Search Results
966 results found with an empty search
- हद हो गयी
निरजंन धुलेकर बबलू की मम्मी से पास दूर का कोई भी रिश्तेदार ख़ास ख़ुश नहीं था, वजह थी उनकी अजीबोगरीब आदतें और एक तकिया कलाम। आज बबलू की मम्मी अपनी शादी की तीसवीं सालगिरह के फंक्शन में मिले व्योहार का ब्यौरा डायरी में लिख रहीं थीं। एक एक लिफाफा पार्सल पैकेट खुलता जा रहा था और उनकी रँनिंग कमेंट्री भी चलने लगी। एल्लो, कानपुर वाली जिज्जी दस दस के नोट के कुल पाँच सौ रुपये पकड़ा गयी हैं इन्हें कौन बताए कि रेट ग्यारह सौ का चल रहा आज कल। उस दिन इनके स्टेशन से आने पर ऑटो को देने के लिए खुल्ले नही थे हमाये पास, सो उन्हें ही देने पड़े थे, हद हो गयी। हें ये क्या है चश्मे का फ्रेम? छोटे जीजा की चश्मे की दुकान है तो वो यही पकड़ा रहे व्योहार में, मेरा आंख का नम्बर ले कर फ्रेम में काँच लगा कर भेजते तो कोई बात होती, हद हो गयी। हाय राम। जिठानी जी ने फिर तौलिए दे दिए? जब आयी थीं यहाँ उस दिन नहाते वक्त एक भी तौलिया सूखा नही था उसी का बदला निकाल रहीं, अब मैं भी इनके डब्बू की शादी में साबुन बट्टी दूंगी। हद हो गयी। अरे। इनकी परम प्रिय भाभी जी ने गुलदान दिया है, हमे क्या ब्लडी फूल समझ रखा है? इसे अपने घर मे यूज क़रतीं थी देखा था मैंने, हद हो गयी। अब जे देखो। बुआ जी ने स्कॉच ब्राइट के दस पैकेट दिए हैं पिछली बार आयीं थी तो किचन की सफाई को लेकर कितनी नौटंकी की थी। रुको, इनकी बेटी की शादी में मैं भी फिनायल की बोतल ही दूंगी, हद हो गयी। हे भगवान जे फूफा भी न। कान के ईयर बड के पैकेट भेजे हैं, पिछली बार मुँह से निकल गया था कि कान मत खाइए मेरे बस तो कोई ये भेजता है क्या, हद हो गयी। जे लो, बड़े जीजाजी ने मोबाइल की बैटरी भेजी है। तीन बार उन्होंने कॉल किया था और तीनों बार मेरे मोबाइल की बैटरी लो होने से कॉल लुप्प हो गया, जे नही की नया मोबाइल ही भेज देते, हद जो गई। धन्य हो गयी, सासु जी ने भी कुछ दिया है देखूं तो ज़रा। सत्यानाश हो ये पेट सफा भी कोई गिफ्ट करने की चीज है? हाँ मुझे थोड़ी देर लगती है अंदर पर उन्हें भी देरी की आदत डालनी चाहिए न तीस सालों में, हद हो गयी। आआहा पतिदेव का पार्सल? देखें भाई क्या तोहफा भेजा है मेरे लिए। हें सेरिडोन की गोलियाँ? इन्हें मालूम है न मैं डिस्प्रीन लेती हूँ, एक काम ठीक से नही होता इनसे कसम से तभी तो हम हर वक़्त माथे पर पट्टी बांधे पड़े रहते, हद हो गई। अरे वाह। बहुरानी का पार्सल? देखें तो हमारी बहु को हमसे कितना प्यार है? हे राम जे क्या? नींद की गोलियाँ वो भी पूरे हज़ार का बंडल? बबलू एक बात सुनो। तुम लोग रात भर इतनी खटर पट्टर मचाये रखते हो हमे सारी रात उठ उठ कर टोकना पड़ता है, सोते क्यूँ नही? बहु को भेज यहाँ ये सारी उसी को दे दूंगी। आ तो गए चिक्की डब्बू, अब तो चैन सोने दो मुझे, हद हो गई। *******
- जगन्नाथ भगवान
डा अर्चना सिंह चौहान जय जय जगन्नाथ भगवान । तुम्हरी महिमा बड़ी महान ॥ उड़ीसा में जाय बिराजै, नित उठ खिचड़ी भोग है साजै । बहन सुभद्रा बलदाऊ भैया , संग है जगन्नाथ भगवान । तुम्हरी महिमा बड़ी महान , जय जय जगन्नाथ भगवान ॥ सतयुग मे बद्रीनाथ की , त्रेता महिमा रामेश्वर की । द्वापर में द्वारिका पुरी की , कलयुग जगन्नाथ धाम की । दर्शन को लालायित सब भगवान, करते है सबका कल्याण । तुम्हरी महिमा बड़ी महान ' जय जय जगन्नाथ भगवान ॥ अदभुत चले है पवन झरोखा, उलटा ही लहराय पताका । कई अजूबे है परिसर मे , कल्पवृक्ष है स्वर्ग लोक का । लाए इन्द्र देव भगवान , देते है इच्छित वरदान । तुम्हरी महिमा बड़ी महान, जय जय जगन्नाथ भगवान ॥ रथ का उत्सव बड़ा ही प्यारा , भक्त लगाते है जयकारा । उलटी एकादशी टगी है , सबके मन में आस लगी है । पूरन हों जाय सबके काम दे दो ऐसा प्रभु वरदान तुम्हरी महिमा बड़ी महान जय जय जगन्नाथ भगवान *******
- एक पुरुष ऐसा भी
दीपक सिंह मैं और विवान, दोनों देहरादून में रहते थे। हम दोनों JBIT Dehradun से बी.टेक कर रहे थे और यह हमारा अंतिम सेमेस्टर था। विवान पढ़ाई में अत्यंत मेधावी थे। मध्यमवर्गीय परिवार से संबंध रखने वाले विवान का व्यक्तित्व जितना आकर्षक था, उतना ही सादगीपूर्ण भी। लंबा कद, मजबूत शरीर, चेहरे पर गम्भीरता और आँखों में एक अलग ही आत्मविश्वास—कॉलेज की न जाने कितनी लड़कियाँ उन पर मोहित थीं, पर विवान ने कभी किसी की ओर विशेष ध्यान नहीं दिया। वह अपने लक्ष्य और अपने सिद्धांतों में ही खोए रहते थे। बी.टेक समाप्त होते ही कॉलेज कैंपस प्लेसमेंट में हम दोनों का चयन हो गया। मुझे और विवान को बंगलोर कार्यालय के लिए नियुक्त किया गया। यह हमारे जीवन का एक नया अध्याय था—नई जगह, नए सपने और नई शुरुआत। बंगलोर जैसे महानगर में किराए पर घर ढूँढ़ना किसी चुनौती से कम नहीं था। बहुत प्रयासों के बाद मैंने एक पेइंग गेस्ट में साझा कमरे पर दस हजार रुपये मासिक किराए में एक बेड ले लिया। विवान भी पास ही किसी बॉयज़ हॉस्टल में रहने लगे। धीरे-धीरे हम दोनों ने एक ही कार्यालय में साथ काम करना शुरू किया। पहले केवल औपचारिक बातचीत होती थी, लेकिन समय के साथ हमारी मुलाकातें बढ़ने लगीं। कार्यालय के बाद की शामें अब अक्सर हम साथ बिताने लगे थे। कभी चाय की छोटी-सी दुकान, कभी शहर की शांत सड़कें, तो कभी किसी पार्क की बेंच—हमारी बातें घंटों चलती रहतीं। समय बीतता गया और अनजाने में ही मेरा मन विवान के और करीब आता चला गया। उनकी सादगी, उनका शांत स्वभाव, दूसरों के प्रति सम्मान, आँखों की गहराई और होंठों पर सजी हल्की-सी मुस्कान—सब कुछ मुझे भीतर तक छूने लगा था। उनका मजबूत और सधा हुआ व्यक्तित्व ऐसा था कि कई बार मन करता, बस उनकी बाँहों में सिमटकर सारी दुनिया भूल जाऊँ। धीरे-धीरे मैंने विवान से विवाह की बात करनी शुरू कर दी। शुरुआत में वह हर बार मुस्कुराकर बात टाल देते, लेकिन शायद वह भी मेरे मन की भावनाओं को समझने लगे थे। कुछ समय बाद उन्होंने भी इस रिश्ते के लिए अपनी सहमति दे दी। फिर एक दिन, दोनों परिवारों की रज़ामंदी और आशीर्वाद के साथ, हम दोनों विवाह के पवित्र बंधन में बंध गए। उस दिन ऐसा लगा मानो जीवन ने मेरी हर अधूरी इच्छा पूरी कर दी हो। यूरोप में पंद्रह दिनों तक अपने जीवन के सबसे खूबसूरत पलों को साथ बिताने के बाद हम दोनों वापस देहरादून लौट आए। वहाँ कुछ दिन हमने अपने माता-पिता और परिवार के साथ बिताए। उन दिनों घर में मानो खुशियों का उत्सव सा छाया रहता था। शादी की नई चमक, रिश्तों की गर्माहट और भविष्य के सुनहरे सपने—सब कुछ किसी सुंदर कहानी जैसा लग रहा था। लगभग पंद्रह दिन परिवार के साथ बिताने के पश्चात हम दोनों पुनः बंगलोर लौट आए और अपने-अपने कार्यों में व्यस्त हो गए। बंगलोर पहुँचने के कुछ समय बाद ही विवान ने हम दोनों की सैलरी के आधार पर बैंक से होम लोन स्वीकृत करवा लिया। फिर हमने अपने सपनों का एक छोटा-सा आशियाना खरीदा—तीन बेडरूम का सुंदर-सा घर, जहाँ हमारी नई जिंदगी ने सचमुच आकार लेना शुरू किया। मैंने विवान को कई बार समझाने का प्रयास किया कि घर के लिए लोन लेने की आवश्यकता नहीं है। मैंने उनसे कहा कि मैं अपने पिता से सहायता ले सकती हूँ, क्योंकि जो कुछ उनका है, वह मेरा भी तो है। लेकिन विवान ने बड़ी विनम्रता और आत्मसम्मान के साथ मेरी बात ठुकरा दी। वह हमेशा कहते थे— “अपना घर अपनी मेहनत से बनाना ही सबसे बड़ी खुशी होती है।” विवान का स्वाभिमान मुझे हमेशा भीतर तक छू जाता था। उन्होंने शादी भी अत्यंत सादगीपूर्ण ढंग से कोर्ट में की थी। हालाँकि बाद में दोनों परिवारों ने मिलकर विवाह का भव्य स्वागत समारोह आयोजित किया, लेकिन विवान और उनके परिवार ने दहेज के नाम पर कुछ भी स्वीकार करने से साफ़ इंकार कर दिया। उन्होंने केवल शुभकामनाओं और स्नेह के प्रतीक स्वरूप मिले उपहार ही स्वीकार किए। मध्यमवर्गीय परिवार से होने के बावजूद विवान दिल के बेहद अमीर इंसान थे। उनके भीतर आत्मसम्मान भी था और अपनों के लिए अथाह प्रेम भी। शादी को अभी डेढ़ वर्ष ही बीते थे कि हमारे जीवन में एक और नई खुशी ने दस्तक दी—हमारे बेटे का जन्म हुआ। उस दिन विवान की आँखों में जो चमक थी, उसे शब्दों में बाँध पाना शायद संभव नहीं। वह घंटों हमारे बेटे को अपनी बाँहों में लेकर उससे बातें करते रहते। कभी उसे सीने से लगाए मुस्कुराते, तो कभी उसकी छोटी-छोटी उँगलियों को पकड़कर खो जाते। कई बार ऐसा होता कि बेटे को सीने पर सुलाते-सुलाते विवान स्वयं भी उसी के साथ सो जाते। उन दिनों हमारा घर सचमुच प्रेम, हँसी और सुकून से भरा हुआ था। ऐसा लगता था मानो जिंदगी ने हमें हर वह खुशी दे दी हो, जिसकी हमने कभी कल्पना की थी। उस दिन भी सब कुछ बिल्कुल सामान्य था। रोज़ की तरह हम दोनों सुबह तैयार होकर अपने छोटे-से बेटे को क्रैच में छोड़ने गए और फिर कार्यालय के लिए निकल पड़े। जाते समय घर को हमेशा की तरह ताला लगाकर बंद कर दिया था। हमें क्या पता था कि हमारी अनुपस्थिति में जिंदगी हमारे लिए एक भयानक मोड़ लेकर खड़ी है। हमारे