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  • अश्लीलता

    अश्विन सिंह एक शहर में ऐसा शोर था कि अश्लील साहित्य का बहुत प्रचार हो रहा है। अखबारों में समाचार और नागरिकों के पत्र छपते कि सड़कों के किनारे खुलेआम अश्लील पुस्तकें बिक रही हैं। दस-बारह उत्साही समाज-सुधारक युवकों ने टोली बनाई और तय किया कि जहाँ भी मिलेगा हम ऐसे साहित्य को छीन लेंगे और उसकी सार्वजनिक होलीका जलाएँगे। उन्होंने एक दुकान पर छापा मारकर बीच-पच्चीस अश्लील पुस्तकें अपने क़ब्ज़े में की। प्रत्येक के पास दो या तीन किताबें थीं। युवकों के मुखिया ने कहा - आज तो देर हो गई है लेकिन कल शाम को अखबार में सूचना देकर परसों किसी सार्वजनिक स्थान में इन अश्लील पुस्तकों को जलाएँगे। प्रचार करने से दूसरे लोगों पर भी असर पड़ेगा। कल शाम को सब मेरे घर पर मिलो। इतनी सारी पुस्तकों को इकट्ठी अभी घर नहीं ले जा सकता। बीस-पच्चीस हैं। पिताजी और चाचाजी भी घर पर फिलहाल मौजूद हैं। देख लेंगे तो आफत हो जाएगी। ये दो-तीन किताबें तुम लोग प्रत्येक छिपाकर अपने घर ले जाओ। कल शाम को जरूर ले आना। दूसरे दिन शाम को सब मिले पर किताबें कोई नहीं लाया। मुखिया ने कहा - किताबें दो तो मैं इस बोरे में छिपाकर रख दूँ। फिर कल जलाने की जगह बोरा ले चलेंगे। लेकिन किताब कोई भी लाया नहीं था। एक ने कहा - कल नहीं, परसों जलाना। पढ़ तो लें। दूसरे ने कहा - अभी हम पढ़ रहे हैं। किताबों को दो-तीन बाद जला देना। अब तो किताबें जब्त ही कर लीं। उस दिन जलाने का कार्यक्रम नहीं बन सका। तीसरे दिन फिर किताबें लेकर मिलने का तय हुआ। तीसरे दिन भी कोई किताबें नहीं लाया। एक ने कहा - अरे यार, बाप के हाथ किताबें पड़ गईं। वे पढ़ रहे हैं। दूसरे ने कहा - अंकल पढ़ लें, तब ले आऊँगा। तीसरे ने कहा - भाभी उठाकर ले गई। बोली की दो-तीन दिनों में पढ़कर वापस कर दूँगी। चौथे ने कहा - अरे, पड़ोस की चाची मेरी गैरहाजिर में उठा ले गईं। पढ़ लें तो दो-तीन दिन में जला देंगे। अश्लील पुस्तकें कभी नहीं जलाई गईं। वे अब औऱ अधिक व्यवस्थित ढंग से पढ़ी जाने लगीं। यही हाल वर्तमान में हैं...सभी अश्लीलता का विरोध तो करते हैं मगर अश्लील वीडियो, रील्स और लेखों और कामुक फोटो वालों के उतने ही लाखों और करोड़ों फालोवर्स हैं। ********

  • भावात्मक स्मृति

    उनकी उंगली पकड़कर स्कूल जाना, जैसे कल की बात हो, नए खिलौनों की जिद करना और फिर पा जाना जैसे कल की बात हो, ऑफिस से लौटते ही मेला दिखाने की जिद करना और उनका मुझे मेला में ले जाना जैसे कल की बात हो, मेले में घंटों उनके कंधों पर चढ़े रहना और तमाम माँगें मानवाना जैसे कल की ही बात हो, बिना मांगे मनचाही वस्तु का पा जाना जैसे कल की बात हो, गलती क्यों ना हमारी हो फिर भी हमारे लिए उनका दूसरों से भिड़ जाना जैसे कल की बात हो, बीमारी चाहे छोटी ही क्यों ना हो उनका घंटों सिरहाने बैठना और प्यार से सिर पर हाथ फेराना जैसे कल की बात हो, पर समय का पहिया तेजी से घूमता है और खुशियां ऐसे काफूर हो जाती है कि जैसे कल की बात हो, आज उन्हीं को ठंडे फर्श पर उत्तर दक्षिण लिटाने का एहसास, बड़ा दर्द देता है अपने कंधों पर उठाकर अकेले अनंत की यात्रा पर भेजने का एहसास, बड़ा दर्द देता है पल भर में ही खुशियों की चादर का अपने ऊपर से उठा लिए जाने का एहसास, बड़ा दर्द देता है जिम्मेदारियों के आने और असुरक्षित हो जाने का एहसास, बड़ा दर्द देता है सच है पिता के साए के हट जाने का एहसास, बड़ा दर्द देता है दोस्तों, कृष्ण की मानो तो आप धन्य हैं जो कुछ सुखद पल ईश्वर ने आपको दिए हैं उन्हें आज ही जी डालो क्योंकि सुखद पदों के खोने का एहसास बड़ा दर्द देता है। सच है पिता के साए के हट जाने का एहसास, बड़ा दर्द देता है। ***********

