top of page

Search Results

921 results found with an empty search

  • डोर

    नीना सिन्हा “नंदिता! प्रतियोगी परीक्षाओं के फॉर्म भरे कि नहीं? फॉर्म पास है या ले आऊँ?" “ग्रेजुएशन के बाद से ही किसी बड़े व्यवसाई घराने में ब्याह हो जाए, बस इतना ही ख्वाब है मेरे माता पिता का। मैं किसी को पसंद न आई, तभी पढ़ाई पूरी हो पाई”, उदास मुस्कान आकर ठहर गई। “ऐसा न कहिए, नंदिता! आप कॉलेज की शान हैं, एक खूबसूरत, व्यवहारिक, टॉपर लड़की का सपना सिर्फ किसी सेठ जी की बहू बनना कैसे हो सकता है?” नाटकीय अंदाज़ में उसने पूछा। “कॉलेज टॉपर तुम हो, मैं तो सातवीं-आठवीं पोजीशन में अटककर आगे की कक्षा में प्रमोट कर दी जाती हूँ, बस”, प्यारे से मुखड़े पर हँसी खिल उठी। पर क्षण भर बाद ही उदासी ने ग्रस लिया, "मेरी शादी के लिए किए जा रहे बारं-बार प्रयास और शारीरिक दोष के कारण अस्वीकृति। माता-पिता के टूटते सपनों का बोझ मेरे कंधों पर है।" “वैलेंटाइन वीक चल रहा है। अपना रहस्य मैं भी उजागर कर दूँ? प्यारी सी दोस्त से तुम कब पसंद बन गई, जान ही नहीं पाया। निम्न मध्यवर्गीय पृष्ठभूनि वाला मैं बेरोजगार बंदा, हाल-ए-दिल सुनाऊँ तो सुनाऊँ कैसे?" खुशगवारी की कूची फिर गई, “रिश्तों की तलाश शुरू हो चुकी है, तुमने कभी बताया नहीं! भला हो तुम्हें रिजेक्ट करने वाले लड़कों का। तुम्हारी डोली उठती तो मैं देवदास पार्ट टू बन जाता”, नाटकीय गुस्से में वह बोला। "प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी से भाषा पर अधिकार हो गया है, तभी इतनी बातें बनाते हो। इतने वर्षों में इतने वेलेंटाइन वीक आकर निकल गए, एक भी वैलेंटाइन गिफ्ट दिया होता तब तो मैं इशारा समझती।" “खाली जेब वालों के लिए कैसा वैलेंटाइन वीक? वैसे भी बाजारवाद जानबूझकर इस बात को बढ़ावा देता है ताकि लोगों की जेब ढीली की जा सके।” “तुमसे बहस में कौन जीता है। गिफ्ट को मारो गोली, एक गुलाब ही दे दिया होता।” “पर्यावरण प्रेमी हूँ भाई। गुलाबों को डंडी से अलग कर मुरझाने को विवश कर देना बुरा लगता है। प्यार की मुहर के रूप मम्मी की अँगूठी लाकर पहना दूँ? शायद विश्वास हो जाए, ‘हम बने, तुम बने, एक दूजे के लिए।’ मैं इंतजार में था बालसखा कि हम में से किसी की भी नौकरी लगे, तब मैं दोनों के माँ-बाप से शादी की अनुमति माँगूँ। आपके खूबसूरत नैनों में अपने लिए पसंद आँक चुका था, पर आपने भी अब तक कुछ नहीं कहा, नंदिता!” “कैसे कहती मयंक? मेरा पोलियोग्रस्त एक पैर, तुम इतने हैंडसम और बैच टॉपर! औरों से न सुनना मंजूर था, तुम्हारी न सुनने के बाद धड़कनें रुक न जातीं?" “पोलियोग्रस्त लड़की को बहू बनाने को आंटी राजी न हुईं तो?” नंदिता को चिंता हुई। “छोड़ो! कौन सा उन्हें बहू को धावक बनाना है। दिनचर्या में कहाँ कोई व्यवधान आता है? डर आपके माता-पिता के मना कर देने का है”, मयंक की जिंदादिली कायम थी। नंदिता की आँखों में खूबसूरत सपने तैरने लगे, मयंक ही था उसका असली वैलेंटाइन, जो वर्षों से उसका साथ देता, उसकी परवाह करता आ रहा था। गुलाब, चॉकलेट, टेड्डी बियर तथा स्पर्श के बिना ही जीवन में उसने प्यार के सुनहरे रंग बिखेर दिए थे। ********

