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  • Top 10 Mistakes in Literary Content Writing

    Introduction Writing literary content is a craft that combines creativity with skill. Whether you are penning a poem, a short story, or a novel, the process involves avoiding common pitfalls that can undermine your work. Literary content deserves attention to detail and a deep understanding of the art of storytelling. This article will explore the top 10 mistakes in literary content writing and provide insights on how to avoid them. Ignoring the Importance of Structure A well-structured piece of literary content is crucial for maintaining reader interest and delivering your message effectively. Lack of a Clear Beginning, Middle, and End Every story, poem, or article needs a clear structure. Without a defined beginning, middle, and end, readers can become confused and lose interest. It's vital to create an engaging introduction, a well-developed body, and a satisfying conclusion. Overcomplicating the Plot While complex plots can be intriguing, overcomplicating them can lead to confusion. It's essential to strike a balance between complexity and clarity, ensuring that your readers can follow the story without getting lost in unnecessary details. Weak Character Development Characters are the heart of any narrative. Poorly developed characters can make even the most exciting plot fall flat. One-Dimensional Characters Characters should be multi-faceted and believable. One-dimensional characters lack depth and relatability, making it difficult for readers to invest in their journey. Inconsistent Character Behavior Consistency is key in character development. When characters act in ways that contradict their established personalities without reason, it disrupts the narrative flow and confuses the audience. Overuse of Clichés and Tropes Clichés and tropes can undermine the originality of literary content. While they may be tempting shortcuts, they often result in stale and predictable narratives. Identifying and Avoiding Clichés Being aware of common clichés and actively working to avoid them can enhance the originality of your work. Instead of relying on well-worn phrases and ideas, strive to create fresh and innovative content. Reimagining Tropes Tropes are not inherently bad, but they should be used creatively. Reimagining and subverting traditional tropes can add a unique twist to your writing and engage your audience. Neglecting the Editing Process Even the most talented writers need to edit their work. Neglecting this crucial step can result in errors that detract from the quality of your literary content. Overlooking Grammar and Spelling Errors Grammar and spelling errors can distract readers and undermine your credibility as a writer. Careful editing and proofreading are essential to producing polished work. Ignoring Feedback Feedback from peers and mentors can provide valuable insights into your writing. Ignoring constructive criticism limits your growth and the potential improvement of your work. Conclusion Avoiding these common mistakes can elevate your literary content from mediocre to exceptional. By focusing on structure, character development, originality, and editing, you can create compelling and memorable narratives. Remember that writing is a craft that requires dedication and continuous improvement. Embrace the process, learn from your mistakes, and enjoy the journey of storytelling. Optimized by Rabbit SEO

  • हीरे की पहचान

    रामकुमार वर्मा एक बार एक महान राजा का भव्य दरबार लगा हुआ था। सर्दियों का मौसम था, इसलिए दरबार महल के खुले प्रांगण में लगाया गया था, जहाँ हल्की-हल्की सुनहरी धूप सबको सुखद गर्माहट दे रही थी। राजसिंहासन के सामने एक शानदार शाही मेज़ सजी हुई थी, जिस पर कई कीमती वस्तुएँ रखी थीं। दरबार में मंत्री, दीवान, पंडित, सेनापति और राज्य के अनेक गणमान्य लोग उपस्थित थे। राजा के परिवार के सदस्य भी उस सभा में बैठे थे। पूरा वातावरण गरिमा और शांति से भरा हुआ था। उसी समय दरबार के द्वार पर एक अजनबी व्यक्ति ने प्रवेश की अनुमति माँगी। अनुमति मिलने पर वह आत्मविश्वास से भरा हुआ अंदर आया और राजा को प्रणाम कर बोला— “महाराज, मैं कई राज्यों की यात्रा करता हूँ और अपने साथ दो अनोखी वस्तुएँ लेकर चलता हूँ। मैं जहाँ भी जाता हूँ, वहाँ के राजा और विद्वानों के सामने इन वस्तुओं को रखता हूँ और उनसे इनकी पहचान करने की चुनौती देता हूँ। आज तक कोई भी इनकी सही पहचान नहीं कर पाया। इस प्रकार मैं अनेक राज्यों से विजेता बनकर लौट चुका हूँ। अब मैं आपके राज्य में आया हूँ, यह देखने के लिए कि यहाँ कोई इनकी परख कर पाता है या नहीं।” राजा को यह सुनकर उत्सुकता हुई। उन्होंने मुस्कराते हुए कहा, “बताओ, वे वस्तुएँ क्या हैं?” उस व्यक्ति ने धीरे से अपनी पोटली खोली और दोनों वस्तुएँ शाही मेज़ पर रख दीं। दरबार के सभी लोग ध्यान से देखने लगे। वे दोनों वस्तुएँ आकार, रंग, चमक और रूप में बिल्कुल एक जैसी थीं। कोई भी अंतर पहचानना असंभव प्रतीत हो रहा था। राजा ने कुछ देर देखने के बाद कहा— “ये तो दोनों एक जैसी ही लगती हैं।” वह व्यक्ति मुस्कराया और बोला— “महाराज, दिखने में दोनों एक जैसी हैं, लेकिन वास्तव में एक बहुत कीमती हीरा है और दूसरी केवल साधारण काँच का टुकड़ा। आज तक कोई भी यह नहीं बता पाया कि इनमें से कौन सा हीरा है और कौन सा काँच। यदि आपके दरबार में कोई सही पहचान कर ले, तो मैं यह हीरा आपकी राज्य-तिजोरी में भेंट कर दूँगा। लेकिन यदि कोई पहचान न पाया, तो आपको इस हीरे के बराबर धनराशि मुझे देनी होगी।” यह सुनकर पूरे दरबार में सन्नाटा छा गया। राजा ने एक-एक करके अपने मंत्रियों, दीवानों और विद्वानों की ओर देखा। सबने वस्तुओं को ध्यान से देखा, परंतु किसी में भी इतना साहस नहीं था कि निश्चित रूप से कुछ कह सके। दोनों वस्तुएँ इतनी समान थीं कि अंतर करना असंभव लगता था। दीवान ने विनम्रता से कहा— “महाराज, हम यह परख नहीं कर सकते। दोनों वस्तुएँ बिल्कुल एक जैसी दिखाई दे रही हैं।” राजा भी असमंजस में पड़ गए। राज्य में धन की कमी नहीं थी, परंतु यदि वे हार जाते तो उनकी प्रतिष्ठा को ठेस पहुँचती। इसलिए दरबार में एक विचित्र चिंता का वातावरण बन गया। तभी सभा के पीछे थोड़ी हलचल हुई। एक अंधा व्यक्ति , हाथ में लाठी लिए धीरे-धीरे खड़ा हुआ। उसने कहा— “मुझे महाराज के पास ले चलो। मैंने सारी बात सुनी है। यदि अनुमति हो, तो मैं भी एक बार इन वस्तुओं को परखना चाहता हूँ।” लोगों को आश्चर्य हुआ। जो विद्वान और ज्ञानी व्यक्ति पहचान नहीं पाए, वहाँ एक अंधा व्यक्ति कैसे पहचान पाएगा? फिर भी उसे राजा के सामने लाया गया। उसने विनम्रता से कहा— “महाराज, मैं जन्म से अंधा हूँ। मैं इन वस्तुओं को देख नहीं सकता, पर यदि अनुमति दें तो मैं इन्हें छूकर पहचानने का प्रयास करना चाहता हूँ। यदि सफल हुआ तो अच्छा, और यदि असफल हुआ तो वैसे भी आप सब हार ही चुके हैं।” राजा को उसकी बात में सरलता और आत्मविश्वास दोनों दिखाई दिए। उन्होंने अनुमति दे दी। दोनों वस्तुएँ उसके हाथ में दी गईं। उसने उन्हें कुछ क्षण छुआ… फिर शांत स्वर में बोला— “महाराज, यह हीरा है… और यह काँच का टुकड़ा।” दरबार में एकदम सन्नाटा छा गया। सभी की निगाहें उस यात्री पर टिक गईं जो चुनौती लेकर आया था। वह व्यक्ति तुरंत उठकर उस अंधे के चरणों में झुक गया और बोला— “आपने सही पहचान लिया। मैं अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार यह कीमती हीरा आपके राज्य की तिजोरी में अर्पित करता हूँ।” दरबार में खुशी की लहर दौड़ गई। राजा और सभी दरबारी उस अंधे व्यक्ति की बुद्धिमत्ता से चकित थे। राजा ने जिज्ञासा से पूछा— “तुमने यह कैसे पहचान लिया कि कौन सा हीरा है और कौन सा काँच?” अंधा व्यक्ति मुस्कराया और बोला— “महाराज, हम सब धूप में बैठे हैं। मैंने दोनों को छुआ। जो वस्तु ठंडी रही, वह हीरा थी… और जो जल्दी गरम हो गई, वह काँच था।” उसकी सरल बुद्धि के आगे बड़े-बड़े विद्वान भी नतमस्तक हो गए। फिर वह शांत स्वर में बोला— “महाराज, यही बात जीवन में भी लागू होती है। जो व्यक्ति छोटी-छोटी बातों में तुरंत गरम हो जाए, क्रोधित हो जाए, उलझ जाए— वह काँच के समान है। लेकिन जो कठिन परिस्थितियों में भी शांत और स्थिर बना रहे— वही सच्चा हीरा होता है।” उस दिन राजा के दरबार में केवल हीरे की ही नहीं, बल्कि मानव-स्वभाव की सच्ची पहचान भी हो गई। *******

