Search Results
978 results found with an empty search
- किसान की चतुराई
सुभाष चौधरी एक किसान बहुत ही उम्दा किस्म का मक्का उगाता था। हर वर्ष उसकी उगाई हुई मक्का को राष्ट्रीय फसल मेला में पुरस्कृत किया जाता था। एक साल एक रिपोर्टर उसका साक्षात्कार लेने, और यह जानने की उत्सुकता के साथ वहां आया कि वह किसान हर वर्ष ऐसा कैसे कर पाता है। आसपास उस किसान के बारे में पूछने पर उसे पता चला कि किसान हर वर्ष अपने पड़ोसियों को अपना अच्छी किस्म का मक्का का बीज निशुल्क बांटता है। रिपोर्टर किसान के पास गया और उससे पूछा.. ”आप अपने सभी पड़ोसियों को अच्छी किस्म का बीज निशुल्क क्यों बांटते हैं इससे तो आपका कितना खर्च हो जाता होगा।" किसान बोला, क्या आप नहीं जानते कि हवाएँ पके हुए मक्का के पराग कणों को उड़ा कर आसपास के खेतों में फैला देती हैं। अगर मेरे पड़ोसी बेकार किस्म का मक्का बोयेंगे तो हर साल उनकी फसल से आये पराग कण मेरे खेतों में भी बिखरेंगे और क्रॉस पोलिनेशन के कारण साल दर साल मेरी फसल की गुणवत्ता गिरती चली जाएगी। इसलिए अगर मैं अच्छी मक्का उगाना चाहता हूँ तो मुझे मेरे पड़ोसियों को भी अच्छी मक्का उगने में मदद करनी होगी। वास्तव में हमारे जीवन की सच्चाई भी कुछ इसी प्रकार की है। अगर हम अच्छा और खुशहाल जीवन जीना चाहते हैं तो हमें हमसे जुड़े सभी लोगों को भी ऐसा करने के लिए प्रेरित करना चाहिए और उनकी सहायता करनी चाहिए। हमारे जीवन में ख़ुशी और शांति का स्थायी वास तभी हो सकता है जब हमसे जुड़े हुए लोग भी खुश हाल हों। *****
- स्पर्श
श्रीमती स्वयंकार सुनीता बड़ी उत्साहित थी अपनी बेटी को पहली बार, बस में भेज कर। क्योंकि वह हमेशा चाहती थी कि उसकी बेटी पब्लिक ट्रांसपोर्ट में आना जाना सीखे। पहली बार जा रही थी इसलिए पिता भी साथ में थे। लेकिन सीमा...! उसका तो बुरा हाल हुए जा रहा था बस का सोचकर। सफर तो कई बार किया था उसने, लेकिन मां के बिना कभी नहीं। मां के साथ हमेशा सुरक्षित महसूस करती थी वह। लेकिन आज पिता के साथ अकेले जाना था। सुनीता ने कठोर बनकर सीमा को भेज ही दिया। बस खचाखच भरी हुई थी। पीछे बैठने के लिए कहीं कोई स्थान नहीं था। ड्राइवर ने दोनों को आगे बोनट के पास बैठा दिया। एक लड़का जगह न मिलने के कारण बोनट पर बैठा हुआ था। थोड़ी देर बैठने के बाद सीमा को नींद आ गई। नींद खुली तो उसने पाया जैसे उसके पैर पर कुछ चल रहा है, लेकिन जब देखा तो वह चरित्रहीन, संस्कारहीन लड़का अपने पैर के अंगूठे से उसकी पैर को स्पर्श कर रहा था। सीमा असहज हो गई। वह उसकी अत्यंत चुभने वाली दृष्टि से लहूलुहान हो रही थी। लेकिन पता नहीं क्यों, अपने पिता को एक शब्द नहीं बता पाई, उस लड़के के बारे में। मां बहुत याद आ रही थी। यदि मां होती तो बताना ही नहीं पड़ता, वह स्वयं ही समझ जाती। रास्ता बहुत लंबा था। लेकिन सीमा के लिए लंबा ही नहीं बोझिल भी था। पता नहीं कैसे उस, अबोध लड़की ने समय काटा? जैसे ही वह लड़का अपने स्टॉप पर उतरा, उसने राहत की सांस ली। चाहें वह लड़का उसे फिर कभी नहीं दिखा, लेकिन उसका डरावना व्यवहार सीमा, सारी उम्र याद रखेगी। बिल्कुल वैसे ही जैसे, हम खूबसूरत यादों को अपने मस्तिष्क में, समेट कर रखते हैं। उस लड़के के बारे में सोचती हूं तो दया आती है। आखिर उसने एक अनजान लड़की के हृदय में जगह बनाई भी तो किस रूप में। एक राक्षस के रूप में.. *****
- भला कौन?