  • ईदगाह

    प्रेमचंद रमज़ान के पूरे तीस रोज़ों के बाद ईद आई है। कितना मनोहर, कितना सुहावना प्रभात है। वृक्षों पर अजीब हरियाली है, खेतों में कुछ अजीब रौनक़ है, आसमान पर कुछ अजीब लालिमा है। आज का सूर्य देखो, कितना प्यारा, कितना शीतल है, यानी संसार को ईद की बधाई दे रहा है। गाँव में कितनी हलचल है। ईदगाह जाने की तैयारियाँ हो रही हैं। किसी के कुरते में बटन नहीं है, पड़ोस के घर में सुई-तागा लेने दौड़ा जा रहा है। किसी के जूते कड़े हो गए हैं, उनमें तेल डालने के लिए तेली के घर पर भागा जाता है। जल्दी-जल्दी बैलों को सानी-पानी दे दें। ईदगाह से लौटते-लौटते दुपहर हो जाएगी। तीन कोस का पैदल रास्ता, फिर सैकड़ों आदमियों से मिलना-भेंटना। दुपहर के पहले लौटना असंभव है। लड़के सबसे ज़्यादा प्रसन्न हैं। किसी ने एक रोज़ा रखा है, वह भी दुपहर तक, किसी ने वह भी नहीं, लेकिन ईदगाह जाने की ख़ुशी उनके हिस्से की चीज़ है। रोज़े बड़े-बूढ़ों के लिए होंगे। इनके लिए तो ईद है। रोज़ ईद का नाम रटते थे, आज वह आ गई। अब जल्दी पड़ी है कि लोग ईदगाह क्यों नहीं चलते। इन्हें गृहस्थी की चिंताओं से क्या प्रयोजन! सेवैयों के लिए दूध ओर शक्कर घर में है या नहीं, इनकी बला से, ये तो सेवैयाँ खाएँगे। वह क्या जानें कि अब्बाजान क्यों बदहवास चौधरी क़ायम अली के घर दौड़े जा रहे हैं। उन्हें क्या ख़बर कि चौधरी आज आँखें बदल लें, तो यह सारी ईद मुहर्रम हो जाए। उनकी अपनी जेबों में  तो कुबेर का धन भरा हुआ है। बार-बार जेब से अपना ख़ज़ाना निकालकर गिनते हैं और ख़ुश होकर फिर रख लेते हैं। महमूद गिनता है, एक-दो, दस-बारह, उसके पास बारह पैसे हैं। मोहसिन के पास एक, दो, तीन, आठ, नौ, पंद्रह पैसे हैं। इन्हीं अनगिनती पैसों में अनगिनती चीज़ें लाएँगें—खिलौने, मिठाइयाँ, बिगुल, गेंद और जाने क्या-क्या। और सबसे ज़ियाद प्रसन्न है हामिद। वह चार-पाँच साल का ग़रीब-सूरत, दुबला-पतला लड़का, जिसका बाप गत वर्ष हैज़े की भेंट हो गया और माँ न जाने क्यों पीली होती-होती एक दिन मर गई। किसी को पता ना चला, क्या बीमारी है। कहती तो कौन सुनने वाला था। दिल पर जो कुछ बीतती थी, वह दिल में ही सहती थी ओर जब न सहा गया तो संसार से विदा हो गई। अब हामिद अपनी बूढ़ी दादी अमीना की गोद में सोता है और उतना ही प्रसन्न है। उसके अब्बाजान रूपए कमाने गए हैं। बहुत-सी थैलियाँ लेकर आएँगे। अम्मीजान अल्लाह मियाँ के घर से उसके लिए बड़ी अच्छी-अच्छी चीज़ें लाने गई हैं; इसलिए हामिद प्रसन्न है। आशा तो बड़ी चीज़ है, और फिर बच्चों की आशा! उनकी कल्पना तो राई का पर्वत बना लेती है। हामिद के पाँव में जूते नहीं हैं, सिर पर एक पुरानी-धुरानी टोपी है, जिसका गोटा काला पड़ गया है, फिर भी वह प्रसन्न है। जब उसके अब्बाजान थैलियाँ और अम्मीजान नियामतें लेकर आएँगी, तो वह दिल के अरमान निकाल लेगा। तब देखेगा महमूद, मोहसिन, नूरे और सम्मी कहाँ से उतने पैसे निकालेंगे। अभागिन अमीना अपनी कोठरी में बैठी रो रही है। आज ईद का दिन, उसके घर में दाना नहीं! आज आबिद होता, तो क्या इसी तरह ईद आती ओर चली जाती! इस अंधकार और निराशा में वह डूबी जा रही है। किसने बुलाया था इस निगोड़ी ईद को? इस घर में उसका काम नहीं, लेकिन हामिद! उसे किसी के मरने-जीने से क्या मतलब? उसके अंदर प्रकाश है, बाहर आशा। विपत्ति अपना सारा दलबल लेकर आए, हामिद की आनंद भरी चितवन उसका विध्वंस कर देगी। हामिद भीतर जाकर दादी से कहता है—तुम डरना नहीं अम्माँ, मैं सबसे पहले आऊँगा। बिल्कुल न डरना। अमीना का दिल कचोट रहा है। गाँव के बच्चे अपने-अपने बाप के साथ जा रहे हैं। हामिद का बाप अमीना के सिवा और कौन है! उसे कैसे अकेले मेले जाने दे? उस भीड़-भाड़ से बच्चा कहीं खो जाए तो क्या हो? नहीं, अमीना उसे यूँ न जाने देगी। नन्हीं-सी जान! तीन कोस चलेगा कैसे! पैर में छाले पड़ जाएँगे। जूते भी तो नहीं हैं। वह थोड़ी-थोड़ी दूर पर उसे गोद में ले लेगी; लेकिन यहाँ सेवैयाँ कौन पकाएगा? पैसे होते तो लौटते-लौटते सब सामग्री जमा करके चटपट बना लेती। यहाँ तो घंटों चीज़ें जमा करते लगेंगे। माँगे ही का तो भरोसा ठहरा। उस दिन फ़हीमन के कपड़े सिले थे। आठ आने पैसे मिले थे। उस अठन्नी को ईमान की तरह बचाती चली आती थी इसी ईद के लिए लेकिन कल ग्वालन सिर पर सवार हो गई तो क्या करती! हामिद के लिए कुछ नहीं है, तो दो पैसे का दूध तो चाहिए ही। अब तो कुल दो आने पैसे बच रहे हैं। तीन पैसे हामिद की जेब में, पाँच अमीना के बटवे में। यही तो बिसात है और ईद का त्यौहार, अल्लाह ही बेड़ा पार लगाए। धोबन और नाइन ओर मेहतरानी और चूड़ीहारिन सभी तो आएँगी। सभी को सेवैयाँ चाहिए और थोड़ा किसी को आँखों नहीं लगता। किस-किस सें मुँह चुराएगी? और मुँह क्यों चुराए? साल भर का त्यौहार है। ज़िंदगी ख़ैरियत से रहे, उनकी तक़दीर भी तो उसी के साथ है। बच्चे को ख़ुदा सलामत रखे, दिन भी कट जाएँगे। गाँव से मेला चला। और बच्चों के साथ हामिद भी जा रहा था। कभी सबके सब दौड़कर आगे निकल जाते। फिर किसी पेड़ के नीचे खड़े होकर साथ वालों का इंतज़ार करते। यह लोग क्यों इतना धीरे-धीरे चल रहे हैं! हामिद के पैरों में तो जैसे पर लग गए हैं। वह कभी थक सकता है! शहर का दामन आ गया। सड़क के दोनों ओर अमीरों के बग़ीचे हैं। पक्की चारदीवारी बनी हुई है। पेड़ो में आम और लीचियाँ लगी हुई हैं। कभी-कभी कोई लड़का कंकड़ी उठाकर आम पर निशान लगाता है। माली अंदर से गाली देता हुआ निकलता है। लड़के वहाँ से एक फर्लांग पर हैं। ख़ूब हँस रहे हैं। माली को कैसा उल्लू बनाया है। बड़ी-बड़ी इमारतें आने लगीं। यह अदालत है, यह कॉलेज है, यह क्लब-घर है! इतने बड़े कॉलेज में कितने लड़के पढ़ते होंगे? सब लड़के नहीं हैं जी! बड़े-बड़े आदमी हैं, सच! उनकी बड़ी-बड़ी मूँछे हैं। इतने बड़े हो गए, अभी तक पढ़ने जाते हैं। न जाने कब तक पढ़ेंगे और क्या करेंगे इतना पढ़कर! हामिद के मदरसे में दो-तीन बड़े-बड़े लड़के हैं, बिल्कुल तीन कौड़ी के। रोज़ मार खाते हैं, काम से जी चुराने वाले। इस जगह भी उसी तरह के लोग होंगे ओर क्या। क्लब-घर में जादू होता है। सुना है, यहाँ मुर्दों की खोपड़ियाँ दौड़ती हैं। और बड़े-बड़े तमाशे होते हैं, पर किसी को अंदर नहीं जाने देते। और वहाँ शाम को साहब लोग खेलते हैं। बड़े-बड़े आदमी खेलते हैं, मूँछों दाढ़ीवाले। और मेमें भी खेलती हैं, सच! हमारी अम्माँ को वह दे दो, क्या नाम है, बैट, तो उसे पकड़ ही न सकें। घुमाते ही लुढ़क जाएँ। महमूद ने कहा—हमारी अम्मीजान का तो हाथ काँपने लगे, अल्ला क़सम। मोहसिन बोला—चलो, मनों आटा पीस डालती हैं। ज़रा-सा बैट पकड़ लेंगी, तो हाथ काँपने लगेंगे? सैकड़ों घड़े पानी रोज़ निकालती हैं। पाँच घड़े तो तेरी भैंस पी जाती है। किसी मेम को एक घड़ा पानी भरना पड़े, तो आँखों तले अँधेरा आ जाए।महमूद—लेकिन दौड़ती तो नहीं, उछल-कूद तो नहीं सकतीं। मोहसिन—हाँ, उछल-कूद तो नहीं सकतीं, लेकिन उस दिन मेरी गाय खुल गई थी और चौधरी के खेत में जा पड़ी थी, अम्माँ इतना तेज़ दौड़ीं कि मैं उन्हें न पा सका, सच। आगे चले। हलवाइयों की दुकानें शुरू हुईं। आज ख़ूब सजी हुई थीं। इतनी मिठाइयाँ कौन खाता है? देखो न, एक-एक दूकान पर मनों होंगी। सुना है, रात को जिन्नात आकर ख़रीद ले जाते हैं। अब्बा कहते थे कि आधी रात को एक आदमी हर दुकान पर जाता है और जितना माल बचा होता है, वह तुलवा लेता है और सचमुच के रुपए देता है, बिल्कुल ऐसे ही रुपए। हामिद को यक़ीन न आया—ऐसे रुपए जिन्नात को कहाँ से मिल जाएँगे? मोहसिन ने कहा—जिन्नात को रुपए की क्या कमी? जिस ख़ज़ाने में चाहें चले जाएँ। लोहे के दरवाज़े तक उन्हें नहीं रोक सकते जनाब, आप हैं किस फेर में! हीरे-जवाहरात तक उनके पास रहते हैं। जिससे ख़ुश हो गए, उसे टोकरों जवाहरात दे दिए। अभी यहीं बैठे हैं, पाँच मिनट में कलकत्ता पहुँच जाएँ। हामिद ने फिर पूछा—जिन्नात बहुत बड़े-बड़े होते हैं? मोहसिन—एक-एक आसमान के बराबर होता है जी। ज़मीन पर खड़ा हो जाए तो उसका सिर आसमान से जा लगे, मगर चाहे तो एक लोटे में घुस जाएँ। हामिद—लोग उन्हें कैसे ख़ुश करते होंगे? कोई मुझे यह मंतर बता दे तो एक जिन्न को ख़ुश कर लूँ। मोहसिन—अब यह तो मैं नहीं जानता, लेकिन चौधरी साहब के क़ाबू में बहुत से जिन्नात हैं। कोई चीज़ चोरी हो जाए चौधरी साहब उसका पता लगा देंगे और चोर का नाम भी बता देंगे। जुमेराती का बछवा उस दिन खो गया था। तीन दिन हैरान हुए, कहीं न मिला तब झख मारकर चौधरी के पास गए। चौधरी ने तुरंत बता दिया, मवेशीख़ाने में है और वहीं मिला। जिन्नात आकर उन्हें सारे जहान की ख़बर दे जाते हैं। अब उसकी समझ में आ गया कि चौधरी के पास क्यों इतना धन है और क्यों उनका इतना सम्मान है। आगे चले। यह पुलिस लाइन है। यहीं सब कांस्टेबल क़वायद करते हैं। रैटन! फाय फो! रात को बेचारे घूम-घूमकर पहरा देते हैं, नहीं चोरियाँ हो जाए। मोहसिन ने प्रतिवाद किया—यह कानिसटिबिल पहरा देते हैं! तभी तुम बहुत जानते हो अजी हज़रत, यह चोरी कराते हैं। शहर के जितने चोर-डाकू हैं, सब इनसे मिले रहते हैं। रात को ये लोग चोरों से तो कहते हैं, चोरी करो और आप दूसरे मुहल्ले में जाकर 'जागते रहो! जागते रहो!' पुकारते हैं। जभी इन लोगों के पास इतने रुपए आते हैं। मेरे मामू एक थाने में कानिसटिबिल हैं। बीस रूपया महीना पाते हैं, लेकिन पचास रूपए घर भेजते हैं। अल्ला क़सम! मैंने एक बार पूछा था कि मामू, आप इतने रुपए कहाँ से पाते हैं? हँसकर कहने लगे—बेटा, अल्लाह देता है। फिर आप ही बोले—हम लोग चाहें तो एक दिन में लाखों मार लाएँ। हम तो इतना ही लेते हैं, जिसमें अपनी बदनामी न हो और नौकरी न चली जाए।हामिद ने पूछा—यह लोग चोरी करवाते हैं, तो कोई इन्हें पकड़ता नहीं? मोहसिन उसकी नादानी पर दया दिखाकर बोला—अरे पागल!, इन्हें कौन पकड़ेगा! पकड़ने वाले तो यह लोग ख़ुद हैं; लेकिन अल्लाह, इन्हें सज़ा भी ख़ूब देता है। हराम का माल हराम में जाता है। थोड़े ही दिन हुए, मामू के घर में आग लग गई। सारी लेई-पूँजी जल गई। एक बरतन तक न बचा। कई दिन पेड़ के नीचे सोए, अल्ला क़सम, पेड़ के नीचे! फिर न जाने कहाँ से एक सौ क़र्ज़ लाए तो बरतन-भाँडे आए। हामिद—एक सौ तो पचास से ज़ियादा होते हैं? 'कहाँ पचास, कहाँ एक सौ। पचास एक थैली-भर होता है। सौ तो दो थैलियों में भी न आए।’ अब बस्ती घनी होने लगी। ईदगाह जाने वालों की टोलियाँ नज़र आने लगी। एक-से-एक भड़कीले वस्त्र पहने हुए। कोई इक्के-ताँगे पर सवार, कोई मोटर पर, सभी इत्र में बसे, सभी के दिलों में उमंग। ग्रामीणों का यह छोटा-सा दल अपनी विपन्नता से बेख़बर, संतोष ओर धैर्य में मगन चला जा रहा था। बच्चों के लिए नगर की सभी चीज़ें अनोखी थीं। जिस चीज़ की ओर ताकते, ताकते ही रह जाते और पीछे से बराबर हार्न की आवाज़ होने पर भी न चेतते। हामिद तो मोटर के नीचे जाते-जाते बचा। सहसा ईदगाह नज़र आया। ऊपर इमली के घने वृक्षों की छाया है। नीचे पक्का फ़र्श है, जिस पर जाज़िम बिछा हुआ है। और रोज़ेदारों की पंक्तियाँ एक के पीछे एक न जाने कहाँ तक चली गई हैं, पक्के जगत के नीचे तक, जहाँ जाज़िम भी नहीं है। नए आने वाले आकर पीछे की क़तार में खड़े हो जाते हैं। आगे जगह नहीं है। यहाँ कोई धन और पद नहीं देखता। इस्लाम की निगाह में सब बराबर हैं। इन ग्रामीणों ने भी वज़ू किया और पिछली पंक्ति में खड़े हो गए। कितना सुंदर संचालन है, कितनी सुंदर व्यवस्था! लाखों सिर एक साथ सिजदे में झुक जाते हैं, फिर सबके सब एक साथ खड़े हो जाते हैं, एक साथ झुकते हैं, और एक साथ घुटनों के बल बैठ जाते हैं। कई बार यही क्रिया होती है, जैसे बिजली की लाखों बत्तियाँ एक साथ प्रदीप्त हों और एक साथ बुझ जाएँ, और यही क्रम चलता रहे। कितना अपूर्व दृश्य था, जिसकी सामूहिक क्रियाएँ, विस्तार और अनंतता हृदय को श्रद्धा, गर्व और आत्मानंद से भर देती थीं, मानों भ्रातृत्व का एक सूत्र इन समस्त आत्माओं को एक लड़ी में पिरोए हुए है। नमाज़ ख़त्म हो गई है। लोग आपस में गले मिल रहे हैं। मिठाई और खिलौने की दूकान पर धावा होता है। ग्रामीणों का यह दल इस विषय में बालकों से कम उत्साही नहीं है। यह देखो, हिंडोला है एक पैसा देकर चढ़ जाओ। कभी आसमान पर जाते हुए मालूम होगें, कभी ज़मीन पर गिरते हुए। यह चर्ख़ी है, लकड़ी के हाथी, घोड़े, ऊँट, छड़ों में लटके हुए हैं। एक पैसा देकर बैठ जाओ और पच्चीस चक्करों का मज़ा लो। महमूद और मोहसिन ओर नूरे और सम्मी इन घोड़ों और ऊँटों पर बैठते हैं। हामिद दूर खड़ा है। तीन ही पैसे तो उसके पास हैं। अपने कोष का एक तिहाई ज़रा-सा चक्कर खाने के लिए नहीं दे सकता। सब चर्ख़ियों से उतरते हैं। अब खिलौने लेंगे। इधर दूकानों की क़तार लगी हुई है। तरह-तरह के खिलौने हैं—सिपाही और गुजरिया, राजा और वकील, भिश्ती और धोबन और साधु। वाह! कितने सुंदर खिलौने हैं। अब बोला ही चाहते हैं। महमूद सिपाही लेता है, ख़ाकी वर्दी और लाल पगड़ीवाला, कंधे पर बंदूक़ रखे हुए; मालूम होता है, अभी क़वायद किए चला आ रहा है। मोहसिन को भिश्ती पसंद आया। कमर झुकी हुई है, ऊपर मशक रखे हुए है। मशक का मुँह एक हाथ से पकड़े हुए है। कितना प्रसन्न है। शायद कोई गीत गा रहा है। बस, मशक से पानी उड़ेलना ही चाहता है। नूरे को वकील से प्रेम है। कैसी विद्वता है उसके मुख पर! काला चोग़ा, नीचे सफ़ेद अचकन, अचकन के सामने की जेब में घड़ी, सुनहरी ज़ंजीर, एक हाथ में क़ानून का पोथा लिए हुए। मालूम होता है, अभी किसी अदालत से जिरह या बहस किए चले आ रहे हैं। यह सब दो-दो पैसे के खिलौने हैं। हामिद के पास कुल तीन पैसे हैं, इतने महँगे खिलौने वह कैसे ले? खिलौना कहीं हाथ से छूट पड़े तो चूर-चूर हो जाए, ज़रा पानी पड़े तो सारा रंग घुल जाए, ऐसे खिलौने लेकर वह क्या करेगा, किस काम के? मोहसिन कहता है—मेरा भिश्ती रोज़ पानी दे जाएगा साँझ-सबेरे। महमूद—और मेरा सिपाही घर का पहरा देगा कोई चोर आएगा, तो फ़ौरन बंदूक़ से फ़ायर कर देगा। नूरे—और मेरा वकील ख़ूब मुक़दमा लड़ेगा। सम्मी—और मेरी धोबन रोज़ कपड़े धोएगी। हामिद खिलौनों की निंदा करता है—मिट्टी ही के तो हैं, गिरें तो चकनाचूर हो जाएँ, लेकिन ललचाई हुई आँखों से खिलौनों को देख रहा है और चाहता है कि ज़रा देर के लिए उन्हें हाथ में ले सकता। उसके हाथ अनायास ही लपकते हैं; लेकिन लड़के इतने त्यागी नहीं होते हैं, विशेषकर जब अभी नया शौक़ है। हामिद ललचाता रह जाता है। खिलौने के बाद मिठाइयाँ आती हैं। किसी ने रेवड़ियाँ ली हैं, किसी ने गुलाब−जामुन किसी ने सोहन हलवा। मज़े से खा रहे हैं। हामिद उनकी बिरादरी से पृथक है। अभागे के पास तीन पैसे हैं। क्यों नहीं कुछ लेकर खाता? ललचाई आँखों से सबकी ओर देखता है। मोहसिन कहता है—हामिद रेवड़ी ले जा, कितनी ख़ुश्बूदार है! हामिद को संदेह हुआ, ये केवल क्रूर विनोद है, मोहसिन इतना उदार नहीं है, लेकिन यह जानकर भी वह उसके पास जाता है। मोहसिन दोने से एक रेवड़ी निकालकर हामिद की ओर बढ़ाता है। हामिद हाथ फैलाता है। मोहसिन रेवड़ी अपने मुँह में रख लेता है। महमूद, नूरे और सम्मी ख़ूब तालियाँ बजा-बजाकर हँसते हैं। हामिद खिसिया जाता है। मोहसिन—अच्छा, अबकी ज़रूर देंगे हामिद, अल्लाह क़सम, ले जा। हामिद—रखे रहो। क्या मेरे पास पैसे नहीं हैं? सम्मी—तीन ही पैसे तो हैं। तीन पैसे में क्या-क्या लोगे? महमूद—हमसे गुलाब-जामुन ले जाओ हामिद। मोहमिन बदमाश है। हामिद—मिठाई कौन बड़ी नेमत है। किताब में इसकी कितनी बुराइयाँ लिखी हैं। मोहसिन—लेकिन दिल में कह रहे होंगे कि मिले तो खा लें। अपने पैसे क्यों नहीं निकालते? महमूद—हम समझते हैं, इसकी चालाकी। जब हमारे सारे पैसे ख़र्च हो जाएँगे, तो हमें ललचा-ललचाकर खाएगा। मिठाइयों के बाद कुछ दूकानें लोहे की चीज़ों की, कुछ गिलट और कुछ नक़ली गहनों की। लड़कों के लिए यहाँ कोई आकर्षण न था। वे सब आगे बढ़ जाते हैं।  