  • चोर का दान

    मंजुला अवस्थी एक नगर में एक सेठ और एक गरीब का घर पास-पास था। सेठ को कभी इस बात का मलाल नहीं था कि उसका पड़ोसी गरीब है। गरीब की बेटी, रुक्मणि, अब विवाह योग्य हो चुकी थी। एक दिन गरीब ने सेठ से कुछ धन उधार मांगा, ताकि बेटी के हाथ पीले कर सके, लेकिन सेठ ने इनकार कर दिया। उसी रात, सेठ के घर में एक चोर घुस आया। संयोग से, सेठ और सेठानी अभी तक सोए नहीं थे, तो चोर वहीं छिपकर बैठ गया। सेठ-सेठानी आपस में बातें कर रहे थे। सेठानी ने कहा, "देखते ही देखते रुक्मणि सयानी हो गई है।" सेठ बोला, "हाँ, लड़कियाँ कब बड़ी हो जाती हैं, पता ही नहीं चलता।" सेठानी ने आगे कहा, "अब उसके पिता को उसकी शादी कर देनी चाहिए। लेकिन वे ऐसा क्यों नहीं कर रहे?" सेठ ने बताया, "आज उन्होंने मुझसे कुछ धन उधार माँगा था, लेकिन मैंने इनकार कर दिया। सोचा, गरीब आदमी है, लौटा नहीं पाएगा। लेकिन अब लगता है, मुझे उसकी मदद करनी चाहिए थी।" कुछ देर में दोनों सो गए, और चोर ने उनका धन चुरा लिया। चोर जब घर से निकला, तो उसे याद आया कि उसकी पत्नी ने बर्तन लाने के लिए कहा था। सेठ के घर दोबारा जाना जोखिम भरा था, तो उसने गरीब के घर से बर्तन चुराने का सोचा। गरीब के घर में भी जाग थी। बेटी की चिंता में माता-पिता सो नहीं पा रहे थे। चोर छिपकर बैठा और उनकी बातें सुनने लगा। गरीब की पत्नी ने कहा, "तो सेठ ने मदद से इनकार कर दिया?" गरीब बोला, "हाँ, लेकिन वो अपनी जगह सही है। व्यापारी है, अपना सोचना पड़ता है।" पत्नी ने रोते हुए कहा, "पर हमें चार महीने में रुक्मणि की शादी करनी होगी, नहीं तो...!" गरीब दुखी था, "काश! भगवान मेरी जगह उसकी जान ले लेते, मैं अपनी बेटी को बेसहारा नहीं देख सकता।" चोर यह सब सुनकर विचलित हो गया। उसे अपनी संतान को खोने का दर्द याद आया। उसने गरीब के घर से कुछ बर्तन झोली में डाले, फिर चूल्हे से कोयला निकालकर आँगन में लिख दिया— "सेठ की तरफ से रुक्मणि के विवाह के लिए दिया गया धन, ... एक चोर" धन की पोटली वहीं रखकर वह चला गया। सुबह, दोनों घरों में हड़कंप मच गया—सेठ के घर चोरी हुई थी और गरीब के यहाँ धन मिला था। गरीब सोच में पड़ गया—क्या वह धन छुपा ले? लेकिन फिर सोचा, लोग क्या कहेंगे? कहीं कोई उसे चोर न समझे! उसने सोचा, मुझसे अच्छा तो वह चोर निकला, जिसने मेरी बेटी के लिए चुराया हुआ धन छोड़ दिया। गरीब ईमानदारी दिखाते हुए सेठ के पास पहुँचा और उसे पूरी कहानी सुना दी। सेठ ने वह संदेश पढ़ा और सोचने लगा, "एक चोर इतना अच्छा हो सकता है, जिसने चुराया हुआ धन भी किसी की भलाई के लिए छोड़ दिया, और मैं होते हुए भी मदद न कर सका!" सेठ ने गरीब को धन की पोटली से आधा धन दे दिया और कहा, "ये लो, ये रुक्मणि के विवाह के लिए है। इसे लौटाने की कोई जरूरत नहीं।" गरीब भावुक हो गया, "सेठ जी, आप बहुत अच्छे हैं।" सेठ ने कहा, "न मैं अच्छा हूँ, न तुम। अच्छा तो वह चोर था, जिसने रुक्मणि की शादी की चिंता कर ली। काश, दुनिया में ऐसे भले चोर और होते!" यह कहते हुए सेठ ने गरीब को गले से लगा लिया *****

