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नंदिता और मयंक: एक अनकही प्रेम कहानी
“नंदिता! प्रतियोगी परीक्षाओं के फॉर्म भरे कि नहीं? फॉर्म पास है या ले आऊँ?"
“ग्रेजुएशन के बाद से ही किसी बड़े व्यवसाई घराने में ब्याह हो जाए, बस इतना ही ख्वाब है मेरे माता पिता का। मैं किसी को पसंद न आई, तभी पढ़ाई पूरी हो पाई”, उदास मुस्कान आकर ठहर गई।
“ऐसा न कहिए, नंदिता! आप कॉलेज की शान हैं, एक खूबसूरत, व्यवहारिक, टॉपर लड़की का सपना सिर्फ किसी सेठ जी की बहू बनना कैसे हो सकता है?” नाटकीय अंदाज़ में उसने पूछा।
नीना सिन्हा
Jan 83 min read


दण्ड
संध्या का समय था। कचहरी उठ गयी थी। अहलकार चपरासी जेबें खनखनाते घर जा रहे थे। मेहतर कूड़े टटोल रहा था कि शायद कहीं पैसे मिल जायें। कचहरी के बरामदों में सांडों ने वकीलों की जगह ले ली थी। पेड़ों के नीचे मुहर्रिरों की जगह कुत्ते बैठे नजर आते थे। इसी समय एक बूढ़ा आदमी, फटे-पुराने कपड़े पहने, लाठी टेकता हुआ, जंट साहब के बंगले पर पहुंचा और सायबान में खड़ा हो गया। जंट साहब का नाम था मिस्टर जी0 सिनहा। अरदली ने दूर ही से ललकारा—कौन सायबान में खड़ा है? क्या चाहता है।
प्रेमचंद
Jan 816 min read


कवि का दुख
मेरा यह लघुतम जीवन
जो किसी के किसी काम का नहीं
जिसे पाकर मैंने पाए हैं
अनगिनत दु:ख और किन्चित सुख भी।
दु:खों की श्रृंखला की पहली कड़ी
कौन सी थी ठीक से याद नहीं
यह भी नहीं कि किसका
विस्तार कितना था
और गहराई में अधिक कौन था
यह याद है
जो भी आया उसने चमकाया मुझे
नींबूमँजे बर्तनों की तरह।
धोया मुझे श्वेताभ तरल से वह
अकसर कटाक्ष के बाण पर
सवार होकर आता था
और छेद जाता था
मेरे स्नेहिल हृदय का मुख।
मैंने हरदम ढकेला इसे अदम्य साहस
और धैर्य धना हि साधव:
सूक्ति के बलपर
प्रियंवदा पाण्डेय
Jan 61 min read
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