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- मेरी कोई जायदाद नहीं
अनजान तन्हा बैठा था एक दिन मैं अपने मकान में, चिड़िया बना रही थी घोंसला रोशनदान में। पल भर में आती पल भर में जाती थी वो। छोटे-छोटे तिनके चोंच में भर लाती थी वो। बना रही थी वो अपना घर एक न्यारा, कोई तिनका था, ईंट उसकी कोई गारा। कड़ी मेहनत से घर जब उसका बन गया, आए खुशी के आँसू और सीना तन गया। कुछ दिन बाद मौसम बदला और हवा के झोंके आने लगे, नन्हें से प्यारे-प्यारे दो बच्चे घोंसले में चहचहाने लगे। पाल पोसकर कर रही थी चिड़िया बड़ा उन्हें, पंख निकल रहे थे, दोनों के पैरों पर करती थी खड़ा उन्हें। इच्छुक है हर इंसान कोई जमीन आसमान के लिए, कोशिश थी जारी उन दोनों की एक ऊंची उड़ान के लिए। देखता था मैं हर रोज उन्हें जज्बात मेरे उनसे कुछ जुड़ गए, पंख निकलने पर दोनों बच्चे मां को छोड़ अकेला उड़ गए। चिड़िया से पूछा मैंने तेरे बच्चे तुझे अकेला क्यों छोड़ गए, तूं तो थी मां उनकी फिर ये रिश्ता क्यों तोड़ गए। इंसान के बच्चे अपने मां बाप का घर नहीं छोड़ते, जब तक मिले न हिस्सा अपना, रिश्ता नहीं तोड़ते । चिड़िया बोली परिन्दे और इंसान के बच्चे में यही तो फर्क है, आज के इंसान का बच्चा मोह माया के दरिया में गर्क है। इंसान का बच्चा पैदा होते ही हर शह पर अपना हक जमाता है, न मिलने पर वो मां बाप को कोर्ट कचहरी तक ले जाता है। मैंने बच्चों को जन्म दिया पर करता कोई मुझे याद नहीं, मेरे बच्चे क्यों रहेंगे साथ मेरे, क्योंकि मेरी कोई जायदाद नहीं! *******
- पढ़ने का अलग ढंग
मुकेश ‘नादान’ यह कथा उस समय की है जब नरेंद्रनाथ विद्यालय के लिए पाठशाला में भरती हुए थे। पाठशाला जाने के पहले दत्त-वंश के कुल पुरोहित ने आकर रामखड़ी (लाल रंग की खिल्ली) का चित्र बनाकर नरेंद्र को सिखाया-यह “क' है, यह “ख' है। नरेंद्र ने भी कहा, यह 'क' है, यह “ख' है। इसके बाद धोती पहनकर सरकंडे की कलम लेकर वे पाठशाला गए। किंतु विद्यालय तो एक अपूर्व स्थान होता है। वहाँ अनचाहे, अनजाने, विभिन्न सामाजिक स्तरों के कितने ही लड़के इकट्ठे होते हैं। उनकी बातचीत, बोल-चाल भी सब नए ढंग के होते हैं। इसके फलस्वरूप दो-चार दिनों के भीतर ही शब्दकोश से बाहर के कई शब्दों को नरेंद्र ने सीख लिया। जब उनके माता-पिता को इसका पता चला तो उन्होंने नरेंद्र को उस विद्यालय में रखना उचित नहीं समझा। उन्होंने घर पर ही अपने पूजाघर में एक छोटी सी पाठशाला खोलकर वहाँ गुरुजी के हाथों अपने पुत्र को समर्पित कर दिया। बाहर की पाठशाला में नए संगियों को पाकर नरेंद्र को जो आनंद प्राप्त हुआ था, उसकी कमी भी यहाँ बहुत कुछ पूरी हो गई; क्योंकि इस नई पाठशाला में कई आत्मीय लड़के भी आ गए थे। नरेंद्र ने तब छठे वर्ष में प्रवेश किया था। इस तरह विद्यालय की शिक्षा शुरू होने पर भी माँ के निकट नरेंद्र जो ज्ञान प्राप्त कर रहे थे, वह बंद नहीं हुआ और पुस्तकीय विद्या के हिसाब से बँगला वर्ण परिचय सरकार की अँगरेजी फर्स्ट बुक को उन्होंने माँ से ही पढ़ लिया था। नरेंद्रनाथ के पढ़ने का एक अपना ही ढंग था। अध्यापक महोदय बगल में बैठकर नित्य पाठ पढ़ा जाते और नरेंद्र आँखें मूँदकर सोए-सोए उसे सुनते। इतने से ही उनको दैनिक पाठ याद हो जाता। श्रीरामकृष्ण के भक्त भी रामचंद्र दत्त के पिता नूसिंह दत्त उन दिनों अपने पुत्र के साथ नरेंद्र के घर पर ही रहते थे। रात में नरेंद्र नुसिंह दत्त के साथ ही सोया करते। वृद्ध दत्त महोदय को थोड़ा संस्कृत का ज्ञान था। उनकी धारणा थी कि कठिन विषयों को बचपन से सिखाने से लड़के उन्हें आसानी से याद रख सकते हैं। इस धारणा के कारण वे रात में नरेंद्र को अपने समीप रहने के सुयोग से पुरखों की नामावली, देवी-देवताओं के नाम और मुग्धबोध व्याकरण के सूत्रों को मौखिक रूप से उन्हें सिखाया करते थे। अपनी माता, आत्मीय जन और गुरु महोदय की कृपा से इस प्रकार बैँगला भाषा और संस्कृत में नरेंद्र ने अल्प आयु में ही पर्याप्त ज्ञान प्राप्त कर लिया। सन् 1871 में, जब वे आठ वर्ष के थे, विद्यासागर महाशय के मेट्रोपोलिटन इंस्टीट्यूशन की तत्कालीन नौवीं कक्षा में उनका नामांकन करवा दिया गया। विद्यालय उन दिनों सुकिया-स्ट्रीट में था। वहाँ इन दिनों लाहा का घर हो गया है। विद्यालय के सभी शिक्षकगण उनकी बुद्धिमत्ता से उनकी ओर आकृष्ट हुए। किंतु एक कठिन समस्या उत्पन्न हो गई। अँगरेजी भाषा सीखने के प्रति उन्होंने तीव्र अनिच्छा प्रकट की। सभी लोगों ने बहुत समझाया, “आजकल अँगरेजी शिक्षा पाना आवश्यक है। नहीं सीखने से काम नहीं चलता।” तथापि नरेंद्र की प्रतिज्ञा नहीं 'टली। वृद्ध नृसिंह दत्त महाशय ने भी समझाया, किंतु सफल नहीं हुए। इस तरह कुछ समय बीत जाने पर नरेंद्र ने न जाने क्या सोचकर दत्त महाशय की बात मान ली। इस नई इच्छा के साथ-साथ वे इस प्रकार नए उत्साह से यह भाषा सीखने लगे कि सभी देखकर अवाव्क्त हो गए। इतिहास और संस्कृत भाषा भी उन्होंने सीखी थी, किंतु अंकगणित के प्रति वे विरु थे। प्रवेशिका श्रेणी में अध्ययन काल