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- पहला कदम
डॉ. कृष्णा कांत श्रीवास्तव "माँ, क्या आप कभी डेट पर गए हो?”, सुमित का प्रश्न सुन कविता चौंक गई। "डेट?” उसके जमाने में ये सब बातें कहाँ होती थीं। छोटा शहर, जहाँ हर कोई एक दूसरे की जन्मकुंडली तक से परिचित था। कोई बात किसी से छुपती नहीं थी। फिर बाबूजी का कठोर अनुशासन, कभी हिम्मत ही नहीं हुई कि इस विषय पर कुछ सोचे भी, दोस्ती करना व डेट पर जाना तो दूर की बात थी। उसे एक क़िस्सा अभी भी याद है। शायद बीएससी के सेकंड ईयर में थी। को-एड कॉलेज था। शहर के महिला कॉलेज में विज्ञान के विषय नहीं थे, इसीलिए यहाँ पढ़ने की अनुमति मिली थी। बाबूजी के सख़्त निर्देशों के साथ। कक्षा में दिवाकर नाम का एक लड़का था। उसने कई बार उसकी नज़रों को खुद पर महसूस किया था, पर कभी बातचीत नहीं हुई। दिवाकर को पता नहीं कैसे ज्ञात हुआ, उसने, उसके जन्मदिन पर, एक महँगा-सा कलम लाकर "हैपी बर्थडे” कहते हुए उसके सामने डेस्क पर रख दिया। उन दिनों किसी लड़के द्वारा तोहफ़ा देना कोई मामूली बात नहीं होती थी। उसका दिल ज़ोर से धक-धक करने लगा पर उस नीले-सुनहरे पेन को उठाने या छूने की हिम्मत नहीं हुई उसे। वह अपना बैग उठाकर दूसरी जगह बैठ गई। उनके बीच जो कुछ भी अजन्मा-सा रिश्ता था, वह उसी दिन दफ़न भी हो गया, पर उसे आज भी एक-एक बात याद है। शायद मन के किसी कोने में…. "कोई बात नहीं माँ, इतना सोचने की ज़रूरत नहीं है। आप तैयार हो जाइए हम डेट पर चल रहे हैं।” "पागल है क्या, कोई माँ के साथ भी डेट पर जाता है भला?” "क्यों? क्या गर्ल फ़्रेंड के साथ ही जाते हैं?” हँसने लगा सुमित। "मैं तो आपके साथ ही जाऊँगा। सुंदर-सी साड़ी पहन के तैयार हो जाइए, आख़िर ये आपका पहला डेट है।” बेटे के ज़िद के आगे उसने हथियार डाल दिए। तैयार होकर निकली तो उछल पड़ा, "वाउ माँ, आज तो सबकी नज़रें आप पर ही होगीं।” "चल हट, पिटना है क्या?” उसने हँसते हुए एक धौल जमा दी उसके पीठ पर। मानो बेटे ने उसे ज़िंदगी की सबसे हसीन शाम तोहफ़े में दे दी हो। सबसे पहले उसे कपड़ों की दुकान पर ले गया। "शॉर्टलिस्ट करते है माँ। आप पहले पाँच आउट्फ़िट्स छाँट लो फिर फ़ाइनल करेंगे।” पर उसे अंतिम पाँच में से एक पसंद नहीं करने दिया सुमित ने… पाँचो ले लिए। पहली बार जीवन में उसके लिए इतने कपड़े ख़रीदे गए थे। फिर वे एक मूवी देखने गए, उसके फ़ेवरेट हिरोइन की। वहाँ से निकले तो एक महँगे रेस्टोरेंट में डिनर करने चले गए। "बताओ माँ क्या खाना है?” "तेरा जो जी चाहे ऑर्डर कर दे, मुझे तो सब पसंद है।” "अच्छा। तभी उस दिन फ़ोन पर मौसी से कह रही थी कि बरसों से पनीर टिक्का नहीं खाया क्योंकि सुमित के पापा को पनीर से ऐलर्जी है?” "हाँ तो है ना। उनका पेट….” "आपको तो नहीं है न? मगर आप कभी भी अपनी पसंद ज़ाहिर नहीं करती। आज ऑर्डर आप ही करेंगी। सब कुछ अपनी पसंद का।” "बचपन से देखा है माँ, मेरी पसंद, पापा की, दादी की पसंद को ही आपने अपनी पसंद बना ली है। कपड़े भी पापा के पसंद के ही लेती हो। घर की साज-सज्जा दादी के इच्छा अनुसार ही होता है। आपकी पसंद की अहमियत क्यों नहीं माँ? क्या आपको लगता है कि आप कुछ करना चाहेंगी तो पापा मना कर देंगे। मगर अपनी स्थिति को बेहतर करने के लिए पहला कदम तो आप ही को उठाना होगा न माँ, वरना सब रौंदते हुए निकल जाएँगे।” *******
- अधूरी कहानी
समीर उपाध्याय अक्षत और आभा दोनों कॉलेज में साथ पढ़ते थे। दोनों के बीच प्रेम के अंकुर फूटे। दोनों ने जीवन भर एक दूसरे का साथ निभाने की प्रतिज्ञा भी ली। अक्षत एक सामान्य घर से था और आभा एक बड़े घर की बेटी थी। इसलिए आभा के माता-पिता अक्षत को अपनाने के लिए तैयार नहीं थे। उन्होंने आभा को समझा कर एक बहुत बड़े उद्योगपति के साथ उसकी शादी करवा दी। इस प्रकार अक्षत और आभा की प्रेम कहानी अधूरी रह गई। आज पूरे देढ़ साल बाद अक्षत और आभा की एक शॉपिंग मॉल में मुलाकात हो गई। आभा - "अक्षत, आज तुम्हें देखकर अतीत की पुरानी यादें फिर ताजा हो गई।" अक्षत - "अब बीते हुए कल को याद करने से कुछ भी हासिल होने वाला नहीं है।" आभा - "आज अक्षय तृतीया है। तुम्हें याद होगा एक बार अक्षय तृतीया के दिन हम दोनों शिव मंदिर में गए थे और मैंने शिवजी की अक्षत से पूजा की थी और पति के रूप में तुम्हें पाने की प्रार्थना की थी।" अक्षत - "लेकिन अब इन सब बातों का कोई फायदा नहीं है।" आभा - "मम्मी-पापा का सामना करने की मुझमें हिम्मत नहीं थी। लेकिन अब वे नहीं रहे।" अक्षत - "लेकिन तुम्हारी शादी तो एक बहुत बड़े उद्योगपति के साथ हुई थी ना?" आभा - "छ: महीने पहले एक विमान दुर्घटना में वे चल बसे। अक्षत, आज अक्षय तृतीया का दिन है। मैं चाहती हूं कि आज शिव मंदिर तुम मेरे साथ चलो, क्योंकि मैं शिवजी पर अक्षत चढ़ाकर तुम्हें पाने की प्रार्थना करना चाहती हूं। अब हमारा एक होने का रास्ता सरल हो गया है।" अक्षत - "आभा, तुम्हारी शिव पूजा तुम्हें मुबारक। बेहतर यही होगा कि तुम अपने लिए किसी दूसरे मार्ग की तलाश कर लो।" आभा - "अक्षत, मुझे माफ कर दो।" अक्षत - "मेरी शादी रंगोली के साथ हो चुकी है। तुम्हारे जाने के बाद मेरे एकाकी और नीरस जीवन में रंगोली ने जीवन के सारे रंग भर दिए हैं। उसका निर्मल और निश्चल प्रेम ही मेरे लिए सब कुछ है। उसके त्याग, विश्वास और समर्पण भाव से मेरा जीवन रंगों से सजी हुई रंगोली जैसा बन गया है। अब मैं उस रंगोली में दूसरे रंग भरना नहीं चाहता।" यह कहते हुए अक्षत आगे चल दिया और आभा वहीं पर खड़ी उसे देखती रह गई। ********