ऑफिस पहुँचने के कुछ ही समय बाद अचानक फोन आया कि हमारे घर में आग लग गई है। शायद किसी बिजली के शॉर्ट सर्किट के कारण, या फिर किसी और वजह से देखते ही देखते पूरा घर आग की लपटों में घिर गया था। आस-पास रहने वाले लोगों ने तुरंत फायर ब्रिगेड को सूचना दी। बड़ी मुश्किल से घर का ताला तोड़कर आग पर काबू पाया गया। हमें भी तत्काल घर बुला लिया गया। जब मैं वहाँ पहुँची, तो मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई। हमारा घर… हमारा सपना… हमारी मेहनत… सब कुछ राख में बदल चुका था। कमरे धुएँ से काले पड़ चुके थे, दीवारों पर जलन के निशान थे और घर का अधिकांश सामान राख बन चुका था। मैं वहीं खड़ी सब कुछ देखती रही। ऐसा लग रहा था जैसे किसी ने मेरी पूरी दुनिया मेरी आँखों के सामने जला दी हो। उस घर का एक-एक कोना हमने कितनी मेहनत, कितने संघर्ष और कितने सपनों से सजाया था। मेरी कितनी बड़ी इच्छा थी कि मैं अपने सास-ससुर के साथ उसी घर में रहूँ, उनकी बहू नहीं बल्कि बेटी बनकर उनकी सेवा करूँ। लेकिन एक पल में ऐसा लगा जैसे मेरे सारे अरमान धुएँ में उड़ गए हों। घर, गाड़ी—सब कुछ लोन पर था। ऊपर से अनजान शहर, नए लोग और यह टूटा-बिखरा घर… समझ ही नहीं आ रहा था कि अब कहाँ जाएँ, किससे मदद माँगें। वह घर, जो कभी हमारा सबसे प्यारा आशियाना था, अब मुझे किसी उजड़े हुए खंडहर जैसा लगने लगा था। मैंने घबराकर विवान से कहा— “इस मुश्किल समय में मम्मी-पापा को बता देते हैं… उनसे मदद मांग लेते हैं।” मेरे पिता रिटायर्ड कर्नल थे। उनकी अच्छी स्थिति थी, पैसों की कोई कमी नहीं थी। मुझे लगा शायद अब वही हमारा सहारा बन सकते हैं। लेकिन विवान… उनके चेहरे पर ज़रा-सी भी शिकन नहीं थी। होंठों पर वही पुरानी शांत मुस्कान थी। वह लगातार मुझे हिम्मत बँधा रहे थे। उन्होंने बहुत धीरे से मेरा हाथ पकड़कर कहा— “रितिका, चिंता मत करो… सब ठीक हो जाएगा। बस थोड़ा धैर्य रखना पड़ेगा। कुछ सामान दोबारा ठीक हो जाएगा, और जो नहीं होगा, उसे फिर से खरीद लेंगे। माता-पिता को इस परेशानी में क्यों घबराना? धीरे-धीरे सब संभल जाएगा।” उनकी आवाज़ में इतना विश्वास, इतना अपनापन था कि मैं खुद को रोक नहीं पाई। मेरी आँखें आँसुओं से भर आईं, गला रुंध गया। शायद विवान मेरे टूटते हुए मन को समझ गए थे। उन्होंने मुझे अपनी बाँहों में भर लिया। उनके सीने से लगते ही ऐसा लगा जैसे सारी बेचैनी धीरे-धीरे शांत होने लगी हो। उस पल मुझे एहसास हुआ—घर सिर्फ ईंटों और दीवारों से नहीं बनता… घर उस इंसान से बनता है, जो हर टूटन में आपका हाथ थामे खड़ा रहे। और विवान… मेरे लिए वही घर थे। उस कठिन समय में मैंने पहली बार सचमुच महसूस किया कि एक पुरुष केवल घर चलाने वाला व्यक्ति नहीं होता, बल्कि वह उस मजबूत स्तम्भ की तरह होता है, जिसके कंधों पर पूरे परिवार की छत टिकी होती है। वह स्वयं धूप, बारिश, सर्दी और थकान सह लेता है, लेकिन अपने परिवार तक किसी तकलीफ़ की आँच नहीं आने देना चाहता। वह उस विशाल वृक्ष के समान होता है, जिसकी छाँव में पूरा परिवार सुकून से जीवन बिताता है, जबकि वह स्वयं हर मौसम की मार चुपचाप सहता रहता है। उसे अपने आराम, अपने भोजन या अपनी इच्छाओं की उतनी चिंता नहीं होती, जितनी अपने परिवार की होती है। उसकी सबसे बड़ी फिक्र होती है—अपने माता-पिता, पत्नी और बच्चों की, उन लोगों की जिन्होंने उसे प्यार, संस्कार और जीवन दिया होता है। धीरे-धीरे उस दुखद घटना के घाव भी भरने लगे। समय ने हमारे टूटे हुए जीवन को फिर से संभालना शुरू कर दिया। हमारा बेटा भी अब पाँच वर्ष का हो चुका था। उसकी मासूम हँसी ने घर में फिर से खुशियों की रोशनी भर दी थी। विवान की अथक मेहनत, लगन और प्रतिभा का परिणाम यह हुआ कि कंपनी ने हमें अमेरिका के एक बड़े प्रोजेक्ट के लिए चयनित कर लिया। इसी के साथ विवान का प्रमोशन भी हो गया। अमेरिका पहुँचने के बाद हमारी जिंदगी ने एक नया मोड़ लिया। वहाँ हमने एक सुंदर-सा शानदार बंगला खरीदा। विवान ने दो गाड़ियाँ भी लीं—एक अपने लिए और दूसरी मेरी सुविधा के लिए। आज विवान रोज़ ऑफिस जाते हैं और मैं घर से अपना कार्य करती हूँ। सबसे बड़ी खुशी यह है कि अब मम्मी-पापा भी हमारे साथ रहते हैं। मैं अपनी सामर्थ्य के अनुसार उनकी सेवा करने का प्रयास करती हूँ। सच कहूँ तो मुझे कभी यह महसूस ही नहीं हुआ कि मैं केवल उनकी बहू हूँ। मैं उन्हें अपने माता-पिता की तरह मानती हूँ। उनकी देखभाल करके मुझे एक अद्भुत आत्मिक शांति और संतोष मिलता है। शायद इसलिए भी, क्योंकि विवान हमेशा हमारे लिए हर जिम्मेदारी प्रेम से निभाते आए हैं। अब हमारा बेटा भी दस वर्ष का हो चुका है। दादा-दादी के साथ रहते-रहते वह उनके इतना करीब हो गया है कि कई बार लगता है जैसे उसे हमारी तुलना में उनका साथ अधिक प्रिय हो। दादा-दादी तो उसे प्यार से “छोटा विवान” कहकर बुलाते हैं। घर में जब उसकी खिलखिलाहट गूँजती है और मम्मी-पापा के चेहरे पर मुस्कान आती है, तब लगता है कि जीवन की असली खुशियाँ धन-दौलत में नहीं, बल्कि परिवार को साथ लेकर चलने में हैं। सुख तो बिखरने में नहीं, जुड़कर रहने में है। जब परिवार के लोग एक-दूसरे का हाथ थामकर, कंधे से कंधा मिलाकर जीवन की राह पर चलते हैं, तब जीवन की कठिन से कठिन यात्रा भी बेहद सुंदर बन जाती है। आज जब मैं पीछे मुड़कर देखती हूँ, तो महसूस करती हूँ कि हर स्त्री के जीवन में विवान जैसा जीवनसाथी होना सचमुच एक सौभाग्य है— ऐसा पुरुष, जो केवल अपने लिए नहीं, बल्कि पूरे परिवार को साथ लेकर जीना जानता हो। ******
- वाणी, चरित्र का प्रतिबिंब है।
व्यक्ति स्वच्छ, साफ वस्त्र धारण करता है, आकर्षक जूते-चप्पल पहनता है, आधुनिक व बड़ी गाड़ी का उपयोग करता है, विशाल, सुंदर भवन का निर्माण करता है। यह सब व्यक्ति अपने संगी-साथियों को आकर्षित करने और उनपर अपना प्रभाव छोड़ने के लिए ही करता है। ऐसे मोहक पहनावे से दूसरा व्यक्ति आकर्षित हो सकता है। इस आकर्षण को स्थाई बनाए रखने के लिए व्यक्ति के आंतरिक गुणों की सुंदरता का भी अत्यधिक महत्व हो जाता है। इन आंतरिक गुणों में प्रथम है, मधुर वाणी। बाहरी साज सज्जा होने के बाद यदि वाणी मधुर नहीं, तो व्यक्ति का आकर्षण चिरस्थाई न हो पाएगा। वाणी ही मनुष्य के चरित्र का वास्तविक प्रतिबिंब होती है। व्यक्ति के बोले गए शब्दों व उसके द्वारा किए गए कृत्यों का वास्तविक विश्लेषण व्यक्ति के संपूर्ण व्यक्तित्व का दर्पण बन जाता है। व्यक्ति जब दूसरों के लिए अपशब्दों का प्रयोग करता है, तो इन शब्दों से वह स्वयं अपने उद्देश्य से भ्रमित होकर अपनी विश्वसनीयता और प्रतिष्ठा को भी नुकसान पहुंचाता है। विशुद्ध सात्विक विचारों को प्रिय एवं मधुर शब्दों में व्यक्त कर मनुष्य दूसरों पर अत्यंत गहन प्रभाव छोड़ जाता है। कहा जाता है कि मधुर वाणी व प्रिय शब्दावली का प्रयोग कर व्यक्ति शत्रु को भी परास्त कर सकता है। यह गुण ही मनुष्य की इंद्रियों का दैवीय आभूषण है। अप्रिय व कटु वचनों का प्रयोग ही मनुष्य के कर्मों का निर्धारण भी करता है। मधुर वचनों के प्रयोग से मनुष्य सद्गति को प्राप्त कर सकता है। अतः मधुर वचनों के प्रयोग को एक साधना के तौर पर अपने जीवन में उतार लिया जाना चाहिए और यह निश्चित कर लेना चाहिए कि सदा सर्वदा मीठी बात ही बोलूंगा, कम बोलूंगा, और सब कुछ मधुरता की मिश्री से युक्त करके ही बोलूंगा। कड़वी बातों से जो भयंकर प्रभाव पड़ता है, वह सर्वविदित है। किसी से कटु, अप्रिय, अभद्र शब्द न बोलिए, अपनों से छोटों, नौकरों, बालको यहां तक कि जानवरों तक को अपशब्द द्वारा न पुकारिये। यदि अपशब्दों के प्रयोग से होने वाले प्रभाव की वैज्ञानिकता पर विचार किया जाए, तो हम पाते हैं कि मनुष्य द्वारा बोले गए अपशब्द, उस मनुष्य के आस-पास ही अपशब्दों का एक विद्युत चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न कर देते हैं। वह मनुष्य स्वयं उस विद्युत चुंबकीय क्षेत्र के केंद्र में स्थित होता है। अतः इन विद्युत चुंबकीय तरंगों के कुप्रभाव का सर्वाधिक असर बोले गए व्यक्ति के ऊपर ही पड़ता है। अपशब्दों के लगातार प्रयोग से विद्युत चुंबकीय तरंगों का घेरा घना होता चला जाता है। परिणाम स्वरुप उसका प्रभाव भी तीव्रतम हो जाता है। अंततः मनुष्य इन तरंगों के प्रभाव से अपने चरित्र व गरिमा की बलि देकर अशिष्ट और दुराचारी व्यक्ति के रूप में समाज में स्थापित हो जाता है। मधुर वचन सुनकर किसका ह्रदय प्रसन्न नहीं हो जाता। संसार की प्रत्येक वस्तु प्रेम से प्रभावित होती है। मनुष्य अपनी भावनाओं का अधिकांश प्रदर्शन वचनों द्वारा ही करता है। बालक की मीठी-मीठी बातें सुनकर बड़े-बड़े विद्वानों तक हृदय खिल उठता है। तभी कहा गया है कि मधुर वचन मीठी औषधि के समान लगते हैं। तो कड़वे वचन तीर के समान चुभते हैं। शिशु से लेकर वृद्ध तक संपूर्ण जगत मीठे वचनों को ही सर्वाधिक पसंद करते हैं। मधुर वचनों से मनुष्य तो क्या देवता भी प्रसन्न हो जाते हैं। मीठे का प्रभाव अत्यंत तीव्र व दूरगामी होता