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  • असली दौलत

    डॉ. कृष्णकांत श्रीवास्तव एक गांव में एक श्याम बहादुर नाम का एक किसान अपनी पत्नी और चार लड़कों के साथ रहता था। श्याम बहादुर खेतों में मेहनत करके अपने परिवार का पेट पालता था। लेकिन उसके चारो लड़के आलसी थे। जो गांव में वैसे ही इधर-उधर घूमते रहते थे। एक दिन श्याम बहादुर ने अपनी पत्नी से कहा कि अभी तो मैं खेतों में काम कर रहा हूँ। लेकिन मेरे बाद इन लड़कों का क्या होगा। इन्होंने तो कभी मेहनत भी नहीं की है। ये तो कभी खेत में भी नहीं गए। श्याम बहादुर की पत्नी ने कहा कि धीरे-धीरे ये भी काम करने लगेंगे। समय बीतता गया और श्याम बहादुर के लड़के कोई काम नहीं करते थे। एक बार श्याम बहादुर बहुत बीमार पड़ गया। वह काफी दिनों तक बीमार ही रहा। उसने अपनी पत्नी को कहा कि वह चारों लड़को को बुला कर लाये। उसकी पत्नी चारों लड़को को बुलाकर लायी। श्याम बहादुर ने कहा लगता है कि अब मैं ज्यादा दिनों तक जिन्दा नहीं रहूँगा। श्याम बहादुर को चिंता थी कि उसके जाने के बाद उसके बेटों का क्या होगा। इसलिए उसने कहा बेटों मैने अपने जीवन में जो भी कुछ कमाया है वह खजाना अपने खेतों के निचे दबा रखा है। मेरे बाद तुम उसमें से खजाना निकालकर आपस में बाँट लेना। यह बात सुनकर चारों लड़के खुश हो गए। कुछ समय बाद श्याम बहादुर की मृत्यु हो गयी। श्याम बहादुर की मृत्यु के कुछ दिनों बाद उसके लड़के खेत में दबा खजाना निकालने गए। उन्होंने सुबह से लेकर शाम तक सारा खेत खोद दिया। लेकिन उनको कोई भी खजाना नज़र नहीं आया। लड़के घर आकर अपनी माँ से बोले माँ पिताजी ने हमसे झूठ बोला था। उस खेत में हमें कोई खजाना नहीं मिला। उसकी माँ ने बताया कि तुम्हारे पिताजी ने जीवन में यही घर और खेत ही कमाया है। लेकिन अब तुमने खेत खोद ही दिया है तो उसमे बीज बो दो। इसके बाद लड़को ने बीज बोये और माँ के कहेनुसार उसमे पानी देते गए। कुछ समय बाद फसल पक कर तैयार हो गयी। जिसको बेचकर लड़कों को अच्छा मुनाफा हुआ। जिसे लेकर वह अपनी माँ के पास पहुंचे। माँ ने कहा कि तुम्हारी मेहनत ही असली खजाना है। यही तुम्हारे पिताजी तुमको समझाना चाहते थे। सीख: हमें आलस्य को त्यागकर मेहनत करना चाहिए। मेहनत ही इंसान की असली दौलत है। *********

  • जग में जीना

    यूं ही हुआ नहीं आना है, निभना है कुछ निभाना है! तेरी मेरी को कहते नहीं जिंदगी, प्रेम पर प्रीत की परत चढ़ाना है! प्रगति के पथ पर चलना है, कष्टों दुष्टों से बचना है! पल पल ऐसा जीना हो हर पल हर दिन का गहना हो ! जब तक भी जग में जीना हो, बहे प्रेम प्रीत की सरिताएं, अपनों के लिए पसीना हो, सबके लिए जीना हो! जीवन श्रम हो, सत्कर्म हो जीवन, प्रेम भावना है जीवन जीवन पल-पल साधना, जीवन क्षण क्षण की साधना! दुखियों के दुख पीना जब तक भी जग में जीना हो! *****

