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  • बदलाव

    पूनम भटनागर सावित्री और रूक्मिणी बैठीं हंसी ठठ्ठा कर रही थीं कि सावित्री एकाएक विषय बदलती हुई बोली, तो रूक्मिणी कब बना रही हो साक्षी को हमारे घर की बहू। क.....या, रूक्मिणी सावित्री के इस प्रस्ताव पर अचकचा कर बोली। अरे भूल गयी क्या, उस दिन ही तो तय किया था कि सुदेश व साक्षी को विवाह बंधन में बांध कर हम दोस्ती को नाम दे देंगे। दोनों बच्चे भी राजी हैं इस फैसले से। मां, किस फैसले की बात कर रही हो। साक्षी ‌और सुदेश ने घर में प्रवेश करते हुए कहा। अरे वही, तुम दोनों के विवाह बंधन की बात। अरे मां, मेरी अभी तो नौकरी लगी है, थोड़ा खुश तो हो लेने दो, कुछ समय बाद कर लेंगे शादी। अभी कौन सी उम्र निकली जा रही है। न---न भी न, मैं तो दोनों लक्ष्मियों के आने की राह देख रही हूं, सावित्री ने अधीर होते हुए कहा। दोनों लक्ष्मी, रुक्मिणी व दोनों बच्चों ने हैरानी जताते हुए कहा। तो सावित्री ने खुलासा करते हुए कहा्, एक तो लक्ष्मी साक्षी बन कर आ रही है दूजे चांदी सोने के सिक्के से भरा थाल फेरों से पहले मुझे चाहिए। अब एक, एक एक तो बेटा है मेरा, वो भी सुप्रीटेंडेंट, इतना तो बनता है ‌। रुक्मणी को जाहिर है ये बात नहीं सुहाई। वो उठते हुए बोली, देखते ‌है। घर आकर वह सोचने लगी कि सावित्री का इस तरह खुल्लम खुल्ला मांग करना अच्छा नहीं लगा हालांकि रूक्मिणी के लिए यह कोई ‌बडी बात नहीं थी, रूक्मिणी के पिता गांव के पटवारी थे। कई खेत भी उनके नाम थे। पर इस तरह मूंह खोल कर मांगना ठीक नहीं। सावित्री और रूक्मिणी दोनों का घर एक ही मोहल्ले में था। दोनों के बच्चे साथ खेल कर बड़े हुए। साक्षी ने भी आई पी एस की परिक्षा पास कर शहर में नौकरी लगने से वह वहां चली गई। पर दोनों बच्चों की दोस्ती प्यार में बदल कर परवान चढ़ रही थी। सावित्री की जिद अपनी जगह थी। दोनों बच्चों ने एक प्लान ‌बनाया कि मां के सर से किस तरह ये दहेज का भूत उतर सके। साक्षी के पड़ोस में शादी थी। उसने पड़ोसियों से कहा कि दोनों पक्षों को एक नाटक खेलना है। साक्षी की मां रुक्मिणी व सावित्री दोनों को उसने बुला लिया। सुदेश व उसके पापा ‌भी आ गये। सभी लोग शादी में शामिल होने गए। अभी वो शादी की रस्में देख ही ‌रहे थे कि पुलिस आकर वर पक्ष के लोगों को व वर को हथकड़ी डाल कर लें गयी। ये लोग साक्षी के साथ घर आ गए। क्यों कि खाना तो ये लोग खाकर आए नहीं थे अतः साक्षी ने पहले से ही बनाया पनीर व कोफ्ते की सब्जी निकाली व रोटी बनाने का उपक्रम करने लगी। सुदेश भी वही किचन में आ गया। सावित्री, रुक्मणी व सुदेश के पिता सब लोग पड़ोस की शादी की ही बात कर रहे थे। रसोई घर में उनकी बातें साफ सुनाई दे रही थी। एकाएक सुदेश के पिता, सावित्री से बोले अब बताओ, तुम्हारा क्या कहना है, शादी में मिलने वाले दहेज के बारे में। तुम्हारी तो होने वाली बहू ही पुलिस में है। सावित्री कानों को हाथ लगाती बोली, तौबा करो जी, मैं बहुत ग़लत सोच ‌रही थी, असली दहेज तो साक्षी ही है, जो घर की लक्ष्मी बन कर आएगी।‌ सब लोग ठहाका लगा कर हंस पड़े। अंदर रसोई घर में भी सुदेश व साक्षी इस बदलाव की हवा को महसूस कर मुस्कुरा उठे। और इस तरह एक रिश्ता दहेज की बलि चढ़ने से बच गया। ******