हामिद लोहे की दुकान पर रुक जाता है। कई चिमटे रखे हुए थे। उसे ख़याल आया, दादी के पास चिमटा नहीं है। तवे से रोटियाँ उतारती हैं, तो हाथ जल जाता है। अगर वह चिमटा ले जाकर दादी को दे दे, तो वह कितना प्रसन्न होंगी! फिर उनकी उँगलियाँ कभी न जलेंगी। घर में एक काम की चीज़ हो जाएगी। खिलौने से क्या फ़ायदा। व्यर्थ में पैसे ख़राब होते हैं। ज़रा देर ही तो ख़ुशी होती है। फिर तो खिलौने को कोई आँख उठाकर नहीं देखता। या तो घर पहुँचते-पहुँचते टूट-फूट बराबर हो जाएँगे। चिमटा कितने काम की चीज़ है। रोटियाँ तवे से उतार लो, चूल्हें में सेंक लो। कोई आग माँगने आए तो चटपट चूल्हे से आग निकालकर उसे दे दो। अम्माँ बेचारी को कहाँ फ़ुरसत है कि बाज़ार आएँ और इतने पैसे ही कहाँ मिलते हैं? रोज़ हाथ जला लेती हैं। हामिद के साथी आगे बढ़ गए हैं। सबील पर सब-के-सब शरबत पी रहे हैं। देखो, सब कितने लालची हैं! इतनी मिठाइयाँ लीं, मुझे किसी ने एक भी न दी। उस पर कहते है, मेरे साथ खेलो। मेरा यह काम करो। अब अगर किसी ने कोई काम करने को कहा, तो पूछूँगा। खाएँ मिठाइयाँ, आप मुँह सड़ेगा, फोड़े-फुंसियाँ निकलेंगी, आप ही ज़बान चटोरी हो जाएगी। तब घर से पैसे चुराएँगे और मार खाएँगे। किताब में झूठी बातें थोड़े ही लिखी हैं। मेरी ज़बान क्यों ख़राब होगी। अम्माँ चिमटा देखते ही दौड़कर मेरे हाथ से ले लेंगी और कहेंगी—मेरा बच्चा अम्माँ के लिए चिमटा लाया है। हज़ारों दुआएँ देंगी। फिर पड़ोस की औरतों को दिखाएँगी। सारे गाँव में चर्चा होने लगेगी, हामिद चिमटा लाया है। कितना अच्छा लड़का है। इन लोगों के खिलौनों पर कौन इन्हें दुआएँ देगा? बड़ों की दुआएँ सीधे अल्लाह के दरबार में पहुँचती हैं, और तुरंत सुनी जाती हैं। मेरे पास पैसे नहीं हैं। तभी तो मोहसिन और महमूद यूँ मिज़ाज दिखाते हैं। मैं भी इनसे मिज़ाज दिखाऊँगा। खेलें खिलौने और खाएँ मिठाइयाँ। मैं नहीं खेलता खिलौने, किसी का मिज़ाज क्यों सहूँ। मैं ग़रीब सही, किसी से कुछ माँगने तो नहीं जाता। आख़िर अब्बाजान कभी न कभी आएँगे। अम्माँ भी आएँगी ही। फिर इन लोगों से पूछूँगा, कितने खिलौने लोगे? एक-एक को टोकरियों खिलौने दूँ और दिखा दूँ कि दोस्तों के साथ इस तरह का सलूक किया जाता है। यह नहीं कि एक पैसे की रेवड़ियाँ लीं, तो चिढ़ा-चिढ़ाकर खाने लगे। सब-के-सब हँसेंगे कि हामिद ने चिमटा लिया है। हँसें! मेरी बला से। उसने दुकानदार से पूछा—यह चिमटा कितने का है? दुकानदार ने उसकी ओर देखा और कोई आदमी साथ न देखकर कहा—तुम्हारे काम का नहीं है जी! 'बिकाऊ है कि नहीं?' 'बिकाऊ क्यों नहीं है। और यहाँ क्यों लाद लाए हैं?' ‘तो बताते क्यों नहीं, कै पैसे का है?' 'छ: पैसे लगेंगे।' हामिद का दिल बैठ गया। 'ठीक−ठीक बताओ' 'ठीक-ठीक पाँच पैसे लगेंगे, लेना हो लो, नहीं चलते बनो।' हामिद ने कलेजा मज़बूत करके कहा—तीन पैसे लोगे? यह कहता हुआ वह आगे बढ़ गया कि दुकानदार की घुड़कियाँ न सुने। लेकिन दुकानदार ने घुड़कियाँ नहीं दी। बुलाकर चिमटा दे दिया। हामिद ने उसे इस तरह कंधे पर रखा, मानो बंदूक़ है और शान से अकड़ता हुआ संगियों के पास आया। ज़रा सुनें, सबके सब क्या-क्या आलोचनाएँ करते हैं। मोहसिन ने हँसकर कहा—यह चिमटा क्यों लाया पगले, इसे क्या करेगा? हामिद ने चिमटे को ज़मीन पर पटककर कहा—ज़रा अपना भिश्ती ज़मीन पर गिरा दो। सारी पसलियाँ चूर-चूर हो जाएँ बच्चू की।महमूद बोला—तो यह चिमटा कोई खिलौना है? हामिद—खिलौना क्यों नहीं है? अभी कंधे पर रखा, बंदूक़ हो गई। हाथ में ले लिया, फ़क़ीरों का चिमटा हो गया। चाहूँ तो इससे मजीरे का काम ले सकता हूँ। एक चिमटा जमा दूँ, तो तुम लोगों के सारे खिलौनों की जान निकल जाए। तुम्हारे खिलौने कितना ही ज़ोर लगाएँ, मेरे चिमटे का बाल भी बाँका नहीं कर सकते। मेरा बहादुर शेर है चिमटा। सम्मी ने खँजरी ली थी। प्रभावित होकर बोला—मेरी खँजरी से बदलोगे? दो आने की है। हामिद ने खँजरी की ओर उपेक्षा से देखा—मेरा चिमटा चाहे तो तुम्हारी खँजरी का पेट फाड़ डाले। बस, एक चमड़े की झिल्ली लगा दी, ढब-ढब बोलने लगी। ज़रा-सा पानी लग जाए तो ख़त्म हो जाए। मेरा बहादुर चिमटा आग में, पानी में, आँधी में, तूफ़ान में बराबर डटा खड़ा रहेगा। चिमटे ने सभी को मोहित कर लिया,  लेकिन अब पैसे किसके पास धरे हैं।  फिर मेले से दूर निकल आए हैं, नौ कब के बज गए, धूप तेज़ हो रही है। घर पहुँचने की जल्दी हो रही है। बाप से ज़िद भी करें, तो चिमटा नहीं मिल सकता। हामिद है बड़ा चालाक। इसीलिए बदमाश ने अपने पैसे बचा रखे थे। अब बालकों के दो दल हो गए हैं। मोहसिन, मह्मूद, सम्मी और नूरे एक तरफ़ हैं, हामिद अकेला दूसरी तरफ़। शास्त्रार्थ हो रहा है। सम्मी तो विधर्मी हो गया। दूसरे पक्ष से जा मिला; लेकिन मोहसिन, महमूद और नूरे भी हामिद से एक-एक, दो-दो साल बड़े होने पर भी हामिद के आघातों से आतंकित हो उठे हैं। उसके पास न्याय का बल है और नीति की शक्ति। एक ओर मिट्टी है, दूसरी ओर लोहा, जो इस वक़्त अपने को फ़ौलाद कह रहा है। वह अजेय है, घातक है। अगर कोई शेर आ जाए तो मियाँ भिश्ती के छक्के छूट जाएँ, मियाँ सिपाही मिट्टी की बंदूक़ छोड़कर भागें, वकील साहब की नानी मर जाए, चोग़े में मुँह छिपाकर ज़मीन पर लेट जाएँ। मगर यह चिमटा, यह बहादुर, यह रूस्तम−ए−हिंद लपककर शेर की गरदन पर सवार हो जाएगा और उसकी आँखें निकाल लेगा। मोहसिन ने एड़ी-चोटी का ज़ोर लगाकर कहा—अच्छा, पानी तो नहीं भर सकता। हामिद ने चिमटे को सीधा खड़ा करके कहा—भिश्ती को एक डाँट बताएगा तो दौड़ा हुआ पानी लाकर उसके द्वार पर छिड़कने लगेगा। मोहसिन परास्त हो गया; पर महमूद ने कुमुक पहुँचाई—अगर बच्चा पकड़ जाएँ तो अदालत में बँधे-बँधे फिरेंगे। तब तो वकील साहब के पैरों पड़ेंगे। हामिद इस प्रबल तर्क का जवाब न दे सका। उसने पूछा—हमें पकड़ने कौन आएगा? नूरे ने अकड़कर कहा—यह सिपाही बंदूक़वाला। हामिद ने मुँह चिढ़ाकर कहा—यह बेचारे हम बहादुर रूस्तम−ए−हिंद को पकड़ेंगे! अच्छा लाओ, अभी ज़रा कुश्ती हो जाए। इसकी सूरत देखकर दूर से भागेंगे। पकड़ेंगे क्या बेचारे! मोहसिन को एक नई चोट सूझ गई—तुम्हारे चिमटे का मुँह रोज़ आग में जलेगा। उसने समझा था कि हामिद लाजवाब हो जाएगा; लेकिन यह बात न हुई। हामिद ने तुरंत जवाब दिया—आग में बहादुर ही कूदते हैं जनाब, तुम्हारे यह वकील, सिपाही और भिश्ती लेडियों की तरह घर में घुस जाएँगे। आग में कूदना वह काम है, जो यह रूस्तम-ए-हिंद ही कर सकता है। महमूद ने एक ज़ोर लगाया—वकील साहब कुरसी-मेज़ पर बैठेंगे, तुम्हारा चिमटा तो बावरची-ख़ाने में ज़मीन पर पड़ा रहेगा। इस तर्क ने सम्मी और नूरे को भी सजीव कर दिया। कितने ठिकाने की बात कही है पट्ठे ने। चिमटा बावरची-ख़ाने में पड़ा रहने के सिवा और क्या कर सकता है? हामिद को कोई फड़कता हुआ जवाब न सूझा, तो उसने धाँधली शुरू की—मेरा चिमटा बावरची-ख़ाने में नहीं रहेगा। वकील साहब कुर्सी पर बैठेंगे, तो जाकर उन्हें ज़मीन पर पटक देगा और उनका क़ानून उनके पेट में डाल देगा। बात कुछ बनी नहीं। ख़ासी गाल-गलौज थी; लेकिन क़ानून को पेट में डालने वाली बात छा गई। ऐसी छा गई कि तीनों सूरमा मुँह ताकते रह गए मानो कोई धेलचा कनकौआ किसी गंडेवाले कनकौए को काट गया हो। क़ानून मुँह से बाहर निकलने वाली चीज़ है। उसको पेट के अंदर डाल दिया जाना बेतुकी-सी बात होने पर भी कुछ नयापन रखती है। हामिद ने मैदान मार लिया। उसका चिमटा रूस्तम-ए-हिंद है। अब इसमें मोहसिन, महमूद नूरे, सम्मी किसी को भी आपत्ति नहीं हो सकती। विजेता को हारने वालों से जो सत्कार मिलना स्वाभविक है, वह हामिद को भी मिला। औरों ने तीन-तीन, चार-चार आने पैसे ख़र्च किए, पर कोई काम की चीज़ न ले सके। हामिद ने तीन पैसे में रंग जमा लिया। सच ही तो है, खिलौनों का क्या भरोसा? टूट-फूट जाएँगे। हामिद का चिमटा तो बना रहेगा बरसों! संधि की शर्तें तय होने लगीं। मोहसिन ने कहा—ज़रा अपना चिमटा दो, हम भी देखें। तुम हमारा भिश्ती लेकर देखो। महमूद और नूरे ने भी अपने-अपने खिलौने पेश किए। हामिद को इन शर्तों को मानने में कोई आपत्ति न थी। चिमटा बारी-बारी से सबके हाथ में गया; और उनके खिलौने बारी-बारी से हामिद के हाथ में आए। कितने ख़ूबसूरत खिलौने हैं! हामिद ने हारने वालों के आँसू पोंछे—मैं तुम्हें चिढ़ा रहा था, सच! यह चिमटा भला, इन खिलौनों की क्या बराबरी करेगा; मालूम होता है, अब बोले, अब बोले। लेकिन मोहसिन की पार्टी को इस दिलासे से संतोष नहीं होता। चिमटे का सिक्का ख़ूब बैठ गया है। चिपका हुआ टिकट अब पानी से नहीं छूट रहा है। मोहसिन—लेकिन इन खिलौनों के लिए कोई हमें दुआ तो न देगा? महमूद—दुआ को लिए फिरते हो। उल्टे मार न पड़े। अम्माँ ज़रूर कहेंगी कि मेले में यही मिट्टी के खिलौने मिले? हामिद को स्वीकार करना पड़ा कि खिलौनों को देखकर किसी की माँ इतनी ख़ुश न होंगी, जितनी दादी चिमटे को देखकर होंगी। तीन पैसों ही में तो उसे सब कुछ करना था ओर उन पैसों के इस उपयोग पर पछतावे की बिल्कुल ज़रूरत न थी। फिर अब तो चिमटा रूस्तम-ए-हिंद है और सभी खिलौनों का बादशाह! रास्ते में महमूद को भूख लगी। उसके बाप ने केले खाने को दिए। महमूद ने केवल हामिद को साझी बनाया। उसके अन्य मित्र मुँह ताकते रह गए। यह उस चिमटे का प्रसाद था। ग्यारह बजे गाँव में हलचल मच गई। मेलेवाले आ गए। मोहसिन की छोटी बहन ने दौड़कर भिश्ती उसके हाथ से छीन लिया और मारे ख़ुशी के जा उछली, तो मियाँ भिश्ती नीचे आ रहे और सुरलोक सिधारे। इस पर भाई-बहन में मार-पीट हुई। दानों ख़ूब रोए। उनकी अम्माँ यह शोर सुनकर बिगड़ी और दोनों को ऊपर से दो-दो चाँटे और लगाए। मियाँ नूरे के वकील का अंत उनके प्रतिष्ठानुकूल इससे ज़ियादा गौरवमय हुआ। वकील ज़मीन पर या ताक पर तो नहीं बैठ सकता। उसकी मर्यादा का विचार तो करना ही होगा। दीवार में खूँटियाँ गाड़ी गई। उन पर लकड़ी का एक पटरा रखा गया। पटरे पर काग़ज़ का क़ालीन बिछाया गया। वकील साहब राजा भोज की भाँति सिंहासन पर विराजे। नूरे ने उन्हें पंखा झलना शुरू किया। अदालतों में खस की टट्टियाँ और बिजली के पंखे रहते हैं। क्या यहाँ मामूली पंखा भी न हो! क़ानून की गर्मी दिमाग़ पर चढ़ जाएगी कि नहीं। बाँस का पंखा आया और नूरे हवा करने लगे। मालूम नहीं, पंखे की हवा से या पंखे की चोट से वकील साहब स्वर्गलोक से मृत्युलोक में आ रहे और उनका माटी का चोला माटी में मिल गया। फिर बड़े ज़ोर-शोर से मातम हुआ और वकील साहब की अस्थि घूर पर डाल दी गई। अब रहा महमूद का सिपाही। उसे चटपट गाँव का पहरा देने का चार्ज मिल गया; लेकिन पुलिस का सिपाही कोई साधारण व्यक्ति तो नहीं, जो अपने पैरों चलें। वह पालकी पर चलेगा। एक टोकरी आई, उसमें कुछ लाल रंग के फटे-पुराने चिथड़े बिछाए गए; जिसमें सिपाही साहब आराम से लेटे। नूरे ने यह टोकरी उठाई और अपने द्वार का चक्कर लगाने लगे। उनके दोनों छोटे भाई सिपाही की तरफ़ से 'छोनेवाले, जागते लहो' पुकारते चलते हैं। मगर रात तो अँधेरी ही होनी चाहिए; महमूद को ठोकर लग जाती है। टोकरी उसके हाथ से छूटकर गिर पड़ती है और मियाँ सिपाही अपनी बंदूक़ लिए ज़मीन पर आ जाते हैं और उनकी एक टाँग में विकार आ जाता है। महमूद को आज ज्ञात हुआ कि वह अच्छा डाक्टर है। उसको ऐसा मरहम मिला गया है जिससे वह टूटी टाँग को आनन-फ़ानन जोड़ सकता है। केवल गूलर का दूध चाहिए। गूलर का दूध आता है। टाँग जोड़ दी जाती है, लेकिन सिपाही को ज्यों ही खड़ा किया जाता है, टाँग जवाब दे देती है। शल्य-क्रिया असफल हुई, तब उसकी दूसरी टाँग भी तोड़ दी जाती है। अब कम-से-कम एक जगह आराम से बैठ तो सकता है। एक टाँग से तो न चल सकता था, न बैठ सकता था। अब वह सिपाही संन्यासी हो गया है। अपनी जगह पर बैठा-बैठा पहरा देता है। कभी-कभी देवता भी बन जाता है। उसके सिर का झालरदार साफ़ा खुरच दिया गया है। अब उसका जितना रूपांतर चाहो, कर सकते हो। कभी-कभी तो उससे बाट का काम भी लिया जाता है। अब मियाँ हामिद का हाल सुनिए। अमीना उसकी आवाज़ सुनते ही दौड़ी और उसे गोद में उठाकर प्यार करने लगी। सहसा उसके हाथ में चिमटा देखकर वह चौंकी। 'यह चिमटा कहाँ था?' 'मैंने मोल लिया है।' 'कै पैसे में?' 'तीन पैसे दिए।' अमीना ने छाती पीट ली। यह कैसा बेसमझ लड़का है कि दुपहर हुआ, कुछ खाया न पिया। लाया क्या, चिमटा! सारे मेले में तुझे और कोई चीज़ न मिली, जो यह लोहे का चिमटा उठा लाया? हामिद ने अपराधी भाव से कहा—तुम्हारी उँगलियाँ तवे से जल जाती थीं; इसलिए मैंने इसे लिया। बुढ़िया का क्रोध तुरंत स्नेह में बदल गया, और स्नेह भी वह नहीं, जो प्रगल्भ होता है और अपनी सारी कसक शब्दों में बिखेर देता है। यह मूक स्नेह था, ख़ूब ठोस, रस और स्वाद से भरा हुआ। बच्चे में कितना त्याग, कितना सद्भाव और कितना विवेक है! दूसरों को खिलौने लेते और मिठाई खाते देखकर इसका मन कितना ललचाया होगा? इतना ज़ब्त इससे हुआ कैसे? वहाँ भी इसे अपनी बुढ़िया दादी की याद बनी रही। अमीना का मन गद्गद् हो गया। और अब एक बड़ी विचित्र बात हुई। हामिद के इस चिमटे से भी विचित्र। बच्चे हामिद ने बूढ़े हामिद का पार्ट खेला था। बुढ़िया अमीना बालिका अमीना बन गई। वह रोने लगी। दामन फैलाकर हामिद को दुआएँ देती जाती थी और आँसू की बड़ी-बड़ी बूँदें गिराती जाती थी। हामिद इसका रहस्य क्या समझता! ******