सुभाष चौधरी एक बार एक धनी पुरुष ने एक मंदिर बनवाया। मंदिर में भगवान की पूजा करने के लिए एक पुजारी रखा। मंदिर के खर्च के लिए बहुत सी भूमि, खेत और बगीचे मंदिर के नाम से लगाए। उन्होंने ऐसा प्रबंध किया था कि मंदिर में जो भूखे, दीन दुखी या साधु-संत आवें, वे वहां दो-चार दिन ठहर सकें और उनको भोजन के लिए भगवान का प्रसाद मंदिर से मिल जाया करे। अब उन्हें एक ऐसे मनुष्य की आवश्यकता हुई जो मंदिर की संपत्ति का प्रबंध करें और मंदिर के सब कामों को ठीक-ठीक चलाता रहे। बहुत से लोग उस धनी पुरुष के पास आए। वे लोग जानते थे कि यदि मंदिर की व्यवस्था का काम मिल जाए तो वेतन अच्छा मिलेगा। लेकिन उस धनी पुरुष ने सबको लौटा दिया। वह सब से कहता था – "मुझे एक भला आदमी चाहिए, मैं उसको अपने आप छांट लूंगा।" बहुत से लोग मन ही मन में उस धनी पुरुष को गालियां देते थे। बहुत लोग उसे मूर्ख या पागल बतलाते थे। लेकिन वह धनी पुरुष किसी की बात पर ध्यान नहीं देता था। जब मंदिर के पट खुलते थे और लोग भगवान के दर्शन के लिए आने लगते थे तब वह धनी पुरुष अपने मकान की छत पर बैठकर मंदिर में आने वाले लोगों को चुपचाप देखता रहता था। एक दिन एक मनुष्य मंदिर में दर्शन करने आया। उसके कपड़े मैले और फटे हुए थे वह बहुत पढ़ा लिखा भी नहीं जान पड़ता था। जब वह भगवान का दर्शन करके जाने लगा तब धनी पुरूष ने उसे अपने पास बुलाया और कहा – ‘क्या आप इस मंदिर की व्यवस्था संभालने का काम करें ?’ वह मनुष्य बड़े आश्चर्य में पड़ गया। उसने कहा – ‘मैं तो बहुत पढ़ा लिखा भी नहीं हूं, मैं इतने बड़े मंदिर का प्रबंध कैसे कर सकूंगा?’ धनी पुरुष ने कहा – ‘मुझे बहुत विद्वान नहीं चाहिए, मैं तो एक भले आदमी को मंदिर का प्रबंधक बनाना चाहता हूं।’ उस मनुष्य ने कहा – ‘आपने इतने व्यक्तियों में मुझे ही क्यों भला आदमी माना।’ धनी पुरुष बोला – ‘मैं जानता हूं कि आप भले आदमी हैं। मंदिर के रास्ते में एक ईंट का टुकड़ा गड़ा रह गया था और उसका एक कोना ऊपर निकला हुआ था, मैं उधर बहुत दिनों से देख रहा था कि उस मंदिर की ईंट के टुकड़े की नोक से लोगों को ठोकर लगती थी, लोग गिरते थे लुढ़कते थे और उठ कर चल देते थे। आपको उस टुकड़े से ठोकर नहीं लगी किंतु फिर भी आपने उसे देखते ही उखाड़ देने का यतन किया। मैं देख रहा था कि आप मेरे मजदूर से फावड़ा मांगकर ले गए और उस टुकड़े को खोद कर आपने वहां की भूमि भी बराबर कर दी।’ उस व्यक्ति ने कहा – “यह तो कोई बात नहीं है, रास्ते में पड़े कांटे, कंकड़ और पत्थर, ईटों को हटा देना तो प्रत्येक मनुष्य का कर्तव्य है।’ धनी पुरुष ने कहा – ‘अपने कर्तव्यों को जानने और पालन करने वाले लोग ही भले आदमी होते हैं।’ वह व्यक्ति मंदिर का प्रबंधक बन गया उसने मंदिर का बड़ा सुंदर प्रबंध किया। ******
- आधा गांव
ऊँघता शहर राही मासूम रज़ा गाजीपुर के पुराने किले में अब एक स्कूल है जहाँ गंगा की लहरों की आवाज तो आती हैं, लेकिन इतिहास के गुनगुनाने या ठंडी साँसें लेने की आवाज नहीं आती। किले की दीवारों पर अब कोई पहरेदार नहीं घूमता, न ही उन तक कोई विद्यार्थी ही आता है, जो डूबते हुए सूरज की रोशनी में चमक्षमाती हुई गंगा से कुछ कहे या सुने। गँदले पानी की इस महान् धारा को न जाने कितनी कहानियाँ याद होंगी। परन्तु माँएँ तो जिनों, परियों, भूतों और डाकुओं की कहानियों में मगन हैं और गंगा के किनारे न जाने कब से मेल्हते हुए इस शहर को इसका खयाल भी नहीं आता कि गंगा के पाठशाले में बैठकर अपने पुरखों की कहानियाँ सुने। यह असंभव नहीं कि अगर अब भी इस किले की पुरानी दीवार पर कोई आ बैठे और अपनी आँखें बंद कर ले तो उस पार के गाँव और मैदान और खेत घने जंगलों में बदल जायँ और तपोबन में ऋषियों की कुटियाँ दिखायी देने लगें। और वह देखे कि अयोध्या के दो राजकुमार कंधे से कमानें लटकाये तपोवन