- हम तीन
डॉ. कृष्णा कांत श्रीवास्तव एक औरत ने तीन सन्तों को अपने घर के सामने देखा। वह उन्हें जानती नहीं थी। औरत ने कहा – “कृपया भीतर आइये और भोजन करिए।” संत बोले – “क्या तुम्हारे पति घर पर हैं?” औरत – “नहीं, वे अभी बाहर गए हैं।” संत –“हम तभी भीतर आयेंगे जब वह घर पर हों।” शाम को उस औरत का पति घर आया और औरत ने उसे यह सब बताया। पति – “जाओ और उनसे कहो कि मैं घर आ गया हूँ और उनको आदर सहित बुलाओ।” औरत बाहर गई और उनको भीतर आने के लिए कहा। संत बोले – “हम सब किसी भी घर में एक साथ नहीं जाते।” “पर क्यों?” – औरत ने पूछा। उनमें से एक संत ने कहा – “मेरा नाम धन है।” फ़िर दूसरे संतों की ओर इशारा कर के कहा – “इन दोनों के नाम सफलता और प्रेम हैं। हममें से कोई एक ही भीतर आ सकता है। आप घर के अन्य सदस्यों से मिलकर तय कर लें कि भीतर किसे निमंत्रित करना है।” औरत ने भीतर जाकर अपने पति को यह सब बताया। उसका पति बहुत प्रसन्न हो गया और बोला –“यदि ऐसा है तो हमें धन को आमंत्रित करना चाहिए। हमारा घर खुशियों से भर जाएगा।” पत्नी – “मुझे लगता है कि हमें सफलता को आमंत्रित करना चाहिए।” उनकी बेटी दूसरे कमरे से यह सब सुन रही थी। वह उनके पास आई और बोली – “मुझे लगता है कि हमें प्रेम को आमंत्रित करना चाहिए। प्रेम से बढ़कर कुछ भी नहीं हैं।” “तुम ठीक कहती हो, हमें प्रेम को ही बुलाना चाहिए” – उसके माता-पिता ने कहा। औरत घर के बाहर गई और उसने संतों से पूछा – “आप में से जिनका नाम प्रेम है वे कृपया घर में प्रवेश कर भोजन गृहण करें।” प्रेम घर की ओर बढ़ चले। बाकी के दो संत भी उनके पीछे चलने लगे। औरत ने आश्चर्य से उन दोनों से पूछा – “मैंने तो सिर्फ़ प्रेम को आमंत्रित किया था। आप लोग भीतर क्यों जा रहे हैं?” उनमें से एक ने कहा – “यदि आपने धन और सफलता में से किसी एक को आमंत्रित किया होता तो केवल वही भीतर जाता। आपने प्रेम को आमंत्रित किया है। प्रेम कभी अकेला नहीं जाता। प्रेम जहाँ-जहाँ जाता है, धन और सफलता उसके पीछे जाते हैं। ******
- अद्भुत प्यार
सरोज माहेश्वरी लॉन में पंक्तिबद्ध कुर्सियां लगी थी। आज वृद्धाश्रम की संख्या में एक अंक और बढ़ऩे वाला था। नियमानुसार नवीन आगन्तुक को अपने साथियों के समक्ष अपना परिचय देना होता हैं। काले शूट बूट में एक़ स्मार्ट ज्येष्ठ नागरिक का आगमन हुआ। जोरदार तालियों से साथियों ने स्वागत किया। बिना भूमिका के रामनाथ जी ने बताया "मैं रामनाथ अरोरा" अपनी मर्जी से इस वृद्धाश्रम में आया हूं। एक वर्ष पूर्व पत्नी राधा का देहान्त हृदयगति रुक जाने से हो गया। जीवन में एकाकीपन छा गया। बच्चे अपनी-अपनी जिम्मेदारियों में व्यस्त हैं। मुझे उनसे कोई शिकायत नहीं है। धन, नौकर चाकर, गाड़ी, घर की कोई कमी नहीं है। यह एकाकीपन मुझे कहीं अवसाद में न पहुंचा दे, इससे बचने के लिए मैंने हमउम्र साथिय़ों के साथ रहने का निर्णय लिया है। कविता, कहानी, लेख लिखता हूं। दो लाइन सुनाना पंसद करूँगा। जीवन की इस संध्या में, हम कहीं गुम न हो जाएं। जी ले जी भर के हम, आओ साथ-साथ गुनगुनाएँ।। सदा शांत रहने वाली पुष्पादेवी अपनी डायरी में कुछ न कुछ लिखती रहती थीं। पति के मृत्यु के उपरांत वह भी इस आश्रम में आईं थीं। प्रत्युत्तर में पुष्पादेवी ने साहस करके अपनी लिखी लाइन बोलते हुए कहा। चलो अब हम सब मिलकर, कुछ ऐसा कर दिखाएं। याद करे ये ज़माना, अपनी बेबसी पे न आंसू बहाएं।। तालियों से ऐसा शमा बंधा गया। अब तो अक्सर रामनाथ जी एवं पुष्पाजी एक साथ देखे जाते, एक दूसरे को अपने लिखे उद्गार सुनाते। एक दूसरे का सानिध्य दोनों को रास आने लगा और न जाने कब दोनों की "आँखें चार हो गईं" पता ही न चला। आश्रम में लोग गलत नज़ारों से देखने लगे, परन्तु वे दोऩों मानसिक एवं भावनात्मक रूप से एक दूसरे के समीप आ गए थे। एक दूसरे के बिना रहना अब उन्हें असम्भव लगने लगा। उनका यह प्यार कहीं बदनामी की डगर पर न बढ़ जाए, वे शादी करके अपने प्यार के नाम देना चाहते थे। शादी करके दोनों ने एक साथ रहने का निर्णय किया तो बेटों ने पुरज़ोर विरोध दिया। राजनाथ जी के पोते प्रशांत और पुष्पादेवी के पोते राघव को जब दादा-दादी की पवित्र प्रेम कहानी का पता लगा तब दोनों के पोतों ने पूरी जिम्मेदारी अपने कंधों पर लेकर कोर्ट और समाज में ससम्मान ऐसे अद्भुत प्रेमियों को मिलाकर पुण्य का काम किया। ******
- बदरा कहां गए
अशोक कुमार बाजपेई ओ बदरा तुम कहां गए बेचैन सभी की आंखें हैं तुम तो सुधि भूल गए ओ बदरा तुम कहां गए। पिछले माह तुम आए थे आकर खुब जल बरसाए थे इस माह तुम सुधि न लीनी दें जैसे सब को भूल गए ओ बदरा तुम कहां गए। अब तो बदरा आ जाओ और हमें ना तड़पाओ इस उमस से निजात दिलाओ थोड़ी तो गर्मी कम कर जाओ जल्दी आओ जल्दी आओ तुम कैसे रास्ता भूल गए । ओ बदरा तुम कहां गए । *****
- मेहनत का महत्व
