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  • अपनेपन की मिठास

    अनजान “मैं तो सुबह से घूम-घूम कर थक गई हूं और कितना घूमना है।” रानी ने कहा। “अरे, अभी से थक गई हो ये तो कुछ भी नहीं है। ऐसे थकोगी तो बड़े-बड़े किलों को कैसे देखोगी। ऐतिहासिक स्थलों को देखने के लिए बहुत चलना पड़ता है और सीढ़ियां भी चढ़नी पड़ती हैं।” श्याम ने कहा। “फिर भी घूमते हुए बहुत समय हो गया है। मुझे तो भूख लग रही है और प्यास भी।” “हां, तो चलो हम सभी कुछ खा लेते हैं।” जतिन ने कहा। “चलो किसी होटल में चलते हैं।” श्याम बोले। नही, ये हमारा शहर है। आज मैं आप सब को अपनी मन पसंद दुकान से कुछ अपनी पसंद की स्वादिष्ट चीजे खिलाऊंगा।” और जतिन ने एक गली की तरफ इशारा किया, चलो वहां चलते हैं। रानी ने उस पतली सी गली को देखकर ही बुरा सा मुंह बना लिया और जतिन से बोली, “चलो हम तो उस होटल में चलते हैं। वहां आराम से बैठकर कुछ अच्छा खायेंगे।” सभी सहमत हुए। होटल में बैठकर सभी ने अपनी-अपनी पसंद की चीजों का ऑर्डर दे दिया। “अरे, जतिन कहां चले गए उन्हें क्या खाना है। वो भी ऑर्डर कर देते।” परंतु जतिन वहां नहीं थे। श्याम उनको देखने होटल के बाहर चले गए। वहां उन्होंने देखा तो जतिन उसी पतली गली में एक दुकान के सामने खड़े होकर मजे से कुछ खाते हुए दिखाई दिए। श्याम वापस आ गए। तब तक सबके मनपसंद ऑर्डर टेबिल पर आ चुके थे। सब खाने में व्यस्त हो गए। खाना खाकर जब सभी होटल से बाहर आए तो जतिन जी भी वही खड़े हुए दिखाई दिए। “अरे, आप भी कुछ खा लीजिए। कहां चले गए थे आप?” रानी ने पूछा। जतिन ने डकार लेते हुए कहा मैंने भरपेट रबड़ी-इमारती और कचौड़ी समोसा खाया है वह दुकान वाला सबसे अच्छी इमारती बनाता है। मेरा तो और कहीं खाने का मन ही नहीं करता। जो भी खाओ मन तृप्त हो जाता हैं और मैं तो घर के लिए लेकर भी जाता हूं। एक पैकेट की तरफ इशारा करते हुए उन्होंने कहा। हां, वो होटल वाला भी सब चीजें अच्छी बनाता है। फूले हुए भटूरे, कुरकुरा डोसा और मजेदार चाइनीज। वाह !! क्या स्वाद है सभी चीजों में। सभी ने एक स्वर में कहा। हां, होटल वाले भी अच्छा बनाते हैं परन्तु बात आत्म संतुष्टि की है जो मुझे इसी दुकान पर मिलती है। मैंने बचपन से ही मोहन हलबाई की दुकान की रबड़ी, इमारती खाई है जो मुझे आज भी पसंद है। बहुत देर से सुन रही रानी ने कहा यह तो जतिन जी अपने शहर की अपनेपन की मिठास है जो सब जगह नहीं मिलती है। ******

  • मेरी अभिलाषा

    मोहिनी शर्मा मैं वो कल बनना नहीं चाहती, जिसमें सिर्फ शेरों शायरी की बातें हो। मैं वो आज बनना चाहती हूं, जिसमें तुम्हारी, मेरी और जीवन, की ढेरों प्यारी बातें हो। जिसमें सलीक़ा हो जीने का, थोड़ी खट्टी थोड़ी मीठी तकरार हो, मैं वो ग़ज़ल बनना चाहूँगी, जिसे तुम गाओ मेरे लिए। मैं वो बहार बनना चाहूँगी । जिसमें कुछ गुनगुनाओ तुम मेरे लिए। हर मौसम हम साथ रहे, एक खूबसूरत एहसास की तरह। मैं वो शब्द बनना चाहूँगी, जिसे तुम बोलो रोज सुबह शाम मेरे लिए। मैं वक़्त की वो याद बनना चाहती हूं, जिसे जब भी तुम पढ़ो तो मुस्कराओ मेरे लिए। मैं वो कल बनना नहीं चाहती, जिसमें सिर्फ शेरों शायरी की बातें हो। मैं वो आज बनना चाहती हूं, जिसमें तुम्हारी मेरी और जीवन की ढेरों प्यारी बातें हो। *****

