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- क्रोध
डॉ. कृष्णा कांत श्रीवास्तव एक संत भिक्षा में मिले अन्न से अपना जीवत चला रहे थे। वे रोज अलग-अलग गांवों में जाकर भिक्षा मांगते थे। एक दिन वे गांव के बड़े सेठ के यहां भिक्षा मांगने पहुंचे। सेठ ने संत को थोड़ा अनाज दिया और बोला कि गुरुजी मैं एक प्रश्न पूछना चाहता हूं। संत ने सेठ से अनाज लिया और कहा कि ठीक है पूछो। सेठ ने कहा कि मैं ये जानना चाहता हूं कि लोग लड़ाई-झगड़ा क्यों करते हैं? संत कुछ देर चुप रहे और फिर बोले कि मैं यहां भिक्षा लेने आया हूं, तुम्हारे मूर्खतापूर्ण सवालों के जवाब देने नहीं आया। ये बात सुनते ही सेठ एकदम क्रोधित हो गया। उसने खुद से नियंत्रण खो दिया और बोला कि तू कैसा संत है, मैंने दान दिया और तू मुझे ऐसी बोल रहा है। सेठ ने गुस्से में संत को खूब बातें सुनाई। संत चुपचाप सुन रहे थे। उन्होंने एक भी बार पलटकर जवाब नहीं दिया। कुछ देर बाद सेठ का गुस्सा शांत हो गया, तब संत ने उससे कहा कि भाई जैसे ही मैंने तुम्हें कुछ बुरी बातें बोलीं, तुम्हें गुस्सा आ गया। गुस्से में तुम मुझ पर चिल्लाने लगे। अगर इसी समय पर मैं भी क्रोधित हो जाता तो हमारे बीच बड़ा झगड़ा हो जाता। क्रोध ही हर झगड़े का मूल कारण है और शांति हर विवाद को खत्म कर सकती है। अगर हम क्रोध ही नहीं करेंगे तो कभी भी वाद-विवाद नहीं होगा। जीवन में सुख-शांति चाहते हैं तो क्रोध को नियंत्रित करना चाहिए। क्रोध को काबू करने के लिए रोज ध्यान करें। भगवान के मंत्रों का जाप करें। सार- घर-परिवार हो या कार्यस्थल हमें शांत रहना चाहिए। अगर कोई गुस्सा कर भी रहा है तो हमें उसका जवाब शांति से देना चाहिए। जैसे ही हमने शांति को छोड़ा और क्रोध किया तो छोटी सी बात भी बड़ा नुकसान कर सकती है। ******
- गोदान
मुंशी प्रेमचंद होरीराम ने दोनों बैलों को सानी-पानी देकर अपनी स्त्री धनिया से कहा-गोबर को ऊख गोड़ने भेज देना। मैं न जाने कब लौटूँ। ज़रा मेरी लाठी दे दे। धनिया के दोनों हाथ गोबर से भरे थे। उपले पाथकर आयी थी। बोली-अरे, कुछ रस-पानी तो कर लो। ऐसी जल्दी क्या है। होरी ने अपने झुर्रियों से भरे हुए माथे को सिकोड़कर कहा-तुझे रस-पानी की पड़ी है, मुझे चिन्ता है कि अबेर हो गयी तो मालिक से भेंट न होगी। असनान-पूजा करने लगेंगे, तो घंटों बैठे बीत जायेगा। ‘इसी से तो कहती हूँ, कुछ जलपान कर लो। और आज न जाओगे तो कौन हरज होगा। अभी तो परसों गये थे।’ ‘तू जो बात नहीं समझती, उसमें टाँग क्यों अड़ाती है भाई? मेरी लाठी दे दे और अपना काम देख। यह इसी मिलते-जुलते रहने का परसाद है कि अब तक जान बची हुई है। नहीं कहीं पता न लगता कि किधर गये। गांव में इतने आदमी तो हैं, किस पर बेदखली नहीं आयी, किस पर कुड़की नहीं आयी। जब दूसरे के पाँवों-तले अपनी गर्दन दबी हुई है, तो उन पाँवों को सहलाने में ही कुशल है।’ धनिया इतनी व्यवहारकुशल न थी। उसका विचार था कि हमने ज़मींदार के खेत जोते हैं, तो वह अपना लगान ही तो लेगा। उसकी खुशामद क्यों करें, उसके तलवे क्यों सहलायें। यद्यपि अपने विवाहित जीवन के इन बीस बरसों में उसे अच्छी तरह अनुभव हो गया था कि चाहे कितनी ही कतर-ब्योंत करो, कितना ही पेट-तन काटो, चाहे एक-एक कौड़ी को दांत से पकड़ो; मगर लगान बेबाक होना मुश्किल है। फिर भी वह हार न मानती थी और इस विषय पर स्त्री-पुरुष में आये दिन संग्राम छिड़ा रहता था। उसकी छः सन्तानों में अब केवल तीन जिन्दा हैं, एक लड़का गोबर सोलह साल का, और दो लड़कियाँ सोना और रूपा, बारह और आठ साल की। तीन लड़के बचपन ही में मर गये। उसका मन आज भी कहता था, अगर उनकी दवा-दारू होती तो वे बच जाते; पर वह एक धेले की दवा मईल्थ मँगवा सकी थी। उसकी ही उम्र अभी क्या थी। छत्तीसवाँ ही साल तो था; पर सारे बाल पक गये थे, चेहरे पर झुर्रियों पड़ गयी थी। सारी देह ढल गयी थी, वह सुन्दर गेहुआं रंग सँवला गया था और अस्त्रों से भी कम सूझने लगा था। पेट की चिन्ता ही के कारण तो कभी जीवन का सुख न मिला। इस चिरस्थायी जीर्णावस्था ने उसके आत्मसम्मान को उदासीनता का रूप दे दिया था। जिस गृहस्थी में पेट-कीं रोटियाँ भी न मिलें, उसके लिए इतनी खुशामद क्यों? इस परिस्थिति से उसका मन बराबर विद्रोह किया करता था और दो-चार घुड़कियाँ खा लेने पर ही उसे यथार्थ का ज्ञान होता था। उसने परास्त होकर होरी की लाठी, मिरजई, जूते, पगड़ी और तमाखू का बटुआ लाकर सामने पटक दिये। होरी ने उसकी ओर आँखें तरेर कर कहा-क्या ससुराल जाना है जो पाँचों पोसाक लायी है? ससुराल में भी तो कोई जवान साली-सलहज नहीं बैठी है, जिसे जाकर दिखाऊं। होरी के गहरे साँवले, पिचके हुए चेहरे पर मुस्कुराहट की मृदुता झलक पड़ी। धनिया ने लजाते हुए कहा-ऐसे ही तो बड़े सजीले जवान हो कि साली-सलहजें तुम्हें देख कर रीझ जायेंगी। होरी ने फटी हुई मिरजई को बड़ी सावधानी से तह करके खाट पर रखते हुए कहा-तो क्या तू समझती है, मैं आ हो गया? अभी तो चालीस भी नहीं हुए। मर्द साठे पर पाठे होते हैं। ‘जाकर सीसे में मुँह देखो। तुम जैसे मर्द साठे पर पाठे नहीं होते। दूध-घी अंजन लगाने तक को तो मिलता नहीं, पाठे होंगे! तुम्हारी दशा देख-देखकर तो मैं और भी सूखी जाती हूँ कि भगवान! यह बुढ़ापा कैसे कटेगा? किसके द्वार पर भीख माँगेंगे?’ होरी की वह क्षणिक मृदुता यथार्थ की इस आंच में जैसे झुलस गयी। लकडी संभालता हुआ बोला-साठ तक पहुँचने की नौबत न आने पायेगी धनिया! इसके पहले ही चल देंगे। धनिया ने तिरस्कार किया-अच्छा रहने दो, मत असुभ मुँह से निकालो। तुमसे कोई अच्छी बात भी कहे, तो लगते हो कोसने। होरी कन्धे पर लाठी रखकर घर से निकला, तो धनिया द्वार पर खड़ी उसे देर तक देखती रही। उसके इन निराशा-भरे शब्दों ने धनिया के चोट खाये हुए हृदय में आतंकमय कम्पन-सा डाल दिया था। वह जैसे अपने नारीत्व के सम्पूर्ण तप और व्रत से अपने पति को अभय-दान दे रही थी। उसके अन्तःकरण से जैसे आशीर्वादों का व्यूह-सा निकल कर होरी को अपने अन्दर छिपाये लेता था। विपन्नता के इस अथाह सागर में सोहाग ही वह तृण था, जिसे पकड़े हुए वह सागर को पार कर रही थी। इन असंगत शब्दों ने यथार्थ के निकट होने पर भी मानो झटका देकर उसके हाथ से वह तिनके का सहारा छीन लेना चाहा. बल्कि यथार्थ के निकट होने के कारण ही उसमें इतनी वेदना-शक्ति आ गयी थी। काना कहने से काने को जो दुःख होता है, वह क्या दो आँखोंवाले आदमी को हो सकता है? होरी कदम बढ़ाये चला जाता था। पगडण्डी के दोनों ओर ऊख के पौधों की लहराती हुई हरियाली देख कर उसने मन में कहा-भगवान! कही गौ से बरखा कर दें और डीडी भी सुभीते से रहे, तो एक गाय जरूर लेगा। देशी गायें तो न दूध दें न उनके बछवे ही किसी काम के हों। बहुत हुआ तो तेली के कोल्हू में चले। नहीं, वह पछाई गाय लेगा। उसकी खूब सेवा करेगा। कुछ नहीं तो चार-पाँच सेर दूध होगा। गोबर दूध के लिये तरस-तरस कर रह जाता है। इस उमिर में न खाया-पिया, तो फिर कब खायेगा। साल-भर भी दूध पी ले, तो देखने लायक हो जाय। बछवे भी अच्छे बैल निकलेंगे। दो सौ से कम की गोई न होगी। फिर, गऊ से ही तो द्वार की सोभा है। सबेरे-सबेरे गऊ के दर्शन हो जायें तो क्या कहना! न जाने कब यह साध पूरी होगी, कब वह शुभ दिन आयेगा! हर एक गृहस्थ की भाँति होरी के मन में भी गऊ की लालसा चिरकाल से संचित चली आती थी। यही उसके जीवन का सबसे बड़ा स्वप्न, सबसे बड़ी साध थी। बैंक सूद से चैन करने या जमीन खरीदने या महल बनवाने कीं विशाल आकांक्षाएँ उसके नन्हें-से हृदय में कैसे समाती। जेठ का सूर्य आमों के झुरमुट से निकलकर आकाश पर छायी हुई लालिमा को अपने रजत प्रताप से तेज़ प्रदान करता हुआ ऊपर चढ़ रहा था और हवा में गर्मी आने लगी थी। दोनों ओर खेतों में काम करने वाले किसान उसे देखकर राम-राम करते और सम्मान भाव से चिलम पीने का निमन्त्रण देते थे; पर होरी को इतना अवकाश कहीं था? उसके अन्दर बैठी हुई सम्मान-लालसा ऐसा आदर पाकर उसके सूखे मुख पर गर्व की झलक पैदा कर रही थी। मालिकों से मिलते-जुलते रहने ही का तो यह प्रसाद है कि सब उसका आदर करते हैं। नहीं उसे कौन पूछता? पाँच बीघे के किसान की बिसात ही क्या? यह कम आदर नहीं है कि तीन-तीन, चार-चार हलवाले महतो भी उसके सामने सिर झुकाते हैं। अब वह खेतों के बीच की पगडण्डी छोड़कर एक खलेटी में आ गया था जहाँ बरसात में पानी भर जाने के कारण तरी रहती थी और जेठ में कुछ हरियाली नजर आती थी। आस-पास के गाँवों की गउएँ यहाँ चरने आया करती थी। उस समय में भी यहाँ की हवा में कुछ ताजगी और ठंडक थी। होरी ने दो-तीन सीसे जोर से ली। उसके जी में आया, कुछ देर यहीं बैठ जाये। दिन-भर तो लू-लपट में मरना है ही । कई किसान इस गड्ढे का पट्टा लिखाने को तैयार थे। अच्छी रकम देते थे; ईश्वर भला करे राय साहब का कि उन्होंने साफ कह दिया, यह जमीन जानवरों की चराई के लिए छोड़ दी गयी है और किसी दाम पर भी न उठायी जायगी। कोई स्वार्थी ज़मींदार होता, तो कहता गायें जायँ भाड़ में, हमें रुपये मिलते हैं, क्यों छोड़ें? पर राय साहब अभी तक पुरानी मर्यादा निभाते आते हैं। जो मालिक प्रजा को न पाले, वह भी कोई आदमी है? सहसा उसने देखा, भोला अपनी गायें लिये इसी तरफ चला आ रहा है। भोला इसी गाँव से मिले हुए पुरवे का ग्वाला था और दूध-मक्खन का व्यवसाय करता था। अच्छा दाम मिल जाने पर कभी-कभी किसानों के हाथों गायें बेच भी देता था। होरी का मन उन गायों को देख कर ललचा गया। अगर भोला वह आगे वाली गाय उसे दे दे तो क्या कहना! रुपये आगे-पीछे देता रहेगा। वह जानता था, घर में रुपये नहीं हैं। अभी तक लगान नहीं चुकाया जा सका, बिसेसर साह का देना भी बाकी है, जिस पर आने रुपये का सूद चढ़ रहा है; लेकिन दरिद्रता में जो एक प्रकार की अदूरदर्शिता होती है, वह निर्लज्जता जो तकाजे, गाली और मार से भी भयभीत नहीं होती, उसने उसे प्रोत्साहित किया। बरसों से जो साध मन को आन्दोलित कर रही थी, उसने उसे विचलित कर दिया। भोला के समीप जाकर बोला-राम-राम भोला भाई, कहो क्या रंग-ढंग हैं? सुना अबकी मेले से नयी गायें लाये हो। भोला ने रुखाई से जवाब दिया, होरी के मन की बात उसने ताड़ ली थी- हाँ, दो बछिये और दो गायें लाया। पहले वाली गायें सब सूख गयी थी। बन्धी पर दूध न पहुँचे तो गुजर कैसे हो? होरी ने आगे वाली गाय के पुट, पर हाथ रखकर कहा- दुधार तो मालूम होती है। कितने में ली? भोला ने शान जमायी-अबकी बाजार बड़ा तेज़ रहा महतो, इराके अस्सी रुपये देने पड़े। आँखें निकल गयी। तीस-तीस रुपये तो दोनों कलोरों के दिये। तिस पर गाहक रुपये का आठ सेर दूध माँगता है। ‘बड़ा भारी कलेजा है तुम लोगों का भाई, लेकिन फिर लाये भी तो वह माल कि यही दस-पाँच गाँवों में तो किसी के पास निकलेगी नहीं।’ भोला पर नशा चढ़ने लगा। बोला-राय साहब इसके सौ रुपये देते थे। दोनों कलोरों के पचास-पचास रुपये. लेकिन हमने न दिये । भगवान ने चाहा. तो सौ रुपये इसी ब्यान में पीट लूँगा। ‘इसमें क्या सन्देह है भाई! मालिक क्या खा के लेंगे। नज़राने में मिल जाय, तो भले ले लें। यह तुम्हीं लोगों का गुर्दा है कि अँजुली-भर रुपये तकदीर के भरोसे गिन देते हो। यही जी चाहता है कि इसके दरसन करता रहूँ। धन्य है तुम्हारा जीवन कि गउओं की इतनी सेवा करते हो। हमें तो गाय का गोबर भी मयस्सर नहीं। गिरस्त के घर में एक गाय भी न हो. तो कितनी लज्जा की बात है। साल-के-साल बीत जाते हैं, गोरस के दरसन नहीं होते। घरवाली बार-बार कहती है, भोला भैया से क्यों नहीं कहते! मैं कह देता हूँ, कभी मिलेंगे तो कहूँगा। तुम्हारे सुभाव से बड़ी परसन रहती है। कहती है, ऐसा मर्द ही नहीं देखा कि जब बातें करेंगे, नीची आँखें करके, कभी सिर नहीं उठाते।’ भोला पर जो नशा चढ़ रहा था, उसे इस भरपूर प्याले ने और गहरा कर दिया। बोला-भला आदमी वही है, जो दूसरों की बहू-बेटी को अपनी बहू-बेटी समझे। जो दुष्ट किसी मेहरिया की ओर ताके, उसे गोली मार देनी चाहिए। ‘यह तुमने लाख रुपये की बात कह दी भाई। बस, सज्जन वही, जो दूसरों की आबरू को अपनी आबरू समझे।’ ‘जिस तरह मर्द के मर जाने रो औरत अनाथ हो जाती है, उसी तरह औरत के मर जाने से मर्द के हाथ-पाँव टूट जाते हैं। मेरा तो घर उजड़ गया महतो, कोई एक लोटा पानी देनेवाला भी नहीं।’ गत वर्ष भोला की स्त्री लू लग जाने से मर गयी थी- यह होरी जानता था, लेकिन पचास बरस का खंखड़ भोला भीतर से इतना स्निग्ध है, वह न जानता था। स्त्री की लालसा उसकी अस्त्रों में सजल हो गयी थी। होरी को आसन मिल गया। उसकी व्यावहारिक कृषक-बुद्धि सजग हो गयी। ‘पुरानी मसल झूठी थोड़ी है बिन घरनी घर भूत का डेरा। कहीं सगाई क्यों नहीं ठीक कर लेते?. ‘ताक में हूँ महतो, पर कोई जल्दी फँसता नहीं। सौ-पचास खरच करने को भी तैयार हूँ। जैसी भगवान की इच्छा।’ ‘अब मैं भी फिकर में रहूँगा। भगवान चाहेंगे, जल्दी घर बस जायगा।’
- दूध में दरार पड़ गई
अटल बिहारी वाजपेयी ख़ून क्यों सफ़ेद हो गया? भेद में अभेद खो गया। बँट गये शहीद, गीत कट गए, कलेजे में कटार दड़ गई। दूध में दरार पड़ गई। खेतों में बारूदी गंध, टूट गये नानक के छंद सतलुज सहम उठी, व्यथित सी बितस्ता है। वसंत से बहार झड़ गई दूध में दरार पड़ गई। अपनी ही छाया से बैर, गले लगने लगे हैं ग़ैर, ख़ुदकुशी का रास्ता, तुम्हें वतन का वास्ता। बात बनाएँ, बिगड़ गई। दूध में दरार पड़ गई। ****
- निर्णय
श्रृंगारिका माथुर गांव में जगजीवन के पोते का आज मुंडन था। उसी की दावत चल रही थी। उन्होंने नाचने गाने वालों को भी बुलाया था। एक लड़की बहुत ही सुंदर डांस कर रही थी। तभी उस लड़की ने महसूस किया कि कोई उसको पकड़ने के लिए आगे बढ़ा, वह नृत्य करते-करते दूर हो गई। थोड़ी देर बाद फिर से किसी ने उसे पकड़ना चाहा इस बार उसको धक्का देते समय उसका संतुलन बिगड़ गया और वह भी गिर गई। अभी वह उठ ही रही थी कि तभी एक लंबा चौड़ा नशे में डूबा आदमी उसके पास आया और जब तक वह कुछ समझ पाती उस आदमी ने अपने दोनों हाथों से उसे उठा लिया और अपने सर के बराबर ऊपर उठा कर नीचे पटक दिया उस लड़की की चीख निकल गई उसका सर फट गया था। सब लोग उस लड़की को उठाने के लिए दौड़े। उसके बाद भी वह उसी की तरफ दोबारा बढ़ने लगा कुछ लोगों ने उसको रोक लिया । यह सब सुजाता देख रही थी उसका खून खौलने लगा, गुस्से के कारण उसका चेहरा तमतमा गया। उसकी मुट्ठी कस गईं। वह पल भर में दौड़कर स्टेज के ऊपर आ गई और आते ही उस आदमी की शर्ट के कॉलर को खींचकर उसके चेहरे पर थप्पड़ थप्पड़ मारना शुरू कर दिया, जब तक कोई समझ पाता उस आदमी के चेहरे पर अनगिनत बौछार कर चुकी थी। उसको ऐसा करते देखकर उसके भाई और उसकी मां उसके पास दौड़कर आए, उसको वहाँ से बाहर की तरफ खींचने लगे, और चिल्लाने लगे - तुम यह क्या कर रही हो? तुमको पता है वह सब नशे में हैं? वो नाचने आई है। उसका अपना मामला है, इसके साथ के लोग सब समझा लेते। तुमको यहां नही आना चाहिए। सभ्य घरों की लड़कियां बिना वजह किसी से नही भिड़ती। ऐसी बातें सुनकर सुजाता खामोश होने के बजाय शेरनी की तरह दहाड़ उठी, उसने कहा- "यह काम आप सबको करना चाहिए था जो मैंने किया। लड़की नाचने आई थी किसी के हाथ का खिलौना नही थी। इसके साथ इतना बुरा व्यवहार उस आदमी ने किया और सब देखते रहे और आप कहते हैं सभ्य लड़कियां ऐसा नहीं करती, तो क्या करती है? किसी लड़की की इज्जत अपने सामने लूटता हुआ देखता रहे। उसके साथ कोई भी बुरा व्यवहार करके चला जाए, सब खामोश रहें, क्या यही सभ्य समाज है? फिर वह उस लड़की के पास आई। उसके सर पर काफी चोट आ गई थी। सुजाता उसके पास गई उससे बोली- क्यों करती हो यह सब? उसको देखते ही लड़की धीरे से उठकर सुजाता से लिपट कर जोर-जोर से रोने लगी। उसके रोने में इतना दर्द था जो वहां उपस्थित सभी लोगों के कलेजे को चीर रहा था। वह रोते-रोते बोली - "दीदी मैं नाचने का काम करती हूं, लेकिन कोई गंदा काम नहीं करती हूं। नाचना मेरी मजबूरी है। मेरी मां बहुत बीमार है, मेरे घर में मेरा छोटा भाई है। मैं इतनी पढ़ी-लिखी भी नहीं हूं कि मुझे कहीं नौकरी मिल सके। घरों में झाड़ू पोछा का काम करती थी। वहां पर भी मैं सुरक्षित नहीं रह पाई थी। मेरी दोस्त ने मुझे यह काम बताया और मुझे लगा इसमें तो कोई गलत काम नहीं है तब से मैं नाचने का काम कर रही थी।" उसकी बात सुनकर सुजाता का दिल भर आया था उसकी आंखें नम हो गई थी। सुजाता पुलिस में भर्ती के लिए तैयारी कर रही थी और आज भर्ती होने से पहले ही उसने उस काम को कर दिया जो शायद पुलिस वाले को यह काम करने से पहले दस बार सोचना पड़ता। उसने उस लड़की के आंसू पोछते हुए कहा- "जानती हूं, इस समाज में एक अकेली लड़की के लिए बाहर निकलना कितना मुश्किल है। आज भी हमारा समाज इतनी उन्नति करने के बाद भी लड़की के मामले में कहीं ना कहीं पीछे है। आज भी लड़की आजादी