डॉ. कृष्णकांत श्रीवास्तव राहुल एक समझदार लड़का था, लेकिन वह पढ़ाई के मामले में हमेशा मेहनत करने से बचता था। एक बार जब उसका पसंदीदा कप टूट गया तो माँ ने उसे बाज़ार से खुद जाकर एक अच्छा कप लाने को कहा। पहली बार राहुल को इस तरह का कोई काम मिला था, वह मन ही मन खुश हो रहा था कि चलो इसी बहाने उसे बाहर जाने को मिलेगा और उतनी देर कोई पढ़ने के लिए नहीं कहेगा। वह पास के बाजार में पहुंचा और इधर-उधर कप खोजने लगा। वह जो भी कप उठाता उसमे कोई न कोई कमी होती। कोई कमजोर होता, तो किसी की डिजाईन अच्छी नहीं होती। काफी खोजने पर भी उसे कोई अच्छा कप नहीं दिखाई दिया और वो मायूस लौटने लगा। तभी उसकी नज़र सामने की दूकान में रखे एक लाल रंग के कप पर जा टिकी। उसकी चमक और ख़ूबसूरती देख राहुल खुश हो गया और झट से दुकानदार से वह कप हाथ में लेकर देखने लगा। कप वाकई में बहुत अच्छा था। उसकी मजबूती, उसकी चमक, उसकी शानदार डिजाईन, हर चीज परफेक्ट थी। राहुल ने वो कप खरीद लिया और घर चला गया। रात को भी राहुल कप अपने साथ लेकर बिस्तर पर लेट गया, और देखते-देखते उसे नींद आ गयी। वह गहरी नींद में सो रहा था कि तभी उसे एक आवाज़ सुनाई दी, राहुल-राहुल। राहुल ने देखा कि वो कप उससे बातें कर रहा है। कप ने कहा, “मैं जानता हूँ कि मैं तुम्हें बहुत पसंद हूँ। पर क्या तुम जानते हो कि मैं पहले ऐसा नहीं था?” राहुल ने कहा, “नहीं, मुझे नहीं पता, तुम्हीं बताओ कि पहले तुम कैसे थे।” कप ने कहा, “एक समय था, जब मैं मामूली लाल मिटटी का हुआ करता था। फिर एक दिन मेरा मास्टर मुझे अपने साथ ले गया। उसने मुझे जमीन पर पटक दिया और मेरे ऊपर पानी डाल कर अपने हाथों से मुझे मिलाने लगा। मैं चिल्लाया कि अब बस करो, लेकिन वो कहता रहा, अभी और अभी और। मैंने बहुत कष्ट सहे, जब वो रुका तो मुझे लगा कि बस अब जो होना था, हो गया। अब मैं पहले से काफी अच्छी स्थिति में हूँ।” लेकिन ये क्या, उसने मुझे उठाकर एक घुमते हुए चक्के पर फेंक दिया। वह चक्का इतनी तेजी से नाच रहा था कि मेरा तो सर ही चकरा गया। मैं चिल्लाता रहा, अब बस, अब बस। लेकिन मास्टर कहता अभी और, अभी और… और वो अपने हाथ और डंडे से मुझे आकार देता रहा जब तक कि मैं एक कप के आकार में नहीं आ गया। खैर, सच कहूँ तो पहले तो मुझे बुरा लग रहा था, लेकिन अब मैं खुश था कि चलो इतने कष्ट सह कर ही सही अब मैं अपने जीवन में कुछ बन गया हूँ, वर्ना उस लाल मिटटी के रूप में मेरा कोई मूल्य नहीं था। लेकिन, मैं गलत था। अभी तो और कष्ट सहने बाकी थे। मास्टर ने मुझे उठा कर आग की भट्ठी में डाल दिया। मैंने अपने पूरे जीवन में कभी इतनी गर्मी नहीं सही थी। मुझे लगा कि मैं इस अग्नि में जल कर भष्म हो जाऊँगा। मैं एक बार फिर चिल्लाया, नहीं-नहीं, मुझे बाहर निकालो, अब बस करो, अब बस करो। लेकिन मास्टर फिर यही बोला अभी और अभी और…और कुछ देर बाद मुझे भट्ठी से निकाल दिया गया। अब मैं अपने आप को देखकर हैरान था। मेरी ताकत कई गुना बढ़ गयी थी। मेरी मजबूती देखकर मास्टर भी खुश था, उन्होंने मुझे फ़ौरन रंगने के लिए भेज दिया और मैं अपने इस शानदार रूप में आ गया। सचमुच, आज मुझे खुद पर इतना गर्व हो रहा है, जितना पहले कभी नहीं हुआ। हाँ, ये भी सच है कि उससे पहले मैंने कभी इतनी मेहनत नहीं की थी। इतने कष्ट नहीं सहे थे, लेकिन आज जब मैं अपने आप को देखता हूँ तो मुझे लगता है कि मेरा संघर्ष मेरी मेहनत बेकार नहीं गयी, आज मैं सर ऊँचा उठा कर चल सकता हूँ। आज मैं कह सकता हूँ कि मैं दुनिया के सबसे अच्छे कपों में से एक हूँ। राहुल सारी बातें बड़े ध्यान से सुन रहा था और जैसे ही कप ने अपनी बात पूरी की उसकी आँखें खुल गयीं। आज सपने में ही सही, राहुल मेहनत का महत्त्व समझ गया था। उसने मन ही मन निश्चय किया कि अब वो कभी मेहनत से जी नहीं चुराएगा और अपने शिक्षक और माता-पिता के कहे अनुसार मन लगा कर पढ़ेगा और कड़ी मेहनत करेगा। सार - कड़ी मेहनत का कोई विकल्प नहीं है। जितना बड़ा संघर्ष होगा जीत उतनी ही शानदार होगी। *****
- स्वर्ग की देवी
प्रेमचंद भाग्य की बात ! शादी विवाह में आदमी का क्या अख्तियार । जिससे ईश्वर ने, या उनके नायबों –ब्रह्मण—ने तय कर दी, उससे हो गयी। बाबू भारतदास ने लीला के लिए सुयोग्य वर खोजने में कोई बात उठा नही रखी। लेकिन जैसा घर-घर चाहते थे, वैसा न पा सके। वह लडकी को सुखी देखना चाहते थे, जैसा हर एक पिता का धर्म है ; किंतु इसके लिए उनकी समझ में सम्पत्ति ही सबसे जरूरी चीज थी। चरित्र या शिक्षा का स्थान गौण था। चरित्र तो किसी के माथे पर लिखा नही रहता और शिक्षा का आजकल के जमाने में मूल्य ही क्या ? हां, सम्पत्ति के साथ शिक्षा भी हो तो क्या पूछना ! ऐसा घर बहुत ढढा पर न मिला तो अपनी विरादरी के न थे। बिरादरी भी मिली, तो जायजा न मिला!; जायजा भी मिला तो शर्ते तय न हो सकी। इस तरह मजबूर होकर भारतदास को लीला का विवाह लाला सन्तसरन के लडके सीतासरन से करना पडा। अपने बाप का इकलौता बेटा था, थोडी बहुत शिक्षा भी पायी थी, बातचीत सलीके से करता था, मामले-मुकदमें समझता था और जरा दिल का रंगीला भी था । सबसे बडी बात यह थी कि रूपवान, बलिष्ठ, प्रसन्न मुख, साहसी आदमी था ; मगर विचार वही बाबा आदम के जमाने के थे। पुरानी जितनी बाते है, सब अच्छी ; नयी जितनी बातें है, सब खराब है। जायदाद के विषय में जमींदार साहब नये-नये दफों का व्यवहार करते थे, वहां अपना कोई अख्तियार न था ; लेकिन सामाजिक प्रथाओं के कटटर पक्षपाती थे। सीतासरन अपने बाप को जो करते या कहते वही खुद भी कहता था। उसमें खुद सोचने की शक्ति ही न थी। बुद्वि की मंदता बहुधा सामाजिक अनुदारता के रूप