  • कटोरी पनिहारिन

    डॉ. जहान सिंह जहान “कटोरी में जिसने चाहा खाया और उसे झूठा करके छोड़ दिया।” कटोरी, ओ कटोरी, कहां मर गई? बड़ी ठकुराइन चिल्ला-चिल्ला कर थक गई। तभी पीछे से आवाज आई, मालकिन मैं आ गई। अरे कलमुही खसमाखानी कहां थी? बुलाते-बुलाते मेरा तो गला दुखने लगा। कटोरी डरी सहमी बोली। मैं छत पर अनाज साफ कर रही थी। उसे छोड़ नासपिटी, बड़े ठाकुर को आज तहसील जाना है। जल्दी जा उनके नहाने के लिए पानी भर दे। जी मालकिन कहती हुई कटोरी गुसलखाने की तरफ लपकी। कटोरी भरापूरा बदन, घुंघराले बाल, चटक श्यामला रंग, तीखा नाक नक्श, ठुडी पर गोदन, बड़ी-बड़ी आंखों में काजल, दांतों में मिस्सी, कानों में बालियां, गले में सुतिया वजनदार, कमर में काले धागे की करधनी, कांख के ऊपर चोली, नाभि के नीचे घाघरा टखने तक, पैरों में मोटी-मोटी खडूवा और लछछे। एक कलाई पर नाम का गोधन और दूसरी कलाई में उसके खसम नथ्था का नाम। बस्ती की एक खूबसूरत औरत, बड़े घरों की बहुयें, बेटियां उससे ईर्ष्या करती थीं। हवेली के बाहर मलिन बस्ती में एक झोपड़ी डालकर मढैया में रहती थी। ठाकुर जगताप सिंह एक निर्दई अय्याश जमीदार था। उम्र ढल रही थी, पर मजबूत कद काठी रोबीली मूछें, भारी आवाज अभी भी शासन करने के लिए काफी थी। कटोरी जिस दिन बिदा होकर आई। उसकी डोली हवेली के चबूतरे पर उतारी गई। ठकुराइन ने मुंह दिखाई की रस्म अदा की और भेंट दी। किसी प्रजा की शादी होकर आती है, तो दुल्हन पहले हवेली में उतारी जाती, ऐसी प्रथा थी। कटोरी पर नजर पड़ते ही, ठाकुर अपना दिल बैठा। कटोरी गुसल खाने में पानी भर रही थी। अचानक कलसा फिसला और वह भीग गई। चोली, घाघरा तरबतर हो गया। वो शरमाई सी बदन संभालने लगी। देखते ही देखते ठाकुर भेड़िया बन गया और कटोरी भेड़। कटोरी छटपटाती रही गिड़गड़ती रही और वह भूखे दरिंदे की शिकार हो गई। कुछ देर बाद कटोरी रोती और डर से कांपती गुसलखाने से निकली। ठाकुराईन को समझते देर न लगी। उसने कटोरी को सीने से लगाया और पुचकार कर शांत कराया। और हाथ जोड़कर विनती करने लगी कि यह बात हवेली के बाहर न जाए। अब हमारी इज्जत तुम्हारे हाथ है। मैं ठाकुर को समझाऊंगी कि आगे इस तरह की हरकत ना करें। कटोरी ने चुप रहना ही हितकर समझा क्योंकि नथ्था बहुत गुस्सैल मर्द है। अगर उसे पता चला तो कुछ अनर्थ हो जाएगा। ठकुराइन एक समझदार और अच्छे किरदार की महिला थी। उसके कटोरी के ऊपर कई एहसान थे। कटोरी ने चुप रहना ही ठीक समझा। छोटे ठाकुर शिव प्रताप सिंह जो बाहर चबूतरे पर बैठा था। उसने कटोरी को गुसलखाने से ऐसी हालत में निकलता देख लिया। अपने बड़े भाई के चरित्र के बारे में वह अच्छी तरह से जानता था। पूरा मामला उसने भॉप लिया और उसकी भी भूख जाग गई। फिर वह मौके की तलाश में रहने लगा और एक दिन उसने भी मुंह काला कर लिया। छोटे ठाकुर शिव प्रताप सिंह शराब, वेश्यावृत्ति में लिप्त घर पर बिल्कुल ध्यान नहीं देता था। पत्नी रूप कुमारी जिस दिन से हवेली में आई, आज तक बाहर न निकली अकेली और मायूस रहती थी। आज व्रत है। पूजा के लिए खुद फूल चुनने हैं। तैयार होकर नथ्था कहार को साथ चलने की आवाज दी। नथ्था जी मालकिन कहकर गाड़ी के पीछे-पीछे चल दिया। रूप कुमारी खुली हवा, नहर का ठंडा ठंडा पानी, आम का बाग, वह एक पिंजरे से निकाल कर पंख फैलाए आसमान में उड़ती मैंना बन गई। सोचते-सोचते बचपन में चली गई और आम तोड़ने की जिद करने लगी। नथ्था को घोड़ा बनकर पीठ पर खड़ी होकर आम तोड़ने लगी। नौकर तो नौकर उसे आज्ञा का पालन करना होता है। अचानक रूप कुमारी का पैर फिसला और नथ्था के ऊपर गिर पड़ी। नथ्था चौड़ा सीना, मजबूत बाजू, घने बाल, काली मूंछे, एक मर्द का अहसास देती गर्म सांसे। दोनों की हदें टूटी सरहदें मिलकर एक हो गई। एक तूफान आया। जो बारिश के बाद ही थमता है। बात हवेली तक पहुंची। बड़ी ठकुराइन एक समझदार प्रशासनिक महिला थी। उसे रूप कुमारी की प्यास का अंदाजा था और छोटे ठाकुर के कर्मों की एक झलक। अतः इसे नैसर्गिक न्याय मान कर दोनों को माफ कर दिया। कटोरी पनिहारिन बस्ती के पनघट की रौनक, हर कोई उसको निहारे। वो जब कमर पर गागर संवारे।। कुंवर राजेंद्र सिंह बड़े ठाकुर का पुत्र शहर से गर्मी की छुट्टियां मनाने हवेली में आया। एक दिन वह बाहर चौपाल पर बैठा संगीत सुन रहा था। कटोरी आंगन में धान कूट रही थी। एक बेर बेचने वाली लड़की अंदर आई और बेर खरीदने के लिए कुंवर से मनुहार कर रही थी। कुंवर ने उसका हाथ पकड़ कर अपनी और खींच लिया। वह चिल्लाई और रोने लगी। कटोरी ने आवाज सुनी और दौड़ी चली आई। दृश्य देखकर हस्तप्रद रह गई। उसकी आत्मा ने उसे कचोटा, जमीर जागा और बोली मौन तोड़ा। अब चुप न रहूंगी और अन्याय नहीं सहूँगी और अन्याय होने भी नहीं दूंगी। उसने ठाकुर को ललकारा, हाथ में मुसल था, उसे हवा में लहराया, एक दुर्गा का रूप। ठाकुर डर कर पीछे हट गया। कटोरी ने लड़की को गले लगाया चुपाया और बाहर भेज दिया। बड़ी ठकुराइन छत से देख रही थी। उसकी आंखों में खुशी के आंसू थे। लगा एक स्त्री भी पुरुष समाज से लड़ सकती है। यदि साहस कर ले। नीचे उतरकर कटोरी को गले लगाया। कुंवर गजेंद्र बहुत शर्मिंदा था और रात को ही शहर वापस चला गया। कटोरी अब कटोरी ना थी कटार बन चुकी थी। बस्ती में अन्याय के लिए हथियार बन चुकी थी। बेर बेचने वाली लड़की ने बात बस्ती में जंगल की आग की तरह फैल गई थी। मलिन बस्ती की लड़कियां, औरतें जो भी रसूखदार मर्द की भूख का शिकार बनती रही, उन्होंने भी मौन तोड़ा और कटोरी की तरह साहस दिखाया। कटोरी पनिहारिन अब बस्ती के महिलाओं की एक नेता बन गई। नथ्था ने भी उसका पूरा साथ दिया। एक दिन कटोरी बस्ती की पीड़ित महिलाओं के साथ तहसीलदार से मिली। अंग्रेजी हुकूमत थी। अंग्रेज के बगल में उनसे मिलने का इंतजार कर रही थी। तभी उसकी पत्नी रूथ ने कटोरी को देखा और उसे अपने लिए ग्रह सेवक चुन लिया। नथ्था ने भी सहर्ष अपनी सहमति दे दी। वहां काम के दौरान उसे समझ में आया कि शिक्षा बहुत जरूरी है। इस अंधेरी दुनिया से बाहर निकालने के लिए। मैडम रूथ से उसने अपनी इच्छा बताई। रूथ ने बस्ती में एक पाठशाला खुलवाने के लिए मदद की। कटोरी ने एक कन्या पाठशाला आरंभ कर दी। अब अपने अधिकारों के लिए शिक्षा ही एक रास्ता है। कटोरी ने ऐसी अलख जगाई कि आसपास के क्षेत्र के लोगों में अन्याय के लड़ने की शक्ति महिलाओं को मिलने लगी। कटोरी कन्या पाठशाला के 90 वर्ष पूरे होने पर एक जलसा किया गया। कटोरी पनिहारिन का बड़ा चित्र आज भी पाठशाला में सुसज्जित है। नई पीढ़ी के लिए उदाहरण बन गई। “अगर साहस है तो, हर बुराई से लड़ सकते हैं।” ******

  • बूढ़ा बरगद

    विभा गुप्ता "बाबूजी, मैं आपके और आपकी बहू की रोजाना चिकचिक से अब तंग आ गया हूँ। कल ही आपको वृद्धाश्रम छोड़ आता हूँ, आपकी बहू को शांति मिल जाएगी और आप भी सुकून से रह पाएँगे।" नरेश ने खीझते हुए बिस्तर पर लेटे अपने पिता से कहा। सुनकर पिता नम आँखों से बेटे को देखने लगे। नरेश जब आठ बरस का था, तब उसकी माँ का देहांत हो गया था। महीने भर बाद ही रिश्तेदारों ने उसके पिता पर फिर से विवाह करने के लिए दबाव डालने लगे थें लेकिन उन्होंने सबको एक ही जवाब दिया," अब नरेश के लिए पिता भी मैं और माँ भी। वे एक सरकारी मुलाज़िम थें। उन्हें समय पर ऑफ़िस जाना पड़ता था। नरेश को भी स्कूल के लिये समय पर तैयार करना आसान नहीं था उनके लिये। फिर भी उन्होंने नरेश का पालन-पोषण अच्छी तरह से किया। उसे अच्छी शिक्षा-दीक्षा दी और उसे इंजीनियर बनाया। अब तो नरेश ही उनका एकमात्र जीने का सहारा था। पोते-पोतियों के साथ हँस-खेल लेते और दिनभर में एक बार नरेश को देख लेते तो उनकी जी तृप्त हो जाता था। नरेश की पत्नी स्वभाव से अच्छी ही थी, इधर कुछ दिनों से वह न जाने क्यों, वह अपने ससुर से बात-बात पर उलझ जाती थी और फिर नरेश से अपना दुखड़ा सुनाती। नरेश दिनभर के काम से थका-हारा घर लौटता और पत्नी की चिकचिक सुनता तो अपना सिर पकड़कर बैठ जाता। इसीलिए अपने पिता को वृद्धाश्रम भेजने का उचित समाधान मानकर वह अपने मित्र विवेक से सलाह लेने उसके घर गया। विवेक अपने घर के बाहर बूढ़े बरगद के पेड़ के नीचे बैठा था। नरेश ने उससे यहाँ बैठने का कारण पूछा तो विवेक बोला, "यहाँ बैठकर मैं अपने पिता को अपने नजदीक पाता हूँ। इसकी ठंडी छाँव में अपने पिता के स्पर्श को महसूस करता हूँ। बचपन में इसकी डालियों पर ही तो वे मुझे झूला झुलाते थें, यहीं पर बैठकर वे मेरे बच्चों को अपने जीवन के संघर्ष को कहानी के रूप में सुनाते थें।यहाँ बैठकर तो मैं उनके एहसास को महसूस करता हूँ।जानते हो मित्र..., तुम्हारे पिता से बातें करके तो मैं अपने पिता की कमी को पूरा करने का प्रयास करता हूँ। तुम बहुत भाग्यशाली हो जो चाचाजी का हाथ तुम्हारे सिर पर अभी है। ईश्वर उन्हें दीर्घायु दे।" कहते हुए उसकी आँखें भीग गईं। "अच्छा .., तुम बताओ कैसे आना हुआ?" विवेक ने पूछा तो नरेश बोला, "बस यूँ ही चला आया" कहकर वह अपने घर की तरफ़ चल दिया। सोचने लगा, मेरे बाबूजी ने भी तो मेरे सपनों को पूरा करने लिये न जाने अपनी कितनी इच्छाओं का त्याग किया होगा और मैं उन्हें न जाने क्या-क्या कहकर उनके मन को आहत करता रहा। और आज तो उन्हें वृद्धाश्रम.....हे भगवान, मुझे क्षमा करना। उसने मन ही मन विवेक को धन्यवाद दिया जिसने उसे पिता को वृद्धाश्रम भेजने की बड़ी भूल करने से बचा लिया था। ******