है। यही कारण है कि भोजन में मीठे की प्रबलता होती है। मधुर भाषण जैसी मिठास भला कहां प्राप्त की जा सकती है। स्वयं रहीम दास जी ने भी अपने मुख से कहा है कि कागा काको धन हरे, कोयल काको देय। मीठे वचन सुनाय कर, जग अपना कर लेय।। अर्थात न तो कौवे ने हमारी कोई संपत्ति हड़प ली है और न ही कोयल ने हमें कोई विशेष संपत्ति दे दी है। यह तो केवल उन दोनों की वाणी का प्रभाव है, कि कोयल को हम कितने ध्यान से सुनते हैं, जबकि कौवे को देखते ही दुत्कार देते हैं। रिचर्ड कार्लसन ने कहा, "जब हम किसी अन्य व्यक्ति की आलोचना करते हैं या उस व्यक्ति के लिए अपशब्दों का प्रयोग करते हैं, तो ऐसे शब्दों का कुप्रभाव, अमुक व्यक्ति के स्थान पर स्वयं के ऊपर ही अधिक पड़ता है।" जो कि वैज्ञानिकता के आधार पर भी उचित प्रतीत होता है। एक अन्य विचारक के अनुसार, “प्रिय भाषण में वशीकरण की महान शक्ति होती है। इससे पराए भी अपने हो जाते हैं। सर्वत्र मित्र ही मित्र दृष्टिगोचर होते हैं। मधुर भाषण एक दैवीय वरदान है। शास्त्रों में इसे सर्व शिरोमणि कहा जाता है।” माधुर्य रस से ओतप्रोत, सत्य, हितकर व प्रिय भाषण एक सिद्धि के रूप में कार्य करता है। यह आत्म-संयम, स्वार्थ-त्याग एवं प्रेम भावना से ही उत्पन्न हो सकता है। जिस व्यक्ति के मन, वचन व कर्मों में दूसरों के प्रति मधुर भाव है, उसे ही इस वशीकरण विद्या का पूर्ण ज्ञाता माना जा सकता है। ऐसे व्यक्ति के हाथ में जड़ से लेकर चेतन तक सभी को वश में कर लेने की सिद्धि प्राप्त हो जाती है। डेल कार्नेगी के अनुसार, “कोई भी मूर्ख आलोचना, निंदा और अपशब्दों का प्रयोग कर, शिकायत कर सकता है, लेकिन माधुर्य, प्रेम व आत्मसंयम से ओतप्रोत वाणी का प्रयोग एक सशक्त, आचरणवान व धर्मवीर मनुष्य ही कर सकता है।” जो व्यक्ति मधुर वचन नहीं बोलते वह अपनी वाणी का दुरुपयोग करते हैं। ऐसे व्यक्ति संसार में अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा को खो बैठते हैं। तथा अपने जीवन को कष्टकारी बना लेते हैं। कड़वे वचन से उनके बनते काम बिगड़ जाते हैं तथा वे प्रतिपल अपनी विरोधी शक्तियों को जन्म देते रहते हैं। उन्हें सांसारिक जीवन में सदा अकेलापन झेलना पड़ता है। तथा मुसीबत के समय लोग उन से मुंह फेर लेते हैं। मधुर वचन बोलने वाले व्यक्ति सबको सुख शांति देते हैं। सभी ऐसे लोगों का साथ पसंद करते हैं। इससे समाज में पारस्परिक सौहार्द की भावना का संचार करने में मदद मिलती है। सामाजिक मान प्रतिष्ठा और श्रद्धा का आधार स्तंभ वाणी ही है। अपनी वाणी का प्रयोग हम जिस प्रकार करते हैं हमें वैसा ही फल मिलता है। हम अपने वचनों से अपनी सफलता के द्वार खोल सकते हैं या असफलता को निमंत्रण दे सकते हैं। मधुर बोलिए और उसके मीठे फल आपको मिलेंगे। मधुर भाषण करने वाले की जिव्हा पर साक्षात सिद्धियां निवास करती है। यह दैवीय संपत्ति का लक्षण है। शास्त्रकारों का मत है कि “सत्य बोलो और मधुर बोलो। कटु सत्य कभी मत बोलो।“ यह भी परम सत्य है कि मधुर वाणी निंदा, छिद्रान्वेषण, परदोषदर्शन, आलोचना, खरी-खोटी, नीचता, ईर्ष्या इत्यादि से बहुत दूर रहती है। इसका प्रमुख उद्देश्य दूसरों के सद्गुणों, उच्च भावनाओं, सदविचारों को प्रकट करना है। मधुर वाणी से आयु में भी वृद्धि होती है। सभी प्राणियों का यह मानवोचित कर्तव्य है, कि दूसरे की भावनाओं का आदर करें। ऐसा करने से मनुष्य के मनुष्य से गहन गंभीर भाव परक व मधुर संबंध बनते हैं। कहां भी जाता है कि हम जैसे व्यवहार की आशा दूसरों से अपने लिए करते हैं, हमें स्वयं भी दूसरों से वैसा ही व्यवहार करना चाहिए। तभी कहा गया है ऐसी बानी बोलिए, मन का आपा खोय। औरन को शीतल करे, आपहु शीतल होय।। मनुष्य जितना ही प्रिय भाषण का उच्चारण एवं श्रवण करेगा, उतना ही शारीरिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त करेगा। इसके विपरीत खोटे वचन, खोटे सिक्कों के समान कार्य करते हैं। वह आप जिसको भी देंगे, वह आपको सूद समेत लौटा देगा। अतः मीठी वाणी में ही आनंद और माधुर्य है। ********
- सिरफिरा हाथी
डॉ. कृष्णकांत श्रीवास्तव बहुत समय पहले की बात है। गांव में एक अध्यापक रहते थे। उनके अनेकों विद्यार्थी थे। एक दिन अध्यापक ने अपने सभी विद्यार्थियों को अपने पास बुलाया और बड़े प्यार से समझाया, विद्यार्थियों सभी जीवों में ईश्वर का वास होता है इसलिए हमें सबका आदर व सत्कार करना चाहिए। कुछ दिनों बाद अध्यापक जी ने अपने प्रांगण में एक विशाल हवन का आयोजन किया। हवन की लकड़ी के लिए कुछ विद्यार्थियों को पास के जंगल में भेजा गया। विद्यार्थी हवन के लिए लकड़ियाँ चुन रहे थे कि तभी वहाँ एक सिरफिरा हाथी आ धमका। सभी विद्यार्थी शोर मचा कर जान बचाने के लिए भागने लगे, “भागो…। हाथी आया…सिरफिरा हाथी आया…।” लेकिन उन सबके बीच एक आदर्श विद्यार्थी ऐसा भी था जो इस खतरनाक परिस्थिति में भी डरा नहीं और शांत खड़ा रहा। उसे ऐसा करते देख उसके साथियों को बड़ा ही आश्चर्य हुआ और उनमे से एक बोला, “ये तुम क्या कर रहे हो? देखते नहीं सिरफिरा हाथी इधर ही आ रहा है, भागो और जल्द से जल्द अपनी जान बचाओ।” इस पर विद्यार्थी बोला, “तुम लोग जाओ और बचाओ अपनी जान, मुझे इस हाथी से कोई भय नहीं है । अध्यापक जी ने कहा था, कि हर जीव में ईश्वर का वास होता है इसलिए भागने कि कोई जरुरत नहीं क्योंकि ईश्वर हमें हानि नहीं पहुंचा सकता।”ऐसा कह कर वह वहीं खड़ा रहा और जैसे ही हाथी पास आया वह विद्यार्थी उस सिरफिरे हाथी को नमन करने लगा। लेकिन हाथी तो सिरफिरा था और कहां रुकने वाला था, वह सामने आने वाली हर एक चीज को तहस नहस करता जा रहा था। जैसे ही विद्यार्थी उसके सामने आया हाथी ने उसे अपनी सूड़ से उठाया और एक ओर जोर से पटक कर आगे बढ़ गया। विद्यार्थी के शरीर पर बहुत चोट आई, वह घायल हो कर वहीं बेहोश हो गया। काफी समय बाद जब उसे होश आया तो वह आश्रम में था और अध्यापक जी उसके सामने खड़े थे। अध्यापक जी बोले, “सिरफिरे हाथी को आते देखकर भी तुम वहाँ से हटे क्यों नहीं जबकि तुम्हें पता था कि वह तुम्हें चोट ही नहीं पहुंचा सकता बल्कि जान से मार भी सकता था।” तब विद्यार्थी बोला, “अध्यापक जी आपने ही तो कुछ दिन पहले समझाया था कि सभी जीवों में ईश्वर का वास होता है। यही कारण था कि मैं भागा नहीं, मैंने नमस्कार करना ही उचित समझा।” इस पर अध्यापक जी ने विद्यार्थी को समझाया, “बेटा तुम मेरी आज्ञा मानते हो ये बहुत अच्छी बात है मगर मैंने ये भी तो सिखाया है कि विपरीत परिस्थितियों में अपना विवेक नहीं खोना चाहिए। हाथी आ रहा था, यह तो तुमने देखा और वह सिरफिरा है यह भी तुम्हें ज्ञात हो गया था। फिर भी हाथी को तुमने ईश्वर का रूप समझा। मगर बाकी विद्यार्थियों ने जब तुम्हें रोका तो भी तुम्हें क्यों कुछ समझ नहीं आया। उन्होंने तो तुम्हें मना किया था। अन्य विद्यार्थियों की बात का तुमने विश्वास क्यों नहीं किया। उनकी बात मान लेते तो तुम्हें इतनी अधिक तकलीफ का सामना नहीं करना पड़ता, तुम्हारी ऐसी हालत भी नहीं होती। जल में भी ईश्वर का वास है पर किसी जल को लोग देवता पर चढ़ाते हैं और किसी जल का लोग नहाने धोने में प्रयोग करते हैं। हमेशा देश, काल और परिस्थिति को ध्यान में रखकर ही आपना निर्णय लेना चाहिए।” सार - हमें दूसरों कि बात का अनुसरण तो जरुर करना चाहिए मगर विशेष परिस्थिति में अपने विवेक का प्रयोग करने से नहीं चूकना चाहिए। परिस्थितियों के अनुसार निर्णय को परिवर्तित करने में ही बुद्धिमानी है। *******
- उपन्यास सम्राट प्रेमचंद
धनपत राय श्रीवास्तव, जो प्रेमचंद नाम से जाने जाते हैं, का जन्म ३१ जुलाई १८८० को वाराणसी जिले (उत्तर प्रदेश) के लमही गाँव में हुआ था। वो हिन्दी और उर्दू के सर्वाधिक लोकप्रिय उपन्यासकार, कहानीकार एवं विचारक थे। उनकी माता का नाम आनन्दी देवी तथा पिता का नाम मुंशी अजायबराय था जो लमही में डाकमुंशी थे। प्रेमचंद की आरंभिक शिक्षा फ़ारसी में हुई। सात वर्ष की अवस्था में उनकी माता तथा चौदह वर्ष की अवस्था में उनके पिता का देहान्त हो गया जिसके कारण उनका प्रारंभिक जीवन संघर्षमय रहा। प्रेमचंद के जीवन का साहित्य से क्या संबंध है इस बात की पुष्टि रामविलास शर्मा के इस कथन से होती है कि- "सौतेली माँ का व्यवहार, बचपन में शादी, पण्डे-पुरोहित का कर्मकाण्ड, किसानों और क्लर्कों का दुखी जीवन-यह सब प्रेमचंद ने सोलह साल की उम्र में ही देख लिया था। इसीलिए उनके ये अनुभव एक जबर्दस्त सचाई लिए हुए उनके कथा-साहित्य में झलक उठे थे।" उनकी बचपन से ही पढ़ने में बहुत रुचि थी। 