  • कौन तार से बीनी चदरिया

    अंजना वर्मा खामोश हवा अचानक गीत पर मूंग के सुरों से झनकने लगी थी। कड़ी, चिकनी आवाज में वे सब बाहर दरवाजे पर खड़ी होकर गा रही थीं, "जच्चा रानी सोने के पलंग बिछा जा जच्चा रानी सोने के पलंग" सुशील के साथ-साथ किरण ने खिड़की की दरार से बाहर झाँका। ऐसे तो किरण समझ ही गई थी कि यह आवाज किसकी है? कौन आया होगा अभी? या कौन आ सकता है इन दिनों? देखा तो वे ही दोनों थीं खूब सजी-सँवरी और हाथों से तालियाँ बजा-बजाकर गा रही थीं। चेहरे पर पूरा श्रृंगार काजल से भरी आँखें और ललाट पर बड़ी-सी बिंदी, नाक में लौंग, कानों में लटकते हुए झुमके, गले में मोतियों की माला, माँग में सिंदूर और खूब चमक-दमक वाली सितारों जड़ी साड़ी। एक तो वही थी सुंदरी, जो कई बार शादी-ब्याह के मौके पर आकर नाच चुकी थी। बला की सुंदर थी और नाम भी था सुंदरी, लेकिन उसे बनाने वाला उस पर नर या नारी का लेबल चिपकाना भूल गया था। दूसरी साँवली नाक-नक्श की, पर साज-सज्जा वही। दोनों गाए जा रही थीं। आवाज बिना माइक के चारों ओर फैल रही थी। एक मृदंगिया उनके पास ही खड़ा मृदंग ठनका रहा था। उनका गीत कुछ देर तक चलता रहा। किरण सोच रही थी कि वह बाहर जाए न जाए। बाहर तो निकलना ही था, पर कैसे? "इतना नहीं, इतना लेंगी”वाले आक्रमण से निपटने की हिम्मत जुटा रही थी वह। खिड़की के पीछे चोर-सी छिपी हुई वह यही सोच रही थी कि उनका गाना बंद हो गया। कुछ समय के लिए फिजाँ खामोश हो गई। मियाँ-बीवी दोनों ने एक-दूसरे की ओर मुस्कुराते हुए देखा। तभी सुनाई पड़ा कड़ी आवाज में दोनों में से कोई एक बोली, "ये रानी जी! अरे बाहर तो जाओ। हम सबको पता चल गया है कि खुशियाली हुई है। चलो, नेग-निछावर निकालो। पौता खेलाए रही हो। जीए, जुग-जुग जीए।" गाने-नाचने की आवाज सुनकर किरण की बहू भी आ गई थी अपने बच्चे को गोद में लेकर और साथ में बेटा भी। दोनों के चेहरों पर हँसी थी। मनोरंजन के इस अनोखे सान से उनकी देखा-देखी कभी ही कभी हो पाती थी। उन दोनों ने भी खिड़की से झाँका। अपनी बहू से किरण ने कहा, "बच्चा लेकर न जाना बाहर। बच्चा ले लेंगी अपनी गोद में तो एक न सुनेंगी। अपनी माँग मनवाकर ही रहेँगी। और बच्चा जल्दी देंगी नहीं।" बहू की हँसती हुई मुख-मुद्रा अचानक गंभीर बन गई। फिर सुनाई पड़ा, "ये बहू जी!" किरण ने झाँका सुंदरी बोल रही थी। बोलने के बाद थोड़ी देर तक इंतजार करती रही कि कोई निकले। जब कोई न निकला, किरण और न सुशील ही, तो वह बोली, "अरी कुसुमा चल गा।" और फिर दोनों शुरू हो गई थीं। सतर्क मृदंगिया के सधे हाथ मूदंग पर फिर चलने लगे थे सुर-लहरी की छाया की तरह। उन दोनों की आवाज फिर गूँजने लगी थी, "अँगने में जसोमति ठाढ़ि हैं गोदी में कन्हैया लिहले, गोदी में कन्हैया लिहले नाये चंदा आव ना अँगनवाँ के बीच हो कन्हैया मोरा रोयेले ना।" थोड़ी देर तक सुर-ताल में गाते रहने के बाद गाना बंद हो गया था। पुकार आने लगी थी, "अरी औओ बहूजी! बाहर आओ न, काहे लुकाय रही हो? अगर नय आओगी तो हम ही आते हैं। ओ बाबूजी! बाहर आओ।" यह सुनते ही सुशील घबरा गए कि कहीं दोनों भीतर न आ जाएँ। उन्होंने सुन रखा था कि वे पुरुषों से नहीं डरती उनकी देह से लिपट जाती हैं। इसी डर से भले लोग तुरंत पैसे निकालकर दे देते हैं। सुशील बोले, "चलो, बाहर निकलो अब, नहीं तो वे भीतर आ जाएँगी।" उनके बाहर आते ही एक अजीब समाँ आ गया। वे दोनों पूरे उल्लास के साथ फिर गाने लगी थीं। स्वरों में एक ऊर्जा घुल गई थी "हमें पीर उठति है बालम हो-बालम हो बालम हो।" अजीब भंगिमा के साथ सुंदरी साड़ी फहरा-फहराकर नाचने लगी थी। दूसरी न देखने में सुंदर थी, न नाचने में ही अच्छी, फिर भी अलसाई-सी इधर-उधर हाथ फैंककर नाच रही थी, जैसे नाचने का कोई उत्साह उसके पास न बचा हो। गीत खत्म कर दोनों उस दंपति के पास आ गई थीं, "अरे! जरा बबुअवा को लाओ न! हम भी तो देखें! खेलाएँगे हम बबुआ को, आसीरबाद देंगे।" ताली बजाकर साँवली वाली ने कहा था, "अरे रानी! जीए तेरा लल्ला, जीए-लाख बरीस जीए।" सुंदरी बोली, "तो लाओ, दो हमें। पाँच हजार से कम न लेंगी।" बड़ी देर से उनका नाचना-गाना देखकर अवाक बनी हुई किरण बोली, "अच्छा-अच्छा, ठहरो! मैं लाती हूँ।" मोल-भाव का हिसाब बैठाते हुए उसने घर के भीतर से लाकर एक हजार का नोट पकड़ाया तो बात न बनी। सुंदरी ने या कुसुम ने लेने के लिए हाथ भी नहीं उठाया। सुंदरी बोली, "अरे-अरे! ये क्‍या दे रही हो?" कहकर आँखें नचाई। कुसुम ने कहा, "इतने से हम नहीं मानेंगी।" सुंदरी बोली, "तुम्हारे यहाँ खुशियाली है। चलो रानी, निकालो! हम रोज-रोज किसी के यहाँ नहीं जातीं। जब उपरवाला ऐसा दिन देता है तभी हम जाती हैं।" कुसुम बोली, "हम सबको तो तुम्हारा ही आसरा है। आजकल हम सबको कोई पूछता भी नहीं।" उसकी आवाज में दीनता घुली हुई थी। किरण ने अपने ब्लाउज में छुपाया हुआ एक वैसा ही नोट बढ़ाया। दोनों नोटों को थामते हुए सुंदरी ने कहा, "कम-से-कम एक पत्ता तो और दो।" उसका स्वर इस बार मुलायम था। उसके कहने के साथ ही कुसुम बोली, "हमारे अपने तो तुम्हीं सब हो, नाहीं त कौन है हमें देखने अउर पूछने वाला दीदी? देखो, तुम्हारे बगल में भी एक बच्चा हुआ है। उन सबने हमें कितना साड़ी-कपड़ा दिया है! पैसा भी दिया।" यह कहने के बाद वह अपनी टोकरी पर पड़ा हुआ कपड़ा हटाकर दिखाने लगी थी जिसमें नई साड़ियाँ और कपड़े रखे हुए थे। किरण थोड़ा शरमा गई भीतर-ही-भीतर। बगल वाले ने इतना दिया तो उसे भी उससे कम तो नहीं देना चाहिए। फिर कुछ खीझकर हजार का एक और नोट निकाला यह सोचते हुए कि ये जब तक मन-भर नहीं लेंगी, यहाँ से जाएँगी नहीं और तमाशा करती रहेंगी। सुंदरी ने लपककर नोट पकड़ लिया। किरण की ठुडडी पकड़कर बोली, "जीयो दीदी, जीयो। बने रहैं तुम्हरे पूत बना रहे तुम्हरा ललल्‍ला। बाबू लखिया होए। भ्रगवान दिन देवें अइसा कि हम बार-बार नार्चैं-गाए तुम्हारे दुआरे।" इस तरह असीसती हुई दोनों चली गई। मृर्दंगिया भी मृदंग लिए उनके पीछे-पीछे चला गया। रास्ते में एक जगह रुककर सुंदरी ने मृदंगिया को पैसे पकड़ाए तो उसने अपनी अलग राह पकड़ ली। पैदल चलते-चलते सुंदरी के चेहरे पर पसीने की बूँदें स्फटिक के दानों की तरह छल्छला आई। वह रुक गई और कुसुम से बोली, "का कहती हो? ऑटो ले लेवें?" कुसुम बोली, "काहै? अब थोड़ी दूर पर तो हइए है। अब निगचाने पर पड़सा काहै को जियान करें? सुस्ताय लो तनका देर।" दोनों एक पेड़ की छाया मैं बैठ गई। सुंदरी और कुसुम शहर के सीमांत पर रहती थीं। वहीं पर इनके जैसी कुछ और भी थीं जो नाच-गाकर अपना जीवन चलाती थीं। इनका न कोई लिंग था, न कोई जाति थी। सबका जीवन एक-सा था। एक-सी समस्या, एक ही जीवन-शैली। बोली, "कल जाना है माई से भेंट करने। कल सवेरे ही निकलेंगे। तुम भी चलिहो हमरा साथे।" कुसुम कुछ नहीं बोली। चुप रहने का मतलब था 'हाँ। कुसुम और सुंदरी की आपस में अच्छी 'पटती थी। दोनों दो सहेलियों की तरह, सहोदर बहनों की तरह रहती थीं। रिश्ते में रिश्ता यही एक था। थोड़ा सुस्ताने के बाद दोनों उठकर चल दी अपने बसेरे की ओर। "सुना है तुम्हारे बहिन 'पुत' की शादी हो गई?" कुसुम ने सुंदरी से कहा। "हाँ। बहिन अपनी नई-नवेली बहू को लेकर माई से मिलने आई है। उसके यहाँ शादी में माई जा नहीं सकी थी। सो उसे देखाने ले आई है। उससे मिलूँगी? पता नहीं। सोचा है शिवाला पर मिलूँ। लेकिन माई किसके साथ आएगी शिवाला पर? रेणु उसके साथ आवेगी तब तो भेंट होड़ए जाएगा। केकरो मालूम नए होना चाहिए कि हमारा माय है।" फिर ठहरकर बोली, "बहिन तो शायद ना आ सकेगी मिलने। घर में पतोहू है। कोनो कुछो कह दिया कि तुम्हारी सास की एक खोजवा बहिन है तब? ना-ना। दूर ही से भेंट करौंगी, कहीं गाँव के बाहर। माई शिवाला में आएगी जो गाँव से तनिका दूर पर है। पर आएगी किसके साथ?" इतना कहकर वह चुप हो गई जैसे कुछ सोचने लगी हो। फिर बोली, "और क्‍या करना कुसुम बेसी हिलि-मिलि के? ओ सबके दुनिया अलग है, अठर हमर सबके दुनिया अलग। हाथ-पैर, मुँह-कान मानुस के समान होके भी हम मानुस में नहीं गिनाते हैं। ऐसे अच्छा होता कि हम कोनों जनावरै जाति में जनम लेते चाहे मरद होते, चाहे मठगी। अभी हम क्या हैं? बताओ तो?" यह कहने के बाद सुंदरी ने आँखों मैं पानी भरकर कुसुम की ओर देखा। उसकी दोनों बड़ी-बड़ी आँखें भादो के उमड़े तालों की तरह लग रही थीं, जिनका पानी काँपता रहता है। कुसुम उसी तरह निर्विकार थी, चुप। कोई उत्तर उसने नहीं दिया था। एक सूखा मौन पसरा था उसके चेहरे पर वैशाख का ताप। फिर सुंदरी बोली, "ये कुसुम! हमार ई शरीर कोनो काम का है क्‍या? चइला जैसा है देह! चढ़ जाएगा अगिन पर। कुसुम! तुम पहली बार जाओगी हमरे साथ हमरे गाँव। देखना मेरा घर कड़सा है। जिसके भाग में जेतना लिखा रहता है न, ओतने मिलता है। मेरे भाग में क्या लिखा था? यही दुआरे-दुआरे नाचना। सो नाच रहे हैं। जिसके