  • श्राद्ध की चिन्ता

    मुकुन्द लाल आकाश में किरण फूटते-फूटते यह खबर गांव में फैल गई कि बूढ़े धनेशर की मृत्यु हो गई। उसके घर से रूदन-क्रंदन की आवाजें आ रही थी। उसके तीनों पुत्र और उसके शुभचिंतक अंतिम संस्कार की तैयारी में लगे हुए थे। देखते-देखते अर्थी तैयार हो गई। तीन-चार घंटों के बाद लोग दाह-संस्कार करके श्मशान घाट से लौट आए। उस परिवार के अभिभावक का सहारा समाप्त होने का दुख तो तीनों पुत्रों के अंतर्मन में था ही लेकिन श्राद्ध की चिन्ता से उसका अवसाद दुगना हो गया था। उनकी आर्थिक स्थिति दशकों से खराब थी। धनेशर को अपनी जर्जर हालत और खराब स्वास्थ्य के कारण आभास हो गया था कि वह इस धरती पर कुछ ही महीनों का मेहमान है। उसकी धर्मपत्नी भी उसे छोड़कर पांच वर्ष पहले ही इस दुनिया से विदा हो गई थी। उसे मरने का गम नहीं था लेकिन वह बेहद चिन्तित था कि उसकी मौत के कारण होने वाले खर्चीले श्राद्ध में थोड़े से बचे हुए खेत बिक न जांय क्योंकि मात्र उन्हीं खेतों से उसके पुत्रों और उनके परिवारों की परवरिश होती थी। उसने मरने के सप्ताह-भर पहले अपने तीनों पुत्रों को अपने पास बुलाकर समझाया था कि वे श्राद्ध के चलते खेत बेचने या गिरवी रखने की गलती भूलकर भी न करें। उसने चेतावनी देते हुए कहा था कि झूठी प्रतिष्ठा का प्रदर्शन करने में या किसी के बहकावे में आकर खेत बेच दिया तो उन लोगों का आशियाना उजड़ जाएगा। उसने यह भी सलाह दी कि रिश्तेदारों को भी बुलाने की आवश्यकता नहीं है, उन्हें खबर दे देना ही काफी होगा। दाह-संस्कार के उपरांत नियमानुसार निश्चित अवधि में ही दस-पाँच पंडितों को आमंत्रित करके वेलोग ब्रह्मभोज संपन्न कर लें। उसकी आर्थिक कमजोरी जग-जाहिर थी। उसका फायदा उठाने के फिराक में गांव के संपन्न लोग उसके बड़े पुत्र रामसेवक के इर्द-गिर्द मंडराने लगे। उसके सामने घड़ियाली आंसू बहाने लगे। तरह-तरह के प्रलोभन देने लगे। धनेशर की आत्मा की मुक्ति और शांति के लिए श्राद्ध में किसी प्रकार की कोताही नहीं बरतने की उन्होंने सलाह दी। उनमें से एक-दो ने उधार रुपये देने की भी पेशकश की। किसी ने खेत बेचकर धूम-धाम से श्राद्ध संपन्न करके पितृ-ऋण से मुक्त होने की सलाह दी। किन्तु रामसेवक ने अपने पिता के दिए गए निर्देशों का पालन करने का मन बना लिया था। इस नीति के तहत उनकी बातों को सुनकर भी किसी प्रकार की प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की। उसने मौन धारण कर लिया था। उसके दोनों छोटे भाइयों ने भी अपने बड़े भाई के रास्ते का अनुशरण किया। मौन रहकर ही रामसेवक ने उनके हर प्रश्नों का जवाब दे दिया था। ******

  • विसर्जन

    प्रेम नारायन तिवारी मनोज सिन्हा आफिस जाने के लिए तैयार हो रहे हैं। उनकी पत्नी मधुलिका उनका नास्ता तैयार कर रही हैं। बैठक मे इधर-उधर गणपति पूजा के अवशेष दिख रहे हैं। बाबूजी के कमरे में रखा डी जे देखकर सिन्हा साहब का मन खिन्न हो गया। इसी डी जे के कारण उन्हें बाबूजी को दस दिनों के लिए ओल्ड एज होम में छोड़ने की आवश्यकता पड़ गयी है। आज शाम को आफिस से लौटते समय बाबूजी को घर लाना है। बाबूजी की उम्र पचहत्तर साल की हो गयी है। बीपी सूगर की बीमारी है। तेज आवाज उन्हें बरदास्त नहीं होती है। पिछले साल की गणपति पूजा मे डी जे बाहर बारामदे में रखा गया था फिर भी उनको दिक्कत हो गयी। डी जे बंद कराने पर सिन्हा साहब के तीनों बच्चे नाराज होकर बैठ गये थे। इसबार उन्होंने डी जे लगाने को मना कर दिए तो तीनों बच्चे और मधुलिका एक खेमे मे होकर विरोध करने लगे। नहीं होगी गणपति पूजा, बिना डी जे, नाच, गान की कैसी पूजा। मजबूर होकर बाबूजी को घर से ले जाकर ओल्ड एज होम में छोडना पड़ा। डी जे को बाबूजी के कमरे में देखकर सिन्हा साहब का बीपी बढ गया। गणपति बप्पा के चले जाने से घर कितना सूना-सूना लग रहा है, नास्ता कर रहे सिन्हा साहब के पास बैठकर मधुलिका बोली। इसे सूना-सूना नहीं कहते शान्ति कहते हैं, और यह बप्पा के विसर्जन से नहीं आया है, इस डी जे के कानफोडू आवाज के बंद होने से आया है। रही सूनेपन की बात तो ऐसा बाबूजी के न होने से लग रहा है। दिन में बाबूजी का कमरा ठीक करा देना, आफिस से लौटते समय बाबूजी को साथ लेता आऊंगा। बाबूजी के सम्बन्ध में एक बात कहनी है, बच्चे कह रहे हैं बाबूजी को वहीं रहने दिया जाय। ओल्ड एज का महीने का खर्च ज्यादा तो नहीं आयेगा? बच्चों का क्या यह तो मनमानी करने पर आमादा हो गये हैं, तुम अपनी बताओ तुम क्या कहती हो? मैं क्या कहूँ समझ में नहीं आ रहा, मगर बच्चों को नाराज करना अच्छा भी तो नहीं लगेगा। देवेश और विशेष अब अलग-अलग कमरे की डिमांड कर रहे हैं। रजनी पहले से ही किसी दूसरे को अपना रूम सेयर करने नहीं देती। ले देकर एक यही बाबूजी का कमरा बचा है। दे दिया जायेगा, मजबूरी जो है। बस अब रहने दो मैं समझ गया तुम क्या कहना चाहती हो, ऐसा कह वह नास्ता वैसे ही छोड़कर चले गये। आफिस में भी उनके दिमाग में बाबूजी का चेहरा तथा मधुलिका की बातें चक्कर काट रही थी। बच्चों से ज्यादा कष्ट उनको अपनी पत्नी मधुलिका से हो रहा है, जो कि बाबूजी के बारे में सब कुछ जानती है। बाबूजी उन्हें अनाथालय से गोद लेकर आये थे। गोद लेने के लिए उन्हें बारह चौदह साल का होशियार बच्चा चाहिए था। उस दिन की सारी बातों का गवाह वह स्वयं हैं। यहाँ जो भी बच्चा गोद लेने आता है वह कम उम्र का बच्चा चाहता है ताकि बच्चा जल्द ही उन्हें अपना माँ बाप समझने लगे। आप उसके बिलकुल उलट बारह चौदह साल का बच्चा क्यों? वार्डन ने तब बाबूजी से पूछा था। देखिए एक दुर्घटना में मैंने अपना इसी उम्र का बच्चा खोया है। उस दुर्घटना में मेरी पत्नी चलने फिरने मे असमर्थ हो गयी हैं। इस उम्र का बच्चा समय-समय पर मेरी पत्नी की देखभाल भी कर सकता है। बच्चे को जो समझाया जाये समझ भी सकता है। उस समय अनाथालय में इस उम्र के पांच बच्चे थे। पूरी बात सुनकर एक बच्चे ने कहा इसको बेटे की नहीं नौकर की जरूरत है। ऐसा कह वह आफिस से बाहर निकल गया, उसके साथ बाकी के तीन भी चले गए थे। माँ को मैंने वास्तव में अपना मान लिया था। उस समय मैं हाईस्कूल में पढ रहा था। मैं माँ की देखभाल करता माँ मुझे पढाती। माँ बहुत अच्छी अध्यापिका थी, हाई स्कूल और इण्टर की परीक्षा प्रथम श्रेणी मे पास किया, नब्बे प्रतिशत से भी अधिक के मार्क थे। माँ मुझे इन्जीनियर बनाना चाहती थी, उसके सपने पूरा करने के लिए माँ से दूर जाना पड़ा। बाबूजी ने एक माँ की देखभाल के लिए एक नर्स रख लिया। मैं इन्जीनियर बना मगर माँ नहीं देख सकी। ना जाने कैसे बेड से सरककर सिर के बल गिरी और चल बसी थी। शाम को बंगले पर सबकुछ वैसे ही था जैसा कि सिन्हा साहब देखकर गये थे। डी जे सेट बाबूजी के कमरे मे ही था, अलबत्ता बैठक में इस समय तीनों बच्चे भी बैठे थे। मधुलिका उठकर एक गिलास पानी ले आई। तुम तीनों यहाँ बैठे क्या कर रहे हो? हम आपके आने का इंतजार कर रहे थे। सुबह जो बात मां ने कहा है उसपर आपका विचार जानना है हमें। यदि मैं न कहूँ तो? हम यहाँ नहीं रहेंगे तीनों बच्चे एक साथ बोल उठे। हाँ तब सुनों बाबूजी ओल्ड एज होम में रहने को राजी हो गये हैं। अब वह यहाँ नहीं आयेंगे। उन्होंने यह मकान बेच दिया है। एक सप्ताह के अंदर इस मकान को खाली करना है। क्यों क्यों बेंच दिए हैं, हम कहाँ रहेंगे? मधुलिका चीखती हुई बोल पड़ी। यही तो व्यवस्था करना है हमें, मगर तुम सब चिंता मत करो मैंने सारी व्यवस्था कर लिया है। एक दो कमरे का फ्लैट किराये पर ले लिया है। कल रविवार है छुट्टी का दिन है हम सामान सिफ्ट कर लेंगे। ऐसे कैसे हम किराये के फ्लैट मे चले जायेंगे। दो कमरे के फ्लैट मे गुजारा कैसे होगा। मधुलिका इनको तो नहीं पता मगर तुम तो जानती हो कि फ्लैट बाबूजी के नाम पर है। वह इसे रखें चाहे बेंचें। हमें तो जाना ही होगा। एक कमरे में देवेश दूसरे मे विशेष रह लेगा। तुम अपनी बेटी के साथ हाल में रहना, उसका क्या कल विवाह हो जायेगा अपने घर चली जायेगी। लेने को तो तीन कमरे का फ्लैट किराये का ले लूं मगर महीने का खर्च कैसे चलेगा? तुम आप कहाँ रहोगे? सभी एक स्वर मे बोल पड़े। मैंने अपनी व्यवस्था भी बाबूजी के साथ कर लिया है। आखिर एक दिन वहीं तो जाना है। मेरा खाना मत बनाया करना मैं वहीं खाया करूँगा। मैं बाबूजी के पास जा रहा हूँ। उन्होंने मुझे बुलाया है, उन्हें मेरे बिना नींद नहीं आती। इसके पहले कि मेरे बच्चे मुझे विसर्जित कर दें, मैं जीते जी खुद का विसर्जन करता हूँ। ******