13 वर्ष की उम्र में ही उन्होंने तिलिस्म-ए-होशरुबा पढ़ लिया और उन्होंने उर्दू के मशहूर रचनाकार रतननाथ 'शरसार', मिर्ज़ा हादी रुस्वा और मौलाना शरर के उपन्यासों से परिचय प्राप्त कर लिया। उनकी बचपन से ही पढ़ने में बहुत रुचि थी। १३ साल की उम्र में ही उन्होंने तिलिस्म-ए-होशरुबा पढ़ लिया और उन्होंने उर्दू के मशहूर रचनाकार रतननाथ 'शरसार', मिर्ज़ा हादी रुस्वा और मौलाना शरर के उपन्यासों से परिचय प्राप्त कर लिया। उनका पहला विवाह पंद्रह साल की उम्र में हुआ। १९०६ में उनका दूसरा विवाह शिवरानी देवी से हुआ जो बाल-विधवा थीं। वे सुशिक्षित महिला थीं जिन्होंने कुछ कहानियाँ और प्रेमचंद घर में शीर्षक पुस्तक भी लिखी। उनकी तीन संताने हुईं-श्रीपत राय, अमृत राय और कमला देवी श्रीवास्तव। १८९८ में मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद वे एक स्थानीय विद्यालय में शिक्षक नियुक्त हो गए। नौकरी के साथ ही उन्होंने पढ़ाई जारी रखी। १९१० में उन्होंने अंग्रेजी, दर्शन, फारसी और इतिहास विषयसहित इंटर पास किया। १९१९ में बी.ए.[2] पास करने के बाद वे शिक्षा विभाग के इंस्पेक्टर पद पर नियुक्त हुए। १९२१ ई. में असहयोग आंदोलन के दौरान महात्मा गाँधी के सरकारी नौकरी छोड़ने के आह्वान पर स्कूल इंस्पेक्टर पद से त्यागपत्र दे दिया। इसके बाद उन्होंने लेखन को अपना व्यवसाय बना लिया। मर्यादा, माधुरी आदि पत्रिकाओं में वे संपादक पद पर कार्यरत रहे। इसी दौरान उन्होंने प्रवासीलाल केसाथ मिलकर सरस्वती प्रेस भी खरीदा तथा हंस और जागरण निकाला। प्रेस उनके लिए व्यावसायिक रूप से लाभप्रद सिद्ध नहीं हुआ। १९३३ ई. में अपने ऋण को पटाने के लिए उन्होंने मोहनलाल भवनानी के सिनेटोन कंपनी में कहानी लेखक के रूप में काम करने का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। फिल्म नगरी प्रेमचंद को रास नहीं आई। वे एक वर्ष का अनुबंध भी पूरा नहीं कर सके और दो महीने का वेतन छोड़कर बनारस लौट आए। उनका स्वास्थ्य निरंतर बिगड़ता गया। लम्बी बीमारी के बाद ८ अक्टूबर १९३६ को उनका निधन हो गया। साहित्यिकजीवन प्रेमचंद के साहित्यिक जीवन का आरंभ १९०१ से हो चुका था | आरंभ में वे नवाब राय के नाम से उर्दू में लिखते थे। प्रेमचंद के लेख पहली रचना के अनुसार उनकी पहली रचना अपने मामा पर लिखा व्यंग्य थी, जो अब अनुपलब्ध है। शायद उनका वह नाटक था जो उन्होंने अपने मामा जी के प्रेम और उस प्रेम के फलस्वरूप चमारों द्वारा उनकी पिटाई पर लिखा था। इसका जिक्र उन्होंने ‘पहली रचना’नाम के अपने लेख में किया है।" उनका पहला उपलब्ध लेखन उर्दू उपन्यास 'असरारे मआबिद' है जो धारावाहिक रूप में प्रकाशित हुआ। इसका हिंदी रूपांतरण देवस्थान रहस्य नाम से हुआ। प्रेमचंद का दूसरा उपन्यास 'हमखुर्मा व हमसवाब' है जिसका हिंदी रूपांतरण 'प्रेमा' नाम से १९०७ में प्रकाशित हुआ। १९०८ ई. में उनका पहला कहानी संग्रह सोज़े-वतन प्रकाशित हुआ। देशभक्ति की भावना से ओतप्रोत इस संग्रह को अंग्रेज़ सरकार ने प्रतिबंधित कर दिया और इसकी सभी प्रतियाँ जब्त कर लीं और इसके लेखक नवाब राय को भविष्य में लेखन न करने की चेतावनी दी। इसके कारण उन्हें नाम बदलकर लिखना पड़ा। 'प्रेमचंद' नाम से उनकी पहली कहानी बड़े घर की बेटी ज़माना पत्रिका के दिसम्बर १९१० के अंक में प्रकाशित हुई। १९१५ ई. में उस समय की प्रसिद्ध हिंदी मासिक पत्रिका सरस्वती के दिसम्बर अंक में पहली बार उनकी कहानी सौत नाम से प्रकाशित हुई। १९१८ ई. में उनका पहला हिंदी उपन्यास सेवासदन प्रकाशित हुआ। इसकी अत्यधिक लोकप्रियता ने प्रेमचंद को उर्दू से हिंदी का कथाकार बना दिया। हालाँकि उनकी लगभग सभी रचनाएँ हिंदी और उर्दू दोनों भाषाओं में प्रकाशित होती रहीं। उन्होंने लगभग ३०० कहानियाँ तथा डेढ़ दर्जन उपन्यास लिखे। १९२१ में असहयोग आंदोलन के दौरान सरकारी नौकरी से त्यागपत्र देने के बाद वे पूरी तरह साहित्य सृजन में लग गए। उन्होंने कुछ महीने मर्यादा नामक पत्रिका का संपादन किया। इसके बाद उन्होंने लगभग छह वर्षों तक हिंदी पत्रिका माधुरी का संपादन किया। उन्होंने १९३० में बनारस से अपना मासिक पत्र हंस का प्रकाशन शुरू किया। १९३२ ई. में उन्होंने हिंदी साप्ताहिक पत्र जागरण का प्रकाशन आरंभ किया। उन्होंने लखनऊ में १९३६ में अखिल भारतीय प्रगतिशील लेखक संघ के सम्मेलन की अध्यक्षता की। उन्होंने मोहन दयाराम भवनानी की अजंता सिनेटोन कंपनी में कथा-लेखक की नौकरी भी की। १९३४ में प्रदर्शित फिल्म मजदूर की कहानी उन्होंने ही लिखी थी। मरणोपरांत उनकी कहानियाँ "मानसरोवर" नाम से ८ खंडों में प्रकाशित हुईं। प्रेमचंद साहित्य की वैचारिक यात्रा आदर्श से यथार्थ की ओर उन्मुख है। सेवासदन के दौर में वे यथार्थवादी समस्याओं को चित्रित तो कर रहे थे लेकिन उसका एक आदर्श समाधान भी निकाल रहे थे। १९३६ तक आते-आते महाजनी सभ्यता, गोदान और कफ़न जैसी रचनाएँ अधिक यथार्थपरक हो गईं, किंतु उसमें समाधान नहीं सुझाया गया। अपनी विचारधारा को प्रेमचंद ने आदर्शोन्मुख यथार्थवादी कहा है। इसके साथ ही प्रेमचंद स्वाधीनता संग्राम के सबसे बड़े कथाकार हैं। इस अर्थ में उन्हें राष्ट्रवादी भी कहा जा सकता है। प्रेमचंद मानवतावादी भी थे और मार्क्सवादी भी। प्रगतिवादी विचारधारा उन्हें प्रेमाश्रम के दौर से ही आकर्षित कर रही थी। प्रेमचंद ने १९३६ में उन्होंने प्रगतिशील लेखक संघ के पहले सम्मेलन को सभापति के रूप में संबोधन किया था। उनका यही भाषण प्रगतिशील आंदोलन के घोषणा पत्र का आधार बना। इस अर्थ में प्रेमचंद निश्चित रूप से हिंदी के पहले प्रगतिशील लेखक कहे जा सकते हैं। रचनाएँ बहुमुखी प्रतिभासंपन्न प्रेमचंद ने उपन्यास, कहानी, नाटक, समीक्षा, लेख, सम्पादकीय, संस्मरण आदि अनेक विधाओं में साहित्य की सृष्टि की। उनकी ख्याति कथाकार के तौर पर हुई और अपने जीवन काल में ही वे ‘उपन्यास सम्राट’की उपाधि से सम्मानित हुए। उपन्यास · असरारेमआबिद- उर्दू साप्ताहिक आवाज-ए-खल्क़ में 8 अक्टूबर 1903 से 1 फरवरी 1905 तक धारावाहिक रूप में प्रकाशित हुआ। कालान्तर में यह हिन्दी में देवस्थान रहस्य नाम से प्रकाशित हुआ। · हमखुर्माव हमसवाब- इसका प्रकाशन 1907 ई. में हुआ। बाद में इसका हिन्दी रूपान्तरण 'प्रेमा' नाम से प्रकाशित हुआ। · किशना- इसके सन्दर्भ में अमृतराय लिखते हैं कि- "उसकी समालोचना अक्तूबर-नवम्बर 1907 के 'ज़माना' में निकली।" इसी आधार पर 'किशना' का प्रकाशन वर्ष 1907 ही कल्पित किया गया। · रूठीरानी- इसे सन् 1907 में अप्रैल से अगस्त महीने तक ज़माना में प्रकाशित किया गया। · जलवएईसार- यह सन् 1912 में प्रकाशित हुआ था। · सेवासदन- 1918 ई. में प्रकाशित सेवासदन प्रेमचंद का हिन्दी में प्रकाशित होने वाला पहला उपन्यास था। यह मूल रूप से उन्होंने 'बाजारे-हुस्न' नाम से पहले उर्दू में लिखा गया लेकिन इसका हिन्दी रूप 'सेवासदन' पहले प्रकाशित हुआ। यह स्त्री समस्या पर केन्द्रित उपन्यास है जिसमें दहेज-प्रथा, अनमेल विवाह, वेश्यावृत्ति, स्त्री-पराधीनता आदि समस्याओं के कारण और प्रभाव शामिल हैं। डॉ रामविलास शर्मा 'सेवासदन' की मुख्य समस्या भारतीय नारी की पराधीनता को मानते हैं। · प्रेमाश्रम (1922)- यहकिसान जीवन पर उनका पहला उपन्यास है। इसका मसौदा भी पहले उर्दू में 'गोशाए-आफियत' नाम से तैयार हुआ था लेकिन इसे पहले हिंदी में प्रकाशित कराया। यह अवध के किसान आन्दोलनों के दौर में लिखा गया। इसके सन्दर्भ में वीर भारत तलवार किसान राष्ट्रीय आन्दोलन और प्रेमचन्द:1918-22 पुस्तक में लिखते हैं कि- "1922 में प्रकाशित 'प्रेमाश्रम' हिंदी में किसानों के सवाल पर लिखा गया पहला उपन्यास है। इसमें सामंती व्यवस्था के साथ किसानों के अन्तर्विरोधों को केंद्र में रखकर उसकी परिधि के अन्दर पड़नेवाले हर सामाजिक तबके का-ज़मींदार, ताल्लुकेदार, उनके नौकर, पुलिस, सरकारी मुलाजिम, शहरी मध्यवर्ग-और उनकी सामाजिक भूमिका का सजीव चित्रण किया गया है।"[14] · रंगभूमि (1925)- इसमेंप्रेमचंदएक अंधे भिखारी सूरदास को कथा का नायक बनाकर हिंदी कथा साहित्य में क्रांतिकारी बदलाव का सूत्रपात करते हैं। · निर्मला (1925)- यहअनमेल विवाह की समस्याओं को रेखांकित करने वाला उपन्यास है। · कायाकल्प (1926) · अहंकार - इसका प्रकाशन कायाकल्प के साथ ही सन् 1926 ई. में हुआ था। अमृतराय के अनुसार यह "अनातोल फ्रांस के 'थायस' का भारतीय परिवेश में रूपांतर है।"