में प्रकट होती है। लीला ने जिस दिन घर में वॉँव रखा उसी दिन उसकी परीक्षा शुरू हुई। वे सभी काम, जिनकी उसके घर में तारीफ होती थी यहां वर्जित थे। उसे बचपन से ताजी हवा पर जान देना सिखाया गया था, यहां उसके सामने मुंह खोलना भी पाप था। बचपन से सिखाया गया था रोशनी ही जीवन है, यहां रोशनी के दर्शन दुर्भभ थे। घर पर अहिंसा, क्षमा और दया ईश्वरीय गुण बताये गये थे, यहां इनका नाम लेने की भी स्वाधीनता थी। संतसरन बडे तीखे, गुस्सेवर आदमी थे, नाक पर मक्खी न बैठने देते। धूर्तता और छल-कपट से ही उन्होने जायदाद पैदा की थी। और उसी को सफल जीवन का मंत्र समझते थे। उनकी पत्नी उनसे भी दो अंगुल ऊंची थीं। मजाल क्या है कि बहू अपनी अंधेरी कोठरी के द्वार पर खडी हो जाय, या कभी छत पर टहल सकें । प्रलय आ जाता, आसमान सिर पर उठा लेती। उन्हें बकने का मर्ज था। दाल में नमक का जरा तेज हो जाना उन्हें दिन भर बकने के लिए काफी बहाना था । मोटी-ताजी महिला थी, छींट का घाघरेदार लंहगा पहने, पानदान बगल में रखे, गहनो से लदी हुई, सारे दिन बरोठे में माची पर बैठीे रहती थी। क्या मजाल कि घर में उनकी इच्छा के विरूद्व एक पत्ता भी हिल जाय ! बहू की नयी-नयी आदतें देख देख जला करती थी। अब काहे की आबरू होगी। मुंडेर पर खडी हो कर झांकती है। मेरी लडकी ऐसी दीदा-दिलेर होती तो गला घोंट देती। न जाने इसके देश में कौन लोग बसते है ! गहनें नही पहनती। जब देखो नंगी – बुच्ची बनी बैठी रहती है। यह भी कोई अच्छे लच्छन है। लीला के पीछे सीतासरन पर भी फटकार पडती। तुझे भी चॉँदनी में सोना अच्छा लगता है, क्यों ? तू भी अपने को मर्द कहता कहेगा ? यह मर्द कैसा कि औरत उसके कहने में न रहे। दिन-भर घर में घुसा रहता है। मुंह में जबान नही है ? समझता क्यों नही ? सीतासरन कहता---अम्मां, जब कोई मेरे समझाने से माने तब तो? मां---मानेगी क्यो नही, तू मर्द है कि नही ? मर्द वह चाहिए कि कडी निगाह से देखे तो औरत कांप उठे। सीतासरन -----तुम तो समझाती ही रहती हो । मां ---मेरी उसे क्या परवाह ? समझती होगी, बुढिया चार दिन में मर जायगी तब मैं मालकिन हो ही जाउँगी सीतासरन --- तो मैं भी तो उसकी बातों का जबाब नही दे पाता। देखती नही हो कितनी दुर्बल हो गयी है। वह रंग ही नही रहा। उस कोठरी में पडे-पडे उसकी दशा बिगडती जाती है। बेटे के मुंह से ऐसी बातें सुन माता आग हो जाती और सारे दिन जलती ; कभी भाग्य को कोसती, कभी समय को । सीतासरन माता के सामने तो ऐसी बातें करता ; लेकिन लीला के सामने जाते ही उसकी मति बदल जाती थी। वह वही बातें करता था जो लीला को अच्छी लगती। यहां तक कि दोनों वृद्वा की हंसी उडातें। लीला को इस में ओर कोई सुख न था । वह सारे दिन कुढती रहती। कभी चूल्हे के सामने न बैठी थी ; पर यहां पसेरियों आटा थेपना पडता, मजूरों और टहलुओं के लिए रोटी पकानी पडती। कभी-कभी वह चूल्हे के सामने बैठी घंटो रोती। यह बात न थी कि यह लोग कोई महाराज-रसोइया न रख सकते हो; पर घर की पुरानी प्रथा यही थी कि बहू खाना पकाये और उस प्रथा का निभाना जरूरी था। सीतासरन को देखकर लीला का संतप्त ह्रदय एक क्षण के लिए शान्त हो जाता था। गर्मी के दिन थे और सन्ध्या का समय था। बाहर हवा चलती, भीतर देह फुकती थी। लीला कोठरी में बैठी एक किताब देख रही थी कि सीतासरन ने आकर कहा--- यहां तो बडी गर्मी है, बाहर बैठो। लीला—यह गर्मी तो उन तानो से अच्छी है जो अभी सुनने पडेगे। सीतासरन—आज अगर बोली तो मैं भी बिगड जाऊंगा। लीला—तब तो मेरा घर में रहना भी मुश्किल हो जायेगा। सीतासरन—बला से अलग ही रहेंगे ! लीला—मैं मर भी लाऊं तो भी अलग रहूं । वह जो कुछ कहती सुनती है, अपनी समझ से मेरे भले ही के लिए कहती-सुनती है। उन्हें मुझसे कोई दुश्मनी थोडे ही है। हां, हमें उनकी बातें अच्छी न लगें, यह दूसरी बात है।उन्होंने खुद वह सब कष्ट झेले है, जो वह मुझे झेलवाना चाहती है। उनके स्वास्थ्य पर उन कष्टो का जरा भी असर नही पडा। वह इस ६५ वर्ष की उम्र में मुझसे कहीं टांठी है। फिर उन्हें कैसे मालूम हो कि इन कष्टों से स्वास्थ्य बिगड सकता है। सीतासरन ने उसके मुरझाये हुए मुख की ओर करुणा नेत्रों से देख कर कहा—तुम्हें इस घर में आकर बहुत दु:ख सहना पडा। यह घर तुम्हारे योग्य न था। तुमने पूर्व जन्म में जरूर कोई पाप किया होगा। लीला ने पति के हाथो से खेलते हुए कहा—यहां न आती तो तुम्हारा प्रेम कैसे पाती ? पांच साल गुजर गये। लीला दो बच्चों की मां हो गयी। एक लडका था, दूसरी लडकी । लडके का नाम जानकीसरन रखा गया और लडकी का नाम कामिनी। दोनो बच्चे घर को गुलजार किये रहते थे। लडकी लडकी दादा से हिली थी, लडका दादी से । दोनों शोख और शरीर थें। गाली दे बैठना, मुंह चिढा देना तो उनके लिए मामूली बात थी। दिन-भर खाते और आये दिन बीमार पडे रहते। लीला ने खुद सभी कष्ट सह लिये थे पर बच्चों में बुरी आदतों का पडना उसे बहुत बुरा मालूम होता था; किन्तु उसकी कौन सुनता था। बच्चों की माता होकर उसकी अब गणना ही न रही थी। जो कुछ थे बच्चे थे, वह कुछ न थी। उसे किसी बच्चे को डाटने का भी अधिकार न था, सांस फाड खाती थी। सबसे बडी आपत्ति यह थी कि उसका स्वास्थ्य अब और भी खराब हो गया था। प्रसब काल में उसे वे भी अत्याचार सहने पडे जो अज्ञान, मूर्खता और अंध विश्वास ने सौर की रक्षा के लिए गढ रखे है। उस काल-कोठरी में, जहॉँ न हवा का