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- माँ का कटोरदान
डॉ कृष्णा कांत श्रीवास्तव जब हम छोटे थे तब मम्मी रोटियां एक स्टील के कटोरदान में रखा करती थी। रोटी रखने से पहले कटोरदान में एक कपड़ा बिछाती वो कपड़ा भी उनकी पुरानी सूती साड़ी से फाड़ा हुआ होता था। वो कपड़ा गर्म रोटियों की भाप से गिरने वाले पानी को सोख लेता था, जैसे मम्मी की साड़ी का पल्लू सोख लेता था हमारे माथे पे आया पसीना। कभी धूप में छाँव बन जाता, कभी ठण्ड में कानों को गर्माहट दे जाता। कभी कपड़ा न होता तो अख़बार भी बिछा लेती थी मम्मी। लेकिन कुछ बिछातीं ज़रूर थी। समय बीतता गया और हम बड़े हुए। एक बार दीपावली पर हम मम्मी के साथ बाजार गए। तो बर्तनों की दूकान पर देखा केसरोल, चमचमाते लाल रंग, का बाहर से प्लास्टिक और अंदर से स्टील का था। दुकानदार ने कहा ये लेटेस्ट है इसमें रोटियां गर्म रहती है। हम तो मम्मी के पीछे ही पड़ गए अब तो इसी में रोटियां रक्खी जाएँगी, मम्मी की कहाँ चलती थी हमारी ज़िद के आगे। अब रोटियाँ कैसेरोल में रक्खी जाने लगी। कटोरदान में अब पापड़ रखने लगी थी मम्मी। अगले महीने, मम्मी की एक सहेली ने, पापड़ मंगवा के दिए पर, वो तो बहुत बड़े थे, तो कटोरदान में फिट ही नहीं हो पाये इसलिए उन्हें एक दूसरे बड़े डब्बे में रखा गया। और अब कटोरदान में मम्मी ने परथन रख लिया। जैसे-जैसे समय बीतता गया कटोरदान की भूमिका भी बदलती गई पर वो मायूस न हुआ जैसा था वैसा ही रहा। बस ढलता गया नयी भूमिकाओं में। कुछ और समय बीता.... मेरी शादी हो गयी और मैं एक नए शहर में आ गयी। मम्मी ने मुझे बहुत सुन्दर कीमती और नयी चीज़ें दी अपनी गृहस्ती को सजाने के लिए। पर मुझे हमेशा कुछ कमी लगती। एक बार जब गर्मी की छुटियों में मम्मी से मिलने गई तो मम्मी ने मुझे एक कैसेरोल का सेट दिया। मैने कहा मुझे ये नहीं वो कटोरदान चाहिए। मम्मी हंस दी बोली, “उसका क्या करेगी? ये ले जा लेटेस्ट है।” मैंने कहा हाँ ठीक है पर वो भी। मम्मी मुस्कुरा दी और परथन निकालकर कटोरदान धोने लगी, उसे अपनी साड़ी के पल्लू से सुखाया और उसमें पापड़ का एक पैकेट रख कर मेरे बैग में में रख दिए। अब खुश मम्मी बोली, मैने कहा हाँ। मै उस कटोरदान को बहुत काम में लेती हूं। सच कहूँ तो अकेलापन कुछ कम हुआ। कभी बेसन के लाडू भर के रखती हूं, कभी मठरी कभी उसमें ढोकला बनाती हूँ। कभी सूजी का हलवा जमाती हूँ। कभी कभी पापड़ भी रखती हूँI नित नयी भूमिका मैं ढल जाता है, मम्मी का ये कटोरदान। यहाँ आने के बाद मुझे मम्मी की बहुत याद आती थी, पर मैं कहती नहीं थी के मम्मी को दुःख होगा। कभी-कभी सोचती हूँ क्या इस कटोरदान को भी मम्मी की याद आती होगी? ये भी तो मेरी तरह मम्मी के हाथों के स्पर्श को तरसता होगा। आखिर इसने भी तो अपनी लगभग आधी ज़िन्दगी उनके साथ बिताई है। बस हम दोनों ऐसे ही अक्सर मम्मी को याद कर लेते हैं। एक दूसरे को 'छू' कर मम्मी का प्यार महसूस कर लेते हैं। बस ऐसे ही एक दूसरे को सहारा दे देते हैं। मैं और मम्मी का कटोरदान। सच माँ की कमी कोई पूरा नहीं कर सकता। इसलिये आज माँ है तो पल भर भी गंवाये बिना उनके साथ जिन्दगी जी लो। *******
- मेरा गीत