से अपना काम नहीं कर सकती। हर वक्त हर जगह कोई ना कोई ऐसा दानव खड़ा रहता है। इसी वजह से लड़की अपने आप को सुरक्षित महसूस नहीं कर पा रही।" तभी वह आदमी अपने दो साथियों के सहारे उठ कर वहां तक आया और एक भद्दी सी गाली देते हुए बोला - "तुझे मैं देख लूंगा।" उसकी तरफ खा जाने वाली आंखों से घूरते हुए सुजाता बोली- "पहले खुद को देख, खुद अपने पैरों पर खड़ा नहीं हो पा रहा। अपनी बहन और बेटी के समान लड़की के साथ इतना बुरा व्यवहार करता है। शर्म आनी चाहिए। पहले खुद को देख फिर किसी और को देखना। इतना बोलते बोलते ही सुजाता ने पुलिस का नंबर डायल कर दिया। फिर सुजाता सब की तरफ मुखातिब होते हुए बोली- यह कैसा समाज है जो एक लड़की की रक्षा नहीं कर सकता। इतने सारे लोग थे। सब सिर्फ तमाशा देखते रहे और नशे में डूबे एक इंसान के रूप में जानवर ने अपनी हैवानियत दिखाते हुए एक लड़की को उठाकर फेंक दिया। एक खिलौने की तरह, एक सामान की तरह।" अभी सुजाता इतना ही बोल पाई थी भीड़ में पीछे से एक आवाज आई- "ऐसा काम ही क्यों करती है? ऐसा काम करेगी तो कुछ भी हो सकता है। सुजाता फिरकी की तरह उस आवाज की दिशा की तरफ घूम गई और दहाड़ कर बोली अगर तुम्हारी भी ऐसी ही मजबूरी हो तो, इसकी जगह तुम्हारी बहन बेटी होती तब। ऐसे ही लोग हैं जो समाज में ऐसे गंदे लोगों को बढावा देते हैं।" तभी पुलिस की गाड़ी के सायरन की आवाज सुनते ही वो लोग भागने लगे लेकिन पुलिस ने दौड़ कर पकड़ लिया। नाचने वाली लड़की सुजाता की तरफ कृतज्ञतापूर्ण नजरों से देख रही थी। उसके चेहरे को देख कर लग रहा था कि उसने समाज की ऐसी गंदगी से डटकर मुकाबला करने का निर्णय ले लिया था। *******
- फल वाली बुढ़िया
डॉ. कृष्णा कांत श्रीवास्तव ऑफिस से निकल कर शर्मा जी ने स्कूटर स्टार्ट किया ही था कि उन्हें याद आया। पत्नी ने कहा था 1 किलो जामुन लेते आना। तभी उन्हें सड़क किनारे बड़े और ताज़ा जामुन बेचते हुए एक बीमार सी दिखने वाली बुढ़िया दिख गयी। वैसे तो वह फल हमेशा राम आसरे फ्रूट भण्डार से ही लेते थे, पर आज उन्हें लगा कि क्यों न बुढ़िया से ही खरीद लूँ? उन्होंने बुढ़िया से पूछा, “माई जामुन कैसे दिए।” बुढ़िया बोली, “बाबूजी 40 रूपये किलो।” शर्माजी बोले, “माई 30 रूपये दूंगा।” बुढ़िया ने कहा, “35 रूपये दे देना। दो पैसे मैं भी कमा लूंगी।” शर्मा जी बोले, “30 रूपये लेने हैं तो बोलो। बुझे चेहरे से बुढ़िया ने "न" में गर्दन हिला दी। शर्माजी बिना कुछ कहे चल पड़े और राम आसरे फ्रूट भण्डार पर आकर जामुन का भाव पूछा तो वह बोला 50 रूपये किलो हैं। बाबूजी कितने दूँ? शर्माजी बोले, “5 साल से फल तुमसे ही ले रहा हूँ। ठीक भाव लगाओ। तो उसने सामने लगे बोर्ड की ओर इशारा कर दिया।” बोर्ड पर लिखा था - मोल भाव करने वाले माफ़ करें। शर्माजी को उसका यह व्यवहार बहुत बुरा लगा। उन्होंने कुछ सोचकर स्कूटर को वापस ऑफिस की ओर मोड़ दिया। सोचते सोचते वह बुढ़िया के पास पहुँच गए। बुढ़िया ने उन्हें पहचान लिया और बोली, “बाबूजी जामुन दे दूँ। पर भाव 35 रूपये से कम नही लगाउंगी।” शर्माजी ने मुस्कुराकर कहा, “माई एक नही दो किलो दे दो और भाव की चिंता मत करो। अब बुढ़िया का चेहरा ख़ुशी से दमकने लगा। जामुन देते हुए बोली, “बाबूजी मेरे पास थैली नही है।” फिर बोली, “एक टाइम था जब मेरा आदमी जिन्दा था। तो मेरी भी छोटी सी दुकान थी।” सब्ज़ी, फल सब बिकता था उस पर। आदमी की बीमारी मे दुकान चली गयी। आदमी भी नही रहा। अब खाने के भी लाले पड़े हैं। किसी तरह पेट पाल रही हूँ। कोई औलाद भी नही है। जिसकी ओर मदद के लिए देखूं। इतना कहते-कहते बुढ़िया रुआंसी हो गयी और उसकी आंखों मे आंसू आ गए। शर्माजी ने 100 रूपये का नोट बुढ़िया को दिया तो वो बोली बाबूजी मेरे पास छुट्टे नही हैं। शर्माजी बोले माई चिंता मत करो, रख लो। अब मैं तुमसे ही फल खरीदूंगा और कल मैं तुम्हें 1000 रूपये दूंगा। धीरे-धीरे चुका देना और परसों से बेचने के लिए मंडी से दूसरे फल भी ले आना। बुढ़िया कुछ कह पाती उसके पहले ही शर्माजी घर की ओर रवाना हो गए। घर पहुंचकर उन्होंने पत्नी से कहा, “न जाने क्यों हम हमेशा मुश्किल से पेट पालने वाले। थड़ी लगा कर सामान बेचने वालों से मोल भाव करते हैं। किन्तु बड़ी दुकानों पर मुंह मांगे पैसे दे आते है। शायद हमारी मानसिकता ही बिगड़ गयी है। गुणवत्ता के स्थान पर हम चकाचौंध पर अधिक ध्यान देने लगे हैं। अगले दिन शर्माजी ने बुढ़िया को 500 रूपये देते हुए कहा, “माई लौटाने की चिंता मत करना।जो फल खरीदूंगा उनकी कीमत से ही चुक जाएंगे। जब शर्माजी ने ऑफिस मे ये किस्सा बताया तो सबने बुढ़िया से ही फल खरीदना प्रारम्भ कर दिया। तीन महीने बाद ऑफिस के लोगों ने स्टाफ क्लब की ओर से बुढ़िया को एक हाथ ठेला भेंट कर दिया। बुढ़िया अब बहुत खुश है। उचित खान पान के कारण उसका स्वास्थ्य भी पहले से बहुत अच्छा है। हर दिन शर्माजी और ऑफिस के दूसरे लोगों को दुआ देती नही थकती। शर्माजी के मन में भी अपनी बदली सोच और एक असहाय निर्बल महिला की सहायता करने की संतुष्टि का भाव रहता है। जीवन मे किसी बेसहारा की मदद करके देखो। अपनी पूरी जिंदगी में किये गए सभी कार्यों से ज्यादा संतोष मिलेगा। *****
- आपके लिए
समीक्षा सिंह मंजिल तक जो जाती ना हों उन राहों पर जाना क्या। अनजाने लोगों को जग में अपना दर्द सुनाना क्या। चाहे कुछ भी मिल न सके पर कोई काश न बाकी हो। दिल तो दिल है दिलवालों का जीना क्या मर जाना क्या। वो जायें तो जाने देना जिनको अपनी चाह नहीं। जिनके दिल में गैर बसे हों उनको भी अपनाना क्या। कोशिश पूरी कर न सके तो दोष किसी को देना क्या। मंजिल हो ना हो हाँसिल पर रस्तों पर पछताना क्या। गैरों की महफ़िल में अक्सर अपने पाए जाते हैं। लेकिन अपनी महफ़िल में गैरों के गीत सुनाना क्या। जो भी हो मंज़ूर हमें सब आप सजा तो बतलायें। जान तुम्हें ‘सिंह’ सौंप चुके तो कोई और बहाना क्या। *****