[15] · प्रतिज्ञा (1927)- यहविधवा जीवन तथा उसकी समस्याओं को रेखांकित करने वाला उपन्यास है। · गबन (1928)- उपन्यासकी कथा रमानाथ तथा उसकी पत्नी जालपा के दाम्पत्य जीवन, रमानाथ द्वारा सरकारी दफ्तर में गबन, जालपा का उभरता व्यक्तित्व इत्यादि घटनाओं के इर्द-गिर्द घूमती है। · कर्मभूमि (1932)-यहअछूत समस्या, उनका मन्दिर में प्रवेश तथा लगान इत्यादि की समस्या को उजागर करने वाला उपन्यास है। · गोदान (1936)- यहउनका अन्तिम पूर्ण उपन्यास है जो किसान-जीवन पर लिखी अद्वितीय रचना है। इस पुस्तक का अंग्रेजी अनुवाद 'द गिफ्ट ऑफ़ काओ' नाम से प्रकाशित हुआ। · मंगलसूत्र (अपूर्ण)- यह प्रेमचंद का अधूरा उपन्यास है जिसे उनके पुत्र अमृतराय ने पूरा किया। इसके प्रकाशन के संदर्भ में अमृतराय प्रेमचंद की जीवनी में लिखते हैं कि इसका-"प्रकाशन लेखक के देहान्त के अनेक वर्ष बाद 1948 में हुआ।" कहानी इनकी अधिकतर कहानियोँ में निम्न व मध्यम वर्ग का चित्रण है। डॉ॰ कमलकिशोर गोयनका ने प्रेमचंद की संपूर्ण हिंदी-उर्दू कहानी को प्रेमचंद कहानी रचनावली नाम से प्रकाशित कराया है। उनके अनुसार प्रेमचंद ने अपने जीवन में लगभग 300 से अधिक कहानियाँ तथा 18 से अधिक उपन्यास लिखे है| इनकी इन्हीं क्षमताओं के कारण इन्हें कलम का जादूगर कहा जाता है| प्रेमचंद का पहला कहानी संग्रह सोज़े वतन (राष्ट्र का विलाप) नाम से जून 1908 में प्रकाशित हुआ। इसी संग्रह की पहली कहानी दुनिया का सबसे अनमोल रतन को आम तौर पर उनकी पहली प्रकाशित कहानी माना जाता रहा है। डॉ॰ गोयनका के अनुसार कानपुर से निकलने वाली उर्दू मासिक पत्रिका ज़माना के अप्रैल अंक में प्रकाशित सांसारिक प्रेम और देश-प्रेम (इश्के दुनिया और हुब्बे वतन) वास्तव में उनकी पहली प्रकाशित कहानी है। कुछ कहानियों का शीर्षक इस प्रकार है - अन्धेर, अनाथ लड़की, अपनी करनी, अमृत, अलग्योझा, आखिरी तोहफ़ा, आखिरी मंजिल, आत्म-संगीत, आत्माराम, दो बैलों की कथा, आल्हा, इज्जत का खून, इस्तीफा, ईदगाह, ईश्वरीय न्याय, उद्धार, एक आँच की कसर, एक्ट्रेस, कप्तान साहब, कर्मों का फल, क्रिकेट मैच, कवच, कातिल, कोई दुख न हो तो बकरी खरीद ला, कौशल़, खुदी, गैरत की कटार, गुल्ली डण्डा, घमण्ड का पुतला, ज्योति, जेल, जुलूस, झाँकी, ठाकुर का कुआँ, तेंतर, त्रिया-चरित्र, तांगेवाले की बड़, तिरसूल, दण्ड, दुर्गा का मन्दिर, देवी, देवी - एक और कहानी, दूसरी शादी, दिल की रानी, दो सखियाँ, धिक्कार, धिक्कार - एक और कहानी, नेउर, नेकी, नबी का नीति-निर्वाह, नरक का मार्ग, नैराश्य इत्यादि। *******
- अजब प्रेम की गजब कहानी
शिवनाथ सुमित एक मध्यमवर्गीय परिवार का बड़ा ही होनहार लड़का था। उसके गाँव में कॉलेज नहीं था इसलिए हाई स्कूल के बाद वह पढ़ने के लिए शहर आ गया था। वह जिस मकान में रह रहा था, वह मकान उसके किसी दूर के रिश्तेदार का था जिसका किराए भी उसे नहीं देना होता था। मकान में बस केवल एक ही कमरा था इसलिए उस मकान में सुमित के अलावे और कोई भी नहीं रहता था। सुमित जहां रह रहा था उसके आस-पास सभी घर गरीब लोगों के थे। चूंकि वह उस घर में अकेला रहता था इसलिए खाना-बनाने व कपड़े धोने से लेकर घर की साफ़-सफाई करने तक सारे काम उसे खुद ही करने होते थे। कुछ दिन बाद एक गरीब लड़की अपने छोटे भाई के साथ सुमित के घर पर आयी। आते ही उसने पूछा- " तुम मेरे भाई को ट्यूशन पढ़ा सकते हो क्या?" सुमित ने कुछ देर सोचा फिर बोला "नहीं"। "क्यूँ? "मैं यहां पढ़ने आया हूं। मेरे पास टाइम नहीं है। मेरी पढ़ाई डिस्टर्ब होगी।" लड़की को शायद पता था कि सुमित खुद से खाना बनाता है इसलिए उसने समय की समस्या का समाधान सुझाते हुए कहा, "अपने भाई को पढ़ाने के बदले मैं तुम्हारा खाना बना दिया करूंगी। इससे तुम्हारे पास जो समय बचेगा उसमें तुम पढ़ा दिया करना।" सुमित ने कोई जवाब नहीं दिया तो वह और लालच देते हुए बोली - "मैं तुम्हारे बर्तन भी साफ़ कर दिया करूंगी।" अब सुमित को भी लालच आ ही गया। उसने कहा- "अगर कपड़े भी धो दोगी तो पढ़ा दूँगा।" वह मान गयी। इस तरह उसका रोज घर में आना-जाना होने लगा। वह लड़की काम करती रहती और सुमित उसके भाई को पढ़ा रहा होता। सुमित की उस लड़की से ज्यादा बातें नहीं होती थी। उसका भाई 8 वीं कक्षा में था। पढ़ने में खूब होशियार था। इस कारण उसे पढ़ाने में सुमित को ज्यादा माथा-पच्ची नहीं करनी पड़ती थी। कभी-कभी वह लड़की सुमित के घर की सफाई भी कर दिया करती थी। वह हर काम इतने मनोयोग से करती, जैसे वह उसका अपना ही घर हो। दिन गुजरने लगे। एक रोज शाम को वह सुमित के यहां आयी तो उसके हाथ में एक बड़ी सी कुल्फी थी। उसने सुमित को जब कुल्फी दी तो उसने पूछ लिया- " कहाँ से लायी हो'? उसने कहा "घर से। आज बरसात हो गयी तो कुल्फियां नहीं बिकी।" इतना कह कर वह थोड़ा उदास हो गयी। "मग़र तुम्हारे पापा तो समोसे-कचोरी का ठेला लगाते हैं न?" "हां, सर्दियों में समोसे-कचोरी और गर्मियों में कुल्फी। आज बारिश हो गयी तो कुल्फी नहीं बिकी।" "हां ठण्ड के कारण लोग कुल्फी नहीं खाते।" सुमित ने आज उसे पहली बार थोड़े गौर से देखा था। गम्भीर मुद्रा में वह उसे अपनी उम्र से थोड़ी बड़ी लगी, शायद परिस्थितियों ने उसे समय से थोड़ा पहले ही बड़ी कर दिया था। वह समझदार भी थी और मासूम भी। धीरे-धीरे वक़्त गुजरने लगा। अब तो कभी-कभार सुमित उसके घर भी जाने लगा। विशेषतौर पर किसी त्यौहार या उत्सव पर। कई बार उस लड़की से सुमित की नजरें मिलती तो फिर मिली ही रह जाती। सुमित कुछ समझ नहीं पाता कि आखिर ऐसा क्यूँ हो रहा है? समय इसी तरह बीतता चला गया। इस बीच सुमित ने कुछ बातें उस लड़की के बारे में भी जान ली कि वो; बूंदी बाँधने का काम करती है। बूंदी मतलब किसी ओढ़नी या चुनरी पर धागे से गोल-गोल बिंदु बनाना। बिंदु बनाने के बाद चुनरी की रंगाई करने पर डिजाइन तैयार हो जाती है। सुमित ने बूंदी बाँधने का काम करते उसे बहुत बार देखा था। एक दिन उसने उससे पूछ लिया- " ये काम तुम क्यूँ करती हो?" "इसके पैसे मिलते हैं।" "क्या करोगी पैसों का?" "इकठ्ठे करती हूँ।" "कितने हो गए?" "यही कोई छः-सात हजार।" "मुझे हजार रुपये उधार चाहिए। जल्दी ही लौटा दूंगा।" सुमित ने उसे आजमाना चाहा। "किस लिए चाहिए?" "कारण पूछोगी तो रहने दो।" सुमित ने थोड़ी मायूसी के साथ कहा। "अरे मैंने तो ऐसे ही पूछ लिया। तू माँगे तो सारे दे दूँ।" उसकी यह आवाज़ सुमित को आज बिलकुल अलग सी ही जान पड़ी मग़र सुमित उस वक़्त कुछ भी समझ नहीं पाया। उसे पैसे मिल रहे थे,वह उन्हीं में खोकर रह गया। दरअसल सुमित ने एक दोस्त से कुछ दिन पहले कुछ पैसे उधार लिए थे। वह दो -तीन बार तगादा कर चुका था। अब वह उसके पैसे आज ही लौटा देगा। उसी को देने के लिए ही उसने लड़की से हजार रूपये उधार मॉंगे थे। एक रोज सुमित को अपनी जेब में गुलाब की टूटी पंखुड़ियाँ मिलीं मगर उस समय वह यह सोच कर रह गया कि कॉलेज के किसी दोस्त ने चुपके से डाल दी होगी। उस समय उसे प्यार-वार की इतनी समझ तो थी नहीं जो वह कुछ समझ पाता। एक दिन सुमित के कॉलेज की एक लड़की दोस्त कुछ नोट्स लेने के लिए सुमित के पास आयी थी। उस समय वह लड़की सुमित के घर के बाहर ही खड़ी थी। उस लड़की को देखकर वह बाहर से ही तुरंत वापस घर चली गयी थी और फ़िर दूसरे दिन दो पहर में ही आ धमकी थी। आते ही उसने कहा- " मैं कल से तुम्हारा कोई काम नहीं करूंगी।" "क्यूँ? काफी देर तक तो उसने जवाब नहीं दिया फिर न जाने क्या सोचकर धोने के लिए उसके बिखरे कपड़े समेटने लगी। "कहीं जा रही हो क्या?" "नहीं। बस तुम्हारा काम नहीं करूंगी और तुम कल से मेरे भाई को भी मत पढ़ाना।" "अरे, तुम्हारे हजार रूपये कल दे दूंगा। कल घर से पैसे आ रहे हैं।" उसने सोचा कि शायद पैसे के लिए ही वह ऐसा कर रही है इस कारण उसने उसे पक्का आश्वासन दे दिया। "पैसे नहीं चाहिए मुझे।" "तो फिर?" सुमित ने अपनी आँखे उसके चेहरे पर टिका रखी थी। जब उसने एक बार फिर सुमित से नजरें मिलायीं तो सुमित को लगा कि उसकी आंखों में हजारों प्रश्न हैं मगर वे सभी उसकी समझ से बाहर के थे। लड़की ने कोई जवाब नहीं दिया और उसके कपड़े लेकर चली गयी। वह अपने घर से ही उसे घोकर लाया करती थी। दूसरे दिन वह न तो खुद उसके यहां आयी और न उसका भाई ही वहां पढ़ने आया। सुमित ने जैसे-तैसे खाना बनाया और खाकर कॉलेज चला गया पर कालेज में मन नहीं लगा। वह समझ नहीं पा रहा था कि जब पैसे वाली बात नहीं है तो फिर यह लड़की ऐसे वर्ताव क्यों कर रही है? उसने बहुत सोचा, बहुत दिमाग लगाया पर कुछ भी समझ नहीं पाया अत: दोपहर को वह जैसे ही कालेज से वापस आया तो वह सीधा उसके घर चला गया। वह जानना चाहता था कि आखिर क्या कारण है कि लड़की उसके काम क्यों नहीं करना चाहती जबकि अपनी ओर से उसने कभी भी उसके साथ किसी तरह का दुर्व्यवहार नहीं किया था। घर में अकेली लड़की को देख उसका फायदा उठाना तो दूर, वह पढ़ने-पढ़ाने में इतना मशगूल रहता था कि उसने पहली बार उस लड़की को ठीक से देखा भी तो उस दिन, जिस दिन वह कुल्फी लेकर उसके घर आयी थी। सुमित जब उसके घर पहुंचा तो उसे पता चला कि वह लड़की बीमार है। वह एक छप्पर में चारपाई पर अकेली लेटी थी। घर में उसकी मम्मी थी जो काम में लगी थी। सुमित जब उसके पास पहुंचा तो उसने करवट लेकर अपना मुँह फेर लिया। सुमित ने पूछा- "दवाई ली क्या?" "नहीं।" उसने बिना सुमित की तरफ देखे एक छोटा सा जवाब दिया। "क्यों नहीं ली? "मेरी मर्ज़ी। तुझे इससे क्या? "ठीक है पर मुझसे नाराज़ क्यूँ हो, ये तो बता दो। मेरी गलती क्या है? मैंने तो कभी तुम्हारे साथ कुछ गलत नहीं किया!" "तुम सब समझते हो।" उसने बिना उसकी तरफ देखे जवाब दिया। "मुझे कुछ नहीं पता। तुम्हारी कसम। सुबह से परेशान हूँ। प्लीज बता दो।" न जाने किस अधिकार से सुमित ने उस लड़की की कसम भी खा ली। "नहीं बताउंगी। जाओ यहाँ से।" इस बार आवाज़ रोने की थी। सुमित को जरा घबराहट सी हुई। आज से पहले उसने कभी किसी लड़की को छुआ तक नहीं था इसलिए उसे उसको छूकर देखने की हिम्मत तो नहीं हो रही थी पर पता नहीं क्यों, आखिर