गुजर था, न प्रकाश का, न सफाई का, चारों और दुर्गन्ध, और सील और गन्दगी भरी हुई थी, उसका कोमल शरीर सूख गया। एक बार जो कसर रह गयी वह दूसरी बार पूरी हो गयी। चेहरा पीला पड गया, आंखे घंस गयीं। ऐसा मालूम होता, बदन में खून ही नही रहा। सूरत ही बदल गयी। गर्मियों के दिन थे। एक तरफ आम पके, दूसरी तरफ खरबूजे । इन दोनो फलो की ऐसी अच्छी फसल कभी न हुई थी अबकी इनमें इतनी मिठास न जाने कहा से आयी थी कि कितना ही खाओ मन न भरे। संतसरन के इलाके से आम औरी खरबूजे के टोकरे भरे चले आते थे। सारा घर खूब उछल-उछल खाता था। बाबू साहब पुरानी हड्डी के आदमी थे। सबेरे एक सैकडे आमों का नाश्ता करते, फिर पसेरी-भर खरबूज चट कर जाते। मालकिन उनसे पीछे रहने वाली न थी। उन्होने तो एक वक्त का भोजन ही बन्द कर दिया। अनाज सडने वाली चीज नही। आज नही कल खर्च हो जायेगा। आम और खरबूजे तो एक दिन भी नही ठहर सकते। शुदनी थी और क्या। यों ही हर साल दोनों चीजों की रेल-पेल होती थी; पर किसी को कभी कोई शिकायत न होती थी। कभी पेट में गिरानी मालूम हुई तो हड की फंकी मार ली। एक दिन बाबू संतसरन के पेट में मीठा-मीठा दर्द होने लगा। आपने उसकी परवाह न की । आम खाने बैठ गये। सैकड़ा पूरा करके उठे ही थे कि कै हुई । गिर पडे फिर तो तिल-तिल करके पर कै और दस्त होने लगे। हैजा हो गया। शहर के डाक्टर बुलाये गये, लेकिन आने के पहले ही बाबू साहब चल बसे थे। रोना-पीटना मच गया। संध्या होते-होते लाश घर से निकली। लोग दाह-क्रिया करके आधी रात को लौटे तो मालकिन को भी कै दस्त हो रहे थे। फिर दौड धूप शुरू हुई; लेकिन सूर्य निकलते-निकलते वह भी सिधार गयी। स्त्री-पुरूष जीवनपर्यंत एक दिन के लिए भी अलग न हुए थे। संसार से भी साथ ही साथ गये, सूर्यास्त के समय पति ने प्रस्थान किया, सूर्योदय के समय पत्नी ने । लेकिन मुशीबत का अभी अंत न हुआ था। लीला तो संस्कार की तैयारियों मे लगी थी; मकान की सफाई की तरफ किसी ने ध्यान न दिया। तीसरे दिन दोनो बच्चे दादा-दादी के लिए रोत-रोते बैठक में जा पंहुचे। वहां एक आले का खरबूजज कटा हुआ पडा था; दो-तीन कलमी आम भी रखे थे। इन पर मक्खियां भिनक रही थीं। जानकी ने एक तिपाई पर चढ कर दोनों चीजें उतार लीं और दोंनों ने मिलकर खाई। शाम होत-होते दोनों को हैजा हो गया और दोंनो मां-बाप को रोता छोड चल बसे। घर में अंधेरा हो गया। तीन दिन पहले जहां चारों तरफ चहल-पहल थी, वहां अब सन्नाटा छाया हुआ था, किसी के रोने की आवाज भी सुनायी न देती थी। रोता ही कौन ? ले-दे के कुल दो प्राणी रह गये थे। और उन्हें रोने की सुधि न थी। लीला का स्वास्थ्य पहले भी कुछ अच्छा न था, अब तो वह और भी बेजान हो गयी। उठने-बैठने की शक्ति भी न रही। हरदम खोयी सी रहती, न कपडे-लत्ते की सुधि थी, न खाने-पीने की । उसे न घर से वास्ता था, न बाहर से । जहां बैठती, वही बैठी रह जाती। महीनों कपडे न बदलती, सिर में तेल न डालती बच्चे ही उसके प्राणो के आधार थे। जब वही न रहे तो मरना और जीना बराबर था। रात-दिन यही मनाया करती कि भगवान् यहां से ले चलो । सुख-दु:ख सब भुगत चुकी। अब सुख की लालसा नही है; लेकिन बुलाने से मौत किसी को आयी है ? सीतासरन भी पहले तो बहुत रोया-धोया; यहां तक कि घर छोडकर भागा जाता था; लेकिन ज्यों-ज्यो दिन गुजरते थे बच्चों का शोक उसके दिल से मिटता था; संतान का दु:ख तो कुछ माता ही को होता है। धीरे-धीरे उसका जी संभल गया। पहले की भॉँति मित्रों के साथ हंसी-दिल्लगी होने लगी। यारों ने और भी चंग पर चढाया । अब घर का मालिक था, जो चाहे कर सकता था, कोई उसका हाथ रोकने वाला नही था। सैर’-सपाटे करने लगा। तो लीला को रोते देख उसकी आंखे सजग हो जाती थीं, कहां अब उसे उदास और शोक-मग्न देखकर झुंझला उठता। जिंदगी रोने ही के लिए तो नही है। ईश्वर ने लडके दिये थे, ईश्वर ने ही छीन लिये। क्या लडको के पीछे प्राण दे देना होगा ? लीला यह बातें सुनकर भौंचक रह जाती। पिता के मुंह से ऐसे शब्द निकल सकते है। संसार में ऐसे प्राणी भी है। होली के दिन थे। मर्दाना में गाना-बजाना हो रहा था। मित्रों की दावत का भी सामान किया गया था । अंदर लीला जमींन पर पडी हुई रो रही थी त्याहोर के दिन उसे रोते ही कटते थें आज बच्चे बच्चे होते तो अच्छे- अच्छे कपडे पहने कैसे उछलते फिरते! वही न रहे तो कहां की तीज और कहां के त्योहार। सहसा सीतासरन ने आकर कहा – क्या दिन भर रोती ही रहोगी ? जरा कपडे तो बदल डालो , आदमी बन जाओ । यह क्या तुमने अपनी गत बना रखी है ? लीला—तुम जाओ अपनी महफिल मे बैठो, तुम्हे मेरी क्या फिक्र पडी है। सीतासरन—क्या दुनिया में और किसी के लडके नही मरते ? तुम्हारे ही सिर पर मुसीबत आयी है ? लीला—यह बात कौन नही जानता। अपना-अपना दिल ही तो है। उस पर किसी का बस है ? सीतासरन मेरे साथ भी तो तुम्हारा कुछ कर्तव्य है ? लीला ने कुतूहल से पति को देखा, मानो उसका आशय नही समझी। फिर मुंह फेर कर रोने लगी। सीतासरन – मै अब इस मनहूसत का अन्त कर देना चाहता हूं। अगर तुम्हारा अपने दिल पर काबू नही है तो मेरा भी अपने दिल पर काबू नही है। मैं अब जिंदगी – भर मातम नही मना सकता। लीला—तुम रंग-राग मनाते हो, मैं तुम्हें मना तो नही करती ! मैं रोती हूं तो क्यूं नही रोने देते। सीतासरन—मेरा घर रोने के लिए नही है ? लीला—अच्छी बात है, तुम्हारे घर में न रोउंगी। लीला ने देखा, मेरे स्वामी