  • यादें

    ओम प्रकाश तिवारी बात-बात में बात हो गई। पार उमरिया साठ हो गई।। अम्मा ने जो की बतकहियाँ। आज वही ज़ज्बात हो गई।। पिता तुम्हारे संघर्षों की। सीख मेरी सौगात हो गई।। उतने पाँव पसारे जितनी। चादर की औकात हो गई।। ऐसा प्यार मिला मित्रों का। जब चाहा बरसात हो गई।। तीन बेटियाँ रत्न स्वरूपा। मिलीं तो फिर क्या बात हो गई।। जीवन साथी साथ तुम्हारा। खुशियाँ सब खैरात हो गई।। ऋतु वसंत बन गई जिंदगी। सब कुछ रातों-रात हो गई।। *******

  • Earth

    Acharya jahan Oh ! Large heart Mother Earth. You only follow rule of Give, gave and given. We made hell out of this heaven. Robbed your beautiful green dress. Stolen your blue water pools. Hurt your body with sharp blasting tools . Oh ! Mother you are in the hands of cruel sons. Poisoned your air to suffocate. Made you thirsty, hungry and breathless. All our such acts are senseless. How long you will continue this journey. How long you will endure this agony. Robbing your health and wealth. Singing the last song of death. Oh! Mother earth They forget if mother goes. Can offspring survive. No, how hard they strive . Beware its thunder blunder. Stop changing nature's calendar. *******

  • तुम हो किंचित निकट यहीं

    तुम हो किंचित निकट यहीं महेन्द्र मुकुंन्द पिय! तुम हो किंचित निकट यहीं.......... ऐसा होता आभास मुझे। मृदु-गंध-पवन तन छू मेरा, देकर जाती विश्वास मुझे। तजि लोक-लाज, सब को विसारि, तेरी छवि में सब को भूली। सावन की शीत-समीर बही , मैं स्मृति के झूला झूली। घनघोर घटाओं का गर्जन, दामिनि दमके हिय कम्प करे, यह दिवस लगे वैरी मुझको, अब भाता नहीं उजास मुझे। पिय! तुम हो किंचित निकट यहीं......... अनुप्राणित प्राण किए तुमको, जग-बंधन तोड़ दिए मैंने। होतव्य! सुकृत-कृत-अकृत सब, हवि आहुति छोड़ दिए मैंने। छवि दरश परे यह परम-लालसा, पीर घनी देती मुझको, हृग पथराये हैं पथ देखत, छोड़े जाती हैं साँस मुझे। पिय! तुम हो किंचित निकट यहीं ...........