  • व्यक्ति की पहचान

    लक्ष्मी मिश्रा किसी जंगल में एक संत महात्मा रहते थे। सन्यासियों वाली वेशभूषा थी और बातों में सदाचार का भाव, चेहरे पर इतना तेज था कि कोई भी व्यक्ति उनसे प्रभावित हुए नहीं रह सकता था। एक बार जंगल में शहर का एक व्यक्ति आया और वो जब महात्मा जी की झोपड़ी से होकर गुजरा तो देखा बहुत से लोग महात्मा जी के दर्शन करने आये हुए थे। वो महात्मा जी के पास गया और बोला कि आप धनी भी नहीं हैं, आपने महंगे कपडे भी नहीं पहने हैं, आपको देखकर मैं बिल्कुल प्रभावित नहीं हुआ फिर ये इतने सारे लोग आपके दर्शन करने क्यों आते हैं ? महात्मा जी ने उस व्यक्ति को अपनी एक अंगूठी उतार के दी और कहा कि आप इसे बाजार में बेच कर आएं और इसके बदले एक सोने की माला लेकर आना। अब वो व्यक्ति बाजार गया और सब की दुकान पर जा कर उस अंगूठी के बदले सोने की माला मांगने लगा। लेकिन सोने की माला तो क्या उस अंगूठी के बदले कोई पीतल का एक टुकड़ा भी देने को तैयार नहीं था। थक-हार के व्यक्ति वापस महात्मा जी के पास पहुंचा और बोला कि इस अंगूठी की तो कोई कीमत ही नहीं है। महात्मा जी मुस्कुराये और बोले कि अब इस अंगूठी को पीछे वाली एक गली में सुनार की दुकान पर ले जाओ। व्यक्ति जब सुनार की दुकान पर गया तो सुनार ने एक माला नहीं बल्कि पांच माला अंगूठी के बदले देने को कहा। व्यक्ति बड़ा हैरान हुआ कि इस मामूली से अंगूठी के बदले कोई पीतल की माला देने को तैयार नहीं हुआ लेकिन ये सुनार कैसे 5 सोने की माला दे रहा है। व्यक्ति वापस महात्मा जी के पास गया और उनको सारी बातें बतायीं। अब महात्मा जी बोले कि चीजें जैसी ऊपर से दिखती हैं, अंदर से वैसी नहीं होती। ये कोई मामूली अंगूठी नहीं है बल्कि ये एक हीरे की अंगूठी है जिसकी पहचान केवल सुनार ही कर सकता था। इसलिए वह 5 माला देने को तैयार हो गया। ठीक वैसे ही मेरी वेशभूषा को देखकर तुम मुझसे प्रभावित नहीं हुए। लेकिन ज्ञान का प्रकाश लोगों को मेरी ओर खींच लाता है। व्यक्ति महात्मा जी की बातें सुनकर बड़ा शर्मिंदा हुआ। शिक्षा:- कपड़ों से व्यक्ति की पहचान नहीं होती बल्कि आचरण और ज्ञान से व्यक्ति की पहचान होती है। ******

  • छोटी बहन

    रमेश मिश्रा शनिवार रात लगभग 11:30 बजे मैं ऑफिस से बाइक पर घर लौट रहा था, तभी मैंने देखा कि एक लड़की सलवार सूट पहने सड़क पर मदद के लिए इशारा कर रही थी। मैंने बाइक रोकी, लेकिन एक ऑटो हमारे पास से निकल गया। मैंने कहा, "जी कहिए..." वह गुस्से में बोली, "मैंने ऑटो को रुकने का इशारा किया था, इतनी देर में ऑटो आया था और आपकी वजह से वह भी चला गया।" मुझे भी बुरा लगा, सोचा कि इतनी रात को अकेली लड़की मेरी गलती की वजह से परेशान हो गई। मैंने तुरंत माफी मांगी और लिफ्ट के लिए पूछा, लेकिन उसने साफ मना कर दिया। मैंने फिर कहा, "रात काफी हो चुकी है और आप अकेली हैं।" मगर वह गुस्से में थी और कुछ सुनने को तैयार नहीं थी। मैंने सोचा कि चला जाऊं, लेकिन फिर मन में आया कि अगर कुछ गलत हो गया तो मुझे इसका दोषी माना जाएगा। मैंने कहा, "ठीक है, जब तक आपको ऑटो नहीं मिलता, मैं यहीं खड़ा रहूंगा क्योंकि गलती मेरी है।" वह कुछ नहीं बोली। आधा घंटा और बीत गया, अब समय रात के 12 बजे के पार हो गया। मैंने फिर से लिफ्ट देने की पेशकश की और कहा, "अब तक आधा सफर तय कर लिया होता, यहाँ खड़े रहने से कोई फायदा नहीं है।" लेकिन उसने अनसुना कर दिया। मैं उलझन में था, उसे अकेले छोड़ने का मन नहीं कर रहा था। मेरे मन में बेचैनी थी कि कहीं कुछ गलत न हो जाए। फिर सोचा, "जब मेरे मन में इतनी घबराहट है, तो वह तो एक लड़की है और मैं उसके लिए अजनबी हूँ, कैसे मुझ पर विश्वास करेगी?" अचानक मुझे एक उपाय सूझा। मैंने कहा, "देखो, मेरे घर में भी तुम्हारे जैसी एक छोटी बहन है और तुम भी वैसी ही हो। मेरी मानो, यहाँ इतनी रात को अकेले रहना ठीक नहीं है। प्लीज मेरे साथ बाइक पर चलो, जहां तक तुम्हें अच्छा लगे।" मेरे इन शब्दों से वह थोड़ी राहत महसूस करने लगी और बोली, "आप जाइए, मैं कोई न कोई उपाय कर लूंगी।" मैंने कहा, "मुझे यहाँ रुके एक घंटा हो गया है। ऑटो तो दूर, आदमी भी नजर नहीं आ रहा। प्लीज चलो।" वह फिर भी तैयार नहीं हुई। मैंने अपना पर्स खोला और उसे दिखाया, "देखो, इसमें मेरी फोटो है, पहचान पत्र है, ड्राइविंग लाइसेंस और आधार कार्ड है। इसे अपने पास रख लो, जब सुरक्षित जगह पहुँच जाओ तो लौटा देना।" उसने मेरा आधार कार्ड देखा और कहा, "दीपक..." मैंने कहा, "हां, मेरा नाम दीपक है। देखो, अब प्लीज मना मत करना। तुम्हारे घर में तुम्हारे माता-पिता, भाई-बहन इंतजार कर रहे होंगे। वैसे मेरे भी मम्मी-पापा और बहन इंतजार कर रहे हैं, चलो।" वह थोड़ी सी मुस्कुराई और बाइक पर बैठ गई। मैंने पूछा, "तुम्हारा घर कहाँ है?" वह बोली, "आप चलते रहो, जहां लगेगा बता दूंगी।" लगभग एक घंटा लगातार बाइक चलती रही, वह कुछ नहीं बोली। लगभग 40 किलोमीटर के बाद वह बोली, "बस, यहीं रोक दो।" और तुरंत एक सड़क से कॉलोनी की ओर जाने वाले रास्ते पर दौड़ पड़ी। कुछ ही मिनटों में वह मेरी आँखों से ओझल हो गई। घर पहुंचा तो तीन बज चुके थे। पापा बहुत गुस्से में थे, मम्मी और बहन भी जाग रहे थे। यकीनन वे चिंतित थे और गुस्सा भी। बिना कुछ बताए मैं चुपचाप अपने कमरे में चला गया। अगले दिन रविवार था, सो आराम से सो रहा था। अचानक ग्यारह बजे छोटी बहन ने आकर झकझोरा, "भैया, उठो कोई लड़की आई है, उसके मम्मी-पापा भी हैं। क्या कोई लफड़ा कर दिया है क्या?" और हंसने लगी, "पापा बुला रहे हैं नीचे, जल्दी चलो।" मैंने कहा, "पागल है, मैं और लफड़ा? शैतान कहीं की।" अचकचाई नींद में तुरंत बनियान पहनकर नीचे आया। देखा तो वही रात वाली लड़की और उसके साथ एक अंकल-आंटी थे। यह देखकर मैं हैरान रह गया। मैं कुछ पूछता, उससे पहले वह उठकर आई और बोली, "भैया, हैरान हो गए ना, मैं यहाँ कैसे आई? आपका पर्स जिसमें आपका पैन कार्ड, आधार कार्ड है, उसी से पता लेकर मम्मी-पापा के साथ आई हूँ। आपने रात में मेरी इतनी मदद की और मैंने आपको धन्यवाद तक नहीं कहा। उल्टा आपके जरूरी दस्तावेज भी ले गई। पहले थैंक्यू, फिर सॉरी। जैसे आपने कहा था, मैं भी आपकी छोटी बहन जैसी हूँ।" इसके बाद उसके मम्मी-पापा ने मुझे ढेरों आशीर्वाद दिए और मेरी काफी तारीफ की। फिर अपने यहां आने का निमंत्रण देकर वे लोग चले गए। उनके जाते ही पापा ने मुझे सीने से लगा लिया और कहा, "मुझे गर्व है तुझ पर दीपक, तूने एक अच्छे बेटे वाली बात की। मगर रात को ही बता देता तो अच्छा होता, बेकार में तुझे डांटा मैंने।" मैंने कहा, "पापा, आप भी तो मेरी भलाई के लिए ही चिंतित थे।" पापा ने एक बार फिर से मुझे सीने से लगा लिया और इस बार मम्मी और छोटी बहन भी आकर मुझसे लिपट गईं। दोस्तो, मुझे मेरे पापा ने बचपन से लेकर आज तक एक बात ही सिखाई है, "अकेली लड़की मौका नहीं, जिम्मेदारी होती है हमारी। ******