में यद्यपि उन्हें कड़ा परिश्रम करना पड़ता था तथापि वे केवल किताबी कीड़ा नहीं बनना चाहते थे। वे रटंत विद्या में विश्वास नहीं करते थे। निश्चय ही इसके चलते परीक्षाफल में उन्हें हानि भी 'उठानी पड़ी थी। उनके मनोनुकूल विषयों को अधिक समय मिलता। लेकिन अन्य विषयों में उस प्रकार अधिकार नहीं हो पाता था। उन्हें साहित्य पसंद था। इतिहास में उनकी विशेष रुचि थी। इसीलिए मार्शमैन, एलफिंस्टन आदि विद्वानों की भारत के इतिहास की पुस्तकें उन्होंने पढ़ डालीं। अँगरेजी और बँगला साहित्य की कई अच्छी-अच्छी पुस्तकों का उन्होंने अध्ययन किया था। किंतु गणित की ओर वे भली-भाँति ध्यान नहीं देते थे। एक बार उन्होंने कहा था, “प्रवेशिका परीक्षा के मात्र दो-तीन दिन पहले देखा कि रेखागणित को तो कुछ पढ़ा ही नहीं। तब सारी रात जागकर पढ़ने लगे और चौबीस घंटों में रेखागणित की चार पुस्तकों को 'पढ़कर अधिकृत कर लिया।” इन्ही दिनों उन्होंने पुस्तक पढ़ने की एक नई रीति की खोज की। बाद में उन्होंने बताया था, “ऐसा अभ्यास हो गया था कि किसी लेखक की पुस्तक को पंक्तिबद्ध नहीं पढ़ने पर भी मैं उसे समझ लेता था। हर अनुच्छेद (पैराग्राफ) की प्रथम और अंतिम पंक्तियाँ पढ़कर ही उसका भाव ग्रहण कर लेता। यह शक्ति जब और बढ़ गई, तब अनुच्छेद (पैराग्राफ) पढ़ने की भी जरूरत नहीं पड़ती थी। हर पृष्ठ की प्रथम और अंतिम पंक्तियाँ पढ़कर ही समझ लेता। फिर जहाँ किसी विषय को समझाने के लिए लेखकों ने चार-पाँच या इससे अधिक पृष्ठ लगाकर विवेचन करना शुरू किया होता, वहाँ आरंभ की कुछ बातों को पढ़कर ही मैं उसे समझ लेता था।” *******
- होली का मज़ाक
यशपाल “बीबी जी, आप आवेंगी कि हम चाय बना दें!” किलसिया ने ऊपर की मंज़िल की रसोई से पुकारा। “नहीं, तू पानी तैयार कर- तीनों सेट मेज़ पर लगा दे, मैं आ रही हूँ। बाज़ आए तेरी बनाई चाय से। सुबह तीन-तीन बार पानी डाला, तो भी इनकी काली और ज़हर की तरह कड़वी. . .। तुम्हारे हाथ डिब्बा लग जाए, तो पत्ती तीन दिन नहीं चलती। सात रुपए में डिब्बा आ रहा है। मरी चाय को भी आग लग गई है।” मालकिन ने किलसिया को उत्तर दिया। आलस्य अभी टूटा नहीं था। ज़रा और लेट लेने के लिए बोलती गईं, “बेटा मंटू, तू ज़रा चली जा ऊपर। तीनों पॉट बनवा दे। बेटा, ज़रा देखकर पत्ती डालना, मैं अभी आ रही हूँ।” “अम्मा जी, ज़रा तुम आ जाओ! हमारी समझ में नहीं आता। बर्तन सब लगा दिए हैं।” सत्रह वर्ष की मंटू ने ऊपर से उत्तर दिया। ठीक ही कह रही है लड़की, मालकिन ने सोचा। घर मेहमानों से भरा था, जैसे शादी-ब्याह के समय का जमाव हो। चीफ़ इंजीनियर खोसला साहब के रिटायर होने में चार महीने ही शेष थे। तीन वर्ष की एक्सटेंशन भी समाप्त हो रही थी। पिछले वर्ष बड़े लड़के और लड़की के ब्याह कर दिए थे। रिटायर होकर तो पेंशन पर ही निर्वाह करना था। जो काम अब हज़ार में हो जाता, रिटायर होने पर उस पर तीन हज़ार लगते। रिटायर होकर इतनी बड़ी, तेरह कमरे की हवेली भी नहीं रख सकते थे। पहली होली पर लड़की जमाई के साथ आई थी। बड़ा लड़का आनंद सात दिन की छुट्टी लेकर आया था, इसलिए बहू को भी बुला लिया था। आनंद की छोटी साली भी बहन के साथ लखनऊ की सैर के लिए आ गई थी। इंजीनियर साहब के छोटे भाई गोंडा जिले में किसी शुगर मिल में इंजीनियर थे। मई में उनकी लड़की का ब्याह था। वे पत्नी, साली और लड़की के साथ दहेज ख़रीदने के लिए लखनऊ आए हुए थे। खूब जमाव था। मालकिन ऊपर पहुँची। प्लेटों में अंदाज़ से नमकीन और मिठाई रखी। जमाई ज्ञान बाबू के लिए बिस्कुट और संतरे रखे। साहब इस समय कुछ नहीं खाते थे। उनके लिए थोड़ी किशमिश रखी। किलसिया और सित्तो के हाथ नीचे भेजने के लिए ट्रे में चाय लगाने लगीं। “अम्मा जी, यह क्या?” मंटू माँ के बायें हाथ की ओर संकेत कर झल्ला उठी, “फिर वही डंडे जैसी खाली कलाइयाँ! कड़ा फिर उतार दिया! तुम्हें तो सोना घिस जाने की चिंता खाए जाती है।” “नहीं मंटू. . .” माँ ने समझाना चाहा। “तुम ज़रा ख़याल नहीं करतीं,” मंटू बोलती गई, “इतने लोग घर में आए हुए हैं। त्योहार का दिन है। यही तो समय होता है कि कुछ पहनने का और तुम उतार कर रख देती हो।” मंटू झुँझला ही रही थी कि उसकी चाची, मालकिन की देवरानी लीला नाश्ते में सहायता देने के लिए ऊपर आ गई। उसने भी मंटू का साथ दिया, “हाँ भाभी जी, त्योहार का दिन है, घर में बहू आई है, जमाई आया है, ऐसे समय भी कुछ नहीं पहना! कलाई नंगी रहे, तो असगुन लगता है। सुबह तो चूड़ियाँ भी थीं, कड़ा भी था।” मालकिन ने नाश्ता बाँटने से हाथ रोककर मंटू से कहा, “जा नन्हीं, दौड़कर जा, बीचवाले गुसलखाने में देख! सिर धोने लगी थी, तो बालों में उलझ रहा था, वहीं उतार कर रख दिया था। जहाँ मंजन-वंजन पड़ा रहता है, वहीं रखा था। लाकर पहना दे!” “मंटू जी ने धड़धड़ाती हुई नीचे गई। गुसलखाने में देखकर उसने वहीं से पुकारा, “अम्मा जी, यहाँ कुछ नहीं है।” मालकिन ने मंटू की बात सुनी, तो चेहरे पर चिंता झलक आई। देवरानी से बोलीं, “लीला, मेरे बाद तुम नहाई थी न। तुमने नहीं देखा! आलमारी में रख दिया था।” और