  • एक जैसे दु:ख

    महेश कुमार केशरी बाहर की गर्मी और तपिस देखकर ही लोगों के पसीने छूट रहे थें। पारा पैंतालिस के पार चल रहा था। पशु-पक्षी, चिड़ियाँ-चुग्गे सब ईश्वर से प्रार्थना कर रहें थें, कि जल्दी से बारिश हो और पारा कुछ नीचे गिरे। लेकिन जयवर्धन सुबह से ही काम में जुटा हुआ था। रेत को बोरियों में भरकर दो तल्ले पर धीरे-धीरे चढ़ा रहा था। जयवर्धन, साठ साल से कम का नहीं है। इतने उम्र तक तो लोग रिटायर होकर घरों में सुख-सुविधा के मजे उड़ाते हैं। जयवर्धन को उसके बच्चों ने घर से निकाल दिया है। जवानी में जयवर्धन हट्टा-कट्ठा था। पैसे कमाता था तो जमकर खाता भी था। अब हड्डियों का केवल ढाँचा ही बचा है। वैसी खाली इमारत जो कभी भी ढह सकती है। जुगल ठेकेदार रेत की धीमी ढुलाई से खीज गया था। मजदूरों को उसने ठेके पर लगाया था। काम को तीन दिनों में खत्म होना था। लेकिन किसी तरह वो दो दिनों में ही काम को निपटाना चाह रहा था। ताकि कुछ ज्यादा पैसे वो बचा सके। जुगल ने जयवर्धन को डपटा- "अबे, थोड़ा जल्दी-जल्दी पैर चला। इस तरह से सीढ़ियाँ चढेगा तो हफ्ते भर में भी काम खत्म नहीं होगा।" जयवर्धन गमछे से पसीना पोंछते हुए बोला- "हाँ बाबू अभी जल्दी करता हूँ। बस तुरंत अभी खत्म करता हूँ।" स्टेन साहब से रहा ना गया। वो, जुगल से बोले- "अरे भाई, सुबह से वो बेचारा इतनी गर्मी में काम कर रहा है। कम-से-कम उसे कुछ खाने के लिये तो पूछ लो। आखिर वो भी तो आदमी है। हमारी-तुम्हारी जब इतनी भीषण गर्मी से जान निकल रही है। तो क्या वो इंसान नहीं है? वो, बिना कुछ खाये-पिये खटे जा रहा है। जाओ उसे कुछ खाने को दो और कुछ देर आराम करने को कहो।" जब जुगल ने कुछ नहीं कहा तो, स्टेन साहब ने अपनी तरफ से जयवर्धन को आवाज दी- "जयवर्धन .... अरे भाई जयवर्धन तुम कब तक काम करते रहोगे यार। उन्होंने जेब से एक सौ रूपये का नोट निकाला और सामने के होटल की तरफ इशारा करते हुए बोले। जाओ रे भले मानस उस होटल से कुछ खाकर आओ। काहे फोकट में जान देने पर तुले हो भाई जाओ।" स्टेन साहब करोड़ों की कोठी और कई शापिंग कांपलेक्स के मालिक थें। लेकिन बेटा सात समंदर पार विदेश में अपने बच्चों के साथ रहता था। वो भी साठ के करीब ही थें। अचानक जयवर्धन का दु:ख उन्हें अपना ही दु:ख लगने लगा था। और वो भीतर-ही-भीतर कहीं रीतने लगे थें। और, ठेकेदार सारा माजरा समझने के चक्कर में था। वो उजबकों की तरह अपने मालिक स्टेन साहब को घूरे जा रहा था। ************

