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नंदिता और मयंक: एक अनकही प्रेम कहानी

  • Jan 8
  • 3 min read

Updated: Feb 11

प्रतियोगी परीक्षाओं का दबाव


“नंदिता! प्रतियोगी परीक्षाओं के फॉर्म भरे कि नहीं? फॉर्म पास है या ले आऊँ?" मयंक ने उत्सुकता से पूछा।


“ग्रेजुएशन के बाद से ही किसी बड़े व्यवसाई घराने में ब्याह हो जाए, बस इतना ही ख्वाब है मेरे माता-पिता का। मैं किसी को पसंद न आई, तभी पढ़ाई पूरी हो पाई,” नंदिता ने उदास मुस्कान के साथ कहा।


“ऐसा न कहिए, नंदिता! आप कॉलेज की शान हैं। एक खूबसूरत, व्यवहारिक, टॉपर लड़की का सपना सिर्फ किसी सेठ जी की बहू बनना कैसे हो सकता है?” नाटकीय अंदाज़ में उसने पूछा।


“कॉलेज टॉपर तुम हो, मैं तो सातवीं-आठवीं पोजीशन में अटककर आगे की कक्षा में प्रमोट कर दी जाती हूँ, बस,” प्यारे से मुखड़े पर हँसी खिल उठी। पर क्षण भर बाद ही उदासी ने ग्रस लिया। "मेरी शादी के लिए किए जा रहे बार-बार प्रयास और शारीरिक दोष के कारण अस्वीकृति। माता-पिता के टूटते सपनों का बोझ मेरे कंधों पर है।"


वैलेंटाइन वीक की खुशबू


“वैलेंटाइन वीक चल रहा है। अपना रहस्य मैं भी उजागर कर दूँ? प्यारी सी दोस्त से तुम कब पसंद बन गई, जान ही नहीं पाया। निम्न मध्यवर्गीय पृष्ठभूनि वाला मैं बेरोजगार बंदा, हाल-ए-दिल सुनाऊँ तो सुनाऊँ कैसे?” खुशगवारी की कूची फिर गई। “रिश्तों की तलाश शुरू हो चुकी है, तुमने कभी बताया नहीं! भला हो तुम्हें रिजेक्ट करने वाले लड़कों का। तुम्हारी डोली उठती तो मैं देवदास पार्ट टू बन जाता,” नाटकीय गुस्से में वह बोला।


“प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी से भाषा पर अधिकार हो गया है, तभी इतनी बातें बनाते हो। इतने वर्षों में इतने वैलेंटाइन वीक आकर निकल गए, एक भी वैलेंटाइन गिफ्ट दिया होता, तब तो मैं इशारा समझती।”


“खाली जेब वालों के लिए कैसा वैलेंटाइन वीक? वैसे भी बाजारवाद जानबूझकर इस बात को बढ़ावा देता है ताकि लोगों की जेब ढीली की जा सके।”


“तुमसे बहस में कौन जीता है। गिफ्ट को मारो गोली, एक गुलाब ही दे दिया होता।”


“पर्यावरण प्रेमी हूँ भाई। गुलाबों को डंडी से अलग कर मुरझाने को विवश कर देना बुरा लगता है। प्यार की मुहर के रूप मम्मी की अँगूठी लाकर पहना दूँ? शायद विश्वास हो जाए, ‘हम बने, तुम बने, एक दूजे के लिए।’ मैं इंतजार में था बालसखा कि हम में से किसी की भी नौकरी लगे, तब मैं दोनों के माँ-बाप से शादी की अनुमति माँगूँ। आपके खूबसूरत नैनों में अपने लिए पसंद आँक चुका था, पर आपने भी अब तक कुछ नहीं कहा, नंदिता!”


नंदिता की चिंताएँ


“कैसे कहती मयंक? मेरा पोलियोग्रस्त एक पैर, तुम इतने हैंडसम और बैच टॉपर! औरों से न सुनना मंजूर था, तुम्हारी न सुनने के बाद धड़कनें रुक न जातीं?”


“पोलियोग्रस्त लड़की को बहू बनाने को आंटी राजी न हुईं तो?” नंदिता को चिंता हुई।


“छोड़ो! कौन सा उन्हें बहू को धावक बनाना है। दिनचर्या में कहाँ कोई व्यवधान आता है? डर आपके माता-पिता के मना कर देने का है,” मयंक की जिंदादिली कायम थी।


प्रेम की अनकही कहानी


नंदिता की आँखों में खूबसूरत सपने तैरने लगे। मयंक ही था उसका असली वैलेंटाइन, जो वर्षों से उसका साथ देता, उसकी परवाह करता आ रहा था। गुलाब, चॉकलेट, टेड्डी बियर तथा स्पर्श के बिना ही जीवन में उसने प्यार के सुनहरे रंग बिखेर दिए थे।


एक नई शुरुआत


अब, जब नंदिता ने मयंक की बातें सुनीं, तो उसके मन में एक नई उम्मीद जागी। क्या प्यार सिर्फ उपहारों में होता है? क्या यह सिर्फ वैलेंटाइन वीक की बात है? नहीं, प्यार तो एक गहरी भावना है, जो दिल से दिल तक पहुँचती है।


सपनों की उड़ान


नंदिता ने सोचा, "क्या मैं अपने सपनों को सच कर सकती हूँ? क्या मैं अपने माता-पिता की इच्छाओं के खिलाफ जाकर अपने लिए एक नया रास्ता चुन सकती हूँ?" यह सवाल उसके मन में गूंजने लगा।


आत्म-खोज की यात्रा


इस यात्रा में, नंदिता ने अपने भीतर झाँका। उसने अपने डर और चिंताओं का सामना किया। उसने महसूस किया कि वह सिर्फ एक लड़की नहीं है, बल्कि एक मजबूत महिला है, जो अपने सपनों के लिए लड़ सकती है।


प्यार की शक्ति


मयंक ने उसे यह सिखाया कि प्यार की शक्ति किसी भी बाधा को पार कर सकती है। उसने नंदिता को यह विश्वास दिलाया कि वह हमेशा उसके साथ है।


अंत में


इस प्रकार, नंदिता और मयंक की कहानी एक नई दिशा में बढ़ी। उन्होंने अपने सपनों को जीने का निर्णय लिया। प्यार और समर्थन के साथ, वे एक नई शुरुआत के लिए तैयार थे।


उनकी कहानी हमें यह सिखाती है कि प्यार में विश्वास और साहस होना चाहिए। चाहे परिस्थितियाँ कैसी भी हों, सच्चा प्यार हमेशा रास्ता दिखाता है।


---wix---

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