर असली परीक्षा अभी बाकी थी।
मुझे भट्टी की आग में झोंक दिया गया। चारों ओर आग ही आग… ऐसा लगा अब सब समाप्त हो जाएगा। मैं भीतर-ही-भीतर पुकारता रहा—‘हे ईश्वर! यह कैसा न्याय है? एक के बाद एक कष्ट क्यों?’
आग से निकला तो सोचा अब शांति मिलेगी। पर नहीं—मुझे बाजार भेज दिया गया। लोग मुझे ठोक-ठोककर देखते, परखते। और अंत में मेरी कीमत लगाई—बस बीस-तीस रुपये!
मैं टूट चुका था। मुझे लगता था, ईश्वर ने मेरे हिस्से में बस पीड़ा ही लिखी है। फिर एक दिन, एक सज्जन मुझे खरीदकर ले गए। मुझे धोया गया, साफ किया गया, और मुझमें गंगाजल भरकर संतों की सभा में रख दिया गया।
उसी क्षण मुझे समझ आया—कुम्हार का फावड़ा भी कृपा थी। उसका रौंदना भी कृपा थी। चाक की चक्कराती गति भी कृपा थी। भट्टी की आग भी कृपा थी। और बाजार की ठोकरें भी कृपा ही थीं। यदि मैं उस मिट्टी से गुजरकर यह घड़ा न बना होता, तो आज संतों की सेवा का सौभाग्य कैसे मिलता?”
घड़ा शांत हो गया। वह व्यक्ति गहरी सोच में डूब गया।
हमारे जीवन में भी जब कठिनाइयाँ आती हैं, तो हम अक्सर सोचते हैं—“भगवान मेरे साथ ही ऐसा क्यों कर रहे हैं?” पर सच यह है कि हर परीक्षा, हर पीड़ा, हर ठोकर—हमें गढ़ रही होती है। हम भविष्य नहीं देख पाते, इसलिए ईश्वर की योजना को समझ नहीं पाते।
जिस तरह आप अपनी गाड़ी किसी अनाड़ी को नहीं सौंपते, वैसे ही ईश्वर भी अपनी विशेष कृपा उस व्यक्ति को सौंपते हैं जो भीतर से परिपक्व हो चुका हो। कठिन समय ईश्वर की दूरी नहीं, बल्कि उनकी तैयारी का समय होता है।
किसी को फल जल्दी मिलता है, किसी को देर से—पर जो धैर्य रखता है, सत्य और न्याय के मार्ग पर अडिग रहता है, वह अंततः सफल होता है। तो क्या करें जब जीवन की भट्टी तपाने लगे?
संतोष का मार्ग अपनाएँ। जो मिला है, वह भी बहुत है—यह भाव आते ही मन हल्का हो जाता है। दुनिया का सबसे सुखी व्यक्ति वह है, जो तुलना नहीं, कृतज्ञता में जीता है। हम हमेशा उसे देखते हैं जिसके पास हमसे ज्यादा है, कभी यह भी देखिए—कितने लोग ऐसे हैं जिन्हें वह भी नहीं मिला जो आपके पास है।
याद रखिए—हम अभी मिट्टी हैं या भट्टी में तप रहे हैं, यह अंत नहीं है।
शायद ईश्वर हमें भी किसी बड़ी सेवा के लिए तैयार कर रहे हों। और जब वह क्षण आएगा, तब समझ में आएगा—सब कुछ… सचमुच सब कुछ…ईश्वर की कृपा ही थी।
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