के पवित्र सन्नाटे की रक्षा कर रहे हैं। लेकिन इन दीवारों पर कोई बैठता ही नहीं। क्योंकि जब इन पर बैठने की उम्र आती है तो गजभर की छातियोंवाले बेरोजगारी के कोल्हू में जोत दिये जाते हैं कि वे अपने सपनों का तेल निकालें और उस जहर को पीकर चुपचाप मर जायेँ। लगा झूलनी का धक्का बलम कलकत्ता चले गये। कलकत्ता की चटकलों में इस शहर के सपने सन के ताने-बाने में बुनकर दिसावर भेज दिये जाते हैं और फिर सिर्फ ख़ाली आँखें रह जाती हैं और वीरान दिल रह जाते हैं और थके हुए बदन रह जाते हैं, जो किसी अँधेरी -सी कोठरी में पड़े रहते हैं और पगड्डंडियों, कच्चे-पक्के तालाबों, धान, जौ और मटर के खेतों को याद करते रहते हैं। कलकत्ता! कलकत्ता किसी शहर का नाम नहीं है। गाजीपुर के बेटे-बेटियों के लिए यह भी विरह का एक नाम है। यह शब्द विरह की एक पूरी कहानी है, जिसमें न मालूम कितनी आँखों का काजल बहकर सूख चुका है। हर साल हजारों-हजार परदेस जानेवाले मेघदूत द्वारा हजारों-हजार संदेश भेजते हैं। शायद इसीलिए गाजीपुर में टूटकर पानी बरखता है और बरसात में नयी-पुरानी दीवारों, मस्जिदों और मन्दिरों की छतों और स्कूलों की खिड़कियों के दरवाजों की दरार में विरह के अंखुए फूट आते हैं, और जुदाई का दर्द जाग उठता है और गाने लगते हैं बरसत में कोऊ घर से ना निकले तु्महि अनूक बिदेस जबैया कलकत्ता, बंबई, कानपुर और ढाका-इस शहर की हदें हैं। दूर तक फैली हुई हदें “यहाँ के रहनेवाले यहाँ से जाकर भी यहीं के रहते हैं। गुब्बारे आकाश में चाहे कितनी दूर निकल जाये परंतु अपने केन्द्र से उनका संबंध नहीं टूटता, जहाँ किसी बच्चे के हाथ में निर्बल धागे का एक सिरा होता है। इधर कुछ दिनों से ऐसा हो गया है कि बहुत से बच्चों के हाथों से यह डोर डूट गयी है। यह कहानी, सच पूछिये तो, उन्हीं गुब्बारों की है या शायद उन बच्चों की है जिनके हाथों में मरी हुई डोर का एक सिरा है और जो अपने गुब्बारों की तलाश कर रहे हैं और जिन्हें यह नहीं मालूम कि डोर टूट जाने पर उन गुब्बारों का अंजाम क्या हुआ। गंगा इस नगर के सिर पर और गालों पर हाथ फेरती रहती है, जैसे कोई माँ अपने बीमार बच्चे को प्यार कर रही हो, परंतु जब इस प्यार की कोई प्रतिक्रिया नहीं होती, तो गंगा निलख-जिलखकर रोने लगती है और यह नगर उसके आँसुओं में डूब जाता है। लोग कहते हैं कि बाढ़ आ गयी। मुसलमान अजान देने लगते हैं। हिंदू गंगा पर चढ़ावे चढ़ाने लगते हैं कि रूठी हुई गंगा मैया मान जाय। अपने प्यार की इस हतक पर गंगा झल्ला जाती है और किले की दीवार से अपना सिर टकराने लगती है और उसके उजले-सफेद बाल उलझकर दूर-दूर तक फैल जाते हैं। हम उन्हें झाग कहते हैं। गंगा जब यह देखती है कि उसके दुःख को कोई नहीं समझता, तो वह अपने आँसू पॉछ डालती है; तब हम यह कहते हैं कि पानी उतर गया। मुसलमान कहते हैं कि अजान का वार कभी खाली नहीं जाता, हिंदू कहते हैं कि गंगा ने उनकी भेंट स्वीकार कर ली। और कोई यह नहीं कहता कि माँ के आँखुओं ने जमीन को और भी
- संयम का महत्व
रमा कांत कहने को तो संयम बहुत ही छोटा सा शब्द है पर समझने को बहुत ही बड़ा है। आज मैं आपको एक छोटी की घटना का उल्लेख कर रहा हूँ। जो समझ गया समझो जीवन का गूढ़ रहस्य समझ गया और जो न समझा सका उसे ईश्वर ही सदबुद्धि दे। एक देवरानी और जेठानी में किसी बात पर जोरदार बहस हुई और दोनों में बात इतनी बढ़ गई कि दोनों ने एक दूसरे का मुँह तक न देखने की कसम खा ली और अपने-अपने कमरे में जा कर दरवाजा बंद कर लिया। परंतु थोड़ी देर बाद जेठानी के कमरे के दरवाजे पर खट-खट हुई। जेठानी तनिक ऊँची आवाज में बोली कौन है, बाहर से आवाज आई दीदी मैं! जेठानी ने जोर से दरवाजा खोला और बोली अभी तो बड़ी कसमें खा कर गई थी। अब यहाँ क्यों आई हो? देवरानी ने कहा दीदी सोच कर तो वही गई थी, परंतु माँ की कही एक बात याद