  • दण्ड

    प्रेमचंद संध्या का समय था। कचहरी उठ गयी थी। अहलकार चपरासी जेबें खनखनाते घर जा रहे थे। मेहतर कूड़े टटोल रहा था कि शायद कहीं पैसे मिल जायें। कचहरी के बरामदों में सांडों ने वकीलों की जगह ले ली थी। पेड़ों के नीचे मुहर्रिरों की जगह कुत्ते बैठे नजर आते थे। इसी समय एक बूढ़ा आदमी, फटे-पुराने कपड़े पहने, लाठी टेकता हुआ, जंट साहब के बंगले पर पहुंचा और सायबान में खड़ा हो गया। जंट साहब का नाम था मिस्टर जी0 सिनहा। अरदली ने दूर ही से ललकारा—कौन सायबान में खड़ा है? क्या चाहता है। बूढ़ा—गरीब बाम्हान हूं भैया, साहब से भेंट होगी? अरदली—साहब तुम जैसों से नहीं मिला करते। बूढ़े ने लाठी पर अकड़ कर कहा—क्यों भाई, हम खड़े हैं या डाकू-चोर हैं कि हमारे मुंह में कुछ लगा हुआ है? अरदली—भीख मांग कर मुकदमा लड़ने आये होंगे? बूढ़ा—तो कोई पाप किया है? अगर घर बेचकर नहीं लड़ते तो कुछ बुरा करते हैं? यहां तो मुकदमा लड़ते-लड़ते उमर बीत गयी; लेकिन घर का पैसा नहीं खरचा। मियां की जूती मियां का सिर करते हैं। दस भलेमानसों से मांग कर एक को दे दिया। चलो छुट्टी हुई। गांव भर नाम से कांपता है। किसी ने जरा भी टिर-पिर की और मैंने अदालत में दावा दायर किया। अरदली—किसी बड़े आदमी से पाला नहीं पड़ा अभी? बूढ़ा—अजी, कितने ही बड़ों को बड़े घर भिजवा दिया, तूम हो किस फेर में। हाई-कोर्ट तक जाता हूं सीधा। कोई मेरे मुंह क्या आयेगा बेचारा! गांव से तो कौड़ी जाती नहीं, फिर डरें क्यों? जिसकी चीज पर दांत लगाये, अपना करके छोड़ा। सीधे न दिया तो अदालत में घसीट लाये और रगेद-रगेद कर मारा, अपना क्या बिगड़ता है? तो साहब से उत्तला करते हो कि मैं ही पुकारूं? अरदली ने देखा; यह आदमी यों टलनेवाला नहीं तो जाकर साहब से उसकी इत्तला की। साहब ने हुलिया पूछा और खुश होकर कहा—फौरन बुला लो। अरदली—हजूर, बिलकुल फटेहाल है। साहब—गुदड़ी ही में लाल होते हैं। जाकर भेज दो। मिस्टर सिनहा अधेड़ आदमी थे, बहुत ही शांत, बहुत ही विचारशील। बातें बहुत कम करते थे। कठोरता और असभ्यता, जो शासन की अंग समझी जाती हैं, उनको छु भी नहीं गयी थी। न्याय और दया के देवता मालूम होते थे। डील-डौल देवों का-सा था और रंग आबनूस का-सा। आराम-कुर्सी पर लेटे हुए पेचवान पी रहे थे। बूढ़े ने जाकर सलाम किया। सिनहा—तुम हो जगत पांडे! आओ बैठो। तुम्हारा मुकदमा तो बहुत ही कमजोर है। भले आदमी, जाल भी न करते बना? जगत—ऐसा न कहें हजूर, गरीब आदमी हूं, मर जाऊंगा। सिनहा—किसी वकील मुख्तार से सलाह भी न ले ली? जगत—अब तो सरकार की सरन में आया हूं। सिनहा—सरकार क्या मिसिल बदल देंगे; या नया कानून गढ़ेंगे? तुम गच्चा खा गये। मैं कभी कानून के बाहर नहीं जाता। जानते हो न अपील से कभी मेरी तजवीज रद्द नहीं होती? जगत—बड़ा धरम होगा सरकार! (सिनहा के पैरों पर गिन्नियों की एक पोटली रखकर) बड़ा दुखी हूं सरकार! सिनहा—(मुस्करा कर) यहां भी अपनी चालबाजी से नहीं चूकते? निकालो अभी और, ओस से प्यास नहीं बुझती। भला दहाई तो पूरा करो। जगत—बहुत तंग हूं दीनबंधु! सिनहा—डालो-डालो कमर में हाथ। भला कुछ मेरे नाम की लाज तो रखो। जगत—लुट जाऊंगा सरकार! सिनहा—लुटें तुम्हारे दुश्मन, जो इलाका बेचकर लड़ते हैं। तुम्हारे जजमानों का भगवान भला करे, तुम्हें किस बात की कमी है। मिस्टर सिनहा इस मामले में जरा भी रियायत न करते थे।  जगत ने देखा कि यहां काइयांपन से काम चलेगा तो चुपके से 4 गिन्नियां और निकालीं। लेकिन उन्हें मिस्टर सिनहा के पैरों रखते समय उसकी आंखों से खून निकल आया। यह उसकी बरसों की कमाई थी। बरसों पेट काटकर, तन जलाकर, मन बांधकर, झुठी गवाहियां देकर उसने यह थाती संचय कर पायी थी। उसका हाथों से निकलना प्राण निकलने से कम दुखदायी न था। जगत पांडे के चले जाने के बाद, कोई 9 बजे रात को, जंट साहब के बंगले पर एक तांगा आकर रुका और उस पर से पंडित सत्यदेव उतरे जो राजा साहब शिवपुर के मुख्तार थे। मिस्टर सिनहा ने मुस्कराकर कहा—आप शायद अपने इलाके में गरीबों को न रहने देंगे। इतना जुल्म! सत्यदेव—गरीब परवर, यह कहिए कि गरीबों के मारे अब इलाके में हमारा रहना मुश्किल हो रहा है। आप जानते हैं, साधी उंगली से घी नहीं निकलता। जमींदार को कुछ-न-कुछ सख्ती करनी ही पड़ती है, मगर अब यह हाल है कि हमने जरा चूं भी की तो उन्हीं गरीबों की त्योरियां बदल जाती हैं। सब मुफ्त में जमीन जोतना चाहते हैं। लगान मांगिये तो फौजदारी का दावा करने को तैयार! अब इसी जगत पांडे को देखिए, गंगा कसम है हुजूर सरासर झूठा दावा है। हुजूर से कोई बात छिपी तो रह नहीं सकती। अगर जगत पांडे मुकदमा जीत गया तो हमें बोरियां-बंधना छोड़कर भागना पड़ेगा। अब हुजूर ही बसाएं तो बस सकते हैं। राजा साहब ने हुजूर को सलाम कहा है और अर्ज की है हक इस मामले में जगत पांडे की ऐसी खबर लें कि वह भी याद करे। मिस्टर सिनहा ने भवें सिकोड़ कर कहा—कानून मेरे घर तो नहीं बनता? सत्यदेव—आपके हाथ में सब कुछ है। यह कहकर गिन्नियों की एक गड्डी निकाल कर मेज पर रख दी। मिस्टर सिनहा ने गड्डी को आंखों से गिनकर कहा—इन्हें मेरी तरफ से राजा साहब को नजर कर दीजिएगा। आखिर आप कोई वकील तो करेंगे। उसे क्या दीजिएगा? सत्यदेव—यह तो हुजूर के हाथ में है। जितनी ही पेशियां होंगी उतना ही खर्च भी बढ़ेगा। सिनहा—मैं चाहूं तो महीनों लटका सकता हूं। सत्यदेव—हां, इससे कौन इनकार कर सकता है। सिनहा—पांच पेशियां भी हुयीं तो आपके कम से कम एक हजार उड़ जायेंगे। आप यहां उसका आधा पूरा कर दीजिए तो एक ही पेशी में वारा-न्यारा हो जाए। आधी रकम बच जाय। सत्यदेव ने 10 गिन्नियां और निकाल कर मेज पर रख दीं और घमंड के साथ बोले—हुक्म हो तो राजा साहब कह दूं, आप इत्मीनान रखें, साहब की कृपादृष्टि हो गयी है। मिस्टर सिनहा ने तीव्र स्वर में कहा ‘जी नहीं, यह कहने की जरूरत नहीं। मैं किसी शर्त पर यह रकम नहीं ले रहा। मैं करूंगा वही जो कानून की मंशा होगी। कानून के खिलाफ जौ-भर भी नहीं जा सकता। यही मेरा उसूल है। आप लोग मेरी खातिर करते हैं, यह आपकी शरारत है। उसे अपना दुश्मन समझूंगा जो मेरा ईमान खरीदना चाहे। मैं जो कुछ लेता हूं, सच्चाई का इनाम समझ कर लेता हूं।‘ जगत पांडे को पूरा विश्वास था कि मेरी जीत होगी; लेकिन तजबीज सुनी तो होश उड़ गये! दावा खारिज हो गया! उस पर खर्च की चपत अलग। मेरे साथ यह चाल! अगर लाला साहब को इसका मजा न चखा दिया, तो बाम्हन नहीं। हैं किस फेर में? सारा रोब भुला दूंगा। वहां गाढ़ी कमाई के रुपये हैं। कौन पचा सकता है? हाड़ फोड़-फोड़ कर निकलेंगे। द्वार पर सिर पटक-पटक कर मर जाऊंगा। उसी दिन संध्या को जगत पांडे ने मिस्टर सिनहा के बंगले के सामने आसन जमा दिया। वहां बरगद का घना वृक्ष था। मुकदमेवाले वहीं सत्तू, चबेना खाते ओर दोपहरी उसी की छांह में काटते थे। जगत पांडे उनसे मिस्टर सिनहा की दिल खोलकर निंदा करता। न कुछ खाता न पीता, बस लोगों को अपनी रामकहानी सुनाया करता। जो सुनता वह जंट साहब को चार खोटी-खरी कहता—आदमी नहीं पिशाच है, इसे तो ऐसी जगह मारे जहां पानी न मिले। रुपये के रुपये लिए, ऊपर से खरचे समेत डिग्री कर दी! यही करना था तो रुपये काहे को निकले थे? यह है हमारे भाई-बंदों का हाल। यह अपने कहलाते हैं! इनसे तो अंग्रेज ही अच्छे। इस तरह की आलोचनाएं दिन-भर हुआ करतीं। जगत पांडे के आस-पास आठों पहर जमघट लगा रहता। इस तरह चार दिन बीत गये और मिस्टर सिनहा के कानों में भी बात पहुंची। अन्य रिश्वती कर्मचारियों की तरह वह भी हेकड़ आदमी थे। ऐसे निर्द्वंद्व रहते मानो उन्हें यह बीमारी छू तक नहीं गयी है। जब वह कानून से जौ-भर भी न टलते थे तो उन पर रिश्वत का संदेह हो ही क्योंकर सकता था, और कोई करता भी तो उसकी मानता कौन! ऐसे चतुर खिलाड़ी के विरुद्ध कोई जाब्ते की कार्रवाई कैसे होती? मिस्टर सिनहा अपने अफसरों से भी खुशामद का व्यवहार न करते। इससे हुक्काम भी उनका बहुत आदर करते थे। मगर जगत पांडे ने वह मंत्र मारा था जिसका उनके पास कोई उत्तर न था। ऐसे बांगड़ आदमी से आज तक उन्हें साबिका न पड़ा था। अपने नौकरों से पूछते—बुड्ढा क्या कर रहा है। नौकर लोग अपनापन जताने के लिए झूठ के पुल बांध देते—हुजूर, कहता था भूत बन कर लगूंगा, मेरी वेदी बने तो सही, जिस दिन मरूंगा उस दिन के सौ जगत पांडे होंगे। मिस्टर सिनहा पक्के नास्तिक थे; लेकिन ये बातें सुन-सुनकर सशंक हो जाते, और उनकी पत्नी तो थर-थर कांपने लगतीं। वह नौकरों से बार-बार कहती उससे जाकर पूछो, क्या चाहता है। जितना रुपया चाहे ले, हमसे जो मांगे वह देंगे, बस यहां से चला जाय, लेकिन मिस्टर सिनहा आदमियों को इशारे से मना कर देते थे। उन्हें अभी तक आशा थी कि भूख-प्यास से व्याकुल होकर बुड्ढा चला जायगा। इससे अधिक भय यह था कि मैं जरा भी नरम पड़ा और नौकरों ने मुझे उल्लू बनाया। छठे दिन मालूम हुआ कि जगत पांडे अबोल हो गया है, उससे हिला तक नहीं जाता, चुपचाप पड़ा आकाश की ओर देख रहा है। शायद आज रात दम निकल जाय। मिस्टर सिनहा ने लंबी सांस ली और गहरी चिंता में डूब गये। पत्नी ने आंखों में आंसू भरकर आग्रहपूर्वह कहा—तुम्हें मेरे सिर की कसम, जाकर किसी इस बला को टालो। बुड्ढा मर गया तो हम कहीं के न रहेंगे। अब रुपये का मुंह मत देखो। दो-चार हजार भी देने पड़ें तो देकर उसे मनाओ। तुमको जाते शर्म आती हो तो मैं चली जाऊं। सिनहा—जाने का इरादा तो मैं कई दिन से कर रहा हूं; लेकिन जब देखता हूं वहां भीड़ लगी रहती है, इससे हिम्मत नहीं पड़ती। सब आदमियों के सामने तो मुझसे न जाया जायगा, चाहे कितनी ही बड़ी आफत क्यों न आ पड़े। तुम दो-चार हजार की कहती हो, मैं दस-पांच हजार देने को तैयार हूं। लेकिन वहां नहीं जा सकता। न जाने किस बुरी साइत से मैंने इसके रुपये लिए। जानता कि यह इतना फिसाद खड़ा करेगा तो फाटक में घुसने ही न देता। देखने में तो ऐसा सीधा मालूम होता था कि गऊ है। मैंने पहली बार आदमी पहचानने में धोखा खाया। पत्नी—तो मैं ही चली जाऊं? शहर की तरफ से आऊंगी और सब आदमियों को हटाकर अकेले में बात करुंगी। किसी को खबर न होगी कि कौन है। इसमें तो कोई हरज नहीं है? मिस्टर सिनहा ने संदिग्ध भाव से कहा-ताड़ने वाले ताड़ ही जायेंगे, वाहे तुम कितना ही छिपाओ। पत्नी—ताड़ जायेंगे ताड़ जायें, अब किससे कहां तक डरुं। बदनामी अभी क्या कम हो रही है,जो और हो जायगी। सारी दुनिया जानती है कि तुमने रुपये लिए। यों ही कोई किसी पर प्राण नहीं देता। फिर अब व्यर्थ ऐंथ क्यों करो? मिस्टर सिनहा अब मर्मवेदना को न दबा सके। बोले—प्रिये, यह व्यर्थ की ऐंठ नहीं है। चोर को अदालत में बेंत खाने से उतनी लज्जा नहीं आती, जितनी किसी हाकिम को अपनी रिश्वत का परदा खुलने से आती है। वह जहर खा कर मर जायगा; पर संसार के सामने अपना परदा न खोलेगा। अपना सर्वनाश देख सकता है; पर यह अपमान नहीं सह सकता, जिंदा खाल खींचने, या कोल्हू में पेरे जाने के सिवा और कोई स्थिति नहीं है, जो उसे अपना अपराध स्वीकार करा सके। इसका तो मुझे जरा भी भय नहीं है कि ब्राह्मण भूत बनकर हमको सतायेगा, या हमें उनकी वेदी बनाकर पूजनी पड़ेगी, यह भी जानता हूं कि पाप का दंड भी बहुधा नहीं मिलता; लेकिन हिंदू होने के कारण संस्कारों की शंका कुछ-कुछ बनी हुई है। ब्रह्महत्या का कलंक सिर पर लेते हुए आत्मा कांपती है। बस इतनी बात है। मैं आज रात को मौका देखकर जाऊंगा और इस संकट को काटने के लिए जो कुछ हो सकेगा, करुंगा। तिर जमा रखो। आधी रात बीत चुकी थी। मिस्टर सिनहा घर से निकले और अकेले जगत पांडे को मनाने चले। बरगद के नीचे बिलकुल सन्नाटा था। अन्धकार ऐसा था मानो निशादेवी यहीं शयन कर रही हों। जगत पांडे की सांस जोर-जोर से चल रही थी मानो मौत जबरदस्ती घसीटे लिए जाती हो। मिस्टर सिनहा के रोएं खड़े हो गये। बुड्ढा कहीं मर तो नहीं रहा है? जेबी लालटेन निकाली और जगत के समीप जाकर बोले—पांडे जी, कहो क्या हाल है? जगत पांडे ने आंखें खोलकर देखा और उठने की असफल चेष्टा करके बोला—मेरा हाल पूछते हो? देखते नहीं हो, मर रहा हूं? सिनहा—तो इस तरह क्यों प्राण देते हो? जगत—तुम्हारी यही इच्छा है तो मैं क्या करूं? सिनहा—मेरी तो यही इच्छा नहीं। हां, तुम अलबत्ता मेरा सर्वनाश करने पर तुले हुए हो। आखिर मैंने तुम्हारे डेढ़ सौ रूपये ही तो लिए हैं। इतने ही रुपये के लिए तुम इतना बड़ा अनुष्ठान कर रहे हो! जगत—डेढ़ सौ रुपये की बात नहीं है। जो तुमने मुझे मिट्टी में मिला दिया। मेरी डिग्री हो गयी होती तो मुझे दस बीघे जमीन मिल जाती और सारे इलाके में नाम हो जाता। तुमने मेरे डेढ़ सौ नहीं लिए, मेरे पांच हजार बिगाड़ दिये। पूरे पांच हजार; लेकिन यह घमंड न रहेगा, याद रखना कहे देता हूं, सत्यानाश हो जायगा। इस अदालत में तुम्हारा राज्य है; लेकिन भगवान के दरवार में विप्रों ही का राज्य है। विप्र का धन लेकर कोई सुखी नहीं रह सकता। मिस्टर सिनहा ने बहुत