विनय कुमार मिश्रा "भैया आप मुझसे बातें करिए, मुझे अपने गीत सुनाइये मैं सुनूँगी" मैंने हाथ पकड़ कर कहा। भैया थोड़े हतप्रभ हो मुझे देखने लगे। और मेरा हाथ छुड़ाकर दूसरी तरफ बैठ गए। मेरी आँखें भीग आईं। मुझसे नाराज नहीं हैं ये। बस मर्यादा की एक झूठी परंपरा ढो रहे हैं। भैया मेरे जेठ हैं। इनके सामने आने की मनाही थी। इस घर में मुझे चालीस साल से ज्यादा हो गएं। पूरे घर में सब को देखा है। सबसे बातें किया मैंने। बस इनके सामने आज पहली बार आई हूँ। जिसे ज़िंदगी भर भाई मानते आई उससे कभी बात नहीं किया। भैया को गाने बजाने का बहुत शौक था। जब दालान में ये कोई गीत गाते तो पूरा गांव होता था। मैं बस सुनती थी। और मन ही मन गर्व करती थी भैया के इस कला पर। कभी इस कला को पर्दे के पीछे से देखने की कोशिश करती। "छोटकी बहू! तुम कमरे में जाओ.. ये तुम्हें शोभा नहीं देता।" इस पवित्र रिश्ते में इतना पर्दा क्यूँ था मैं कभी समझ नहीं पाई। भैया की कोई संतान नहीं है। पर इन्हें इसके लिए कभी उदास नहीं देखा। ये मेरे बच्चों को बहुत प्यार करते थे। पहले माँ बाउजी फिर एक दिन दीदी के जाने से थोड़े उदास रहने लगे थे। गीत-संगीत भी छूट गया। पर बच्चों और अपने भाई से दिल की बात कहा करते थे। पिछले साल इन्होंने अपने भाई और मैंने अपने पति को खो दिया। मेरे साथ-साथ भैया भी टूट गए हैं। बच्चे बड़े हो गएं हैं। वो अब अपनी ही दुनिया में रहते हैं। उनके पास हमारे लिए समय नहीं। ना कभी दस मिनट बैठते हैं। कुछ दिनों से पर्दे से ही देखा करती हूँ। अपने पुराने गीतों को धीरे से गुनगुनाते हुए रो पड़ते हैं। शायद अपने आस पास उन लोगों को बहुत याद करते हैं जिनसे कभी ये दालान गुलजार रहता था। अपने दालान में बिल्कुल अकेले पड़े रहते हैं। आज भैया की शादी की सालगिरह भी है। सुबह से वही गीत अपनी कपकपाती आवाज में गुनगुनाने की कोशिश करते फिर रोने लग पड़ते। ये गीत उन्होंने दीदी के लिए लिखा था। जब भी गाते थे तो दीदी मुझसे चहक कर कहा करती थी। "तेरे भैया ये गीत मेरे लिए गाते हैं" आज बच्चों को अपने पास थोड़ी देर बैठाना चाहते थे पर उन्होंने नहीं सुना। आज सुबह से ना जाने कितनी बार भैया को रोते देख मुझसे रहा नहीं गया। भैया अब भी चेहरे को दूसरी तरफ किये मेरे चले जाने का इंतजार कर रहे हैं। "भैया! अपनी छोटी बहन से भी नहीं करेंगे अपने दिल की बात।" उन्होंने अब भी मेरी तरफ नहीं देखा। "जरा इधर देखिए मेरी तरफ, इस बहन के सिवा अब कौन है आपका जो आपकी बात सुने, घुटघुटकर मर जायेंगे आप! मैं नहीं देख सकती आपको इस तरह भैया, मैं नहीं देख सकती" मैं फूटफूटकर रो पड़ी। उन्होंने पलट कर मेरे माथे पर अपना हाथ रख दिया। "तू..सच ..में सुनेगी... छोटकी..मेरा गीत" "गीत ही नहीं भैया, आपके मन मे जो भी है मैं सब सुनूँगी" भैया के गीत फिर से पूरे दालान में गूँज उठे, मैं भरी आँखों से ताली बजा उठी..! *****
- झिझक
मोना जैन अभी नई-नई ही तो आई थी शुमी यहां। हैरानी सिर्फ उसे इस बात की थी उस आफिस में चालीस के स्टाफ के बीच सिर्फ छह लड़कियां ही थी। ऊपर से सबके कामों में विभिन्नता होने के कारण सब के अलग-अलग केबिन थे। शुमी तो एक दम से भयग्रस्त सी हो गई कि कहीं उसके घर वाले मानेंगे, ऐसी जगह पर काम करने देने के लिए। खैर जो भी हो शुभी ने अपने मन में कुछ सोचा और बाहर जाने लगी। तभी रोमी की नजर उस पर गई उसने कहा दीदी जरा यहां आइये, शुमी को लगा जैसे कि वो कोई मन के भेद जानने वाला जादूगर हो। उसने कहा दीदी अभी आप बाहर मत जाओ। किसी भी निर्णय पर जाने से पहले दो मिनट मेरी बात सुन लीजिए। मैं जानता हूं दीदी आप क्या सोच रहे हैं कि इतने सारे पुरुषों के बीच में सिर्फ थोड़ी सी ही स्त्रियां? यहां रहकर आपको अजीब लगेगा। अरे, दीदी हम सब यहां