आ गई कि जब कभी किसी से कुछ कहा सुनी हो जाए तो उसकी अच्छाइयों को याद करो और मैंने भी वही किया और मुझे आपका दिया हुआ प्यार ही प्यार याद आया और मैं आपके लिए चाय ले कर आ गई। बस फिर क्या था दोनों रोते रोते, एक दूसरे के गले लग गईं और साथ बैठ कर चाय पीने लगीं। जीवन मे क्रोध को क्रोध से नहीं जीता जा सकता, बोध से जीता जा सकता है। अग्नि-अग्नि से नहीं बुझती जल से बुझती है। समझदार व्यक्ति बड़ी से बड़ी बिगड़ती स्थितियों को दो शब्द प्रेम के बोलकर संभाल लेते हैं। हर स्थिति में संयम और बड़ा दिल रखना ही श्रेष्ठ है। *****
- हाय ये झटका
अर्चना नाकरा शादी को अभी जुम्मा-जुम्मा साल ही हुआ था। इतनी सुन्दर बहू, राशि। ऊपर से दीपावली पर मां ने सितारों जड़ी साड़ी भेजी थी। वो, बेहद खूबसूरत लग रही थी। सास बार-बार उसकी नजरें उतार रही थी। पति, राघव, तो देख देखकर निहाल हो रहे थे। दियों की जगमग उसके चेहरे की खुशी के आगे छुपती नहीं थी। सास ने एक सुंदर सा गले में हार पहनाया, आशीर्वाद दिया और जल्दी ही एक नई खुशी घर में लाने का अनुरोध भी कर दिया। राशि और राघव दोनों ही शरमा गए थे। राशि छत पर, दिए जलाने में इतनी व्यस्त थी कि उसने देखा ही नहीं उसकी साड़ी का पल्लू कब एक जलती लौ को छू गया। पल्लू ने आग पकड़ ली थी। राशि की घरेलू मददगार 'शन्नो' उसी तरफ, दिए लेकर आ रही थी। उसने जैसे ही राशि को देखा, तुरंत खींच कर उसकी साड़ी को अलग कर दिया। उसके भी, हाथ जल गये थे। फिर वो अपनी शाल से राशि को ढक कर नीचे ले आई थी। साड़ी का पल्लू जल चुका था। बची हुई साड़ी छत पर पड़ी मुंह चिढ़ा रही थी। तीन-चार दिन बाद जब राशि सदमे से उबरी। तो वो छत पर गई और मां की इतने प्यार से दी वो साड़ी उठा लाई थी। मानों मां के प्यार को सहेज रही थी। करीने से काट कर उसके पल्लू को अलग किया उसको अलमारी में रखने ही जा रही थी कि सासू मां ने थोड़ी धीमी आवाज में कहा बेटा “अब ये साड़ी दोबारा नहीं पहनना।” इसे विदा कर। जली हुई साड़ी नहीं पहनते। और हां.. जो हो गया सो गया। राशि ने देखा उसकी घरेलू मददगार शन्नो पर्दे के पीछे खड़ी, बड़ी प्यारी सी नजरों से साड़ी को ताक रही थी। राशि ने पूछा, शन्नो तुम्हें चाहिए? देखो, मैंने इसे थोड़ा ठीक कर दिया है। लेना चाहो तो, ले जा सकती हो। शन्नो खुशी-खुशी वो साड़ी घर ले गई। शन्नो की कद काठी भी लगभग राशि जैसी ही थी। और फिर कुछ दिन बाद शन्नो वही साड़ी पहनकर राशि के घर काम कर रही थी। राशि का पति राघव ऑफिस से आया तो उसे, राशि रसोई में काम करती लगी। और उसने शन्नो को राशि समझ कर अपनी बाहों में भर लिया। शन्नो मुंह में भरकर लड्डू खा रही थी जो शायद राशि ने थोड़ी देर पहले दिया था। उसके मुंह से आवाज नहीं निकल रही थी। और राघव सोच रहा था कि राशि मुड़कर मुझसे गले क्यों नहीं मिल रही? इतनी देर में.. राशि रसोई में आकर ये सब देख कर हैरान हो गई। उसे लगा राघव.. शन्नो के साथ.. वो ज़ोर से चीखती हुई बाहर की ओर भागी। राशि की सास भी घर नहीं थी। राघव भी शन्नो को देख हैरान था। वो कभी उसे कभी, उस साड़ी को देखता! बेचारा, अपने, सिर पर हाथ मारता, परेशान हो रहा था। बाहर सदमे से कांपती राशि को देख कर अफसोस कर रहा था। राशि ठीक तो हो गई पर एक फांस सी उसके मन में घर कर गई। राघव उसे खूब समझाता। कि मैं तो शन्नो को तुम्हारी दी साड़ी में नहीं पहचान पाया। पर तुम मुझे तो, बताती और हां आइंदा से उसे अपना कोई सूट, साड़ी ना देना, जब देना, नया ही दिलाना। घर आकर, सासू मां भी चकरा गई थी। क्योंकि वो खुद भी बरसों पहले की गई इस गलती से महिनों अपने पति से लड़ चुकी थी। *****
- सबसे कीमती चीज