भाग में कोठा-अटारी रही, उसके मिली। हमें तो कोई जानता भी नहीं कि हम किसकी कोख से जनमे? हमारे भीतर किस स्त्री-पुरुष का खून दौड़ रहा है? हमारे महतारी-बाप कौन हैं? पर कोई तो हैं? नाहीं तो यह देह नए होती। कौन जानना चाहता है? कोई चाहेगा तो भी ओके मालूम नहीं होने दैंगे सब। आउर कया करना? क्‍यों बताना? हम भी थोड़े कहैँगे? अपने महतारी-बाप का नाम नए हँसवाएँगे। कहना हमारा काम भी नहीं। अब तो जो हैं, जहाँ हैं वही सब कुछ। वही रास्ता हमारा। हमारा रास्ता अलग है सभी से। जाए रहे हैं माय को देखने। एगो ओही से माया-ममता है।" यह कहते हुए उसने आँखें पौँछी। यह सुनकर कुसुम की आँखों से भी एक बूँद लुढ़की और गाल पर अटक गई। फिर सुंदरी बोली, "और जानती हो? अब तो मन भी नहीं होता भेंट करने का? क्‍या करना है मिलके? हमैं सब त्याग दिए, भूल गए। एक बहिन है और एक भाई। मेरे बाद पहिले बहन रेनु हुई। ओकरा बाद गोपी। दोनों मेरे घर से निकल जाने के बाद हुए। उनको बचपन में, फिर एक बार जवान होने पर देखा था। फिर अबकी बार कहीं। फिर अब। नहीं - अब शायद देखना न हो पाएगा - इसके बाद। उ, अपना घर-दुआर मैं मगन है। दुलहा, बाल-बच्चा, खेत-पथार। हमको याद रखी होगी एक खिस्सा की 'तरह...। उसको बहुतै बाद मैं, होसमंद होने पर पता चला था कि एक उसकी बहिन है जो खोजवा है।" कुसुम बोली, "ये सुंदरी! तुमको तो उहो मालूम कि तुम्हारा जनमभूमि कहाँ है? मतारी-बाप कौन है? हमें तो ओहू नय पता। हम तो जानते ही नहीं कि कौन हमरा माय-बाप है? हम कौन हि फिर थोड़ी देर चुप रहने के बाद कुसुम बोली,"जाने दे सुंदर की। हम सबको उ, सब नहीं सोचना चाहिए। हमको भी तो उसी ने बनाया जिसने मरद-मानुस बनाया, जनी-जात बनाया। काहै सोच करैँ हम? पेड़ में भी देख तो सब पेड़ों में फूल-बीज कहाँ होत है? हम भी हैं उसी तरह। लेकिन हैं तो उसी के हाथ के बनाए। वही रामजी हमें भी बनाए हैं।" कुसुम कभी-कभी उसको सुंदर की बोल देती थी। "हाँ, पर कोन सोचता है अडसे? फिर हमें सबसे अलग क्यों रखा गया जैसे अछूत हैं हम? हमें कौन गुदानता है? रास्ते चलते सब देखिकै हँस देते हैं? का हम हँसने की चीज हैं?" सुंदरी बोली। "नहीं मानेगा तो क्या हुआ? सच्चाई तो इहे है न कि हम भी भगवान के बनाए हुए हैं।" "अपना को संतोष दे ले कुसुमी। बाकी सोच के देख कि पिलुआ-पतारी में भी एक ठो मरद होत है त एगो मउगी।" दुख से उसका चेहरा तमतमा उठा। इसके बाद दोनों ही चुप हो गई। कोई शब्द न फूटा किसी के मुँह से। दूसरे दिन सवेरे-सवेरे दोनों निकल पड़ीं। उन्होंने सुबह वाली रेल पकड़ ली थी कि रेल में गाते हुए जाएँगी। रास्ते में कुछ कमाई भी हो जाएगी। एक डब्बे मैं सुंदरी चढ़ी। उसके पीछे-पीछे कुसुम भी। दरवाजे से भीतर घुसकर जब बर्थ के पास पहुँचीं तो दोनों खड़ी हो गई। उन्हें देखकर कुछ लोग मुस्कुराने लगे। औरतें शरमा गई उनके चेहरे पर पसरी पुरुष की छाया देख। पुरुषों को उनके चेहरे मैं औरतों के चेहरे की मूर्ति दिख रही थी। इन दोनों अर्धनारीश्वरों को देखकर पूरा डब्बा कौतुक के मूड मैं आ गया था। एक छिपी-छिपी मुस्कुराहट सबके चेहरे पर तैरने लगी थी। सुंदरी ने आहत होकर कुसुम की ओर देखा जैसे कहती हो, "देख - ये लोग कैसे मुस्कुरा रहे हैं!" को यह सब देखते हुए एक जमाना बीत चुका थाय क्योंकि वह उम्र में सुंदरी से काफी बड़ी थी। वह निर्विकार बनी रही। अभी तो पैसे कमाना जरूरी था। अतः सुंदरी ने एक फिल्‍मी गीत शुरू कर दिया। वह गाते हुए आगे-आगे चल रही थी। पीछे-पीछे कुसुम हाथ पसारे हुए चल रही थी। कुछ लोगों ने पैसे निकाले, परंतु कुछ कंजूस इन्हें देखकर भी अनदेखा कर रहै थे और गंभीर बने बैठे थे कि कुछ देना न पड़े। गाते-गाते उनकी यह भाव-भंगिमा देखकर सुंदरी का दिल घृणा से भर गया - संवैदनहीन। ईश्वर ने सब कुछ दिया है। सारे अंग बनाकर भी ईश्वर इन लोगों के भीतर दिल रखना भूल गया। मन तो किया कुसुम से बोले, "कुसुमी! ये जो मुँह छुपा रहे हैं, इनके आगे तो हाथ पसार मत।" लेकिन मजबूरीवश कुछ कह न पाई। वह देखती रह गई थी, कुसुम का हाथ उन पत्थरों के आगे भी पसरा हुआ था। नोट-सिक्‍्के बटोरते हुए दोनों आगे बढ़ती चली रही थीं। डिब्बे का अंत आ गया तो सुंदरी ने कुसुम से पूछा, "क्या कहती है? आगे चलें?" यह कहने के बाद उसने अपने नकली उरोजों पर आँचल डालकर उन्हें इतनी हिफाजत से ढँक लिया था कि वैसे कोई स्त्री भी न करती। ऐसे उसके नारी-रूप की बराबरी करने वाली कोई न थी। कुसुम ने कहा, "एक डिब्बा अउर देख लैं।" यह कहते हुए दोनों अगले डब्बे की ओर चलीं। कुसुम ने डब्बे मैं चढ़ते हुए कहा, "अब हम गाते हैं।" सुंदरी ने पूछा, "कौन वाला गाओगी?" कुसुम बोली, "झूठी देखी प्रीत जगत की।" सुंदरी बोली, "फिर वही गितवा। अपन गीत रख अपने पास। भजन सुनिके इहाँ कोई पइसा न टसकाएगा। इन सालन के चटकदार गीत सुनाव, नैन मटकका कर, तबही मिली पइसा। तू छोड़ दे। हम ही गाते हैं।" यह सुनकर सदा शांत रहने वाली कुसुम की भी हँसी छूट गई। बोली, "ठीक है। तो तू ही गा।" सुंदरी ने दूसरा फिल्‍मी गीत शुरू किया। कुसुम के मन मैं वह भजन गूँजता रह गया जिसे गाने का वह मन बना चुकी थी, "ऐसी देखी प्रीत जगत की" और जिसे अक्सर वह खुद के लिए गाती थी, खुद ही सुनती थी। रैल रुकी तो दोनों उतरीं और गाँव जाने वाली बस में सवार हो गई। बस मैं खलासी और ड्राइवर की आँखें उन्हें वैसे ही घूर रही थीं, जैसे वे गर्म-गर्म जलेबियाँ हों। उन्हें देखकर सुंदरी ने हिकारत से मुँह चमकाकर घुमा लिया। बस ने उन्हें गाँव के सीमांत पर उतार दिया। यहाँ से मिट॒टी वाली सड़क थी जो गाँव तक जाती थी। उसके बाद खेतों की पगडंडी। दोनों चल दीं उस ओर। सुंदरी का मन हरे-भरे खेतों को देखकर हरा हो गया था। दिशाओं के पट खोलकर खुली हवा चली आ रही थी। दोनों के चेहरों पर 'ताजगी छा गई। सुंदरी का गोरा रंग खिलकर खूब चिकना और गुलाबी हो गया। दोनों ने पान खा लिया था। एक अजब उल्लास से भरी हुई दोनों चली जा रही थीं। खेतों की पगडंडी पर सँभाल-सँभालकर पैर डाल रही थीं। गाँव आने पर कुछ बच्चे, कुछ नौजवान इन्हें मुस्कुराकर देखने लगे थे। सब सोच रहे थे कि क्‍या बात है कि दोनों खोजवा चली आ रही हैं। किसी पर ध्यान न देते हुए सुंदरी ने कहा, "चल अपने घर की ओर ले चलती हूँ देखना। पर इहाँ किसी से मिलना नहीं है। सिर्फ जाना है अनजान बनकर।" वे एक बड़े घर के बाहर पहुँची। वह घर पूरा संपन्‍न लग रहा था देखने से। कुसुम हैरत से देखती रह गई थी अपनी ठुडडी पर ओठों के नीचे उँगली दबाएँ हुए। कुछ गर्व मैं भरकर सुंदरी ने उसे देखा। वे दोनों कुछ देर रुक गई वहाँ पर। कुसुम बोल उठी, "हाँ, बहुते हैं तुम्हारे माई-बाउजी।" सुंदरी बोली, 'त ओसे का? हमें क्या मिला उनका? बस, खाली जनम दिए। अठर त कुछो नाहीं। छोड़ - कुसुम।" "तो माई से भेंट कैसे करोगी?" "हाँ, शिवाला पर। बाकिर अभी जना तो दें कि हम आ गए हैं।" वे दोनों अहाते के भीतर चली गई। सुंदरी अपने ही घर के भीतर जाने मैं ठिठक रही थी। कदम आगे नहीं बढ़ रहे थे, लग रहा था जैसे किसी अपरिचित के आँगन मैं जा रही हो। उसने पहले बाहर से ही झाँका। एक औरत दिखाई दी। वह पहचान गई कि यह उसकी बहन रेनु थी जो अब बहुत बदल गई थी। उसकी देह गदरा गई थी और अब वह पूरी तरह से प्रौढ़ा दिखाई दे रही थी। बहन को देखने के बाद वह आँगन के भीतर गई और नाटक करते हुए बोली, "इहाँ पर सादी- ब्याह हुआ है? हमको मालूम हुआ।" स्त्री-पुरुष के बीच की कड़ी आवाज सुनकर रेनु ने उलटकर देखा और उसके पास चली आई। अपनी किन्नर बहन को देखकर उसकी नजर मैं पहचान उभर आई। उस पहचान को उसने आवाज मैं घुलने से रोक दिया। पर खुशी की मुस्कुराहट बिखेरे बिना न रह सकी। बोली, "हाँ, तुम लोग आ गई? अच्छा, माई से कहती हूँ।" वह सामने वाली कोठरी मैं चली गई जहाँ उसकी माँ बैठी हुई थी पलंग पर। उसने कहा, "माई! माया दीदी आई है।" सुंदरी का वास्तविक नाम था, उसके माता-पिता द्वारा दिया हुआ। जिंदगी में वह क्षण कभी न आया कि वह अपने नाम को अपने माता-पिता द्वारा पुकारे जाते हुए सुनती। यह सुनते ही उसकी माँ बाहर आँगन मैं आई। पर सुंदरी को सामने खड़ी देखकर भी उसे संबोधित न कर सकी। क्या बोले, समझ नहीं पा रही थी। बस खड़ी देखती रही। आवाज मुँह तक आकर रुक गई थी। आँखों में खुशी के साथ एक बेबसी थी। सुंदरी ने ही कहा, "सादी-ब्याह हुआ है। बहुरिया को दिखाओ। आसीरवाद दे देवें।" सुंदरी आँगन मैं एक ओर खड़ी चारों ओर नजर दौड़ा रही थी कि परिवार का कोई सदस्य दिखाई दे जाए। पिता अब नहीं रहे थे। न भाई दिखाई दे रहा था और न ही बहन का बेटा। बहू तो कोठरी में होगी। तभी अपनी पायल की झंकार से ऑगन को गुँजाती हुई एक ओर से बहू आती दिखाई दी। उसके हाथों में कुछ खाने की सामग्री थी। सुंदरी की माँ का दिल तड़प रहा था कि वह सुंदरी को कलेजे सै लगा ले। बुलाकर भीतर बैठाए। परंतु मजबूर