  • अंतिम मुलाकात

    संस्मरण अंतिम मुलाकात त्रिपुरा सुंदरी मेरे पिता एक बार दिल्ली आये और उस समय मैं वहां ओखला स्थित जामिया मिल्लिया इस्लामिया में पढ़ता था। वह गांव से नवल सिंह के साथ मुझसे मिलने यहां आये थे और सुबह में नौ - दस बजे के आसपास उनको मैंने यूनिवर्सिटी में देखा। दिल्ली आने कि कार्यक्रम शायद उन्होंने आकस्मिक रूप से ही बनाया था और उस समय एसटीडी सेवा शुरू नहीं हुई थी। हमलोग पत्र व्यवहार से ही आपसी बातों का आदान प्रदान किया करते थे। यह 1990-91 के आसपास की घटना होगी। नवल सिंह के छोटे बेटे उदयशंकर उस समय सैनिक अधिकारी के रूप में दिल्ली में ही तैनात थे और इंडिया गेट के पास पंडारा हाउस में रहते थे। अपने पिता नवल सिंह को उन्होंने दिल्ली घूमने के लिए बुलाया था और इसी दौरान नवल सिंह ने पिता जी को भी साथ में दिल्ली चलने के लिए कहा था और इस प्रकार पिता जी दिल्ली आये और दो-तीन दिन नवल सिंह के साथ उदयशंकर जी के घर पर ही ठहरे। यह जनवरी का महीना था और पिता जी 26 जनवरी के आसपास दिल्ली आये थे। उदयशंकर जी ने इस दौरान राजपथ पर गणतंत्र दिवस का परेड देखने के लिए पिता जी के साथ मेरा पास भी बनवा दिया था। इस दिन यानी 25 जनवरी की रात में मैं भी पंडारा हाउस में ही उदयशंकर जी के आवास पर रुका और सुबह परेड देखने गया। इस दिन राजपथ पर राष्ट्रपति आर. वेंकटरमण ने भारतीय पुलिस सेवा के बिहार कैडर के एक अधिकारी रणधीर वर्मा जो धनबाद में एस.पी. थे उनको मृत्योपरांत देश में वीरता के सर्वोच्च सम्मान अशोक चक्र से अलंकृत किया था। वे धनबाद में बैंक लुटेरों के साथ मुठभेड़ में शहीद हो गये थे। उनकी पत्नी रीता वर्मा ने यह सम्मान ग्रहण किया था। इसके अगले दिन पिता जी के साथ दिल्ली परिवहन निगम की दिल्ली दर्शन बस सेवा से हम दिल्ली के दर्शनीय स्थलों पर घूमने भी गये। पिता जी इसके अगले दिन मगध एक्सप्रेस से गांव लौट गये थे। नवल सिंह को अपने बेटे उदयशंकर के पास अभी कुछ दिन और रुकना था। पिता जी को ट्रेन में मैं चढ़ाने गया था और उनका स्लीपर क्लास में रिजर्वेशन था। इसके बाद पिता जी से मुलाकात नहीं हो पायी क्योंकि गांव लौटने के चार-पांच महीने के बाद ब्रेन हेमरेज से उनका देहांत हो गया। उनके निधन के बारे में अगले दिन मुझे टेलीग्राम से पता चला और फिर शाम में मगध एक्सप्रेस से बड़हिया रवाना हुआ लेकिन यहां मेरे आने से पहले मेरे बड़े भाई ने उनका दाहसंस्कार कर दिया था। जिस समय मेरे भाई ने पटना से मुझे टेलीग्राम भेजा था उस समय वह पटना मेडिकल कॉलेज अस्पताल में भर्ती थे और लिहाजा मैं पटना स्टेशन पर उतरकर वहीं गया लेकिन अस्पताल में पिछले दिन भर्ती होने वाले मरीजों की सूची को रजिस्टर में देखकर अस्पताल के लोगों ने पिछले दिन देर रात में उनके देहांत के बारे में बताया। इसके बाद मैं इस अस्पताल के बाहर नेशनल फार्मेसी नामक दुकान पर इस वाकये के बारे में जानकारी प्राप्त करने गया। इसके मालिक नरेंद्र प्रताप सिंह मेरे पिता जी के परिचित थे और पटना में बी. ए. की पढ़ाई के दौरान मेरे पिता जी को इनके पिता सीताराम सिंह ने होम टीचर के तौर पर अपने घर में आश्रय प्रदान किया था और बाद में पिता जी डिप्टी कलक्टर बन गये थे। नेशनल फार्मेसी के लोगों को पिता जी के देहांत के बारे में पता था और उनमें से कोई आदमी पिता जी के शव वाहन पर साथ गांव भी गया था। उनसे सारी बातें मालूम हुईं। उस समय पानी बरस रहा था और मैं किसी तरह पटना स्टेशन फिर वापस लौटकर आया और आधी रात में लालकिला एक्सप्रेस से बड़हिया पहुंचा और उस समय बिहार में बिजली ज्यादा नहीं रहती थी मैं किसी कुली के साथ अंधेरे में बाजार को पार करने के बाद गांव पहुंचा और बाहर बरामदे में भाइयों को कुछ पड़ोसियों और रिश्तेदारों के साथ सोया देखा। मेरे आने की खबर सुनकर मां भी भीतर घर से बाहर निकल आयी और रोने लगी। ************