डॉ. कृष्णा कांत श्रीवास्तव माँ की मौत के बाद जब तेरहवी भी निमट गई तब नम आँखों से चारु ने अपने भाई से विदा ली। "सब काम निमट गये भैया माँ चली गई अब मैं चलती हूँ भैया!" आंसुओ के कारण उसके मुंह से केवल इतना निकला। "रुक चारु अभी एक काम तो बाकी रह गया। ये ले माँ की अलमारी खोल और तुझे जो सामान चाहिए तू ले जा।" एक चाभी पकड़ाते हुए भैया बोले। "नही भाभी ये आपका हक है आप ही खोलिये।" चारु चाभी भाभी को पकड़ाते हुए बोली। भाभी ने भैया के स्वीकृति देने पर अलमारी खोली। "देख ये माँ के कीमती गहने, कपड़े है तुझे जो ले जाना ले जा क्योकि माँ की चीजों पर बेटी का हक सबसे ज्यादा होता है।" भैया बोले। "भैया पर मैने तो हमेशा यहां इन गहनो, कपड़ो से कीमती चीज देखी है मुझे तो वही चाहिए।" चारु बोली। "चारु हमने माँ की अलमारी को हाथ तक नही लगाया जो है तेरे सामने है तू किस कीमती चीज की बात कर रही है।" भैया बोले। "भैया इन गहने कपड़ों पर तो भाभी का हक है क्योकि उन्होंने माँ की सेवा बहू नही बेटी बनकर की है। मुझे तो वो कीमती सामान चाहिए जो हर बहन बेटी चाहती है।" चारु बोली। "मैं समझ गई दीदी आपको किस चीज की चाह है। दीदी आप फ़िक्र मत कीजिये मांजी के बाद भी आपका ये मायका हमेशा सलामत रहेगा। पर फिर भी मांजी की निशानी समझ कुछ तो ले लीजिये।" भाभी भरी आँखों से बोली तो चारु रोते हुए उनके गले लग गई। "भाभी जब मेरा मायका सलामत है। मेरे भाई-भाभी के रूप मे फिर मुझे किसी निशानी की जरूरत नही फिर भी आप कहती हैं तो मैं ये हँसते खेलते मेरे मायके की तस्वीर ले जाना चाहूंगी। जो मुझे हमेशा एहसास कराएगा कि मेरी माँ भले नही पर मायका है।" चारु पूरे परिवार की तस्वीर उठाते हुए बोली और नम आँखों से विदा ली सबसे। *****
- मेरा बटुआ
राजीव बंसल खचाखच भरी बस में कंडक्टर को एक गिरा हुआ बटुआ मिला जिसमे एक सौ का नोट और भगवान् की एक फोटो थी। वह जोर से चिल्लाया, “अरे भाई! किसी का बटुआ गिरा है क्या?” अपनी जेबें टटोलने के बाद सीनियर सिटीजन सीट पर बैठा एक आदमी बोला, “हाँ, बेटा शायद वो मेरा बटुआ होगा, जरा दिखाना तो।” “दिखा दूंगा - दिखा दूंगा, लेकिन चाचाजी पहले ये तो बताओ कि इसके अन्दर क्या-क्या है?” “कुछ नहीं इसके अन्दर थोड़े पैसे हैं और मेरे प्रभु की एक फोटो है।”, चाचाजी ने जवाब दिया. “पर भगवान की फोटो तो किसी के भी बटुए में हो सकती है, मैं कैसे मान लूँ कि ये आपका है।”, कंडक्टर ने सवाल किया। अब चाचाजी उसके बगल में बैठ गए और बोले, “बेटा ये बटुआ तब का है जब मैं हाई स्कूल में था। जब मेरे बाबूजी ने मुझे इसे दिया था तब मेरे प्रभु की फोटो इसमें थी। लेकिन मुझे लगा कि मेरे माँ-बाप ही मेरे लिए सबकुछ हैं इसलिए मैंने अपने प्रभु की फोटो के ऊपर उनकी फोटो लगा दी। जब युवा हुआ तो लगा मैं कितना खूबसूरत हूँ और फ़िर मैंने माँ-बाप के फोटो के ऊपर अपनी फोटो लगा ली। फिर मुझे एक लड़की से प्यार हो गया, लगा वही मेरी दुनिया है, वही मेरे लिए सबकुछ है और मैंने अपनी फोटो के साथ-साथ उसकी फोटो लगा ली। सौभाग्य से हमारी शादी भी हो गयी। कुछ दिनों बाद मेरे बेटे का जन्म हुआ, इतना खुश मैं पहले कभी नहीं हुआ था। सुबह-शाम, दिन-रात मुझे बस अपने बेटे का ही ख़याल रहता था। अब इस बटुए में मैंने सबसे ऊपर अपने बेटे की फोटो लगा ली। पर अब जगह कम पड़ रही थी, इसलिए मैंने अपने प्रभु और अपने माँ-बाप की फोटो निकाल कर बक्से में रख दी। और विधि का विधान देखो, फोटो निकालने के दो-चार साल बाद माता-पिता का देहांत हो गया और दुर्भाग्यवश उनके बाद मेरी पत्नी भी एक लम्बी बीमारी के बाद मुझे छोड़ कर चली गयी। इधर बेटा बड़ा हो गया था, उसकी नौकरी लग गयी औऱ शादी भी हो गयी। उसके बाद बहू-बेटे को अब ये घर छोटा लगने लगा, उन्होंने दूर कहीं अपार्टमेंट में एक फ्लैट ले लिया और वहां चले गए। अब मैं अपने उस घर में बिलकुल अकेला था जहाँ मैंने तमाम रिश्तों को जीते-मरते देखा था। पता है, जिस दिन मेरा बेटा मुझे छोड़ कर गया, उस दिन मैं बहुत रोया। इतना दुःख