  • ठाकुर का कुआँ

    प्रेमचंद जोखू ने लोटा मुँह से लगाया तो पानी में सख्त बदबू आई। गंगी से बोला- यह कैसा पानी है? मारे बास के पिया नहीं जाता। गला सूखा जा रहा है और तू सड़ा पानी पिलाए देती है ! गंगी प्रतिदिन शाम पानी भर लिया करती थी। कुआँ दूर था, बार-बार जाना मुश्किल था। कल वह पानी लाई, तो उसमें बू बिलकुल न थी, आज पानी में बदबू कैसी ! लोटा नाक से लगाया, तो सचमुच बदबू थी। ज़रुर कोई जानवर कुएँ में गिरकर मर गया होगा, मगर दूसरा पानी आवे कहाँ से? ठाकुर के कुएँ पर कौन चढ़ने देगा? दूर से लोग डाँट बताएँगे। साहू का कुआँ गाँव के उस सिरे पर है, परंतु वहाँ भी कौन पानी भरने देगा? कोई तीसरा कुआँ गाँव में है नहीं। जोखू कई दिन से बीमार है। कुछ देर तक तो प्यास रोके चुप पड़ा रहा, फिर बोला-अब तो मारे प्यास के रहा नहीं जाता। ला, थोड़ा पानी नाक बंद करके पी लूँ। गंगी ने पानी न दिया। ख़राब पानी से बीमारी बढ़ जाएगी इतना जानती थी, परंतु यह न जानती थी कि पानी को उबाल देने से उसकी ख़राबी जाती रहती हैं। बोली- यह पानी कैसे पिओगे?  न जाने कौन जानवर मरा है। कुएँ से मैं दूसरा पानी लाए देती हूँ। जोखू ने आश्चर्य से उसकी ओर देखा-पानी कहाँ से लाएँगे? ठाकुर और साहू के दो कुएँ तो हैं। क्या एक लोटा पानी न भरने देंगे? 'हाथ-पाँव तुड़वा आएगी और कुछ न होगा। बैठ चुपके से। ब्रह्म-देवता आशीर्वाद देंगे, ठाकुर लाठी मारेगें, साहूजी एक के पाँच लेंगे। ग़रीबों का दर्द कौन समझता है! हम तो मर भी जाते है, तो कोई दुआर पर झाँकने नहीं आता, कंधा देना तो बड़ी बात है। ऐसे लोग कुएँ से पानी भरने देंगे?' इन शब्दों में कड़वा सत्य था। गंगी क्या जवाब देती, किंतु उसने वह बदबूदार पानी पीने को न दिया। रात के नौ बजे थे। थके-माँदे मजदूर तो सो चुके थे, ठाकुर के दरवाजे पर दस-पाँच बेफ़िक्रे जमा थे। मैदानी बहादुरी का तो अब न जमाना रहा है, न मौका। कानूनी बहादुरी की बातें हो रही थीं। कितनी होशियारी से ठाकुर ने थानेदार को एक ख़ास मुकदमे में रिश्वत दी और साफ़ निकल गये। कितनी अक्लमंदी से एक मार्के के मुकदमे की नक़ल ले आए। नाजिर और मोहतमिम, सभी कहते थे, नक़ल नहीं मिल सकती। कोई पचास माँगता, कोई सौ। यहाँ बेपैसे-कौड़ी नकल उड़ा दी। काम करने ढंग चाहिए। इसी समय गंगी कुएँ से पानी लेने पहुँची। कुप्पी की धुँधली रोशनी कुएँ पर आ रही थी। गंगी जगत की आड़ में बैठी मौके का इंतज़ार करने लगी। इस कुएँ का पानी सारा गाँव पीता है। किसी के लिए रोका नहीं, सिर्फ़ ये बदनसीब नहीं भर सकते। गंगी का विद्रोही दिल रिवाजी पाबंदियों और मज़बूरियों पर चोटें करने लगा—हम क्यों नीच हैं और ये लोग क्यों ऊँच हैं?  इसलिए कि ये लोग गले में तागा डाल लेते हैं? यहाँ तो जितने है, एक-से-एक छँटे हैं। चोरी ये करें, जाल-फ़रेब ये करें, झूठे मुकदमे ये करें। अभी इस ठाकुर ने तो उस दिन बेचारे गड़रिए की भेड़ चुरा ली थी और बाद में मारकर खा गया। इन्हीं पंडित के घर में तो बारहों मास जुआ होता है। यही साहू जी तो घी में तेल मिलाकर बेचते हैं। काम करा लेते हैं, मजूरी देते नानी मरती है। किस-किस बात में हमसे ऊँचे हैं, हम गली-गली चिल्लाते नहीं कि हम ऊँचे हैं, हम ऊँचे हैं। कभी गाँव में आ जाती हूँ, तो रस-भरी आँख से देखने लगते हैं। जैसे सबकी छाती पर साँप लोटने लगता है, परंतु घमंड यह कि हम ऊँचे हैं! कुएँ पर किसी के आने की आहट हुई। गंगी की छाती धक-धक करने लगी। कहीं देख लें तो गजब हो जाए। एक लात भी तो नीचे न पड़े। उसने घड़ा और रस्सी उठा ली और झुककर चलती हुई एक वृक्ष के अंधेरे साये मे जा खड़ी हुई। कब इन लोगों को दया आती है किसी पर ! बेचारे महँगू को इतना मारा कि महीनों लहू थूकता रहा। इसीलिए तो कि उसने बेगार न दी थी। इस पर ये लोग ऊँचे बनते हैं? कुएँ पर स्त्रियाँ पानी भरने आई थी। इनमें बात हो रही थी। 'खाना खाने चले और हुक्म हुआ कि ताजा पानी भर लाओ। घड़े के लिए पैसे नहीं हैं।' 'हम लोगों को आराम से बैठे देखकर जैसे मरदों को जलन होती है।' 'हाँ, यह तो न हुआ कि कलसिया उठाकर भर लाते। बस, हुकुम चला दिया कि ताजा पानी लाओ, जैसे हम लौंडियाँ ही तो हैं।' 'लौडिंयाँ नहीं तो और क्या हो तुम? रोटी-कपड़ा नहीं पातीं?  दस-पाँच रुपए भी छीन-झपटकर ले ही लेती हो। और लौडियाँ कैसी होती हैं!' 'मत लजाओ, दीदी! छिन-भर आराम करने को जी तरसकर रह जाता है। इतना काम किसी दूसरे के घर कर देती, तो इससे कहीं आराम से रहती। ऊपर से वह एहसान मानता! यहाँ काम करते-करते मर जाओ; पर किसी का मुँह ही सीधा नहीं होता।' दोनों पानी भरकर चली गई, तो गंगी वृक्ष की छाया से निकली और कुएँ की जगत के पास आई। बेफ़िक्रे चले गऐ थे। ठाकुर भी दरवाज़ा बंद कर अंदर आँगन में सोने जा रहे थे। गंगी ने क्षणिक सुख की साँस ली। किसी तरह मैदान तो साफ़ हुआ। अमृत चुरा लाने के लिए जो राजकुमार किसी जमाने में गया था, वह भी शायद इतनी सावधानी के साथ और समझ-बूझकर न गया हो। गंगी दबे पाँव कुएँ की जगत पर चढ़ी, विजय का ऐसा अनुभव उसे पहले कभी न हुआ था। उसने रस्सी का फंदा घड़े में डाला। दायें-बायें चौकन्नी दृष्टि से देखा जैसे कोई सिपाही रात को शत्रु के किले में सुराख़ कर रहा हो। अगर इस समय वह पकड़ ली गई, तो फिर उसके लिए माफ़ी या रियायत की रत्ती-भर उम्मीद नहीं। अंत मे देवताओं को याद करके उसने कलेजा मजबूत किया और घड़ा कुएँ में डाल दिया। घड़े ने पानी में गोता लगाया, बहुत ही आहिस्ता। ज़रा भी आवाज़ न हुई। गंगी ने दो-चार हाथ जल्दी-जल्दी मारे। घड़ा कुएँ के मुँह तक आ पहुँचा। कोई बड़ा शहज़ोर पहलवान भी इतनी तेज़ी से न खींच सकता था। गंगी झुकी कि घड़े को पकड़कर जगत पर रखे कि एकाएक ठाकुर साहब का दरवाज़ा खुल गया। शेर का मुँह इससे अधिक भयानक न होगा। गंगी के हाथ से रस्सी छूट गई। रस्सी के साथ घड़ा धड़ाम से पानी में गिरा और कई क्षण तक पानी में हिलकोरे की आवाजें सुनाई देती रहीं। ठाकुर कौन है, कौन है? पुकारते हुए कुएँ की तरफ़ आ रहे थे और गंगी जगत से कूदकर भागी जा रही थी। घर पहुँचकर देखा कि जोखू लोटा मुँह से लगाए वही मैला-गंदा पानी पी रहा है। ******