एक फैमिली की तरह रहते हैं। जहां जरूरत पड़ने पर सब आपस में एक-दूसरे की मदद करते हैं। सारे त्योहार मिलजुल कर मनाते हैं। आप को यहां इतने सारे भाई मिल जायेंगे हमें एक बहन और हमारी पुरानी दीदियों को एक और सहयोगी। रोमी, शुमी को सब बातें समझा ही रहा था कि इतने में रोमी को पीछे ताली वजने की आवाज आई उसने मुड़कर देखा तो बास ताली बजा रहे थे। बास ने पास आकर रोमी की पीठ थपथपाई और कहा तुम जैसे लोग अगर हर जगह हो तो महिलाओं को कभी भी झिझक का सामना नहीं करना पड़ेगा। रोमी की बातों ने शुमी का हौसला बढ़ाया और उसने दूसरी आफिस ज्वाइन करने का फैसला त्याग दिया। *****
- पतिव्रता
रीटा मक्कड़ दिसम्बर के महीने का आखिरी सप्ताह चल रहा है। सर्दी इन दिनों खूब जोरों की पड़ रही है। रात को धुंध इतनी ज्यादा हो जाती है कि सामने वाला घर भी दिखाई नही देता। ऐसे में जब सब लोग रजाईयों में दुबके पड़े हैं या फिर हीटर चला कर अपने कमरे गर्म करने का प्रयास कर रहे हैं। इस समय रात के करीब ग्यारह बजे होंगे। सुनीता भी किचन समेट के बस अभी रजाई में लेटने ही जा रही थी कि अचानक से किसी के जोर-जोर से रोने की आवाज़ सुनाई दी। ऐसी सुनसान रात में आवाज़ सुन के ही सुनीता दहशत में आ गयी। पति राजीव को देखा तो वो भी अभी पूरी तरह सोए नही थे शायद। "देखता हूं कौन रो रहा है" बोल कर वो उठ ही रहे थे कि किसी ने बाहर की घण्टी जोर-जोर से आठ दस बार बजा दी। राजीव जल्दी से बाहर को भागे। सुनीता भी पीछे-पीछे चल दी। बाहर जा कर देखा तो गेट पर एक औरत खड़ी थी और बहुत ज्यादा रो रही थी और मदद की भीख माँग रही थी। ध्यान से देखने पर सुनीता को याद आया कि ये तो वही औरत है जो सामने बन रही बिल्डिंग में एक तरफ बनी झोंपड़ी में पिछले कई महीनों से रह रही है। वो बोल रही थी कि उसके घरवाले ने किसी बात पर उसकी खूब पिटाई कर दी और उसे झोंपड़ी से बाहर निकाल दिया था। राजीव ने किसी तरह उसके पति को डांट कर समझा कर उस औरत को झोंपड़ी के अंदर भेजा। तब दोनों वापिस अपने घर आये। दोबारा सोने की बहुत कोशिश की लेकिन आंखों में अब नींद का नामो निशान नही था। उस औरत की शक्ल आंखों से हट ही नही रही थी। तीन छोटे-छोटे बच्चों के साथ उस छोटी सी झोंपड़ी में गिनती के दो चार बर्तनों और दो चार कपड़ों के साथ कैसे गुजारा करती होगी। बच्चों ने भी कभी किसी ने चप्पल नही पहनी होती तो किसी की जुराबें नही होती। अगर किसी ने टोपी पहनी होती तो उसकी पजामी गायब होती। शायद भगवान गरीब के बच्चों को हर मौसम की मार को सहने की शक्ति दे कर ही भेजता है। उस औरत को भी आते जाते जब भी देखा हंसते मुस्कुराते अपने बच्चों के साथ खेलते और घर का काम करते देखा। माथे पर शिकन तक कभी नही दिखी उसके। अभी करवा चौथ पर भी तो देखा था उसे जब बड़े-बड़े घरों और माल के चक्कर में चांद नही दिखता तो बहुत सी औरतें सड़क पर या बालकनी में जहां से भी चांद दिखाई दे वहीं पूजा कर लेती हैं। तभी अपनी बालकनी से ही सुनीता ने उसको भी देखा था। लाल साड़ी में और लंबा से चटक लाल सिंदुर, बड़ी सी बिंदिया और कांच की बहुत सारी चूड़ियां पहने हुए। जब वो भी चांद को अर्घ देकर अपने पति की आरती उतार रही थी। यही बातें सोचते सोचते कब सुनीता की नींद लग गयी पता ही नही चला। सुबह जब उठी तो काफी देर हो गयी थी। आज लग रहा था बाहर खूब खिली-खिली धूप निकली हुई है। रात की बर्फीली ठंड के बाद सुबह की धूप बेहद सुकून देती है। किचन के काम निपटा कर धूप में बैठने जब बालकनी में आई तो उत्सुकता वश खुद ब खुद ही नज़र सामने बन रही बिल्डिंग की तरफ उठ गई। देखा तो वही औरत नहा के गीले बालों में खूब बड़ा सा चटक लाल रंग का सिंदूर और बड़ी सी बिंदी लगा कर पुरानी मटमैली सी साड़ी पहने हुए बाहर धूप में अपने बच्चों के कपड़े सूखा रही थी और साथ में शायद कुछ गुनगुना भी रही थी जिसकी आवाज़ तो दूरी की वजह से सुनीता को सुनाई नही दी लेकिन होंठ हिलते हुए साफ दिखाई दे रहे थे। ******