मुझे पहले कभी नहीं हुआ था। कुछ नहीं सूझ रहा था कि अब मैं क्या करूँ और तब मेरी नज़र उस बक्से पर पड़ी जिसमे सालों पहले मैंने अपने प्रभु की फोटी अपने बटुए से निकाल कर रख दी थी। मैंने फ़ौरन वो फोटो निकाली और उसे अपने सीने से चिपका ली। अजीब सी शांति महसूस हुई, लगा मेरे जीवन में तमाम रिश्ते जुड़े और टूटे, लेकिन इन सबके बीच में मेरे भगवान् से मेरा रिश्ता अटूट रहा। मेरा भगवान कभी मुझसे रूठा नहीं। और तब से इस बटुए में सिर्फ मेरे प्रभु की फोटो है और किसी की भी नहीं और मुझे इस बटुए और उसमे पड़े सौ के नोट से कोई मतलब नहीं है, मेरा स्टॉप आने वाला है। तुम बस बटुए की फोटो मुझे दे दो। मेरा भगवान मुझे दे दो, बस। कंडक्टर ने फौरन बटुआ चाचाजी के हाथ में रखा और उन्हें एकटक देखता रह गया। ******
- सबक
मीनाक्षी चौहान दूनी खुशी हो रही है, एक तो मन मुताबिक डील फ़ाइनल हो गई दूसरे तीन दिन बाद अपने घर वापस लौट रहा हूँ। ये खुशगवार मौसम, ठंडी-ठंडी हवाएँ, ऊंचे-ऊंचे पहाड़ और सामने एकदम खाली सी सड़क। बस दौड़ा दी गाड़ी। थोड़ी खुशी थोड़ी मस्ती और थोड़ी स्पीड का मेल तो होता ही बेजोड़ है। अपनी मस्ती में मस्त गाड़ी चला रहा था कि ना जाने झुरमुट से कहाँ वो ट्रैफ़िक पुलिस का सिपाही प्रकट हो गया। गाड़ी रुकवा ली मेरी। "आपका चालान किया गया है।" "चालान?.......चालान किस बात का सर जी?" "ओवर स्पीड का।" "अब सड़क खाली थी तो मैंने स्पीड जरा बढ़ा दी। मानता हूँ स्पीड थोड़ी ज्यादा थी।" "ज्यादा?........अस्सी से ऊपर दौड़ रही थी आपकी गाड़ी। जानते तो होंगे यहाँ स्पीड लिमिट चालीस है। जगह-जगह साईन बोर्ड लगे हैं पढ़े नहीं लगता है आपने।" "अरे सर जी जाने भी दीजिये। मामला रफा-दफा करिये।" मैनें बात वहीं दबाने की गुजारिश की। "आप हमारे बड़े साहब से बात कर लो वो बैठें हैं पेड़ के नीचे। बड़े भले आदमी हैं।" उसने चीड़ के पेड़ की ओर इशारा किया। गाड़ी लॉक करके हम दोनों उस ओर चल दिये। "साब जी स्पीड गन कैमरा में इनकी गाड़ी की स्पीड अस्सी से ऊपर आयी है।" बड़े अफसर को उसने सारी कहानी अच्छे से समझा दी। "सब कुछ सुनसुना कर वो बड़े अफसर मुझसे बड़ी ही तहजीब के साथ बोले," हजार का फ़ाइन तो आपको भरना ही होगा।" "सर, मैं कोई टूरिस्ट थोड़े ही ना हूँ, बिजनेसमैन हूँ। यहाँ अक्सर आता-जाता रहता हूँ। आप तो समझदार है।" "फैमिलीमैन तो हैं ना, ...........जैसे मेरी फैमिली मेरी राह देखती है जाहिर सी बात है आपकी फैमिली भी आपका इन्तज़ार कर रही होगी। ये पहाड़ हैं, हादसा होते देर नहीं लगती। फ़ाइन तो आपको पूरा देना पड़ेगा। समझिये ये चालान सजा नहीं एक सबक है।" उस बड़े अफसर ने तो लेक्चर झाड़ना शुरु कर दिया। मेरा पूरे हजार रुपये का चालान काट कर ही माना। अब भरने पड़े मुझे पूरे के पूरे पैसे। डेशबोर्ड पर चालान की पर्ची पटक कर मन ही मन उसे कोसते हुए आगे बढ़ा कि अब गाड़ी ने रेंगना शुरु कर दिया। आगे जाम लगा हुआ था वजह पूछी पता चला तेज स्पीड के चलते एक वैन कंट्रोल् खो कर नीचे खाई में जा गिरी। कलेजा धक्क से हो गया, हलक सूख गई। जाम से निकलते ही सबसे पहले पानी पिया। पानी पीते-पीते नज़र डेशबोर्ड पर गई जहाँ वो सबक की पर्ची फड़फड़ा रही थी। उठाकर रख लिया वो सबक अपने धड़कते हुए दिल के पास बनी जेब में। *****
- तराजू