थी। अतः खड़ी-खड़ी सारे दृश्य को निहार रही थी चुपचाप। कुछ न कह सकती थी। नौंकर-दाई, नाते-रिश्ते सब जैसे छिपे हुए कैमरे थे। कहाँ क्या क्लिक हो जाए? सतर्क थी। दो महरियाँ आँगन मैं काम कर रही थीं। अभी उनकी नजर भी सुंदरी और कुसुम पर थी कि वे क्‍या करती हैं? क्‍या गाती हैं? बहू सुंदरी के पास आई तो उसने कहा, "आय-हाय! चाँद जैसी बहू उतार लाई हो। एहवात बना रहे बहू का। दूधे नहाय पूर्तों फले।" सुंदरी ने अपना झोला फैलाकर कागज मैं बाँधी खाद्य-सामग्री ले ली। फिर जैसे उसने एलान किया, "अब हम जा रही हैं शिवाला की ओर।" यह कहकर अर्थ-भरी आँखों से एक बार माँ को, फिर रैनु को देखा। उसके बाद अपनी नजरें आँगन मैं चारो ओर दौड़ाई। बड़ा-सा आँगन। काम करती हुई महरियाँ। अरा-पूरा घर। फिर सूनी नजरों से माँ और बहन को देखते हुए मुँह घुमाकर बाहर निकल गई। उसके पीछे-पीछे कुसुम भी। उन दोनों के जाते ही एक महरी ने कहा, "ये लो। ये तो बिना नाचे-गाए चली गई।" "तो आई किसलिए थीं?" दूसरी ने कहा। हूँ… देखो ना" दूसरी व्यंग्य से मुस्कुराई। इस पर सुंदरी की माँ ने तड़पकर कहा,"बिचारियों ने कुछ नेग-निछावर भी तो नहीं लिया। आई, आशीर्वाद दैकर चली गई।" घर से बाहर निकलकर सुंदरी और कुसुम कच्ची सड़क पर आई तो कुसुम ने पूछा, "माई से कैसे मिलोगी? अभी तो देखा-देखी भी नए हुई ठीक से?" माई से सुनाए तो दिया कि जा रहे हैं शिवाला पर। उँहँ आएगी सब।" दोनों एक निर्जन शिवालय पर पहुँच गई थीं जो गाँव के बाहर पड़ता था। वह शिवालय काफी प्राचीन था जिससे सटा हुआ एक विशाल बरगद का पेड़ था। दूर-दूर तक फैली उसकी डालियों से मोटी-मोटी जड़ें लटक-लटककर को छू रही थीं। गाँव के लोग कहते थे कि इस पर शंकर जी का साँप रहता है, जो काटता नहीं है, पर अक्सर आस-पास घूमता हुआ दिखाई दे जाता है। वहीं पास मैं एक कनेर का पेड़ था। दुनिया-भर के पीले फूल उसके नीचे झर-झर कर गिरे हुए थे। मंदिर के आस-पास पसरी हुई नीरवता बरगद की घनी पत्तियों में छिपी चिड़ियोँ की निश्चित और निर्भय बतियाहट के रवरों से टूट रही थी। कभी-कभी दूर से टेरते किसी पंछी का तेज स्वर सुनाई दे जाता। ऐसे तो सन्‍नाटे की झंकार ही गूँज रही थी। कुसुम चली उसकी छाया मैं बैठने तो सुंदरी ने कहा, "वहीं बैठेगी? शंकर जी के साँप से भैंट करेगी क्या?" कुसुम डर गई, "क्या…. साँप?" "अरे नहीं कुछ नहीं बैठ, जहाँ मन करता हो। कुछ नए होगा।" "नहीं-नही, चल मंदिरवा के ओसारे में। वहीं बैठेंगी।" सुंदरी ने देखा वहाँ एक खूब साफ-सुथरा कुआँ है तो उसका मन कुएँ के गर्भ का पानी पीने के लिए मचल उठा। वह चल दी कुएँ से पानी निकालने। डोल कुएँ मैं गिराने लगी तो कुसुम भी चली आई। सुंदरी ने पानी का डोल ऊपर खींचा और बोली, "पहिले तू पी ले पानी।" कुसुम अपने पैरों पर बैठ गई और ओक से पानी पीने लगी। ऊपर से सुंदरी पानी गिरा रही थी। जब वह पीकर उठी तो उसकी जगह सुंदरी बैठ गई ओक मुँह तक ले जाकर। कुसुम डोल से पानी गिराकर उसे पानी पिलाने लगी। बहुत दिनों बाद शैवाल की महक वाला ठंडा पानी सुंदरी के कंठ से फिसलता हुआ कलेजे तक उतर रहा था। बहुत दिनों बाद पानी में बसे हरेपन के स्वाद से वह तृप्त हो गई। पीकर उसने डकार ली। फिर चल दी आँचल से मुँह पॉँछती मंदिर के ओसारे में बैठने। दूर से आती हुई ठंडी हवा से दोनों की आँखें झपकने लगीं तो वहीं चादर बिछाकर दोनों लेट गई। लेटे-लेटे सुंदरी कुसुम से बोली, "हाँ तो तुम्हें साँप का खिस्सा नहीं मालूम न?" "नाहीं।" ई बरगद की जड़ी में एक जोड़ा नाग-नागिन रहता है कौना जमाना से, कोई नहीं जाने। कोई कहता है कि शंकर जी का साँप है तो कोई कहता है कि शंकरे जी हैं। पर एक बार तो हमहीं देखें रहें। ठीक हमरा सामने छत्तर काढ़ के खड़ा हो गया। साक्षात भोले बाबा लेखन। बाकिर काटा-उटा नए, जैसे आसीरबाद दे रहा होय" ऐसा कहते हुए सुंदरी के रोंगटे खड़े हो गए। उसने कहा, "देख, हमरे रोएँ खड़े हो गए हैं। उ, भोले बाबा रहैं और साथ में पारबत्ती जी। एक अउर साँप था।" कुसुम ने आश्चर्य से कहा, हू? बाप रै। हम तो डरिए जाते।" "नाहीं, कौनो डर नाहीं - ईहा के कौंनो लड़िका-बूढ़-जवान से पूछो। सबकै मालूम है ई बात। सब कहेगा हम ईहा देखा, उहाँ देखा। बाकि साँप आज तक केहुको काटा नए है। बड़ा जगता मंदिर है। भागे से कोई उ, साँप को देख पाता है।" फिर तरह-तरह की बातें होने लगीं। कहते-सुनते कुछ समय बीता। तब सुंदरी ने सूने रास्ते की ओर देखा जिस पर दो स्त्री चली आ रही थीं। वह बोली, "देख, उहे, माय आय रही है। उसके साथ रेनु है। पता नहीं आज गोपी क्यों नहीं दिखाई दिया? बहिन पुत भी नहीं।" उन दोनों के नजदीक पहुँचते ही वह उठी। पहले माँ से, फिर बहन से गले लगकर मिली। वृद्धा ने पूछा, "कैसी है तू माया? मेरी बेटी! तू आँगन में आई, पर मैं किसी से कह न सकी कि मेरा बच्चा आया है। तुझे आँगन मैं अजनबी की तरह खड़ा रहने दिया। बैठा न सकी। पानी तक के लिए पूछ न सकी तुझे। यही तो मेरा भाग्य है।" यह कहकर वह अपनी आँखों से निकलते हुए आँसुओं को पोंछने लगी। "अच्छा-अच्छा! अब रोय मत। अभी थोड़ा देर हमरे साथ बोल-बतिया ले। रो नहीं। हमें अच्छी तो हूँ। देखिए रही है।" सुंदरी अपनी माँ को मंदिर के ओसारे में बैठाते हुए बोली। उसे बैठाने के बाद उसके बगल मैं बैठ गई। रेनु भी वहीं बैठी हुई थी। थोड़ी दूर पर कुसुम थी। शायद यह दूरी उसने स्वयं बना ली थी कि उनकी आपसी बातों में उसके कारण कोई खलल न पहुँचे। सब खुलकर अपना दुख-सुख कह-सुन सकें। "अच्छा, तू अपनै बारे मैं बता। तू एतना दुब्बर काहै होए गई है? हड्डी-हड्डी तो निकल आई है।" सुंदरी बोली। "मुझे छोड़ दे। अब क्‍या करना है मुझे? उठ जाऊँ संसार से, अब तो यही चाहती हूँ जीकर क्‍या करना है? अब सारी पिछली बातें याद आने लगी है।" वृद्धा बोली। "क्या?" इतना रूप दिया भगवान ने, पर उसका माथा खराब हो गया था कि तुझे ऐसा बना दिया। फिर भी, जैसी भी थी रहती मेरे आँगन मैं। पर सब उठा ले गए मुझसे छल करके। मैं सो रही थी। हमेशा इसी डर से दरवाजा बंद करके सोती थी। उस दिन तुझे लेकर सोई तो आँख लग गई। किवाड़ खुले हुए थे। तभी सब उठा ले गए दे दिया तुम्हें खोजवा को अहूँ... हूँ... हैँ...।" कहकर वह अपनी छाती पीटने लगी थी। सुंदरी ने कहा, "माई! भूल जा उ सब बात। जो हमरे किस्मत मैं था, सोई हुआ। किस्मत का लिखा ना मिटत है, माई। तू काहै रोती अठर छाती पीटती है? एमे तोहार दोस ना है।" वृद्धा ने उसकी ठुडडी पकड़ ली और कहा, "अब तो जाने कब मिलना होगा। मैं रहूँ... न रहूँ।" "नहीं-नहीं, ई सब मत बोल। हम फिर आएँगे भेंट करने।" सुंदरी अपने झोले मैं से मिठाई का डब्बा निकाल लाई। माँ को देते हुए बोली, "लो माई, बड़का दोकान से खरीदा है। खाना।" बहन की ओर देखते हुए बोली, "तुझे अब देख रही हूँ जब तुम्हारे बेटा का बियाह होय गया। चलो, देखकर संतोष तो हुआ। माई को देखना। गोपी तो है ही। पर तू भी देखना। हम तो रमता जोगी। संसार के माया-मोह से तो अभिए छूटि गए हैं... गोपी कड़सा है? दिखाई नए दिया।" "ठीक है। वह शहर गया है। सवेरे ही निकल गया।" रेनु बोली। और "राजू?" 'वह भी साथ में गया है।" "हमरा भागे खराब है। उसकी दुलहिन को तो देखे, बाकिर उसको नए देख सके। अब पता नहीं कब देख भी पाएँगे, कि नाहीं।" सुंदरी कुछ उदास होती हुई बोली। "नहीं दिदिया, ऐसे क्‍यों कहती हो? देखोगी क्‍यों नहीं?" "हाँ सायद कहीं देख पाए! पर कोय उम्मेद नाहीं।" मंदिर के ओसारे पर ये तीन औरतें पास-पास बैठी रहीं। बातें जितनी हुर्ईई, उससे अधिक स्नेह-भरी दृष्टि का लेन-देन हुआ। जितना कुछ कहा गया, उससे अधिक अनकहै को सुना और महसूसा गया। झिर-झिर हवा चल रही थी और एक अजीब शांति से नहाया हुआ था सब कुछ मंदिर, प्रांगण, बरगद, कनेर का पेड़, कुआँ और सामने कुछ दूर तक फैला हुआ मैदान। अचालक सुंदरी उठी। अपना आँचल सँभालते हुए बोली, "अच्छा माई! अब साँझ होय रही है। हमें बस पकड़ना है। तुझे भी घर जाना है। तू भी चलते-चलते थक जाएगी। धीरे-धीरे जाना। फिर मिलेंगे। कोनो बात का चिंता मत करना।" उसकी माँ भी उठी। स्नेहकातर होकर अपने कमजोर हाथों से सुंदरी का गाल छूती हुई उसकी छुड्डी पकड़कर उसे कई पलों तक देखती रही। कुछ बोल न सकी। सुंदरी ने माँ को पकड़ लिया और उसके गाल से अपना सटा लिया। माँ के गाल की गोरी कोमल त्वचा बुढ़ा के और भी कोमल लग रही थी सटने पर। सीने से चिपकी उसकी सूती साड़ी का मुलायम एहसास वह अपने कलेजे में सँजोती रही। अलग हुई तो देखा माँ रो रही थी। सुंदरी ने उसकी बुढ़ाई झुर्रीदार पल्रकों को डँगलियों से पोंछ दिया। सुंदरी की माँ डगमगाते कदमों से सीढ़ियाँ उतरने लगी। उसके पैरों की डगमगाहट बुढ़ापे की कम और भावविहवलता अधिक थी। रेनु ने उसे सँभाल रखा था। वह उसे पकड़कर ले जा रही थी। जब वे दोनों कुछ दूर निकल गई तो सुंदरी और कुसुम भी चल दीं अपनी राह पर। ********

