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- उम्मीद
अरविंद नौखवाल एक पुत्र अपने वृद्ध पिता को रात्रिभोज के लिये एक अच्छे रेस्टोरेंट में लेकर गया। खाने के दौरान वृद्ध पिता ने कई बार भोजन अपने कपड़ों पर गिराया। रेस्टोरेंट में बैठे दूसरे खाना खा रहे लोग वृद्ध को घृणा की नजरों से देख रहे थे, लेकिन उसका पुत्र शांत था। खाने के बाद पुत्र बिना किसी शर्म के वृद्ध को वॉशरूम ले गया। उनके कपड़े साफ़ किये, चेहरा साफ़ किया, बालों में कंघी की, चश्मा पहनाया, और फिर बाहर लाया। सभी लोग खामोशी से उन्हें ही देख रहे थे। फ़िर उसने बिल का भुगतान किया और वृद्ध के साथ बाहर जाने लगा। तभी डिनर कर रहे एक अन्य वृद्ध ने उसे आवाज दी, और पूछा - क्या तुम्हें नहीं लगता कि यहाँ अपने पीछे तुम कुछ छोड़ कर जा रहे हो? उसने जवाब दिया - नहीं सर, मैं कुछ भी छोड़कर नहीं जा रहा। वृद्ध ने कहा - बेटे, तुम यहाँ प्रत्येक पुत्र के लिए एक शिक्षा, सबक और प्रत्येक पिता के लिए उम्मीद छोड़कर जा रहे हो। आमतौर पर हम लोग अपने बुजुर्ग माता-पिता को अपने साथ बाहर ले जाना पसंद नहीं करते, और कहते हैं - क्या करोगे, आपसे चला तो जाता नहीं, ठीक से खाया भी नहीं जाता, आप तो घर पर ही रहो, वही अच्छा होगा। लेकिन क्या आप भूल गये कि जब आप छोटे थे, और आपके माता पिता आपको अपनी गोद में उठाकर ले जाया करते थे। आप जब ठीक से खा नहीं पाते थे तो माँ आपको अपने हाथ से खाना खिलाती थी, और खाना गिर जाने पर डाँट नही प्यार जताती थी। फिर वही माँ बाप बुढ़ापे में बोझ क्यों लगने लगते हैं? माँ-बाप भगवान का रूप होते हैं। उनकी सेवा कीजिये, और प्यार दीजिये क्योंकि एक दिन आप भी बूढ़े होंगे। अपने माता पिता का सर्वदा सम्मान करें। ******
- संतोष का फल
रंजना द्विवेदी विलायत में अकाल पड़ गया। लोग भूखे मरने लगे। एक छोटे नगर में एक धनी दयालु पुरुष थे। उन्होंने सब छोटे लड़कों को प्रतिदिन एक रोटी देने की घोषणा कर दी। दूसरे दिन सबेरे एक बगीचे में सब लड़के इकट्ठे हुए। उन्हें रोटियाँ बँटने लगीं। रोटियाँ छोटी-बड़ी थीं। सब बच्चे एक-दूसरे को धक्का देकर बड़ी रोटी पाने का प्रयत्न कर रहे थे। केवल एक छोटी लड़की एक ओर चुपचाप खड़ी थी। वह सबके अन्त में आगे बढ़ी। टोकरे में सबसे छोटी अन्तिम रोटी बची थी। उसने उसे प्रसन्नता से ले लिया और वह घर चली आयी। दूसरे दिन फिर रोटियाँ बाँटी गयीं। उस बेचारी लड़की को आज भी सबसे छोटी रोटी मिली। लड़की ने जब घर लौटकर रोटी तोड़ी तो रोटी में से एक मुहर निकली। उसकी माता ने कहा कि – ‘मुहर उस धनी को दे आओ।’ लड़की दौड़ी गयी मुहर देने। धनी ने उसे देखकर पूछा – ‘तुम क्यों आयी हो?’ लड़की ने कहा – ‘मेरी रोटी में यह मुहर निकली है। आटे में गिर गयी होगी। देने आयी हूँ। तुम अपनी मुहर ले लो।’ धनी ने कहा – ‘नहीं बेटी! यह तुम्हारे संतोष का पुरस्कार है।’ लड़की ने सिर हिलाकर कहा – ‘पर मेरे संतोष का फल तो मुझे तभी मिल गया था। मुझे धक्के नहीं खाने पड़े।’ धनी बहुत प्रसन्न हुआ। उसने उसे अपनी धर्म पुत्री बना लिया और उसकी माता के लिये मासिक वेतन निश्चित कर दिया। वही लड़की उस धनी की उत्तराधिकारिणी हुई। ******
- गाली पास ही रह गयी
रमेश द्विवेदी एक लड़का बड़ा दुष्ट था। वह चाहे जिसे गाली देकर भाग खड़ा होता। एक दिन एक साधु बाबा एक बरगद के नीचे बैठे थे। लड़का आया और गाली देकर भागा। उसने सोचा कि गाली देने से साधु चिढ़ेगा और मारने दौड़ेगा, तब बड़ा मजा आयेगा; लेकिन साधु चुपचाप बैठे रहे। उन्होंने उसकी ओर देखा तक नहीं। लड़का और निकट आ गया और खूब जोर-जोर से गाली बकने लगा। साधु अपने भजन में लगे थे। उन्होंने समझ लिया कि कोई कुत्ता या कौवा चिल्ला रहा है। एक दूसरे लड़के ने कहा – ‘बाबा जी! यह आपको गालियाँ देता है?’ बाबा जी ने कहा – ‘हाँ भैया, देता तो है, पर मैं लेता कहाँ हूँ। जब मैं लेता नहीं तो सब वापस लौटकर इसी के पास रह जाती हैं। लड़का – ‘लेकिन यह बहुत खराब गालियाँ देता है।’ साधु – ‘यह तो और खराब बात है। पर मेरे तो वे कहीं चिपकी हैं नहीं, सब-की-सब इसी के मुख में भरी हैं। इसका मुख गंदा हो रहा है।’ गाली देनेवाला लड़का सुन रहा था साधु की बात। उसने सोचा, ‘यह साधु ठीक कह रहा है। मैं दूसरों को गाली देता हूँ तो वे ले लेते हैं। इसी से वे तिलमिलाते हैं, मारने दौड़ते हैं और दु:खी होते हैं। यह गाली नहीं लेता तो सब मेरे पास ही तो रह गयीं।’ लड़के को बड़ा बुरा लगा, ‘छि:! मेरे पास कितनी गंदी गालियाँ हैं।’ अन्त में वह साधु के पास गया और बोला – ‘बाबाजी! मेरा अपराध कैसे छूटे और मुख कैसे शुद्ध हो?’ साधु-‘पश्चात्ताप करने तथा फिर ऐसा न करने की प्रतिज्ञा करने से अपराध दूर हो जायगा। और ‘राम-राम’ कहने से मुख शुद्ध हो जायगा।’ ******
- सर्वस्व दान
रीता देवी एक पुराना मन्दिर था। दरारें पड़ी थीं। खूब जोर से वर्षा हुई और हवा चली। मन्दिर बहुत-सा भाग लड़खड़ा कर गिर पड़ा। उस दिन एक साधु वर्षा में उस मन्दिर में आकर ठहरे थे। भाग्य से वे जहाँ बैठे थे, उधर का कोना बच गया। साधु को चोट नहीं लगी। साधु ने सबेरे पास के बाजार में चंदा करना प्रारम्भ किया। उन्होंने सोचा – ‘मेरे रहते भगवान् का मन्दिर गिरा है तो इसे बनवाकर ही मुझे कहीं जाना चाहिये।’ बाजार वालों में श्रद्धा थी। साधु विद्वान थे। उन्होंने घर-घर जाकर चंदा एकत्र किया। मन्दिर बन गया। भगवान् की मूर्ति की बड़े भारी उत्सव के साथ पूजा हुई। भण्डारा हुआ। सबने आनन्द से भगवान् का प्रसाद लिया। भण्डारे के दिन शाम को सभा हुई। साधु बाबा दाताओं को धन्यवाद देने के लिये खड़े हुए। उनके हाथ में एक कागज था। उसमें लम्बी सूची थी। उन्होंने कहा – ‘सबसे बड़ा दान एक बुढ़िया माता ने दिया है। वे स्वयं आकर दे गयी थीं।’ लोगों ने सोचा कि अवश्य किसी बुढ़िया ने सौ-दो-सौ रुपये दिये होंगे। कई लोगों ने सौ रुपये दिये थे। लेकिन सबको बड़ा आश्चर्य हुआ। जब बाबा ने कहा – ‘उन्होंने मुझे चार आने पैसे और थोड़ा-सा आटा दिया है।’ लोगों ने समझा कि साधु हँसी कर रहे हैं। साधु ने आगे कहा – ‘वे लोगों के घर आटा पीसकर अपना काम चलाती हैं। ये पैसे कई महीने में वे एकत्र कर पायी थीं। यही उनकी सारी पूँजी थीं। मैं सर्वस्व दान करने वाली उन श्रद्धालु माता को प्रणाम करता हूँ।’ लोगों ने मस्तक झुका लिये। सचमुच बुढ़िया का मनसे दिया हुआ यह सर्वस्व दान ही सबसे बड़ा था। ******
- असफलता से न डरें
डॉ. कृष्णकांत श्रीवास्तव "असफलता" – एक ऐसा शब्द जिसे सुनते ही हमारे मन में नकारात्मक भावनाएँ उमड़ने लगती हैं। डर, निराशा, संदेह, हताशा – यह सब कुछ एक ही शब्द के साथ जुड़ा होता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि यही असफलता हमारे जीवन की सबसे बड़ी शिक्षक हो सकती है? यदि हम असफलता से डरें नहीं, बल्कि उससे कुछ सीखें, तो वह हमारे जीवन की दिशा बदल सकती है। आइए हम जानेंगे कि असफलता क्यों ज़रूरी है, इससे डरना क्यों नहीं चाहिए, और हम इसे कैसे अपनी सफलता की सीढ़ी बना सकते हैं। · असफलता जीवन का हिस्सा है कोई भी व्यक्ति जन्म से सफल नहीं होता। बचपन में जब हम चलना सीखते हैं, तो कितनी बार गिरते हैं? क्या हम उस गिरने से डर कर चलना बंद कर देते हैं? नहीं! हम फिर उठते हैं, फिर गिरते हैं, और धीरे-धीरे चलना सीख जाते हैं। यही प्रक्रिया जीवन भर चलती है। सफलता की राह में बार-बार गिरना यानी असफल होना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। असफलता एक संकेत है कि आप प्रयास कर रहे हैं। जो लोग कुछ नहीं करते, उन्हें कभी असफलता का सामना नहीं करना पड़ता। इसलिए असफलता का आना यह सिद्ध करता है कि आप प्रयासरत हैं, और एक दिन सफलता निश्चित रूप से आपके कदम चूमेगी। · असफलता से डरना क्यों गलत है? असफलता से डरना दरअसल खुद पर विश्वास न होने का संकेत है। डर हमें प्रयास करने से रोकता है, हमारे आत्म-विश्वास को कमजोर करता है और हमें हमारी क्षमताओं पर संदेह करने को मजबूर करता है। अगर थॉमस एडिसन अपने हजारों प्रयोगों में मिली असफलताओं से डर जाते, तो क्या आज हमारे पास बिजली का बल्ब होता? अगर महात्मा गांधी पहले ही आंदोलन में असफल होकर