- महापर्व छठ
मंजू यादव 'किरण' मैं अपनी बेटी के घर गयी हुयी थी, वहां मेरी बेटी के बेटे (नाती) का जन्मदिन था। एक दिन मेरी बेटी की सास मुझसे कहने लगीं, "बहनजी, आपका पोता कितने साल का हो गया है।" मैंने कहा, "तीन साल का हो गया है, चौथे में चल रहा है।" वो बोलीं, फिर तो ठीक है मैंने छठ मैया से उसके होने की मन्नत मांगी थी कि मेरी बहू की भाभी के अगर लड़का होगा तो मैं छठ मैया उसकी कोसी भरूंगी। मैंने अपनी बेटी की सास की बात सुन तो ली, पर इतना ध्यान नहीं दिया क्योंकि हमारे इधर छठ का त्योहार नहीं होता है। बात आई-गई हो गई लेकिन जब मैं और मेरे साहब बेटी के घर से चलने लगे तो मेरे दामाद जी भी छठ पर अपने यहां आने के लिए कहने लगे। मेरे दामाद जी मुझसे कहने लगे, "आप छठ पर हमारे घर जरूर आईयेगा, हमारी अम्मा प्रथम (मेरा पोता) की कोसी भरेंगी। उन्होंने शायद इसके होने की मन्नत मांगी है।" मैंने उस समय तो अपने दामाद जी से कुछ नहीं कहा, हम दोनों अपने घर दिल्ली आ गये। जब छठ का अगला पर्व आया तो मेरे साहब बोले, "तुम लोग चित्रांगदा (मेरी बेटी) के घर पर हो आओ, उसकी सास ने प्रथम के होने पर छठ मैया की कोसी भरने को बोला है।" वैसे हम लोगों के यहां छठ का त्योहार नहीं होता है लेकिन छठ के त्योहार आने पर हम लोग चित्रांगदा के घर जाने की तैयारी करने लगे। अब जब मेरी बेटी की सास ने हमारे पोते की होने की मनौती मांगी थी तो जाना भी जरूरी था। जब छठ का त्योहार आया तो मैं, प्रथम और हमारी बहू (पायल) तीनों को लेकर मैं अपनी बेटी के घर गये। खासतौर से बेटी की सास के लिए एक सुंदर सी साड़ी और अंगूठी लेकर गए, वहां हम लोग खरने वाले दिन पहुंचे थे। अगले दिन से उनका छठ का व्रत था, व्रत तो हमने भी रखा था, पर फलाहार रखा था। बेटी की सास ने तो निर्जल व्रत रखा था, उनके घर के मंदिर को छठ पर बहुत सुंदर सजाया था, छठ की पूजा भी देखने लायक थी, खासतौर से डिजाइनदार ठेकुए तो मैंने पहली बार देखे थे। वहां गन्ने के समूह से एक छत्र बनाया गया था उसी के ऊपर लाल कपड़े से उसको ढका गया था, वहीं बेटी की सास ने हमारी बहू की कोसी भरी, ये सब हमने पहली बार देखा था। शाम को हम लोग घाट भी गए थे, वहां भी जाकर पूजा-पाठ करी डूबते सूर्य को अर्ध्य दिया। अगले दिन उगते सूर्य को घाट पर ही अर्ध्य देकर फिर कुछ खाया-पिया। मुझे मेरी बेटी के सास के हाथ के बने ठेकुए बहुत पसंद आये थे, ये हमने पहली बार खाये थे। इस तरह से हम लोगों ने छठ का त्योहार और कोसी कैसे भरते हैं देखा। सबसे बड़ी बात तो हमें ये लगी कि बेटी की सास ने हमारे पोते के लिए मनौती मांगी थी और उसके नाम की कोसी भरी वर्ना आजकल तो इंसान अपनों-अपनों के लिए मनौती मांगता है। उन्होंने हमारे लिए मनौती मांगी, ईश्वर ऐसा दिल सबका बना दे। हालांकि हम लोगों के यहां छठ का त्योहार नहीं होता था, फिर भी मैंने पांच साल तक आगे भी छठ का व्रत अपने घर भी आकर हर साल रखा। लेकिन छठ मैया के गाने मैं आज तक बड़े मनोयोग से सुनती हूं, छठ के गाने मुझे बहुत अच्छे लगते हैं। छठ पूजा भगवान सूर्य और छठ मैया को समर्पित है, छठ पूजा में चार दिनों के दौरान महिलाएं अपनी संतान की सलामती और परिवार की खुशहाली के लिए व्रत करती हैं। *****