  • जेब खर्च

    डॉ. कृष्णा कांत श्रीवास्तव सेठ बद्री प्रसाद जी अपने दोनो बेटों अनिल व सुनील को प्रतिदिन दो रुपये जेब खर्च का देते थे। उस समय साठ सत्तर के दशक में दो रुपये की अच्छी खासी कीमत होती थी। ऐसे समझ सकते है कि दूध उस समय एक रुपये लीटर, चाय 40-50 पैसे कप उपलब्ध हो जाता था। ढाबे में पूरे माह का दोनों समय का खाना 70-80 रुपये में खाया जा सकता था। ऐसे समय मे दो रुपये जेब खर्च मिलने का मतलब था कि अनिल व सुनील अपने को पूरा रईस ही समझते थे। बच्चों में परिवार के प्रति एक जिम्मेदारी तथा बचत की आदत भी बने, बद्री प्रसाद जी ने एक नियम सा बना दिया कि माह के अंत में एक बार अनिल परिवार में सबको आइसक्रीम अपने जेब खर्च की बचत से खिलायेगा तो दूसरे माह सुनील। तीन चार माह तो यह क्रम चला, पर उसके बाद जब भी अनिल का नंबर आइसक्रीम खिलाने का आता तो वह कोई न कोई बहाना बना देता। कभी कह देता कि वह पैसे घर भूल आया है तो कभी अपनी तबियत खराब बताकर कतरा जाता। या बिल्कुल मजबूरी में अनिल को आइसक्रीम खिलानी ही पड़ जाती तो वह खुद नही खाता। इससे परिवार में लगने लगा कि अनिल की प्रवृत्ति कंजूसी व लालची निकल आयी है। पर इस बात को किसी ने भी अनिल के सामने उजागर नही किया। परन्तु बद्री प्रसाद जी को यह बात कचोट रही थी कि घर में कोई कमी नही फिर उनका बेटा लोभ लालच का शिकार क्यूँ? वो विचार करने लगे कि अनिल की यह वृति कैसे छुड़वाई जाये? फिर बद्री प्रसाद जी के मन में विचार आया कि अनिल इन पैसों का आखिर करता क्या है? उन्होंने अनिल पर निगाह रखनी प्रारम्भ कर दी। उन्होंने पाया कि आजकल अनिल एक साधारण से लड़के के साथ अधिक रहने लगा है। जानकारी प्राप्त करने पर ज्ञात हुआ कि वह लड़का महिपाल एक नितांत गरीब घर का है। कौतूहलवश बद्री प्रसाद जी ने महिपाल के परिवार की विस्तृत जानकारी हासिल की तो पता चला कि उसका परिवार महिपाल की पढ़ाई का खर्च उठाने में असमर्थ है, पर उसकी कक्षा का कोई लड़का उसकी सहायता कर रहा है, जिस कारण महिपाल अपनी पढ़ाई कर पा रहा है। बद्रीनाथ जी समझ गये कि वह और कोई नही उनका बेटा अनिल ही है जो अपने जेब खर्च से अपने गरीब मित्र महिपाल की सहायता कर रहा है। आज उन्हें अपने बेटे अनिल पर गर्व की अनुभूति हो रही थी। बद्रीनाथ जी सोच रहे थे उनका बेटा भले ही उम्र में अभी बच्चा ही हो पर संस्कार में वो बहुत ऊंचा उठ गया है। अपने छलके आँसुओ को संभालते बद्रीनाथ जी महिपाल के स्कूल की पूरे वर्ष की फीस जमा कराके घर लौटते हुए अपने बेटे अनिल के प्रति गर्व से फूले नही समा रहे थे। *****