डरते-डरते उसने लड़की के हाथ को जब छूकर देखा तो वह उछल कर रह गया। लड़की का हाथ बहुत ही अधिक गर्म था। सुमित ने उसकी मम्मी को पास बुलाकर उसकी बुखार के बारे में उसे बताया। फिर वे दोनों उसे हॉस्पिटल ले गए। डॉक्टर ने कुछ दवाएं दी और उसे एडमिट कर लिया। कुछ जाँच वगैरह होनी थी क्यूंकि शहर में एक दो डेंगू के मामले आ चुके थे। सुमित को अब उस लड़की को लेकर कुछ चिंता सी होने लगी थी। उसकी माँ उसके पापा को बुलाने घर चली गयी तो सुमित उसके पास अकेला रह गया था। बुखार जरा कम हो गया था। वह लड़की गुमसुम सी लेटी थी। वह दीवार को एकटक घूर रही थी। सुमित ने उसके चेहरे को सहलाया तो लड़की की आँखों में आँसू आ गए। उसे रोते देख सुमित की आंखें भी भींग गयीं। सुमित ने भरे गले से पूछा- "बताओगी नहीं?" लड़की ने आँखों में आँसू लिए मुस्कुराकर कहा- "अब बताने की जरूरत नहीं है। मुझे पता चल गया है कि तुझे मेरी परवाह है। है ना?" सुमित के होठों से अपने आप ही एक अल्फ़ाज़ निकला - "बहुत।" "बस! अब मैं यदि मर भी जाऊँ तो मुझे तुझसे कोई गिला-शिकवा नहीं रहेगी।" उसने सुमित की हाथ को कस कर दबाते हुए कहा। उसके इस वाक्य का कोई भी जवाब सुमित की लबों से तो नहीं निकला मग़र उसकी आँखें शायद उस लड़की के जवाब को संभाल न सकीं और बेचारी बरस पड़ीं। वह लड़की उठ कर बैठ गयी और उससे बोली - "रोता क्यूँ है पागल? मैंने जिस दिन पहली बार तेरे लिए रोटी बनायी थी उसी दिन से मैं तुझे चाहने लगी हूँ पर एक तू था ऐसा पागल कि मेरे प्यार को समझने में इतना वक़्त ले गया।" फिर उसने अपने साथ उसके आँसू भी पोंछे। थोड़ी देर बाद उसके घर वाले आ गए। रात हो गयी थी। उसकी हालत में कोई खास सुधार नहीं हुआ। देर रात तक उसकी बीमारी की रिपोर्ट आ गयी। बताया गया कि उसे डेंगू है। यह जान कर सुमित का सीना किसी अज्ञात भय से जोरों से धड़कने लगा। लड़की को खून की कमी हो गयी थी। यह महज एक संयोग था या कुछ और, पता नहीं, सुमित का खून लड़की के खून से मैच कर गया। सुमित ने जब उसे दो बोतल खून दिया तो उसके दिल को जरा सा सुकून मिला। उस रात वह बिलकुल अचेत सी रही। बार-बार अचेत अवस्था में वह उल्टियाँ कर देती थी। सुमित उस रात एक मिनिट भी सो नहीं पाया। डॉक्टरों ने दूसरे दिन बताया कि रक्त में प्लेटलेट्स की संख्या तेजी से कम हो रही है। उसे और खून देना होगा। डेंगू का वायरस खून का थक्का बनाने वाली प्लेटलेट्स पर हमला करता हैं। अगर प्लेटलेट्स खत्म हो जाते हैं तो पूरे शरीर के अंदरूनी अंगों से ख़ून का रिसाव शुरू हो जाता है और फिर बचने का कोई चांस नहीं रह जाता। लड़की क स्थिति जान सुमित ने अपना खून और देने का आग्रह किया मग़र उसने रात को खून दिया था इस कारण डॉक्टर ने उसका खून लेने से साफ मना कर दिया। अब सुमित ने अपने कॉलेज के दो-चार दोस्तों को वहां बुलाया। सुमित था ही इतना लोकप्रिय की दो-चार कौन कहे, दस दोस्त एक साथ आ गए। सभी ने खून दिया और उसे हिम्मत भी बंधायी। पैसों की भी जरूरत पड़ने पर उसे देने का आश्वासन दिया और वहां से चले गए। उस वक्त उसे भी पता चला कि जिंदगी में दोस्त होना भी कितना जरूरी है। अभी सुमित के पास पैसों की भी कमी नहीं थी क्योंकि घर से आ गए थे। दूसरे दिन की रात वह कुछ ठीक सी दिखी। बातें भी करने लगी। रात को सब सोए थे। सुमित उसके पास बैठा हुआ जाग रहा था। उसने सुमित से कहा- "पागल बीमार मैं हूँ, तू नहीं। फिर तुमने अपनी ऐसी हालत क्यों बना ली है?" "तू ठीक हो जा। मैं तो नहाते ही ठीक हो जाऊंगा।" लड़की ने उदास होकर पूछा - "एक बात बता?" "क्या?" "मैंने एक दिन तुम्हारी जेब में गुलाब डाला था, तुझे मिला था क्या ? "सिर्फ पंखुड़ियाँ मिली थी।" "हाँ" पर तुम कुछ समझे थे या नहीं?" "नहीं।" "क्यूँ?" "सोचा था कॉलेज के किसी दोस्त का मज़ाक है।" "और वो रोटियाँ?" "कौन सी?" "दिल के आकार वाली।" "अब समझ में आ रहा है।" सुमित थोड़ा झेंप गया। लड़की ने उसके कंधों को हल्का धक्का दिया और बोली "बुद्दू हो क्या" "हाँ", पढ़ाई-लिखाई को छोड़ अभी तक कभी कुछ सूझा ही नहीं। आखिर अपने घर का इकलौता चिराग हूं। मुझे अपने घर के लिए बहुत कुछ करना है। सुमित ने जरा गंभीर होकर बड़े ही भोलेपन से जवाब दिया। सुमित के भोलेपन को देख लड़की हँसने लगी। बीमार होने के बावजूद काफी देर तक हॅंसती रही एक निश्छल सी मासूम हंसी। फिर उसने पूछ लिया - "कल सोए थे क्या?" "नहीं।" "अब सो जाओ। मैं ठीक हूँ मुझे कुछ नहीं होगा।" सुमित को सचमुच में नींद आ रही थीं पर वह सो नहीं पाया। वह लड़की सो गयी पर घंटे भर बाद ही वापस जग गयी। सुमित बैठा-बैठा ऊंघ रहा था ।उसने उसे टोका - "सुनो।" "हाँ।" सुमित नींद में ही बोला। "ये बताओ कि ये बीमारी छूने से किसी को लग सकती है क्या?" "नहीं, सिर्फ एडीज मच्छर के काटने से ही लगती है।" "इधर आओ।" सुमित उसके करीब चला गया।" एक बार गले लग जाओ। अगर कहीं मर गयी तो फिर मेरी ये आरज़ू कहीं बाकी न रह जाए।" "ऐसा ना कहो प्लीज।" सुमित बस इतना ही कह पाया। इसके बाद वह लड़की बीमार होने के बावजूद सुमित से काफी देर तक लिपटी रही और फिर सो गयी। उसे ढंग से लिटाकर सुमित भी वहीं पास में ही एक खाली बेड पर सो गया। वह सुबह बड़ी ही मनहूस थी। सुमित तो उठ गया पर वह नहीं उठी। सदा के लिए सो गयी। सुमित ने उसे जगाने की बहुत कोशिश की थी पर उसने आँखे नहीं खोली। खोलती भी तो कैसे? वह इस संसार को, सुमित को छोड़कर इस दुनिया से जा चुकी थी। सुमित को रोता बिलखता छोड़कर। ******
- चोरी के गीत
रॉबिनहुड जिसने चोरी के पढ़े, नब्बे प्रतिशत गीत। उसने मंचों पर किया, जीवन अधिक व्यतीत।। रचनाओं में झोंकता, जो ज़्यादातर जान। मिल पाती उसको नहीं, यहाँ उचित पहचान।। मौलिकता जिनमें भरी, जिनका शिल्प सचेत। उनके हिस्से मंच के, आते बंजर खेत।। कवि अभिनय करके पढ़े, फटे - पुराने छंद। मंदबुद्धि श्रोता करें, उनको बहुत पसंद।। या सच से वाकिफ नहीं, या बनता अंजान। उसकी कविता देश को, पहुँचाती नुकसान।। कविता की जादूगरी, उसको पूरी ज्ञात। अभिनय उसका इसलिए, चलता सारी रात।। जब कविता में घुस गए, नंगे धंधेबाज। आदर कम रखने लगा, इसके लिए समाज।। *****
- अंतिम बार
"बाबू, ई प्योर शीशम के लकड़ी हौ। चमक नहीं देखत हौ, और हल्का कितना हौ लईकन सब पचासों साल बैठी तबो कुछ ना होई। "सीताराम बढ़ई की कही ये बातें जैसे लगती हैं कल की ही बात हो, लेकिन, इस बात को सुने अवधेश को सालों हो गये। अवधेश ने कमरे को एक बार फिर निहारा। करीने से सजे हुए बेंच और टेबल, जिस पर जगह-जगह धूल जम गई थी। सामने लगी ट्यूबलाइट उसको जैसे मुँह चिढ़ा रही थी। वो अपने अवचेतन में कहीं गहरा धँसता चला गया। आज से दस साल पहले जब उसने ये कोचिंग इंस्टीटयूट शुरू किया था। ये सोचकर कि जो तकलीफ उसे गाँव में उठानी पड़ी है। वो तकलीफ आसपास के लोगों को नहीं उठानी पड़े। वो, शिक्षक ही बनेगा। कितना अच्छा तो पेशा है।समाज में लोग कितना सम्मान देते हैं। सब लोग प्रणाम सर..... प्रणाम सर कहते नहीं थकते, और, उसे शुरू से किताबों से कितना लगाव रहा है। खुद भी पढ़ो और दूसरे लोगों को भी शिक्षित करो, लेकिन, इधर कोरोना के कारण पिछले एक-सवा साल से कोचिंग बंद थी। सरकार सब कुछ खोलने की अनुमति देती है, लेकिन कोचिंग इंस्टीटयूट पर जैसे उसे पाला मार जाता है। जिम, रेडिमेड, शापिंग माल, बस, ट्रेन, हवाई जहाज सब खुल गये हैं, लेकिन, सरकार को पढाई से ही चिढ़ है। कोचिंग वाले टैक्स नहीं देते ना! इसलिए भी सरकार इन लोगों को कोचिंग इंस्टीटयूट खोलने की अनुमति नहीं देती। अगर वो भी कोई जिम या शापिंग माल चलाता तो क्या सरकार उसको रोक लेती? नहीं, बिल्कुल नहीं! वो बहुत कोशिश करता रहा कि वो अपना कोचिंग इंस्टीटयूट बंद ना करे, लेकिन, घर में छोट-छोटे बच्चे हैं।उनके खाने पीने के लाले पड़ गये हैं। पिताजी को डॉक्टर को दिखाना है। दिसंबर आधा गुजर गया है। माँ का स्वेटर भी लेना है। ठंढ़ से काँपती रहती है। आखिर बूढ़ी काया में ताकत ही कितनी होती है। स्वेटर जगह-जगह से फट गया है, और स्वेटर के कुछ हिस्से तो छीजकर आर-पार भी दिखने लगे हैं। कई दिनों से माँ कह रही है। घर के अंदर तो पहन सकती हूँ, लेकिन, बाहर निकलते मुझे शर्म आती है। आखिर, लोग क्या कहेंगे।एक शिक्षक की माँ फटा हुआ स्वेटर पहने हुए है। रमा ने भी कई बार शॉल के लिए तगादा कर दिया है।कहती है आँगनबाड़ी जाते हुए ठंढ़ लगती है। अब रमा को शॉल भी एक दो दिन में खरीदकर देता हूँ। आखिर रमा की आँगनबाड़ी वाली नौकरी ना होती तो आज वे लोग कहीं भीख माँग रहे होते। उसको मिलने वाले छह हजार रूपये से ही तो घर अब तक चल रहा है। नहीं तो इस आपदा काल में कौन किसकी मदद करता है? सबसे जरूरी काम है पिताजी को डॉक्टर को दिखाना। उनकी खाँसी रुकती ही नहीं। आखिर, कितने दिनों तक मेडिकल से लेकर सिरप पिलाई जाये। सारी कंपनियों के सिरप एक-एक करके देख लिए। जितने रूपये सिरप और गोलियों पर खर्च किये।उतने में तो किसी अच्छे डॉक्टर को दिखला देते, लेकिन, डॉक्टर भी पाँच सौ से कम में नहीं मानेगा।