  • संबंध सुहाना है

    लीला तिवानी है प्रेम से जग प्यारा, सुंदर है सुहाना है जिस ओर नज़र जाए, बस प्रेम-तराना है बादल का सागर से, सागर का धरती से धरती का अंबर से, संबंध सुहाना है तारों का चंदा से, चंदा का सूरज से सूरज का किरणों से, संबंध सुहाना है सखियों का राधा से, राधा का मोहन से मोहन का मुरली से, संबंध सुहाना है पेड़ों का पत्तों से, पत्तों का फूलों से फूलों का खुशबू से, संबंध सुहाना है जन-जन में प्रेम झलके, हर मन में प्रेम छलके मन का इस छलकन से, संबंध सुहाना है। *******

  • जिंदगी जहां ले जाए

    डॉ. जहान सिंह ‘जहान’ अभ्रक की विशाल पहाड़ियां, घने जंगल से गुजरती पतली पगडंडियां। रात में अनगिनत जुगनूओं से टिमटिमाता क्षेत्र। झरनों से गिरते पानी का अद्भुत संगीत। सम्मोहन से जकड़े हुए अंधेरा। अगर कुछ सुनाई पड़ रहा था तो अपनी सांसे। या यदा-कदा खौफनाक जानवरों का चीत्कार जो सिर्फ सिहरन और भय पैदा कर देता। इस जादुई सन्नाटे को तोड़ रहा था तो जीप का हॉर्न। ठा0 भूपेंद्र सिंह रूपगढ़ के जमीदार बड़ी कद-काठी, घुड़सवारी और शिकार का खानदानी शौक। पचास साल पार कर चुके लेकिन नौजवानों जैसी फुर्ती, अचूक निशानेबाज। पड़ोस के चालीस गांव में दबदबा। उनकी मां ठकुराइन रूप कुंवर अपनी शान और संस्कार विरासत में दे गई थीं। ठा0 भूपेंद्र सिंह दस हाकारो और तमाम लाव लश्कर के साथ तीन दिनों से जंगल में डेरा डाले थे। पता चला कि आज की रात नदी पार जंगली सूअरों का झुंड आया है। जो ठाकुर साहब के नए लगाए चाय के बागान से गुजरेगा। शायद नया चाय का बागान उजड़ ना जाए। इस चिंता से शेर के शिकार का प्लान बदलकर अपना पूरा दलबल लेकर सोना नदी की तरफ चल दिए। जब घड़ी देखी तो सुबह के 3:00 बज चुके थे। बोझल आंखें गजब की थकान और सर्द रात अजीब सी उलझन पैदा कर रही थी। लेकिन किस में हिम्मत जो चू चपड कर सके। सब थके से शिकार के नशे में बस चले जा रहे थे। झाड़ियों की सरसराहट ने अचानक जीप को तुरंत ब्रेक लगाकर रोकने को मजबूर कर दिया। ठाकुर साहब की पीछे वाली जीप भी चीं करके रुक गई। पीछे से आवाज आई कि काफिला क्यों रोका गया। ड्राइवर गुलजारी ने होठों पर उंगली रखकर चुप रहने का संकेत दिया और सर्च लाइट डाली तो बड़ी चमकीली आंखें दिखाई पड़ी। सर्च लाइट घुमा कर देखी तो दो नहीं है सैकड़ों जोड़ें स्थिर गति से निहार रहे थे। ठाकुर साहब को समझने में जरा भी देर नहीं लगी कि खूंखार जंगली सूअरों का हमला होने वाला है। एक भयानक विशाल भारी-भरकम दो-दो फुट नुकीले वीरो वाला सूअर आक्रमक मुद्रा में समूह का नेतृत्व कर रहा था। ठाकुर साहब दे दो नाली बंदूक निकाल कर धायं-धायं दो फायर दाग दिए। सूअर तेजी से पलटा और भागने की कोशिश में तार की लगी झाड़ी में फंस गया। खून से लथपथ तारों से उलझ कर पेट से अंतडियां बाहर झांकने लगी थी। पर ना जाने किस पुकार पर अनोखी ताकत से भागा जा रहा था। वर्षों बाद इतना बड़ा शिकार छोड़ना नहीं चाह रहे थे। सुबह की पै फटने वाली थी। पुराने शिकारी का शौक, खून के दाग देखते हुए पहाड़ी की ढलान पर पीछा करने लगे। मीलों की दूरी तय करने के बाद अचानक एक बड़ी झाड़ी पर रास्ता खत्म हो गया। ठाकुर साहब ने बंदूक से फिर निशाना लेते हुए झाड़ी के पीछे गए तो उनकी मौत दिखी झांका तो दिल दहलाने वाला दृश्य था। वह एक माँ थी। अपने छोटे-छोटे बच्चों के बीच आकर दम तोड़ रही थी। आंखों में आंसू दर्द से चिन्ह आरती हुई बच्चों को दुलार कर प्यार कर रही थी। इतने पुराने शिकारी का भी एक बार दिल दहल गया। वापस आने का मन बना ही रहे थे। तो अचानक ख्याल आया कि इस तड़प-तड़प के जान देने से तो अच्छा होगा कि इसको तुरंत मृत्यु प्राप्त हो जाए। बिना सोचे दो गोलियां और दाग दी। बच्चे डर से दूर जाकर दुबक गए, यह कौन सी शक्ति थी। जो घायल मां को इतनी दूर खींच लाई। शायद मां का बच्चों से प्यार। यह ठाकुर साहब भूपेंद्र सिंह के जीवन का आखिरी शिकार था। जिसने हमेशा के लिए हृदय परिवर्तन कर दिया है कि बेगुनाह जानवरों की हत्या नहीं होनी चाहिए। उनमें भी किसी बच्चे की मां हो सकती है। घाटी के किनारे लगे कैंप में दोपहर 2:00 बजे ठाकुर भूपेंद्र ने एक लंबी अंगड़ाई लेकर आंखें खोली। तेज धूप लेकिन हवाओं में शरद लहर एक अजीब एहसास। जब कभी इतनी दूर तक आते हैं। इस क्षेत्र में तो एक याद उनको परेशान करने लगती है वह है। वहां से तीन मील दूरी पर स्थित माधवगढ़ की हवेली। जिसकी मालकिन राजकुमारी जगरानी जो अपनी खूबसूरती के लिए दूर-दूर तक जानी जाती है। घुड़सवारी, तीरंदाजी का बचपन से ही शौक। उनके पति राजा गोपालराय सोनापुर के मेले में घोड़े से गिरकर घायल ऐसे हुए कि बिस्तर पकड़ा और कुछ समय बाद महल में ही दम तोड़ दिया। अचानक उनकी मृत्यु के बाद पूरी देख-रेख की जिम्मेदारी राजकुमारी जगरानी ने संभाली। अंग्रेजों का शिकंजा कसता जा रहा था। जमीनों के लगान, लेनदेन के झगड़े बढ़ते जा रहे थे। आए दिन कोर्ट कचहरी का आना-जाना। सरकारी दखलअंदाजी इतनी हो गई थी कि कभी-कभी तो विधवा राजकुमारी जगरानी जो अपने इलाके में छोटी पंडिताइन के नाम से ज्यादा प्रसिद्ध थी, को भी कलेक्टर, तहसीलदार, जज से मिलने के लिए सोनापुर आने-जाने की जरूरत पड़ने लगी। ठाकुर भूपेंद्र सिंह की कुछ जमीदारी सोनापुर क्षेत्र में पड़ती थी। लगान वसूलने और जमा करने के दौरान दोनों लोगों की मुलाकात कभी-कभी कलेक्टर साहब के बंगले में हो जाती थी। वक्त बीत गया, कब वह दोनों एक दूसरे के करीब आए गए पता ही नहीं चला। छोटी पंडिताइन का पैर ऐसा फिसला कि ठाकुर के आंगन तक आ गया। ठाकुरों के घरों में उन पुराने समय में औरतें विरोध जता तो सकती थी लेकिन कुछ कर नहीं सकती थी। ठकुराइन भी शुरू की बेचैनी के बाद शांत हो गई। और अपना नसीब मानकर जीवन व्यतीत करने लगी। छोटी पंडिताइन और ठाकुर के चर्चे इलाके में आग की तरह फैले लगे। दोनों परिवार के लोगों में रंजिश भी रही झगड़े भी हुए। कोर्ट कचहरी, पंचायत भी लगी पर बाद में समाज सिर्फ एक मूकदर्शक बनकर रह गया। दोनों की जिंदगी कहां से कहां ले गई थी। जंगल की कोठी पर मिलना हफ्तों पड़े रहना। सिर्फ छोटी पंडिताइन के प्रेम ने समाज की सब बेड़ियां तोड डाली। विधवा का समाज में खुला प्रेम प्रसंग लोगों की आंखों में किरकिरी थी। कुंवर अरुण प्रताप सिंह, ठाकुर साहब का छोटा लड़का, एक बिगड़ैल रईसजादा की तरह गुंडई और दबंगई करने में लिप्त रहने लगा। उसका शराब, वेश्या, खून खराबा ही शौक रह गया था। एक रात शराब और मुजरे की दावत में किसी तवायफ ने जहर देकर कुंवर की जीवन लीला समाप्त कर दी। ठाकुर भूपेंद्र सिंह को हवेली से घृणा हो गई। और उन्होंने जंगल में पहाड़ियों के बीच एक कोठी बनवाई और दिन के कामकाज के बाद रात वहीं पर विश्राम करने लगे। छोटी पंडिताइन का मेलजोल और प्रगाढ़ हो गया। विधवा का ध्यान जायदाद की तरफ क्या काम हुआ कि परिवार के लोगों ने अंग्रेजों से मिलकर जायदाद में लूटपाट खींचा-घसोटी चालू कर दी। राजकुमारी का भतीजा गंगा देवराय अंग्रेजों का पिट्ठू बन गया। और जमीदारी की जड़ खोदने में लग गया। छोटी पंडिताइन को रास्ते से हटाने की सोचने लगा। एक दिन डाकू लक्खा को काफी मोटी रकम देकर जगरानी को मरवाने की पेशकश कर दी। एक खुशगवार शाम को ठाकुर साहब और राजकुमारी जगरानी पैदल घूमते-घूमते नदी के किनारे तक आ गए। हाथों में हाथ प्यार में गाफिल जोड़ी अचानक घोड़ों की टॉप सुनकर ठिठक गई। ठाकुर का हाथ फौरन पिस्तौल पर चला गया। और राजकुमारी सिमटकर बाजुओं में आ गई। एक क्षण में पंडिताइन ने भी हमेशा साथ रहने वाली पिस्टल हाथ में ले ली। वह बचपन से ही अचूक निशानेबाज थी। अचानक एक भारी-भरकम शरीर का काला आदमी पगड़ी बांधे दोनाली हाथ में लिए घोड़े पर सवार आमने-सामने आ गया। दोनों को समझने में देर नहीं लगी कि दोनों डाकुओं से घिर गए हैं। ठाकुर ने कड़कती आवाज में पूछा कौन? जवाब आया सरकार हम लक्खा डाकू हूं। हमारी आपसे कोई दुश्मनी नहीं है। हमारे मां-बाप ने आपका नमक खाया है। लेकिन सरकार राजकुमारी जगरानी मेरे हवाले कर दो। लक्खा तुम जानते हो कि ठाकुर भूपेंद्र सिंह अपने मातहतों का स्वागत ही नहीं। उनकी रक्षा भी करना जानते हैं। अगर राजकुमारी को ले जाना है। तो तुम मुझे मार कर ही ले जा सकते हो। वरना अपने घर लौट जाओ। और कोठी पर आकर जो चाहना वह ले जाना। सरकार हमारी मजबूरी है। गंगा देव राय ने इस काम के लिए मुझे पूरी 50 गिन्नी दी हैं। लक्खा जिस काम के पैसे ले लेता है। उसे अपनी जान लगाकर भी पूरा करता है। तो लक्खा सावधान अब जंग होगी। जो जीतेगा वह राजकुमारी को ले जाएगा। ठाकुर की जिद और डाकू का कॉल आमने-सामने था। निर्णय विधाता के हाथ में। तभी एक खूंखार जानवर के दहाड़ ने की भयानक चीतकार ने सबका ध्यान विचलित कर दिया। ठाकुर भूपेंद्र सिंह असंतुलित हो गए और पैर से फिसलकर पहाड़ी के नीचे बह रहे दरिया में गिर पड़े। राजकुमारी देखते ही चीख पड़ी बचाओ-बचाओ। डाकू लक्खा बहसी हंसी हंस रहा था। उसने सोचा कि ठाकुर साहब की बिना हत्या किए। उसका कॉल पूरा हो रहा था। वह राजकुमारी की तरफ बढ़ा और पकड़कर घोड़े पर बैठाने की कोशिश करनी चाही। राजकुमारी बहादुर और निशानेबाज भी थी। उसने ताबड़तोड़ दो फायर कर दिए। देखते ही देखते लक्खा ढेर हो गया। साहसी राजकुमारी जगरानी ने बिना वक्त गंवाए दरिया में छलांग लगा दी। इससे पहले कि ठाकुर का दल उस पर हावी हो पाता। राजकुमारी भी दरिया में डूबने उतराने लगी। ठाकुर भूपेंद्र सिंह धारा के विपरीत बहाव में राजकुमारी के करीब पहुंचने की कोशिश कर रहे थे। राजकुमारी भी पूरे साहस से ठाकुर साहब की तरफ पहुंचने के लिए दरिया से लड़ रही थी। ठाकुर ने किसी तरह राजकुमारी की चुनरी पकड़ ली। और दोनों करीब आ गए। थके बोझिल लेकिन चेहरों पर विजय थी। राजकुमारी ने फूलती सांस में पूछा। अब हम कहां जाएंगे? ठाकुर भूपेंद्र सिंह ने कहा उसी आत्मविश्वास से भरी आवाज में “जिंदगी जहां ले जाए।” *******