  • प्रतियोगिता

    नितिन श्रीवास्तव सुबह-सुबह माँ की आवाज कान में पड़ी, "अब उठ भी जाओ आठ बज रहा है। इतवार का मतलब सारा दिन सोना ही नहीं होता है।" मैं और छोटा भाई अनमने से करवट बदल कर सो गए। छोटा आँख बंद किये ही बड़बड़ाया, "अरे अब तो इम्तिहान भी ख़तम हो गए अब भी देर तक नहीं सो सकते? उठते ही पचास काम गिना देंगी सब्जी ले आओ, पेड़ में पानी डालो, कूलर में पानी भरो फलाना-फलाना-फलाना। भैया तुम ही उठ जाओ तुम्हें तो वो प्रतियोगिता में भी जाना है न? मैं तो कम से कम दो घंटे और सोऊंगा।" "प्रतियोगिता?" मैं चिल्ला के उठ गया जैसे बिजली का करंट लगा हो। मुझे याद आया कि उसी दिन तो श्रृंगेरी पीठ ट्रस्ट की सामान्य ज्ञान प्रतियोगिता थी। आमतौर पर हर दूसरे तीसरे रविवार को किसी न किसी संस्थान की प्रतियोगिता आयोजित होती रहती थी और मैं हर एक में भाग जरूर लेता था। हाँ मिलता मिलाता कुछ नहीं था बस मन की तसल्ली हो जाती थी कि दो और प्रश्न सही हो जाते तो कम से कम सांत्वना पुरस्कार तो मिल ही जाता। फिर हर बार नए जोश और भरपूर तैयारी के साथ मैदान में उतरते। इस बार भी "प्रतियोगिता प्रवाह", "कौन क्या है?", "मनोरमा वर्षावली" और पिछले दो माह के सारे अखबार चाट डाले थे। इस बार तो कुछ न कुछ लेकर ही आएंगे। खैर जल्दी से उठ कर मंजन किया तब तक माँ ने चाय और रस मेज पर रख दिया और मैं एक आखिरी बार दोहराने के लिए सारी किताबें लेकर बैठ गया। विज्ञान और इतिहास में मुझे चिंता कभी नहीं हुई लेकिन खेल कूद और राजनीतिक मामलों में थोड़ा मामला मुश्किल लगता था। वही एक बार दोबारा दोहराने लगा। जल्दी-जल्दी चाय और पढाई ख़त्म करके तैयार होने का कार्यक्रम शुरू कर दिया। ग्यारह बजे से प्रतियोगिता शुरू होनी थी, साढ़े नौ बज चुके थे और सरस्वती शिशु मंदिर तक पहुंचने में भी दस मिनट लग जाते थे। नहा के निकले और माँ ने जो कपडे बिस्तर पर रखे थे पहने। बालों में तेल लगा कंघी किया और जूते पहने। एक पेंसिल बॉक्स में दो छीली हुई पेन्सिल, एक रबर, एक पेन, छोटी स्केल रखकर उसे थैले में डाला और साथ में लिखने वाला बोर्ड रखा। तैयारी पूरी हो गयी थी इसलिए माँ को आवाज लगाई, "हम जा रहे हैं।" "रुको भगवान के आगे हाथ जोड़ो फिर घर से बाहर निकालो" माँ दौड़ते हुए रसोई से आईं। जल्दी से जूते उतारे और भगवान के आगे हाथ जोड़े मन ही मन, "इस बार बस सांत्वना पुरस्कार भर का हो जाये कम से कम." भाग कर साइकिल उठाई और बगल वाले घर के सामने खड़े होकर जोर से आवाज लगाई, "मधुकर जल्दी कर देर हो रही है।" मधुकर आधा पराठा मुँह में दबाये बाहर आया और इशारे से चलने को बोला पीछे पीछे उसकी माँ आधा पराठा हाथ में लिए भागी-भागी आईं लेकिन उनके आवाज लगा पाने से पहले हम गली के बाहर निकल चुके थे। छठी कक्षा में भी हमें तब साइकिल से अकेले जाने की आजादी मिल जाया करती थी। साइकिल दौड़ाते हम शिशु मंदिर के आगे पहुंचे। एक-एक करके बच्चे अंदर जा रहे थे, हमने भी साइकिल स्कूल के मैदान में किनारे बने स्टैंड में लगाई और प्रतियोगिता वाली जगह पहुँच गए। इस बार इंतजाम पिछली बार से अच्छा था। जमीन में दरी भी बिछी थी बैठने के लिए, पीने के पानी के लिए बगल में घड़ा रखा था और ऊपर धुप से बचने के लिए तिरपाल जैसा भी लगाया था। हम दोनों ने एक दुसरे को देखा तो मधुकर बोला, "इस बार ये लोग इसीलिए फॉर्म के साथ एक रुपया भी लिए थे ये सब इंतजाम के लिए, हैं न?" मैंने हामी में सिर हिलाया और वहां खड़े शिक्षक महोदय को अपना प्रवेश पत्र दिखाया तो उन्होंने हमें हमारी जगह बता दी और हम दोनों अपनी-अपनी जगह बैठ गए। मैंने अपने थैले से सामान निकाल कर सामने सजा लिया। पर्चे बांटे जाने लगे तो दिल की धड़कन थोड़ी बढ़ सी गयी, पर्चा हाथ में लेकर एक बार पूरा पढ़ा तो लगा इस बार तो बाजी मार ही लेंगे क्योंकि ज्यादातर प्रश्नों के उत्तर पता थे। अभी अपना नाम पर्चे पर लिख ही रहे थे कि शिक्षक महोदय की आवाज आयी, "इस बार प्रश्न थोड़े ज्यादा हैं और समय उतना ही इसलिए लिखने की गति थोड़ा तेज रखें नहीं तो प्रश्न छूट जायेंगे।" फटाफट प्रश्नों के उत्तर देना शुरू किया, एक दो ऐसे भी थे जिनका उत्तर पूरी तरह निश्चित नहीं आ रहा था तो उन्हें छोड़ते हुए आगे बढ़ते गए। "आखिरी दस मिनट बचे हैं सभी लोग जल्दी करें और पर्चे जमा कर दें." शिक्षक ने चेतावनी सी दी। जो प्रश्न छोड़ दिए थे बस वो ही देखना बाकी था। दोबारा देखने पर भी कोई ज्यादा सफलता नहीं मिली तो जो समझ आया विकल्प चुन कर उत्तर पूरे कर दिए। शिक्षक ने पर्चे जमा करने शुरू किये तो कुछ लोग अभी भी लगे पड़े थे उनसे पर्चे छीनते हुए वो मेरे पास पहुंचे तो मैंने गर्व से पर्चा उनकी ओर बढ़ाया और उन्होंने मेरी ओर देखे बिना ही पर्चा लिया और आगे बढ़ गए। मैंने देखा मधुकर भी पर्चा जमा करके सामान समेट रहा था तो मैं भी अपना सामान समेट कर उसके पास पहुंच गया। "कैसा रहा?" मेरा स्वाभाविक प्रश्न। "पता नहीं यार मैं तो तुक्का लगाता जा रहा था।" उसने निराश स्वर में कहा। ये जानते हुए भी कि मधुकर जैसा मेधावी तुक्का तो नहीं लगाएगा, मैंने उसका झूठ हमेशा की तरह सहर्ष स्वीकार कर लिया। हम वहां से हट कर बरामदे में आ गए क्योंकि परिणाम के लिए एक घंटा इन्तजार जो करना था। एक घंटे के बाद परिणाम की घोषणा शुरू हुई प्रथम पुरस्कार के लिए नाम बुलाया गया "महेन्दर" जिसे सुन कर मधुकर थोड़ा निराश हुआ क्योंकि ज्यादातर वो ही प्रथम आता था और उसे इस बार भी उम्मीद थी। अगला नाम पुकारा गया द्वितीय पुरस्कार के लिए, "रंजन" यानि मेरा, मुझे तो विश्वास ही नहीं हुआ और मैं जल्दी से लड़खड़ाता हुआ आगे पहुंचा। मुख्य अतिथि जो शायद हमारे इलाके के पार्षद थे उन्होंने मुझे प्रशस्ति पत्र और 100 रुपए का नोट दिया मेरा ख़ुशी का ठिकाना ही नहीं था। मधुकर को इस बार सांत्वना पुरस्कार से काम चलाना पड़ा लेकिन वो शायद इस बात से ज्यादा दुखी हो रहा था कि मेरे जैसा फिसड्डी दूसरे स्थान पर आ गया। हम घर पहुंचे और मैंने भागते हुए जाकर माँ को पुरस्कार दिखाया। माँ ने प्यार से माथा चुम लिया और पापा को बताया कि मुझे प्रतियोगिता में पुरस्कार मिला। पापा ने पुरस्कार हाथ में लिया, "चलो अच्छा है लेकिन पढ़ाई में भी कुछ अच्छा करके दिखाओ तो कुछ बात हो इस सब से थोड़े न अच्छी नौकरी मिलेगी।" "पापा की सुई भी हमेशा एक ही जगह अटकी रहती है।" मन ही मन सोचा और उनकी बात को अनदेखा करके छोटे भाई को पुरस्कार दिखा कर चिढ़ाने के लिए छत पर भागा जहां वो दोस्तों के साथ खेल रहा था। ******