  • हनुमान की खोज

    मुकेश ‘नादान’ बचपन में माँ की गोद में बैठकर उन्होंने रामायण की जो अपूर्व हृदयाकर्षक कहानी सुनी थी, वह दांपत्य जीवन के दुखमव अनुभव से व्यक्ति सईस की तिक वाणी से अचानक मलिन हो जाने पर भी कभी भी हृदय से मिट नहीं सकी, बल्कि पश्चिमी जीवन के आदर्श के संघर्ष में वह और अधिक स्पष्ट हो गई थी। खासकर रामायण के हनुमान का चरित्र उन्हें बाल्यकाल में बहुत ही आकृष्ट करता था। महावीर हनुमान का आदर्श उनके हृदय में सदैव देदीप्यमान रहता तथा रामायण-गान का समाचार पाते ही वे उसे सुनने दौड़ पड़ते थे। एक दिन वे किसी कथावाचक से रामायण की कथा सुन रहे थे। कथावाचक ने जब कहा, "हनुमान केले के वन में रहते हैं।" तब महावीर का दर्शन करने को उत्सुक धीरेश्वर उनसे पूछ बैठे, "वहाँ जाने पर क्या उनको देखा जा सकता है?" बालक के उत्सुकता भरे प्रश्न के उत्तर में कथावाचक ने उपहास करते हुए कहा, "हाँ जी, जाकर ही देख लो वीरेश्वर के घर के बगल में ही केले की एक झाड़ी थी। कथा समाप्त होने पर रात में घर लौटने के मार्ग में धीरेश्वर उसी झाड़ी में जाकर केले के पेड़ के नीचे बैठकर हनुमान के आने की प्रतीक्षा करने लगे। किंतु जब काफी देर बाद भी दर्शन नहीं हुए, तब व्यथित मन से घर लौटकर उन्होंने सबको यह बात बताई। तब बड़े-बूढ़ों ने उन्हें सांत्वना देते हुए कहा, "अरे विले, लगता है आज भगवान् के कार्य से हनुमान कहीं दूसरी जगह गए हैं, इसी से उन्हें तू देख नहीं पाया।" इससे वे बहुत आश्वस्त हुए। ******