डर जाते, तो क्या हमें स्वतंत्रता मिलती? अगर डॉ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम अपनी कठिनाइयों से घबरा जाते, तो क्या वे भारत के ‘मिसाइल मैन’ और राष्ट्रपति बन पाते? हर महान व्यक्ति ने असफलता का सामना किया है, लेकिन उन्होंने उससे डरने के बजाय, उससे सबक लिया और आगे बढ़ते गए। · असफलता से क्या सीख मिलती है? असफलता हमें हमारी कमियों से अवगत कराती है। यह हमें बताती है कि कहाँ सुधार की ज़रूरत है, किस दिशा में मेहनत करनी है और क्या रणनीति अपनानी है। असफलता हमें खुद को समझने का मौका देती है। हम सोचते हैं कि हमने कहाँ गलती की और उसे कैसे सुधार सकते हैं। लगातार प्रयास करते रहने से हमारे अंदर सहनशक्ति और धैर्य विकसित होता है, जो जीवन के हर क्षेत्र में लाभकारी होता है। जब हम बार-बार असफल होते हैं, तो हमें नया सोचने की प्रेरणा मिलती है। हम समस्याओं का समाधान नए तरीके से ढूँढने लगते हैं। सफलता के शिखर पर पहुँचने से पहले असफलता का अनुभव व्यक्ति को विनम्र बनाता है और दूसरों की मेहनत का सम्मान करना सिखाता है। · असफलता को अपनाएँ – सफलता आपका इंतजार कर रही है जब तक हम असफलता को अपने जीवन का शत्रु मानते रहेंगे, तब तक सफलता हमारे लिए एक सपना बनी रहेगी। लेकिन जैसे ही हम असफलता को एक मार्गदर्शक, एक मार्ग-संकेतक के रूप में स्वीकार करते हैं, वैसे ही हम सफलता के और करीब पहुँच जाते हैं। जापान में एक कहावत है – "गिरो सात बार, उठो आठ बार।" यही असली सफलता की कुंजी है। गिरना गलत नहीं है, लेकिन गिर कर न उठना गलत है। · युवाओं के लिए विशेष संदेश आज के युवा वर्ग को असफलता से बेहद डर लगता है – चाहे वह परीक्षा में कम अंक हों, नौकरी का इंटरव्यू हो, या अपने सपनों का स्टार्टअप हो। समाज का दबाव, माता-पिता की अपेक्षाएँ और खुद की असुरक्षा भावनाएँ उन्हें भीतर से तोड़ देती हैं। लेकिन आपको समझना होगा – असफल होना आपके प्रयासों का हिस्सा है। जब आप एक परीक्षा में असफल होते हैं, इसका मतलब यह नहीं कि आप जीवन में असफल हैं। यह केवल एक पड़ाव है, न कि अंत। युवाओं को चाहिए कि वे असफलताओं को स्वीकारें, उससे सीखें और फिर पूरे आत्मबल के साथ नए प्रयास में लग जाएँ। · असफलता से कैसे न डरें? (कुछ उपयोगी सुझाव) ü सोच बदलें: असफलता को 'अंत' न समझें, बल्कि उसे 'आरंभ' मानें। ü विचार साझा करें: अपने डर को अपने दोस्तों, परिवार या मेंटर के साथ साझा करें। जब हम बोलते हैं, तो डर कमजोर होता है। ü छोटे लक्ष्य बनाएँ: एकदम बड़ी सफलता की चाह से पहले छोटे-छोटे लक्ष्य निर्धारित करें और उन्हें पूरा करें। ü प्रेरणादायक कहानियाँ पढ़ें: सफल लोगों की जीवनी पढ़ें और जानें कि कैसे उन्होंने असफलताओं को पार किया। ü स्वस्थ मानसिकता बनाए रखें: ध्यान, योग, और सकारात्मक सोच आपके मन को मजबूत बनाएंगे। असफलता से डरने की जरूरत नहीं, उसे अपनाने की जरूरत है। जो असफलता से नहीं डरता, वही जीवन में सच्ची सफलता का स्वाद चखता है। याद रखिए – "असफलता अंत नहीं है, यह तो शुरुआत है – एक नए प्रयास, एक नई सीख और एक नई सफलता की।" तो आइए, आज एक संकल्प लें कि हम असफलता से नहीं डरेंगे, बल्कि उसे गले लगाकर, उससे सीखकर, जीवन में आगे बढ़ेंगे। क्योंकि अंत में वही जीतता है – जो डरकर नहीं, लड़कर चलता है। "ठोकरें खाकर न गिरो तुम, क्योंकि गिरकर उठने वालों की ही पहचान होती है। मत डर असफलता से ए दोस्त, यही तो तेरी सफलता की पहली उड़ान होती है।" ******
- स्वच्छता