  • पत्थर का दर्द

    डॉ. कृष्ण कांत श्रीवास्तव बहुत पहले की बात है। एक शिल्पकार मूर्ति बनाने के लिए जंगल में पत्थर ढूंढने गया। वहाँ उसको एक बहुत ही अच्छा पत्थर मिल गया। जिसको देखकर वह बहुत खुश हुआ और वह सोचने लगा कि यह मूर्ति बनाने के लिए बहुत ही उपयुक्त है। जब वह घर की ओर लौट रहा था, तो उसको एक और पत्थर मिला। शिल्पकार ने उस पत्थर को भी अपने साथ ले लिया। घर आकर उसने पत्थर पर अपने औजारों से कारीगरी करना प्रारंभ कर दिया। औजारों की चोट जब पत्थर पर हुई, तो पत्थर बोला कि शिल्पकार मुझको छोड़ दो। तुम्हारे औजारों के प्रहार से मुझे बहुत दर्द हो रहा है। अगर तुम मुझ पर चोट करोगे तो मै बिखर कर अलग हो जाऊंगा। तुम किसी और पत्थर पर मूर्ति बना लो। पत्थर की बात सुनकर शिल्पकार को दया आ गयी। उसने पत्थर को छोड़ दिया और दूसरे पत्थर को लेकर मूर्ति बनाने लगा। वह पत्थर कुछ नहीं बोला। कुछ समय में शिल्पकार ने उस पत्थर से बहुत अच्छी भगवान की मूर्ति बना दी। गांव के लोग मूर्ति बनने के बाद उसको लेने आये। गांव वालों ने सोचा कि हमें नारियल फोड़ने के लिए एक और पत्थर की जरुरत होगी। उन्होंने वहाँ रखे पहले पत्थर को भी अपने साथ ले लिया। मूर्ति को ले जाकर उन्होंने मंदिर में सजा दिया और मूर्ति के सामने उसी पत्थर को रख दिया जिसने शिल्पकार से प्रहार करने को मना किया था। अब जब भी कोई दर्शनार्थी मंदिर में दर्शन करने आता तो मूर्ति की फूलों से पूजा करता, दूध से स्नान कराता और उस पत्थर पर नारियल फोड़ता था। जब लोग उस पत्थर पर नारियल फोड़ते तो पत्थर बहुत परेशान होता। उसको दर्द होता और वह चिल्लाता लेकिन कोई उसकी सुनने वाला नहीं था। एक दिन एकांत का समय पाकर उस पत्थर ने मूर्ति बने पत्थर से बात की और कहा कि तुम तो बड़े मजे से हो। लोग तुम्हारी पूजा करते है। तुमको दूध से स्नान कराते हैं और लड्डुओं का प्रसाद चढ़ाते हैं। लेकिन मेरी तो किस्मत ही ख़राब है, मुझ पर लोग नारियल फोड़ कर जाते हैं। जिससे मुझे बड़ा कष्ट होता है। इस पर मूर्ति बने पत्थर ने कहा कि जब शिल्पकार तुम पर कारीगरी कर रहा था, यदि तुम उस समय उसको नहीं रोकते तो आज मेरी जगह तुम होते। लेकिन तुमने आसान रास्ता चुना, इसलिए तुम अभी दुःख उठा रहे हो और पूरा जीवन यूं ही दुःख उठाते रहोगे। उस पत्थर को मूर्ति बने पत्थर की बात समझ आ गयी। उसने कहा कि अब से मैं भी कोई शिकायत नहीं करूँगा। इसके बाद लोग आकर उस पर नारियल फोड़ते। नारियल टूटने से उस पर भी नारियल का पानी गिरता और अब लोग मूर्ति को प्रसाद का भोग लगाकर उस पत्थर पर रखने लगे। सीख: जीवन के प्रथम पड़ाव में जो मनुष्य मेहनत करते हैं और कष्टों को सहकर अपने व्यक्तित्व का विकास करते हैं। उनका शेष जीवन सम्मान सहित आराम से व्यतीत होता है। *******

  • FALL OF A FEATHER

    Aastha Awasthi Death so languid As fiery as a feather That kisses the face of its demise as ever A Tale of Death the fall of a Feather A voice of dreams just gone forever There were hundreds of feathers like it Oblivious and happy Playing with glee They were all puppets in a useless scheme I wondered why it wasn't like esteem Tons of conversations but not a single one with it Room full of feathers but no friends to greet View of its lonely corner everyone in a jolly cart While it was suffocating on tears that tear her apart Once it was too with all of them The others on the wings of the heaven they said But it couldn't keep up with the glory of them It tried n' tried its best But it still went in vain Pain was a pinch of salt Always the right amount Not a life without knives nor a death with smiles For it was forever the last in the line Defenceless little thing that was barely even alive The dark couldn't help dragging this easy blame To the edge of its mind where the evils claim Just a little push was all that it took To fall from grace for falling loose Nobody looked back nobody needed evermore No one even realized it wasn't there anymore Smiles and hopes all faded to none As it kept falling and falling alone Down as it goes Limbs flailing around It chokes; it suffers in this peaceful town Water in the throat freezing up its heart Right up to the end before it could even start Selfish it may be as it fall from its palm Not a hero of any sort and it found its calm Sun was on the horizon Casting shadows flake On the ghastly waters of this tranquil lake That can rival the sky in its beauty and art Just close your eyes and let go at last Death as languid as a fiery feather That kisses the face of its demise as ever ********

  • कम्बल

    किसी क्लब का अध्यक्ष होना भी अपने आप में सरदर्द हो जाता है। रोज कोई न कोई कार्यक्रम लगा ही रहता है, अतुल पाँच महीनों से लगातार दौड़ ही रहे थे। कभी वृद्धाश्रम, कभी विकलांगों का कैंप तो कभी ब्लड डोनेशन। देखते-देखते दिसंबर का महीना भी आ गया। ''और अतुल बाबू इस महीने क्या करने का सोचा है।" ''सोच रहा हूँ गरीबों में कंबल बांट दूँ, हम लोग यहाँ मोजा, जूता, जैकेट से लैस होकर भी ठंड से ठिठुरते रहते हैं। कई गरीबों के तन पर तो मैंने एक कपड़ा तक नहीं देखा। मन द्रवित हो जाता है, मुझसे तो देखा भी नहीं जाता।" ''कहीं से कंबलों का जुगाड़ हो गया क्या" श्रीवास्तव जी ने चुटकी लेते हुए कहा, आखिर वो भी तो भूतपूर्व अध्यक्ष थे। अपने कार्यकाल में कई बार ऐसे ही उनका मन द्रवित हो जाता था। श्रीवास्तव जी की बात सुनकर अतुल एक बार के लिए सकपका सा गया जैसे उसकी चोरी पकड़ी गई हो। नजरें चुराते हुए उसने श्रीवास्तव जी से कहा, ''अगले इतवार को चलते हैं, क्लब की तरफ से दो सौ कंबल बाँटेंगे। सोच रहा शहर से दूर किसी गाँव में बाँटा जाये।" ''सही कह रहे हो अतुल सारे क्लब को इससे आसान समाज सेवा कुछ नजर ही नहीं आती, जो देखो वही क्लब कंबल बांटने में जुट जाता है। अरे जिसका पेट पहले से भरा हो उसका पेट फिर दोबारा क्यों भरना। यह साले भिखारी दो-दो, चार-चार कंबल बटोर कर बैठ जाते हैं और फिर औने-पौने दाम में बाजार में बेच देते हैं। ''सही कह रहे हैं श्रीवास्तव जी इसीलिए शहर से दूर गाँव में बाँटने को सोच रहा हूँ, शायद असली जरूरतमंद वहीं मिल जायें। आप चलेंगे न" ''नेक काम में पूछना क्या?" श्रीवास्तव जी ने अतुल से कहा, इतवार की सुबह सुषमा जल्दी-जल्दी हाथ चला रही थी। क्लब के सदस्य कंबल बाँटने के लिए आने वाले थे। सुबह का नाश्ता तो करके ही जाएंगे। अतुल तेजी से हाथ बटा रहे थे और कमल के द्वारा दान किये गए कंबलों को तेजी से अपनी गाड़ी में रख रहे थे। ''सुगंधा इसमें से दो-चार कम्बल निकाल लो, कामवालियों को दे देना। वह भी खुश हो जायेंगी। पिछली बार बर्तन धोने वाली को सिलाई मशीन दिलवा दी तो खाना बनाने वाली कितना नाराज हो गई थी कि उसको नहीं मिली। अरे भाई अब अपनी जेब से आदमी किस-किस को दे, इस बार सबको खुश कर दो।" सुगंधा ने चार कम्बल घर के भीतरी हिस्से में रख दिए, कहीं बाथरूम जाने के बहाने क्लब के किसी सदस्य की उन पर नजर न पड़ जाए। तभी दरवाजे पर कूड़ा उठाने वाले विजय ने घंटी बजाई। अतुल ने बहती गंगा में हाथ धोने की सोची, कौन सा अपनी जेब से पैसा देना है। लगे हाथ इसको भी कंबल दे ही देता हूँ। यह भी तो जरूरतमंद है ही, खुश हो जाएगा और जीवन भर सलाम भी ठोकता रहेगा। ''यह लो कंबल और तुम्हारे किसी साथी को जरूरत हो तो बताना, मुझसे आकर ले जाए। हम गरीबों की सहायता के लिए हमेशा खड़े रहते हैं।" विजय ने उल्टे ही हाथ उस कंबल को वापस कर दिया, ''भैया! आपने कह दिया यही बहुत है, मेरी तो सरकारी नौकरी है, काम भर का कमा लेता हूँ। मुझसे ज्यादा गरीब लोग इस दुनिया में पड़े हैं, उन्हें मुझसे ज्यादा जरूरत है। आप उन्हें दे दीजिए।" अतुल चुपचाप विजय का चेहरा देख रहा था शर्मिंदगी से उसका चेहरा काला पड़ चुका था और विजय के चेहरे पर आत्मविष्वास की चमक थी। अतुल सोच रहा था आखिर गरीब कौन है..... **********