  • गलियों में इंसानियत

    राम कुमार वर्मा नई दिल्ली की भीड़, शोर और भागती जिंदगी में एक छोटे कस्बे से आया साधारण बैंक क्लर्क निर्मल अपनी नई जिंदगी शुरू करने आया था। हाल ही में उसका तबादला दिल्ली के एक पुराने बैंक ब्रांच में हुआ था। अपने छोटे शहर की सादगी और शांति में पला-बढ़ा निर्मल, अब इस बड़े शहर की तेज रफ्तार और महंगे माहौल में खुद को ढालने की कोशिश कर रहा था। सबसे बड़ी चुनौती उसके लिए थी - रहने के लिए एक अच्छा, सस्ता और साफ कमरा ढूंढना। निर्मल ने कई एजेंटों और मकान मालिकों से बात की, लेकिन हर जगह या तो किराया बहुत ज्यादा था या कमरे की हालत बहुत खराब। कई बार तो कमरे ऐसे थे कि उनमें रहना मुश्किल था। रोजाना की भागदौड़ और निराशा के बीच निर्मल सोचता रहा, क्या सचमुच इस शहर में एक आम आदमी के लिए जीना इतना कठिन है? कई दिनों की खोज के बाद एक दिन निर्मल एक पुरानी, शांत और साफ-सुथरी गली में पहुंचा। वहां कुछ छोटे मकान थे और एक परचून की दुकान। सामने एक मध्यम आकार का मकान था, जिसकी दीवारों पर उम्र के निशान थे। निर्मल ने दरवाजे पर दस्तक दी। दरवाजा खोलने आईं राधिका - एक विधवा महिला, अपने छोटे बच्चों के साथ। उसकी आंखों में थकान थी, लेकिन चेहरे पर ईमानदारी और विनम्रता झलक रही थी। निर्मल ने पूछा, “क्या आपके पास कोई कमरा किराए पर है?” राधिका बोली, “हां, एक कमरा खाली है, आइए देख लीजिए।” कमरा साधारण था - एक खिड़की, पुराना पंखा, कोने में अलमारी। किराया था 12,000 रुपये। निर्मल ने हैरानी से पूछा, “इतना किराया?” राधिका ने हल्की मुस्कान के साथ कहा, “साहब, इससे कम नहीं ले सकती। पिछला किराएदार भी यही देता था। अगर आपको ठीक न लगे तो आप कहीं और देख सकते हैं।” निर्मल बाहर आकर सोचने लगा, शायद यह उसकी मजबूरी का हिस्सा है। पास की दुकान पर उसने राधिका के बारे में पूछा। दुकानदार ने बताया, “राधिका पिछले दो साल से अपने बच्चों को पालने के लिए मकान किराए पर देती है। कई लोग कमरे देखने आए, लेकिन किराया सुनकर चले गए।” निर्मल के दिल में राधिका के लिए सहानुभूति जाग गई। उसने तय किया कि वह उसे परेशान नहीं करेगा। वह तुरंत लौट आया और बोला, “मैंने कई जगह देखी, लेकिन सच कहूं तो यह कमरा सबसे अच्छा लगा। किराया भी ठीक है, मैं यहीं रहूंगा।” राधिका की आंखों में खुशी की चमक आ गई, उसकी जुबान शांत थी, मगर आंखों से आंसू बहने लगे। उसने कहा, “भगवान आपको सुखी रखे।” इस छोटे से पल ने दोनों के जीवन में एक अनकहा रिश्ता बना दिया। अगले दिन राधिका ने कहा, “कमरे की सफाई और कपड़े धोने का काम मैं खुद कर दूंगी, कोई पैसे नहीं चाहिए।” निर्मल ने नरमी से कहा, “एक शर्त है, मैं आपको इसके लिए भुगतान करूंगा।” राधिका मुस्कुराई, “भगवान आपको सफलता दे।” निर्मल हर रोज दफ्तर जाता, मेहनत करता। उसकी लगन और नम्रता के कारण ऑफिस में उसकी इज्जत बढ़ने लगी। कुछ ही महीनों में निर्मल को एडवांस मैनेजर की पोस्ट मिल गई। उस दिन उसने राधिका के बच्चों के लिए कपड़े और मिठाइयां खरीदीं। ऑफिस में किसी ने पूछा, “इतनी अच्छी पोस्ट और वेतन के बाद भी वही पुराना कमरा क्यों?” निर्मल ने मुस्कुरा कर कहा, “वहां का माहौल मुझे शांति देता है, राधिका और उसके बच्चे अब मेरे परिवार जैसे हैं।” रात को जब वह कमरे में लौटता, बच्चे उसके पास बैठकर किताबें खोलते, सवाल पूछते। इन लम्हों ने उसके दिल को छू लिया। समय बीतता गया, निर्मल ने देखा कि राधिका अपने दुख छुपाकर अपने बच्चों के लिए जीती थी। उसने कभी गलत रास्ता नहीं अपनाया। उसकी मेहनत, ईमानदारी और विनम्रता ने निर्मल के दिल में उसके लिए गहरा सम्मान पैदा कर दिया। धीरे-धीरे निर्मल ने फैसला किया कि वह राधिका से शादी करेगा। यह निर्णय आसान नहीं था - माता-पिता और समाज की सोच का डर था। उसने सबसे पहले अपने माता-पिता से बात की। पहले तो पिता ने चिंता जताई, मां ने भी भावनात्मक रूप से स्वीकारने में समय लिया। लेकिन निर्मल ने उन्हें राधिका के चरित्र, त्याग और संघर्ष के बारे में विस्तार से समझाया। धीरे-धीरे माता-पिता ने निर्मल के निर्णय को सही मानते हुए समर्थन देना शुरू किया। उन्हें समझ आ गया कि सच्चा चरित्र ही सबसे बड़ा धन है। निर्मल ने राधिका को बताया कि माता-पिता अब मान गए हैं और वह पूरी तरह उसके साथ जीवन बिताने को तैयार है। राधिका ने थोड़ी हिचकिचाहट के बाद उसकी सच्चाई और समर्पण देखकर सहमति दे दी। दोनों ने सादगी से विवाह किया। शादी में कोई बड़ा समारोह नहीं था, सिर्फ नजदीकी रिश्तेदार और शुभकामनाएं। लेकिन उनके जीवन में अब खुशी, हंसी, प्यार और शांति थी। निर्मल और राधिका ने बच्चों के साथ जीवन को ऐसे जिया जैसे यह नया अध्याय हो। निर्मल बच्चों के साथ खेलता, पढ़ाई में मदद करता, उनकी छोटी-छोटी खुशियों में शामिल होता और पिता की भूमिका निभाता। राधिका अक्सर चुपचाप उनके प्रयासों और स्नेह को देखती और सोचती, काश उसका स्वर्गीय पति यह दृश्य देख सकता। उसकी आंखों में आंसू और चेहरे पर मुस्कान दोनों होते। समाज की आलोचना और कठिनाइयां कभी उनके जीवन को प्रभावित नहीं कर पाईं। उनके दिलों में विश्वास और प्यार इतना मजबूत था कि वह हर चुनौती का सामना कर सकते थे। निर्मल ने महसूस किया कि सही निर्णय लेना कठिन होता है, लेकिन वही निर्णय असली खुशी और संतोष देता है। उनका घर अब हंसी, प्यार और आत्मीयता से भरा था। राधिका और बच्चों के साथ हर दिन नए अनुभव, नए सबक और नए रिश्तों की गहराई लेकर आता था। निर्मल ने समझ लिया कि दौलत, पद और सम्मान जीवन की अंतिम सफलता नहीं है, बल्कि इंसानियत, सच्चाई, प्यार और रिश्तों की अहमियत सबसे ऊपर है। उनका जीवन एक उदाहरण बन गया कि कठिन परिस्थितियों, सामाजिक दबाव और आर्थिक चुनौतियों के बावजूद सही निर्णय, सच्चा प्यार और इंसानियत इंसान को पूरी संतुष्टि और सच्ची खुशी दे सकते हैं। निर्मल और राधिका का संबंध सिर्फ पति-पत्नी का नहीं, एक सच्चे परिवार और पारिवारिक मूल्यों का प्रतीक बन गया। बच्चे अब अपने पिता और मां दोनों में प्यार, सुरक्षा और आदर्श देख रहे थे। निर्मल ने महसूस किया कि जीवन का असली सुख वही है, जहां इंसान अपने दिल की सुनता है, सही निर्णय करता है और दूसरों के लिए ईमानदारी और स्नेह रखता है। धीरे-धीरे उनके घर में खुशियों की गूंज बढ़ती गई। राधिका ने अपने बच्चों और निर्मल के साथ हर पल का आनंद लिया। निर्मल ने उनके साथ जीवन बिताने के हर क्षण को संजोया। ******

  • चाँद...