फिर वहीं बैठे-बैठे मंटू को उत्तर दिया, “अच्छा बेटी, ज़रा अपने कमरे में तो देख ले! ड्रेसिंग टेबल की दराज़ में देख लेना, कपड़े वहीं पहने थे!” लीला की बहन कैलाश भी आ गई थी। उसने भी पूछ लिया, “क्या है, क्या नहीं मिल रहा?” लीला को भाभी की बात अच्छी नहीं लगी। चेहरा गंभीर हो गया। उसने तुरंत अपनी बहन को संबोधन किया, “काशो, हम दोनों तो नीचे के गुसलखाने में नहाने गई थीं. . .।” मालकिन ने देवरानी के बुरा मान जाने की आशंका में तुरंत बात बदली, “मैं तो कह रही हूँ कि तू वहाँ नहाई होती तो उठाकर सँभाल लिया होता।” भाभी की बात से लीला को संतोष नहीं हुआ। उसने फिर कैलाश को याद दिलाया, “काशो, मैं बीच के गुसलखाने में जा रही थी, तो किलसिया ने नहीं कहा था कि बहू का साबुन-तौलिया और उसके लिए गरम पानी रख दिया है। आपके बाद तो कुसुम ही नहाई थी। सँभाल कर रखा होगा तो उसी के पास होगा।” बीच की मंज़िल से फिर मंटू की पुकार सुनाई दी, “अम्मा जी, यहाँ भी नहीं है, मैंने सब देख लिया है।” मालकिन ने कैलाश से कहा, “काशो बहन, तू जा नीचे, मंटू से कह कि ज़रा कुसुम से पूछ ले। उसने सँभाल लिया होगा। मुझे तो यही याद है कि गुसलखाने की आलमारी में रखा था।” कैलाश नीचे जा रही थी, तो लीला ने मालकिन को सुझाया, “भाभी जी, आपके बाद. . .।” किलसिया कमरे में आ गई थी। बोली, “गोल कमरे में चाय दे दी है। बड़े साहब, जमाई बाबू और बड़े भैया तीनों वहीं पी रहें हैं। पकौड़ी लौटा दी है, कोई नहीं खाएगा। बहू जी, उनकी बहन और बड़ी बिटिया भी चाय नीचे मँगा रही हैं।” “सित्तो क्या कर रही है?” मालकिन ने किलसिया से पूछा। “नीचे के गुसलखाने में कपड़े धो रही है।” किलसिया बहू, उनकी बहन और बड़ी बिटिया के लिए चाय लेकर चली तो बोली, “आपके बाद कुसुम से पहले किलसिया भी तो गुसलखाने में गई थी। उसी ने तो आपके कपड़े उठाकर कुसुम के लिए साबुन-तौलिया रखा था।” लीला ने स्वर दबा कर कहा। “भाभी जी, मैंने आपसे कहा नहीं, पर किलसिया की आदत अच्छी नहीं है। पहले भी देखा, इस बार भी दो बार पैसे उठ चुके हैं। परसों मैंने मेज़ की दराज में एक रुपया तेरह आना रख दिए थे, चार आने चले गए। ‘इनके’ कोट की जेब में रुपए-रुपए के सत्ताइस नोट थे, एक रुपया उड़ गया। कमरे किलसिया ही साफ़ करती है। मैंने सोचा, इतनी-सी बात के लिए मैं क्या कहूँ?” मालकिन ने समझाया, “तू भी क्या कहती है लीला! आठ आने, रुपए की बात मैं मानती हूँ, मरी उठा लेती होगी पर पाँच तोले का कड़ा उठा ले, ऐसी हिम्मत कहाँ? मरी बेचने जाएगी तो पकड़ी नहीं जाएगी?” मंटू और कैलाश ने आकर बताया, “कुसुम भाभी कहती हैं कि उन्होंने तो कड़ा देखा नहीं।” सित्तो ने कपड़े धोकर सामने की छत पर लगे तारों पर फैला दिए थे। उसने वहीं से मालकिन को पुकारा, “बीबी जी, सब काम हो गया, अब हम जाएँ!” किलसिया फिर ऊपर आ गई थी। वह भी बोली, “हमें भी छुट्टी दीजिए, त्योहार का दिन है, ज़रा घर की भी सुध लें।” “जाना बाद में,” मालकिन बोलीं, “देखो, हमने सिर धोया था तो कड़ा उतार की गुसलखाने की अलमारी में रख दिया था। पहले ढूंढ़ कर लाओ, तब कोई घर जाएगा।” किलसिया ने तुरंत विरोध किया, “हम क्या जाने, हमें तो जिसने जो कपड़ा दिया गुसलखाने में रख दिया। रंग से ख़राब कपड़े उठा कर धोबी वाली पिटारी में डाल दिए। हमने छुआ हो तो हमारे हाथ टूटें।” सित्तो ने दुहाई दी, “हाय बीबी जी, हम तो बीच के गुसलखाने में गई ही नहीं। हम तो सुबह से महाराज के साथ बर्तन-भांडे में लगी रहीं और तब से नीचे कपड़े धो रही थीं।” “ख़ामख़्वाह क्यों बकती हो!” मालकिन ने दोनों को डाँट दिया, “मैं किसी को कुछ कह रही हूँ? कड़ा गुस्लख़ाने में रखा था, पाँच तोले का है, कोई मज़ाक तो है नहीं! किसकी हिम्मत है जो पचा लेगा!” घर भर में चिंता फैल गई। सब ओर खुसुर-फुसुर होने लगी। बात मर्दों में भी पहुँच गई। जमाई ज्ञान बाबू ने पुकारा, “क्यों मंटा बहन जी, क्या बात है? माँ जी, मंटा ने छिपा लिया है। कहती है पाँच चाकलेट दोगी तो ढूंढ देगी।” मंटा ने विरोध किया, “हाय जीजा जी, कितना झूठ! मैंने कब कहा? मैं तो खुद सब जगह ढूँढ़ती फिर रही हूँ।” बड़ा लड़का आनंद भी बोल उठा, “अम्मा जी, याद भी है कि कड़ा पहना था। कहीं स्टील वाली अलमारी में ही तो नहीं पड़ा है। तुम घर भर ढूँढ़वा रही हो। तुम भूल भी तो जाती हो। चाभियाँ रखती हो ड्रेसिंग टेबल की दराज में छिपाकर और ढूँढ़ती हो रसोई में।” मालकिन ने जीना उतरते हुए बेटे को उत्तर दिया, “तुम भी क्या कह रहे हो? कल शाम लीला के साथ दाल धो रही तो बायें हाथ से घड़ी खोल कर रख दी थी। मंटू ने शोर मचाया, खाली कलाई अच्छी नहीं लगती। वही घड़ी नीचे रखकर कड़ा ले आई थी।” बड़ी लड़की ने माँ का समर्थन किया, “क्या कह रहे हो भैया, सुबह भी कड़ा अम्मा जी के हाथ में था। हमने खुद देखा है।” कैलाश ने भी वीणा का समर्थन किया, “सुबह मिश्रानी जी के यहाँ गई थीं, तब भी कड़ा हाथ में था। मिश्रानी जी ने नहीं कहा था कि बहुत दिनों बाद पहना है!” सित्तो ने दोनों गुसलखाने अच्छी तरह देखे। फिर महाराज के