  • मिठाई के लिए

    तपेश भौमिक सौम्य प्रायः मिठाई दुकान के सामने शो-केस में सजी मिठाइयों में से एक विशेष मिठाई को कुछ देर तक निहारता, फिर जो भी चीजें उसे खरीदने के लिए भेजा जाता वह उन चीजों को लेकर उसकी याद दिल में संजोए लौट जाता। उस विशेष मिठाई का स्वाद उसे एक बार मिल चुका था इसलिए उस पर उसकी दीवानगी अपनी हद से आगे बढ़ गई थी। शो-केस में सजी प्रत्येक मिठाई पर कीमतों के ‘टैग’ होते थे, इसलिए अलग से उनकी कीमत पूछने की जरूरत ही नहीं पड़ी। केवल उसे लेने के लिए अपनी जेब की औकात होनी चाहिए थी। ‘जेब को औकात नहीं तो जीभ को सौगात नहीं।’ यही मन ही मन सोचता हुआ लौट जाता। उस मिठाई की कीमत महज़ तीन रुपये ही थी जबकि कुल जमा पूंजी तीन रुपए जेब में कभी हुए ही नहीं। सौम्य के साथ यही विडम्बना थी। अगर कभी हुई भी तो किसी जरूरी खर्चे की नौबत आ गयी। फिर वही ‘ढाक के तीन पात’ वाली बात आ जाती। उस विशेष मिठाई का सपना अधूरा रह जाता। मन को यह कह कर सांत्वना देता कि ‘जब कमाऊँगा तब खाऊँगा। लेकिन कमाने के दिन कब आएंगे?’ यह सवाल भी परीक्षा के प्रश्नपत्रों में छपे सवालों से कहीं अधिक पेचीदा था। कई बार चवन्नी-अठन्नी के सिक्कों को उछाल-उछाल कर पैसे जोड़े भी गए पर न जाने कैसे वे सिक्के किसी दूसरी उछाल के लिए तैयार होकर बिदक गए। सवाल तीन रुपए का था और जवाब तीन का न आता था। यह तीन का तड़का ही बेमानी-सी थी, उसके लिए। अगर अन्य मिठाइयों की भांति उसकी कीमत दो रुपए होती तो वह जरूर एक दिन खरीद लेता और राह चलते मुंह के हवाले कर देता। दो रुपए तक जोड़ पाना सौम्य के लिए कोई ज्यादा भारी काम नहीं रहा, कई बार उसने जोड़े, पर तीन की पहेली कभी न सुलझी। वह एक अजीब व्ययामोह की स्थिति से गुज़र रहा था। वह अपने मन को यह कह कर ढाढ़स बंधाता कि “आज तीन के लिए तरस हो रही है तो क्या? कल छह से छक कर खाएँगे।” कभी उस विशेष मिठाई का शो-केस में न होने से सोचता कि क्या उसकी खपत कम हो गई है? खुद ही जवाब देता, ‘मेरी बला से। इस दुकान में नहीं मिलेगी तो दूसरी दुकान में ढूंढ लूँगा। ‘मन ही मन उसका नाम जपता हुआ वह आगे बढ़ जाता। सौम्य दर्जा-दर-दर्जा अच्छे अंकों से पास होता गया। कुछ खाने-पीने के बारे में कभी अपने माँ-बाप के सामने उसने जिद्द किया हो, उसे पता नहीं। अपने परिवार की गिरते माली हालात से वह वाकिफ़ था। एक अरसा बीत गया था कि वह कभी किसी झिझक के कारण उस मिठाई को खरीद नहीं पाया था। अब तो वह दसवीं भी अच्छे अंकों से पास हो गया था। पढ़ाई में उसने ऐसी डुबकी लगाई थी कि मिठाई की बात ही वह भूल चुका था। अब तो उन दिनों की गई बातों को सोचकर उसे हँसी आने लगी थी। उसे झिझक होने लगी कि भला उस विशेष मिठाई के लिए उस दुकान तक वह जाएगा। नहीं, यह तो बड़ी हास्यस्पद बात होगी। एक दिन दुकानदार उसकी दृष्टि को ताड़ गया था कि उसे कुछ लेना-देना नहीं है, यों ही घूर रहा है। उसने एकबार सौम्य से यह भी पूछा था कि कुछ और लेना है क्या? कुछ लेना हो तो जल्दी ले लो, दूसरे ग्राहक भी तो हैं। ले लो, नहीं तो चलते बनो। उन दिनों वह अपने माँ-बाप के साथ किराए के मकान में रहता था। व्यापार में भारी नुकसान के कारण बाप ने मकान बेच कर महाजन का ऋण चुकता कर दिया था, जिसके कारण उसका परिवार किराए के सस्ते मकान में रहने लगा था। उस आँगन में और कई किराएदार रहा करते थे, जिन्हें घर पर किसी अतिथि के आने पर सौम्य को ही मिठाई दुकान भेज कर मिठाई मंगवाना सुविधाजनक लगता था। वह दौड़ कर मांग के अनुसार मिठाई, समोसे आदि ला देता तो उसके एवज में उसे कभी एक जलेबी तो कभी एक समोसा मिल जाया करता थी। कक्षा नौ तक आते-आते उसका पढ़ाकू व्यक्तित्व ही कुछ ऐसा बन गया था कि लोग उसे मिठाई दुकान भेजने में या तो हिचकिचाने लगे थे नहीं तो उन्हें उसकी माँ ने ही मना कर दिया था। इंसान का व्यक्तित्व उसके कामों से ऊँचा उठता जाता है। ऐसे व्यक्ति को कोई कुछ कहने से पहले दो बार सोचता है या उससे कुछ कहते नहीं बनता। सौम्य के परीक्षा फल ही ऐसे आते थे जिनसे उसके परिवार के प्रति सबका एक आदर भाव बनता जा रहा था, नहीं तो एक अच्छे खाते-पीते परिवार का अचानक समाज के हाशिये पर आ जाने से लोग उनका तमाशा ही देखते हैं और उनकी मज़ाक बनाने से पीछे नहीं हटते। एक मात्र सौम्य का परीक्षा फल ही था जिसके बदौलत उनकी साख अब भी समाज में कायम थी। आज वह आई॰टी इंजीनियर है और प्रथम तनख़ाह के पैसे भी जेब में है। अब वह इस उधेड़बुन में पड़ गया कि पहले वह मिठाई दुकान जाएगा या माँ के सामने सारे पैसे रख देगा? पैसे उसके परिवार के लिए ज़रूरत थी न कि गुलछर्रे उड़ाने के लिए। उसके दिमाग में यह भावना भी आई कि अगर वह उस दुकान के सामने जाएगा और उस विशेष मिठाई को डब्बा भर कर खरीदेगा तो हो सकता है कि दुकानदार उसे ताड़ जाए। ऐसी हालात में कुछ सवाल ऐसे भी उसके मन में आ-जा रहे थे। जिसे सुलझाने में वह लगभग नाकाम साबित हो रहा था। अब तक बहुत साहस जूटा कर उसने लगभग अपने आप को उस मिठाई दुकान तक धक्के मारता हुआ ले गया था। वह चिर-परिचित मिठाई ट्रे में सजी दिख गई। शो-केस के अंदर भरपूर सुंदरता के साथ वह अपने को फ़ोकस करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ रही थी; मानो कह रही हो कि ‘आज इतने दिनों बाद मेरी सुध ली है तुमने मेरे भाई? मैं तो कब से बाट जोह रही हूँ।’ मिठाई अब तीन रुपए की न होकर पाँच रुपए की हो गई थी, लेकिन इस बढ़ोत्तरी से उसका कोई लेना-देना न था। पाँच क्या दस का हो जाए, वह ट्रे में सजी सारी मिठाइयों को खरीदने की औकात रखता हैं आज। वह पहले तो उस विशेष मिठाई का नाम ही भूल चुका था। क्या वह ‘शो केस’ के सीसे पर उंगुली दिखा कर कहेगा कि अमुक मिठाई पचास या सौ रुपए के, डिब्बे में पैक कर दें। पहले तो वह हकला गया, फिर अपने को तटस्थ करता हुआ एकबार पीछे मुड़ कर देखा, शायद कोई कुछ कह रहा हो। एक गरीब बच्चा हाथ पसारे पैसा या मिठाई कुछ मांग रहा हो। माँ ने तो कहा था कि पहली तंख्वाह के पैसे से पहले ठाकुरजी के मंदिर में भेंट चढ़ाएगी। सौम्य को इस बात से चिढ़ थी कि उसके कमाए पैसे का पहला आस्वादन मंदिर का पुरोहित क्यों करेगा? उसे चढ़ावे इत्यादि से काफी चिढ़ है, फिर माँ कहती है तो उनका मन रखने के लिए वह मान लेगा। नहीं तो पहले वह अपनी मर्जी के अनुसार जितना मन होगा पहले खा लेगा, फिर कोई दूसरी बात होगी। सौम्य ने अपने दिमाग पर बल डाला पर उस विशेष मिठाई का नाम याद न कर पाया। इतने बड़े-बड़े गणनांक वह याद रखता है और आज इस साधारण मिठाई के नाम को वह यदि स्मरण नहीं कर पा रहा हो तो यह भी उसकी बदकिस्मती है। वह उंगली दिखा कर कुछ कहता कि उससे पहले ही दुकानदार ने उसे आश्वस्त करते हुए सवाल किया। ”आपको ‘मंडा-मिठाई’ कितने दूँ?” इतना सुनते ही उसे मानो बिजली का शॉक-सा लग गया हो। उसके दिमाग में तुरत यह नाम क्रौंध गया। कहीं दुकानदार उसकी उस दृष्टि को स्मरण न करा रहा हों। उसने कुछ अन्यमनस्क-सा कह दिया, “जी हाँ’ बीस दे दीजिए।” तभी दो-चार और घुमक्कड़ बच्चे वहाँ आ गए तो दुकानदार ने डांट कर भगाने की कोशिश की। सौम्य ने उन्हें मना कर दिया। उसने डिब्बे को खोल कर उन सारे बच्चों को मिठाई बाँट दी और खाली हाथ यह सोचने लगा कि अब माँ को सारे पैसे दे देगा। उसे इसकी कोई परवाह नहीं कि माँ के हाथ रुपए सौंपने से पहले उन बच्चों को उसने कुछ पैसों के मिठाई भी खिला दी थी। उन मिठाई खाते बच्चों के चेहरो को देख कर उसे उस मिठाई का पूरा स्वाद मिल चुका था। उसके मन से उस विशेष मिठाई को खाने की मनसा जाती रही। वह दुकानदर को पैसे देकर उल्टे पाव लौटने को पीछे मुड़ा कि दुकानदार ने सवाल किया, “आपको मिठाई लेनी थी न?” “हाँ, लेनी थी, शाम को माँ के साथ आकर ले लूँगा, अभी याद नहीं आ रही कि कौन-सी किस्म कितनी लूँ।” उसने अनमने भाव से जवाब दिया और उन बच्चों के मिठाई खाते चेहरों को मन में आँकता हुआ लौट चला। वह अपने आप को दुनिया का सबसे बड़ा खुशकिस्मत मान कर चलता हुआ कब घर की देहरी पर पहुँच चुका था, उसे पता ही न चला। ************