    किरण मोरे   क्या कहूँ तेरी खूबसूरती के बारे में, चाँद... किसी शर्माती हसीना की तरह... तू पेड़ों में छिप जाती है, पेड़ों को आँचल बनाकर... नज़रों से हट जाती है... क्या कहूँ तेरी खूबसूरती के बारे में... जितना कहूँ, सब फीका पड़ जाता है... किसी ने बहुत खूब कहा है... मत ढँको मेरे चाँद को... इन ईंट की दीवारों से... वो भूल न जाए कहीं खुलकर जीना... फिर मैं क्यों बाँधूँ तुझे... अपनी आँखों के धागों से...? क्या कहूँ मैं तेरी खूबसूरती के बारे में, चाँद... तू ही बता... जो कहूँ... सब फीका पड़ जाता है.. *******

  • बेचारे पतिदेव

    श्री प्रसाद चौरसिया सोचा था—आज तो रविवार है। न जल्दी उठना, न ऑफिस की भागदौड़। आराम से बिस्तर में पड़े-पड़े “बेड टी” का आनंद लूंगा… लेकिन आदत भी अजीब चीज़ है। आँख खुली तो घड़ी में छह बजे थे। मीता गहरी नींद में थी। मन हुआ उसे पास खींच लूँ… फिर सोचा—रोज़ तो बेचारी सबसे पहले उठ जाती है। आज सोने देता हूँ। थोड़ी देर बाद फिर नींद आ गई। जब दोबारा आँख खुली तो घड़ी आठ बजा चुकी थी। मीता अब भी करवट बदले सोई थी। मैंने हिलाया—“मीता… उठो यार… चाय पिला दो…” वो हल्के से कुनमुनाई। “आज नहीं उठ पाऊँगी… पूरे बदन में बहुत दर्द है… सिर भी फटा जा रहा है… आप तो आराम से सो रहे थे, मैं सारी रात नहीं सो पाई…” मैं घबरा गया। “अरे! दवाई ली?” “हाँ… बस थोड़ी देर आराम कर लूँ… प्लीज़ आज चाय आप बना लो…” मन तो बिल्कुल नहीं था। सोचा था—आज छुट्टी का मज़ा लूंगा। पर मीता की हालत देखकर चुपचाप उठ गया। चाय चढ़ाई… फ्रेश हुआ… दो कप लेकर कमरे में पहुँचा। मीता मुश्किल से उठकर बैठी। “अब कैसी हो?” “वैसी ही…” थोड़ी देर बाद फिर आवाज़ आई— “सुनिए…” “हाँ?” “आज सुमित्रा नहीं आएगी… आप थोड़ी सफ़ाई कर लीजिए न…” मैंने माथा पकड़ा। रविवार + छुट्टी + बाई गायब + बीमार पत्नी = मजदूरी पक्की। लेकिन मीता की आवाज़ में सचमुच तकलीफ थी। तुम फिक्र मत करो… मैं कर लूंगा सब।” उस दिन पहली बार एहसास हुआ कि माँ ने बचपन में जो झाड़ू-पोंछा, बर्तन, सब्ज़ी काटना सिखाया था—वो आज काम आने वाला है। झाड़ू लगाया। सिंक के बर्तन साफ़ किए। ब्रेड-बटर बनाया। फिर आवाज़ आई—“मेरे कपड़े बाथरूम में रख दो… नहा लूँ तो शायद अच्छा लगे…” मैंने सहारा देकर बाथरूम तक पहुँचाया। खुद अखबार लेकर बैठा ही था कि फिर आवाज़— “जरा सहारा देना…” डॉक्टर ले चलने की बात की—मना कर दिया। “कुछ देर में ठीक हो जाऊँगी…” दोपहर के खाने की बारी आई। मूड बिल्कुल नहीं था। फ्रिज खोला—मटर, गोभी, गाजर। सोचा पुलाव बना लूँ। पर मीता बोली— “पुलाव नहीं… मैं रोटी बना लूँगी…” मैं झुंझला गया—“तुमसे उठा नहीं जा रहा, रोटी कैसे बनाओगी?” आख़िरकार आलू-गोभी-मटर की सब्ज़ी और पराँठे बनाए। दही में तड़का लगाया—क्योंकि मीता को पसंद है। खाना खिलाया। बर्तन भी धो दिए। दोपहर दो बज गए। मैं थककर सो गया। शाम को दोस्त विजय का फोन आया— “चल पार्टी करते हैं!” “नहीं यार, मीता की तबीयत खराब है…” वो आने को तैयार। मैंने मीता की तरफ देखा—उसने इशारे से मना कर दिया। सच कहूँ तो मुझे भी राहत मिली। शाम की चाय बनाई। फिर रात के खाने की तैयारी की सोच रहा था कि मीता बोली— “दवाई खत्म हो गई… ले आओ… और कल की सब्ज़ी भी…” मैं बाजार निकल गया। दवाई की दुकान पर विजय और ज्योति मिल गए। “क्या हुआ भाभी को?” “आज उठ ही नहीं पाई…” वो दोनों साथ चल पड़े। घर पहुँचे—तो अंधेरा। जबकि मैं सारी लाइटें जला कर गया था। दिल धक-धक करने लगा। दरवाज़ा खोला— “मीता… मीता…” और फिर… मैं ठिठक गया। मेरे सामने वही रूप खड़ा था, जिससे मैं पहली बार प्यार में पड़ा था। हल्की गुलाबी साड़ी। खुले घुंघराले बाल। माथे पर बड़ी सी बिंदी। चेहरे पर शरारती मुस्कान। विजय और ज्योति पीछे खड़े थे—रहस्यमय मुस्कान लिए। मीता खिलखिलाई—“क्यों विजय भाई? हार गए न शर्त? आपके दोस्त से आज मजदूरी करवा ही ली… मजदूर दिवस पर!” मैं स्तब्ध। विजय ने राज खोला—“यार अमित, हमने शर्त लगाई थी कि आज भाभी तुझसे घर का सारा काम करवा दें तो मानेंगे। जबसे शादी हुई है तू पूरा आलसी हो गया है!” “सुमित्रा को छुट्टी दी गई थी। प्लान पूरा था। और तू… पूरे दिन परफेक्ट मजदूर बना रहा!” तीनों हँस पड़े। मैं पहले तो झेंपा… फिर खुद भी हँस पड़ा। सच में… आज पहली बार समझ आया— घर का काम “काम” नहीं, जिम्मेदारी है। और मीता रोज़ ये सब बिना शिकायत करती है। खाना बाहर से आया था। हम चारों ने साथ बैठकर खाया। जाते-जाते विजय बोला—“और हाँ… रात के बर्तन मत भूलना!” मैं हँस पड़ा। दरवाज़ा बंद किया। मीता की तरफ बढ़ा। “क्यों मेमसाब… मजदूरी तो करवा ली आपने… अब मजदूरी आप देंगी या मैं खुद ले लूँ?” मीता शरमाकर मेरी बाँहों में सिमट गई। उस रात मुझे समझ आया—पति बेचारा नहीं होता… बस कभी-कभी उसे याद दिलाना पड़ता है कि घर सिर्फ पत्नी की जिम्मेदारी नहीं, साझेदारी है। और हाँ— मजदूर दिवस की असली बधाई उसी को मिलनी चाहिए, जो रोज़ बिना वेतन, बिना छुट्टी, बिना शिकायत घर को “घर” बनाए रखता है। ******