  • हींगवाला

    सुभद्रा कुमारी चौहान लगभग पैंतीस साल का एक खान आंगन में आकर रुक गया। हमेशा की तरह उसकी आवाज सुनाई दी – ”अम्मा… हींग लोगी?” पीठ पर बंधे हुए पीपे को खोलकर उसने नीचे रख दिया और मौलसिरी के नीचे बने हुए चबूतरे पर बैठ गया। भीतर बरामदे से नौ-दस वर्ष के एक बालक ने बाहर निकलकर उत्तर दिया – ”अभी कुछ नहीं लेना है, जाओ!” पर खान भला क्यों जाने लगा? ज़रा आराम से बैठ गया और अपने साफे के छोर से हवा करता हुआ बोला- ”अम्मा, हींग ले लो, अम्मा! हम अपने देश जाता है, बहुत दिनों में लौटेगा।” सावित्री रसोईघर से हाथ धोकर बाहर आई और बोली – “हींग तो बहुत-सी ले रखी है खान! अभी पंद्रह दिन हुए नहीं, तुमसे ही तो ली थी।” वह उसी स्वर में फिर बोला – “हेरा हींग है माँ, हमको तुम्हारे हाथ की बोहनी लगती है। एक ही तोला ले लो, पर लो ज़रूर।” इतना कहकर फौरन एक डिब्बा सावित्री के सामने सरकाते हुए कहा – “तुम और कुछ मत देखो माँ, यह हींग एक नंबर है, हम तुम्हें धोखा नहीं देगा।“ सावित्री बोली – “पर हींग लेकर करूंगी क्या? ढेर-सी तो रखी है।” खान ने कहा – “कुछ भी ले लो अम्मा! हम देने के लिए आया है, घर में पड़ी रहेगी। हम अपने देश कू जाता है। ख़ुदा जाने, कब लौटेगा?” और खान बिना उत्तर की प्रतीक्षा किए हींग तौलने लगा। इस पर सावित्री के बच्चे नाराज़ हुये। सभी बोल उठे –“मत लेना माँ, तुम कभी न लेना। ज़बरदस्ती तौले जा रहा है।” सावित्री ने किसी की बात का उत्तर न देकर, हींग की पुड़िया ले ली। पूछा – “कितने पैसे हुए खान?” “पैंतीस पैसे अम्मा!” खान ने उत्तर दिया। सावित्री ने सात पैसे तोले के भाव से पाँच तोले का दाम, पैंतीस पैसे लाकर खान को दे दिये। खान सलाम करके चला गया। पर बच्चों को माँ की यह बात अच्छी न लगी। बड़े लड़के ने कहा – “माँ, तुमने खान को वैसे ही पैंतीस पैसे दे दिये। हींग की कुछ ज़रूरत नहीं थी।” छोटा माँ से चिढ़कर बोला – “दो माँ, पैंतीस पैसे हमको भी दो। हम बिना लिए न रहेंगे।” लड़की जिसकी उम्र आठ साल की थी, बड़े गंभीर स्वर में बोली – “तुम माँ से पैसा न मांगो। वह तुम्हें न देंगी। उनका बेटा वही खान है।” सावित्री को बच्चों की बातों पर हँसी आ रही थी। उसने अपनी हँसी दबाकर बनावटी क्रोध से कहा – “चलो-चलो, बड़ी बातें बनाने लग गए हो। खाना तैयार है, खाओ।” छोटा बोला – “पहले पैसे दो। तुमने खान को दिए हैं।” सावित्री ने कहा – “खान ने पैसे के बदले में हींग दी है। तुम क्या दोगे?” छोटा बोला – “मिट्टी देंगे।” सावित्री हँस पड़ी – “अच्छा चलो, पहले खाना खा लो, फिर मैं रुपया तुड़वाकर तीनों को पैसे दूंगी।” खाना खाते-खाते हिसाब लगाया। तीनों में बराबर पैसे कैसे बंटे? छोटा कुछ पैसे कम लेने की बात पर बिगड़ पड़ा –“कभी नहीं, मैं कम पैसे नहीं लूंगा!” दोनों में मारपीट हो चुकी होती, यदि मुन्नी थोड़े कम पैसे स्वयं लेना स्वीकार न कर लेती। कई महीने बीत गये। सावित्री की सब हींग खत्म हो गई। इस बीच होली आई। होली के अवसर पर शहर में खासी मारपीट हो गई थी। सावित्री कभी-कभी सोचती, हींग वाला खान तो नहीं मार डाला गया? न जाने क्यों, उस हींग वाले खान की याद उसे प्राय: आ जाया करती थी। एक दिन सवेरे-सवेरे सावित्री उसी मौलसिरी के पेड़ के नीचे चबूतरे पर बैठी कुछ बुन रही थी। उसने सुना, उसके पति किसी से कड़े स्वर में कह रहे हैं – “क्या काम