- अपने तो अपने होते हैं…
डॉ. पारुल अग्रवाल ज्योति और उसका पति सजल दोनों एम.एन.सी. में काम करते हैं और उनका एक साल का बेटा है। पर ज्योति को करीब पंद्रह दिन से वो काफ़ी सुस्त लगने लगा था। बच्चे को उनके पीछे देखने के लिए एक बारह घंटे की काम वाली रजनी है। अभी एक महीने से ही ज्योति ने अपनी नौकरी दोबारा शुरू की है। जिससे वो ऑफिस में भी बीच-बीच में बच्चे को देख सकें इस वजह से घर में सीसीटीवी लगवाया। सीसीटीवी कामवाली की अनुपस्थिति में लगवाया था। अगले दिन ज्योति ऑफिस में जैसे ही अपने बेटे की झलक देखने के लिए बैठी तो उसने देखा तेज़ आवाज़ में टीवी चल रहा है। कामवाली का पति और सास भी घर पर ही थे। पति आराम से एसी चलाकर लेटा था। सास भी आराम से खा पी रही थी। बेटा रो रहा था तो उसको कुछ खिलाने-पिलाने की जगह उसको कुछ सुंघाकर सुलाने की तैयारी थी। ये सब देखकर उससे रहा नहीं गया उसने तुरंत पति को भी फोन करके घर चलने के लिए कहा। रजनी को शक न हो इसलिए ज्योति ने घर पर बच्चे के लिए फोन किया और ये दिखाया कि वो शाम तक ही घर पहुंचेगी। रजनी पूरी तरह निश्चिंत थी। उसका पति और सास अभी घर पर ही थे। जैसे ही ज्योति और उसके पति ने अपनी चाबी से घर का दरवाज़ा खोला वो हैरान रह गई। सीसीटीवी से तो वो अनजान थे। रजनी ने झूठ बोलने की पूरी कोशिश की और कहा उसके सास और पति को कुछ काम था इसलिए वो आए हैं। जब ज्योति ने थोड़ा सख्ती से पुलिस की धमकी दी तब उसने बताया कि ये सब पंद्रह दिन से चल रहा है और बच्चे को वो हल्की मात्रा में अफ़ीम देकर सुला देते थे। ये सब सुनकर ज्योति के तो पैरों तले ज़मीन खिसक गई। उसने रजनी और उसके घरवालों को धक्के देकर निकाल दिया। अब ज्योति बहुत देर तक अपने बेटे को सीने से लगाकर फफक कर रोती रही। आज वो अपनी सास को अपने साथ ना रखकर गांव भेजने के निर्णय पर आठ-आठ आँसू रो रही थी। उसको याद आ रहा था कैसे, उसके बेटे के पैदा होने से कुछ समय पहले आकर उसकी सास ने सब संभाल लिया था, पर ज्योति को तो उनका कुछ भी कहना-सुनना अपने ऊपर नियंत्रण लगता था। तभी तो बेटे के छः महीने होते-होते उसने बच्चे को रखने वाली कामवाली को ढूंढना शुरू कर दिया था। आज उसे पता चल रहा था कि एक बच्चा अपने दादा-दादी के साथ जितना सुरक्षित है उतना किसी के साथ नहीं। सजल ने भी उसको बहुत समझाया था पर उसने एक ना सुनी थी। बेटे के लिए ज्योति ने नौकरी छोड़ने का फैसला लिया क्योंकि अब सास को वापस बुलाने की उसकी हिम्मत नहीं हो रही थी। पर सजल ने चुपचाप उन्हें सब कुछ फोन पर बता दिया था। अगले दिन सुबह-सुबह घंटी बजी तो ज्योति ने देखा, सामने उसकी सास थी। ज्योति उनके चरणों में झुक गई। वो उसे गले लगाती हुई बोली बेटा तैयार हो जा नहीं तो ऑफिस के लिए देर हो जायेगी, वैसे भी अपने तो अपने होते हैं। *******
- जग का मेला
सत्येंद्र तिवारी जग का मेला लगा रहेगा लगा रहेगा आना-जाना यही सत्य हमने पहचाना। ठगे गए सब इस मेले में, जाने कौन यहां ठगता है सब को ठगने वाला अपना, सच में बहुत सगा लगता है चाहत बार-बार कहती है, ठगने वाले रूप दिखाना सब में रहकर क्यों अनजाना। यही सत्य हमने,......... है कच्चा धागा संबंधों का, सपने जैसे अनुबंधों का मायावी यह जादू-टोना, तन-माटी सोंधी गंधों का जगत में अनुरागी प्रकृति के, अनुरागों का रूप सयाना सीखा नव खिलवाड़ बनाना। यही सत्य हमने.......... मात-पिता संतान सहोदर, पंचतत्वों से मिली धरोहर-को, केवल अभिनय करना है बजे सांस की जब तक मउहर जगत-रंगमंच पर पर्दा, उसे उठाना उसे गिराना छुपकर बदले रोज ठिकाना। यही सत्य हमने.......... *****
- ज़िन्दगी ख़ूबसूरत है।
सरला सिंह कुछ साल पहले, मेरी एक सहेली ने सिर्फ 50 साल की उम्र पार की थी। लगभग 8 दिनों बाद वह एक बीमारी से पीड़ित हो गई थी और उसकी जल्दी ही मृत्यु हो गई। ग्रुप में हमें एक शोक संदेश प्राप्त हुआ कि "दुख की बात है .. वह हमारे साथ नहीं रही।" दो महीने बाद मैंने उसके पति को फोन किया। ऐसे ही मुझे लगा कि वह बहुत परेशान होगा, क्योंकि ट्रैवल वाला जॉब था। अपनी मृत्यु तक मेरी सहेली सब कुछ देख लेती थी, घर, अपने बच्चों की शिक्षा, वृद्ध ससुराल वालों की देखभाल करना, उनकी बीमारी, रिश्तेदारों का प्रबंधन करना, सब कुछ, सब कुछ, सब कुछ। वह कहती रहती थी, "मेरे घर को मेरे समय की जरूरत है, मेरे पति चाय काफ़ी भी नहीं बना पाते, मेरे परिवार को मुझसे हर चीज के लिए जरूरत है, लेकिन कोई भी मेरे द्वारा किए गए प्रयासों की परवाह नहीं करता है और न ही मेरी सराहना करता है। सब मेरी मेहनत को नोर्मल मान के चलते हैं।" मैंने उसके पति को यह जानने के लिए फ़ोन किया कि क्या परिवार को किसी सहारे की जरूरत है। मुझे लगा कि उनके पति बहुत परेशान होंगे। अचानक से सारी ज़िम्मेदारियों को निभाना है, उम्र बढ़ने के साथ-साथ माता-पिता, बच्चे, अपनी नौकरी, इस पर अकेलापन कैसे होंगे बेचारे? फोन कुछ समय के लिए बजा, नही उठाया। एक घंटे के बाद उन्होंने वापस कॉल किया। उसने माफी मांगी कि वह मेरे कॉल का जवाब नहीं दे पाए। क्यूँकि अपने क्लब में एक घंटे के लिए टेनिस खेलना शुरू किया था और दोस्तों से मिलना वग़ैरह भी। यह सुनिश्चित करने के लिए कि उनका समय ठीक से गुजर