कोरोना के समय में एक तो डॉक्टर सामने से देखते नहीं। आनलाइन दिखलाना है तो दिखलाओ नहीं तो जै राम जी की। उसने बेंच को छुआ तो धूल के साथ-साथ जैसे उसके हाथ में अतीत के खुरचन भी आ गये। टीचर्स डे और वसंत पंचमी पर कितना सजाते थे छात्र इस इंस्टीटयूट को। कैसा लकदक करता था यही इंस्टीटयूट छात्र-छात्राओं के हँसी ठहाकों से। अवधेश को कमरे की एक-एक चीज से प्रेम था। उसने इंटीरियर डिजाइनर से अपने इंस्टीटयूट को सजवाया था। गुलाबी पेंट, बढ़ियाँ कार्पेट, अच्छी कुर्सी और मेज। शानदार ब्लैकबोर्ड, टेबल के ऊपर सजे भाँति-भाँति के पेन।कैसे वो सफेद कमीज और काली पैंट पहन कर नियम से सुबह छह बजे ही नाश्ता-पानी करके चल देता था। फिर, देर रात गये ही घर लौटता। उसने नीचे ऊपर सब मिलाकर तीन-चार कमरे ले रखे थे। दो तीन और लड़को को भी रख लिया था। पहले काम के घंटे बढ़ते गये।उसके अंदर एक जूनून सा छाने लगा। फिर, छात्रों की बढ़ती संख्या को देखकर उसने रूम बढ़ा दिये। फिर, टीचर भी बढ़ाने पड़े। मिला जुलाकर साठ-सत्तर हजार रूपये महीने में वो कमा ही लेता था। फिर, धीरे-धीरे नई तकनीक आने से उसने कुछ कम्प्यूटर भी खरीद लिये और भी कई कमरे किराये पर ले लिये थे। और स्टाफ़ बढाया। खूब मेहनत करने लगा। वो अपने साथ-साथ और लोगों को भी रोजगार दे सकता है। ये सोचकर ही उसका सीना गर्व से चौड़ा हो जाता था, और हमेशा उसे इस बात की खुशी रही।सब लोग हँसी खुशी से जी रहे थें। तभी कोरोना ने दस्तक दी और सबकुछ जहाँ का तहाँ जमकर रह गया।रोज सड़कों पर दौड़ने वाली उसकी स्कुटी घर में एक किनारे खड़ी हो गई। कभी-कभार कोई सामान लाने जाना होता तो, स्कुटी के भाग खुलते और वो रोड़ पर दौड़ती।नियमित आनेवाले टीचर्स अब दिखने बंद हो गये। पहले उसने औने-पौने दाम में कम्प्यूटर बेचे।शुरूआती दौर में तो तीन-चार महीने का लंबा लॉकडाउन लगा। अचानक से आने वाले पैसे आने बंद हो गये।खर्च ज्यों-का-त्यों।बहुत बचत करने की आदत शुरू से नहीं रही। पैसा आता था तो पता नहीं चलता था।कितना भी खर्च कर लो।कोई फर्क नहीं पड़ता था, लेकिन, अचानक से पैसे आने बंद होने से दिमाग जैसे सुन्न पड़ने लगा। जरुरी चीजों को तो नहीं टाला जा सकता था, लेकिन, गैर जरूरी चीजों पर सख्त पाबंदी लगा दी गई।चाऊमिन, पिज़्ज़ा मोमोज़ सब बंद। फिर, इंस्टीटयूट के मकान मालिक का तगादा बढ़ने लगा। नीचे के अतिरिक्त लिए गये कमरे को गैर जरूरी समझकर छोड़ दिया गया।ये सोचकर कि पता नहीं कितना लंबा लॉकडाउन चलेगा, और हर महीने का किराया भी चढ़ता जायेगा। सारे-के-सारे कम्प्यूटर पहले ही बिक चुके थें। कमरे वैसे भी खाली ही थे।सारे फर्नीचर को दो कमरों में समेटा गया, और कमरों की चाभी साल भर पहले ही मकान मालिक को सौंप दी गई। ये सोचकर कि आज नहीं तो कल जब सब कुछ ठीक-ठाक हो जायेगा तो फिर, से कमरे को किराये पर ले लिया जायेगा। लेकिन, जब दूसरी लहर आयी और फिर, डेढ़ दो महीने का लॉकडाउन लगा, तो रमा जैसे बिफरती हुई बोली- "क्या, कोचिंग इंस्टीटयूट के अलावा दूसरा कोई काम नहीं है? पेपर बेचो, सब्जी बेचो, फल बेचो कुछ भी करो। लेकिन, अब घर की हालत मुझसे देखी नहीं जाती, और मेरी आँगनबाड़ी की कमाई से कुछ होने जाने वाला नहीं है। वो ऊँट के मुँह में जीरा का फोरन जैसा साबित हो रहा है। तुम जल्दी कुछ करो। नहीं तो मैं बच्चों को लेकर अपने मायके चली जाऊँगी।" और यही सोचकर अवधेश ने ये फैसला किया था, कि अब और इंतजार करना मूर्खता के सिवाय कुछ नहीं है। हो सकता है सालों कोरोना खत्म ना हो।तब तो सालों उसका इंस्टीटयूट बंद रहेगा। रमा ठीक कहती है। मुझे अपना इंस्टीटयूट बंद करके कोई और काम करना चाहिए।नहीं तो घर कैसे चलेगा? और यही सोचकर उसने एक जरूरत मंद संस्था को बहुत कम कीमत पर अपना फर्नीचर बेचने का फैसला किया था। "भैया, आटो वाला आ गया है, सामान लेने।" रघुवीर ने टोका तो अवधेश अतीत के नर्म बिस्तर से हकीकत की ठोस जमीन पर गिरा। " हुँ... हाँ... कौन रघुवीर अच्छा आटो वाला आ गया। चलो अच्छा है।" अवधेश के भीतर कुछ पिघला, कार्पेट, दीवार, टेबल या छत या कि दस साल का सुहाना सफर और उसकी आँखे भींगनें लगी। उसने आखिरी बार कमरे को गौर से निहारा। लगा जैसे सब कुछ छूटा जा रहा है, और वो किसी भी कीमत पर उसे नहीं छोड़ना चाहता। रघुवीर ने पूछा- "क्या हुआ भईया..?" लेकिन, अवधेश, रघुवीर की बातों का कोई जबाब नही दे सका। बस भर्राये गले से बोला- "कुछ नहीं रघुवीर.. l" शाम का धुँधलका गहराने लगा था। उसे लगा कमरे को पलटकर अंतिम बार देख ले। लेकिन, उसकी हिम्मत नहीं पड़ी।धीरे-धीरे नीम अंधेरे में वो सीढ़ियों से नीचे उतर गया। ************
- बदरंग जिंदगी
दामोदर को एहसास हुआ कि उसे फिर, से पेशाब लग गई है।पता नहीं उसका गुर्दा खराब हो गया है, या शायद कोई और बात है।अब, बिना डॉक्टर को दिखाये उसे कैसे पता चलेगा कि उसको बार-बार पेशाब क्यों आता है? ऐसा नहीं है कि उसने डॉक्टर को नहीं दिखाया। उसने कई-कई डॉक्टरों को दिखाया, लेकिन, समस्या ज्यों की त्यों बनी हुई है। उसे लगातार पेशाब आना बंद ही नहीं होता है। वो आखिर करे भी तो क्या करे? अब उसका डॉक्टरों पर से जैसे विश्वास ही उठ गया है। उसे लगता है कि उसके मर्ज की दवा शायद अब किसी भी डॉक्टर के पास नहीं है। कभी-कभी उसे ऐसा भी लगता है कि वो एक ऐसे जँगल में पहुँच गया जहाँ से उसे बाहर निकलने का रास्ता ही नहीं सूझ रहा है, और, वो उसी जँगल में आजीवन भटकता रहकर कहीं मर-खप जायेगा। उसे अपने जीवन में सब कुछ अच्छा लगता है, लेकिन, उसे अच्छा नहीं लगता कि उसे बार-बार पेशाब आये।ज्यादा पेशाब आने से उसे बार-बार पेशाब करने काम को छोड़कर जाना पड़ता है। उसके मालिक, यानि कारखाने के मालिक, उसकी इस हरकत पर बड़ी बारीक नजर रखे हुए रहते हैं, और वो तब मन ही मन भीतर से कटकर रह जाता है। जब, मालिक उसे टेढ़ी नजर से देखते हैं, और, मन ही मन गुर्राते हैं। और भला गुर्राये भी क्यों ना? उसे छह हजार रुपये महीने भी तो देते हैं, और वो इधर साल भर से काम भी तो ठीक से नहीं कर पा रहा है। उसको कभी-कभी खुद भी लगता है कि वो काम छोड़ दे, और अपने घर पर ही रहे। तब तक, जब तक की उसकी बार-बार पेशाब करने वाली बीमारी खत्म ना हो जाये, लेकिन अगर वो काम छोड़ देगा तो खायेगा क्या? बार-बार ये सवाल उसके दिमाग में कौंध जाता है। अमन की उम्र भी भला क्या है? मात्र उन्नीस साल! इतने कम उम्र में ही उसने पूरे घर की जिम्मेदारी संभाल ली है। ऐसे उम्र में दूसरे बच्चे जब बाप के पैसे पर कहीं किसी कॉलेज में अय्याशी कर रहे होते हैं। उस समय अमन सारे घर को देखने लगा है। आखिर क्या होता है आजकल छ: हजार रूपये में? आज अगर अमन को मिलने वाले पँद्रह हजार रूपये उसको नहीं मिलते तो क्या वो घर चला पाता? नहीं बिल्कुल नहीं! और अमन हर महीने याद करके उसकी दवा ऑनलाइन खरीदकर भेज देता है। नहीं तो उसकी सैलरी में तो वो अपनी दवा तक नहीं खरीद पाता। आज एक दवा खरीदने जाओ तो, वो दो सौ रूपये का मिलता है, लेकिन अगले महीने जाओ तो कंपनी उसी दवा पर दस-बीस फीसदी रेट बढ़ा देती है, और, आजकल डॉक्टर के केबिन के बाहर मरीजों से ज्यादा उसे मेडिकल रि-पर्जेंटेटिव वाले लड़के ही दिखाई देते हैं। मरीजों को ठेलते-ठालते अंदर घुसने को बेताब दिख पड़ते हैं ये लड़के! जो, थोड़ी बहुत भी नैतिकता डॉक्टरों में बची थी। वो इन कमबख़्त दवा कंपनियों ने खत्म कर रखी है।रोज एक दवा कंपनी बाजार में उतर जाती है और, उसके ऊपर दबाव होता है, अपने प्रोडक्ट की मार्केटिंग का। जहाँ चूकते-चूकते आखिरकार डॉक्टर भी हथियार डाल ही देते हैं।रोज एक नया चेहरा वैसे ही एक कृत्रिम मुस्कुराहट ओढ़े हुए उनके केबिन में दाखिल हो जाता है, और ना चाहते हुए भी वो उनकी दवा मरीजों को लिख देते हैं।दवाओं पर मनमाना दाम कंपनी लगाती है और कंपनी के टार्गेट और मुनाफे के बीच फँस जाते हैं उसके जैसे लोग। उसको लगा वो कुछ देर और रूका तो उसका पेशाब पैंट में ही निकल जायेगा। लोग उसकी इस बीमारी पर बुरा सा मुँह बनाते हैं।खास कर उसके सहकर्मी, और उसने अपनी बहुत देर से दबी हुई इच्छा आखिरकार, दिनेश को बताई। दिनेश उसका साथी है। रोज काम करने बैरकपुर से रघुनाथपुर वो दिनेश की मोटर साइकिल से ही आता जाता है। उसके पास अपनी मोटरसाइकिल नहीं है। उसका घर, दिनेश के घर के बगल में ही है इसलिए वो उसकी मोटरसाइकिल से ही काम पर आता जाता है। "दिनेश मैं आता हूँ, पेशाब करके।" इतना कहकर वो निपटने के लिए जाने लगा, लेकिन, तभी दिनेश की बात को सुनकर रूक गया। दिनेश ने कारखाने से छुट्टी होने के बाद अभी कारखाने का गेट बंद ही किया था कि दामोदर की इस अप्रत्याशित बात को सुनकर झुँझला पड़ा- "अगर, तुम्हें पेशाब करने जाना ही था, तो कारखाना बंद होने से पहले ही चले जाते, और हाँ, अभी तुम थोड़ी देर पहले भी तो पेशाब करने गये थे।पता नहीं तुमको कितना बार पेशाब लगता है? एक हमलोग हैं। कारखाना में घुसने के बाद बहुत मुश्किल से दो या ज्यादा से ज्यादा तीन बार जाते होंगे, लेकिन, तुमको तो दिन भर में पचास बार पेशाब लगता है।