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बदरंग जिंदगी
उसके बगल वाला कमरा उसकी बेटी प्रीती का है। पापा के आने की आहट पाकर उसने जल्दी से अपने कमरे की बत्ती बंद कर ली। लेकिन, दामोदर के दिमाग में एक नई दुश्चिंता ने घर करना शुरू कर दिया। आखिर इस साल प्रीति का पच्चीसवाँ लगने वाला है। आखिर कबतक जवान लड़की को कोई घर में रखेगा। कल को कहीं कुछ ऊँच-नीच हो गई तो! तमाम दुश्चिंताओं के बीच दामोदर रात भर करवटें बदलता रहा। लेकिन, उसे नींद नहीं आई।
महेश कुमार केशरी
Apr 168 min read


बड़े भाई साहब
मेरे भाई साहब मुझसे पाँच साल बड़े, लेकिन केवल तीन दर्जे आगे। उन्होंने भी उसी उम्र में पढ़ना शुरू किया था जब मैंने शुरू किया था, लेकिन तालीम जैसे महत्त्व के मामले में वह जल्दबाज़ी से काम लेना पसंद न करते थे। इस भवन की बुनियाद ख़ूब मज़बूत डालना चाहते थे, जिस पर आलीशान महल बन सके। एक साल का काम दो साल में करते थे। कभी-कभी तीन साल भी लग जाते थे। बुनियाद ही पुख़्ता न हो, तो मकान कैसे पायेदार बने।
प्रेमचंद
Apr 613 min read


इंसानियत की पहचान
धीरे-धीरे पूरा हॉल खड़ा हो गया। सबने मिलकर उन्हें सैल्यूट किया, “जय हिंद सर!” लेकिन सबसे ज्यादा कांप रहे थे वे दो सिपाही जिन्होंने कल उन्हें अपमानित किया था।
वर्मा साहब ने उनकी ओर देखा, “माफी मांगने से ज्यादा जरूरी है सबक लेना। याद रखो जिस तरह तुमने मुझे धक्का दिया, उसी तरह तुम किसी और मजबूर इंसान को भी दे सकते हो। और तब वर्दी का सम्मान खो जाएगा।”
रामप्रसाद शर्मा
Apr 54 min read


पिता की दौलत
यह कहानी एक गहरी भावनात्मक और जीवन-मूल्य से भरी सामाजिक सच्चाई को उजागर करती है। कहानी की शुरुआत एक गांव में अकेले रह रहे बूढ़े पिता की मृत्यु से होती है। उनके दोनों बेटे, जो रोज़गार और भविष्य के लिए अलग-अलग शहरों में बस चुके थे, पिता के अंतिम संस्कार के लिए गांव आते हैं। सारे धार्मिक और सामाजिक कर्मकांड पूरे हो जाते हैं। गांव के कुछ लोग जा चुके होते हैं और कुछ अभी बैठे होते हैं, तभी बड़े भाई की पत्नी अपने पति के कान में कुछ फुसफुसाती है।
इसके बाद बड़े भाई अपने छोटे भाई को भी
श्रद्धा पटेल
Jan 23 min read
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