लक्ष्मी कुमावत "देखो वर्मा जी की बहू कितनी समझदार है। इसे कहते हैं एक आदर्श बहू। इसे कहते हैं माता-पिता के संस्कार। अपनी सास ननद की कितनी सेवा करती है। सारे घर का काम कितनी तेजी से करती है और एक मेरी बहू है जिससे कोई काम ठीक से नहीं होता।" 'हां, जॉब वाली बहू हैं देखो। और तुम्हारी बहू को देखो कुछ नहीं करती' अम्मा जी और ननदरानी सुबह से ही ताने मारने में लगी हुई थी और आशा यह सोच रही थी कि आखिरकार मेरी सेवा में कहाँ कमी रह गई। हमेशा दूसरों की बहुओं का ही पलड़ा हमसे भारी क्यों होता है? आस-पड़ोस में शादी क्या होती है, अम्मा जी के तेवर ही बदल जाते हैं। दूसरों की बहू में आदर्श बहू नजर आने लग जाती है और खुद की बहुओं में हमेशा कमियां नजर आती है। आशा अम्माजी की बड़ी बहू है। अम्मा जी कहने को तो पैसठ साल की है, लेकिन आस-पड़ोस के लोग उन्हें इसी नाम से पुकारते हैं। काफी पहले ही उनके पति इस दुनिया से सिधार चुके हैं। उनके दो बेटे हैं बड़ा बेटा रमेश और बहू आशा, छोटा बेटा सुरेश उसकी पत्नी अनीता और एक बेटी मधु हैं, जिसकी शादी हो चुकी है। लेकिन अम्मा जी की मेहरबानी से ससुराल से ज्यादा अपने पीहर में नजर आती है। दो प्यारे-प्यारे पोते हैं। अम्मा जी को अपने बच्चे सर्वगुण संपन्न और बहुएँ कामचोर नजर आती हैं। उनकी इसी आदत के चलते अनीता तो अपने पति के साथ दूसरे शहर में रहती है। कभी-कभी किसी तीज त्यौहार पर आना होता है, तो इस कान से सुनकर उस कान से निकाल कर चली जाती है। लेकिन सास ननद की बातों को भुगतना तो आशा को पड़ता है। आशा की शादी को सात साल हो चुके हैं लेकिन उसके बावजूद भी आदर्श बहू बनते बनते वह अपनी पहचान कहां खो गई, उसे खुद ही नहीं पता। शादी से पहले जॉब करती थी लेकिन शादी के बाद अम्मा जी ने दस बहाने करके जॉब छुड़वा दी कि बाद में ज्वाइन कर लेना। जो जॉब छोड़ी, आज तक दोबारा ज्वाइन नहीं कर पाई। घर के कामों से ही फुर्सत नहीं मिलती। अम्मा जी के भाई के घर में शादी थी, तो वापस आने के बाद उनकी नई बहू के भी अम्मा जी ने खूब तारीफ के पुल बांधे। "देखो, जॉब करने वाली बहू है। घर और जॉब दोनों संभालती है और एक हमारी को देखो कुछ नहीं कर पाती। मेरे ही पल्ले ऐसी बहुए क्यों पड़ी" ननद भी क्या कम थी। उसने भी आग में घी डालने का काम किया। 'अरे मां तू तो रहने दे। जब बैठे-बैठे सब कुछ खाने को मिल रहा है तो कोई क्यों काम करें। एक बार तो मन में आया कि जवाब दे दो कि आप भी पीहर में क्यों पड़े हो अपने ससुराल में जाकर काम क्यों नहीं करते? तो पता चले कि कौन कामचोर है? पता नहीं दो दिन के अंदर नई बहू ऐसा क्या काम कर देती है जो उनकी सेवा चाकरी दिख जाती है। पर फिर ये सोच कर चुप रह गई कि चिकने घड़े पर असर ही कितना होता है। पर हैरानी के बात ये थी कि रमेश भी वहीं बैठा था लेकिन कुछ बोल नहीं रहा। लेकिन जब अम्माजी और ननद का बड़बड़ाना यूं ही चालू रहा तो आशा ने सारे काम जहां के तहां छोड़े और जाकर अपने कमरे में लेट गई। यह देखकर अम्मा जी और ननद रानी दोनों एक बार तो चुप हुई। उसके बाद रमेश को कहा, 'जाकर देख, महारानी को क्या हुआ है?' आशा को अंदर सब कुछ सुनाई दे रहा था उसने वहीं से आवाज लगाकर कहा, 'अम्मा, कामचोर बहू काम नहीं करती। अपने आप कर लो अपने घर का काम। 'शर्म नहीं आती जो बात का बतंगड़ बना रही है। मैं तो इसलिए कहती हूं कि कम से कम दो बातें ढंग की सुनेगी तो तेरी ही जिंदगी सुधरेगी।' 'मैं कहाँ बतंगड़ बना रही हूं। मैं तो आप ही लोगों की बात पर अमल कर रही हूं। एक बात बताइए मुझे कहां से लाते हो आप आदर्श बहू का तराजू? और उस तराजू में हमेशा पलड़ा आपकी बहू का है क्यों हल्का होता है?' 'सात साल हो गए आदर्श बहू बनते-बनते, पर आज तक तो बन नहीं पाई। कुछ और ही बनकर रह गई मैं। मैंने आप लोगों के लिए जॉब तक छोड़ा, अपना सुकून छोड़ कर के आप लोगों को खुश करने में लगी रही, लेकिन कभी आदर्श बहू नहीं बन पाई। अब मुझे समझ में आ गया ये आदर्श वादर्श कुछ नहीं होता है। क्योंकि अगर आप आदर्श बहू होने का मतलब जानती ना, तो पहले अपनी बेटी को बनाती।' यह सब सुनकर के अम्मा जी और ननदरानी दोनों चुपचाप रह गई। पर आज आशा ने एक बात जरूर सीखी कि कुछ लोगों की आदत होती है उनको आप का त्याग कभी नजर नहीं आता। जिंदगी में अगर आप ऐसे लोगों को खुश करने के लिए अपना सब कुछ खोते हो तो आप बेवकूफी कर रहे हो। *****