है? भीतर मत जाओ। यहाँ आओ।” उत्तर मिला – “हींग है, हेरा हींग।” और खान तब तक आंगन में सावित्री के सामने पहुँच चुका था। खान को देखते ही सावित्री ने कहा – “बहुत दिनों में आए खान! हींग तो कब की खत्म हो गई।” खान बोला – “अपने देश गया था अम्मा, परसों ही तो लौटा हूँ।” “सावित्री ने कहा – “यहाँ तो बहुत ज़ोरों का दंगा हो गया है।” खान बोला – “सुना, समझ नहीं है लड़ने वालों में।” सावित्री बोली – “खान, तुम हमारे घर चले आये। तुम्हें डर नहीं लगा?” दोनों कानों पर हाथ रखते हुए खान बोला – “ऐसी बात मत करो अम्मा। बेटे को भी क्या माँ से डर हुआ है, जो मुझे होता?” और इसके बाद ही उसने अपना डिब्बा खोला और एक छटांक हींग तोलकर सावित्री को दे दी। रेजगारी दोनों में से किसी के पास नहीं थी। खान ने कहा कि वह पैसा फिर आकर ले जायेगा। सावित्री को सलाम करके वह चला गया। `इस बार लोग दशहरा दूने उत्साह के साथ मनाने की तैयारी में थे। चार बजे शाम को माँ काली का जुलूस निकलने वाला था। पुलिस का काफ़ी प्रबंध था। सावित्री के बच्चों ने कहा – “हम भी काली का जुलूस देखने जायेंगे।” सावित्री के पति शहर से बाहर गए थे। सावित्री स्वभाव से भीरु थी। उसने बच्चों को पैसों का, खिलौनों का, सिनेमा का, न जाने कितने प्रलोभन दिए, पर बच्चे न माने, सो न माने। नौकर रामू भी जुलूस देखने को बहुत उत्सुक हो रहा था। उसने कहा – “भेज दो न माँ जी, मैं अभी दिखाकर लिए आता हूँ।” लाचार होकर सावित्री को जुलूस देखने के लिए बच्चों को बाहर भेजना पड़ा। उसने बार-बार रामू को ताकीद की कि दिन रहते ही वह बच्चों को लेकर लौट आये। बच्चों को भेजने के साथ ही सावित्री लौटने की प्रतीक्षा करने लगी। देखते-ही-देखते दिन ढल चला। अंधेरा भी बढ़ने लगा, पर बच्चे न लौटे। अब सावित्री को न भीतर चैन था, न बाहर। इतने में उसे कुछ आदमी सड़क पर भागते हुए जान पड़े। वह दौड़कर बाहर आई, पूछा – ”ऐसे भागे क्यों जा रहे हो? जुलूस तो निकल गया न।” एक आदमी बोला – “दंगा हो गया जी, बडा भारी दंगा!” सावित्री के हाथ-पैर ठंडे पड़ गये। तभी कुछ लोग तेजी से आते हुए दिखे। सावित्री ने उन्हें भी रोका। उन्होंने भी कहा – “दंगा हो गया है!” अब सावित्री क्या करे? उन्हीं में से एक से कहा – “भाई, तुम मेरे बच्चों की खबर ला दो। दो लड़के हैं, एक लड़की। मैं तुम्हें मुँह मांगा इनाम दूंगी।” एक देहाती ने जवाब दिया – “क्या हम तुम्हारे बच्चों को पहचानते हैं माँ जी?” यह कहकर वह चला गया। सावित्री सोचने लगी, सच तो है, इतनी भीड़ में भला कोई मेरे बच्चों को खोजे भी कैसे? पर अब वह भी करें, तो क्या करें? उसे रह-रहकर अपने पर क्रोध आ रहा था। आखिर उसने बच्चों को भेजा ही क्यों? वे तो बच्चे ठहरे, ज़िद तो करते ही, पर भेजना उसके हाथ की बात थी। सावित्री पागल-सी हो गई। बच्चों की मंगल-कामना के लिए उसने सभी देवी-देवता मना डाले। शोरगुल बढ़कर शांत हो गया। रात के साथ-साथ नीरवता बढ़ चली। पर उसके बच्चे लौटकर न आये। सावित्री हताश हो गई और फूट-फूटकर रोने लगी। उसी समय उसे वही चिरपरिचित स्वर सुनाई पड़ा – “अम्मा!” सावित्री दौड़कर बाहर आई उसने देखा, उसके तीनों बच्चे खान के साथ सकुशल लौट आए हैं। खान ने सावित्री को देखते ही कहा – “वक्त अच्छा नहीं हैं अम्मा! बच्चों को ऐसी भीड़-भाड़ में बाहर न भेजा करो।” बच्चे दौड़कर माँ से लिपट गये। *******

