चोर का दान
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मंजुला अवस्थी
एक नगर में एक सेठ और एक गरीब का घर पास-पास था। सेठ को कभी इस बात का मलाल नहीं था कि उसका पड़ोसी गरीब है। गरीब की बेटी, रुक्मणि, अब विवाह योग्य हो चुकी थी। एक दिन गरीब ने सेठ से कुछ धन उधार मांगा, ताकि बेटी के हाथ पीले कर सके, लेकिन सेठ ने इनकार कर दिया।
उसी रात, सेठ के घर में एक चोर घुस आया। संयोग से, सेठ और सेठानी अभी तक सोए नहीं थे, तो चोर वहीं छिपकर बैठ गया। सेठ-सेठानी आपस में बातें कर रहे थे।
सेठानी ने कहा, "देखते ही देखते रुक्मणि सयानी हो गई है।"
सेठ बोला, "हाँ, लड़कियाँ कब बड़ी हो जाती हैं, पता ही नहीं चलता।"
सेठानी ने आगे कहा, "अब उसके पिता को उसकी शादी कर देनी चाहिए। लेकिन वे ऐसा क्यों नहीं कर रहे?"
सेठ ने बताया, "आज उन्होंने मुझसे कुछ धन उधार माँगा था, लेकिन मैंने इनकार कर दिया। सोचा, गरीब आदमी है, लौटा नहीं पाएगा। लेकिन अब लगता है, मुझे उसकी मदद करनी चाहिए थी।"
कुछ देर में दोनों सो गए, और चोर ने उनका धन चुरा लिया। चोर जब घर से निकला, तो उसे याद आया कि उसकी पत्नी ने बर्तन लाने के लिए कहा था। सेठ के घर दोबारा जाना जोखिम भरा था, तो उसने गरीब के घर से बर्तन चुराने का सोचा। गरीब के घर में भी जाग थी। बेटी की चिंता में माता-पिता सो नहीं पा रहे थे। चोर छिपकर बैठा और उनकी बातें सुनने लगा।
गरीब की पत्नी ने कहा, "तो सेठ ने मदद से इनकार कर दिया?"
गरीब बोला, "हाँ, लेकिन वो अपनी जगह सही है। व्यापारी है, अपना सोचना पड़ता है।"
पत्नी ने रोते हुए कहा, "पर हमें चार महीने में रुक्मणि की शादी करनी होगी, नहीं तो...!"
गरीब दुखी था, "काश! भगवान मेरी जगह उसकी जान ले लेते, मैं अपनी बेटी को बेसहारा नहीं देख सकता।"
चोर यह सब सुनकर विचलित हो गया। उसे अपनी संतान को खोने का दर्द याद आया। उसने गरीब के घर से कुछ बर्तन झोली में डाले, फिर चूल्हे से कोयला निकालकर आँगन में लिख दिया—
"सेठ की तरफ से रुक्मणि के विवाह के लिए दिया गया धन, ... एक चोर"
धन की पोटली वहीं रखकर वह चला गया।
सुबह, दोनों घरों में हड़कंप मच गया—सेठ के घर चोरी हुई थी और गरीब के यहाँ धन मिला था।
गरीब सोच में पड़ गया—क्या वह धन छुपा ले? लेकिन फिर सोचा, लोग क्या कहेंगे? कहीं कोई उसे चोर न समझे! उसने सोचा, मुझसे अच्छा तो वह चोर निकला, जिसने मेरी बेटी के लिए चुराया हुआ धन छोड़ दिया।
गरीब ईमानदारी दिखाते हुए सेठ के पास पहुँचा और उसे पूरी कहानी सुना दी।
सेठ ने वह संदेश पढ़ा और सोचने लगा, "एक चोर इतना अच्छा हो सकता है, जिसने चुराया हुआ धन भी किसी की भलाई के लिए छोड़ दिया, और मैं होते हुए भी मदद न कर सका!"
सेठ ने गरीब को धन की पोटली से आधा धन दे दिया और कहा, "ये लो, ये रुक्मणि के विवाह के लिए है। इसे लौटाने की कोई जरूरत नहीं।"
गरीब भावुक हो गया, "सेठ जी, आप बहुत अच्छे हैं।"
सेठ ने कहा, "न मैं अच्छा हूँ, न तुम। अच्छा तो वह चोर था, जिसने रुक्मणि की शादी की चिंता कर ली। काश, दुनिया में ऐसे भले चोर और होते!"
यह कहते हुए सेठ ने गरीब को गले से लगा लिया
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