रंजन कुमार एक किसान ने एक बिल्ली पाल रखी थी। सफेद कोमल बालों वाली बिल्ली किसान की खाटपर ही रात को उसके पैर के पास सो जाती थी। किसान जब खेत पर से घर आता तो बिल्ली उसके पास दौड़कर जाती और उसके पैरों से अपना शरीर रगड़ती, म्याऊँ-म्याऊँ करके प्यार दिखलाती। किसान अपनी बिल्ली को थोड़ा-सा दूध और रोटी देता था। एक दिन शाम को किसान के लड़के ने अपने पिता से कहा – ‘पिताजी! आज रात को मैं आपके साथ सोऊंगा।’ किसान बोला – ‘नहीं। तुम्हें अलग खाटपर सोना चाहिये।’ लड़का कहने लगा – ‘आप बिल्ली को तो अपनी खाटपर सोने देते हैं, परंतु मुझे क्यों नहीं सोने देते?’ किसान ने कहा – ‘तुम्हें खुजली हुई है। तुम्हारे साथ सोने से मुझे भी खुजली हो जायगी। पहले तुम अपनी खुजली अच्छी होने दो।’ लड़का खुजली से बहुत तंग था। उसके पुरे शरीर में छोटे-छोटे फोड़े-जैसे हो रहे थे। खाज के मारे वह बेचैन रहता था। उसने अपने पिता से कहा – ‘यह खुजली मुझे ही क्यों हुई है? इस बिल्ली को क्यों नहीं हुई?’ किसान बोला – ‘कल सबेरे तुम्हें मैं यह बात बताऊंगा।’ दूसरे दिन सबेरे किसान ने बिल्ली को कुछ अधिक दूध और रोटी दी, लेकिन जब बिल्ली का पेट भर गया, वह दूध-रोटी छोड़कर दूर चली गयी और धूप में बैठकर बार-बार अपना एक पैर चाटकर अपने मुँह पर फिराने लगी। किसान ने अपने लड़के को वहाँ बुलाया और बोला – ‘देखो, बिल्ली कैसे अपना मुँह धो रही है। यह इसी प्रकार अपना सब शरीर स्वच्छ रखती है। इसी से इसे खुजली नहीं होती। तुम अपने कपड़े और शरीर को मैला रखते हो, इससे तुम्हें खुजली हुई है। मैल में एक प्रकार का विष होता है। वह पसीने के साथ जब शरीर के चमड़े में लगता है और भीतर जाता है, तब खुजली, फोड़े और दूसरे भी कई रोग हो जाते हैं।’ लड़के ने कहा – ‘मैं आज अपने सब कपड़े गरम पानी में उबालकर धोऊंगा। बिस्तर और चद्दर भी धोऊंगा। खून नहाऊँगा। पिताजी! इससे मेरी खुजली दूर हो जायगी।’ किसान ने बताया – ‘शरीर के साथ पेट भी स्वच्छ रखना चाहिये। देखो, बिल्ली का पेट भर गया तो उसने दूध भी छोड़ दिया। पेट भर जाने पर फिर नहीं खाना चाहिये। ऐसी वस्तुएँ भी नहीं खानी चाहिये, जिनसे पेट में गड़बड़ी हो। मिर्च, खटाई, बाजार की चाट, अधिक मिठाइयाँ खाने और चाप पीने से पेट में गड़बड़ी हो जाती है। इससे पेट साफ़ नहीं रहता। पेट साफ न रहे तो बहुत-से रोग होते हैं। बुखार भी पेट की गड़बड़ी से आता है। जो लोग जीभ के जरा-से स्वाद के लिये बिना भूख ज्यादा खा लेते हैं अथवा मिठाई, घी में तली हुई चीजें, दही-बड़े आदि बार-बार खाते रहते हैं, उनको एक खुजली ही क्यों और भी तरह-तरह की बीमारियाँ हो जाती हैं। पेट साफ रखने के लिये चोकर-मिले आटे की रोटी, हरी सब्जी तथा मौसमी, सस्ते फल अधिक खाने चाहिये।’ किसान के लड़के ने उस दिन से अपने कपड़े स्वच्छ रखने आरम्भ कर दिये। वह रोज शरीर रगड़कर स्नान करता है। वह इस बात का ध्यान रखता है कि ज्यादा न खाय तथा कोई ऐसी वस्तु न खाय, जिससे पेट में गड़बड़ी हो। उसकी खुजली अच्छी हो गयी है। वह चुस्त शरीर का तगड़ा और बलवान् हो गया है। उसके पिता और दूसरे लोग भी अब उसे बड़े प्रेम से अपने पास बैठाते हैं। *****
- अधर बावरे जिह्वा पागल
डॉ देवेंद्र तोमर अधर बावरे जिह्वा पागल कहने को कुछ भी कह जाऍं तुम्हीं कहो क्या कह सकता हूँ तुमसे मुझको प्यार नहीं है। एक नहीं अनगिन मौकों पर मुझे तुम्हारा प्यार मिला है। मान मनव्वल पाया तुमसे मनचाहा मनुहार मिला है। रुठा हुआ मनाया तुमने अपने हृदय लगाया तुमने। तुम्हीं कहो क्या कह सकता हूँ मुझ पर कुछ उपकार नहीं है। तुम्हीं कहो क्या कह सकता हूँ तुमसे मुझको प्यार नहीं है। कर्तव्यों की कदम कदम पर लाज रखी है तुमने मन से। इतना किया भरोसा मुझ पर जितना ऑंखों को दरपन से। मेरे हाथों माँग भराई बेंदी अपने भाल सजायी। तुम्हीं कहो क्या कह सकता हूँ मुझ पर कुछ अधिकार नहीं है। तुम्हीं कहो क्या कह सकता हूँ तुमसे मुझको प्यार नहीं है। मेरे अपने नासूरों पर मरहम नेह लगाया तुमने। जब भी और जहाँ भी देखा बिखरा हुआ सजाया तुमने। क्षण भर को भी रहा न रोगी सारी पीड़ा तुमने भोगी। तुम्हीं कहो क्या कह सकता हूँ मुझ पर कुछ उपचार नहीं है। तुम्हीं कहो क्या कह सकता हूँ तुमसे मुझको प्यार नहीं है। अधर बावरे जिह्वा पागल कहने को कुछ भी कह जाऍं तुम्हीं कहो क्या कह सकता हूँ तुमसे मुझको प्यार नहीं है। *****
- बच्चों से क्षमा मांगो