  • तमाशा

    सम्पदा ठाकुर हमें नहीं भाते जरा भी लोग झूठे और मक्कार यह गले लगा कर पीठ पीछे करते हैं वार ऐसे लोग खुद को बहुत समझते हैं होशियार ठगते रहते हैं सबको बनकर उसके वफादार इनके होते हैं मुख में राम और रखते हैं बगल में छुरी ऐसे लोगों का का क्या कहिए इनकी तो होती ही है नियत बुरी अपनी चिकनी चुपड़ी बातों से सबको ठगते रहते हैं जनाब ये सोचते हैं इनकी तरह नहीं है कोई चालाक एक भी मौका नहीं छोड़ते यह करने को घात इसे लगता है नहीं समझ पा रहा है कोई भी इनकी चाल मगर इन्हें नहीं पता यहां सब बैठे हैं उस्ताद बोलते नही है मगर, देखते हैं तमाशा बैठकर कि कौन कहां तक गिर सकता है यार। ******

  • अश्लीलता

    अश्विन सिंह एक शहर में ऐसा शोर था कि अश्लील साहित्य का बहुत प्रचार हो रहा है। अखबारों में समाचार और नागरिकों के पत्र छपते कि सड़कों के किनारे खुलेआम अश्लील पुस्तकें बिक रही हैं। दस-बारह उत्साही समाज-सुधारक युवकों ने टोली बनाई और तय किया कि जहाँ भी मिलेगा हम ऐसे साहित्य को छीन लेंगे और उसकी सार्वजनिक होलीका जलाएँगे। उन्होंने एक दुकान पर छापा मारकर बीच-पच्चीस अश्लील पुस्तकें अपने क़ब्ज़े में की। प्रत्येक के पास दो या तीन किताबें थीं। युवकों के मुखिया ने कहा - आज तो देर हो गई है लेकिन कल शाम को अखबार में सूचना देकर परसों किसी सार्वजनिक स्थान में इन अश्लील पुस्तकों को जलाएँगे। प्रचार करने से दूसरे लोगों पर भी असर पड़ेगा। कल शाम को सब मेरे घर पर मिलो। इतनी सारी पुस्तकों को इकट्ठी अभी घर नहीं ले जा सकता। बीस-पच्चीस हैं। पिताजी और चाचाजी भी घर पर फिलहाल मौजूद हैं। देख लेंगे तो आफत हो जाएगी। ये दो-तीन किताबें तुम लोग प्रत्येक छिपाकर अपने घर ले जाओ। कल शाम को जरूर ले आना। दूसरे दिन शाम को सब मिले पर किताबें कोई नहीं लाया। मुखिया ने कहा - किताबें दो तो मैं इस बोरे में छिपाकर रख दूँ। फिर कल जलाने की जगह बोरा ले चलेंगे। लेकिन किताब कोई भी लाया नहीं था। एक ने कहा - कल नहीं, परसों जलाना। पढ़ तो लें। दूसरे ने कहा - अभी हम पढ़ रहे हैं। किताबों को दो-तीन बाद जला देना। अब तो किताबें जब्त ही कर लीं। उस दिन जलाने का कार्यक्रम नहीं बन सका। तीसरे दिन फिर किताबें लेकर मिलने का तय हुआ। तीसरे दिन भी कोई किताबें नहीं लाया। एक ने कहा - अरे यार, बाप के हाथ किताबें पड़ गईं। वे पढ़ रहे हैं। दूसरे ने कहा - अंकल पढ़ लें, तब ले आऊँगा। तीसरे ने कहा - भाभी उठाकर ले गई। बोली की दो-तीन दिनों में पढ़कर वापस कर दूँगी। चौथे ने कहा - अरे, पड़ोस की चाची मेरी गैरहाजिर में उठा ले गईं। पढ़ लें तो दो-तीन दिन में जला देंगे। अश्लील पुस्तकें कभी नहीं जलाई गईं। वे अब औऱ अधिक व्यवस्थित ढंग से पढ़ी जाने लगीं। यही हाल वर्तमान में हैं...सभी अश्लीलता का विरोध तो करते हैं मगर अश्लील वीडियो, रील्स और लेखों और कामुक फोटो वालों के उतने ही लाखों और करोड़ों फालोवर्स हैं। ********