- निश्चिन्ती
निरंजन धुलेकर इनकी शुरू से एक आदत है। सोते समय या तो मेरा हाथ पकड़ लेंगे या मेरे गाल पर हाथ रख कर सोएंगे, कुछ नही तो साड़ी का पल्लू ही हाथ में ले कर सो जाएंगे। एक बार मज़ाक में पूछा तो बोले कि बस मुझे अच्छा लगता है। जैसे कोई छोटा बच्चा माँ का आँचल पकड़ कर सेफ महसूस करता है ठीक वैसे ही पर इनका माजरा कुछ और ही है। आज दोनों कामवालियां गायब, कुक भी गायब, किसी की डेथ हो गयी इनकी बिरादरी में सो वहीं गयीं इकट्ठी, ये भी रात नौ बजे लौटे। काम निपटाते मैं बेहद थक कर आ लेटी। आज इनका हाथ मेरे गालों पर नही मेरे बालों में घूम रहा था जैसे कुछ खोज रहा हो। मुझे सब पता है ख़ुद की परेशानियां भूल इन्हें मेरी चिंता हो रही है। मुँह से कुछ बोलेंगे नही बस ये स्पर्श ही अहसास दिला जाते हैं। मैं इस तरह चुपचाप लेटी हुई इन्हें बिल्कुल अच्छी नही लगती। हाथ फेरते हुए पूछ लिया, "परेशान हो न थक गई न, कुछ कहना है क्या सोच रही हो, कोई प्रॉब्लम, कुछ चाहिए?" बस, इनका इधर ये पूछना और उधर मैं सब भूल जाती हूँ कि क्या सोच रही थी, क्या काम बाकी था, क्या दिमाग में चल रहा था, सब गायब हो जाता है। इनको जवाब देने के लिए याद करने लगती हूँ और फिर से चुप हो जाती हूँ और इन्हें मेरी चुप्पी से उलझन होती है और मुझे इनके सवाल न करने से। मैं जब इनका हाथ अपने गालों पर रखती हूँ तब जा कर इन्हें तसल्ली होती है कि मैं निश्चिन्त हूँ। पर सच तो ये है कि मुझे भी तभी नींद आती है जब मुझे ये तसल्ली हो जाती है कि ये मेरी तरफ से एकदम निश्चिन्त हैं। ******
- कलेजे का टुकड़ा
डॉ. कृष्णा कांत श्रीवास्तव पापा मैने आपके लिए हलवा बनाया है,11 साल की बेटी अपने पिता से बोली, जो कि अभी ऑफिस से घर में पहुंचे ही थे। पिता - वाह क्या बात है, लाकर खिलाओ फिर पापा को...! बेटी दौड़ती हुई फिर रसोई में गई और बड़ा कटोरा भरकर हलवा लेकर आई। पिता ने खाना शुरू किया और बेटी को देखा पिता की आंखों में आंसू आ गये। क्या हुआ पापा हलवा अच्छा नहीं लगा क्या? पिता - नहीं मेरी बेटी बहुत अच्छा बना है, और देखते देखते पूरा कटोरा खाली कर दिया। इतने में माँ बाथरूम से नहाकर बाहर आई, और बोली - ला मुझे खिला अपना हलवा.... पिता ने बेटी को 50 रुपए इनाम में दिये। बेटी खुशी से मम्मी के लिए रसोई से हलवा लेकर आई। मगर ये क्या जैसे ही उसने हलवा की पहली चम्मच मुँह में डाली तो तुरंत थूक दिया। और बोली ये क्या बनाया है... ये कोई हलवा है इसमें चीनी नहीं नमक भरा है। और आप इसे कैसे खा गए ये तो एकदम कड़वा है। पत्नी - मेरे बनाये खाने में तो कभी नमक कम है, कभी मिर्च तेज है, कहते रहते हो। और बेटी को बजाय कुछ कहने के इनाम देते हो। पिता हँसते हुए - पगली... तेरा मेरा तो जीवन भर का साथ है। रिश्ता है पति पत्नी का, जिसमे नोक झोक.. रूठना मनाना सब चलता है...मगर ये तो बेटी है कल चली जाएगी। आज इसे वो अहसास... वो अपनापन महसूस हुआ जो मुझे इसके जन्म के समय हुआ था। आज इसने बड़े प्यार से पहली बार मेरे लिए कुछ बनाया है। फिर वो जैसा भी हो मेरे लिए सबसे बेहतर और सबसे स्वादिष्ट है ये बेटियां अपने पापा की परियां और राजकुमारी होती हैं, जैसे तुम अपने पापा की परी हो। वो रोते हुए पति के सीने से लग गई और सोच रही थी, इसीलिए हर लड़की अपने पति में अपने पापा की छवि ढूंढ़ती है। यही सच है, हर बेटी अपने पिता के बड़े करीब होती है या यूँ कहें कलेजे का टुकड़ा, इसलिए शादी में विदाई के समय सबसे ज्यादा पिता ही रोता है। कई जन्मों की जुदाई के बाद बेटी का जन्म होता है, इसलिए तो कन्या दान करना सबसे बड़ा पूण्य होता है। *****