प्रो.पुनीत शुक्ला तुम अपने उन बच्चों से तुरन्त क्षमा माँगो जिनको तुमने केवल इस बात पर पीट दिया क्योंकि उन्होंने तुम्हारी बात नहीं मानी। तुम अपने उन बच्चों से तुरन्त क्षमा माँगो जिनको तुमने केवल इसलिए मार दिया या छोड़ दिया क्योंकि उन्होंने अपनी पसन्द का जीवनसाथी चुना। तुम अपने उन पड़ोसियों से तुरन्त क्षमा माँगो जिनको तुमने केवल इसलिये नफ़रत किया क्योंकि वे दूसरे धर्म, जाति या विचारधारा के व्यक्ति थे। तुम अपने उन पड़ोसियों से तुरन्त क्षमा माँगो जिनको तुमने केवल इसलिये सज़ा दिया क्योंकि उनके पूर्वजों ने कुछ गलतियाँ की थीं। तुम अगर इस तरह क्षमा माँगोगे तो तुम्हारी ग़लतियों में सुधार नहीं होगा लेकिन, यह संसार थोड़ा सा सुधर जायेगा और, आने वाली पीढ़ियों के लिये रहने लायक एक अच्छी दुनिया का निर्माण शुरू होगा। *****
- लहरें गिनना
रमापति शुक्ला एक दिन अकबर बादशाह के दरबार में एक व्यक्ति नौकरी मांगने के लिए अर्जी लेकर आया। उससे कुछ देर बातचीत करने के बाद बादशाह ने उसे चुंगी अधिकारी बना दिया। बीरबल, जो पास ही बैठा था, यह सब देख रहा था। उस आदमी के जाने के बाद वह बोला- “यह आदमी जरूरत से ज्यादा चालाक जान पड़ता है। बेईमानी किये बिना नहीं रहेगा।“ थोड़े ही समय के बाद अकबर बादशाह के पास उस आदमी की शिकायतें आने लगीं कि वह प्रजा को काफी परेशान करता है तथा रिश्वत लेता है। अकबर बादशाह ने उस आदमी का तबादला एक ऐसी जगह करने की सोची, जहां उसे किसी भी प्रकार की बेईमानी का मौका न मिले। उन्होंने उसे घुड़साल का मुंशी मुकर्रर कर दिया। उसका काम था घोड़ों की लीद उठवाना। मुंशीजी ने वहां भी रिश्वत लेना आरम्भ कर दिया। मुंशीजी साईसों से कहने लगे कि तुम घोड़ों को दाना कम खिलाते हो, इसलिए मुझे लीद तौलने के लिए भेजा गया है। यदि तुम्हारी लीद तौल में कम बैठी तो अकबर बादशाह से शिकायत कर दूंगा। इस प्रकार मुंशीजी प्रत्येक घोड़े के हिसाब से एक रुपया लेने लगे। अकबर बादशाह को जब इस बात का पता चला तो उन्होंने मुंशीजी को यमुना की लहरें गिनने का काम दे दिया। वहां कोई रिश्वत व बेईमानी का मौका ही नहीं था। लेकिन मुंशीजी ने वहां भी अपनी अक्ल के घोड़े दौड़ा दिये। उन्होंने नावों को रोकना आरम्भ कर दिया कि नाव रोको, हम लहरें गिन रहे हैं। अत: नावों को दो-तीन दिन रुकना पड़ता था। नाव वाले बेचारे तंग आ गए। उन्होंने मुंशीजी को दस रुपये देना आरम्भ कर दिया। अकबर बादशाह को जब इस बात का पता लगा तो उन्होंने लिखकर आज्ञा दी, “नावों को रोको मत, जाने दो?” उस मुंशी ने उस लिखित में थोड़ा सुधार कर टंगवा दिया, "नावों को रोको, मत जाने दो" और वसूली करने लगे। अंततः बादशाह को उस मुंशी को सार्वजनिक सेवा से बाहर करना ही पड़ा। ******
- सच्ची मित्रता
रमाशंकर त्रिपाठी राकेश अपने ऑफिस से घर के लिए जा रहा था। उसके घर के रास्ते में एक पुल पड़ता था जिसके नीचे से गहरी नदी बहती थी। जब राकेश वह पुल पार कर रहा था तो देखता है कि एक आदमी पुल से नीचे कूदने वाला था। राकेश उसे जाकर रोकता है,” यह क्या कर रहे हो भाई? ऐसा क्या हुआ है?” “मैं अपना सब कुछ लुटा चुका हूं। छोटा सा व्यापार था मेरा। वह बर्बाद हो गया है। कैसे अपने घर परिवार का पोषण करूंगा।” वह आदमी कहते कहते रोने लगता है। “तो ठीक है मर जाओ और पीछे अपने परिवार को एक और दुःख दे जाओ। क्या करेंगे वह, तुम्हारा दुख मनाएंगे या लोगों के पैसे चुकाने के रास्ते ढूंढेंगे” राकेश ने उसे डांटा। राकेश की डांट सुनकर हो आदमी थोड़ा संभला। तब राकेश ने उसके बारे में उससे सारी बात पूछी। “मेरा नाम अजय है। मेरा कपड़ों का छोटा सा व्यापार था। पिछले महीने शहर में जो दंगे हुए थे उसमें मेरी दुकान और कारखाना जला दिया गया। समझ नहीं आता लोगों के पैसे कहां से चुकाऊंगा और कैसे अपना घर चलाऊंगा।” राकेश को अजय अपने बारे में सब कुछ बताता है। राकेश उसे सांत्वना देते हुए कहता है,”मेरा लकड़ी का बहुत बड़ा काम है। कईं जगह पर माल भी सप्लाई करता हूं। तुम मेरा व्यापार में हाथ बंटाओगे तो अपनी परेशानियों से बाहर निकल सकते हो और मुझे भी साथ मिल जाएगा। मैं जल्द ही तुम्हें अपने ऑफिस बुलाता हूं, अभी तुम अपने घर जाओ।” पूरी कानूनी जांच पड़ताल के बाद राकेश अजय के साथ होने वाले अग्रिमेंट के कागज़ तैयार करवाता है और उससे