जाए। यहां तक कि उन्होंने पुणे में स्थानांतरण करवा लिया। इसलिए अब ट्रैवल नही करना पड़ता। "घर पर सब ठीक है?" मैंने पूछा; उन्होंने जवाब दिया, एक रसोइया रख लिया है। थोड़ा और पेमेंट किया तो वह किराने का सामान और सब्ज़ी फल वग़ैरह भी ला देगा। उन्होंने अपने बूढ़े माता-पिता के लिए फ़ुल टाइम केयर-टेकर रख ली थी। "ठीक चल रहा है, बच्चे भी ठीक हैं। जीवन धीरे-धीरे सामान्य स्थिति में लौट रहा है” उन्होंने कहा। मैं मुश्किल से एक-दो वाक्य बोल पायी और हमारी बात पूरी हो गयी। मेरी आंखों में आंसू आ गए। मेरी सहेली मेरे ख्यालों में आ रही थी। उसने अपनी सास की छोटी सी बीमारी के लिए हमारे स्कूल के जॉब को छोड़ दिया था। वो अपनी भतीजी की शादी में नही गयी क्योंकि उसको अपने घर में मरम्मत के काम की देखरेख करनी थी। वह कई मजेदार पार्टियों और फिल्मों से चूक गई थी क्योंकि उसके बच्चों की परीक्षा थी और उसे खाना बनाना था। उसे अपने पति की जरूरतों का ख्याल रखना था। उसने हमेशा कुछ प्रशंसा और कुछ पहचान की तलाश की थी। जो उसे कभी नहीं मिली। आज मुझे यहां कुछ कहने का मन हो रहा है। यह दुनिया बड़ी निष्ठुर है। यह आपके जाने के बाद कुछ समय तक आपको याद रखती है और उसके बाद भुला देती है। यह सिर्फ हमारे दिमाग का भ्रम है कि हमारे बाद हमारे परिवार का क्या होगा। मन का यह वहम हटा दो कि मैं अपरिहार्य हूं और मेरे बिना घर नहीं चलेगा। अतः सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अपने आप के लिए समय निकालें। अपने दोस्तों के साथ संपर्क में रहें। बात करें, हंसें और आनंद लें। अपने शौक़ पूरे करो, अपने जुनून को जियो, अपनी जिंदगी को जिओ। हर किसी को आपकी ज़रूरत है, लेकिन आपको भी अपनी देखभाल और प्यार की ज़रूरत है। हम सभी के पास जीने के लिए केवल एक ही जीवन है। *****
- लाल चूड़ियाँ
सुनीता पाण्डेय शाम हो चली थी। मैं चाय बना कर अपनी बालकनी में इत्मिनान से चाय पी रही थी। जो कि मेरी पसंदीदा शांत जगह है। कुछ फूलों के पौधे लगाए हुए थे और उनसे आती खूशबू वातावरण को सुगंधित बना रही थी। अचानक मेरी नज़र सामने के फ्लैट पर गई जो काफी समय से खाली था। वो फ्लैट हमारे फ्लैट से साफ-साफ दिखाई देता था, क्योकि बिल्डिंग की दूरी ज़्यादा नही थी। परदे अगर ना हो तो खिड़की से पूरा घर देख सकते है। उस बिल्डिंग के तीन कमरे दिखाई देते थे। एक हॉल, बीच का किचन और एक रूम मैं कभी गई नही उस बिल्डिंग में लेकिन देखने से लगता था, 2bhk ही होगा। उसमें कुछ हलचल दिखाई दी। मैने सोचा काफी दिनों से बंद है। सफाई करने आये होंगे। मैंने ज़्यादा ध्यान नही दिया और चाय पी कर अपने कामों में लग गई। अगला दिन वही सुबह के कामों में निकल गया। शाम मैं चाय पीने फिर बालकनी में आ गई। मेरी नज़र सामने गई तो कुछ सामान दिखा। कोई शिफ्ट हुआ होगा तभी किचन में एक 23, 24 साल की लड़की दिखाई दी। सूट पहने हुए, मांग में सिंदूर, हाथों में चूड़ियां वो हँस-हँस कर पास में खड़ी एक महिला से बात कर रही थी। तभी मेरे कानों में आवाज़ पड़ी भाभी इधर आना मुझे हेल्प चाहिए। मेरी नज़र हॉल की तरफ गई जहाँ एक लड़का जो कि उसकी ही उम्र का होगा कुछ सरकने की कोशिश कर रहा था। वो लड़की उस महिला को कुछ बोल कर हॉल में आ गई और उस लड़के की मदद करने लगी। मुझे अच्छा तो नही लग रहा था लेकिन नज़र चली ही जा रही थी उस तरफ। तभी एक और लड़का सामने के दरवाज़े से आता दिखाई दिया। जो शायद उस लड़की का पति होगा। उसके हाथ मे बैग था। परदे न होने की वजह से मुझे सब दिखाई दे रहा था। अब मुझे अच्छा नही लगा रहा था और मेरी चाय भी खत्म हो गई थी। मैं वापस आ कर अपने कामों में लग गई। सुबह पौधों को पानी डालने लगी तो फिर सामने की तरफ नज़र उठ गई। वह सब चाय पीते हुए और आजू बाजू देखते हुए बातें कर रहे थे। मैं भी पानी डाल कर वापस आ गई। शाम को चाय पीने फिर मैं वही जाकर बैठ गई। सामने घर में परदे लग गए थे। बस किचन में काम करते वो लड़की और महिला दिख रहे थे। प्यारा सा परिवार है देख कर अच्छा लगा। एक माँ, दो बेटे और प्यारी सी बहू जो दिन भर इधर-उधर तितली की तरह उड़ती फिरती थी। उन सबके हँसने की आवाज़ें मेरे घर तक आ ही जाती थी। एक साल बीत गया समय पंख लग कर उड़ गया। एक दोपहर मैं अपना सब काम कर के बैठी ही थी कि कही से रोने की आवाज़ आई। मैं उठ कर देखने लगी कि कहाँ से ये आवाज़ आ रही है। देखा तो बालकनी की तरफ से आवाज़ आ रही थी। मैने खिड़की के पर्दा ज़रा सा सरकाया तो देखा सामने वाले घर के परदे खुले हुए हैं और काफी लोगो की भीड़ है। मेरा मन एक पल को बैठ गया कि क्या हुआ होगा। कहीं वो महिला, इतना सोच कर मैंने अपने दोनों हाथों को जोड़ने के लिए जैसे ही उठाये वो महिला रोती हुई दिखाई दी जो की उसके बेटे से लिपट कर ज़ोर-ज़ोर से रो रही थी। मैं एक दम से शॉक में आ गई कि हुआ क्या। वो लड़का भी रोये जा रहा था। तभी मेरी नज़र कोने में खड़ी उस लड़की पर गई जो एक दम सुन्न दिख रहीं थी और एक महिला उसको गले से लगाये रो रही थी। उफ़्फ़ मेरा तो दिल वही का वही जम सा गया। मेरी समझ में सब कुछ आ गया कि उस घर का बड़ा बेटा। सोच के ही मेरी हालत खराब हो गई। मैं धम्म से पलंग पर बैठ गई। कोई रिश्ता नही फिर भी पता नही मुझे उस बच्ची का ख़याल बार-बार आ रहा था। उससे जुड़ाव से महसूस कर रही थी मैं। लग रहा था कि अभी दौड़ कर जाऊँ और उसको गले से लगा लूँ। मेरी पलके भीग गई और आँसू अपने आप बहने लगे। अब क्या ही कर सकते है जो होने था हो गया। मेरी हिम्मत ही नही हुई कि मैं कुछ देख सकूँ। रोने की आवाज़ बराबर