पता नहीं क्या हो गया है तुम्हें? किसी अच्छे डॉक्टर को क्यों नहीं दिखाते?" दामोदर के चेहरे पर जमाने भर की कातरता उभर आई। उसके सूखे हुए बदरंग चेहरे पर नजर पड़ते ही दिनेश का दिल भी डूबने लगा, और वो उसकी परेशानी को समझते हुए बोला - "ठीक है जाओ, लेकिन, जरा जल्दी आना। आज मुझे मेरे बेटे को पार्क लेकर जाना है। घूमाने के लिए। वो पिछले कई हफ्तों से कह रहा है। पापा, आप कभी मुझे पार्क लेकर नहीं जाते। आज अगर मैं जल्दी नहीं गया तो वो फिर सो जायेगा और कल फिर, से वही तमाशा करेगा घूमने जाने के लिए। अखिर, इन मालिक लोगों के लिए सुबह नौ बजे से रात को नौ बजे तक काम करते-करते अपने बाल-बच्चों को कहीं घूमाने का समय ही नहीं मिल पाता।" "हाँ आता हूँ।" कहकर दामोदर जल्दी से पान मसाला की एक पुड़िया फाड़कर अपने मुँह में डालता हुआ, पेशाब करने चला गया। दामोदर, सेठ घनश्याम दास के यहाँ पिछले बीस सालों से काम करता आ रहा। दिनेश अभी नया-नया है। दोनों गाड़ी पर बैठे और, अपने गंतव्य की ओर चल पड़े। बात के छोर को दिनेश ने पकड़ा- "तुम्हे ये बीमारी कब से हुई है, और तुम इसका इलाज क्यों नहीं करवाते दामोदर?" दामोदर बोला- "अरे भईया इलाज की मत पूछो। पिछले लॉकडाउन में, मैं अपनी सोसाइटी की गेट पर खड़ा-खड़ा ही बेहोश होकर गिर पड़ा था। वो, तो बगल के एक दुकानदार ने देख लिया, और सोसाइटी के गार्ड की मदद से मुझे मेरठ भिजवाया। सात दिनों तक "जैक" हास्पिटल में रहा। एक दिन का पँद्रह हजार रुपये चार्ज था वहाँ का।केवल सात दिनों में ही एक लाख रूपये से ज्यादा उड़ गये। फिर, मेरे लड़के ने नर्सरी हास्पिटल में मुझे भर्ती कराया। तब जाकर अभी मेरी हालत में कुछ सुधार आया है। अगर वो, दुकानदार और गार्ड़ ना होते तो आज मैं तुम्हारे सामने जिंदा ना होता।" "और, सारा खर्चा कहाँ से आया। सेठजी ने कुछ मदद की या नहीं?" दिनेश बाइक चलता हुआ बोला। "अरे, मुझे कहाँ होश था। लड़का बता रहा था उसने मालिक को फोन करके पैसे माँगे थे, लेकिन मालिक की सुई दो हजार पर अटकी हुई थी। बड़ी हील-हुज्जत के बाद उन्होंने पाँच हजार रूपये दिए।" "बाकी के पैसों का इंतजाम कैसे हुआ?" "कुछ अगल-बगल से कर्ज लिया, और बाकी मेरे ससुर जी ने लगभग चार लाख रूपये देकर मेरी मदद की। तब जाकर मेरी जान बची।" मोटर साइकिल एक मेडिकल स्टोर के बगल से गुजरी। दामोदर ने दिनेश को गाड़ी रोकने के लिए कहा। और, वो लपकता हुआ मेडिकल स्टोर की तरफ बढ़ गया। उसकी दवा खत्म हो गयी थी। उसने दुकानदार को पर्ची दिखाई दुकानदार ने पर्ची को बड़े गौर से देखा और दवाई निकालकर उसने काउंटर पर रख दिया और दामोदर से बोला- "इस बार भी कंपनी ने दवा का दाम बढ़ा दिया है। उसनें एम. आर. पी. पर नजर डालते हुए कहा। पिछले बार ये दो सौ पचास रुपये की आती थी, अब दो सौ सत्तर रूपये लगेंगे। क्या करूँ दे दूँ?" दामोदर ने जेब में हाथ डाला, और पैसे गिने एक-दो उसके पास दो सौ रूपये थे। उसी में उसे रास्ते में घर के लिए एक लीटर दूध भी लेना था। पैसा नहीं बचेगा उसने दुकानदार से कहा- "फिलहाल मुझे दो दिन की दो गोली दे दो। बाकी जब तनख्वाह मिलेगी तब आकर ले जाऊँगा।" दवा लेकर खुदरा पैसा उसने जेब के हवाले किया और वापस आकर बाइक पर बैठ गया। रास्ते में उसने एक लीटर दूध भी लिया। घर, पहुँचकर उसने हाथ मुँह धोया और पलंग पर लेट गया।तब तक उसकी पत्नी रूची चाय बनाकर ले आयी।एक प्याली उसने दामोदर को दी और दूसरी प्याली खुद लेकर चाय पीने लगी। चाय पीते-पीते वो, बोली- "आज, घर का मकान मालिक, आया था और घर का किराया भी माँग रहा था। कह रहा था कि दो महीने का किराया तो पूरा हो ही गया है, और, अब तीसरा महीना भी लगने वाला है। आप लोग जल्दी से जल्दी किराया दीजिये नहीं तो घर खाली कर दीजिए।" "ये हरीश भी अजीब आदमी है। वो जानता है, कि अभी कोविड़ का समय है, और ऐसी नाजुक स्थिति है। यहाँ हम लोग दाने-दाने को तरस रहे हैं। एक टाइम माड़-भात तो एक टाइम पानी या शर्बत पीकर ही काम चला रहे हैं। एक तो खाने-पीने वाले राशन की परेशानी। उस पर से हर महीने का किराया। आखिर कहाँ से लाकर दे आदमी इस गाढ़े समय में किराया? इन ढ़ाई महीनों में वो पहले ही अपने जान पहचान के सभी लोगों से कर्ज ले चुका है। अभी उसने पहले से लिए कर्ज को ही नहीं चुकाया है, तो ये कमरे का किराया कहाँ से लाकर देगा? उसको भी सोचना चाहिए। दो-ढ़ाई महीने से दुकान बंद है। जब मालिक से पैसा मिलेगा तब उसको किराया भी मिल ही जायेगा।कौन से हम भागे जा रहे हैं?" दामोदर को लगा जैसे उसके सीने पर किसी ने बहुत भारी पत्थर रख दिया हो। जिससे उसका साँस फूलने लगा हो, और अब तब में उसका दम घुट जायेगा, और वो वहीं पलंग पर खत्म हो जायेगा। वो उठकर पलंग पर बैठ गया। "आज माँ का फोन भी आया था।कह रही थीं कि एक बार में ना सही लेकिन, किस्तों में ही चार लाख रुपये थोड़ा-थोड़ा करके लौटा दें। मेरी छोटी बहन निम्मो की शादी तय हो गयी है। अगले साल कोई अच्छा सा लगन देखकर पिताजी निम्मो की शादी कर देना चाहते हैं। तुमसे सीधे-सीधे कहते नहीं बना तो, उन्होंने माँ से फोन करके कहलवाया है।" रुची ने डरते-डरते धीरे से कहा। "ठीक है, उनका भी कर्ज, हम लोग चुका देंगे, लेकिन, थोड़ा समय चाहिए।" दामोदर छत को घूरते हुए बोला। रात काफी गहरा चुकी थी।रुची कब की सो गई थी। लेकिन, दामोदर को नींद नहीं आ रही थी। रह-रह कर वो बदरंग हो चुकी दीवार और छत को घूरता जा रहा था।उसे कभी-कभी ये भी लगता है कि उस दीवार और छत की तरह ही उसकी जिंदगी भी बदरंग हो गई है। एक दम बेकार पपड़ी छोड़ती, और सीलन से भरी हुई! क्या पाया आज उसने पचास-पचपन साल की उम्र में? कुछ भी तो नहीं! ताउम्र वो खटता रहा लेकिन, उसके हाथ में क्या लगा? सिवाये शून्य के! एक नपी तौली जिंदगी जो, खुशी से ज्यादा उसे दु:ख ही देती रही।ज्यादातर वक्त अभाव में ही बीता।अचानक उसे लगा कि उसे फिर, से पेशाब लग गया है, वो उठकर फारिग होने चला गया। आकर वापस लेटा तो रूची की नींद खुल गई। उबासी लेती हुई रूची ने पूछा- "क्या हुआ नींद नहीं आ रही है क्या?" "नहीं। लगता है पलंग में खटमल हो गये हैं, और मुझे काट रहे हैं।" दामोदर बिछौना ठीक करता हुआ बोला। रूची ने अच्छा कहा और उबासी लेती हुई फिर, से सो गई। उसके बगल वाला कमरा उसकी बेटी प्रीती का है। पापा के आने की आहट पाकर उसने जल्दी से अपने कमरे की बत्ती बंद कर ली। लेकिन, दामोदर के दिमाग में एक नई दुश्चिंता ने घर करना शुरू कर दिया। आखिर इस साल प्रीति का पच्चीसवाँ लगने वाला है। आखिर कबतक जवान लड़की को कोई घर में रखेगा। कल को कहीं कुछ ऊँच-नीच हो गई तो! तमाम दुश्चिंताओं के बीच दामोदर रात भर करवटें बदलता रहा। लेकिन, उसे नींद नहीं आई। *********
- एक पुरुष
साची सेठ बांधता समाज को, सूत्र एक में, बांटता है घर में, खुशी हर एक में। समाज में सम्मान है, घर की जो आन है पत्थर है नींव का, इमारत आलीशान है। रखता है मन में मन के दुखों को छुपाकर परिवार की खुशी को रहे सावधान है। ममता को रखता छिपा कर ही मन में है पूरा घर खड़ा रहा उसके सम्मान में। प्रधानता की प्राप्ति को लुटाना भी पड़ता है मन की इच्छाओं को, छुपाना भी पड़ता है। विष को जो पी जाये, शंभू नीलकंठ सा पुरुष बनने के लिए, मरना जीना भी पड़ता है। लज्जा संभालता पगड़ी की गांठ में लुट जाता मिट जाता घर की वो शान में। ******
- अर्धांगिनी
संगीता द्विवेदी लेफ्टिनेंट कर्नल की नवेली पत्नी सीमा ने जैसे ही पति के पार्थिव शरीर को झंडे में लिपटे हुए देखा, जोर से फफक पड़ी। अपने दिवंगत पति के माथे को चूम कर वह बहुत रोई। इतना रोई कि नाक और आँख सिंदूर की तरह लाल हो गये, परंतु उसके माथे की लाली गायब थी। दोनों की शादी के अभी मात्र छः महीने ही हुए थे। खेलने-खाने की उम्र में सीमा विधवा हो गई। अब उसके जीवन में न कोई रंग रहा, न ही रस। उसे लगा, जीना बेकार है। आखिर, करे तो क्या करे? इसी ऊहापोह में वह कई महीनों से मर-मर कर जी रही थी। अचानक एक दिन, वाश रूम में लगे आईने ने उसे धिक्कारते हुए कहा, "अपनी सुरत तो देख, पच्चीस वर्ष की है, और चालीस की लगती है। आँखों के पास झुर्रियाँ और बाल सफ़ेद दिख रहे हैं। पढ़ी -लिखी होकर अपना ये हाल बना लिया।" सुनकर वह धक्क- सी रह गयी। तुरंत कमरे में जाकर पति के तस्वीर को गले से लगाया और घंटों तक अपने दुखों को आँसूओं के सैलाब से धोती रहीं। एकाएक उसके मन से काला, सघन बादल.. छंट गया, सुनहरी धूप निकल आई। सीमा के उजड़े जीवन में मानो फिर से बहार छा गयी । आत्मविश्वास भरे लहजे में उसने पति की तस्वीर से कहा, "प्रिय, आपसे वादा करती हूँ कि इस तरह रो कर मैं अपना जीवन बर्बाद नहीं करूँगी। आपकी तरह मैं भी देश के लिए शहीद हो जाना चाहती हूँ। आखिर, आपकी अर्धांगिनी जो हूँ।" वह तैयार होकर सेना में भर्ती के लिए आवेदन करने निकलने लगी। जाते समय उसने अपना चेहरा आईने में फिर से देखा। इसबार आईना मुस्कुरा कर उसे 'जय जवान' कह रहा था। *******