  • भीगी रातें

    ग़ज़ल भीगी रातें शालिनी श्रीवास्तव 'शानु' छोटी लंबी तारों वाली, ख़्वाबों वाली रातें, ज़ाया कर दी मैंने तुझ पर जाने कितनी रातें। तिरे हिज्र में काटी मैंने वस्ल की सारी रातें बीत रही अब यूँ ही, अध सोई, अध जागी रातें। रात अंधेरी, घुप, तन्‍्हाई और इक ख़ाली पन बस, तू क्‍या जाने कैसे कटती, मुझसे ऐसी रातें। शाने पर सिर रखके तेरे एक सुकूँ मिलता है, ख़्वाब सरीखी लगती हैं आगोश में तेरी रातें। मखमल के बिस्तर में सोने वाला क्‍या ही जाने, सीली लकड़ी, बुझता चूल्हा, पेट जलाती रातें। हाथ पकड़ बस इक दूजे का मीलों चलते जाते गीली-गीली सड़कों पर वो भीगी-भीगी रातें।

  • When shadow disappear

    Dr jahan singh 'jahan ' Sun arises. Day begins with test and trial. Night fades away. Exist dreamy land and rosy bed. Challenging day waiting ahead. Time tic tic and Sun up up. You dissolve in unknown crowd. Hello, hi, bye murmur and loud. Looking back OH! You are not alone Your shadow is with you. Rest world is strange and new. Struggle becoming long and long. Shadow becoming short and short. Shadow is wishing to leave you alone. In toughest time no one stands near. In mid noon even shadow disappear. ******

  • मैं कवि हूं …

    डॉ. जहान सिंह ‘जहान’ हां मैं कवि हूं। बिल्कुल नया हूं। अभी-अभी आया हूं। आपकी खुशी, अपना गम, प्रकृति का दर्द, जन्म का उल्लास, मृत्यु का विलाप, भूख का एहसास, वैभव की लालसा, जीवन की जिज्ञासा। ऐसा जहान अपने साथ लाया हूं। हां मैं कवि हूं। अभी-अभी आया हूं। चंद किताबों के बस्ते। कागज के लिखे कुछ दस्ते। टेबल, कुर्सी, लैंप, कलम। एक पुराने चित्रों का एल्बम। बस इतनी है मेरी पूंजी, सब पीछे छोड़ आया हूं। हां मैं कवि हूं। अभी-अभी आया हूं। प्रकृति की गोद, पहाड़ों का सफर रेत की तपती धूप, दरिया का संगीत, परिंदों की उछल कूद बस इनको साथ लाया हूं। हां मैं कवि हूं। अभी-अभी आया हूं। कभी मेरी तरह तुम भी निकलो सफर में। इस अनसुलझी जिंदगी की डगर में। चांद बनकर चांदनी, ढूंढो तारों सजी रातों में। दरिया की लहरों में खो जाओ बातों-बातों में। कभी घायल चिड़िया को पानी पिला कर देखो। उड़ते ही लौट कर तेरे पास आएगी। प्यार के उस स्पर्श को पहचान जाएगी। तपती रेत में तलासो, वो कैक्टस का फूल। जिसने तेरे इंतजार में सदियां गुजार दीं। सुनो कभी कोयल, मोर, सारस के गीत। झरनें का संगीत। पकड़ो कभी महकती हवाओं से, झूमती तितलियां। छू कर तो देखो कितनी मासूम हैं। शर्म से नजरें झुका गले लग जाएंगी। प्यार करके देखो, सभी से जीने का मकसद मिल जाएगा। बांट सको तो प्यार ही बांटो, जीवन जीना आ जाएगा। हां मैं कवि हूं। अभी-अभी आया हूं। बस यही बताने आया हूं। फिर मिलेंगे बात करेंगे। कितना बड़ा जहान है। वक्त आज इतना ही मेहरबान है। हां मैं कवि हूं। बिल्कुल नया हूं। अभी-अभी आया हूं। *****