- चुटकी भर झूठ
सविता शर्मा विनय संदीप और चिंटू एक ही स्कूल में पढ़ते थे। संदीप और चिंटू बहुत ही शैतानी करते थे और उन्हें टीचर से कक्षा में डांट भी बहुत पड़ती थी। लेकिन उन्हें कोई फर्क ही नहीं पड़ता था। विनय दोनों से अलग था, हमेशा पढ़ने और शिक्षकों का कहना मानने वाला विद्यार्थी था। विनय हमेशा सोचता था कि इनके माता-पिता इन्हें कुछ नहीं बोलते मेरी मम्मी तो मुझे बहुत डांटती है। कुछ भी गलत करने से इन्हें अपनी मम्मी-पापा का भी डर नहीं लगता। एक दिन तीनों एक साथ ही स्कूल आ रहे थे। संदीप की मस्ती करने की वजह से देर हो गई स्कूल का दरवाजा बंद हो गया था। दोनों ने विनय से कहा चलो आज खूब खेलेंगे स्कूल खत्म होने के समय घर चले जाएंगे। विनय ने कहा नहीं मुझे मेरी मम्मी से झूठ नहीं बोलना मैं घर जाऊंगा। संदीप ने कहा अरे पता कैसे चलेगा हम पूरा दिन खेलेंगे और स्कूल छूटने के समय घर पहुंच जाएंगे। भूख लगेगी तो टिफिन तो है, हमारे पास। विनय भी उनकी बातों में आ गया शाम तक तीनों खेलते रहे फिर स्कूल छूटने के टाइम घर पहुंचे। मम्मी ने कहा चलो हाथ पैर धो लो खाना खा लो विनय। विनय ने कहा मुझे भूख नहीं है। वह थक गया था जल्दी से सो गया। सुबह मम्मी ने पूछा बेटा आप कल इतने थक गए थे। तुम्हारी तबीयत ठीक है ना या और कोई बात है। विनय ने कहा नहीं कुछ नहीं ऐसे ही। मम्मी ने कहा कल तुम्हारे स्कूल जाना है बहुत दिनों से स्कूल गई नहीं हूं, इतना सुनकर विनय डर गया। उसको लगा अब तो मम्मी जाएगी स्कूल तो पता चल जाएगा कि मैं कल स्कूल नहीं गया था। विनय ने कहा मम्मी मुझे आपको एक बात कहनी है। मैंने आपसे एक छोटा सा झूठ कहा कल मैं स्कूल नहीं गया था, देर हो गई थी। दोस्तों के साथ खेल रहा था। मम्मी ने कहा बेटा चुटकी भर झूठ कब बड़ा रूप ले लेता है पता नहीं। यह तो शुरुआत है आज से आप कुछ नहीं छुपाओगे मम्मी से पापा से। मम्मी मुझे माफ कर दो। मम्मी ने कहा पहली और आखरी गलती समझना आगे से ऐसा बिल्कुल नहीं ठीक है। हां मम्मी मैं आज से कभी झूठ नहीं बोलूंगा और वह स्कूल की ओर चल पड़ा। *****
- रंगविहीन
संगीता बिजलानी पति की मृत्यु के महिने भर बाद शकुन ने सासु माँ और अपने दोनों बच्चों के भविष्य को देखते हुए जैसे-तैसे खुद को संभाला और पुनः ऑफिस जाने के लिए खुद को तैयार किया। बाल गूँथने के लिए ज्यों ही आईने के सामने खड़ी हुई, बिंदी विहीन माथा, सूना गला और सफेद साड़ी में खुद को देख आँसू फिर बह निकले। कितना शौक था शशांक को उसे सजा सँवरा देखने का। चुन-चुन कर कपड़ों के खिले-खिले रँग और प्रिंट लाता था और उन्ही की मैचिंग के कड़े, चूड़ियाँ, बिंदियाँ। पिछले अठारह वर्षों के रँग एकाएक धुल गए। रंगहीन हो गया था जीवन अनायास। तभी किसी काम से सासु माँ अंदर आयीं तो शकुन को देखकर उनकी भी आँखे भर आयी। उन्होंने तुरंत शकुन की अलमारी खोली और एक सुंदर सी, शशांक की पसन्द की साड़ी निकाली और शकुन को देते हुए बोली--"मेरा बेटा तो चला गया। पर जब-जब मैं तुम्हारा रंगहीन रूप देखती हूँ तो मुझे अपने बेटे के न रहने का अहसास ज्यादा होता है। इसलिये तू जैसे सजकर इस घर में आयी थी, हमेशा वैसे ही सजी रह। तुझे पहले की तरह सजा सँवरा हँसता खेलता देखूंगी तो मुझे लगेगा मेरा बेटा अब भी तेरे साथ ही है। और तुझे भी उसकी नजदीकी का अहसास बना रहेगा।" ड्रेसिंग टेबल से एक बिंदी लेकर उन्होंने उसके माथे पर लगा दी। साड़ी को अपने सीने में भींचे आँखों मे आँसू होने के बाद भी दिल मे एक तसल्ली का भाव तैर गया, शशांक के साथ होने का अहसास भर गया। रँगविहीन नहीं है उसका जीवन, शशांक की यादों का रंग हमेशा उसके अस्तित्व में खिला रहेगा। वह सासु माँ के गले लग गयी। बहुत कम उम्र से ही सफेद रंग में कैद सासु माँ ने लेकिन शकुन के जीवन को रँगहीन नहीं होने दिया। *****











