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देवांगना: एक अद्भुत यात्रा

Dec 29, 2025
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Updated: 2 days ago

प्रस्तावना: देवांगना


आज से ढाई हज़ार वर्ष पूर्व, गौतम बुद्ध ने अपने शिष्यों को ब्रह्मचर्य और सदाचार की शिक्षा दी। उन्होंने बहुत जनों के हित के लिए, सुख के लिए, और लोक पर दया करने के लिए संसार में विचरण करने का आदेश दिया। वह 44 वर्षों तक, बरसात के तीन मासों को छोड़कर, लोगों को धर्मोपदेश देते रहे। उनका यह विचरण प्रायः सारे उत्तर प्रदेश और बिहार तक ही सीमित था।


हालांकि, उनके जीवनकाल में ही उनके शिष्य भारत के अनेक भागों में पहुँच गए थे। ई. पू. 253 में, अशोक ने अपने धर्मगुरु आचार्य मोग्गलिपुत्र तिष्य के नेतृत्व में बौद्ध धर्मदूतों को भारत से बाहर भेजा। यह भारतीय इतिहास की एक महत्त्वपूर्ण घटना थी। उस समय, प्रायः सारा भारत, काबुल के उस ओर हिन्दुकुश पर्वतमाला तक, अशोक के शासन में था।


बौद्ध धर्म का प्रसार


बुद्ध के जीवनकाल में, पेशावर और सिन्धु नदी तक, पारसीक शासानुशास दारयोश का राज्य था। तक्षशिला भी उसी के अधीन था। व्यापारियों के सार्थ पूर्वी और पश्चिमी समुद्र तट तक ही नहीं, तक्षशिला तक जाते-आते रहते थे। उनके द्वारा दारयोश के पश्चिमी पड़ोसी यवनों का नाम बुद्ध के कानों तक पहुँच चुका था।


उस काल का मानव संसार बहुत छोटा था। चन्द्रगुप्त के काल में, सिकन्दर ने पंजाब तक पहुँचकर मानव संसार की सीमा बढ़ाई। अशोक काल में, भारत का ग्रीस के राज्यों से घनिष्ठ सम्बन्ध स्थापित हुआ। यह केवल राजनैतिक और व्यापारिक ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक भी था। इसी से अशोक को व्यवस्थित रूप में धर्म-विजय में सफलता मिली।


महायान का उदय


बौद्ध धर्म विश्वधर्म का रूप धारण कर गया। इतना ही नहीं, जब बौद्ध धर्म का सम्पर्क सभ्य-सुसंस्कृत ग्रीकों से हुआ, तो बौद्ध धर्म महायान का रूप धारण कर अति शक्तिशाली बन गया। महायान ने बौद्ध धर्म जीवन का एक ऐसा उच्च आदर्श प्रस्तुत किया जिसमें प्राणिमात्र की सेवा के लिए कुछ भी अदेय नहीं माना गया।


इस आदर्श ने शताब्दियों तक अफगानिस्तान से जापान और साइबेरिया से जावा तक सहृदय मानव को अपनी ओर आकृष्ट किया। महायान ने ही शून्यवाद के आचार्य नागार्जुन, असंग, वसुबन्धु, दिङ्नाग, धर्मकीर्ति जैसे दार्शनिक उत्पन्न किए। उन्होंने क्षणिक विज्ञानवाद का सिद्धान्त स्थिर किया।


भारतीय संस्कृति पर प्रभाव


भारतीय जीवन को बौद्ध धर्म ने एक नया प्राण दिया। बौद्ध-संस्कृति भारतीय संस्कृति का एक अभंग और महत्त्वपूर्ण अंग थी। उसने भारतीय-संस्कृति के प्रत्येक अंग को समृद्ध किया। न्याय-दर्शन और व्याकरण में जैसे चोटी के हिन्दू विद्वान अक्षपाद, वात्स्यायन, वाचस्पति, उदयनाचार्य थे, उससे कहीं बढ़े-चढ़े बौद्ध दार्शनिक नागार्जुन, वसुबन्धु, दिङ्नाग, धर्मकीर्ति, प्रज्ञाकर गुप्त और ज्ञानश्री थे।


पाणिनि, कात्यायन और पतंजलि जैसे दिग्गज हिन्दू वैयाकरणों के मुकाबिले में बौद्ध पण्डित काशिकाकार जयादित्य, न्यासकार जिनेन्द्रबुद्धि तथा पाणिनि सूत्रों पर भाषा वृत्ति बनाने वाले पुरुषोत्तमदेव कम न थे।


कला और साहित्य का विकास


कला का विकास भी बौद्धों ने अद्वितीय रूप से किया। साँची, भरहुत, गान्धार, मथुरा, धान्य कण्टक, अजन्ता, अलची-सुभरा की चित्रकला एवं ऐलोरा-अजन्ता, कोली-भाजा के गुहाप्रासाद बौद्धों की अमर देन है। इस प्रकार, साहित्य, संस्कृति, मूर्तिकला, चित्रकला और वास्तुकला के विकास में बौद्ध संस्कृति ने भारत को असाधारण देन दी।


निष्कर्ष: एक अनोखी धरोहर


बौद्ध धर्म ने न केवल धार्मिक विचारों को फैलाया, बल्कि भारतीय संस्कृति को भी समृद्ध किया। यह एक अद्भुत यात्रा है, जो आज भी हमें प्रेरित करती है। क्या आप भी इस यात्रा का हिस्सा बनना चाहेंगे?




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