  • शैफ

    ''तुम बहुत ही स्वादिष्ट खाना बनाती हो। लाजवाब!!'' नितिन ने खाने के बाद अपनी चचेरी छोटी बहन नीलम की पाक-कला की प्रशंसा करते हुए कहा। ''धन्यवाद भाई साहब! आप तो जानते ही हैं बचपन से ही खाना खाने और बनाने का कितना शौक है मुझे।'' - नीलम ने खुश होते हुए कहा। ''ये तो सच है। तुम खाने में जान डाल देती हो।''- नितिन ने हामी भरी। ''कोशिश करती हूँ भैया। बल्कि, आदित्य भी मुझे आजकल रसोई में मदद करने लगा है। मेरी ही तरह इसे भी बड़ा मज़ा आता है नये-नए पकवान बनाने में।"- नीलम ने अपने बेटे आदित्य की ओर इशारा करते हुए कहा। ''अरे! क्या बात कर रही हो ?'' - बड़े भैया ने आश्चर्य से पूछा ? ''हाँ भाईसाहब! सब्जियाँ साफ़ करने और काटने में, केक, इडली के घोल बनाने में, और भी कितनी ही कामों में मदद कर देता है। पिज़्ज़ा और अलग-अलग तरह के सैंडविच, कई तरह के मिल्कशेक ये सब तो खुद ही बना लेता है। जब भी कुछ बनाती हूँ तो क्या-क्या सामान और मसाले डाल रही हूँ, कितनी मात्रा में डाल रही हूँ, सब जानना चाहता है।" - नीलम ने गर्व से बताया। ''सच में? क्या ये सच है आदित्य? जो भी तुम्हारी मम्मी कह रही हैं?'' - मामाजी ने अपने दस वर्षीय भांजे की ओर देखते हुए पूछा। ''जी मामाजी!'' - आदित्य ने विनम्रता से उत्तर दिया। ''बल्कि मैं तो और भी ज्यादा सहायता करना चाहता हूँ लेकिन मम्मी नहीं चाहती कि मैं ज्यादा गैस स्टोव के आस-पास रहूं। कहती हैं बच्चों के साथ सावधानी बरतना ज़रूरी है।" ''सही कहती है तुम्हारी माँ। लेकिन ये बताओ, ये लड़का होते हुए भी तुम्हें खाना बनाने का चस्का कहाँ से लग गया? नीलम को बचपन से शौक है लेकिन हम भाइयों ने तो कभी कोई इच्छा नहीं दिखायी। और वैसे भी लड़के तो तभी ये सब करते हैं जब और कोई चारा ही न हो। जब पढ़ाई या नौकरी करते समय घर से दूर अकेले रहना पड़े तो कभी चाय-कॉफी या मैगी बना ली। बस इतना ही। बाकी खाने के लिए या तो टिफ़िन लगा लिया कहीं से या किसी होटल से मंगा लिया। और घर में तो शादी के पहले माँ और शादी के बाद पत्नी होती ही है इस सबके लिए। अरे खाना तो लड़कियां बनाती हैं।'' - नितिन ने लगभग मज़ाक बनाते हुए कहा। नीलम और आदित्य उनकी बात सुनकर दंग रह गए। नीलम सोच रही थी कि अपने शौक के बारे में मामाजी से ऐसा सुनकर आदित्य को कैसा लग रहा होगा। जवाब भी आदित्य से ही मिला। ''ठीक है मामाजी। ये बताइये - हमारे देश का सबसे प्रसिद्ध शेफ कौन है?-'' उसने बड़ी गंभीरता से मामाजी से पूछा। मामाजी ने कुछ सोचते हुए कहा - ''एस. के." एक आदमी!!, एक पुरुष!! - हैं ना, मामाजी?- आदित्य ने चहकते हुए कहा। मामाजी कुछ न बोले। अब ये बताइये, हम जहाँ भी होटल, रेस्त्रां, ढाबे आदि में खाना खाने जाते हैं, वहां क्या देखते हैं? अधिकतर वहां खाना बनाने वाले और हमें परोसने वाले कौन होते हैं? आदमी ही ना? - आदित्य ने थोड़ा गर्व से कहा इस बार। अब मामाजी आदित्य की और देखकर मुस्कुरा रहे थे। भांजा सिर्फ खाना ही नहीं, बातें बनाने में भी होशियार है। ''तो फिर ये ''खाना तो लड़कियां बनाती हैं''- वाली बात कहाँ से सच हुयी?'' - आदित्य ने थोड़ा रूककर प्रश्न किया। अपने छोटे से भांजे के मुँह से इतनी तर्कसगंत बात सुनकर मामाजी का मुँह बंद हो गया और आँखें खुल गयीं। *********

