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समर्पण

प्राची मिश्रा

 

आराधन तुम प्रियवर मेरा
हियवंदन नित करते जाना
जीवन का तुम आधार प्रिये
तृण तृण हमको ढलते जाना।
किस ओर चला ये मन मेरा
किसने छेड़ी उर की वीणा
वो कौन सा क्षण था अनुरागी
सब छोड़ गया वो वैरागी।
तुम ही मूरत तुम ही पूजन
नित अर्पण सब करते जाना
इक आस रही इक प्यास रही
तुम जैसी सूरत साथ रही
मिलने की कोई बेला ही नहीं
तुम मुझमें रहे मैं तुझमें रही
सब सार प्रेम के झूठे थे
इक सार समर्पण ही जाना।

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