मेरे हाथ से निकले जा रहे है। उन पर विषय का भूत सवार हो गया है और कोई समझाने वाला नहीं। वह अपने होश मे नही है। मैं क्या करुं, अगर मैं चली जाती हूं तो थोडे ही दिनो में सारा ही घर मिट्टी में मिल जाएगा और इनका वही हाल होगा जो स्वार्थी मित्रो के चुंगल में फंसे हुए नौजवान रईसों का होता है। कोई कुलटा घर में आ जाएगी और इनका सर्वनाश कर देगी। ईश्वा ! मैं क्या करूं ? अगर इन्हें कोई बीमारी हो जाती तो क्या मैं उस दशा मे इन्हें छोडकर चली जाती ? कभी नही। मैं तन मन से इनकी सेवा-सुश्रूषा करती, ईश्वर से प्रार्थना करती, देवताओं की मनौतियां करती। माना इन्हें शारीरिक रोग नही है, लेकिन मानसिक रोग अवश्य है। आदमी रोने की जगह हंसे और हंसने की जगह रोये, उसके दीवाने होने में क्या संदेह है ! मेरे चले जाने से इनका सर्वनाश हो जायेगा। इन्हें बचाना मेरा धर्म है। हां, मुझें अपना शोक भूल जाना होगा। रोऊंगी, रोना तो तकदीर में लिखा ही है—रोऊंगी, लेकिन हंस-हंस कर । अपने भाग्य से लडूंगी। जो जाते रहे उनके नाम के सिवा और कर ही क्या सकती हूं, लेकिन जो है उसे न जाने दूंगी। आ, ऐ टूटे हुए ह्रदय ! आज तेरे टुकडों को जमा करके एक समाधि बनाऊं और अपने शोक को उसके हवाले कर दूं। ओ रोने वाली आंखों, आओ, मेरे आसुंओं को अपनी विहंसित छटा में छिपा लो। आओ, मेरे आभूषणों, मैंने बहुत दिनों तक तुम्हारा अपमान किया है, मेरा अपराध क्षमा करो। तुम मेरे भले दिनो के साक्षी हो, तुमने मेरे साथ बहुत विहार किए है, अब इस संकट में मेरा साथ दो ; मगर देखो दगा न करना ; मेरे भेदों को छिपाए रखना। पिछले पहर को पहफिल में सन्नाटा हो गया। हू-हा की आवाजें बंद हो गयी। लीला ने सोचा क्या लोग कही चले गये, या सो गये ? एकाएक सन्नाटा क्यों छा गया। जाकर दहलीज में खडी हो गयी और बैठक में झांककर देखा, सारी देह में एक ज्वाला-सी दौड गयी। मित्र लोग विदा हो गये थे। समाजियो का पता न था। केवल एक रमणी मसनद पर लेटी हुई थी और सीतासरन सामने झुका हुआ उससे बहुत धीरे-धीरे बातें कर रहा था। दोनों के चेहरों और आंखो से उनके मन के भाव साफ झलक रहे थे। एक की आंखों में अनुराग था, दूसरी की आंखो में कटाक्ष ! एक भोला-भोला ह्रदय एक मायाविनी रमणी के हाथों लुटा जाता था। लीला की सम्पत्ति को उसकी आंखों के सामने एक छलिनी चुराये जाती थी। लीला को ऐसा क्रोध आया कि इसी समय चलकर इस कुल्टा को आडे हाथों लूं, ऐसा दुत्कारूं वह भी याद करें, खडे-,खडे निकाल दूं। वह पत्नी भाव जो बहुत दिनो से सो रहा था, जाग उठा और विकल करने लगा। पर उसने जब्त किया। वेग में दौडती हुई तृष्णाएं अक्समात् न रोकी जा सकती थी। वह उलटे पांव भीतर लौट आयी और मन को शांत करके सोचने लगी—वह रूप रंग में, हाव-भाव में, नखरे-तिल्ले में उस दुष्टा की बराबरी नही कर सकती। बिलकुल चांद का टुकडा है, अंग-अंग में स्फूर्ति भरी हुई है, पोर-पोर में मद छलक रहा है। उसकी आंखों में कितनी तृष्णा है। तृष्णा नही, बल्कि ज्वाला ! लीला उसी वक्त आइने के सामने गयी। आज कई महीनो के बाद उसने आइने में अपनी सूरत देखी। उस मुख से एक आह निकल गयी। शोक न उसकी कायापलट कर दी थी। उस रमणी के सामने वह ऐसी लगती थी जैसे गुलाब के सामने जूही का फूल सीतासरन का खुमार शाम को टूटा । आखें खुलीं तो सामने लीला को खडे मुस्करातेदेखा।उसकी अनोखी छवि आंखों में समा गई। ऐसे खुश हुए मानो बहुत दिनो के वियोग के बाद उससे भेंट हुई हो। उसे क्या मालूम था कि यह रुप भरने के लिए कितने आंसू बहाये है; कैशों मे यह फूल गूंथने के पहले आंखों में कितने मोती पिरोये है। उन्होनें एक नवीन प्रेमोत्साह से उठकर उसे गले लगा लिया और मुस्कराकर बोले—आज तो तुमने बडे-बडे शास्त्र सजा रखे है, कहां भागूं ? लीला ने अपने ह्रदय की ओर उंगली दिखकर कहा –-यहा आ बैठो बहुत भागे फिरते हो, अब तुम्हें बांधकर रखूगीं । बाग की बहार का आनंद तो उठा चुके, अब इस अंधेरी कोठरी को भी देख लो। सीतासरन ने जज्जित होकर कहा—उसे अंधेरी कोठरी मत कहो लीला वह प्रेम का मानसरोवर है ! इतने मे बाहर से किसी मित्र के आने की खबर आयी। सीताराम चलने लगे तो लीला ने हाथ उनका पकडकर हाथ कहा—मैं न जाने दूंगी। सीतासरन-- अभी आता हूं। लीला—मुझे डर है कहीं तुम चले न जाओ। सीतासरन बाहर आये तो मित्र महाशय बोले –आज दिन भर सोते हो क्या ? बहुत खुश नजर आते हो। इस वक्त तो वहां चलने की ठहरी थी न ? तुम्हारी राह देख रही है। सीतासरन—चलने को तैयार हूं, लेकिन लीला जाने नहीं देगीं। मित्र—निरे गाउदी ही रहे। आ गए फिर बीवी के पंजे में ! फिर किस बिरते पर गरमाये थे ? सीतासरन—लीला ने घर से निकाल दिया था, तब आश्रय ढूढता – फिरता था। अब उसने द्वार खोल दिये है और खडी बुला रही है। मित्र—आज वह आनंद कहां ? घर को लाख सजाओ तो क्या बाग हो जायेगा ? सीतासरन—भई, घर बाग नही हो सकता, पर स्वर्ग हो सकता है। मुझे इस वक्त अपनी क्षद्रता पर जितनी लज्जा आ रही है, वह मैं ही जानता हूं। जिस संतान शोक में उसने अपने शरीर को घुला डाला और अपने रूप-लावण्य को मिटा दिया उसी शोक को केवल मेरा एक इशारा पाकर उसने भुला दिया। ऐसा भुला दिया मानो कभी शोक हुआ ही नही! मैं जानता हूं वह बडे से बडे कष्ट सह सकती है। मेरी रक्षा उसके लिए आवश्यक है। जब अपनी उदासीनता के कारण उसने मेरी दशा बिगडते देखी तो अपना सारा शोक भूल गयी। आज मैंने उसे अपने आभूषण पहनकर मुस्कराते हुंए देखा तो मेरी आत्मा पुलकित हो उठी । मुझे ऐसा मालूम हो रहा है कि वह स्वर्ग की देवी है और केवल मुझ जैसे दुर्बल प्राणी की रक्षा करने भेजी गयी है। मैने उसे कठोर शब्द कहे, वे अगर अपनी सारी सम्पत्ति बेचकर भी मिल सकते, तो लौटा लेता। लीला वास्तव में स्वर्ग की देवी है! ****