आ रही थी और मेरे आंखों से ऑंसू बहे जा रहे थे। उस बच्ची का हँसता खेलता चेहरा मेरे सामने बार-बार आ रहा था। शाम हो चली थी और रोने की आवाज़ भी नही आ रही मुझे समझ मे आ गया कि ले गए होंगे उसको। आज मेरा चाय पीना का भी मन नही किया। शाम से रात हो गई और फिर सुबह मेरी हिम्मत ही नही हुई बालकनी में जाने की। लोगों से पता चला कि एक्सीडेंट हुआ था और वही डेथ हो गई। अगले दिन पौधों को पानी डालने के लिए मैं बालकनी में गई तो नज़र सामने वाले घर पर गई। सब कुछ शांत था, कोई नही दीखा मुझे। तभी किचन में वो बच्ची दिखाई दी। मैं उसे देख कर दंग रह गई 24 घंटे भी नही हुए थे। उसका चेहरा बिल्कुल पीला पड़ गया था, आँखें सूजी हुई और एक दम बेजान लग रही थी। पानी पी कर वो वापस चली गई। मेरी पलकें भीग गई उसे ऐसा देख कर। मैं भारी मन से अपने कामों में लग गई। दिन बीत गए तीजे की बैठक, दसवीं तेहरवीं सब हो गई। अब कोई दिखाई भी नही देता था और ना कोई आवाज़ सुनाई देती। मैं भी चुप चाप पहले की तरह चाय पीती और आकर अपने काम करती। वो बच्ची मुझे काफ़ी दिनों तक दिखाई नही दी। एक दिन ज़ोर की आवाज़ से मेरी नींद टूटी गई। मैने देखा तो कोई बोल रहा था। इससे कहो, अपने माँ-बाप के पास चली जाए। जो इसको शादी कर के लाया था वो तो रहा नही तो अब ये क्या करेगी। मैं इसका चेहरा देखना ही नही चाहती और रोने लगी। मम्मी, तभी दूसरी आवाज़ सुनाई दी। भैया चले गए तो इसमें इनका क्या कुसूर है। इन्होंने भी तो अपना पति खोया है। देखो ज़रा इनकी तरफ डेढ़ साल ही तो हुआ था। आप सोचो इनको कैसा लगता होगा? और ये इनका भी घर है ये कही नही जाएंगी। तू मुझसे ऊंची आवाज में बात कर रहा है और वो भी इसके लिए जो तेरे भैया को खा गई। वो महिला फिर ज़ोर से बोली। मम्मी, फिर से वो ज़ोर से बोला बस हो गया। अब एक शब्द और नही। वो अपनी बालकनी में गया और वो लड़की भी। मैंने देखा दोनों चुपचाप एक एक कोना पकड़ कर खड़े थे। मैं अंदर आ गई। अब ये रोज़ का हो गया। वो महिला किसी न किसी बात को लेकर उस बच्ची को सुनाती। 6 महीने गुज़र गए वो लड़का जॉब करने लगा। उस बच्ची में ग़ज़ब का संयम था। कुछ नही कहती, ना उसकी आवाज़ आती। बस किचन में काम करती दिखाई देती और घर के और काम। मुस्कुराहट उसके चेहरे से गायब हो गई थी और अजीब सा पीला पन उसके चेहरे पर आ गया था। भगवान भी क्या-क्या कर देते हैं फूल सी बच्ची एक दम पत्थर बन गई। उसे देख कर मेरी पलकें भीग जाया करती थी। पूरा साल बीत गया। यही सिलसिला चलता रहा। वो महिला उस पर सारे दिन गुस्सा करती और वो बच्ची बस सिर झुकाए काम करती रहती। एक दिन शाम को चिल्लाने की आवाज़ आई। बस हो गया मम्मी बहुत सुना लिया आपने और बहुत सुन लिया इन्होंने। आपको इनसे परेशानी क्या है। ये सब काम करती है जैसा रख रही हो वैसे रह रही है। कभी देखा इनके चेहरे की तरफ क्या से क्या हो गया है। पहले तो आप इनको इतना प्यार करती थी। दिन भर हँसी मज़ाक कितनी तारीफ करती थी। एक पल भी नही रहती थी आप इनके बिना। अब क्या हो गया? भैया चले गए तो इनकी क्या गलती। हाथ जोड़ता हूँ मैं आपके जीने दो इनको प्लीज। वरना ये यू ही घुट-घुट कर मर जाएंगी। इतना कुछ साफ-साफ सुनाई दे रहा था मुझे। बहुत अच्छा लगा मुझे कि उस बच्ची का साथ देने को कोई तो है। उस दिन के बाद कोई आवाज़ सुनाई नही दी मुझे। शाम मैं रोज़ ही चाय पीने बालकनी में आती लेकिन कुछ सुनने को नही मिला। मैंने मन में सोचा बहुत अच्छी सोच का लड़का है बहुत अच्छे से समझा दिया अपनी मम्मी को। समय बीत गया एक दिन मैने देखा कि सामने वाले घरके परदे खुले हुए है। रोशनी लगाई जा रही है। खूब चहल-पहल हो रही है। घर मे डेकोरेशन का काम हो रहा है। किचन में वो महिला किसी को कुछ बता रही है और बहुत खुश भी है। समझते देर नही लगी कि शादी होगा बेटे की। ऐसा डेकोरेशन शादी में ही होता है। मैं भी खुश थी। मेरे दिल से उस बच्चे के लिए दुआएं निकली अपनी चाय खत्म कर के अपने कामो में लग गई। खूब शोर शराबा हो रहा था। गाने की आवाज़े आ रही थी। शायद रात भर ऐसा ही चलेगा। मैं भी काम निबटा कर सो गई। सुबह कुछ मंत्रों की आवाज़ सुनाई दी। मैने अपना पर्दा हटा कर देखा तो सामने वाले घर मे पूजा चल रही थी। शादी हो गई होगी। मैं सोच कर मुस्कुरा दी। तभी मुझे वो लड़का दिखाई दिया। जो पंडित के सामने आ कर बैठ गया। मेरे दिल से उसके लिए दुआएं निकली खुश रहो हमेशा। तभी मेरी नज़र आती हुई लड़की पर पड़ी। मेरा मुँह खुला रह गया। वो वही बच्ची थी मांग में सिंदूर, माथे पर बिंदिया, हाथों में चूड़ियाँ लाल रंग की साड़ी। उसके चेहरे पर हल्की सी मुस्कुराहट थी। वो महिला उसको उस लड़के के पास बैठा रही थी। मेरी आँखों मे आँसू छलक आये। जैसे वो मेरी बच्ची हो। मेरे होंठों पर मुस्कुराहट आ गई। एक अजीब सा सुकून दिल को मिला जैसे ना जाने कितने दिनों से सूखी धरती को बारिश के पानी ने भिगो दिया हो। मेरी आँखों से आंसू रुकने का नाम ही नही ले रहे थे और दिल हज़ारो दुआएं दिए जा रहा था। *****
- औलाद वाले