  • समस्या और समाधान

    डॉ. कृष्ण कांत श्रीवास्तव एक व्यक्ति गाड़ी से उतरा और बड़ी तेज़ी से एयरपोर्ट में घुसा, जहाज़ उड़ने के लिए तैयार था, उसे किसी कार्यकर्म मे पहुंचना था जो खास उसी के लिए आयोजित किया जा रहा था। वह अपनी सीट पर बैठा और जहाज़ उड़ गया, अभी कुछ दूर ही जहाज़ उड़ा था कि कैप्टन ने घोषणा की, तूफानी बारिश और बिजली की वजह से जहाज़ का रेडियो सिस्टम ठीक से काम नहीं कर रहा, इसलिए हम पास के एयरपोर्ट पर उतरने के लिए विवस हैं। जहाज़ उतरा वह बाहर निकल कर कैप्टन से शिकायत करने लगा कि उसका एक-एक मिनट क़ीमती है और होने वाली कार्यकर्म में उसका पहुँचना बहुत ज़रूरी है। पास खड़े दूसरे यात्री ने उसे पहचान लिया और बोला डॉक्टर पटनायक आप जहां पहुंचना चाहते हैं, टैक्सी द्वारा यहां से केवल तीन घंटे मे पहुंच सकते हैं। उसने धन्यवाद किया और टैक्सी लेकर निकल पड़ा। लेकिन ये क्या आंधी, तूफान, बिजली, बारिश ने गाड़ी का चलना मुश्किल कर दिया, फिर भी ड्राइवर चलता रहा। अचानक ड्राइवर को आभास हुआ कि वह रास्ता भटक चुका है। ना उम्मीदी के उतार चढ़ाव के बीच उसे एक छोटा सा घर दिखा। इस तूफान में वहीं ग़नीमत समझ कर गाड़ी से नीचे उतरा और दरवाज़ा खटखटाया। आवाज़ आई, जो कोई भी है अंदर आ जाए, दरवाज़ा खुला है। अंदर एक बुढ़िया आसन बिछाए भगवद् गीता पढ़ रही थी, उसने कहा! मांजी अगर आज्ञा हो तो आपका फोन का उपयोग कर लूं। बुढ़िया मुस्कुराई और बोली, बेटा कौन सा फोन? यहां ना बिजली है ना फोन। लेकिन तुम बैठो, सामने चरणामृत है, पी लो, थकान दूर हो जायेगी और खाने के लिए भी कुछ ना कुछ फल मिल जायेगा खा लो। ताकि आगे यात्रा के लिए कुछ शक्ति आ जाये। डाक्टर ने धन्यवाद किया और चरणामृत पीने लगा। बुढ़िया अपने पाठ में खोई थी कि उसके पास उसकी नज़र पड़ी, एक बच्चा कंबल में लपेटा पड़ा था जिसे बुढ़िया थोड़ी-थोड़ी देर मे हिला देती थी। बुढ़िया की पूजा पूरी हुई तो उसने कहा, मां जी! आपके स्वभाव और व्यवहार ने मुझ पर जादू कर दिया है। आप मेरे लिए भी प्रार्थना कर दीजिए। यह मौसम साफ हो जाये मुझे उम्मीद है आपकी प्रार्थनायें अवश्य स्वीकार होती होंगी। बुढ़िया बोली, नही बेटा ऐसी कोई बात नही, तुम मेरे अतिथी हो और अतिथी की सेवा ईश्वर का आदेश है। मैंने तुम्हारे लिए भी प्रार्थना की है, परमात्मा की कृपा है। उसने मेरी हर प्रार्थना सुनी है। बस एक प्रार्थना और मैं उससे माँग रही हूँ शायद जब वह चाहेगा उसे भी स्वीकार कर लेगा। कौन सी प्रार्थना..?? डाक्टर बोला... बुढ़िया बोली, ये जो 2 साल का बच्चा तुम्हारे सामने अधमरा पड़ा है, मेरा पोता है, ना इसकी मां ज़िंदा है ना ही बाप, इस बुढ़ापे में इसकी ज़िम्मेदारी मुझ पर है, डाक्टर कहते हैं, इसे कोई खतरनाक रोग है जिसका वो उपचार नहीं कर सकते, कहते हैं कि एक ही नामवर डाक्टर है, क्या नाम बताया था उसका। हां "डॉ पटनायक" वह इसका ऑपरेशन कर सकता है, लेकिन मैं बुढ़िया कहां उस डॉ तक पहुंच सकती हूं? लेकर जाऊं भी तो पता नही वह देखने पर राज़ी भी हो या नही? बस अब बंसीवाले से ये ही माँग रही थी कि वह मेरी मुश्किल आसान कर दे। डाक्टर की आंखों से आंसुओं की धारा बह रहा है, वह भर्राई हुई आवाज़ मे बोला। माई, आपकी प्रार्थना ने हवाई जहाज़ को नीचे उतार लिया, आसमान पर बिजलियां कौधवा दीं, मुझे रास्ता भुलवा दिया, ताकि मैं यहां तक खींचा चला आऊं, हे भगवान! मुझे विश्वास ही नहीं हो रहा... कि एक प्रार्थना स्वीकार करके अपने भक्तों के लिए इस तरह भी सहायता कर सकता है। दोस्तों, वह सर्वशक्तिमान है, परमात्मा के भक्तों उससे लौ लगाकर तो देखो, जहां जाकर प्राणी असहाय हो जाता है, वहां से उसकी परम कृपा शुरू होती है। ******

  • बाप हैं मेरे

    लक्ष्मी कांत पाण्डेय लालजी किसान आदमी हैं। पढ़े लिखे नहीं मगर समझदार आदमी हैं। भक्ति भाव वाले लालजी संतुष्ट आदमी हैं। बचपन से उनकी एक आदत रही है। लगभग हर दिन गाँव के आठ दस मंदिरों में से किसी भी एक मन्दिर की साफ सफाई वो जरूर करते हैं। लालजी के चेहरे पर सदैव स्वस्थ और तरुण मुस्कुराहट यूँ काबिज रहती, जैसे मुस्कान ने अमृतपान किया हो। माँ के आशीर्वाद से बचपन में ही वंचित होने वाले लालजी को पिता जी का आशीर्वाद अभी भी प्राप्त हो रहा है। बचपन से आवाज नहीं है, थोड़ी सुनने की क्षमता भी कमजोर है। मगर पत्नी से प्रेम बहुत है। वैसे भी.…भावनाएँ शब्दों का मोहताज नहीं होती। लालजी को नन्हकी देवी के रूप में पत्नी बहुत सुघड़ मिली। अक्सर जिस परिवार में महिलाएँ नहीं होती, उस परिवार में आयी नयी दुल्हन सत्ता का बागडोर शीघ्र ही अपने हाथों में ले लेती हैं। मगर नन्हकी देवी का व्यवहार इसके बिल्कुल विपरीत रहा। शायद उनकी मंशा रही हो, अपने मूक वधिर पति से दब के रहने की। कि कहीं पति को ऐसा अहसास न हो कि इस औरत ने गूँगे बहरे पुरुष को पति के रूप में स्वीकार कर के अहसान किया है। संतुष्ट स्वभाव के लालजी को सत्ता से क्या मतलब। इन दोनों के आपसी प्रेम समर्पण के भाव के बीच घर की सत्ता ठोकर खाती लालजी के पिताजी के पास ही दुबकी रही। लालजी को दो बेटे हुए। जैसे ही बड़ा बेटा मंटू जवान हुआ, जल्दी से उसकी शादी कर के लालजी ने गृहस्थी बहु बेटे को संभला दिये। बेटे बाप पर ही गये थे। सब कुछ अच्छा ही चल रहा था। लालजी का परिवार आज के जमाने के लिए एक आदर्श परिवार था। मंदिर-मंदिर झाड़ू लगाने वाले लाल जी के घर की सफाई भगवान के जिम्मे थी। लालच, नफरत, छल, कपट जैसे कचरे लालजी के घर के आसपास भी नहीं फटकते थे। जब लालजी के बुजुर्ग पिता पर पक्षाघात ने हल्का प्रहार किया, तब उन्हें खुद से चलने फिरने में परेशानी होने लगी। वैसे भी वो काफी बूढ़े हो गये थे। अब लालजी की दिनचर्या बदल चुकी थी। अब उनके जीवन की प्राथमिकता अपने पिता की सेवा करना ही रह गया था। खेती बाड़ी बड़ा बेटा पहले ही संभाल चुका था। उसका व्यवहार ऐसा कि बहुत ही जल्द वो मंटूआ से "मंटू बाबू" हो गया। छोटा बेटा बचपन से कुशाग्र बुद्धि का था। उसको पढ़ाने के लिए सबने अपने-अपने हिस्से का त्याग किया। भाई ने पसीना लगाया तो भाभी ने गहने लगा दिया। नन्हकी देवी ने जिंदगी भर की सारी दुआएँ इकट्ठी कर के छोटे बेटे पर न्योछावर कर दिया। लालजी क्या लगाते। सदैव की भाँति मंदिर मंदिर जाते तो अब भगवान को कुछ देर निहारते। गूँगे मुँह से क्या बोलते....? मगर कहते हैं न!! आज मिले या कल मिलता है, हर पूजा का फल मिलता है। देवताओं ने गूँगे मुँह की आवाज का मान रखा। हेमंत उर्फ हेमू ने सरकारी इंजीनियर की नौकरी पाने में सफलता प्राप्त की। मंटू बाबू का सीना थोड़ा और चौड़ा हो गया। लालजी के संतोषी मुस्कान में थोड़ी और वृद्धि हो गयी। मंटू सिंह की इच्छा जल्द से जल्द छोटे भाई को गृहस्थ में बांधने की थी। बोलियाँ लगने लगी। अचानक से मंटू सिंह के ढेर सारे दोस्त व्यवहार, नाते रिश्तेदार पैदा हो गए। लालजी की क्षमता को तौला जाने लगा। भाभी ने एक तस्वीर देखकर लड़की को देखने की इच्छा जतायी। दोनों परिवार मिले। नन्हकी देवी को लड़की की कुछ ढूंढती हुई सी आँखें भा गयी। भाभी को इतनी पढ़ी लिखी लड़की के द्वारा पैर छू कर प्रणाम करना दिल जीत लिया। लड़की से उसका नाम पूछा गया, लड़की कुछ बोल नहीं पायी। ढूंढती आँखों से लालजी की तरफ देखती रही। वैसे ही....जैसे लालजी मंदिर की मूर्तियों को देखते रहते थे। दर्द ने दर्द को पहचान लिया। लालजी जिंदगी में पहली बार अँगुली से इशारा करते हुए आँ आँ कर के चीखते हुए कुछ माँग रहे थे - "यही चाहिए!!! यही चाहिए!" और अचानक से वहाँ बहुत ही गहरा सन्नाटा छा गया। लड़की अपनी बहती आँखों, ढूंढती नजरों से लालजी को देखे जा रही थी। लालजी उम्मीद लगाए कभी मंटू तो कभी हेमू की तरफ बड़े ही अशक्त एवम लालसा भरी नजरों से टकटकी लगाए देख रहे थे। दोनों तरफ के परिवार वाले हेमंत की तरफ देख रहे थे। हेमंत हाथ नचा कर बोला - "मैं क्या.....मेरी औकात क्या?? उनकी माँग इंद्र भी ठुकराए तो मैं उससे लड़ जाऊँ !!! वो बाप हैं मेरे!! मगर एक बार लड़की से तो पूछ लो।" लड़की से इशारों में पूछा गया तो वो उठकर आगे बढ़ी और लालजी का पैर को पकड़ ली। लालजी दोनों हाथ उसके सर पर रख दिये। बदहवास सन्नाटों को एक हर्ष की किलकारी ने चीर कर रख दिया। सबके सब अति उत्साहित थे। लड़की की ढूंढती आँखों में संतुष्टि का भाव था। खोज पूरी हुई। आँखों से धार तेज हो गयी। बात दहेज की चली। लड़की के दोनों भाइयों ने मंटू सिंह के सामने हाथ जोड़ लिये - "आप कुछ मत माँगिए। पिताजी बहुत दौलत छोड़ गए हैं। हम आपकी उम्मीद से चौगुना देंगे। इसलिए नहीं कि आपने मेरी मूक वधिर बहन को स्वीकार किया है!!! इसलिए भी नहीं कि आपका भाई सरकारी इंजीनियर है!! बल्कि इसलिए कि ऐसा परिवार हमने आजतक न देखा है....न सुना है।" बारात की तैयारियाँ जोरों पर थी। मंटू बाबू अपनी शादी में छूट चुके शौक को भी भाई की शादी में पूरा कर लेना चाहता था। इसलिए बहुत ही व्यस्त था। मगर एक दिन हेमू ने भरे घरवालों के बीच ऊँची आवाज में अपने बड़े भाई को टोक दिया - "दादा! हर चीज में आपकी दादागिरी नहीं चलेगी।" सब के सब लोग चौंक पड़े। मंटू जहाँ था वहीं ठहर गया। हेमू पहली बार अपने बड़े भाई से ऊँची आवाज में बात किया था। मंटू डपटता हुआ सा पूछा - "पागल हो गया है क्या? क्या बोल रहा है?" भाई की डाँट से अंदर ही अंदर काँप गया हेमंत। मगर फिर से हिम्मत जुटा कर बोला - पागल नहीं हूँ दादा! हमारा बियाह है, हमारी भी कुछ इच्छाएँ हैं।" "क्या चाहता है तू?" "दुल्हन के लिए जो भी गहने बनवा रहे हैं, भले कम बनवाएँ, मगर हर गहने का दो सेट बनवाएँ।" - हेमंत ने अपनी भाभी के सूने गले की तरफ देखता हुआ बोला। नन्हकी देवी बेटे की बात सुनकर गर्व से भर गयी। भाभी भावुक हो गयी। मंटू भुनभुनाता, सर को झटकता वहाँ से चला गया - "वकलोल कहीं का" हेमंत व्हाट्सएप पर अपनी होने वाली दुल्हन को मैसेज टाइप करने लगा - "तेरी इच्छा पूरी हुई।" इंजीनियर ने एक बार मुँह खोला तो फिर बंद ही नहीं कर पाया। "हेमू के लिए फॉर्च्यूनर का साटा कर दिया हूँ, पापा के लिए बोलेरो कर दिया हूँ।" - मंटू सिंह घर में बता रहा था। "पापा के लिए भी फॉर्च्यूनर ही कीजिए दादा" - हेमंत ने अपनी इच्छा जाहिर की। "क्यों?" "वो बाप हैं मेरे" - हेमंत गर्व से बोला। "बाबा और पापा के लिए कुर्ता धोती सिलवाने दे दिया हूँ।" "मैं और आप?" "कोट पैंट की नापी दे दिया न।" "पापा के लिए भी कोट पैंट सिलवाइए न दादा" - हेमंत बड़े भाई से मनुहार करता बोला। "पागल है कि?" "वो बाप हैं मेरे!" - इंजीनियर गर्व से बोला। नन्हकी देवी माथा पीट ली, बुढ़ापे में बाप को कोट पैंट पहनाएगा? भाभी मुस्कुरा के रह गयी, जबकि मंटू सिंह हामी भरता घर से निकल गया। सारी तैयारी हो चुकी थी। बाबा बारात जाने में असमर्थ थे। उनकी देखभाल के लिए एक आदमी की व्यवस्था कर दिया गया था। लालजी कोट पैंट पहन कर बेटे की बारात में जायेगें, ये बात सारे गाँव में चर्चा का विषय था। वो समय भी आया जब बारात निकलने वाली थी। सब लोग गाड़ी में बैठे या नहीं, ये देखने के लिए मंटू खुद सारी गाड़ियों में झाँक रहा था। पिताजी उसको कहीं नजर नहीं आ रहे थे। दो चार लोगों से पूछा - कोई संतुष्ट जवाब नहीं मिला। सब लोगों में कानाफूसी होने लगी। सबके सब घबराए हुए से एक दूसरे से ही पूछने लगे। लालजी को ढूंढा जाने लगा। अचानक से कुछ की नजर घर की तरफ गयी। वो सब हैरत से देखते हुए अपने आसपास के लोगों को इशारा कर के घर की तरफ देखने को कहने लगे। सारे बाराती मुँह फाड़े घर की तरफ देख रहे थे। मंटू सिंह जब घर की तरफ देखा तो कलेजा पकड़कर बैठ गया। घर से लालजी निकले। अपने कंधे पर अपने बूढ़े बाप का हाथ रखे, उन्हें संभाले, डगमगाते हुए से गाड़ी की तरफ बढ़ रहे थे। खुद के लिए सिलवाये गये कोट पैंट को अपने बूढ़े बाप को पहनाये हुए। पिता के लिए लाये गये धोती कुर्ता को खुद पहने हुए। नजर उठा कर गाँव वालों की तरफ देखे, जैसे बोल रहे हों - "ये बाप हैं मेरे!" मंटू सिंह दौड़ के अपना कंधा बाबा के दूसरी तरफ लगा दिया। *****