साथ रसोई में सब जगह देख रही थी। किलसिया सब कमरों में जा-जाकर ढूंढ़ रही थी। न देखने लायक जगह में भी देख रही थी और बड़बड़ाती जा रही थी, “बीबी जी चीज़-बस्त खुद रख कर भूल जाती हैं और हम पर बिगड़ा करती हैं।” बात घर में फैल गई थी। बड़े साहब और छोटे साहब ने भी सुन लिया था। दोनों ही इस विषय में जिज्ञासा कर चुके थे। छोटे साहब भाभी से अंग्रेज़ी में पूछ रहे थे, “आपके नहाने के बाद नौकरों में से कोई घर के बाहर गया था या नहीं?” सभी सहमे हुए थे। स्त्रियाँ, लड़कियाँ सब आँगन में इकट्ठी हो गई थीं। दबे-दबे स्वर में नौकरों के चोरी लगने के उदाहरण बता रही थीं। अब मालकिन भी घबरा गईं थीं। देवरानी ने उनके समीप आकर फिर कहा, “देखा नहीं भाभी, किलसिया क़समें तो बहुत खा रही थी पर चेहरा उतर गया है।” “यहाँ आकर तो देखिए!” किलसिया ने बड़े साहब के कमरे से चिक उठाकर पुकारा। “क्यों, क्या है?” मंटा और वीणा ने एक साथ पूछ लिया। “हम कह रहे हैं, यहाँ तो आइए!” किलसिया ने कुछ झुँझलाहट दिखाई। वीणा और मंटा उधर चली गईं। दोनों बहनें कमरे से बाहर निकलीं तो मुँह छिपाए दोहरी हुई जा रही थीं। हँसी रोकने के लिए दोनों ने मुँह पर आँचल दबा लिए थे। किलसिया कमरे से निकली तो भवें चढ़ाकर ऊँचे स्वर में बोल उठीं, “रात साहब के तकिये के नीचे छोड़ आईं। घर भर में ढुँढ़ाई करा रही हैं।” “पापा के तकिये के नीचे।” मंटा ने हँसी से बल खाते हुए कह ही दिया। लीला, कुसुम, कैलाश, नीता सबके चेहरे लाज से लाल हो गए। सब मुँह छिपा कर फिस-फिस करती इधर से उधर भाग गईं। मालकिन का चेहरा खिसियाहट से गंभीर हो गया। अवाक निश्चल रह गईं। वीणा से ज्ञान बाबू ने अर्थपूर्ण ढंग से खाँस कर कहा, “कड़ा मिलने की तो डबल मिठाई मिलनी चाहिए।” छोटे बाबू से भी रहा नहीं गया, बोल उठे, “भाभी, क्या है?” गोल कमरे से बड़े साहब की भी पुकार सुनाई दी, “मिल गया, मंटू कहाँ से मिला है?” मंटू मुँह में आँचल ठूँसे थी, कैसे उत्तर देती? छोटे साहब फिर बोले, “भाभी, भैया क्या पूछ रहे हैं?” मालकिन खिसियाहट से बफरी हुई थीं, क्या बोलतीं? लीला ने हँसी दबाकर भाभी के काम न में कहा, “देखा चालाक को, कहाँ जाकर रख दिया। तभी ढूँढ़ती फिर रही थी।” ज़ेवर चोरी की बात पड़ोसी मिश्रा जी के यहाँ भी पहुँच गई थी। मिश्राइन जी ने आकर पूछ लिया, “मंटू की माँ, क्या बात है, क्या हुआ?” “कुछ नहीं, कुछ नहीं।” मालकिन को बोलना पड़ा, “ख़ामख़्वाह शोर मचा दिया।” कुसुम से रहा नहीं गया। अपने कमरे से झाँक कर बोली, “ताई जी, किलसिया ने अम्मा जी के साथ होली का मज़ाक किया है।” ********
- मन बच्चा
वीना उदय मन फिर-फिर बच्चा हो जाता है। जब 80 साल की बुजुर्ग पिता को अपनी चिंता करता पाता है। बूढ़ी सशक्त हड्डियां सारी ताकत समेट जब पूरे आत्मविश्वास से कहती हैं। मैं हूं ना, मैं हूं ना। बेटा किसी बात की चिंता ना करना मैं हर पल तुम्हारे साथ हूं ना। दुनिया की हर खुशियां मुझ पर लुटाने को आतुर पिता और मेरी नजर उतार हर बला को दूर भगाने की कोशिश में जुटी मां जब पूछती है बेटा खाना खाया तो भूख ना होने पर भी मां के हाथों की गरमागरम रोटियों का लालच भूख जगा जाता है। तुम्हारा ध्यान करने की उम्र में जब तुम दोनों मेरे ख्याल रखते हो तो मन फिर-फिर बच्चा हो जाता है। तुम्हारा साया हर पल मेरे सिर पर यूं ही बना रहे और मेरा मन यूं ही बच्चा बन कर जिए। ******
- दु:ख का अधिकार
यशपाल मनुष्यों की पोशाकें उन्हें विभिन्न श्रेणियों में बाँट देती हैं। प्रायः पोशाक ही समाज में मनुष्य का अधिकार और उसका दर्जा निश्चित करती है। वह हमारे लिए अनेक बंद दरवाजे खोल देती है, परंतु कभी ऐसी भी परिस्थिति आ जाती है कि हम जरा नीचे झुककर समाज की निचली श्रेणियों की अनुभूति को समझना चाहते हैं। उस समय यह पोशाक ही बंधन और अड़चन बन जाती है। जैसे वायु की लहरें कटी हुई पतंग को सहसा भूमि पर नहीं गिर जाने देतीं, उसी तरह खास परिस्थितियों में हमारी पोशाक हमें झुक सकने से रोके रहती है। बाज़ार में, फुटपाथ पर कुछ ख़रबूज़े डलिया में और कुछ जमीन पर बिक्री के लिए रखे जान पड़ते थे। ख़रबूज़ों के समीप एक अधेड़ उम्र की औरत बैठी रो रही थी। ख़रबूज़े बिक्री के लिए थे, परंतु उन्हें खरीदने के लिए कोई कैसे आगे बढ़ता? ख़रबूज़ों को बेचनेवाली तो कपड़े से मुँह छिपाए सिर को घुटनों पर रखे फफक-फफककर रो रही थी। पड़ोस की दुकानों के तख़्तों पर बैठे या बाज़ार में खड़े लोग घृणा से उसी स्त्री के संबंध में बात कर रहे थे। उस स्त्री का रोना देखकर मन में एक व्यथा-सी उठी, पर उसके रोने का कारण जानने का उपाय क्या था? फुटपाथ पर उसके समीप बैठ सकने में मेरी पोशाक ही व्यवधान बन खड़ी हो गई। एक आदमी ने घृणा से एक तरफ़ थूकते हुए कहा, ‘क्या जमाना है! जवान लड़के को मरे पूरा दिन नहीं बीता और यह बेहया दुकान लगा के बैठी है।’ दूसरे साहब अपनी दाढ़ी खुजाते हुए कह रहे थे, ‘अरे जैसी नीयत होती है अल्ला भी वैसी ही बरकत देता है।’ सामने के फुटपाथ पर खड़े एक आदमी ने दियासलाई की तीली से कान खुजाते हुए कहा, ‘अरे, इन लोगों का क्या है? ये कमीने लोग रोटी के टुकड़े पर जान देते हैं। इनके लिए बेटा-बेटी, ख़सम-लुगाई, धर्म-ईमान सब रोटी का टुकड़ा है।’ परचून की दुकान पर बैठे लाला जी ने कहा, ‘अरे भाई, उनके लिए मरे-जिए का कोई मतलब न हो, पर दूसरे के धर्म-ईमान का तो खयाल करना चाहिए! जवान बेटे के मरने पर तेरह दिन का सूतक होता है और वह यहाँ सड़क पर बाज़ार में आकर ख़रबूज़े बेचने बैठ गई है। हजार आदमी आते-जाते हैं। कोई क्या जानता है कि इसके घर में सूतक है। कोई इसके ख़रबूज़े खा ले तो उसका ईमान- धर्म कैसे रहेगा? क्या अँधेर है!’ पास-पड़ोस की दुकानों से पूछने पर पता लगा-उसका तेईस बरस का जवान लड़का था। घर में उसकी बहू और पोता-पोती हैं। लड़का शहर के पास डेढ़ बीघा भर जमीन में कछियारी करके परिवार का निर्वाह करता था। ख़रबूज़ों की डलिया बाज़ार में पहुँचाकर कभी लड़का स्वयं सौदे के पास बैठ जाता, कभी माँ बैठ जाती। लड़का परसों सुबह मुँह-अँधेरे बेलों में से पके ख़रबूज़े चुन रहा था। गीली मेड़ की तरावट में विश्राम करते हुए एक साँप पर लड़के का पैर पड़ गया। साँप ने लड़के को डस लिया। लड़के की बुढ़िया माँ बावली होकर ओझा को बुला लाई। झाड़ना-फूँकना हुआ। नागदेव की पूजा हुई। पूजा के लिए दान-दक्षिणा चाहिए। घर में जो कुछ आटा और अनाज था, दान-दक्षिणा में उठ गया। माँ, बहू और बच्चे ‘भगवाना’ से लिपट-लिपटकर रोए, पर भगवाना जो एक दफ़े चुप हुआ तो फिर न बोला। सर्प के विष से उसका सब बदन काला पड़ गया था। ज़िंदा आदमी नंगा भी रह सकता है, परंतु मुर्दे को नंगा कैसे विदा किया जाए? उसके लिए तो बजाज की दुकान से नया कपड़ा लाना ही होगा, चाहे उसके लिए माँ के हाथों के छन्नी-ककना ही क्यों न बिक जाएं । भगवाना परलोक चला गया। घर में जो कुछ चूनी-भूसी थी सो उसे विदा करने में चली गई। बाप नहीं रहा तो क्या, लड़के सुबह उठते ही भूख से बिलबिलाने लगे। दादी ने उन्हें खाने के लिए ख़रबूज़े दे दिए लेकिन बहू को क्या देती? बहू का बदन बुख़ार से तवे की तरह तप रहा था। अब बेटे के बिना बुढ़िया को दुअन्नी-चवन्नी भी कौन उधार देता। बुढ़िया रोते-रोते और आँखें पोंछते-पोंछते भगवाना के बटोरे हुए ख़रबूज़े डलिया में समेटकर बाज़ार की ओर चली-और चारा भी क्या था? बुढ़िया ख़रबूज़े बेचने का साहस करके आई थी, परंतु सिर पर चादर लपेटे, सिर को घुटनों पर टिकाए हुए फफक-फफककर रो रही थी। कल जिसका बेटा चल बसा, आज वह बाज़ार में सौदा बेचने चली है, हाय रे पत्थर-दिल! उस पुत्र-वियोगिनी के दुःख का अंदाजा लगाने के लिए पिछले साल अपने पड़ोस में पुत्र की मृत्यु से दुःखी माता की बात सोचने लगा। वह संभ्रांत महिला पुत्र की मृत्यु के बाद अढ़ाई मास तक पलंग से उठ न सकी थी। उन्हें पंद्रह-पंद्रह मिनट बाद पुत्र-वियोग से मूर्छा आ जाती थी और मूर्छा न आने की अवस्था में आँखों से आँसू न रुक सकते थे। दो-दो डॉक्टर हरदम सिरहाने बैठे रहते थे। हरदम सिर पर बर्फ़ रखी जाती थी। शहर भर के लोगों के मन उस पुत्र-शोक से द्रवित हो उठे थे। जब मन को सूझ का रास्ता नहीं मिलता तो बेचैनी से कदम तेज हो जाते हैं। उसी हालत में नाक ऊपर उठाए, राह चलतों से ठोकरें खाता मैं चला जा रहा था। सोच रहा था- शोक करने, गम मनाने के लिए भी सहूलियत चाहिए और दुःखी होने का भी एक अधिकार होता है। *******
- ग़म गुसार
उषा श्रीवास्तव किए हैं दफ़्न कई राज़ अब बताऊं क्या कफ़न ये ओढ़ने से पहले मुस्कुराऊं क्या। खटक रही हूं नज़र में अगर ज़ियादा मैं तेरे गुनाह भी इक बार मैं गिनाऊं क्या। चमक रहा है नगीने सा जो अंगूठी में उसी के दिल की वसीयत पे हक़ जताऊं क्या। मैं ग़म गुसार बनूँ है कहाँ मेरी किस्मत सुकूं मिले तो ग़ज़ल गीत मैं सुनाऊं क्या। उसे तलब है कि सजदे करूं सियासत में मैं गर्दिशों में झुकूं सर कलम कराऊं क्या। ******
- राही
सुभद्रा कुमारी चौहान “तेरा नाम क्या है?” “राही” “तुझे किस अपराध में सज़ा हुई?” “चोरी की थी, सरकार।” “चोरी? क्या चुराया था?” “अनाज की गठरी।” “कितना अनाज था?” “होगा पाँच-छः सेर।” “और सज़ा कितने दिन की है?” “साल भर की।” “तो तूने चोरी क्यों की? मजदूरी करती, तब भी तो दिन भर में तीन-चार आने पैसे मिल जाते!” “हमें मजदूरी नहीं मिलती सरकार। हमारी जाति मांगरोरी है। हम केवल मांगते-खाते हैं।” “और भीख न मिले तो?” “तो फिर चोरी करते हैं। उस दिन घर में खाने को नहीं था। बच्चे भूख से तड़प रहे थे। बाजार में बहुत देर तक मांगा। बोझा ढोने के लिए टोकरा लेकर भी बैठी रही। पर कुछ न मिला। सामने किसी का बच्चा रो रहा था, उसे देखकर मुझे अपने भूखे बच्चों की याद आ गई। वहीं पर किसी की अनाज की गठरी रखी हुई थी। उसे लेकर भागी ही थी कि पुलिसवाले ने पकड़ लिया।” अनिता ने एक ठंडी साँस ली। बोली, “फिर तूने कहा नहीं कि बच्चे भूखे थे, इसलिए चोरी की। संभव है इस बात से मजिस्ट्रेट कम सज़ा देता।” “हम गरीबों की कोई नहीं सुनता, सरकार। बच्चे आये थे कचहरी में। मैंने सब-कुछ कहा, पर किसी ने नहीं सुना।” राही ने कहा। “अब तेरे बच्चे किसके पास हैं? उनका बाप है?” अनिता ने पूछा। राही की आँखों में आँसू आ गए। वह बोली, “उनका बाप मर गया, सरकार। जेल में उसे मारा था और वहीं अस्पताल में वह मर गया। अब बच्चों का कोई नहीं है।” “तो तेरे बच्चों का बाप भी जेल में ही मरा। वह क्यों जेल आया था?” अनिता ने प्रश्न किया। “उसे तो बिना कसूर के ही पकड़ लिया था, सरकार।” राही ने कहा, “ताड़ी पीने को गया था। दो-चार दोस्त भाई उसके साथ थे। मेरे घरवाले का एक वक्त पुलिसवाले से झगड़ा हो गया था, उसी का बदला उनसे लिया। 