  • भावात्मक स्मृति

    उनकी उंगली पकड़कर स्कूल जाना, जैसे कल की बात हो, नए खिलौनों की जिद करना और फिर पा जाना जैसे कल की बात हो, ऑफिस से लौटते ही मेला दिखाने की जिद करना और उनका मुझे मेला में ले जाना जैसे कल की बात हो, मेले में घंटों उनके कंधों पर चढ़े रहना और तमाम माँगें मानवाना जैसे कल की ही बात हो, बिना मांगे मनचाही वस्तु का पा जाना जैसे कल की बात हो, गलती क्यों ना हमारी हो फिर भी हमारे लिए उनका दूसरों से भिड़ जाना जैसे कल की बात हो, बीमारी चाहे छोटी ही क्यों ना हो उनका घंटों सिरहाने बैठना और प्यार से सिर पर हाथ फेराना जैसे कल की बात हो, पर समय का पहिया तेजी से घूमता है और खुशियां ऐसे काफूर हो जाती है कि जैसे कल की बात हो, आज उन्हीं को ठंडे फर्श पर उत्तर दक्षिण लिटाने का एहसास, बड़ा दर्द देता है अपने कंधों पर उठाकर अकेले अनंत की यात्रा पर भेजने का एहसास, बड़ा दर्द देता है पल भर में ही खुशियों की चादर का अपने ऊपर से उठा लिए जाने का एहसास, बड़ा दर्द देता है जिम्मेदारियों के आने और असुरक्षित हो जाने का एहसास, बड़ा दर्द देता है सच है पिता के साए के हट जाने का एहसास, बड़ा दर्द देता है दोस्तों, कृष्ण की मानो तो आप धन्य हैं जो कुछ सुखद पल ईश्वर ने आपको दिए हैं उन्हें आज ही जी डालो क्योंकि सुखद पदों के खोने का एहसास बड़ा दर्द देता है। सच है पिता के साए के हट जाने का एहसास, बड़ा दर्द देता है। ***********