खेद और लज्जा प्रकट की, बहुत अनुनय-से काम लिया और अन्त में पूछा—सच बताओ पांडे, कितने रुपये पा जाओ तो यह अनुष्ठान छोड़ दो। जगत पांडे अबकी जोर लगाकर उठ बैठे और बड़ी उत्सुकता से बोले—पांच हजार से कौड़ी कम न लूंगा। सिनहा—पांच हजार तो बहुत होते हैं। इतना जुल्म न करो। जगत—नहीं, इससे कम न लूंगा। यह कहकर जगत पांडे फिर लेट गया। उसने ये शब्द निश्चयात्मक भाव से कहे थे कि मिस्टर सिनहा को और कुछ कहने का साहस न हुआ। रुपये लाने घर चले; लेकिन घर पहुंचते-पहुंचते नीयत बदल गयी। डेढ़ सौ के बदले पांच हजार देते कलंक हुआ। मन में कहा—मरता है जाने दो, कहां की ब्रह्महत्या और कैसा पाप! यह सब पाखंड है। बदनामी न होगी? सरकारी मुलाजिम तो यों ही बदनाम होते हैं, यह कोई नई बात थोड़े ही है। बचा कैसे उठ बैठे थे। समझा होगा, उल्लू फंसा। अगर 6 दिन के उपवास करने से पांच हजार मिले तो मैं महीने में कम से कम पांच मरतबा यह अनुष्ठान करूं। पांच हजार नहीं, कोई मुझे एक ही हजार दे दे। यहां तो महीने भर नाक रगड़ता हूं तब जाके 600 रुपये के दर्शन होते हैं। नोच-खसोट से भी शायद ही किसी महीने में इससे ज्यादा मिलता हो। बैठा मेरी राह देख रहा होगा। लेना रुपये, मुंह मीठ हो जायगा। वह चारपाई पर लेटना चाहते थे कि उनकी पत्नी जी आकर खड़ी हो गयीं। उनक सिर के बाल खुले हुए थे। आंखें सहमी हुई, रह-रहकर कांप उठती थीं। मुंह से शब्द न निकलता था। बड़ी मुश्किल से बोलीं—आधी रात तो हो गई होगी? तुम जगत पांडे के पास चले जाओ। मैंने अभी ऐसा बुरा सपना देखा है कि अभी तक कलेजा धड़क रहा है, जान संकट में पड़ी हुई है। जाके किसी तरह उसे टालो। मिस्टर सिनहा—वहीं से तो चला आ रहा हूं। मुझे तुमसे ज्यादा फिक्र है। अभी आकर खड़ा ही हुआ था कि तुम आयी। पत्नी—अच्छा! तो तुम गये थे! क्या बातें हुईं, राजी हुआ। सिनहा—पांच हजार रुपये मांगता है! पत्नी—पांच हजार! सिनहा—कौड़ी कम नहीं कर सकता और मेरे पास इस वक्त एक हजार से ज्यादा न होंगे। पत्नी ने एक क्षण सोचकर कहा—जितना मांगता है उतना ही दे दो, किसी तरह गला तो छूट। तुम्हारे पास रुपये न हों तो मैं दे दूंगी। अभी से सपने दिखाई देन लगे हैं। मरा तो प्राण कैसे बचेंगे। बोलता-चालता है न? मिस्टर सिनहा अगर आबनूस थे तो उनकी पत्नी चंदन; सिनहा उनके गुलाम थे, उनके इशारों पर चलते थे। पत्नी जी भी पति-शासन में कुशल थीं। सौंदर्य और अज्ञान में अपवाद है। सुंदरी कभी भोली नहीं होती। वह पुरुष के मर्मस्थल पर आसन जमाना जानती है! सिनहा—तो लाओ देता आऊं; लेकिन आदमी बड़ा चग्घड़ है, कहीं रुपये लेकर सबको दिखाता फिरे तो? पत्नी—इसको यहां से इसी वक्त भागना होगा। सिनहा—तो निकालो दे ही दूं। जिंदगी में यह बात भी याद रहेगी। पत्नी—ने अविश्वास भाव से कहा—चलो, मैं भी चलती हूं। इस वक्त कौन देखता है? पत्नी से अधिक पुरुष के चरित्र का ज्ञान और किसी को नहीं होता। मिस्टर सिनहा की मनोवृत्तियों को उनकी पत्नी जी खूब जानती थीं। कौन जान रास्ते में रुपये कहीं छिपा दें, और कह दें दे आए। या कहने लगें, रुपये लेकर भी नहीं टलता तो मैं क्या करूं। जाकर संदूक से नोटों के पुलिंदे निकाले और उन्हें चादर में छिपा कर मिस्टर सिनहा के साथ चलीं। सिनहा के मुंह पर झाडू-सी फिरी थी। लालटेन लिए पछताते चले जाते थे। 5000 रु0 निकले जाते हैं। फिर इतने रुपये कब मिलेंगे; कौन जानता है? इससे तो कहीं अच्छा था दुष्ट मर ही जाता। बला से बदनामी होती, कोई मेरी जेब से रुपये तो न छीन लेता। ईश्वर करे मर गया हो! अभी तक दोनों आदमी फाटक ही तकम आए थे कि देखा, जगत पांडे लाठी टेकता चला आता है। उसका स्वरूप इतना डरावना था मानो श्मशान से कोई मुरदा भागा आता हो। पत्नी जी बोली—महाराज, हम तो आ ही रहे थे, तुमने क्यों कष्ट किया? रुपये ले कर सीधे घर चले जाओगे न? जगत—हां-हां, सीधा घर जाऊंगा। कहां हैं रुपये देखूं! पत्नी जी ने नोटों का पुलिंदा बाहर निकाला और लालटेन दिखा कर बोलीं—गिन लो। 5000 रुपये हैं! पांडे ने पुलिंदा लिया और बैठ कर उलट-पुलट कर देखने लगा। उसकी आंखें एक नये प्रकाश से चमकने लगी। हाथों में नोटों को तौलता हुआ बोला—पूरे पांच हजार हैं? पत्नी—पूरे गिन लो? जगत—पांच हजार में दो टोकरी भर जायगी! (हाथों से बताकर) इतने सारे पांच हजार! सिनहा—क्या अब भी तुम्हें विश्वास नहीं आता? जगत—हैं-हैं, पूरे हैं पूरे पांच हजार! तो अब जाऊं, भाग जाऊं? यह कह कर वह पुलिंदा लिए कई कदम लड़खड़ाता हुआ चला, जैसे कोई शराबी, और तब धम से जमीन पर गिर पड़ा। मिस्टर सिनहा लपट कर उठाने दौड़े तो देखा उसकी आंखें पथरा गयी हैं और मुख पीला पड़ गया है। बोले—पांडे, क्या कहीं चोट आ गयी? पांडे ने एक बार मुंह खोला जैसे मरी हुई चिड़िया सिर लटका चोंच खोल देती है। जीवन का अंतिम धागा भी टूट गया। ओंठ खुले हुए थे और नोटों का पुलिंदा छाती पर रखा हुआ था। इतने में पत्नी जी भी आ पहुंची और शव को देखकर चौंक पड़ीं! पत्नी—इसे क्या हो गया? सिनहा—मर गया और क्या हो गया? पत्नी—(सिर पीट कर) मर गया! हाय भगवान्! अब कहां जाऊं? यह कह कर बंगले की ओर बड़ी तेजी से चलीं। मिस्टर सिनहा ने भी नोटो का पुलिंदा शव की छाती पर से उठा लिया और चले। पत्नी—ये रुपये अब क्या होंगे? सिनहा—किसी धर्म-कार्य में दे दूंगा। पत्नी—घर में मत रखना, खबरदार! हाय भगवान! दूसरे दिन सारे शहर में खबर मशहूर हो गयी—जगत पांडे ने जंट साहब पर जान दे दी। उसका शव उठा तो हजारों आदमी साथ थे। मिस्टर सिनहा को खुल्लम-खुल्ला गालियां दी जा रही थीं। संध्या समय मिस्टर सिनहा कचहरी से आ कर मन मार बैठे थे कि नौकरों ने आ कर कहा—सरकार, हमको छुट्टी दी जाय! हमारा हिसाब कर दीजिए। हमारी बिरादरी के लोग धमकते हैं कि तुम जंट साहब की नौकरी करोगे तो हुक्का-पानी बंद हो जायगा। सिनहा ने झल्ला कर कहा—कौन धमकाता है? कहार—किसका नाम बताएं सरकार! सभी तो कह रहे हैं। रसोइया—हुजूर, मुझे तो लोग धमकाते हैं कि मन्दिर में न घुसने पाओगे। साईस—हुजूर, बिरादरी से बिगाड़ करक हम लोग कहां जाएंगे? हमारा आज से इस्तीफा है। हिसाब जब चाहे कर दीजिएगा। मिस्टर सिनहा ने बहुत धमकाया फिर दिलासा देने लगे; लेकिन नौकरों ने एक न सुनी। आध घण्टे के अन्दर सबों ने अपना-अपना रास्ता लिया। मिस्टर सिनहा दांत पीस कर रह गए; लेकिन हाकिमों का काम कब रुकता है? उन्होंने उसी वक्त कोतवाल को खबर कर दी और कई आदमी बेगार में पकड़ आए। काम चल निकला। उसी दिन से मिस्टर सिनहा और हिंदू समाज में खींचतान शुरु हुई। धोबी ने कपड़े धोना बंद कर दिया। ग्वाले ने दूध लाने में आना-कानी की। नाई ने हजामत  बनानी छोड़ी। इन विपत्तियों पर पत्नी जी का रोना-धोना और भी गजब था। इन्हें रोज भयंकर स्वप्न दिखाई देते। रात को एक कमरे से दूसरे में जाते प्राण निकलते थे। किसी को जरा सिर भी दुखता तो नहीं में जान समा जाती। सबसे बड़ी मुसीबत यह थी कि अपने सम्बन्धियों ने भी आना-जाना छोड़ दिया। एक दिन साले आए, मगर बिना पानी पिये चले गए। इसी तरह एक बहनोई का आगमन हुआ। उन्होंने पान तक न खाया। मिस्टर सिनहा बड़े धैर्य से यह सारा तिरस्कार सहते जाते थे। अब तक उनकी आर्थिक हानि न हुई थी। गरज के बावले झक मार कर आते ही थे और नजर-नजराना मिलता ही था। फिर विशेष चिंता का कोई कारण न था। लेकिन बिरादरी से वैर करना पानी में रह कर मगर से वैर करने जैसे है। कोई-न-कोई ऐसा अवसर ही आ जाता है, जब हमको बिरादरी के सामने सिर झुकाना पड़ता है। मिस्टर सिनहा को भी साल के अन्दर ही ऐसा अवसर आ पड़ा। यह उनकी पुत्री का विवाह  था। यही वह समस्या है जो बड़े-बड़े हेकड़ों का घमंड चूर कर देती है। आप किसी के आने-जाने की परवा न करें, हुक्का-पानी, भोज-भात, मेल-जोल किसी बात की परवा न करे; मगर लड़की का विवाह तो न टलने वाली बला है। उससे बचकर आप कहां जाएंगे! मिस्टर सिनहा को इस बात का दगदगा तो पहिले ही था कि त्रिवेणी के विवाह में बाधाएं पड़ेगी; लेकिन उन्हें विश्वास था कि द्रव्य की अपार शक्ति इस मुश्किल को हल कर देगी। कुछ दिनों तक उन्होंने जान-बूझ कर टाला कि शायद इस आंधी का जोर कुछ कम हो जाय; लेकिन जब त्रिवेणी को सोलहवां साल समाप्त हो गया तो टाल-मटोल की गुंजाइश न रही। संदेशे भेजने लगे; लेकिन जहां संदेशिया जाता वहीं जवाब मिलता—हमें मंजूर नही। जिन घरों में साल-भर पहले उनका संदेशा पा कर लोग अपने भाग्य को सराहते, वहां से अब सूखा जवाब मिलता था—हमें मंजूर नहीं। मिस्टर सिनहा धन का लोभ देते, जमीन नजर करने को कहते, लड़के को विलायत भेज कर ऊंची शिक्षा दिलाने का प्रस्ताव करते किंतु उनकी सारी आयोजनाओं का एक ही जवाब मिलता था—हमें मंजूर नहीं। ऊंचे घरानों का यह हाल देखकर मिस्टर सिनहा उन घरानों में संदेश भेजने लगे, जिनके साथ पहले बैठकर भोजन करने में भी उन्हें संकोच होता था;लेकिन वहां भी वही जवाब मिला—हमें मंजूर नही। यहां तक कि कई जगह वे खुद दौड़-दौड़ कर गये। लोगों की मिन्नतें कीं, पर यही जवाब मिला—साहब, हमें मंजूर नहीं। शायद बहिष्कृत घरानों में उनका संदेश स्वीकार कर लिया जाता; पर मिस्टर सिनहा जान-बूझकर मक्खी न निगलना चाहते थे। ऐसे लोगों से सम्बन्ध न करना चाहते थे जिनका बिरादरी में काई स्थान न था। इस तरह एक वर्ष बीत गया। मिसेज सिनहा चारपाई पर पड़ी कराह रही थीं, त्रिवेणी भोजन बना रही थी और मिस्टर सिनहा पत्नी के पास चिंता में डूबे बैठे हुए थे। उनके हाथ में एक खत था, बार-बार उसे देखते और कुछ सोचने लगते थे। बड़ी देर के बाद रोगिणी ने आंखें खोलीं और बोलीं—अब न बचूंगी पांडे मेरी जान लेकर छोड़ेगा। हाथ में कैसा कागज है? सिनहा—यशोदानंदन के पास से खत आया हैं। पाजी को यह खत लिखते हुए शर्म नहीं आती, मैंने इसकी नौकरी लगायी। इसकी शादी करवायी और आज उसका मिजाज इतना बढ़ गया है कि अपने छोटे भाई की शादी मेरी लड़की से करना पसंद नहीं करता। अभागे के भाग्य खुल जाते! पत्नी—भगवान्, अब ले चलो। यह दुर्दशा नहीं देखी जाती। अंगूर खाने का जी चाहता है, मंगवाये है कि नहीं? सिनाह—मैं जाकर खुद लेता आया था। यह कहकर उन्होंने तश्तरी में अंगूर भरकर पत्नी के पास रख दिये। वह उठा-उठा कर खाने लगीं। जब तश्तरी खाली हो गयी तो बोलीं—अब किसके यहां संदेशा भेजोगे? सिनहा—किसके यहां बताऊं! मेरी समझ में तो अब कोई ऐसा आदमी नहीं रह गया। ऐसी बिरादरी में रहने से तो यह हजार दरजा अच्छा है कि बिरादरी के बाहर रहूं। मैंने एक ब्राह्मण से रिश्वत ली। इससे मुझे इनकार नहीं। लेकिन कौन रिश्वत नहीं लेता? अपने गौं पर कोई नहीं चूकता। ब्राह्मण नहीं खुद ईश्वर ही क्यों न हों, रिश्वत खाने वाले उन्हें भी चूस लेंगे। रिश्वत देने वाला अगर कोई निराश होकर अपने प्राण देता है तो मेरा क्या अपराध! अगर कोई मेरे फैसले से नाराज होकर जहर खा ले तो मैं क्या कर सकता हूं। इस पर भी मैं प्रायश्चित करने को तैयार हूं। बिरादरी जो दंड दे, उसे स्वीकार करने को तैयार हूं। सबसे कह चुका हूं मुझसे जो प्रायश्चित चाहो करा लो पर कोई नहीं सुनता। दंड अपराध के अनुकूल होना चाहिए, नहीं तो यह अन्याय है। अगर किसी मुसलमान का छुआ भोजन खाने के लिए बिरादरी मुझे काले पानी भेजना चाहे तो मैं उसे कभी न मानूंगा। फिर अपराध अगर है तो मेरा है। मेरी लड़की ने क्या अपराध किया है। मेरे अपराध के लिए लड़की को दंड देना सरासर न्याय-विरुद्ध है। पत्नी—मगर करोगे क्या? और कोई पंचायत क्यों नहीं करते? सिनहा—पंचायत में भी तो वही बिरादरी के मुखिया लोग ही होंगे, उनसे मुझे न्याय की आशा नहीं। वास्तव में इस तिरस्कार का कारण ईर्ष्या है। मुझे देखकर सब जलते हैं और इसी बहाने वे मुझे नीचा दिखाना चाहते हैं। मैं इन लोगों को खूब समझता हूं। पत्नी—मन की लालसा मन में रह गयी। यह अरमान लिये संसार से जाना पड़ेगा। भगवान् की जैसी इच्छा। तुम्हारी बातों से मुझे डर लगता है कि मेरी बच्ची की न-जाने क्या दशा होगी। मगर तुमसे मेरी अंतिम विनय यही है कि बिरादरी से बाहर न जाना, नहीं तो परलोक में भी मेरी आत्मा को शांति न मिलेगी। यह शोक मेरी जान ले रहा है। हाय, बच्ची पर न-जाने क्या विपत्ति आने वाली है। यह कहते मिसेज सिनहा की आंखें में आंसू बहने लगे। मिस्टर सिनहा ने उनको दिलासा देते हुए कहा—इसकी चिंता मत करो प्रिये, मेरा आशय केवल यह था कि ऐसे भाव मन में आया करते हैं। तुमसे सच कहता हूं, बिरादरी के अन्याय से कलेजा छलनी हो गया है। पत्नी—बिरादरी को बुरा मत कहो। बिरादरी का डर न हो तो आदमी न जाने क्या-क्या उत्पात करे। बिरादरी को बुरा न कहो। (कलेजे पर हाथ रखकर) यहां बड़ा दर्द हो रहा है। यशोदानंद ने भी कोरा जवाब दे दिया। किसी करवट चैन नहीं आता। क्या करुं भगवान्। सिनहा—डाक्टर को बुलाऊं? पत्नी—तुम्हारा जी चाहे बुला लो, लेकिन मैं बचूंगी नहीं। जरा तिब्बो को बुला लो, प्यार कर लूं। जी डूबा जाता है। मेरी बच्ची! हाय मेरी बच्ची!! *******