- सच की राह
मधु मधुमन ख़ामियाँ ही न गिनवाइए कुछ तो अच्छा भी बतलाइए चाहे कितनी भी हो मुश्किलें राह सच की ही अपनाइए जब किया ही नहीं कुछ ग़लत क्यूँ किसी से भी घबराइए ज़ख़्म ही ज़ख़्म जिसने दिए वो ख़ता फिर न दोहराइए जिनकी ताबीर मुमकिन न हो ख़्वाब ऐसे न दिखलाइए सबसे मिलिए भले ही मगर ख़ुद को ख़ुद से भी मिलवाइए लड़ झगड़ कर मिलेगा न हल प्यार से बात सुलझाइए वो न होगा कभी टस से मस चाहे कितना भी समझाइए जिसको मतलब है बस काम से उसकी बातों में मत आइए कोई सुनता नहीं गर तो क्या दर्द ग़ज़लों में कह जाइए दूर ‘मधुमन‘ है कब आसमाँ पंख तो आप फैलाइए। ******
- नगाड़ों में तूती-नाद
सत्येंद्र तिवारी स्वतंत्र हो गए हैं हम स्वतंत्र हो गए, खुदगर्ज मकसद का प्रजातंत्र हो गए। हर गांव की डगर-डगर शहरों की हर गली माता-पिता बहन थीं बेटियां थी हर कली बदल गए हैं त्याग तपस्या के सारे अर्थ, मूल्यों के लिए जो जिए वह संत खो गए। हर कदम पर उर्वरा षड्यंत्र हो गए, स्वतंत्र हो गए हैं हम............ इंसान तुलते हैं अब वादों के बांट से अपने हितों को साधते धर्मों में बांट के जन-गण शकुंतला सा बाट जोहता रहे, संसद के राजमहल में दुष्यंत खो गए। नेतृत्व के हितों का महामंत्र हो गए, स्वतंत्र हो गए हैं हम............. देखो जिधर नजर में है केवल धुआं धुआं आतंक हर कदमों पर बनता मौत का कुआं घिरते जा रहे नव मेघा दहशतों के अब, सभी को गोवर्धन थे वह अनंत खोगए। दलदलो के कीचड़ का कुतंत्र हो गए, स्वतंत्र हो गए हैं हम.............. बापू और गोडसे की रूह एक हो गई पर खाईयां वतन में अब अनेक हो गई बिस्मिल, भगत, आजाद अब अशफाक नहीं है, चोरों के लिए मात्र हम तो पंथ हो गए। गाड़ों में, तूती का नाद -यंत्र हो गए, स्वतंत्र हो गए हैं हम,.............. *******
- कलयुग
विभा गुप्ता स्नेहा के पति का नये शहर में तबादला हुआ था। अपने आस-पड़ोस से वह बिल्कुल अनजान थी। उसके पति के ऑफ़िस के ही एक सहकर्मी आनंद कुमार का परिवार उसके मुहल्ले में ही रहता था। उसी की पत्नी अनिता के साथ वह उठती-बैठती थी। उसका मन भी लग जाता और आस-पड़ोस की जानकारी भी उसे मिल जाती थी। एक दिन अनिता ने आकर उसे बताया कि कुछ दिन पहले ही सी-301 वाली चौधरी आँटी की डेथ हो गई थी। कल रात ही इन्होंने मुझे बताया कि आज उनकी तेरहवीं है। मैं उनके यहाँ जा रही हूँ, तुम चलना चाहोगी? शिष्टाचार के नाते उसने जाना उचित समझा और 'हाँ' कहते हुए गरदन हिलाकर सहमति दे दी। पड़ोसिन के यहाँ पहुँचकर उसने देखा कि घर के एक बड़े हॉल में मृतका की एक बड़ी तस्वीर रखी हुई थी जिसपर ताज़े फूलों का एक हार चढ़ाया हुआ था। सामने बिछे कालीन पर एक तरफ़ पुरुष और दूसरी तरफ़ महिलाएँ बैठी हुईं थीं। वह भी जाकर महिलाओं की पंक्ति में बैठ गई। महिलाएँ आपस में खुसर-पुसर कर रहीं थीं, तभी दो महिलायें अंदर वाले कमरे से निकली और मृतका की तस्वीर के पास बैठकर ज़ोर-ज़ोर से रोने लगीं। पूछने पर पता चला कि वे मृतका की बहुएँ थीं। अपनी सास के प्रति बहुओं का स्नेह एवं आदर देखकर उसका दिल भर आया और मुँह से निकल पड़ा, "भगवान ऐसी बहुएँ सभी को दे, कितनी भाग्यशाली थीं वो जो ऐसी सुशील बहुएँ मिलीं थीं। उनके जाने के बाद तो बिचारियों का.....।" "अजी काहे की सुशील बहुएँ!" स्नेहा की बात पूरी होने से पहले ही पास बैठी एक महिला तपाक-से बोल पड़ीं। उनका इस तरह से कहना उसे अच्छा नहीं लगा। उसने कहा, "इतना दुखी तो कोई अपनों के लिये ही होता है ना....।" "जी हाँ, बिल्कुल होता है लेकिन..."