डॉ. कृष्णकांत श्रीवास्तव रास्ते में एक खंभे की लाइट जल रही थी। उस खंभे के ठीक नीचे एक 15 से 16 साल की लड़की पुराने फटे कपड़े में डरी सहमी सी अपने आँसू पोछते हुए खड़ी थी। जैसे ही उस बुजुर्ग की नजर उस लड़की पर पड़ी वह रूक सा गया। लड़की शायद उजाले की चाह में लाइट के खंभे से लगभग चिपकी हुई सी थी। वह बुजुर्ग उसके करीब गया और उससे लड़खड़ाती जबान से पूछा तेरा नाम क्या है। तू कौन है और इतनी रात को यहाँ क्या कर रही है? लड़की चुपचाप डरी सहमी नजरों से दूर किसी को देखे जा रही थी। उस बुजुर्ग ने जब उस तरफ देखा जहाँ लड़की देख रही थी तो वहाँ चार लड़के उस लड़की को घूर रहे थे। उनमें से एक को वो बुजुर्ग जानता था। लड़का उस बुजुर्ग को देखकर झेप गया और अपने साथियों के साथ वहाँ से चला गया। लड़की उस शराब के नशे में बुजुर्ग से भी सशंकित थी फिर भी उसने हिम्मत करके बताया। मेरा नाम रूपा है। मैं अनाथाश्रम से भाग आई हूँ। वो लोग मुझे आज रात के लिए कहीं भेजने वाले थे। दबी जुबान से बड़ी मुश्किल से वो कह पाई। बुजुर्ग:- क्या बात करती है, तू अब कहाँ जाएगी। लड़की:- नहीं मालूम। बुजुर्ग:- मेरे घर चलेगी? लड़की मन ही मन सोच रही थी कि ये शराब के नशे में है और आधी रात का समय है। ऊपर से ये शरीफ भी नहीं लगता है, और भी कई सवाल उसके मन में धमाचौकड़ी मचाए हुए थे। बुजुर्ग:- अब आखिरी बार पूछता हूँ मेरे घर चलोगी हमेशा के लिए? बदनसीबी को अपना मुकद्दर मान बैठी गहरे घुप्प अँधेरे से घबराई हुई सबकुछ भगवान के भरोसे छोड़कर लड़की ने दबी कुचली जुबान से कहा जी हाँ। उस बुजुर्ग ने झट से लड़की का हाथ कसकर पकड़ा और तेज कदमों से लगभग उसे घसीटते हुए अपने घर की तरफ बढ़ चला। वो नशे में इतना धुत था कि अच्छे से चल भी नहीं पा रहा था। किसी तरह लड़खड़ाता हुआ अपने मिट्टी से बने कच्चे घर तक पहुँचा और कुंडी खटखटाई थोड़ी ही देर में उसकी पत्नी ने दरवाजा खोला। पत्नी कुछ बोल पाती कि उससे पहले ही उस बुजुर्ग ने कहा ये लो सम्भालो इसको "बेटी लेकर आया हूँ हमारे लिए।" अब हम बाँझ नहीं कहलाएंगे आज से हम भी औलाद वाले हो गए। पत्नी की आँखों से खुशी के आँसू बहने लगे और उसने उस लड़की को अपने सीने से लगा लिया। *****
- अल्बर्ट का ढाबा
शीला पाण्डेय क्लास में सभी बच्चों ने फ़ीस जिसे विद्यालय विकास निधि कहते हैं, दे दिया था, सिर्फ़ अल्बर्ट पाल को छोड़ कर। अल्बर्ट फ़ीस लाए हो? अल्बर्ट ना में सिर हिलाता। देखो कल ज़रूर लाना। तुम्हारे वजह से हम रजिस्टर क्लोज़ नहीं कर पा रहें हैं। मालूम है न नाम कट जाने के बाद बहुत मुश्किल होती है फिर से नाम लिखवाने में, फार्म भरना पड़ेगा। अल्बर्ट हाँ में सर हिलाता। क्लास में घुसते ही मैंने पूछा - अल्बर्ट फ़ीस लाए हो? अल्बर्ट ना में सर हिलाया। ऐसे भी बोलता कम था। अल्बर्ट क्यों नहीं लाए? माँ ने नहीं दिया। विजय श्री अचानक बोल पड़ी - मैम ये पिछले क्लास में भी नहीं देता था। अनुका बनर्जी मैडम ने पूरे साल का फ़ीस अल्बर्ट का खुद दिया। अच्छा, ये तुमने पहले क्यों नहीं बताया। मुझे तो इस बारे में कुछ भी नहीं पता। ओह, अच्छा, चलो पता करती हूँ, कारण क्या है? जब अनुका से पूछा तो मालूम हुआ कि उसके पिता को नौकरी से निकाल दिया गया है। वह दिन भर शराब पीकर पड़ा रहता था। फ़िलहाल मैंने अल्बर्ट के फ़ीस दे दिए। कहा कि किसी चीज़ की कमी हो तो मेरे पास आना। एक दिन अल्बर्ट आया कि मैम जूते फट गए हैं। मैंने कहा कि इस पेड़ पर से बीस कटहल तोड़ कर कैंप के पीछे गेट पर जाकर बेच दो। इस तरह कटहल का भी उपयोग हो जाएगा और तुम्हारा काम भी हो जाएगा। अल्बर्ट अपना एक दोस्त लेकर आया और कटहल तोड़कर ले गया। दूसरे दिन अल्बर्ट ने चहक-चहक कर बताया कि उसे दो सौ रूपये मिले। मैंने कहा - आज जाकर जूता-मोज़ा और एक नया शर्ट ले लेना। मैंने उसे पचास रूपये और दिए। उसी शाम अल्बर्ट फिर आया। नया जूता-मोज़ा और शर्ट पहन कर। देखकर मन प्रसन्न हो गया। वह मेरे पचास रूपये वापस देने लगा कि मैम दो सौ में ही सब आ गया। मैंने कहा इसे रख लो, काँपी-पेंसिल की ज़रूरत हो तो ख़रीद लेना। वह ख़ूब परिश्रमी छात्र था। उसके काले चेहरे पर एक ग़ज़ब का नूर टपकता था। पूरा साल बीत गया। अल्बर्ट कक्षा छह में पहुँच गया। हमारे पतिदेव का तबादला कोलकाता हो गया और मैं भी कोलकाता के काशीपूर विद्यालय में आ गई। कई वर्ष बीत गए। मेरे पतिदेव को बाई रोड सफ़र करने का बड़ा शौक़ है। कार वे स्वयं चलाते हैं। एक बार हम झारखंड से गुजर रहे थे तो एक ढाबे में चाय पीने रूके। देखा ढाबे का मालिक उठकर मेरी बड़ी आवभगत कर रहा है। आलमारी से चाय की कप निकाली गई। टेबल कई बार पोंछा गया। चाय बहुत ही अच्छी थी, फिर दूसरी बार मंगायी गई। मैं पैसा देने काउन्टर पर पहुँची तो मालिक ने पैसा लेने से इंकार कर दिया। बोला आपसे पैसा लेकर पाप नहीं करूँगा। आपके आशीर्वाद से बड़ा आदमी बन गया हूँ। मेरे दो-दो तीन स्टार होटल हैं। मैंने शुरुआत इस ढाबे से किया था इसलिए यहाँ बैठता हूँ। लेकिन मैं तुम्हें पहचान नहीं रही हूँ, तुम कौन हो भाई? मालिक बोला - पहचानना तो आपको ही पड़ेगा मैम। मैं आपको सिर्फ़ एक क्लू दे सकता हूँ। वो है - दुर्गापुर। अल्बर्ट, बेटा, तुम्हें देखकर बहुत ख़ुशी हुई। मेरे पतिदेव आवाज़ दे रहे थे - चलो देर मत करो। मैं गाड़ी में बैठ गई तो अल्बर्ट मिठाई का बड़ा पैकेट गाड़ी में रख दिया। कई बार हाथ जोड़कर प्रणाम करता है। जब तक गाड़ी आँखों से ओझल नहीं हो गई, सड़क किनारे खड़ा हाथ हिलाता रहा। पूरे रास्ते मैं अल्बर्ट की कहानी अपने पतिदेव से सुनाती रही। ईश्वर कभी-कभी कितना सुंदर काम हम से करवाता है। प्रभु की महिमा अपार। अल्बर्ट के प्यार ने सच में मुझे ख़ास बना दिया। पटना से कोलकाता आना-जाना लगा ही रहता है। आते-जाते मैं जब भी मिलती हूँ अल्बर्ट से तो जीवन में उत्साह का नया संचार होता है। अल्बर्ट कहता हैं कि मैं हरेक व्यक्ति से जो मेरे क़रीब है उसको आपके और अनुका मैम के बारे में ज़रूर बताता हूँ। ख़ूब ख़ुश रहो अल्बर्ट। अल्बर्ट ने हमें कई दिनों तक ख़ुश रहने का शुभ शगुन दे दिया था। *****