  • पिता का आशीर्वाद

    डॉ. कृष्णकांत श्रीवास्तव जब मृत्यु का समय न्निकट आया तो पिता ने अपने एकमात्र पुत्र धनपाल को बुलाकर कहा कि “बेटा मेरे पास धन-संपत्ति नहीं है कि मैं तुम्हें विरासत में दूं। पर मैंने जीवनभर सच्चाई और प्रामाणिकता से काम किया है। तो मैं तुम्हें आशीर्वाद देता हूं कि, तुम जीवन में बहुत सुखी रहोगे और धूल को भी हाथ लगाओगे तो वह सोना बन जायेगी।” बेटे ने सिर झुकाकर पिताजी के पैर छुए। पिता ने सिर पर हाथ रखकर आशीर्वाद दिया और संतोष से अपने प्राण त्याग कर दिए। अब घर का खर्च बेटे धनपाल को संभालना था। उसने एक छोटी सी ठेला गाड़ी पर अपना व्यापार शुरू किया। धीरे धीरे व्यापार बढ़ने लगा। एक छोटी सी दुकान ले ली। व्यापार और बढ़ा। अब नगर के संपन्न लोगों में उसकी गिनती होने लगी। उसको विश्वास था कि यह सब मेरे पिता के आशीर्वाद का ही फल है। क्योंकि, उन्होंने जीवन में दु:ख उठाया, पर कभी धैर्य नहीं छोड़ा, श्रद्धा नहीं छोड़ी, प्रामाणिकता नहीं छोड़ी इसलिए उनकी वाणी में बल था। और उनके आशीर्वाद फलीभूत हुए। और मैं सुखी हुआ। उसके मुंह से बारबार यह बात निकलती थी। एक दिन एक मित्र ने पूछा: तुम्हारे पिता में इतना बल था, तो वह स्वयं संपन्न क्यों नहीं हुए? सुखी क्यों नहीं हुए? धर्मपाल ने कहा: मैं पिता की ताकत की बात नहीं कर रहा हूं। मैं उनके आशीर्वाद की ताकत की बात कर रहा हूं। इस प्रकार वह बारबार अपने पिता के आशीर्वाद की बात करता, तो लोगों ने उसका नाम ही रख दिया बाप का आशीर्वाद! धर्मपाल को इससे बुरा नहीं लगता, वह कहता कि मैं अपने पिता के आशीर्वाद के काबिल निकलूं, यही चाहता हूं। ऐसा करते हुए कई साल बीत गए। वह विदेशों में व्यापार करने लगा। जहां भी व्यापार करता, उससे बहुत लाभ होता। एक बार उसके मन में आया, कि मुझे लाभ ही लाभ होता है !! तो मैं एक बार नुकसान का अनुभव करूं। तो उसने अपने एक मित्र से पूछा, कि ऐसा व्यापार बताओ कि जिसमें मुझे नुकसान हो। मित्र को लगा कि इसको अपनी सफलता का और पैसों का घमंड आ गया है। इसका घमंड दूर करने के लिए इसको ऐसा धंधा बताऊं कि इसको नुकसान ही नुकसान हो। तो उसने उसको बताया कि तुम भारत में लौंग खरीदो और जहाज में भरकर अफ्रीका के जंजीबार में जाकर बेचो। धर्मपाल को यह बात ठीक लगी। जंजीबार तो लौंग का देश है। वहां से लौंग भारत में लाते हैं और यहां 10-12 गुना भाव पर बेचते हैं। भारत में खरीद करके जंजीबार में बेचें, तो साफ नुकसान सामने दिख रहा है। परंतु धर्मपाल ने तय किया कि मैं भारत में लौंग खरीद कर, जंजीबार खुद लेकर जाऊंगा। देखूं कि पिता के आशीर्वाद कितना साथ देते हैं। नुकसान का अनुभव लेने के लिए उसने भारत में लौंग खरीदे और जहाज में भरकर खुद उनके साथ जंजीबार द्वीप पहुंचा। जंजीबार में सुल्तान का राज्य था। धर्मपाल जहाज से उतरकर के और लंबे रेतीले रास्ते पर जा रहा था ! वहां के व्यापारियों से मिलने को। उसे सामने से सुल्तान जैसा व्यक्ति पैदल सिपाहियों के साथ आता हुआ दिखाई दिया। उसने किसी से पूछा कि, यह कौन है? उन्होंने कहा: यह सुल्तान हैं। सुल्तान ने उसको सामने देखकर उसका परिचय पूछा। उसने कहा: मैं भारत के गुजरात के खंभात का व्यापारी हूं। और यहां पर व्यापार करने आया हूं। सुल्तान ने उसको व्यापारी समझ कर उसका आदर किया और उससे बात करने लगा। धर्मपाल ने देखा कि सुल्तान के साथ सैकड़ों सिपाही हैं। परंतु उनके हाथ में तलवार, बंदूक आदि कुछ भी न होकर बड़ी-बड़ी छलनियां है। उसको आश्चर्य हुआ। उसने विनम्रता पूर्वक सुल्तान से पूछा: आपके सैनिक इतनी छलनी लेकर के क्यों जा रहे हैं। सुल्तान ने हंसकर कहा: बात यह है, कि आज सवेरे मैं समुद्र तट पर घूमने आया था। तब मेरी उंगली में से एक अंगूठी यहां कहीं निकल कर गिर गई। अब रेत में अंगूठी कहां गिरी, पता नहीं। तो इसलिए मैं इन सैनिकों को साथ लेकर आया हूं। यह रेत छानकर मेरी अंगूठी उसमें से तलाश करेंगे। धर्मपाल ने कहा: अंगूठी बहुत महंगी होगी। सुल्तान ने कहा: नहीं! उससे बहुत अधिक कीमत वाली अनगिनत अंगूठी मेरे पास हैं। पर वह अंगूठी एक फकीर का आशीर्वाद है। मैं मानता हूं कि मेरी सल्तनत इतनी मजबूत और सुखी उस फकीर के आशीर्वाद से है। इसलिए मेरे मन में उस अंगूठी का मूल्य सल्तनत से भी ज्यादा है। इतना कह कर के सुल्तान ने फिर पूछा: बोलो सेठ, इस बार आप क्या माल ले कर आये हो। धर्मपाल ने कहा कि: लौंग! सुल्तान के आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा। यह तो लौंग का ही देश है सेठ। यहां लौंग बेचने आये हो? किसने आपको ऐसी सलाह दी। जरूर वह कोई आपका दुश्मन होगा। यहां तो एक पैसे में मुट्ठी भर लोंग मिलते हैं। यहां लोंग को कौन खरीदेगा? और तुम क्या कमाओगे? धर्मपाल ने कहा: मुझे यही देखना है, कि यहां भी मुनाफा होता है या नहीं। मेरे पिता के आशीर्वाद से आज तक मैंने जो धंधा किया, उसमें मुनाफा ही मुनाफा हुआ। तो अब मैं देखना चाहता हूं कि उनके आशीर्वाद यहां भी फलते हैं या नहीं। सुल्तान ने पूछा: पिता के आशीर्वाद? इसका क्या मतलब? धर्मपाल ने कहा: मेरे पिता सारे जीवन ईमानदारी और प्रामाणिकता से काम करते रहे। परंतु धन नहीं कमा सकें। उन्होंने मरते समय मुझे भगवान का नाम लेकर मेरे सिर पर हाथ रखकर आशीर्वाद दिए थे, कि तेरे हाथ में धूल भी सोना बन जाएगी। ऐसा बोलते-बोलते धर्मपाल नीचे झुका और जमीन की रेत से एक मुट्ठी भरी और सम्राट सुल्तान के सामने मुट्ठी खोलकर उंगलियों के बीच में से रेत नीचे गिराई तो.. धर्मपाल और सुल्तान दोनों का आश्चर्य का पार नहीं रहा। उसके हाथ में एक हीरेजड़ित अंगूठी थी। यह वही सुल्तान की गुमी हुई अंगूठी थी। अंगूठी देखकर सुल्तान बहुत प्रसन्न हो गया। बोला: वाह खुदा आप की करामात का पार नहीं। आप पिता के आशीर्वाद को सच्चा करते हो। धर्मपाल ने कहा: फकीर के आशीर्वाद को भी वही परमात्मा सच्चा करता है। सुल्तान और खुश हुआ। धर्मपाल को गले लगाया और कहा: मांग सेठ। आज तू जो मांगेगा मैं दूंगा। धर्मपाल ने कहा: आप 100 वर्ष तक जीवित रहो और प्रजा का अच्छी तरह से पालन करो। प्रजा सुखी रहे। इसके अलावा मुझे कुछ नहीं चाहिए। सुल्तान और अधिक प्रसन्न हो गया। उसने कहा: सेठ तुम्हारा सारा माल में आज खरीदता हूं और तुम्हारी मुंह मांगी कीमत दूंगा। इस कहानी से शिक्षा मिलती है, कि पिता के आशीर्वाद हों, तो दुनिया की कोई ताकत कहीं भी तुम्हें पराजित नहीं होने देगी। पिता और माता की सेवा का फल निश्चित रूप से मिलता है। आशीर्वाद जैसी और कोई संपत्ति नहीं। *****

  • बैंक की सीख

    अरविन्द जायसवाल जिले की सबसे बड़ी अफसर डीएम नुसरत की माँ, साधारण कपड़ों में एक बड़े सरकारी बैंक में पैसे निकालने गईं। वहाँ बैंक के सभी अफसरों ने उन्हें भिखारिन समझकर अपमानित किया। कोई सोच भी नहीं सकता था कि यह साधारण सी महिला असल में जिले की डीएम मैडम की माँ है। सभी ने उन्हें तिरस्कार की नजरों से देखा और सोचने लगे कि ऐसी औरत इतने बड़े बैंक में क्या करने आई है। वह महिला धीरे-धीरे काउंटर की ओर बढ़ी। वहाँ कल्पना नाम की एक सुरक्षा गार्ड बैठी थी। महिला ने कहा, “बेटी, मुझे बैंक से पैसे निकालने हैं। यह रहा चेक।” कल्पना ने चेक देखे बिना ही कहना शुरू कर दिया, “तुम्हारी इतनी हिम्मत कैसे हुई बैंक आने की? यह बैंक तुम्हारे जैसे लोगों के लिए नहीं है। भिखारिन, यहाँ क्यों आई हो? यह बैंक बड़े लोगों का है। तुम्हारे जैसी औरत की तो ऐसे बैंक में खाता खुलवाने की औकात ही नहीं है। निकल जाओ यहाँ से नहीं तो मार कर भगा दूंगी।” महिला बोली, “बेटी, तुम पहले चेक तो देखो। मुझे ₹5 लाख नकद निकालने हैं।” यह सुनते ही कल्पना गुस्से से आग बबूला हो गई, “यह कोई मजाक करने की जगह है क्या? क्या सोच रही हो तुम? तुम्हारे जैसी औरत की इतनी औकात ही नहीं। और क्या कहा 5 लाख? जल्दी से यहाँ से निकल जाओ। नहीं तो धक्का मार कर बाहर फेंक दूंगी।” ठीक उसी समय बैंक मैनेजर अपने केबिन से बाहर झांकते हुए बोले, “कौन इतना हंगामा कर रहा है?” कल्पना बोली, “कोई भिखारीन औरत है सर, जा नहीं रही है।” बैंक मैनेजर गुस्से से बाहर आए और बिना कुछ पूछे उस बुजुर्ग महिला को एक जोरदार थप्पड़ मार दिया। महिला लड़खड़ा कर जमीन पर गिर पड़ी। फिर मैनेजर ने सिक्योरिटी गार्ड को कहा, “घसीट कर बाहर निकालो इस औरत को।” कल्पना ने जबरदस्ती महिला को बैंक से बाहर निकाल दिया। वहाँ मौजूद सभी ग्राहक और कर्मचारी चुपचाप सब कुछ देख रहे थे। किसी को नहीं पता था कि यह महिला जिले की डीएम नुसरत की माँ है और पूरी घटना बैंक के सीसीटीवी कैमरे में रिकॉर्ड हो रही थी। घर लौटकर महिला रोते-रोते अपनी बेटी डीएम नुसरत को फोन कर पूरी घटना बताती है। यह सुनकर नुसरत अंदर से कांप उठी। वह रोते हुए अपनी माँ से बोली, “माँ, कल मैं खुद आ रही हूँ और तुम्हारे साथ जाकर उसी बैंक से पैसे निकालूंगी।” अगले दिन सुबह नुसरत ने सादा सूती साड़ी पहनी और अपनी माँ के साथ बैंक जाने के लिए तैयार हुई। माँ-बेटी एक दूसरे को गले लगाती हैं, उनकी आँखों में गर्व और पीड़ा दोनों थे। सुबह ठीक 11:00 बजे वे बैंक पहुँचीं। बैंक अब तक नहीं खुला था, जबकि बैंक खुलने का समय 10:00 बजे था। नुसरत शांति से दरवाजे के पास बैठकर इंतजार करने लगी। थोड़ी देर बाद बैंक खुला, वे दोनों अंदर गईं। दोनों के कपड़े इतने साधारण थे कि वहाँ मौजूद ग्राहक और कर्मचारी उन्हें एक सामान्य ग्रामीण महिला और युवती समझकर भ्रमित हो गए। कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था कि यही नुसरत जिले की डीएम है। धीरे-धीरे वे काउंटर की ओर बढ़ी। वहाँ वही कल्पना बैठी थी। नुसरत विनम्रता से बोली, “मैम, हमें पैसे निकालने हैं। माँ की दवाई लेनी है और कुछ जरूरी काम भी हैं। यह रहा चेक। कृपया देख लीजिए।” कल्पना ने दोनों महिलाओं को सिर से पाँव तक देखा और व्यंग्य में कहा, “आप शायद गलत बैंक में आ गई हैं। यह शाखा हाई प्रोफाइल क्लाइंट्स के साथ काम करती है।” नुसरत मुस्कुरा कर जवाब देती हैं, “एक बार चेक करके देख लीजिए मैडम। अगर ना हो तो हम चले जाएंगे।” कल्पना ने अनमने मन से लिफाफा लिया और बोली, “थोड़ा समय लगेगा। वेटिंग चेयर पर बैठिए।” नुसरत अपनी माँ का हाथ पकड़कर एक खाली कुर्सी पर बैठ गई। उन्होंने माँ को पानी दिया और खुद भी शांत भाव से बैठी रही। बैंक में मौजूद लोग उनकी ओर देख रहे थे। चारों ओर कानाफूसी शुरू हो गई, “किस गाँव से आई हैं? शायद पेंशन के लिए आई होंगी। यहाँ इनका खाता होने का तो सवाल ही नहीं है।” नुसरत सब कुछ सुन रही थी, लेकिन शांत बनी रही। उनकी माँ थोड़ी असहज हो रही थी, लेकिन बेटी का धैर्य देखकर खुद को संभाल लिया। कुछ देर बाद नुसरत ने कल्पना से कहा, “अगर आप व्यस्त हैं तो कृपया मैनेजर से मिलने की व्यवस्था कर दीजिए। मुझे एक जरूरी बात करनी है।” कल्पना झुंझलाकर फोन उठाती है और मैनेजर के केबिन में कॉल करती है। मैनेजर काम करते हुए झांक कर देखता है, सामने साधारण कपड़ों में एक महिला अपनी माँ के साथ बैठी है। वह ठंडे स्वर में बोला, “मुझे फालतू लोगों के लिए वक्त नहीं है। कह दो बैठे रहें।” नुसरत कुछ नहीं बोली, बस माँ का हाथ पकड़ कर शांत भाव से बैठी रही। एक अफसर की मर्यादा और एक बेटी का धैर्य। नुसरत तब भी पूरी तरह शांत और संयमित थी। माँ की बेचैनी और लोगों की कानाफूसी देखकर उन्होंने माँ का हाथ कस के पकड़ा और बोली, “माँ, लग रहा है इन लोगों को कोई फर्क नहीं पड़ता। अब मुझे ही कुछ करना होगा।” वो धीरे से उठी, साड़ी का पल्लू ठीक किया और सीधा मैनेजर के केबिन की ओर बढ़ गई। मैनेजर जो अब तक काँच के पीछे से उन पर नजर रखे हुए था, घबरा गया। वह जल्दी से बाहर आया और नुसरत का रास्ता रोक कर बोला, “हाँ बोलिए क्या काम है?” नुसरत ने लिफाफा आगे बढ़ाकर कहा, “मुझे पैसे निकालने हैं। माँ की दवाई लेनी है और भी बहुत काम है। यह रहा चेक देख लीजिए।” मैनेजर ने लिफाफा लिए बिना ही झुंझला कर कहा, “जब अकाउंट में पैसे ही नहीं होते तो ट्रांजैक्शन कैसे होगा? तुम्हें देखकर तो नहीं लगता कि तुम्हारे खाते में पैसे होंगे। बड़ी आई हो पैसे निकालने।” नुसरत अब भी बेहद शांत स्वर में बोली, “अगर आप एक बार चेक करके देख लेते तो बेहतर होता। इस तरह अंदाजा लगाना ठीक नहीं।” मैनेजर अब खुलकर हंसने लगा, “मेरे पास इतनी अनुभव है कि चेहरे देखकर ही समझ जाता हूँ कि किसके पास क्या है। रोज ही तुम्हारे जैसे लोग आते हैं। तुम्हारे खाते में कुछ होगा, मुझे तो नहीं लगता। अब और भीड़ मत करो। देखो सब तुम्हें ही देख रहे हैं। माहौल खराब हो रहा है। अच्छा होगा अगर तुम अभी चली जाओ।” नुसरत का चेहरा अब भी स्थिर था, लेकिन उसकी आँखों में एक अलग चमक आ गई थी। जहाँ पहले शांति थी, अब वहाँ कठोरता उतर आई थी। उन्होंने बिना कुछ कहे लिफाफा मेज पर रख दिया और शांत स्वर में बोली, “ठीक है जा रही हूँ लेकिन एक अनुरोध है, इस लिफाफे में जो जानकारी है कृपया एक बार जरूर पढ़िएगा, शायद आपके किसी काम आ जाए।” इतना कहकर उन्होंने अपनी माँ का हाथ थामा, चेहरा मोड़ा और दरवाजे की ओर बढ़ गईं। लेकिन दरवाजे पर पहुँचकर वह मुड़ीं और गहरी नजर डालते हुए बोलीं, “बेटा, इस व्यवहार का अंजाम तुम्हें भुगतना पड़ेगा, वक्त सब कुछ समझा देगा।” पूरा बैंक कुछ क्षणों के लिए निस्तब्धता में डूब गया। ना कोई आवाज, ना कोई गुस्सा—सिर्फ मर्यादा में लिपटी एक चेतावनी। मैनेजर एक पल के लिए ठहर गया। फिर हंसते हुए बोला, “बुढ़ापे में लोग कुछ भी कह जाते हैं।” वापस जाकर अपनी कुर्सी पर बैठ गया। उसके सामने वही लिफाफा मेज पर पड़ा था, बिना पढ़ा, अनदेखा। उसे यह अंदाजा नहीं था कि उस लिफाफे में ऐसा एक सच छुपा है जो उसकी दुनिया को उलट कर रख देगा। अगले दिन बैंक का वही पुराना रूटीन शुरू हुआ। लेकिन इस बार एक फर्क था—वही वृद्ध महिला, जिसके साथ एक दिन पहले अपमान की सारी हदें पार कर दी गई थी, फिर से उसी बैंक में दाखिल हुईं। मगर इस बार वह अकेली नहीं थीं, उनके साथ था एक तेजतर्रार अफसर, जो सूट-बूट में चमक रहा था, उसके हाथ में था एक चमचमाता ब्रिफ केस। उनके प्रवेश के साथ ही पूरा बैंक उसी दिशा में देखने लगा। किसी को कुछ कहे बिना वे सीधे मैनेजर के केबिन की ओर बढ़ीं। मैनेजर उन्हें पहले पहचान नहीं पाया, लेकिन जैसे-जैसे वे करीब आईं, उनका चेहरा साफ होता गया। वही महिला जिसकी फाइल उसने कल लौटा दी थी, जिससे कहा था “तुम जैसे ग्राहक नहीं चाहिए”, जिसे उसने बाहर निकाल दिया था। अब उसके चेहरे पर डर की परछाई उभरने लगी। घबराकर वह खुद ही केबिन से बाहर आ गया। महिला के चेहरे पर अब आत्मविश्वास और गरिमा की चमक थी। वह नहीं रुकीं, सीधे मैनेजर के सामने खड़ी होकर तीखे स्वर में बोलीं, “मैनेजर साहब, मैंने कल ही कहा था, आपको अपने व्यवहार का परिणाम भुगतना पड़ेगा। आपने सिर्फ मुझे नहीं, मेरे जैसे हजारों सामान्य नागरिकों को तुच्छ समझने की कोशिश की है। अब समय आ गया है कि आप सजा भुगतें।” मैनेजर स्तब्ध होकर बोला, “आप कौन हैं जो मुझे सिखाने आई हैं? यह आपका घर नहीं है, यह बैंक है।” महिला उसकी बात बीच में ही रोक कर मुस्कुरा उठीं, फिर अपने साथ आए अफसर की ओर इशारा करते हुए बोलीं, “यह मेरे कानूनी सलाहकार हैं और मैं नुसरत, इस जिले की प्रशासक, डिस्ट्रिक्ट मैजिस्ट्रेट यानी डीएम और इस बैंक की 8% शेयरहोल्डर। और यह मेरी माँ हैं जिनके साथ आपने और आपके स्टाफ ने बेहद अपमानजनक व्यवहार किया है।” एक पल के लिए पूरे बैंक में सन्नाटा छा गया। सभी कर्मचारी, ग्राहक, यहाँ तक कि दरवाजे के पास खड़े सुरक्षा गार्ड भी हैरान रह गए। मैनेजर के चेहरे का रंग उड़ गया। वह कुछ कह पाता इससे पहले ही नुसरत बोली, “तुम्हें तुरंत बैंक मैनेजर के पद से हटाया जा रहा है। अब तुम्हारी पोस्टिंग फील्ड में होगी, जहाँ तुम्हें हर दिन सामान्य जनता से मिलकर रिपोर्ट बनानी होगी।” नुसरत ने ब्रीफ केस खोला और उसमें से दो दस्तावेज निकाल कर सामने रख दिए। पहला था मैनेजर का ट्रांसफर ऑर्डर, दूसरा कारण बताओ नोटिस जिसमें लिखा था कि उसका व्यवहार बैंक की नीति के खिलाफ पाया गया है। मैनेजर पसीने से तर-बतर हो गया था। कांपते स्वर में बोला, “मैडम, मुझसे बहुत बड़ी भूल हो गई। मैं शर्मिंदा हूँ। बीते कल की घटना के लिए दिल से माफी चाहता हूँ।” नुसरत की नजर अब भी स्थिर थी, लेकिन उसकी आवाज में वह न्याय का तीखापन था जो एक सच्चे अफसर की पहचान होता है। “किस बात की माफी मांग रहे हो? केवल मेरा अपमान किया था या उन सारे ग्राहकों का जो आम कपड़ों में आते हैं? तुम्हारी आँखों में उन्हें सिर्फ उनका पहनावा दिखता है। क्या तुमने कभी बैंक की गाइडलाइन पढ़ी है? उसमें साफ लिखा है हर ग्राहक बराबर है। कोई अमीर-गरीब नहीं होता। और जो कर्मचारी भेदभाव करेगा उसके खिलाफ कार्रवाई होगी।” एक पल रुककर नुसरत कठोर स्वर में बोली, “चाहती तो आज ही तुम्हें सस्पेंड कर सकती थी, लेकिन मैं तुम्हें खुद को सुधारने का एक मौका दे रही हूँ। अगली बार तुम्हारा नाम नहीं, तुम्हारा अस्तित्व मिटा दिया जाएगा।” फिर उन्होंने बैंक की सुरक्षा गार्ड कल्पना को बुलाया। कल्पना डरते-डरते आगे आई, उसकी आँखों में आंसू थे। कांपते हाथों से बोली, “मैडम, मुझे माफ कर दीजिए। मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई। अब से किसी को भी ऐसे नहीं आंकूंगी।” नुसरत ने उसकी तरफ देखा और कहा, “कभी भी किसी को उसके कपड़ों से छोटा मत समझो। आज जो सीख मिली है उसे सारी जिंदगी याद रखना।” *******