109 में उसका चालान करके साल भर की सज़ा दिला दी। वहीं वह मर गया।” अनीता ने एक दीर्घ निःश्वास के साथ कहा, “अच्छा जा, अपना काम कर।” राही चली गई। अनीता सत्याग्रह करके जेल आई थी। पहिले उसे ‘बी‘ क्लास दिया था। फिर उसके घरवालों ने लिखा-पढ़ी करके उसे ‘ए‘ क्लास दिलवा दिया। अनीता के सामने आज एक प्रश्न था। वह सोच रही थी कि देश की दरिद्रता और इन निरीह गरीबों के कष्टों को दूर करने का कोई उपाय नहीं है? हम सभी परमात्मा की संतान हैं। एक ही देश के निवासी। कम-से-कम हम सबको खाने-पहनने का समान अधिकार तो है ही? फिर यह क्या बात है कि कुछ लोग तो बहुत आराम से रहते हैं और कुछ लोग पेट के अन्न के लिए चोरी करते हैं? उसके बाद विचारक की अदूरदर्शिता के कारण या सरकारी वकील के चातुर्यपूर्ण जिरह के कारण छोटे-छोटे बच्चों की मातायें जेल भेज दी जाती हैं। उनके बच्चे भूखों मरने के लिए छोड़ दिये जाते हैं। एक ओर तो यह कैदी है, जो जेल आकर सचमुच जेल जीवन के कष्ट उठाती है, और दूसरी ओर हैं हम लोग, जो अपनी देशभक्ति और त्याग का ढिंढोरा पीटते हुए जेल आते हैं। हमें आमतौर से दूसरे कैदियों के मुकाबिले में अच्छा बर्ताव मिलता है। फिर भी हमें संतोष नहीं होता। हम जेल आकर ‘ए‘ और ‘बी‘ क्लास के लिए झगड़ते हैं। जेल आकर ही हम कौन-सा बड़ा त्याग कर देते हैं? जेल में हमें कौन-सा कष्ट रहता है? सिवा इसके कि हमारे माथे पर नेतृत्व की सील लग जाती है। हम बड़े अभिमान से कहते हैं, “यह हमारी चौथी जेल यात्रा है, यह हमारी पांचवीं जेल यात्रा है।” और अपनी जेल यात्रा के किस्से बार-बार सुना-सुनाकर आत्मगौरव अनुभव करते हैं; तात्पर्य यह कि हम जितने बार जेल जा चुके होते हैं, उतनी ही सीढ़ी हम देशभक्ति और त्याग से दूसरों से ऊपर उठ जाते हैं और इसके बल पर जेल से छूटने के बाद, कांग्रेस को राजकीय सत्ता मिलते ही, हम मिनिस्टर, स्थानीय संस्थाओं के मेम्बर और क्या-क्या हो जाते हैं। अनीता सोच रही थी, “कल तक जो खद्दर भी न पहनते थे, बात-बात पर कांग्रेस का मज़ाक उड़ाते थे, कांग्रेस के हाथों में थोड़ी शक्ति आते ही वे कांग्रेस भक्त बन गए। खद्दर पहनने लगे। यहाँ तक कि जेल में भी दिखाई पड़ने लगे। वास्तव में यह देशभक्ति है या सत्ताभक्ति!” अनीता के विचारों का तांता लगा हुआ था। वह दार्शनिक हो रही थी। उसे अनुभव हुआ, जैसे कोई भीतर-ही-भीतर उसे काट रहा हो। अनीता की विचारावली अनीता को ही खाये जा रही थी। उसे बार-बार यह लग रहा था कि उसकी देशभक्ति सच्ची देशभक्ति नहीं, वरन् मज़ाक है। उसे आत्मग्लानि हुई और साथ-ही-साथ आत्मानुभूति भी। अनीता की आत्मा बोल उठी, “वास्तव में सच्ची देशभक्ति तो इन गरीबों के कष्ट-निवारण में है। ये कोई दूसरे नहीं, हमारी ही भारतमाता की संतानें हैं। इन हज़ारों, लाखों भूखे-नंगे भाई-बहिनों की यदि हम कुछ भी सेवा कर सकें, थोड़ा भी कष्ट-निवारण कर सकें, तो सचमुच हमने अपने देश की कुछ सेवा की। हमारा वास्तविक देश तो देहातों में ही है। किसानों की दुर्दशा से हम सभी थोड़े-बहुत परिचित हैं, पर इन गरीबों के पास न घर है, न द्वार। अशिक्षा और अज्ञान का इतना गहरा पर्दा इनकी आँखों पर है कि होश संभालते ही माता पुत्री को और सास बहू को चोरी की शिक्षा देती है। और उनका यह विश्वास है कि चोरी करना और भीख मांगना ही उनका काम है। इससे अच्छा जीवन बिताने की वह कल्पना ही नहीं कर सकते। आज यहाँ डेरा डाल के रहे, तो कल दूसरी जगह चोरी की। बचे तो बचे, नहीं तो फिर साल दो साल के लिए जेल। क्या मानव जीवन का यही लक्ष्य है? लक्ष्य है भी अथवा नहीं? यदि नहीं है, तो विचारादर्श की उच्च सतह पर टिके हुए हमारे जन-नायकों और युग-पुरुषों की हमें क्या आवश्यकता? इतिहास, धर्म-दर्शन, ज्ञान-विज्ञान का कोई अर्थ नहीं होता? पर जीवन का लक्ष्य है, अवश्य है। संसार की मृग-मरीचिका में हम लक्ष्य को भूल जाते हैं। सतह के ऊपर तक पहुँच पाने वाली कुछेक महान आत्माओं को छोड़कर सारा जन-समुदाय संसार में अपने को खोया हुआ पाता है, कर्त्तव्याकर्त्तव्य का उसे ध्यान नहीं, सत्यासत्य की समझ नहीं, अन्यथा मानवीयता से बढ़कर कौन-सा मानव धर्म है? पतित मानवता को जीवन-दान देने की अपेक्षा भी कोई महत्तर पुण्य है? राही जैसी भोली-भाली, किंतु गुमराह आत्माओं के कल्याण की साधना जीवन की साधना होनी चाहिए। सत्याग्रही की यह प्रथम प्रतिज्ञा क्यों न हो? देशभक्ति का यही मापदंड क्यों न बने?” अनीता दिन भर इन्हीं विचारों में डूबी रही। शाम को भी वह इसी