। लेकिन क्या? "उसने आश्चर्य-से उन्हें देखा। महिला कहने लगी, "जब तक इनकी सास ज़िंदा थीं, इन्होंने उनकी कदर नहीं की। उनकी सेवा करने के बजाय उनसे सेवा करवाती रहीं। इनके बच्चों का जापा उन्होंने अकेले संभाला। जब तक उनके हाथ-पैर चलते रहे, सब अच्छा था लेकिन इंसान है, उम्र के साथ तो शरीर ढ़लेगा ही। बस तभी से....। इस घर की वो मालकिन थीं लेकिन उनकी बहुओं ने उन्हें एक कमरे तक सीमित कर दिया था। खाने के नाम पर तो बस उन्हें रोटी-सब्ज़ी ही मिलती थी। बाकी चीजों पर तो डॉक्टर की मोहर लगाकर उन्हें तरसा ही दिया था। आज देखो तो, उनके नाम पर कितने तरह-तरह के पकवान बनाये जा रहें हैं। जब तक रहीं..., अपनों के प्यार के लिये तरसतीं रहीं...।" इसके आगे उससे सुना नहीं गया, उसका मन खिन्न हो गया और वह वहाँ से उठकर चली आई। रास्ते भर वह यही सोचती रही, घर-मकान, कपड़े-जेवर इत्यादि के दिखावा करने वालों के बारे में तो बहुत सुना था पर रिश्तों का ऐसा झूठा दिखावा आज वह भी देख लिया। हे भगवान! कैसा कलयुग आ गया है। ******
- असली सेवा
संजय नायक "शिल्प" रजनी बेटा, ये शाम के वक्त ऐसे तैयार होकर कहा जा रही हो। अपनी बहु से रजनी उसकी बुजुर्ग सासूमां ने पूछा। टोक दिया ना क्यों अब हर काम तुमसे पूछकर करूं क्या? रजनी थोड़ा भडकते हुए बोली। बेटा मैं तो वो तुम्हें पता है मुझे डायबिटीज है तो दवाई के साथ-साथ खाने का…. हां हां पता है, तुम्हारी बीमारी का बनाकर रख दिया है टेबल पर खा लेना। और मुझे ऐसे मत टोका करो नवरात्रि चल रही है कालोनी में जागरण है। सभी मां की भक्ति का आनंद लेने जा रहे है, मुझे भी वहां जाना है। आखिर दुनियादारी भी तो देखनी है। तुम्हारी तरह बिस्तर पर पडे-पडे बडबडाने की आदत नहीं है मेरी। हूऊऊ, इतना अच्छा मूड बनाया था माता की भक्ति का और खैर जा रही हूं बारह बजे तक आ जाऊंगी। कहकर रजनी मुंह बनाते हुए बाहर निकल गई। दो घर बाद अपनी हम उम्र पडोसन सुधा को आवाज देते हुए कहा, सुधा, अरी ओ सुधा। हां दीदी, सुधा ने दरवाजा खोलते हुए कहा। अरे तू अभी तक तैयार नही हुई भूल गई क्या? आज माता के जागरण में चलना है, देख मैं तो तैयार हो गई रजनी ने मुस्कुराते हुए कहा। नही दीदी, मैं नहीं जा सकूंगी। क्यों? दीदी वो सुबह टायलेट जाते समय मम्मी जी बाथरूम मे गिर गई थी। कमर और कूल्हों मे दर्द है उनके। डाक्टर को दिखाया था मोहनजी और मैने। तो उन्होंने दर्द की टयूब लगाने के लिए और गर्म पानी की सिकाई के लिए बताया था। वैसे एक्सरे करवाया था कुछ नहीं आया फैक्चर वगैरह शुक्र है माता रानी का। अब उनकी सोने से पहले एकबारगी और सिकाई कर दूंगी और टयूब लगा दूंगी ताकि उन्हें रातभर सुकून मिलता रहे। दोनों हाथों को जोडते हुए सुधा बोली। तू इसी सब में पड़ी रहना। अरे नवरात्रि है मातारानी की भक्ति कर वो झोलियां भर देती है खुशियों से। कहते है इन दिनों जोभी भक्ति भाव से माताजी का ध्यान करता है माताजी उसे मनचाही मुरादें देती है। आज हमारी कालोनी में ही नहीं पूरा शहर माता रानी की भक्ति में मग्न है। अब