  • स्वप्न

    मुकेश ‘नादान’ नरेंद्र अकसर कलकत्ता में अपने घर में बैठकर सुदूर दक्षिणेश्वर में श्रीरामकृष्ण के ध्यान में निमग्न श्रीमूर्ति का दर्शन किया करते थे। एक दिन उन्होंने स्वप्न में देखा कि श्रीरामकृष्ण उनके निकट आकर कह रहे हैं, “चल, मैं तुझे ब्रज-गोपी श्रीराधा के समीप ले जाऊँगा।” नरेंद्र ने अनुसरण किया। थोड़ी ही दूर जाकर श्रीरामकृष्ण ने उनकी ओर लौटकर कहा, “और कहाँ जाएगा।' यह कहकर उन्होंने रूप-लावण्यमयी श्रीराधिका का रूप धारण कर लिया। इस दर्शन का फल यह हुआ कि यद्यपि नरेंद्र पहले कुछ ब्रह्मसमाज के गीत ही प्रायः गाया करते थे, लेकिन अब उन्होंने श्रीराधा के कृष्ण-प्रेम के अर्थात्‌ भगवान्‌ के प्रति जीव के आकुलतापूर्ण अनुनय-विनय, विरह-कातरता आदि के गीत गाना भी आरंभ कर दिया। अपने गुरु-शिष्यों से उनके दूवारा इस स्वप्न के विषय में कहने पर उन लोगों ने आश्चर्य से पूछा, “क्या तुम विश्वास करते हो कि यह स्वप्न सच है? ” नरेंद्र ने उत्तर दिया, “हाँ, निश्चय ही विश्वास करता हूँ।” ध्यान के समय नरेंद्र अकसर अपनी प्रतिमूर्ति देखा करते थे कि हू-ब-हू जैसे उनके ही आकार और रूप आदि लेकर एक दूसरा व्यक्ति बैठा है तथा दर्पण में प्रतिबिंबित मूर्ति के हाव-भाव, चाल-ढाल आदि सबकुछ जैसे असली आदमी के समान हो जाता है, वैसे ही इस प्रतिमूर्ति के क्रिया-कलाप भी हू-ब-हू उसी भाँति होते। नरेंद्र सोचते, 'फिर कौन है? ' श्रीरामकृष्ण को यह बतलाने पर उन्होंने उस पर कोई विशेष गंभीरता दिखाए बिना कहा था, “ध्यान की ऊँची अवस्था में ऐसा होता ही है।” एक बार नरेंद्र की यह इच्छा हुई कि वे भाव में निमग्न होकर इस संसार को भूल जाएँ। वे देखते थे कि नित्यगोपाल, मनमोहन आदि श्रीरामकृष्ण के भक्तगण भगवान्‌ का नाम-कीर्तन सुनते-सुनते बह्मज्ञान खोकर किस प्रकार धराशायी हो जाते हैं। उन्हें दुख होता कि वे इस तरह के ऊँचे आध्यात्मिक आनंद का भोग करने से अब तक वंचित हैं। अत: एक दिन उन्होंने श्रीरामकृष्ण से इस अतृप्ति की बात कर उसी प्रकार की भाव-समाधि के लिए प्रार्थना की। इसके उत्तर में श्रीरामकृष्ण ने स्नेहासिक्त दृष्टि से उन्हें देखते हुए कहा, “तुम इतने उतावले क्यों होते हो? उससे भला क्‍या आता-जाता है? बड़े सरोवर में हाथी के उतरने से कुछ हलचल नहीं होती। किंतु छोटे तालाब में उतरने से वहाँ बड़ी हलचल मच जाती है।” उन्होंने और भी स्पष्ट रूप से समझा दिया कि ये सब भक्तगण छोटे पोखर की भाँति हैं, जिनका छोटा आधार है। इन लोगों में भगवत्‌-भक्ति का किंचित्‌ आवेश होते ही हृदय-सरोवर से तूफान उठने लगता है। किंतु नरेंद्र बहुत बड़े सरोवर की भाँति है, इसी से इतनी सहजता से वह विह्वल नहीं होता। जगदंबा के निर्देश और अपनी परीक्षाओं से प्राप्त ज्ञान के फलस्वरूप श्रीरामकृष्ण नरेंद्र पर पूर्ण विश्वास करते थे। भगवत्‌-भक्ति की हानि से रक्षा के लिए अन्य भक्तों के आहार, विहार, शयन, निद्रा, जप, ध्यान आदि सभी विषयों पर तीक्ष्ण दृष्टि रखने पर भी वे नरेंद्र को पूरी स्वाधीनता देते थे। वे भक्तों के सामने स्पष्ट रूप से कहा करते थे, “नरेंद्र यदि उन नियमों का कभी उल्लंघन भी करे तो उसे कुछ भी दोष नहीं लगेगा। नरेंद्र नित्य-सिद्ध है, नरेंद्र ध्यान सिद्ध है, नरेंद्र के भीतर सदा ज्ञानाग्नि प्रज्लित रहकर सब प्रकार के भोजन-दोष को भस्मीभूत कर देती है। इस कारण यत्र-तत्र जो कुछ भी वह क्‍यों न खाए, उसका मन कभी कलुषित या विक्षिप्त नहीं होगा; ज्ञान रूपी खड़्ग से वह समस्त माया-बंधनों को काट डालता है, इसीलिए महामाया उसे किसी प्रकार वश में नहीं कर सकती।” ******

  • गुरू की सीख

    डॉ. कृष्णकांत श्रीवास्तव गुरु रामदास विद्यालय में हिंदी शिक्षक के रूप में कार्य करते थे। गुरु रामदास बड़े दिनों बाद आज शाम को घर लौटते वक़्त अपने दोस्त गोपाल जी से मिलने उसकी दुकान पर गए। गोपाल जी शहर में कपड़े का व्यापार करते थे। इतने दिनों बाद मिल रहे दोस्तों का उत्साह देखने लायक था। दोनों ने एक दुसरे को गले लगाया और दुकान पर ही बैठ कर गप्पें मारने लगे। चाय पीने के कुछ देर बाद गुरु जी बोले, “भाई एक बात बता, पहले मैं जब भी आता था तो तेरी दुकान में खरीदारों की भीड़ लगी रहती थी और हम बड़ी मुश्किल से बात कर पाते थे। लेकिन आज स्थिति बदली हुई लग रही है, बस इक्का-दुक्का खरीदार ही दुकान में दिख रहे हैं और तेरा स्टाफ भी पहले से काफी कम हो गया है।” दोस्त बड़े ही मजाकिया लहजे में बोला, “अरे कुछ नहीं गुरु जी, हम इस मार्केट के पुराने खिलाड़ी हैं। आज धंधा ढीला है तो कोई बात नहीं। कल फिर जोर पकड़ लेगा और पुरानी रौनक वापस आ जाएगी।” इस पर गुरु जी कुछ गंभीर होते हुए बोले, “देख भाई, व्यापार में चीजों को इतना हलके में मत ले। मैं देख रहा हूँ कि इसी रोड पर कपड़ों की तीन-चार और बड़ी दुकाने खुल गयी हैं, प्रतियोगिता बहुत बढ़ गयी है…और ऊपर से…” गुरु जी अपनी बात पूरी करते उससे पहले ही, दोस्त उनकी बात काटते हुए बोला, “अरे ऐसी दुकानें तो बाजार में आती-जाती रहती हैं, इनसे अपने व्यापार में कुछ फर्क नहीं पड़ता।” गुरु जी विद्यालय के समय से ही, अपने दोस्त के हट को जानते थे और वो भली प्रकार समझ गए कि ऐसे समझाने पर वो उनकी बात नहीं समझेगा। कुछ समय बाद उन्होंने दुकान बंदी के दिन; दोस्त को अपने घर चाय पर बुलाया। दोस्त, निर्धारित समय पर उनके घर पहुँच गया। कुछ देर बातचीत के बाद गुरु जी उसे अपने घर में बनी एक व्यक्तिगत प्रयोगशाला में ले गए और बोले, “देख यार, आज मैं तुझे एक बड़ा ही रोचक प्रयोग दिखता हूँ।” गुरु जी ने कांच के एक बड़े से जार में गरम पानी लिया और उसमे एक जिंदा मेंढक डाल दिया। गरम पानी से सम्पर्क में आते ही मेंढक खतरा भांप गया और कूद कर जार से बाहर भाग गया। इसके बाद गुरु जी ने जार को खाली कर उसमें ठंडा पानी भर दिया, और एक बार फिर मेंढक को उसमे डाल दिया। इस बार मेंढक आराम से ठंडे पानी मे तैरने लगा। तभी गुरु जी ने एक विचित्र कार्य किया, उन्होंने जार में भरे ठंडे पानी को बर्नर की सहायता से धीरे-धीरे गरम करना प्रारंभ कर दिया। कुछ ही देर में पानी का तापमान बढ़ने लगा। मेंढक को ये बात कुछ अजीब लगी पर उसने खुद को इस तापमान के हिसाब से व्यवस्थित कर लिया। इस बीच बर्नर जलता रहा और पानी और भी गरम होता गया। पर हर बार मेढक पानी के तापमान के हिसाब से खुद को व्यवस्थित कर लेता और आराम से पड़ा रहता। लेकिन उसकी भी गर्म पानी सहने की एक क्षमता थी। जब पानी का तापमान काफी अधिक हो गया और खौलने को आया। तब मेंढक को अपनी जान पर मंडराते खतरे का आभास हुआ। और उसने पूरी ताकत से जार के बाहर छलांग लगाने की कोशिश की। पर बार-बार खुद को बदलते तापमान में ढालने में उसकी काफी उर्जा खर्च हो चुकी थी और अब खुद को बचाने के लिए न ही उसके पास शक्ति थी और न ही समय। देखते ही देखते पानी उबलने लगा और मेंढक की जार के भीतर ही मौत हो गयी। प्रयोग देखने के बाद दोस्त बोला- गुरु जी आपने तो मेंढक की जान ही ले ली। परंतु आप ये सब मुझ को क्यों दिखा रहे हैं? गुरु जी बोले, “मेंढक की जान मैंने नहीं ली। मेंढक ने खुद अपनी जान ली है। अगर वो बिगड़ते हुए माहौल में बार-बार खुद को व्यवस्थित नहीं करता बल्कि उससे बचने का कुछ उपाय ढूंढता तो वो आसानी से अपनी जान बचा सकता था। और ये सब मैं तुझे इसलिए दिखा रहा हूँ क्योंकि कहीं न कहीं तू भी इस मेढक की तरह व्यवहार कर रहा है। तेरा अच्छा-ख़ासा व्यापार है, पर तू बाजार की बदल रही परिस्थितियों के अनुसार कार्य नहीं कर रहा है, और बस ये सोच कर बैठ जाता है कि आगे सब कुछ अपने आप ठीक हो जाएगा। पर याद रख अगर तू आज ही हो रहे बदलाव के अनुसार खुद को नहीं बदलेगा तो हो सकता है इस मेंढक की तरह कल को संभलने के लिए तेरे पास भी न ऊर्जा हो, न सामर्थ्य हो और न ही समय हो।” गुरु जी की सीख ने दोस्त की आँखें खोल दीं, उसने गुरु जी को गले लगा लिया और वादा किया कि एक बार फिर वो परिवर्तन को अपनाएगा और अपने व्यापार को पुनः पूर्व की भांति स्थापित करेगा। सार - अपने सामाजिक व व्यापारिक जीवन में हो रहे बदलावों के प्रति सतर्क रहिये, ताकि बदलाव की बड़ी से बड़ी आंधी भी आपकी जड़ों को हिला न पाएं। ******

  • कवि का दुख

    प्रियंवदा पाण्डेय   मेरा यह लघुतम जीवन जो किसी के किसी काम का नहीं जिसे पाकर मैंने पाए हैं अनगिनत दु:ख और किन्चित सुख भी। दु:खों की श्रृंखला की पहली कड़ी कौन सी थी ठीक से याद नहीं यह भी नहीं कि किसका विस्तार कितना था और गहराई में अधिक कौन था यह याद है जो भी आया उसने चमकाया मुझे नींबूमँजे बर्तनों की तरह। धोया मुझे श्वेताभ तरल से वह अकसर कटाक्ष के बाण पर सवार होकर आता था और छेद जाता था मेरे स्नेहिल हृदय का मुख। मैंने हरदम ढकेला इसे अदम्य साहस और धैर्य धना हि साधव: सूक्ति के बलपर। जब मैंने पार पा लिया इनसे एक हद तक तब यह दुख है कि मैं कविकर्म क्यों करती हूँ क्यों रचती हूँ शब्द-शब्द से नया संसार जब समझी जाती हूँ ठीक विपरीत फर्क नहीं पड़ता  प्रतिशतभर भी किसी को? बहता नहीं कोई हृदय तरल होकर आँखों से न बदलता है कोई निजाम मनुष्यत्व के विरूद्ध अपना निर्णय न आयोजित होती है कोई सभा इनके सापेक्ष थकहारकर कहती हूँ अनुभूतियों चली जाओ दूर बहुत दूर समा जाओ किसी महासागर के गर्भ में-- मैं मुक्त हो सकूँ अनुभूति के विषय सुख-दुख से। *****