  • लड़की हूँ,

    आँचल सक्सैना   वो गुलशन जो, खाद-धूप को, पाकर भी, गुलज़ार नहीं हूँ मैं वो सपना, जो आँखों में, आकर भी साकार नहीं हूँ जो देखा, जो जाना, जो महसूस किया, लफ़्ज़ों में ढाला मैने अपनी, बात कही बस, मैं कोई, फ़नकार नहीं हूँ हुस्न, मौसिकी, रंग, नज़ारे, सब कुछ ही संसार हैं उसका जो लड़का संसार है मेरा, उसका मैं संसार नहीं हूँ बीच हमारे, सात समंदर, कैसे होगा, मिलना मुमकिन वो भी तो इस पार नहीं है, मैं भी तो उस पार नहीं हूँ गिरना और बदल जाना, या बेबुनियादी बातें करना ये सब मेरी फितरत कब हैं, लड़की हूँ, सरकार नहीं हूँ ******

  • अवीर गुलाल की होली

    बद्री प्रसाद वर्मा अनजान चंपक वन में होली मनाने की तैयारी में सभी जानवर जी जान से जुटे हुए थे। क्या छोटा क्या बड़ा सभी जानवर अपनी-अपनी खरीदारी में लगे हुए थे। चंपक वन का प्रधान मंत्री टनटन हाथी ने सारे चंपक वन में मुनादी करवा दी कि इस साल हमारे घर आ कर सभी जानवरों को होली मनानी होगी। होली पर सभी को बढ़िया बढ़िया पकवान खाने को मिलेगा। तथा बेहतरीन होली खेलने वाले जानवर को हमारे तरफ से पुरस्कार भी दिया जाएगा। मुनादी सुन कर सारे जानवर बहुत खुश हुए। होली के दिन प्रधान मंत्री टनटन हाथी के घर जानवरों का आना शुरू हो गया। सबसे पहले मिन्टू हिरन, बिट्रटू जेबरा और ओम ओम भालू एक साथ पधारे। फिर बारी-बारी से छोटू खरगोश, चिन्टू गैड़ा, बंटू बंदर, विकी सियार, चुन्नू चूहा, रिंकी गिलहरी और लम्बू जीराफ आकर जमा हो गए। प्रधान मंत्री टनटन हाथी का दोस्त मिन्टू हिरन पूछ पड़ा यार टनटन तुम्हारे इस होली प्रोग्राम में दारा शेर, बीरू बाघ, चंदू चीता और यीशु गैंड़ा अभी तक क्यों नही आए? हमें क्या पता क्यों नही आए मगर बुलावा तो हमने सबको दिया था। क्या पता वे सब कहीं और गए हो और देर से आए तब तक आप सब जानवर मिल कर भोजन कीजिए प्रधान मंत्री टनटन हाथी कह कर चुप हो गए। कुर्सी पर बैठे सभी जानवरों के आगे लगे मेज पर पकवानों से भरी थाली मोनू वनमानुष द्वारा रखा जाने लगा। सारे जानवर अपनी-अपनी थाली में गोझियां, मालपुआ, खड़पुडी, गुलगुला, रसगुल्लापुड़ी, पोलाव, मटर-पनीर तथा सलाद देख कर खुशी से फुले नही समाए। खाने की थाली अपनी ओर खिंच कर सभी जानवर खाना खाने लगे। तभी एक चमचमाती गाड़ी से दारा शेर, बीरू बाघ, चंदू चीता और यीशु गैड़ा वहां आए और गाड़ी से बाहर निकल कर खाने की कुर्सी पर जा बैठे। तभी प्रधान मंत्री टनटन हाथी सबसे पूछ पड़ा आप सब को आने में इतना देर क्यों हो गई? इतना सुनना था कि दारा शेर बोल पडा हम चारों मित्रों को होली मनाने के लिए नंदन वन के राजा पहलवान शेर का बुलावा आ जाने से हम सब वहीं होली खेलने चले गए थे। इसलिए यहां आने में देर हो गई। मोनू वनमानुष ने चारो मित्रों के सामने पकवानों से भरी थाली खाने के लिए रख दिए। सभी मित्र एक साथ खाना खाने लगे। खाना खाने के बाद होली खेलने के लिए अपनी-अपनी पिचकारी और रंग अपने-अपने हाथों में उठा लिया। तभी दारा शेर बोल उठा हम सब नंदन वन से अवीर गुलाल की होली खेल कर आ रहे हैं, इसलिए हम चाहते हैं यहां पर भी अवीर गुलाल की होली खेली जाए। ताकी हम जहरीले केमिकल वाले रंगों से बच सकें। हमारा सुझाव सबको पसंद है तो हां या ना में जवाब दे। दारा शेर की बात सुन कर सारे जानवर एक साथ बोल पड़े हम सब अवीर गुलाल की होली खेलना चाहते है। इतना सुनना था कि दारा शेर, टनटन हाथी और सारे जानवर एक दूसरे के माथे और गाल पर अवीर गुलाल लगा कर खूब मजे से होली मनाने लगे। होली समाप्त होते ही प्रधान मंत्री टनटन हाथी ने घोषण की इस साल दारा शेर ने हम सब को अवीर गुलाल की होली खेलने की बात बता कर बहुत नेक काम किया है। और हम सब को जहरीले रंगों से बचाया है इसलिए मैं इस साल का पुरस्कार दारा शेर को देने का ऐलान करता हूं। अगले साल से हम सब सिर्फ अवीर गुलाल से ही होली खेलेंगे। दारा शेर प्रधान मंत्री टनटन शेर की ओर से चांदी का सिल्ड और पांच हजार रूपया नगद पा कर खुशी से फुला नही समाया। पुरस्कार पाने की खुशी में सभी जानवर दारा शेर को बधाई दे कर अपने घर जाने लगे। ******

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