ये जागरण रोज-रोज तो होते नहीं, इस तरह के जागरणों में जाने से, माताजी की भक्ति करने से इंसान को पुण्य मिलता है पुण्य। कुछ पुण्य कमा ले अगले कई जन्म सुधर जाऐंगे। अगले पिछले जन्मों का तो पता नहीं इंसान को जो भी अच्छा कर्म करना है अपने इसी जन्म में कर लेना चाहिए। पाप और पुण्य तो इसी लोक में है और मेरे लिए घर के बुजुर्गों की सेवा से बड़ा कोई पुण्य नही है। इससे बडी कोई भक्ति नही है, अगर मैं अपनी मां समान सासूमां को दर्द में तड़पता छोड़कर जागरण में माताजी की भक्ति कर भी लूंगी तो मुझे मन में सुकून नही मिलेगा। जानती हो यहां जो ईश्वर की कृपा से एक बेटी को दूसरी मां का प्यार और साथ मिला है, इससे बडा कोई पुण्य नही हो सकता। मां ही तो है जिसने मेरी डिलीवरी के वक्त दिनरात मेरी सेवा की। मेरे बिस्तर पर रहते हुए मेरी हर सुविधाओं का ध्यान रखा। माफ करना रजनी दीदी, अपनी मां को दर्द में छोडकर मुझे कोई भक्ति नही करनी। वैसे नवरात्रि पर्व है जय माता दी, कहकर सुधा अंदर की ओर चली गई वहीं रजनी का चेहरा उतर सा गया था। अचानक अंदर से आती आशीर्वादों के साथ-साथ अनेकों दुआओं की मनमोहक आवाजों ने उसे सोचने पर मजबूर कर दिया। क्या वह अपनी मां समान सासूमां को भूखे रखकर माताजी की सच्ची भक्ति करने जा रही है या यहां अपनी सासूमां की उनके दर्द में सहभागी बनकर उनकी बहु सुधा सच्ची भक्ति कर रही है। अचानक उसने भी अपने दोनों हाथों को जोडकर अपने कानों को छूआ और बोली, मुझे भी माफ करना माताजी, आपकी भक्ति तो मैं घरके मंदिर में भी कर लूंगी, मगर सचमुच जो घर में विराजमान असली माताजी है पहले मुझे उनकी सेवा करनी जरूरी है। मुझे उन्हें गर्म खाना उनकी दवाओं के साथ देनी चाहिए। माताजी, मैं आपके जागरण में जरूर आऊंगी मगर अपनी मां की देखभाल करने के बाद जय माता दी। कहकर रजनी भी वापस घर की ओर मुड गई ....!! ******
- अंतिम प्रथम!
निरंजन धुलेकर सालों बाद लौटा था माँ बाबूजी के पास और अब हमेशा यहीं रहूँगा इसलिए बेहद ख़ुश भी था। कुछ हफ्ते तो खूब मज़े से निकल गए बातों गप्पो में पर फिर एक बात साफ़ हो गयी कि मुझे उन दोनों की और उनको मेरी, आदत ही नही थी। पहले मेरे होस्टल जाने और फिर वहीं से नौकरी पर बाहर रहने की वजह से वो दोनों दसियों सालोँ से अकेले ही रहे। मैं अकेला ही रहता आया एक कमरे की आदत वाला। रूटीन में दखलंदाजी की मुझे भी आदत नहीं थी। पर अब घर मे लोग थे तीन और कमरे थे चार तो कभी-कभी हो जाता था टकराव। फ़िर दोनों तरफ उठती खीज और गुस्सा। मैं गुस्से में अक्सर मैं छत पर जा बैठता क्यूंकि उम्र के मारे वो दोनों छत पर नही चढ़ पाते थे। उस दिन भी मैं छत पर ही बैठा था। नज़र एक जगह जा कर टिक गई। छज्जे पर बना गौरैया का गुलजार घोसला आज एकदम ख़ाली था। सोचने लगा क्या हुआ कहाँ उड़ गए सब के सब। कितना बियावान भयानक लग रहा था बड़े कटोरे जितना घोंसला। अचानक महसूस किया कि अभी तो माँ बाबूजी हैं टोकने डाँटने हक़ से बुलाने काम बताने के लिए उनकी आवाज़ों की वजह से ही तो ये घर भरा-भरा है। पर तब क्या होगा जब सूनसान ख़ाली कमरों के सन्नाटों को चीरती आयेंगी उनकी यादें और मच जाएगी मेरे पश्चाताप और आँसुओं की चीख़ पुकार। मैं अंजाने डर से सिहर उठा और झट से नीचे आ गया। मुझे लगा अपने इस घरौंदे में मुझे पूरा ढलना बसना और रमना होगा उनके तौर तरीकों को सीखना, अपनाना होगा। आख़िरकार उन दोनों के लिए मैं ही तो था उनका प्रथम भी और अंतिम भी। *****