  • WE & THEY

    Avighna Gautam Life to humans, Is a beautiful destiny As for animals, We all are enemy. They live in the world Of torture, sadness and scarcity With the shortage of life and food, And its intensity. We are harming animals, As if we are loopy Live and let live, And let them be happy. Afforestation is done, To protect trees They help animals to breathe, And to escape enemies. Poachers to an animal, Is like axe to a tree If hunting is put to a halt, Animals will feel free. Love nature, And love its inventions From hunters and poachers, Animals need preventions. ********

  • घर का भेदी

    डॉ. कृष्णकांत श्रीवास्तव बहुत पुरानी बात है। एक जंगल में हरे भरे एवं बड़े-बड़े बहुत सारे वृक्ष थे। उन वृक्षों पर तरह-तरह के पंछी चहचहाते रहते थे। सभी पेड़ बड़ी खुशहाली से उस जंगल में रहते थे, क्योंकि वह जंगल बहुत घना था। जिसके कारण वहां कोई लकड़हारा नहीं आता था। काफी साल गुजर गए एक दिन उनकी खुशनुमा जिंदगी में एक लकड़हारा आ गया। उसने कहा - अगर मैं इन सब पेड़ों को काट दूंगा, तो मुझे इनसे बहुत सारी लकड़ियां मिल जाएंगी और इन्हें बेचकर मैं बहुत सारा पैसा कमा लूंगा। यह सारी बातें सुनकर पेड़ चिंतित होने लगे। उन्होंने सोचा की अब हमें कोई नहीं बचा सकता। लेकिन उसी में से एक बूढ़े पेड़ ने कहा – फिक्र मत करो! उस लकड़हारे के हाथ में जो कुल्हाड़ी है, वह बिना हत्थे की है। बिना हत्थे के वह हमारा कुछ नहीं बिगाड़ सकता है। लकड़हारे ने काफी देर तक बहुत परिश्रम किया। मगर कोई लाभ नहीं हुआ। उसने सोचा इतने मोटे-मोटे पेड़ों को कैसे काटू? मेरे पास तो कुल्हाड़ी भी बिना हत्थे की है। यही सब बातें सोच कर लकड़हारा वापिस अपने घर जाने लगा। यह देखकर सभी पेड़ कहने लगे- लकड़हारा हमारा कुछ नहीं बिगाड़ पाया। अगले दिन लकड़हारे को एक तरकीब सूझी, उसने सोचा - अगर मैं इस कुल्हाड़ी में लकड़ी का एक हत्था लगा दूं, तो मेरा काम आसान हो जाएगा। वह लकड़ी का हत्था कुल्हाड़ी में लगाकर फिर उसी जंगल में पहुंचा। सभी पेड़ लकड़हारे को फिर देख कर डर गए। क्योंकि अबकी बार उसके हाथ में जो कुल्हाड़ी थी, उसमें एक लकड़ी का हत्था लगा हुआ था। उनमें से एक पेड़ ने कहा- लगता है हम नहीं बच पाएंगे क्योंकि हमारी एक लकड़ी उसकी कुल्हाड़ी से जा मिली है। लकड़हारे ने सारे पेड़ काट डाले। लोहे की कुल्हाड़ी में लकड़ी का हत्था ना होता तो शायद पेड़ कटने से बच जाते। आखिर पेड़ की लकड़ी ही पेड़ों की दुश्मन बन गई। अगर लकड़ी की सहायता नहीं मिली होती तो लोहे की कुल्हाड़ी पेड़ को काट नहीं पाई होती। पेड़ का एक अंश लकड़ी कुल्हाड़ी से जुड़ गई थी। इसलिए उस लकड़ी ने ‘घर का भेदी लंका ढाए’ वाला काम किया। अब बेचारे पेड़ कैसे बच सकते थे? इसी प्रकार देश या समाज को अपने देश के ही गद्दारों से ज्यादा खतरा होता है। *******

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