  • एक कहानी, अपनी भी

    डॉ. कृष्ण कांत श्रीवास्तव आज कल्पना की शादी पक्की हो जाती है। लड़का भी सरकारी बैंक में अच्छे पद पर है। भावनाओं के सागर में हिचकोले लेती कल्पना अपने ब्वॉयफ्रेंड शेखर से मिलती है और पूछती है – अच्छा, यदि आज किसी दूसरे लड़के से मेरी शादी हो जाए तो तुम क्या करोगे? शेखर तो जैसे इस प्रश्न के उत्तर के लिए पहले से ही तैयार था। उसने बिना देर किए बहुत छोटा सा जवाब दिया – मैं, तुम्हें भूल जाऊंगा। ये सुनकर कल्पना गुस्से में दूसरी तरफ घूम कर बैठ गई। उसको शायद शेखर से इतने सीधे और सपाट उत्तर की आशा न थी। फिर भी बात को आगे बढ़ाते हुए कल्पना ने शेखर से कहा, “क्या यह सब इतना आसान है?” तुम सच कहती हो, मेरे लिए तो यह सब इतना आसान नहीं है। परंतु लड़कियों का क्या कहना। वह तो पल में अपनी पिछली जिंदगी को भुला देती हैं। आखिरकार, तुम भी तो लड़की हो और तुम भी इसी प्रकार मुझे बुला दोगी। तो बेहतर तो यही होगा कि जितनी जल्दी तुम मुझे भूल जाओ, मैं भी उतनी जल्दी तुम्हें भुला सकूं। इतने आत्मविश्वास के साथ तुम यह कैसे कह सकते हो कि मैं तुम्हें पल भर में भुला दूंगी? कल्पना ने भीगी आंखों से शेखर की ओर देखते हुए पूछा? शेखर ने बोलना शुरू किया - "सोचो शादी का पहला दिन है। तुम अपने घर में हो। घर में शादी की जोर-शोर से तैयारियां हो रही हैं। तुम शरीर में किलो भर सोने के जेवरात और महंगे कपड़े पहन कर घूम रही होगी। तुम्हारे दोस्त, रिश्तेदार तुम्हारे आसपास घूम रहे होंगे। फोटोग्राफर विभिन्न कोणों से तुम्हारे चित्र ले रहे होंगे और तुम हर चित्र में मुस्कुराकर देख रही होगी। तुम्हारे दोस्त और तुम्हारे रिश्तेदार तुम्हारी खिलखिलाहट पर अपनी सहमति दे रहे होंगे। तब क्या तुम मुझे याद कर रही होगी। नहीं, ऐसे उत्सव के माहौल में और लोगों की भीड़ में तुम मुझे चाह कर भी याद नहीं कर सकती। "और मैं तुम्हारी शादी की खबर सुनकर दोस्तों के साथ कुछ उटपटांग पीकर किसी कोने में पड़ा रहूंगा और फिर जब मुझे होश आएगा तब मैं तुम्हें धोखेबाज, बेवफा बोलकर गाली दूंगा!" "फिर जब तुम्हारी याद आएगी तो अपने किसी दोस्त के कंधे पे सर रख के रो लूंगा।" बारात आएगी, शादी की रस्में होंगी, तुम्हारी विदाई भी होगी परंतु उस वक्त भी तुमको हमारी याद नहीं आएगी। शादी के बाद तुम्हारा व्यस्त समय शुरू हो जाएगा। फिर तुम अपने पति और हजार तरह की रस्मों को निभाने में व्यस्त रहोगी। हमारी याद तुम्हें कभी नहीं आएगी ऐसा तो मैं नहीं कहूंगा। कभी-कभी तुम्हें मेरी याद आएगी, जब तुम अपने पति का हाथ पकड़ोगी, उसके साथ बाइक पर बैठोगी। "और उस समय भी, मैं आवारा की तरह इधर-उधर घूमता रहूंगा। जैसे जिंदगी का कोई मकसद ही नहीं और अपने दोस्तों को समझाऊंगा कि "कभी प्यार मत करना कुछ नहीं मिलता। जिंदगी खत्म हो जाती है, इस प्यार के चक्कर में।” कुछ वक्त बाद तुम अपने पति के साथ हनीमून पर जाओगी। नई-नई जगहों पर घूमोगी, विभिन्न प्रकार के व्यंजनों का स्वाद चखो होगी, महंगी कार और हवाई जहाज का सफर करोगी, अजनबियों के शहर में अपने पति के हाथों में हाथ डालकर कभी आइसक्रीम तो कभी पॉपकॉर्न का मजा लोगी, क्या तब तुम्हें हमारी याद आएगी? लौट कर आओगी तो नया घर होगा, नए लोग होंगे, नए रिश्ते होंगे, सब कुछ नया होगा और वहां सब तुम्हें हाथों-हाथ ले रहे होंगे। तब क्या तुम्हें इतना समय मिल पाएगा कि तुम मुझे याद कर सको? सब खुश होगे और तुम्हारे दिन भी खुशी से बीत रहे होंगे। परंतु एक दिन जब तुम अकेली होगी और घर पर कोई नहीं होगा तब तुम्हें अचानक मेरी याद आएगी और तुम सोचोगी. "पता नहीं किस हाल में होगा, क्या कर रहा होगा, जब मैं मिलूंगी तो उसको कैसे अपनी मजबूरियों के बारे में बताऊंगी और फिर मेरी खुशी की दुआ मांगते हुए वापस अपने परिवार में व्यस्त हो जाओगी। इधर मैं मजनू बना सड़कों पर इधर से उधर चक्कर काट रहा होऊंगा। किसी काम में मन नहीं लगा रहा होगा। घर में और दोस्तों के साथ भी बात-बात पर झगड़ा कर लेता होऊंगा। मैं अब-तक अपने मम्मी-पापा, भाई या फिर दोस्तों से डांट सुन-सुन कर लगभग सुधर ही गया होऊंगा। पग-पग पर ठोकर खाने के बाद, जिंदगी को नए ढर्रे पर लाने के लिए, मम्मी-पापा भाई-बहन और सभी नाते रिश्तेदारों की खुशी के लिए, जीवन को नए सिरे से बुनने का प्रयास आरंभ कर दूंगा। जिंदगी को चलाने के लिए कुछ तो करना ही होगा। नौकरी करके और एक अच्छी सी लड़की से शादी करके तुम्हारे दिए दर्द के प्रतिशोध को तो तुम्हें दिखाना ही होगा। सबको यही बोलूंगा कि भुला दिया है मैंने तुम्हें। लेकिन इस सब के बावजूद, आधी रात को, तारों की चादर तले जब नींद नहीं आएगी तब मैं तुम्हारे मैसेजेस को निकाल कर पढूंगा और सोचूंगा शायद मेरे प्यार में ही कमी थी, जो तुम्हें न पा सका। फिर अपनी तकलीफ को कम करने की कोशिश करूंगा। समय का चक्र घूमेगा, बड़ी तेजी से घूमेगा। अब तुम कोई प्रेमिका या नई दुल्हन नहीं रहोगी। अब तुम मां बन चुकी होगी। पुराने आशिक की याद और पति के प्यार को छोड़कर तुम अपने बच्चे के लिए सोचोगी अब तुम अपने बच्चे के साथ व्यस्त रहोगी। मतलब अब तक मैं तुम्हारी जिंदगी से पूरी तरीके से हमेशा के लिए निकल चुका होऊंगा। इधर मुझे भी एक अच्छा काम मिल गया होगा। शादी की बात चल रही होगी और लड़की भी पसंद हो गई होगी। अब मेरा भी व्यस्त समय शुरू हो गया होगा। अब मैं तुम्हें सचमुच भूल गया होऊंगा। अब अगर मैं जीवन के किसी मोड़ पर किसी जोड़ी को देखूंगा तो उन्हें देखकर मुझे तुम्हारी याद तो अवश्य आएगी। परंतु अब तकलीफ नहीं होगी ….. एक ही सांस में इतनी लंबी दास्तां सुनाने के बाद शेखर ने देखा कि कल्पना की आंख में आंसू छलक रहे हैं। कल्पना भरी आंखों से शेखर की तरफ देखती है। दोनों बिल्कुल चुप हैं पर आंखे बरस रही हैं। थोड़ी देर बाद कल्पना -"तो क्या सब कुछ यहीं खत्म हो जाएगा?” शेखर -"नहीं.! किसी बात पर, जब तुम अपने पति से रूठ जाओगी लेकिन तुम्हारे पति आराम से सो रहे होंगे। उस रात तुम्हारी आंखों में नींद नहीं होगी और इधर मैं भी अपनी पत्नी से किसी बात पर खफा होकर तुम्हारी तरह जागूंगा। पूरी दुनिया सो रही होगी, सिर्फ हम दोनों के अलावा। फिर हम अपने अतीत को याद करके खूब रोएंगे। एक दूसरे को बहुत महसूस करेंगे। लेकिन इस बात का भगवान के अलावा और किसी को पता नहीं चलेगा। ***********

  • आत्ममंथन

    शैलेन्द्र शर्मा सोचना एकांत में, जब कभी फुर्सत मिले भावनाएँ, रंग क्यों पल-पल बदलतीं हैं। क्यों हवा पुरवा तुम्हें अब पूर्ववत् लगती नहीं और पछुआ के कसीदे में जुबां थकती नहीं झाँक कर देखो जरा अन्त:करण से खुले मन वासनाएं, रंग क्यों पल-पल बदलतीं हैं। कभी कोई दूर लेकिन लगे कितना पास है और कोई पास फिर भी दूर का एहसास है जाँचना फिर जाँचना होकर सहज मन से कभी कामनाएँ, रंग क्यों पल-पल बदलतीं हैं। जो रहे गुणगान करते क्यों छिटक कर दूर हैं गो अभी सावन घटाएँ पास हैं, भरपूर हैं जब कभी अवसर मिले खुद को परखना देखना धारणाएँ, रंग क्यों पल-पल बदलतीं हैं। ********

  • मोची का लालच

    डॉ. कृष्ण कांत श्रीवास्तव किसी गाँव में एक धनी सेठ रहता था। उसके बंगले के पास एक जूते सिलने वाले गरीब मोची की छोटी सी दुकान थी। उस मोची की एक खास आदत थी कि वो जब भी जूते सिलता तो भगवान के भजन गुनगुनाता रहता था। लेकिन सेठ ने कभी उसके भजनों की तरफ ध्यान नहीं दिया। एक दिन सेठ व्यापार के सिलसिले में विदेश गया और घर लौटते वक्त उसकी तबियत बहुत ख़राब हो गयी। लेकिन पैसे की कोई कमी तो थी नहीं सो देश विदेशों से डॉक्टर, वैद्य, हकीमों को बुलाया गया। लेकिन कोई भी सेठ की बीमारी का इलाज नहीं कर सका। अब सेठ की तबियत दिन प्रतिदिन ख़राब होती जा रही थी। वह अब चल फिर भी नहीं पाता था। एक दिन वह घर में अपने बिस्तर पर लेटा था। अचानक उसके कान में मोची के भजन गाने की आवाज सुनाई दी, आज मोची के भजन सेठ को कुछ अच्छे लग रहे थे, कुछ ही देर में सेठ इतना मंत्रमुग्ध हो गया कि उसे ऐसा लगा जैसे वो साक्षात परमात्मा से मिलन कर रहा हो। मोची के भजन सेठ को उसकी बीमारी से दूर लेते जा रहे थे। कुछ देर के लिए सेठ भूल गया कि वह बीमार है उसे अपार आनंद की प्राप्ति हुई। कुछ दिन तक यही सिलसिला चलता रहा। अब धीरे-धीरे सेठ के स्वास्थ्य में सुधार आने लगा। एक दिन उसने मोची को बुलाया और कहा - मेरी बीमारी का इलाज बड़े-बड़े डॉक्टर नहीं कर पाये लेकिन तुम्हारे भजन ने मेरा स्वास्थ्य सुधार दिया। ये लो 1000 रुपये इनाम, मोची खुश होते हुए पैसे लेकर चला गया। लेकिन उस रात मोची को बिल्कुल नींद नहीं आई वो सारी रात यही सोचता रहा कि इतने सारे पैसों को कहाँ छुपा कर रखूं और इनसे क्या-क्या खरीद लूं? इसी सोच की वजह से मोची इतना परेशान हुआ कि अगले दिन काम पर भी नहीं जा पाया। अब भजन गाना तो जैसे वो भूल ही गया था, क्योंकि मन में पैसे की खुशी थी। अब तो उसने काम पर जाना ही बंद कर दिया और धीरे-धीरे उसकी दुकानदारी भी चौपट होने लगी। इधर सेठ की बीमारी फिर से बढ़ती जा रही थी। एक दिन मोची सेठ के बंगले में आया और बोला सेठ जी आप अपने ये पैसे वापस रख लीजिये, इस धन की वजह से मेरा धंधा चौपट हो गया, मैं भजन गाना ही भूल गया। इस धन ने तो मेरा परमात्मा से नाता ही तुड़वा दिया। मोची पैसे वापस करके फिर से अपने काम में लग गया। सार - आप खूब पैसा कमाइए, साथ ही साथ दूसरों के हित को भी ध्यान में रखिए और भगवान का स्मरण करिये। इसी में जीवन का सच्चा आनंद है। ******

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