प्रकार कुछ सोचते-सोचते सो गई। रात में उसने सपना देखा कि जेल से छूटकर वह इन्हीं मांगरोरी लोगों के गाँव में पहुँच गई है। वहाँ उसने एक छोटा-सा आश्रम खोल दिया है। उसी आश्रम में एक तरफ़ छोटे-छोटे बच्चे पढ़ते हैं और स्त्रियाँ सूत काटती हैं। दूसरी तरफ़ मर्द कपड़ा बुनते हैं और रूई धुनकते हैं। शाम को रोज़ उन्हें धार्मिक पुस्तकें पढ़कर सुनाई जाती हैं और देश में कहाँ क्या हो रहा है, यह सरल भाषा में समझाया जाता है। वही भीख मांगने और चोरी करने वाले आदर्श ग्रामवासी हो चले हैं। रहने के लिए उन्होंने छोटे-छोटे घर बना लिए हैं। राही के अनाथ बच्चों को अनीता अपने साथ रखने लगी है। अनीता यही सुख-स्वप्न देख रही थी। रात में वह देर से सोई थी। सुबह सात बजे तक उसकी नींद न खुल पाई। अचानक स्त्री जेलर ने आकर उसे जगा दिया और बोली, “आप घर जाने के लिए तैयार हो जाइए। आपके पिता बीमार हैं। आप बिना शर्त छोड़ी जा रही हैं।” अनीता अपने स्वप्न को सच्चाई में परिवर्तित करने की एक मधुर कल्पना ले घर चली गई। ******
- आतप प्रताप
वीना उदय दिनकर के आतप से आकुल अवनि का आँचल है तृषित है जन-जन, व्याकुल तन-मन ठाँव ढूँढते वन-वन। लुप्त हुई मानो हरियाली, सूखी पत्ती-पत्ती औ डाली चिड़िया दुबक गई खोतों में, दादुर हुए कूप मंडूक सन्नाटे में उपवन। पिक मानो हुई काक समान, नहीं सुनाती रसमय गान मेहप्रिये ने नर्तन त्यागा, तनिक नहीं उल्लास है जागा कुपित है क्यों घनश्याम। सिंह, ब्याल, गजराज रीछ, सारे सामिष और निरामिष बैठ सघन - वन सरवर तीरे, एक दूजे के हुए हितैषी दिनकर दीपक राग सुनाए। त्राहि माम जन-जन ने पुकारा, वृष्टि यज्ञ कर मघवा को पुकारा आए देवेंद्र, आए पुरंदर, मेघों पर कर आरोहण मेघ मल्हार गाएँ हर्षित जन। ******
- दिल की सुन
सुमन मोहिनी वो वफ़ा करें या जफ़ा करें सब क़बूल सजदे में उनके हमने सर को झुकाया है। इस दिल की बेक़रारी क्या समझेगा वो जिसके लिए होशो हवास अपना गवाया है। ये दिल भी तो देखो कितना धोखेबाज़ है कहीं और जाकर इसने आशियां बसाया है। दिल और दिमाग़ की इस जद्दो ज़हद में आख़िर तो दिल का ही परचम लहराया है। ए ख़ुदा दुआ इस दिल की क़बूल कर ले उनके दरस को क्यों इतना तड़पाया है। दिल से दिल को राह तो है ये माना हमने फिर सदा वो मेरे दिल की सुन क्यों ना पाया है। दिल की तमन्ना कहीं दिल ही में ना रह जाए उनसे एक बार मुलाक़ात का मन बनाया है। इस दिल की हालत अब कौन समझेगा ‘सुमन’ सबने ही तो कर दिया हमको पराया है। ******
- समय का फेर
डॉ उर्मिला सिन्हा "यह कुलच्छिनी जन्म लेते मां को खा गई फिर बाप को। इसके साये से भी दूर रहना चाहिए। "ताई दांत पीस-पीस कर कोसे जा रही थी। सब का लात मार के साथ जूठन खा अनाथ बालिका रमा जैसे-तैसे ताई ताऊ बुआ दादी के सहारे बड़ी हुई। उस पर कोढ में खाज की तरह रमा का रुपवती होना किसी को फूटी आंख नहीं सुहाता था। क्योंकि फटे पुराने उतरन पहनकर भी उसका रुप दमक उठता। उसके सुंदरता के आगे घर की अन्य लड़कियां पानी भरती। फिर क्या था रमा को नीचा दिखाने के लिए "खा खा के मुटा रही है... काम के न काज के " चाची का गुस्सा सातवें आसमान पर रहता था। थर-थर कांपती रमा सिर झुकाये सबकी तीमारदारी में लगी रहती। उसकी बुद्धि भी बहुत तेज थी। जहाँ घर के अन्य बच्चे महंगे स्कूल में संसाधनों के साथ खींच-तीन कर पास होते वहीं सरकारी स्कूल में रमा को वजीफा मिलता। "ला ये पैसे हमें दे... मुफ्त खोरी की आदत पड़ी हुई है" जख्म पर नमक छिड़कने वालों की कमी न थी। ईश्वर की माया... ऐसे ही रोते-धोते गाली गलौज फजीहत के बीच अपने परिश्रम के बल पर रमा का चयन पहली ही बार में प्रशासनिक सेवा में चयन हो गया। पेपर मीडिया में रमा छा गई। पहचान वाले बधाईयां देने लगे। रमा को जली-कटी सुनाने वालों का मुंह बन गया। किंतु आदत से लाचार ताई जले पर नमक छिड़कने से बाज न आई, "देखना यह मनहूस लड़की वहां भी सुख से न रह पायेगी।" पडो़सी से रहा न गया बोल पड़ी, "अब तो बस करो... यही लड़की तुम लोगों का नाम रौशन की और इसी को भला-बुरा कह रही हो। अब तो जख्मों पर नमक छिड़कना बंद करो।" समय बदलते सबके मुंह पर ताले जड़ गये। *****
- जिंदगी की ओर
कुसुम अग्रवाल मास्टर जी को रिटायर हुए 2 वर्ष बीत चुके थे पर जैसा जोश रिटायरमेंट के समय था अब वह नहीं रहा क्योंकि कोई लक्ष्य ही नहीं रहा जीवन का। वही रोज की घिसी पिटी दिनचर्या। दोनों लड़के विदेश में सेटल हो गए थे। अब वे और उनकी पत्नी ही घर पर थे। मास्टर जी रोजाना सुबह टहलने जाया करते थे। आज मास्टरजी जैसे ही घूमने जाने को हुए पीछे से उनकी पत्नी की आवाज आई। अरे! आज बादल हो रहे हैं कहां जा रहे हो? मास्टर जी बोले अभी ज्यादा नहीं है थोड़ी देर में घूम आऊंगा। लेकिन छाता लेते जाना और बारिश आ जाए तो रास्ते में कहीं रुक जाना मास्टर जी की पत्नी रुकमणी बोली। ठीक है मास्टर जी कहते हुए चल पड़े। चलते-चलते थोड़ी दूर ही पहुंचे थे कि बारिश होने लगी तब मास्टर जी ने देखा कि सामने एक नई टी स्टॉल खुली है जिस पर एक छोटा सा लड़का चाय