  • देवी-दर्शन

    विभा गुप्ता "गायत्री, मेरी बात मान ले, तू अपने अखिल की दूसरी शादी कर दे। पोते को गोद में खिलाने का तेरा सपना पूरा हो जायेगा।" पड़ोसिन विमला ने कहा तो गायत्री जी ने उनकी सलाह को गाँठ मार ली। गायत्री जी के दो बच्चे थें। बड़ा बेटा अखिल बैंक में नौकरी करता था। बेटी के विवाह के बाद उन्होंने एक सुशील लड़की आरती के साथ बेटे का भी विवाह कर दिया। आरती को पहली संतान बेटी हुई तो गायत्री जी ने दूसरी संतान में बेटा होने की उम्मीद रखी। लेकिन दो साल बाद जब आरती ने पुत्री को जन्म दिया तो गायत्री जी की उम्मीदों पर पानी फिर गया। सहेलियों-रिश्तेदारों के मुँह से अपने पोतों की गाथाएँ सुनतीं तो उन्हें बहुत दुख होता था। उन्होंने अपनी व्यथा अपनी पड़ोसिन विमला को सुनाई तो उसने उन्हें अखिल के दूसरे विवाह की सलाह दे डाली। नवरात्रि से दो दिन पहले गायत्री जी ने बेटे से कहा कि बहुत दिनों से बच्चे अपने नाना-नानी से नहीं मिले हैं इसलिए कुछ दिनों के लिये बहू को अपने मायके छोड़ आओ। बेटे ने कहा कि लेकिन माँ, नवरात्रि आ रही है, तुम अकेले सब कैसे..।" "सब कर लूँगी बेटा, बहू को भी तो अपने माता-पिता से मिल लेना चाहिए।" माँ के इतने मीठे बोल सुनकर अखिल भी बहुत खुश हुआ कि मेरी माँ कितनी अच्छी है, बहू का कितना ख्याल रखती है। शाम की गाड़ी से वह पत्नी को मायके पहुँचा आया। गायत्री जी खुश थी कि नवरात्रि पूजा की समाप्ति बाद वह दूसरी बहू लाने की तैयारी शुरु कर देंगी। माँ दुर्गा के चार पूजा के बाद गायत्री जी ने महाअष्टमी के दिन होने वाले कन्या-पूजन के लिये कन्याओं की खोज करनी शुरु कर दी। सबको पहले से ही बताने लगी कि अष्टमी के रोज अपनी बेटी-पोती को ठीक समय पर हमारे घर भेज देना। सात कन्याएँ तो उन्हें मिल गईं लेकिन बहुत प्रयास के बाद भी बची हुई दो की पूर्ति नहीं हो पा रही थी। इसी चिंता में एक रात सपने में उन्होंने देवी माँ से शिकायत कर डाली, "माँ, मैं तो आपकी भक्ति में दिन-रात डूबी रहती हूँ। फिर इस बार आने में आप देरी क्यों कर रहीं है। पिछले दो दिनों से मैं भूखी-प्यासी दरवाज़े-दरवाज़े जाकर आपकी पूर्ण-पूजा के लिये कन्याएँ ढ़ूँढ रहीं हूँ और आप है कि पता नहीं, सब कन्याएँ को आपने कहाँ गायब कर दिया है।" उनकी शिकायत सुनकर देवी माँ भी क्रोधित हो उठीं, "मैं तो तेरे सामने ही थी लेकिन तूने मेरी कदर नहीं की। मुझे अपने से दूर करके अब मुझे खोज रही हो। इतनी अपमानित होने के बाद तो मैं अब कभी नहीं आऊँगी।" कहते हुए देवी माँ अंतर्ध्यान होने लगी तो गायत्री जी ने उनके पैर पकड़ लिये, "मेरे पास, अपमानित, मैं समझी नहीं माँ लेकिन आप मुझे छोड़कर कहीं नहीं जाइये मैं...आप कहीं...।" कहते हुए वो रोने लगीं। "दादी, मेरा पैर तो छोड़ो, दादी!" बड़ी पोती की आवाज़ सुनकर उनकी नींद खुल गई। उन्होंने नींद में देवी माँ के चरण समझकर अपनी पोती के पैर पकड़ लिये थे। सच तो है.., असली देवी तो उनके सामने ही थी। पोती का पैर छोड़ते हुए उन्होंने आश्चर्य से पूछा, "तुम यहाँ कैसे?" "वो माँ कल आप विमला काकी से कह रहीं थी ना कि कन्या-पूजन के लिये दो कन्यायें कम पड़ रहीं हैं तो मैं सबको वापस ले आया।" अखिल मुस्कुराते हुए बोला। "बहुत अच्छा किया बेटा। घर में हो देवी-दर्शन तो बाहर जाने की क्या ज़रुरत है।" मुस्कुराते हुए उन्होंने अपनी दोनों पोतियों को सीने से लगा लिया और मन ही मन शक्ति-रूपा जगतजननी को धन्यवाद दिया। *****