- ग़ज़ल
कुसुम शर्मा ये चाँदी की सी चमकीली हवाएं चली हैं आज बर्फ़ीली हवाएं बहे अश्क़ों के दरिया हैं कहीं पर नमी से हो रहीं गीली हवाएं असर ये तर्क-ए-त'अल्लुक़ का है शायद लगी हैं आज ज़हरीली हवाएं किये जाती हैं सीना चाक सा कुछ ये ख़ंजर से भी नोकीली हवाएं हैं बदले रुख़ जहां वालों ने जब से नहीं चलती हैं शर्मीली हवाएं। ******
- सच्चे गुरु की तलाश
मुकेश ‘नादान’ सन् 1881 की बात है। नवंबर का महीना था, ठंड भी अपना भरपूर असर दिखा रही थी। एक दिन श्रीरामक्रृष्ण परमहंस आमंत्रण पर सुरेंद्रनाथ के घर पधारे। उनके आने पर आनंदोत्सव मनाया जा रहा था। कोई अच्छा गायक न मिलने पर सुरेंद्रनाथ ने अपने मित्र नरेंद्र को बुला लिया। जब श्रीरामकृष्णजी ने नरेंद्र का गाना सुना, तो वे उसकी प्रतिभा को पहचान गए। उन्होंने नरेंद्र से काफी देर तक बातें कीं और जाते समय नरेंद्र को दक्षिणेश्वर आने का निमंत्रण भी दे गए। उस समय नरेंद्र एफ.ए. की तैयारी में जुटे थे। शीघ्र ही परीक्षा होने वाली थी, जिस कारण नरेंद्र श्रीरामकृष्ण परमहंस के आमंत्रण को भूल गए। परीक्षा समाप्त होते ही नरेंद्र के विवाह की बातचीत होने लगी। लेकिन नरेंद्र विवाह करने के इच्छुक नहीं थे, वह अकसर अपने मित्रों से कहते थे, “मैं विवाह नहीं करूँगा।" इधर विश्वनाथ बाबू खुले विचारों वाले व्यक्ति थे, वे नरेंद्र पर किसी भी तरह का दबाव नहीं डालना चाहते थे। अत: उन्होंने विवाह के संबंध में नरेंद्र की राय जानने का कार्य अपने संबंधी डॉ. रामचंद्र दत्त को सौंप दिया। उनके पूछने पर नरेंद्र ने स्पष्ट शब्दों मे कह दिया, “मैं विवाह के बंधन से मुक्त रहना चाहता हूँ, क्योंकि मेरे उद्देश्य की पूर्ति में विवाह बाधक है।” नरेंद्र का जबाब सुनकर रामचंद्र दत्त ने उन्हें सलाह दी, “यदि वास्तव में तुम्हारा उद्देश्य सत्य की प्राप्ति है, तो ब्रह्मसमाज में जाने से कोई लाभ नहीं है। तुम्हारे लिए दक्षिणेश्वर में श्रीरामकृष्ण के पास जाना ठीक रहेगा।” उनके ऐसा कहते ही नरेंद्र को श्रीरामकृष्णजी का आमंत्रण स्मरण हो आया और वह अपने मित्रों के साथ दक्षिणेश्वर जा पहुँचे। श्रीरामकृष्ण परमहंस नरेंद्र से आत्मीयता के साथ मिले। उन्होंने नरेंद्र को अपने निकट चटाई पर बैठा लिया और गाना सुनाने के लिए कहा। नरेंद्र ने ब्रह्मसमाज का “मन चलो निज निकेतन' गीत गाया। गीत समाप्त होने पर श्रीरामकृष्ण नरेंद्र को एकांत में ले गए और अंदर से कमरा बंद कर लिया। श्रीरामकृष्ण ने नरेंद्र से पूछा, “ अरे, तू इतने दिन कहाँ रहा? मैं कब से तेरी प्रतीक्षा कर रहा था। विषयी लोगों से बात करते-करते मेरा मुँह जल गया है, आज तुझ जैसे सच्चे त्यागी से बात करके मुझे शांति मिलेगी।” कहते-कहते उनकी आँखों से आँसू बहने लगे। नरेंद्र हतप्रभ से उनकी ओर देखते रह गए। कुछ पलों बाद रामकृष्ण ने हाथ जोड़कर नरेंद्र से सम्मानजनक शब्दों में कहा, “मैं जानता हूँ कि तू सप्तऋषि मंडल का महर्षि है, नररूपी नारायण है। जीवों के कल्याण की कामना से तूने देह धारण की है।” नरेंद्र उनकी बातों का कोई उत्तर न दे सके। वह अवाव्क्त से उन्हें देखते रहे। उन्होंने मन-ही-मन सोचा, यह तो निरा पागलपन है। मैं विश्वनाथ दत्त का पुत्र हूँ, फिर ये मुझे क्या कह रहे हैं? उसी पल श्रीरामकृष्ण ने नरेंद्र का हाथ थाम लिया और विनीत स्वर में बोले, “मुझे वचन दे कि तू मुझसे मिलने पुन: अकेला आएगा और जल्दी आएगा।" नरेंद्र ने इस अद्भुत स्थिति से मुक्त होने के लिए बचन तो दे दिया, किंतु मन-ही-मन कहा, फिर कभी न आऊँगा। इसके बाद श्रीरामकृष्ण नरेंद्र के साथ वापस बैठक में आ गए। वहाँ अन्य लोगों की मौजूदगी में जो बातें हुई, नरेंद्र को उनमें जरा भी पागलपन नहीं दिखाई दिया। नरेंद्र वापस अपने घर लौट आए। हालाँकि उन्होंने निर्णय लिया था कि वे अब कभी श्रीरामकृष्ण से मिलने दक्षिणेश्वर नहीं जाएँगे, मगर एक माह बाद वे पुन: दक्षिणेश्वर जा पहुँचे। रामकृष्ण एक खटोले पर लेटे हुए थे। नरेंद्र ने देखा, वहाँ उनके अतिरिक्त कोई दूसरा प्राणी नहीं है। जैसे ही रामकृष्ण की दृष्टि नरेंद्र पर पड़ी, वे प्रसन्न हो उठे और आनंदित स्वर में उन्हें अपने निकट बुलाकर बैठा लिया। नरेंद्र के बैठने पर न जाने किस भाव से रामकृष्ण तन््मय हो गए और सरकते-सरकते उनके निकट आ गए। नरेंद्र तनिक से भयभीत हो गए, उन्होंने सोचा, 'शायद यह पागल पहले दिन की भाँति आज भी कोई पागलपन करेगा।' अचानक श्रीरामकृष्ण ने अपना दाहिना पैर नरेंद्र के शरीर से स्पर्श करा दिया। उनका ऐसा करना था कि नरेंद्र को कमरे की दीवारें, सब वस्तुएँ और संपूर्ण संसार घूमता हुआ महसूस होने लगा। एकाएक उन्हें अपना व्यक्तित्व तथा सभी वस्तुएँ शून्य में विलीन होती अनुभव हुई। उस समय नरेंद्र घबरा गए और भयभीत होकर चिल्ला उठे, “अजी, आपने ये मेरी कैसी अवस्था कर डाली, मेरे तो माँ-बाप भी हैं।" नरेंद्र की बात सुनकर श्रीरामकृष्ण खिलखिलाकर हँस दिए और नरेंद्र का हाथ अपनी छाती पर रखकर बोले, “अभी इस सबका समय नहीं आया है, शायद! खैर...फिर कभी सही।” इसके बाद परमहंस पुन: सामान्य स्थिति में आ गए। उन्होंने पहले दिन की भाँति नरेंद्र को प्रेमपूर्वक खिलाया-पिलाया। विभिन्न विषयों पर वार्तालाप करते-करते तथा हास-परिहास भी किया। शाम होने पर नरेंद्र ने जब जाने की आज्ञा माँगी, तो वे उदास होकर बोले, “अच्छा! लेकिन वचन दे, फिर जल्दी ही आएगा तू।” नरेंद्र ने विवश होकर पहले दिन की भाँति वचन दिया और घर लौट आए। *******