बना रहा था। बारिश के कारण मास्टर जी ने उस टी स्टॉल पर रुकना ही उचित समझा। उस स्टॉल पर चाय बनाने वाले बच्चे की लंबाई लगभग तीन साढे तीन फुट थी। वह दुबला पतला फटी सी बनियान पहने और कमर के नीचे तौलिया बांधे हुआ था। मास्टर जी ने बच्चे से उसका नाम पूछा तो उसने बताया मां बाप ने बड़े प्यार से मेरा नाम मनन रखा था लेकिन अब लोग मुझे छोटू नाम से बुलाते हैं। मास्टर जी बोले तुम्हारे माता-पिता कहां रहते हैं छोटू। छोटू चुप रह गया और चाय बनाने लगा। मास्टर जी ने फिर पूछा तुमने तुम्हारे मां बाप के बारे में नहीं बताया। छोटू बोला क्या बताऊं साहब कुछ बताने को बचा ही नहीं। कोरोना ने पूरे परिवार को लील डाला वरना मेरा भी हंसता खेलता परिवार था। मेरे माता-पिता मजदूरी करते थे। कोरोना के चलते माता-पिता की मौत हो गई। अब मेरे परिवार में मैं और मेरी छोटी बहन ही रह गए हैं। इसलिए परिवार की जिम्मेदारी अब मुझ पर आ गई है। मास्टर जी बच्चे को देखने लगे। इतनी छोटी उम्र में इतनी बड़ी जिम्मेदारी, मास्टर जी ने आगे पूछा तुम्हारी छोटी बहन कहां है? छोटू बोला वह 8 बरस की है और दूसरे के घरों में झाड़ू पोछा करने जाती है। उसके बाद यही चाय की दुकान पर आ जाती है मेरे पास। मास्टर जी बच्चे को देखते रह गए। उनका मन भर आया पर बालक की आंखों में एक तेज था। जो मास्टर जी को उसकी ओर आकर्षित कर रहा था। मास्टरजी ने पूछा क्या तुम पहले पढ़ने जाते थे? वह बोला जी बिल्कुल जाता था पर कोरोना के चलते.............. पर मैं ईश्वर को धन्यवाद देता हूं कि मेरी बहन के लिए मैं रह गया। वरना ना जाने क्या होता। मास्टर जी की आंखों में बालक के लिए आंसू छलक आए। छोटू चाय छानकर सब को पकड़ाने लगा। बारिश भी रुक चुकी थी, लेकिन मास्टर जी का मन वहां से जाने को नहीं हुआ। मास्टर जी ने बच्चे से पूछा क्या अब भी तुम्हारा मन पढ़ने को करता है? बिल्कुल करता है लेकिन मैंने अपनी इच्छा को मन के कोने में दबा दिया क्योंकि अब ऐसा होना संभव नहीं है। मास्टर जी एकटक बालक को देखे जा रहे थे। उन्होंने बोला यदि तुम चाहो तो मैं तुम्हें पढ़ा सकता हूं और तुम्हारी बहन को भी पढ़ा दूंगा, तो क्या तुम पढ़ना पसंद करोगे? छोटू की आंखों से आंसू बहने लगे। उसने मास्टर जी के पांव छू लिए वह बोला। 1 वर्ष बीत गया, मेरे मां-बाप को गए लेकिन आज तक किसी नाते रिश्तेदार तक ने प्यार से मुझसे बात नहीं की। आज आपकी इतनी स्नेह भरी बातें सुनकर मेरा मन भर आया। मास्टर जी ने उसे गले लगा लिया और अगले दिन अपने घर का पता देकर रोज शाम को छोटू और उसकी बहन को आने को कहा। छोटू बहुत ही खुश हो गया और मास्टर जी को दिल से धन्यवाद देने लगा। छोटू ने कहा मैं और मेरी बहन आपके पास पढ़ने जरूर आएंगे लेकिन आपको भी मेरी दुकान पर रोज आना पड़ेगा और मुझसे मेरे हाथ की बनी चाय पीनी पड़ेगी। साथ ही कभी पैसे देने की बात मत कीजिएगा। मास्टर जी खुशी-खुशी मान गए और बालक के संघर्ष और स्वाभिमान की मन ही मन सराहना करते हुए अपने घर की ओर निकल पड़े। मास्टर जी आज बहुत प्रसन्न थे क्योंकि पूरे 2 वर्ष बाद आज उन्हें एक नया लक्ष्य जो मिल गया था। *******
- मुल्यांकन
डॉ. कृष्णकांत श्रीवास्तव एक बार एक शहर के मशहूर व्यापारी को एक महिला ने रात्रि भोज पर निमंत्रित किया। वैसे तो वह काफी व्यस्त रहते थे, लेकिन फिर भी उन्होंने उस महिला का निमंत्रण स्वीकार कर लिया। जिस दिन का निमंत्रण था, उस दिन व्यापारी की व्यस्तता कुछ ज्यादा ही निकल आई। निमंत्रण स्वीकार किया है तो जाना तो था ही, इसलिए वह जल्दी-जल्दी काम खत्म करने लगा। जैसे-तैसे सारा काम निपटा कर वह महिला के घर पहुंचे। उन्हें देखते ही उस महिला की आंखें एकबारगी तो खुशी से चमक उठीं, लेकिन अगले ही क्षण उसके चेहरे पर निराशा के भाव आ गए। दरअसल व्यापारी काम खत्म करके उन्हीं कपड़ों में वहां आ गए था। महिला की मायूसी का कारण पता चलने पर उन्होंने कहा कि 'देर हो जाने की वजह से उन्हें कपड़े बदलने का समय ही नहीं मिला।' लेकिन महिला न मानी। उसने कहा, ‘आप अभी तुरंत मोटरगाड़ी में बैठकर घर जाइए और अच्छे से वस्त्र पहनकर आइए।’ ‘ठीक है, मैं अभी गया और अभी आया।’ यह कहकर व्यापारी घर चला गया । जब लौटकर आये तो उन्होंने बहुत कीमती कपड़े पहने हुए थे। थोड़ी देर बाद अचानक सबने देखा कि व्यापारी आइसक्रीम तथा अन्य खाने की चीजों को अपने कपड़ों पर पोत रहा हैं। यह सब करते हुए व्यापारी बोला ‘खाओ मेरे कपड़ो, खाओ। निमंत्रण तुम्हीं को मिला है। तुम ही खाओ।’ ‘यह आप क्या कर रहे हैं?’* सब बोल पड़े। व्यापारी ने कहा, ‘मैं वही कर रहा हूं मित्रो, जो मुझे करना चाहिए। यहां निमंत्रण मुझे नहीं, मेरे कपड़ों को मिला है। इसलिए आज का खाना तो मेरे कपड़े ही खाएंगे।’ उनके यह कहते ही पार्टी में सन्नाटा छा गया। निमंत्रण देने वाली महिला की भी शर्मिंदगी की कोई सीमा नहीं रही। व्यापारी की बात का आशय वह समझ चुकी थी कि व्यक्ति का मूल्यांकन उसकी प्रतिभा और आचरण से किया जाना चाहिए, कपड़ों से नहीं। *******











