इन्द्रजाल
- Dec 29, 2025
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रघुनाथ सिंह
1
शुभे ! शुभे ! शुभे !
विन्ध्याचल के गहन कानन के बीच कान्तार-गामिनी युवती के बढ़ते हुए पद इस मर्मस्पर्शी सम्बोधन-स्वर को सुनते ही सहसा स्तम्भित हो गए। उसने चकित होकर चतुर्दिश पर्यालोचन किया तो पादुका-विहीन पद-चिह्नों से अकित मालुधान तुल्य क्षीण कान्तार की अपेक्षा उसे और कुछ दृष्टिगत न हुआ ।
अनन्तर उस श्यामांगी युवती के अरुण विलोचनों की तारिकाएँ अपांगों के मध्य चकराती हुई अन्वेषण करने लगीं। वह ज्यों ही आई हुई ध्वनि की दिशा की ओर बढ़ने का उपक्रम करने लगी त्यों ही पुनः सुनाई पड़ा-
शुभे, ठहरो ! ठहरो ! ठहरो !
यह आवाज युवती के दक्षिण पार्श्व में स्थित तरु-समूहों के बीच से होकर आई। वह शीघ्रतापूर्वक उस ओर मुड़ पड़ी। उसने अभी थोड़ा भी अनुसरण न किया होगा कि अपने सामने एक विशाल स्कन्धीय, सुन्दर, श्री सम्पन्न एवं राज-लक्षण-युक्त एक आगन्तुक युवक को देखा। उसे देखते ही नारी-सुलभ लज्जा से युवती के विलोल लोचन नमित हो गए। युवती का सामना होते ही योगन्तुक भी ठिठक गया। करुणा थपना गम्भीर आवरण उसके शिथिल एवं उदासीन मुख पर विस्तारित किए हुए थी। सद्यजात घृणा ने उसके मुख-मण्डल की कान्ति को और भी आवृत कर लिया। अतः उसके विषण्ण विलोचन जब दूसरी ओर देखने को उद्यत हुए तो उसकी अस्थिर इन्द्रियों की शिथिल प्रवृत्ति, सूखे तालु से उत्पन्न उष्ण उछ्वास, आतप से व्याकुल मस्तिष्क, क्षुधा द्वारा उद्भूत उदर की कचोट, कानन को गम्भीर निर्जनता द्वारा उत्पन्न भय एवं मन को कातर बनाने वाली शिथिलता आदि ने आगन्तुक पर एक साथ आक्रमण किया, जिससे वह विक्षिप्त की भाँति मुसकरा उठा। अन्धकार उसे चारों ओर से घेरने लगा। कण्टकाकीर्ण कानन के अवन्ध्य तरु-इल आगन्तुक से मिलने के लिए मानों अग्रसर होने लगे ।
आगन्तुक की इस दयनीय स्थिति पर भगवान् भास्कर 'मुसकरा उठे। रश्मियाँ परिहासोन्मुख हुई। जब मरुत के प्रवाह में पढ़कर वृक्षों की पत्तियाँ अनियंत्रित रूप में नाचने को उद्यत हुई तो तरुओं को अपनी मर्यादा अतिक्रमण करना भला न लगा।
तरुओं की इस भावना पर पत्तियों इठलाकर खड़खड़ाहट के साथ अट्टहास कर उठीं। अनन्तर अपने मनोवेग में उड़कर वे खूब नाचीं। मरुत ने सहानुभूति सूचित करते हुए पूछा- तुम तो हो। नाच चुकीं न ! अनन्तर पत्तियाँ करुण-दृष्टि से तरु-दल की ओर देखने लगीं। इसपर वृक्षों ने केवल इतना ही कहा कि तुम तो अपने मनोवेग को संभाल न सकी थीं। अपने मनोवेग की इस उच्छृंखलता पर पत्तियाँ कुछ विचार किए बिना ही भूमि को अपना अस्तित्व सौंपती हुई जीवन की निःसारता का परिचय देने लगीं। आगन्तुक का मन कानन का यह अनोखा स्वागत देखकर कहीं शरण पाने की लालसा में अधीर हो उठा। अनन्तर घबड़ाहट में घूमती हुई उसके नेत्र की तारिकाएँ समस्त मनोविकारों को व्यवधानित करती हुई दया-भिक्षा के निमित्त युवती की ओर आकर स्थिर हुई और वह बोला- शुभे, तृषित हूँ। थोड़ा जल-दान करोगी ?
आगन्तुक वेग के साथ युवती के समीप लड़खड़ाता हुआ आ पहुँचा। आगन्तुक पर चकित दृष्टि डालती हुई युवती पीछे हटने लगी। आगन्तुक शिथिलता के कारण अपनेको सँभाल न सका। वह पृथ्वी पर गिर गया। उसे अपनी इस निर्बल एवं दयनीय दशा पर स्वयं आश्चर्य होने लगा। युवती भी वहीं स्तब्ध हो गई।
आगन्तुक की चेतन शक्ति उस नव-परिचित युवती के साथ मैत्री स्थापित करने के हेतु उतावली होने लगी। उसने युवती की ओर अत्यन्त करुणा-भरे नयनों से देखा। अनन्तर किचित् उठने का उपक्रम करता हुआ बोला- मृत्यु के मुख में पड़ा हूँ। देवि, दया करो।



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