  • कौन तार से बीनी चदरिया

    अंजना वर्मा खामोश हवा अचानक गीत पर मूंग के सुरों से झनकने लगी थी। कड़ी, चिकनी आवाज में वे सब बाहर दरवाजे पर खड़ी होकर गा रही थीं, "जच्चा रानी सोने के पलंग बिछा जा जच्चा रानी सोने के पलंग" सुशील के साथ-साथ किरण ने खिड़की की दरार से बाहर झाँका। ऐसे तो किरण समझ ही गई थी कि यह आवाज किसकी है? कौन आया होगा अभी? या कौन आ सकता है इन दिनों? देखा तो वे ही दोनों थीं खूब सजी-सँवरी और हाथों से तालियाँ बजा-बजाकर गा रही थीं। चेहरे पर पूरा श्रृंगार काजल से भरी आँखें और ललाट पर बड़ी-सी बिंदी, नाक में लौंग, कानों में लटकते हुए झुमके, गले में मोतियों की माला, माँग में सिंदूर और खूब चमक-दमक वाली सितारों जड़ी साड़ी। एक तो वही थी सुंदरी, जो कई बार शादी-ब्याह के मौके पर आकर नाच चुकी थी। बला की सुंदर थी और नाम भी था सुंदरी, लेकिन उसे बनाने वाला उस पर नर या नारी का लेबल चिपकाना भूल गया था। दूसरी साँवली नाक-नक्श की, पर साज-सज्जा वही। दोनों गाए जा रही थीं। आवाज बिना माइक के चारों ओर फैल रही थी। एक मृदंगिया उनके पास ही खड़ा मृदंग ठनका रहा था। उनका गीत कुछ देर तक चलता रहा। किरण सोच रही थी कि वह बाहर जाए न जाए। बाहर तो निकलना ही था, पर कैसे? "इतना नहीं, इतना लेंगी”वाले आक्रमण से निपटने की हिम्मत जुटा रही थी वह। खिड़की के पीछे चोर-सी छिपी हुई वह यही सोच रही थी कि उनका गाना बंद हो गया। कुछ समय के लिए फिजाँ खामोश हो गई। मियाँ-बीवी दोनों ने एक-दूसरे की ओर मुस्कुराते हुए देखा। तभी सुनाई पड़ा कड़ी आवाज में दोनों में से कोई एक बोली, "ये रानी जी! अरे बाहर तो जाओ। हम सबको पता चल गया है कि खुशियाली हुई है। चलो, नेग-निछावर निकालो। पौता खेलाए रही हो। जीए, जुग-जुग जीए।" गाने-नाचने की आवाज सुनकर किरण की बहू भी आ गई थी अपने बच्चे को गोद में लेकर और साथ में बेटा भी। दोनों के चेहरों पर हँसी थी। मनोरंजन के इस अनोखे सान से उनकी देखा-देखी कभी ही कभी हो पाती थी। उन दोनों ने भी खिड़की से झाँका। अपनी बहू से किरण ने कहा, "बच्चा लेकर न जाना बाहर। बच्चा ले लेंगी अपनी गोद में तो एक न सुनेंगी। अपनी माँग मनवाकर ही रहेँगी। और बच्चा जल्दी देंगी नहीं।" बहू की हँसती हुई मुख-मुद्रा अचानक गंभीर बन गई। फिर सुनाई पड़ा, "ये बहू जी!" किरण ने झाँका सुंदरी बोल रही थी। बोलने के बाद थोड़ी देर तक इंतजार करती रही कि कोई निकले। जब कोई न निकला, किरण और न सुशील ही, तो वह बोली, "अरी कुसुमा चल गा।" और फिर दोनों शुरू हो गई थीं। सतर्क मृदंगिया के सधे हाथ मूदंग पर फिर चलने लगे थे सुर-लहरी की छाया की तरह। उन दोनों की आवाज फिर गूँजने लगी थी, "अँगने में जसोमति ठाढ़ि हैं गोदी में कन्हैया लिहले, गोदी में कन्हैया लिहले नाये चंदा आव ना अँगनवाँ के बीच हो कन्हैया मोरा रोयेले ना।" थोड़ी देर तक सुर-ताल में गाते रहने के बाद गाना बंद हो गया था। पुकार आने लगी थी, "अरी औओ बहूजी! बाहर आओ न, काहे लुकाय रही हो? अगर नय आओगी तो हम ही आते हैं। ओ बाबूजी! बाहर आओ।" यह सुनते ही सुशील