बुलाता है। अजय राकेश का साथ कारोबार में आ जाता है। दोनों का कारोबारी दिमाग और मेहनत उस कारोबार को बहुत तरक्की देती है। अजय ने धीरे-धीरे अपना सारा कर्ज़ा उतार दिया और राकेश की मदद से अपने व्यापार को फिर से खड़ा किया। अब वह राकेश के साथ सिर्फ विचार विमर्श का काम देखता था। सब कुछ बहुत अच्छा चल रहा था। उन दोनों की मित्रता परिवार के हर छोटे-बड़े समारोह में सबको दिख जाती थी। यूं तो दोनों एक दूसरे के अच्छे मित्र थे परंतु अजय के लिए राकेश भगवान का रूप था, वह एक तरीके से सब कुछ था उसके लिए। लेकिन उस दोस्ती पर काली नज़र थी राकेश के भाई रमेश की। वो बिल्कुल नकारा और अय्याश आदमी था। राकेश की तरह ना तो कोई काम करता और ना ही भाई की कंपनी में हाथ बंटाता। वह तो बस यही चाहता था कि उसको हिस्सा मिलता रहे वह भी मुफ्त में। अजय के आने पर उसको बड़ा बुरा लगा था। उसने चालाकी से अपने एक वकील दोस्त के साथ मिलकर कंपनी के हर कागज़ात की नकली कॉपी बनवा रखी थी। एक दिन रमेश को सही मौका मिल जाता है। राकेश किसी काम से शहर से बाहर गया था। अजय भी अब कंपनी में कम ही आता-जाता था। रमेश को सुनहरा मौका मिला और उसने फर्ज़ी कागज़ात कंपनी के असली कागज़ात के साथ बदल दिए। जब राकेश वापिस आता है तो रमेश सब कुछ अपने नाम दिखाकर उसे कंपनी से बाहर कर देता है। राकेश को उधार रखना पसंद नहीं था। इसलिए उसने घर गिरवी पर रखकर लेनदारों का हिसाब चुकता किया। अजय भी शहर में नहीं था। जब उसे सारी बात पता चलती है तो वह सीधे राकेश के घर जाता है। उसे देखकर राकेश की आंखें भर आती हैं वह कहता है,” मैं यह घर छोड़कर कहीं और ठिकाना देखता हूं।” अजय उसके पैरों में गिर कर रो पड़ता है,” मुझे इतना पराया समझ लिया। मेरे होते हुए आपको कहीं और जाना पड़े तो लानत है मुझ पर। मैं आपके लिए बेशक दोस्त हूं पर आप मेरे लिए भगवान का रूप हैं। मैं आपके लिए जो कुछ भी करूं वह बहुत कम है। चलिए भाभी जी और बेटे को लेकर अपने दूसरे घर।” अजय का परिवार पूरे गर्मजोशी के साथ राकेश और उसके परिवार का स्वागत करता है। उनके रहने की बहुत अच्छी व्यवस्था भी कर दी जाती है। अब उन दोनों के बेटे एक साथ स्कूल जाते थे। अजय और राकेश मिलकर सारी बातों का पता लगाते हैं। अपने कुछ विश्वास पात्र दोस्त जो पुलिस अफसर और वकील हैं, उनके साथ मिलकर दोनों को रमेश की सारी कारस्तानी समझ में आ जाती है। सबके साथ बातचीत के दौरान वह दोनों यह तो समझ गए थे कि असली कागज़ात का मिलना तो नामुमकिन है। रमेश में उन्हें खत्म कर दिया होगा। लेकिन वह दोनों यह बात भी अच्छी तरह जानते हैं कि रमेश के बसकी कारोबार संभालना नहीं है। वह जल्द ही उसे बर्बाद कर देगा। वह दोनों अब सही मौके का इंतजार करते हैं। उसी बीच अब राकेश अजय के कारोबार में मदद करने लगता है। अजय को राकेश की मदद से अपने कारोबार को आगे बढ़ाने के लिए कई तरीके पता चलते हैं और अब वह ज़्यादा अच्छा कमाने लगता है। इसी तरह से 6 महीने बीत जाते हैं। एक दिन वह लोग अखबार में पढ़ते हैं कि रमेश की कंपनी को खासा नुकसान हो रहा है। अगले ही दिन दोनों उससे मिलने पहुंच जाते हैं। ”देखो रमेश तुमने जो करा मैं उसका कुछ नहीं कर पाया। उसके लिए तो मैं तुम्हें कभी माफ भी नहीं करूंगा। लेकिन आज मैं जो कहने जा रहा हूं उससे तुम अपने आप को लोगों और पुलिस से बचा सकते हो। तुम्हारी सारी धोखेबाजी के बारे में मुझे सब कुछ मालूम है। बेहतर यही है कि तुम मेरी कंपनी और पैसा मुझे वापस कर दो। मैं तुम्हें इतने पैसे दे दूंगा कि तुम अपने आप को बचा सकते हो।” राकेश ने कहा। रमेश के पास और कोई चारा नहीं था, उसको राकेश की बात माननी पड़ी। अब अजय और राकेश के वकीलों द्वारा नए कागज़ात बनवाए गए और सारी कानूनी औपचारिकता पूरी करी गई। राकेश ने रमेश को हमेशा के लिए अपनी ज़िंदगी से अलग कर दिया। जिसके पास अजय और राकेश की तरह सच्ची मित्रता हो वह कभी डूब ही नहीं सकता। देर से ही सही उसे किनारा ज़रूर मिल जाता है। *******
- सोच बदलो, इंडिया बदलो