  • स्कूल का गार्ड

    सपना रानी एक दिन स्कूल में सुबह-सुबह कदम रखते ही गार्ड के मुरझाए और उदास चेहरे की ओर अचानक से ध्यान चला गया। लगभग 65-70 के बुजुर्ग को इस उम्र में अपना और परिवार का खर्च चलाने के लिए तीन शिफ्ट की ड्यूटी पूरी मुस्तैदी के साथ करनी पड़ती है। उस पर से न ढंग का भोजन, न कोई सुविधा और ना ही पदाधिकारियों का अच्छा बात-व्यवहार। सच में मुझे बहुत बुरा लगा, जब उस दिन गार्ड द्वारा गलती से एक बाहरी पदाधिकारी को सैल्युट नहीं किया गया। स्कूल के ही एक पदाधिकारी द्वारा उन्हें खूब खरी-खोटी सुनाई गयी। मैं सब देख और सुन रही थी। मैं चाहकर भी कुछ नहीं कर सकती थी। मैं तो खुद ही संविदा पर कार्य करती थी, जिसका कोई निश्चित भविष्य नहीं होता। मैंने गार्ड जी को स्कूल के मेन गेट पर कड़ी धूप और उमस में पूरी मुस्तैदी के साथ ड्युटी करते पाया। मॉर्निंग एसेंबली के बाद सभी कर्मी अपने-अपने कार्य में लग गये। मैं स्टाफ रुम से अटेंडेंस रजिस्टर लेने गई तो अपना लंच बॉक्स भी साथ में ले लिया। स्कूल का मेन गेट बंद हो चुका था। देर से आनेवाले बच्चों को सज़ा के रूप में बाहर ही धूप में खड़ा कराया गया था। मैं गार्ड रुम में गई तो गार्ड जी एक टूटी हुई कुर्सी पर बैठकर खिड़की से बाहर के बच्चों को देख रहे थे। वे पसीने से तरबतर थे। मुझे देखते ही वे खड़े हो गये। मैंने उन्हें बैठने का संकेत करते हुए पूछा- "गार्ड अंकल, इस कमरे में तो पंखा भी नहीं है। उसपर से यह एस्बेस्टस तो गरमी में और तप रहा है। आप इसमें कैसे ड्युटी करते हैं?? "गार्ड जी ने अपने माथे का पसीना पोछते हुए कहा - "केतना दिन से खराब है? सर से कहते हैं ठीक करवाने को, तो कौनो नहीं सुनता है। जैसे-तैसे ड्युटी कर लेते हैं? दिक्कत त बहुत है। पर का करें?? केहू सुनता ही नहीं है। "मैंने अपनी बात रखी- "आप कल से ड्युटी कर रहे हैं। दूसरे गार्ड कब आएँगे? "गार्ड जी ने थके स्वर में बात रखी- "सहूलियत के लिए तीन शिफ्ट का 24 घंटे का ड्युटी कर लेते हैं। बाकी दूसरा गार्ड आएगा तब न जाएँगे घरे। उसको आठे बजे आना था। आ देखिए पौने नौ बज रहा है। हम का करें??" मैंने उनसे पूछा- "गार्ड जी, मान लीजिए कि दूसरा गार्ड 12 बजे आए तो??" गार्ड जी निरुत्तर हो गये? मैंने फिर पूछा- "आप कुछ खाये हैं कि नहीं? "उन्होंने निराशा में कहा- "नहीं मैडम? कल्ले आठ बजे रात को सतुआ आ पियाज खाये थे। "मैंने कहा- "गार्ड अंकल, इस थैला में मेरा लंचबॉक्स है और पेपर में लपेटकर ठंडा पानी की बोतल रखा हुआ है। लंचबॉक्स में रोटी और सब्जी होगी। आपको जितनी भूख हो खा लीजिए और ठंडा पानी पी लीजिएगा" गार्ड अंकल संकोच में पड़ गये? मैंने उनके कंधे पर हाथ रखते हुए कहा- "आप मेरे पिता समान हैं? जब आप ही भूखे रहेंगे मैं कैसे अपनी ड्युटी निभा पाऊँगीं?? थोड़ा भी संकोच मत कीजिएगा।" मेरी क्लास खाली जा रहा थी। संयोग से टीचर इंचार्ज का ध्यान उस क्लास की ओर अब तक नहीं गया था, नहीं तो म़ुझे उनका कोप भाजन बनना पड़ता। मैं तेजी से अपने क्लास की ओर बढ़ चली। 11 बजे अवकाश हुआ तो मैं ग्राउंड में बच्चों की निगरानी में आकर खड़ी हो गई। गार्ड अंकल तेज कदमों से मेरे पास आए और बोले- "मैडम, बुरा त नहीं मानिएगा न?? एगो बात कहना था।" मैंने कहा-"नहीं मानूँगीं। क्या बात है बताइए?? "उन्होंने अपनी बात रखी- "मेडम, हमको बहुत जोर का भूख लगा था। सो हम सब रोटी-सब्जी खा गये हैं... और पानी भी सब पी गये। "मैंने कहा- "तो क्या हो गया?? आपकी भूख मिटी न?? "गार्ड अंकल मुस्कुराने लगे। मुस्कुराते हुए बोले-"मैडम, ई स्कूल में भांति-भांति का लोग है। बाकी अपने के सबसे अलग हैं। भगवान आपको बहुत बड़ा आदमी बनाएँगे एक दिन। आपने बहुत पुण्य का काम किया है मैडम, हम आपके लंचबॉक्स आ बोतल सरफ से साफ करके थैला में स्टाफ रुम में आपके टेबल पर रख दिए हैं। दूसर गार्ड आ गये हैं। हम घरे जा रहे हैं? परनाम मैडम!" मुझे प्रणाम करते हुए गार्ड जी तेज़ कदमों से अपनी साइकिल पर सवार होकर मेन गेट से बाहर चले गये। मैं उन्हें तब तक देखती रही जब तक कि मेरी आँख से वे ओझल न हो गये। स्कूल से छुट्टी के समय मुझे बहुत ज़ोर की भूख लगी। ठंडा पानी पीकर किसी तरह आधा घंटा स्कूल में बिताने के बाद जब घर पर आई और मम्मी जी को थैला थमाते हुए कहा- "बहुत ज़ोर की भूख लगी है! खाना लगा दो! "मम्मी जी किचेन से ही बोली- "फिर किसी को आज का खाना खिला दिया क्या? मेरी दानी-महात्मा? तभी मैं कहूँ कि तुझको भूख कैसे लग गयी? तू तो आते-आते कभी खाती नहीं??" मम्मी जी के इस प्रश्न का कोई उत्तर मेरे पास नहीं था। उसके सामने एक विनम्र,आज्ञाकारी बच्चे की तरह पेश होकर मैंने कहा- "वो बुजुर्ग गार्ड अंकल न, कल से भूखे थे। मेरा मन नहीं माना। सब दे दिया उन्हें खाने के लिए..... "मम्मी जी कुछ देर चुप रहीं। फिर चुप्पी तोड़ते हुए बोली- "तभी तो तेरे पापा कहते हैं कि मेरी बेटी लाखों में एक है। सच में बेटी तू बहुत ही अच्छी इंसान हैं! तू बैठ, मैं खाना लगाती हूँ।" *******

  • अरमान

    जीत कुमारी   मेरी हर बात का वो मान बहुत रखता है उसपे ये भी कि मेरा ध्यान बहुत रखता है मेरी हर फिक्र को ले जाएगा अपने माथे यानी वो ज़िंदगी आसान बहुत रखता है उसके अरमान कई, अब भी अधूरे हैं मगर देखिए फिर भी वो अरमान बहुत रखता है दिल के बाहर, वो सजा रखता है गुलशन लेकिन दिल के अंदर, वो बयाबान बहुत रखता है। *****

  • एक्स्ट्रा टिफिन

    सपना रानी मै जैसे ही ऑफिस से निकला मुझे याद आया, मुझे अपने टिफिन का खाना फेंकना था। अगर खाना टिफिन में चला गया तो बीबी किच किच करेगी। आज टिफिन में लौकी की सब्ज़ी जो आई थी। लौकी… उफ़्फ़ बेस्वाद सी सब्ज़ी, जो मुझे पसन्द नहीं आती। पता नहीं क्यों बीवी सेहत का ख्याल रखने पर तुली हुई है, लौकी की सब्ज़ी मेरे मुँह का स्वाद मार देती है और भूख मर जाती है मेरी। मैंने पनीर कोफ़्ता और नान मंगवा कर बड़े चटखारे लेकर खाया था? और टिफिन जस का तस पड़ा रह गया था, पर घर पर तो यही दिखाना था कि मैंने टिफिन सारा खाली कर दिया है। अब टिफिन खाकर खाली किया कि खाना फेंक कर बीवी कौन सा देखने आ रही थी...? मैंने एक सुनसान गली के पास बाइक रोकी, बैग से टिफिन निकाला और पहले बॉक्स से सलाद नीचे गिराया, दूसरा बॉक्स जिसमें वही बेस्वाद लौकी की सब्ज़ी थी उसको खोलकर नीचे डालने ही वाला था कि एक आवाज़ आई... “बाबूजी खाना मत फेंकिये, हमें दे दीजिए बाबूजी... सुबह से कुछ भी नहीं खाये हैं।” मैंने जिधर से वो दयनीय आवाज़ आ रही थी उधर नज़र घुमाई? वो कोई पचास साल का एक वृद्ध आदमी था। वो देखने में बहुत गन्दा लग रहा था। उसकी याचना में बहुत करुणा थी। वो मेरे नजदीक आ गया, “बाबूजी हमको दे दीजिए खाना, भगवान आपका भला करेगा, इसे नाली में न गिराइये।” उसने फिर याचना की..... मैंने तीसरे बॉक्स से रोटियाँ निकाली और उसकी तरफ बढ़ा दीं, उसने सिल्वर फॉयल में लपेटी हुई रोटियाँ खोलीं और उन्हें फैला दिया, मैंने उन फैलाई हुई रोटियों पर लौकी की वो बेस्वाद सब्ज़ी भी उड़ेल दी... वो आदमी साईड में बैठकर लपलपाती जीभ के साथ खाने लगा। मैंने अपना टिफिन जब तक पैक करके बैग में डाला वो भूखा बुजुर्ग सारा खाना खत्म कर चुका था। “भगवान आपका भला करे बाबूजी! आत्मा तृप्त हो गई हमारी। खाना बहुत स्वादिष्ट था बाबूजी... आप अब जब भी खाना फेंकने आएं? इधर ही फेंकना बाबूजी... हम यहीं भीख माँगते हैं, हमें नहीं तो किसी और को खाना मिल जाएगा।” कहते कहते बुड्ढे की आँखें भीग गईं.... मैंने उससे नजरें घुमा लीं, तो सामने की दीवार पर लिखा एक दोहा नज़र आया.. “रोटी तेरे मोल का, क्या मैं करूँ बखान। धाये को माटी लगे, भूखे को भगवान।” यह पढ़कर मुझे शर्मिंदगी हुई, मैंने झट से बाइक आगे बढ़ा ली। कितना सच लिखा हुआ था, रोटी का मोल तो केवल भूखा ही जानता है। हम जैसे भरे पेट वाले अपने टिफिन के खाने को फेंककर स्वाद के लिए बाहर से खाना मंगवाकर खा लेते हैं और ये गरीब आदमी रोटी रोटी को तरसते हैं। मुझे अपने आप पर शर्मिंदगी महसूस हो रही थी। मैं अमीरी गरीबी तो नहीं मिटा सकता हूँ, पर खाना बर्बाद करने की जगह किसी भूखे जरूरतमंद को तो दे सकता हूँ, ये सोचते हुए मैं घर आ गया। टिफिन निकालकर बीवी को पकड़ाया और उस बूढ़े भिखारी की कहे शब्द दोहरा दिए, “खाना बहुत स्वादिष्ट था, आत्मा तृप्त हो गई मेरी।” “अच्छा जी, आज बड़ी तारीफ हो रही खाने की, मैं तो रोज़ ही स्वादिष्ट बनाती हूँ।” कहते हुए बीवी किचन की ओर बढ़ गई। मैंने जैसे ही हाथ मुँह धोए वो चाय ले आई। मैंने चाय पीते हुए पत्नी से कहा, “कल से चार रोटी और कुछ सब्ज़ी ज़्यादा दे सकती हो क्या?” “क्यों क्या बात हुई, इतना खाना खा पाओगे?” उसने पूछा। “नहीं किन्हीं की भूख मिटानी है”, मैंने कहा। पता नहीं बीवी ने कुछ समझा या नहीं, पर उसने चाय के बर्तन समेटते हुए कहा, “खाना तो ज़्यादा डाल दूँगी, पर एक्स्ट्रा टिफिन नहीं है, सिल्वर फोइल में डालकर पॉलीथिन में डाल दूँगी, चलेगा?” “चलेगा” मैंने कहा और हम एक दूसरे को देखकर मुस्कुरा दिए.... ******

  • जीवन की सच्ची पूंजी

    एक बार एक शक्तिशाली राजा दुष्यंत घने वन में शिकार खेल रहा थे। अचानक मौसम बिगड़ गया। आकाश में काले बादल छा गए और मूसलाधार वर्षा होने लगी। धीरे-धीरे सूर्य अस्त हो गया और घना अंधेरा छा गया। अँधेरे में राजा अपने महल का रास्ता भूल गये और सिपाहियों से अलग हो गये। भूख प्यास और थकावट से व्याकुल राजा जंगल के किनारे एक ऊंचे टीले पर बैठ गये। थोड़ी देर बाद उन्होंने वहाँ तीन अबोध बालकों को खेलते देखा। तीनों बालक अच्छे मित्र दिखाई पड़ते थे। वे गाँव की ओर जा रहे थे। सुनो बच्चों, ‘जरा यहाँ आओ।’ राजा ने उन्हें बुलाया। बालको के वहाँ पहुंचने पर राजा ने उनसे पूछा, “क्या कहीं से थोड़ा भोजन और जल मिलेगा? मैं बहुत प्यासा हूँ और भूख भी बहुत लगी है।” बालकों ने उत्तर दिया, “अवश्य, हम घर जा कर अभी कुछ ले आते है।” बालक गाँव की ओर भागे और तुरंत जल और भोजन ले आये। राजा बच्चों के उत्साह और प्रेम को देखकर अत्यधिक प्रसन्न हुए। राजा बोले, “प्यारे बच्चों, मैं इस देश का राजा हूं और तुम लोगों से अत्यंत प्रसन्न हूं। तुम लोग जीवन में क्या करना चाहते हो? मैं तुम सब की सहायता करना चाहता हूँ।” राजा की बात सुनकर बालक आश्चर्यचकित हो गए व सोच में पड़ गए। कुछ देर विचारने के बाद एक बालक बोला, “मुझे धन चाहिए। मैंने कभी दो समय की रोटी भरपेट नहीं खायी है। कभी सुन्दर वस्त्र नहीं पहने है इसलिए मुझे केवल धन चाहिए। इस धन से, मैं अपनी आवश्यकताओं को पूरा करूंगा।” राजा मुस्कुरा कर बोले, “ठीक है, मैं तुम्हें इतना धन दूँगा कि जीवन भर सुखी रहोगे।” राजा के शब्द सुनते ही बालकों की ख़ुशी का ठिकाना न रहा। दूसरे बालक ने बड़े उत्साह से राजा की ओर देखा और पूछा, “क्या आप मुझे एक बड़ा-सा बँगला और घोड़ागाड़ी दे सकते हैं?” राजा ने कहा, “अगर तुम्हें यही चाहिए तो तुम्हारी इच्छा भी पूरी कर दी जाएगी।” तीसरे बालक ने बड़ी गंभीरता के साथ कहा, “मुझे न धन चाहिए न ही बंगला-गाड़ी। मुझे तो आप बस ऐसा आशीर्वाद दीजिए जिससे मैं पढ़-लिखकर विद्वान बन सकूँ और पूर्ण शिक्षित होकर मैं अपने देश की सेवा कर सकूँ।” तीसरे बालक की इच्छा सुनकर राजा अत्यंत प्रभावित हुआ। राजा ने उस बालक के लिए अपने राज्य में ही उत्तम शिक्षा का प्रबंध कर दिया। वह परिश्रमी बालक था, इसलिए दिन-रात एक करके उसने पढाई की और बहुत बड़ा विद्वान बन गया और समय आने पर राजा ने उसकी योग्यता को परख कर अपने राज्य में मंत्री पद पर नियुक्त कर लिया। कुछ समय बीता और एक दिन अचानक राजा को वर्षों पहले घटी उस घटना की याद आई। उन्होंने मंत्री से कहा, “वर्षों पहले तुम्हारे साथ जो दो अन्य बालक थे, अब उनका क्या हाल-चाल है। मैं चाहता हूँ कि एक बार फिर मैं एक साथ तुम तीनो से मिलूं, अतः कल अपने उन दोनों मित्रों को राजमहल में भोजन पर आमंत्रित कर लो।” मंत्री ने दोनों मित्रों को राजमहल में भोजन पर आने का संदेशा भिजवा दिया और अगले दिन सभी एक साथ राजा के सामने उपस्थित हो गए। “आज तुम तीनों मित्रों को एक बार फिर साथ देखकर मैं बहुत प्रसन्न हूँ। अपने मंत्री के बारे में तो मैं जानता हूँ। पर तुम दोनों अपने बारे में कुछ बताओ।” राजा ने मंत्री के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा। जिस बालक ने राजा से धन माँगा था वह दुखी होते हुए बोला, “राजा साहब, मैंने उस दिन आपसे धन मांग कर बहुत बड़ी गलती की। इतना सारा धन पाकर मैं आलसी बन गया और बहुत सारा धन बेकार की चीजों में खर्च कर दिया, मेरा बहुत सा धन चोरी भी हो गया। और कुछ एक वर्षों में ही मैं वापस उसी स्थिति में पहुँच गया जिसमें आपने मुझे देखा था।” बंगला-गाडी मांगने वाला बालक भी अपना रोना रोने लगा, “महाराज, मैं बड़े ठाट से अपने बंगले में रह रहा था, पर वर्षों पहले आई बाढ़ में मेरा सबकुछ बर्वाद हो गया और मैं भी अपने पहले जैसी स्थिति में पहुँच गया। दोनों बालकों की कहानी सुनकर राजा मुस्कुराए और जीवन में फिर कभी ऐसी गलती न करने की सलाह देकर उन्हें विदा किया। सार - धन-संपदा सदा हमारे पास नहीं रहती पर ज्ञान जीवन-भर मनुष्य के साथ रहता है और काम आता है और उसे कोई चुरा भी नहीं सकता। इसलिए सबसे बड़ा धन “विद्या” ही है।” ******

bottom of page