घबरा गए कि कहीं दोनों भीतर न आ जाएँ। उन्होंने सुन रखा था कि वे पुरुषों से नहीं डरती उनकी देह से लिपट जाती हैं। इसी डर से भले लोग तुरंत पैसे निकालकर दे देते हैं। सुशील बोले, "चलो, बाहर निकलो अब, नहीं तो वे भीतर आ जाएँगी।" उनके बाहर आते ही एक अजीब समाँ आ गया। वे दोनों पूरे उल्लास के साथ फिर गाने लगी थीं। स्वरों में एक ऊर्जा घुल गई थी "हमें पीर उठति है बालम हो-बालम हो बालम हो।" अजीब भंगिमा के साथ सुंदरी साड़ी फहरा-फहराकर नाचने लगी थी। दूसरी न देखने में सुंदर थी, न नाचने में ही अच्छी, फिर भी अलसाई-सी इधर-उधर हाथ फैंककर नाच रही थी, जैसे नाचने का कोई उत्साह उसके पास न बचा हो। गीत खत्म कर दोनों उस दंपति के पास आ गई थीं, "अरे! जरा बबुअवा को लाओ न! हम भी तो देखें! खेलाएँगे हम बबुआ को, आसीरबाद देंगे।" ताली बजाकर साँवली वाली ने कहा था, "अरे रानी! जीए तेरा लल्ला, जीए-लाख बरीस जीए।" सुंदरी बोली, "तो लाओ, दो हमें। पाँच हजार से कम न लेंगी।" बड़ी देर से उनका नाचना-गाना देखकर अवाक बनी हुई किरण बोली, "अच्छा-अच्छा, ठहरो! मैं लाती हूँ।" मोल-भाव का हिसाब बैठाते हुए उसने घर के भीतर से लाकर एक हजार का नोट पकड़ाया तो बात न बनी। सुंदरी ने या कुसुम ने लेने के लिए हाथ भी नहीं उठाया। सुंदरी बोली, "अरे-अरे! ये क्‍या दे रही हो?" कहकर आँखें नचाई। कुसुम ने कहा, "इतने से हम नहीं मानेंगी।" सुंदरी बोली, "तुम्हारे यहाँ खुशियाली है। चलो रानी, निकालो! हम रोज-रोज किसी के यहाँ नहीं जातीं। जब उपरवाला ऐसा दिन देता है तभी हम जाती हैं।" कुसुम बोली, "हम सबको तो तुम्हारा ही आसरा है। आजकल हम सबको कोई पूछता भी नहीं।" उसकी आवाज में दीनता घुली हुई थी। किरण ने अपने ब्लाउज में छुपाया हुआ एक वैसा ही नोट बढ़ाया। दोनों नोटों को थामते हुए सुंदरी ने कहा, "कम-से-कम एक पत्ता तो और दो।" उसका स्वर इस बार मुलायम था। उसके कहने के साथ ही कुसुम बोली, "हमारे अपने तो तुम्हीं सब हो, नाहीं त कौन है हमें देखने अउर पूछने वाला दीदी? देखो, तुम्हारे बगल में भी एक बच्चा हुआ है। उन सबने हमें कितना साड़ी-कपड़ा दिया है! पैसा भी दिया।" यह कहने के बाद वह अपनी टोकरी पर पड़ा हुआ कपड़ा हटाकर दिखाने लगी थी जिसमें नई साड़ियाँ और कपड़े रखे हुए थे। किरण थोड़ा शरमा गई भीतर-ही-भीतर। बगल वाले ने इतना दिया तो उसे भी उससे कम तो नहीं देना चाहिए। फिर कुछ खीझकर हजार का एक और नोट निकाला यह सोचते हुए कि ये जब तक मन-भर नहीं लेंगी, यहाँ से जाएँगी नहीं और तमाशा करती रहेंगी। सुंदरी ने लपककर नोट पकड़ लिया। किरण की ठुडडी पकड़कर बोली, "जीयो दीदी, जीयो। बने रहैं तुम्हरे पूत बना रहे तुम्हरा ललल्‍ला। बाबू लखिया होए। भ्रगवान दिन देवें अइसा कि हम बार-बार नार्चैं-गाए तुम्हारे दुआरे।" इस तरह असीसती हुई दोनों चली गई। मृर्दंगिया भी मृदंग लिए उनके पीछे-पीछे चला गया। रास्ते में एक जगह रुककर सुंदरी ने मृदंगिया को पैसे पकड़ाए तो उसने अपनी अलग राह पकड़ ली। पैदल चलते-चलते सुंदरी के चेहरे पर पसीने की बूँदें स्फटिक के दानों की