  • उम्मीद की पलक

    स्वाती छीपा तुम्हारा खिड़की की मुंडेर को रोज उम्मीद से ताकते रहना व्यर्थ है सुमन। वह अब लौट कर नहीं आएगी। यही बात आपने तब भी कही थी विक्रम जी जब वह मुझे घायल अवस्था में लॉन में मिली थी। परंतु फिर, हां पता है। फिर तुमने उस नन्ही गौरैया की खूब साज संभाल की थी। थोड़े दिन में ही उसके चोट लगे पंख ठीक हो गए और वह अपनी उड़ान भर चली। यही ना सुमन .. ! ! जी विक्रम जी, उसने उस सामने खड़े पेड़ पर अपना आशियाना बनाया और मैं रोज उसे इस खिड़की की मुंडेर पर दाना पानी डालती रही। तुमने तो उसका पलक नाम रख नामकरण भी कर दिया था सुमन। वह चिड़िया भले ही हो विक्रम जी। पर मेरा उससे बहुत अधिक लगाव जुड़ गया था। उसका भी तुमसे सुमन .... तब ही तो वह तुम्हारे पास रहती थी। सात साल तक तुम दोनों का अटूट साथ रहा। अब भी है विक्रम जी .. ! ! नहीं सुमन .... तुम कैसे भूल सकती हो उसने अपने जीवन की आखिरी सांस तुम्हारे इन महफूज हाथों में ही तो ली थी। फिर नम आंखों से श्रद्धांजलि दे तुमने उसे विदा भी किया था। पर वह आज भी मेरे पास है, यकीन करें विक्रम जी। तुम्हें अब आराम करना चाहिए सुमन। डॉक्टर ने भी यही कह रखा है। जी जाती हूं, रात को जरूरत पड़ने पर विक्रम सुमन को अस्पताल लेकर जाता है। जहां नर्स विक्रम को एक बेटी का पिता बनने की बधाई देती है। सात साल बाद पिता बनकर विक्रम खुशी से फुला नहीं समा रहा है। वह नन्हीं बच्ची को देखने सुमन के पास जाता है और बच्ची को गोद में लेकर कहता है। तुम ठीक कह रही थी सुमन। पलक अब भी तुम्हारे पास ही थी। यह नन्ही परी सी बच्ची ही तो तुम्हारी प्रतीक्षा, इंतजार और तन्मयता से राह तकती उम्मीद की पलक है। सुनकर सुमन मंद मंद मुस्कुराने लगती है। पलक अब धीरे-धीरे बड़ी हो रही है। विक्रम और सुमन उसे खेलने के लिए बहुत सारे खिलौने लाकर देते हैं। पर उसे खिलौनों से ज्यादा अपनी मां सुमन के आसपास रहना और खिड़की के सामने स्थित पेड़ के नीचे खेलना कूदना अधिक पसंद है। शायद मौजूदा पलक की स्मृतियों में बीती गौरैया पलक का अब भी कुछ शेष है। *****

  • आख़िरी मुलाकात

    सुनील कुमार आज बाबू जी की तेरहवीं है। नाते-रिश्तेदार इकट्ठे हो रहे हैं पर उनकी बातचीत, हँसी मज़ाक देख-सुनकर उसका मन दुखी हो रहा है.."कोई किसी के दुख में भी कैसे हँसी मज़ाक कर सकता है? पर किससे कहे, किसे मना करे" इसीलिये वह बाबूजी की तस्वीर के सामने जाकर आँख बंद करके चुपचाप बैठ गई। अभी बीस दिन पहले ही की तो बात है। वह रक्षाबंधन पर मायके आई थी। तब बाबूजी कितने कमजोर लग रहे थे। सबके बीच होने के बावजूद उसे लगा कि जैसे वह कुछ कहना चाहते हों फिर मौका मिलते ही फुसफुसा कर धीरे से बोले भी थे "बिट्टू... रमा तुम्हारी भाभी हमको भूखा मार देगी। आधा पेट ही खाना देती है, दोबारा माँगने पर कहती है कि परेशान ना करो, जितना देते हैं उतना ही खा लिया करो। ज़्यादा खाओगे तो नुकसान करेगा फिर परेशान हम लोगों को करोगे।" कहते-कहते उनका गला भर आया। "पर कभी आपने बताया क्यों नही बाबूजी?" सुनकर सन्न रह गई वह और तुरंत अपने साथ लाई मिठाई से चार पीस बर्फी के निकाल कर बाबूजी को दे दिये। वह लगभग झपट पड़े और जल्दी-जल्दी खाने लगे। ऐसा लग रहा था मानों बरसों से उन्होंने कुछ खाया ही ना हो। "अरे,अरे,,,,इतना मत खिलाओ बिट्टू। तुम तो चली जाओगी पर अभी पेट ख़राब हो जायेगा तो हमको ही भुगतना पड़ेगा" तभी भाभी ने आकर ताना दिया। तब मन मसोस कर वह रह गई थी और चलते-चलते दबे शब्दों में उसने भाभी से कुछ दिनों के लिए बाबूजी को अपने साथ ले जाने की बात कही तो भाभी तो कुछ न बोलीं पर भइया भड़क गये। "सारी उम्र किया है, तो अब भी कर लेंगें। वैसे तूने ये बात क्यों कही? कुछ कहा क्या बाबूजी ने?" ”नही भइया, नही.." वह हड़बड़ा गई और बाकी के शब्द उसके मन में ही रह गए। बड़े भाई से जवाब-सवाल कर भी कैसे सकती थी? बचपन से ही बेटियों को भाइयों से दबकर रहने का संस्कार जो कूट-कूट कर भरा जाता है। पर जाते-जाते उसने एक बार पलटकर देखा तो उसके जन्मदाता तरसी निगाहों से उसे ही देख रहे थे। तब क्या पता था कि ये उनकी आख़िरी मुलाकात है। इसके पाँच दिन बाद ही खब़र मिली कि "बाबूजी की हालत ठीक नहीं है, वो अस्पताल में हैं, आकर मिल जाओ।" सुनकर छटपटा उठी वह और दूसरे दिन ही उनके पास पहुँच गई। बाबूजी अर्धमूर्छित से थे, उसको पहचान भी नही पाये। वह उनके कान में फुसफुसाई "बाबूजी, देखिये मैं आपकी बिट्टू" कई बार आवाज़ देने पर बामुश्किल उनकी आँखें हिली.. "बि..ट्टू.. भू..ख.." उनकी अस्फुट सी आवाज़ सुनकर वह यूँ खुश हो गई मानो बरसों के प्यासे को जी भर के पानी पीने को मिल गया हो। "बताइये, क्या खाना है बाबूजी..?" पूछते हुए उसकी आँखे भर आईं। "आ,,लू टमाटर की स,,ब्ज़ी रो,,टी .." लड़खड़ाती आवाज़ में उनके मुँह से बोल निकले। जल्दी से उसने इंतज़ाम भी किया, पर देर हो चुकी थी! बाबूजी बगैर खाये पिये, भूखे ही इस सँसार से चले गये। "बिट्टू,,बिट्टू ,,,,चलो,खाना खा लो" अचानक भइया की आवाज़ सुनकर वह चौंक पड़ी। "खाना?" वह धीरे से बोली "भूख नही है भइया" बिट्टू थोड़ा सा खा लो भइया ने फिर कहा वह कुछ न बोली। चुपचाप उठकर घरबालों वाले बिछे आसन पर बैठ गई। थाली में तरह-तरह के पकवान परोसे जा रहे थे। उसकी आँखों से आँसू बह निकले। कानों में बाबूजी के आख़िरी शब्द गूँज रहे थे..."आलू टमाटर की सब्जी, रोटी। *****

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