- बुद्धिमान साधु
डॉ. कृष्णकांत श्रीवास्तव किसी राजमहल के द्वार पर एक साधु आया और द्वारपाल से बोला कि तुम भीतर जाकर राजा से कहो कि बाहर उनका भाई आया है। द्वारपाल ने समझा कि शायद ये कोई दूर के रिश्ते में राजा का भाई होगा जो संन्यास लेकर साधुओं की तरह रह रहा होगा। सूचना मिलने पर राजा मुस्कुराया और साधु को राजमहल में बुलाकर अपने पास बैठा लिया। साधु ने पूछा, “कहो अनुज, क्या हाल-चाल हैं तुम्हारे?” “मैं ठीक हूँ आप कैसे हैं भैया?”, राजा बोला। साधु ने कहा, “जिस महल में मैं रहता था, वह पुराना और जर्जर हो गया है। कभी भी टूटकर गिर सकता है। मेरे 32 नौकर थे वे भी एक-एक करके चले गए। पाँचों रानियाँ भी वृद्ध हो गयीं और अब उनसे भी काम नहीं होता।” यह सुनकर राजा ने साधु को 10 सोने के सिक्के देने का आदेश दिया। साधु ने 10 सोने के सिक्के कम बताए। तब राजा ने कहा, “इस बार राज्य में सूखा पड़ा है, आप इतने से ही संतोष कर लें।” साधु बोला, “मेरे साथ सात समुन्दर पार चलो वहां सोने की खदानें हैं। मेरे पैर पड़ते ही समुद्र सूख जाएगा। मेरे पैरों की शक्ति तो आप देख ही चुके हैं।” अब राजा ने साधु को 100 सोने के सिक्के देने का आदेश दिया। साधु के जाने के बाद मंत्रियों ने आश्चर्य से पूछा, “क्षमा करियेगा राजन, लेकिन जहाँ तक हम जानते हैं आपका कोई बड़ा भाई नहीं है, फिर आपने इस ठग को इतना इनाम क्यों दिया?” राजन ने समझाया, “देखो, भाग्य के दो पहलु होते हैं। राजा और रंक। इस नाते उसने मुझे भाई कहा। जर्जर महल से उसका आशय उसके बूढ़े शरीर से था। 32 नौकर उसके दांत थे और 5 वृद्ध रानियाँ, उसकी 5 इन्द्रियां हैं। समुद्र के बहाने उसने मुझे उलाहना दिया कि राजमहल में उसके पैर रखते ही मेरा राजकोष सूख गया। मैं उसे मात्र दस सिक्के दे रहा था जबकि मेरी हैसियत उसे सोने से तौल देने की है। इसीलिए उसकी बुद्धिमानी से प्रसन्न होकर मैंने उसे सौ सिक्के दिए और कल से मैं उसे अपना सलाहकार नियुक्त करूँगा। सार - किसी व्यक्ति के बाहरी रंग रूप से न तो उसकी बुद्धिमत्ता का अंदाजा लगाना चाहिये और न ही उसके बारे में गलत विचार बनाने चाहिये। ******
- मां तुम कितनी सुंदर हो।
डॉ. जहान सिंह 'जहान' प्राकृति का ये सुन्दर आवरण ही पर्यावरण है। ये खूबसूरत धरती मां का घूंघट है। उसकी लज्जा है, उसका श्रंगार है।। तेरे-मेरे जीवन का आंचल है।। ये पर्यावरण है। मत करो मलीन इस मां के आवरण को। तुझ पर से तेरा आंचल हट जायेगा ।। तू बेसहारा हो जायेगा। थम जायेंगी सांसे तेरी। जब ये हवाएं-प्राण वायु, जब ये जल-प्राण पेय, मां को निष्प्राण कर जाएंगे। बिन मां के तू कैसे जी पायेगा। ये 'जहान' फिर यहीं थम जाएगा।। मत करो इस का क्षरण। प्राकृति का ये सुन्दर आवरण। पर्यावरण है।। ******
- गलती का पछतावा
सुरेश चंद्र वर्मा एक व्यक्ति जिनकी उम्र लगभग 60 रही होगी, रिक्शे से अपनी पत्नी को बैठा कर कुछ बेचने का सामान ले के कहीं जा रहे थे। गर्मी भी खूब थी और उम्र ज़्यादा होने के कारण रिक्शा धीरे धीरे चला रहे थे। रास्ते में भीड़ थी मुझे जल्दी जाना था। मै पीछे से कई बार हॉर्न बजा रहा था। मुझे बहुत ग़ुस्सा आ रहा था रिक्शे वाले पर। बड़ी मुश्किल से आगे आया। जैसे आगे आया सोचा इनको बोलता हूँ रिक्शा साइड में चलाये। लेकिन जब इनकी उम्र देखी तो खुद के किए पर शर्मिंदा था। गाड़ी रोक कर गाड़ी में पड़ी पानी की बोतल उनको पकड़ाते हुए माफ़ी माँगा। बदले में खूब आशीर्वाद मिला। अब मुझे कोई जल्दी नही थी। सोचा पता करता हूँ कि इस उम्र में इन्हें इतनी मेहनत क्यों करनी पड़ रही है। तो पता लगा कि बेटा नशा करता है। इनको पूछता नही है। कमाई का कोई श्रोत नही है। इसलिए जीवन यापन के लिए खिलौने बेचते है। पत्नी बीमार रहती है। जो कमाते है इलाज में लग जाता है। बताते हुए उनकी भी आँख नम थी और मेरी भी कुछ थोड़े पैसे देने का प्रायस किया, पर लिया नही। बोला बाबू हो सके तो पत्नी को किसी अच्छे डाक्टर को दिखा दो। वादा कर के चला आया हूँ अपना नम्बर दे के। कल उनकी पत्नी को अच्छे डाक्टर को दिखा देंगे। आप की हैसियत बड़ी गाड़ी में घूमने से नही, लोगों को इज्जत देने से बढ़ेगी। और इस तरह के बहुत रिक्शा चालक जो गर्मी में अपना पूरा परिवार लेके सड़क पर जीवित रहने की लड़ाई लड़ते हैं ये बस आप के सम्मान के भूखे होते हैं। इन्हें बार-बार हॉर्न बजा कर, दुःख मत दीजिए। इन्हें इस गर्मी में आप से ज़्यादा जल्दी है, मंज़िल पर पहुँचने की। आप AC कार में बैठे हैं तब भी इतनी जल्दी है। तो इन्हें कितनी होगी। ऐसे लोग जहाँ भी मिले थोड़ा समय निकालिए और इनसे बात करिए। थोड़ा मदद का प्रयास करिए। अपने लिए मेहनत और भागदौड़ तो तब तक चलेगी जब तक आप अंतिम सैंया पर लेट ना जाए। इस लिए जीवित होने का प्रमाण दीजिए। केवल खुद के लिए जीना आप को मृतक होने का प्रमाण पत्र देती है। *****