डॉ. कृष्णकांत श्रीवास्तव भारत एक युवा देश है। यहां की 65% जनसंख्या 35 वर्ष से कम उम्र की है। इतनी बड़ी युवा शक्ति किसी भी राष्ट्र के लिए वरदान होती है, लेकिन यह शक्ति तभी फलदायी सिद्ध होती है जब उसमें सकारात्मक सोच, सशक्त नेतृत्व और परिवर्तन की ललक हो। आज भारत को सबसे अधिक जरूरत है — सोच बदलने की। "सोच बदलो, इंडिया बदलो" केवल एक नारा नहीं, बल्कि एक आंदोलन है, जो भारत को एक सशक्त, विकसित और समावेशी राष्ट्र में परिवर्तित कर सकता है। सोच की ताकत सोच वह बीज है, जिससे व्यवहार, आदतें, समाज और राष्ट्र का निर्माण होता है। यदि हम सकारात्मक, समावेशी और रचनात्मक सोच रखते हैं, तो उसका असर हमारे कार्यों और समाज पर स्पष्ट दिखाई देता है। वहीं, नकारात्मक और संकुचित सोच केवल समस्याओं को जन्म देती है। उदाहरण के तौर पर, यदि कोई युवा सोचता है कि "सरकारी नौकरी ही सफलता है", तो वह केवल सीमित अवसरों की ओर देखेगा। लेकिन अगर वह सोचता है कि "मैं अपने हुनर से कुछ नया कर सकता हूँ", तो वह उद्यमिता, स्टार्टअप और नवाचार की दिशा में आगे बढ़ेगा। यही सोच है जो भारत को आत्मनिर्भर बनाएगी। युवा सोच को क्यों बदलना जरूरी है? भारत में आज भी कई युवा बेरोजगारी, सामाजिक भेदभाव, भ्रष्टाचार और नशे की लत जैसे समस्याओं से घिरे हैं। इसका मुख्य कारण सिर्फ संसाधनों की कमी नहीं है, बल्कि सोच की रुकावट है। अगर युवा सोच ले कि “परिस्थितियाँ मेरी किस्मत तय करेंगी”, तो वह हमेशा हार मानेगा। लेकिन अगर वह माने कि “मेरे विचार और कर्म ही मेरी किस्मत तय करेंगे”, तो वह बदलाव लाएगा। युवाओं को चाहिए कि वे चुनौतियों को अवसर मानें, असफलताओं से सीखें, और निरंतर आत्मविकास के पथ पर आगे बढ़ें। सकारात्मक सोच से बदलाव कैसे संभव है? सोच बदलने का अर्थ है — आलोचना से समाधान की ओर बढ़ना। भारत में यदि हम भ्रष्टाचार, जातिवाद या लिंगभेद को खत्म करना चाहते हैं, तो पहले हमें अपनी सोच से इन्हें निकालना होगा। जब कोई युवा यह सोचता है कि "मैं जात-पात नहीं मानता", तब समाज में समरसता आती है। जब कोई लड़की यह सोचती है कि "मैं किसी लड़के से कम नहीं", तब समानता बढ़ती है। जब कोई बेरोजगार यह सोचता है कि "मैं खुद अवसर पैदा करूंगा", तब भारत में नए रोजगार जन्म लेते हैं। शिक्षा में सोच का बदलाव आज भारत को केवल डिग्रीधारी नहीं, बल्कि विचारशील, रचनात्मक और सशक्त युवा चाहिए। हमारी शिक्षा प्रणाली को भी सोच में बदलाव लाना होगा — रट्टा प्रणाली से हटकर नवाचार, संवाद और कौशल पर आधारित शिक्षा की ओर बढ़ना होगा। शिक्षा का उद्देश्य केवल नौकरी पाना नहीं, बल्कि इंसान को समाज के लिए उपयोगी बनाना होना चाहिए। जब युवा “अंक” से अधिक “अंकुश” पर ध्यान देंगे, यानी अपने व्यवहार, दृष्टिकोण और विचारों पर काम करेंगे, तभी असली शिक्षा संभव होगी। समाज को बदलने वाली सोच हमारा समाज आज भी रूढ़िवादिता और परंपराओं की बेड़ियों में जकड़ा हुआ है। लेकिन युवा पीढ़ी में इतनी शक्ति है कि वह इन बेड़ियों को तोड़कर एक नया युग शुरू कर सकती है। जब युवा दहेज को नकारेगा, तभी यह कुप्रथा समाप्त होगी। जब युवा पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी समझेगा, तभी आने वाली पीढ़ियों को स्वच्छ भारत मिलेगा। जब युवा स्वदेशी उत्पादों को अपनाएगा, तभी भारत आत्मनिर्भर बनेगा। डिजिटल सोच की दिशा में कदम आज का युवा टेक्नोलॉजी से जुड़ा हुआ है, लेकिन आवश्यकता है कि वह इसका उपयोग केवल मनोरंजन के लिए न कर, बल्कि ज्ञान, विकास और नवाचार के लिए करे। सोशल मीडिया पर केवल ट्रेंडिंग चीजें न देखे, बल्कि उसमें अपनी सकारात्मक बातों से बदलाव लाने की कोशिश करे। यूट्यूब पर केवल मजेदार वीडियो न देखें, बल्कि स्किल्स सीखने वाले चैनल भी देखें। मोबाइल का इस्तेमाल केवल चैट के लिए न करें, बल्कि उसके जरिए बिजनेस, कोर्स और करियर को मजबूत बनाएं। बदलाव के उदाहरण भारत में कई ऐसे युवा हैं जिन्होंने सोच बदलकर समाज में बदलाव लाया: अरुणाचल की पुलोम लोबोम — जिन्होंने अपनी सोच से महिलाओं को हथकरघा उद्योग में आत्मनिर्भर बनाया। तमिलनाडु की सुगंधा — जिन्होंने गांव में लड़कियों के लिए डिजिटल लर्निंग सेंटर शुरू किया। गुजरात के मयूर — जिन्होंने खेती के पारंपरिक तरीकों को छोड़कर ड्रोन और AI से खेती शुरू की। इन युवाओं की सोच ने भारत के कोनों में रोशनी फैलाई है। कैसे बदलें अपनी सोच? असफलता से न डरें: हर असफलता एक सबक होती है। सकारात्मक संगति में रहें: जिस वातावरण में आप रहते हैं, वही आपकी सोच को बनाता है। नई चीजें सीखें: रोज कुछ नया जानें, पढ़ें और उसे जीवन में उतारें। समय का सदुपयोग करें: वक्त को बर्बाद करना, जीवन को बर्बाद करना है। छोटी शुरुआत करें: बड़े बदलाव की शुरुआत हमेशा छोटे कदमों से होती है। निष्कर्ष "सोच बदलो, इंडिया बदलो" केवल एक आदर्श वाक्य नहीं, बल्कि हर युवा के जीवन का ध्येय होना चाहिए। जब हर युवा अपनी सोच को नकारात्मकता से निकालकर सकारात्मकता, रचनात्मकता और नवाचार की दिशा में ले जाएगा, तब भारत सच्चे अर्थों में विश्वगुरु बनेगा। युवाओं! ये समय है खुद को बदलने का, सोचने का, आगे बढ़ने का। क्योंकि जब आप बदलेंगे, तभी भारत बदलेगा। आइए! संकल्प लें — आज से, अभी से — अपनी सोच को बदलें, और भारत को एक नई दिशा दें। ******
- बड़ों की बात मानो
सरिता देवी एक बड़ा भारी जंगल था, पहाड़ था और उसमें पानी के शीतल निर्मल झरने थे। जंगल में बहुत-से पशु रहते थे। पर्वत की गुफा में एक शेर, एक शेरनी और शेरनी के दो छोटे बच्चे रहते थे। शेर और शेरनी अपने बच्चों को बहुत प्यार करते थे। जब शेर के बच्चे अपने माँ-बाप के साथ जंगल में निकलते थे, तब उन्हें देखकर जंगल के दूसरे पशु भाग जाया करते थे। लेकिन शेर-शेरनी अपने बच्चों को बहुत कम अपने साथ ले जाते थे। वे बच्चों को गुफा में छोड़कर वन में अपने भोजन की खोज में चले जाया करते थे। शेर और शेरनी अपने बच्चों को बार-बार समझाते थे कि वे अकेले गुफा से बाहर भूलकर भी न निकलें। लेकिन बड़े बच्चे को यह बात अच्छी नहीं लगती थी। एक दिन जब बच्चों के माँ-बाप जंगल में गये थे, बड़े बच्चे ने छोटे से कहा – ‘चलो झरने से पानी पी आवें और वनमें थोड़ा घूमें। हिरनों को डरा देना मुझे बहुत अच्छा लगता है।’ छोटे बच्चे ने कहा – ‘पिताजी ने कहा है कि अकेले गुफा से मत निकलना। झरने के पास जाने को तो उन्होंने बहुत मन किया है। तुम ठहरो। पिताजी या माता जी को आने दो। हम उनके साथ जाकर पानी पी लेंगे।’ बड़े बच्चे ने कहा – ‘मुझे प्यास लगी है। सब पशु तो हम लोगों से डरते ही हैं। डरने की क्या बात है?’ छोटा बच्चा अकेला जाने को तैयार नहीं हुआ। उसने कहा – ‘मैं तो माँ-बाप की बात मानूँगा। मुझे अकेला जाने में डर लगता है।’ बड़े भाई ने कहा – ‘तुम डरपोक हो, मत जाओ, मैं तो जाता हूँ।’ बड़ा बच्चा गुफा से निकला और झरने के पास गया। उसने भर पेट पानी पिया और तब हिरनों को ढूँढ़ने इधर-उधर घूमने लगा। उस जंगल में उस दिन कुछ शिकारी आये थे। शिकारियों ने दूरसे शेर के अकेले बच्चे को घूमते देखा तो सोचा कि इसे पकड़कर किसी चिड़िया खाने को बेच देने से रुपये मिलेंगे। छिपे-छिपे शिकारी लोगों ने शेर के बच्चे को चारों ओर से घेर लिया और एक साथ उस पर टूट पड़े। उन लोगों ने कम्बल और कपड़े डालकर उस बच्चे को पकड़ लिया। बेचारा शेर का बच्चा क्या करता। वह अभी कुत्ते-जितना बड़ा भी नहीं हुआ था। उसे कम्बल में खूब लपेटकर उन लोगों ने रस्सियों से बाँध दिया था। वह न तो छटपटा सकता था, न गुर्रा सकता था। शिकारियों ने इस बच्चे को एक चिड़िया खाने को बेच दिया। वहाँ वह एक लोहे के कटघरे में बंद कर दिया गया। वह बहुत दु:खी था। उसे अपने माँ-बाप की बड़ी याद आती थी। बार-बार वह गुर्राता और लोहे की छड़ों को नोचता था, लेकिन उसके नोचने से छड़ टूट तो सकती नहीं थी। जब भी वह शेर का बच्चा किसी छोटे बालक को देखता था, बहुत गुर्राता और उछलता था। यदि कोई उसकी भाषा समझता तो वह उससे अवश्य कहता – ‘तुम अपने माँ-बाप तथा बड़ों की बात अवश्य मानना। बड़ों की बात न मानने से पीछे पश्चात्ताप करना पड़ता है। मैं बड़ों की बात न मानने से ही यहाँ बंदी हुआ हूँ।’ *****











