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पिता की दौलत

  • Jan 2
  • 3 min read

Updated: Jan 2

श्रद्धा पटेल

जीवन की सीख देने वाली कहानी

गांव में अकेले रहते बूढ़े पिता की मृत्यु हुई, तो विभिन्न शहरों में बसे दोनों भाई पिता के अंतिम संस्कार के लिए गांव पहुंचे।

सब कार्य सम्पन्न हुए। कुछ लोग चले गए थे और कुछ अभी बैठे थे कि बड़े भाई की पत्नी बाहर आई और उसने अपने पति के कान में कुछ कहा।

बड़े भाई ने अपने छोटे भाई को भीतर आने का इशारा किया और खड़े होकर वहां बैठे लोगों से हाथ जोड़ कर कहा, ”अभी पांच मिनट में आते है।”

दोनों की स्त्रियां ससुरजी के कमरे में थी। भीतर आते ही बड़े भाई ने उनसे फुसफुसाकर कर पूछा, “बक्सा छुपा दिया था ना।”

“हां, बक्सा हमारे पास है। चलिए जल्दी से देख लेते हैं नहीं तो कोई आसपास का हक़ जताने आ जाएगा और कहेगा कि तुम्हारे पीछे हमने तुम्हारे बाबूजी पर इतना ख़र्च किया वगैरह वगैरह। क्यों देवरजी…” बड़े की पत्नी ने हंसते हुए कहा।

“हां सही कहा भाभी।” कहकर छोटे ने भी सहमति जताई।

बड़ी बहू ने जल्दी से दरवाज़ा बंद किया और छोटी ने तेज़ी से बाबूजी की चारपाई के नीचे से एक बहुत पुराना बक्सा निकाला। दोनों भाई तुरंत तेज़ी से नीचे झुके और बक्से को खोलने लगे।

“अरे, पहले चाबी तो पकड़ो, ऐसे थोड़े ना खुलेगा। मैंने आते ही ताला लगाकर चाबी छुपा ली थी।”

बड़ी बहू ने अपने पल्लू के एक छोर पर बंधी हुई चाबी निकाली और अपने पति को पकड़ा दी।

बक्सा खुलते ही वहां मौजूद चारों बक्से पर झुक गए। उन्हें विश्वास था कि इसमें मां के गहने, अन्य बहुमूल्य वस्तुएं होंगी। परंतु बक्से में तो बड़े और छोटे की पुरानी तस्वीरें, छोटे-छोटे कुछ बर्तन, उन्हीं दोनों के छोटे-छोटे कपड़े सहेजकर रखे हुए थे। उन्हें विश्वास नहीं हो रहा था कि कोई ये सब भी भला सहेजकर रखता है।

चारों के चेहरे निराशा से भर गए। तभी छोटे भाई की नज़र बक्से के कोने में कपड़ों के बीच रखी एक कपड़े की थैली पर गई। उसने तुरंत आगे बढ़कर उस थैली को बाहर निकाला। ये देखकर सबकी नज़रों में अचानक चमक आ गई। सभी ने लालची नज़रों से उस थैली को टटोला। छोटे भाई ने उस थैली को वहीं ज़मीन पर पलट दिया। उसमें कुछ रुपए थे और साथ में एक काग़ज़ जिस पर कुछ लिखा हुआ था। छोटे भाई ने रुपए गिने, तो लगभग बीस हज़ार रुपए थे।

"बस… और… कुछ नहीं है।"

“अरे, इस काग़ज़ को पढ़ो, ज़रुर किसी बैंक अकाउंट या लॉकर का विवरण होगा।” बड़ी बहू ने कहा, तो बड़े बेटे ने तुरंत छोटे के हाथों से उस काग़ज़ को छीनकर पढ़ा।

उस पर लिखा हुआ था- 'क्या ढूंढ़ रहे हो?।। संपत्ति…?

हां… ये ही है मेरी और तुम्हारी मां की संपत्ति। तुम दोनों के बचपन की वो यादें, जिसमें तुम शामिल थे। वो‌ ख़ुशबू, वो प्यार, वो अनमोल पल, आज भी इन कपड़ों में, इन तस्वीरों में इन छोटे-छोटे बर्तनों में मौजूद हैं। यही है हमारी अनमोल दौलत… तुम तो हमें यहां अकेले छोड़ कर चले गए थे अपना भविष्य संवारने।

मगर हम यहां तुम्हारी यादों के सहारे ही जिए… तुम्हारी मां तुम्हें देखने को तरस गई और शायद मैं भी… अब तक तुमसे कोई पैसा नहीं लिया। अपनी पेंशन से ही सारा घर चलाया, पर तुम लोगों को हमेशा ‘इस बक्से में अनमोल दौलत है’ जान-बूझकर सुनाता रहा। मगर बच्चों ध्यान देना अपने बच्चों को कभी अपने से दूर मत करना, वरना जैसे तुमने अपने भविष्य का हवाला देकर हमें अपने से दूर किया वैसे ही… दुनिया का सबसे बड़ा दुख जानते हो क्या होता है?… अपनों के होते हुए भी किसी अपने का पास नहीं होना। जीवन में उस समय कोई दौलत-गहने, संपति काम नहीं आते।

बच्चों मरने के बाद भी मैं तुम पर बोझ नहीं बनना चाहता, इसलिए ये पैसे मेरे अंतिम संस्कार का ख़र्च है।'

पूरा काग़ज़ पढ़ते ही बड़े बेटे के साथ-साथ छोटा बेटा भी फूट-फूटकर रो पड़ा!।।

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