तरह छल्छला आई। वह रुक गई और कुसुम से बोली, "का कहती हो? ऑटो ले लेवें?" कुसुम बोली, "काहै? अब थोड़ी दूर पर तो हइए है। अब निगचाने पर पड़सा काहै को जियान करें? सुस्ताय लो तनका देर।" दोनों एक पेड़ की छाया मैं बैठ गई। सुंदरी और कुसुम शहर के सीमांत पर रहती थीं। वहीं पर इनके जैसी कुछ और भी थीं जो नाच-गाकर अपना जीवन चलाती थीं। इनका न कोई लिंग था, न कोई जाति थी। सबका जीवन एक-सा था। एक-सी समस्या, एक ही जीवन-शैली। बोली, "कल जाना है माई से भेंट करने। कल सवेरे ही निकलेंगे। तुम भी चलिहो हमरा साथे।" कुसुम कुछ नहीं बोली। चुप रहने का मतलब था 'हाँ। कुसुम और सुंदरी की आपस में अच्छी 'पटती थी। दोनों दो सहेलियों की तरह, सहोदर बहनों की तरह रहती थीं। रिश्ते में रिश्ता यही एक था। थोड़ा सुस्ताने के बाद दोनों उठकर चल दी अपने बसेरे की ओर। "सुना है तुम्हारे बहिन 'पुत' की शादी हो गई?" कुसुम ने सुंदरी से कहा। "हाँ। बहिन अपनी नई-नवेली बहू को लेकर माई से मिलने आई है। उसके यहाँ शादी में माई जा नहीं सकी थी। सो उसे देखाने ले आई है। उससे मिलूँगी? पता नहीं। सोचा है शिवाला पर मिलूँ। लेकिन माई किसके साथ आएगी शिवाला पर? रेणु उसके साथ आवेगी तब तो भेंट होड़ए जाएगा। केकरो मालूम नए होना चाहिए कि हमारा माय है।" फिर ठहरकर बोली, "बहिन तो शायद ना आ सकेगी मिलने। घर में पतोहू है। कोनो कुछो कह दिया कि तुम्हारी सास की एक खोजवा बहिन है तब? ना-ना। दूर ही से भेंट करौंगी, कहीं गाँव के बाहर। माई शिवाला में आएगी जो गाँव से तनिका दूर पर है। पर आएगी किसके साथ?" इतना कहकर वह चुप हो गई जैसे कुछ सोचने लगी हो। फिर बोली, "और क्‍या करना कुसुम बेसी हिलि-मिलि के? ओ सबके दुनिया अलग है, अठर हमर सबके दुनिया अलग। हाथ-पैर, मुँह-कान मानुस के समान होके भी हम मानुस में नहीं गिनाते हैं। ऐसे अच्छा होता कि हम कोनों जनावरै जाति में जनम लेते चाहे मरद होते, चाहे मठगी। अभी हम क्या हैं? बताओ तो?" यह कहने के बाद सुंदरी ने आँखों मैं पानी भरकर कुसुम की ओर देखा। उसकी दोनों बड़ी-बड़ी आँखें भादो के उमड़े तालों की तरह लग रही थीं, जिनका पानी काँपता रहता है। कुसुम उसी तरह निर्विकार थी, चुप। कोई उत्तर उसने नहीं दिया था। एक सूखा मौन पसरा था उसके चेहरे पर वैशाख का ताप। फिर सुंदरी बोली, "ये कुसुम! हमार ई शरीर कोनो काम का है क्‍या? चइला जैसा है देह! चढ़ जाएगा अगिन पर। कुसुम! तुम पहली बार जाओगी हमरे साथ हमरे गाँव। देखना मेरा घर कड़सा है। जिसके भाग में जेतना लिखा रहता है न, ओतने मिलता है। मेरे भाग में क्या लिखा था? यही दुआरे-दुआरे नाचना। सो नाच रहे हैं। जिसके भाग में कोठा-अटारी रही, उसके मिली। हमें तो कोई जानता भी नहीं कि हम किसकी कोख से जनमे? हमारे भीतर किस स्त्री-पुरुष का खून दौड़ रहा है? हमारे महतारी-बाप कौन हैं? पर कोई तो हैं? नाहीं तो यह देह नए होती। कौन जानना चाहता है? कोई चाहेगा तो भी ओके मालूम नहीं होने दैंगे सब। आउर कया करना? क्‍यों बताना? हम भी थोड़े कहैँगे? अपने महतारी-बाप का नाम नए हँसवाएँगे। कहना हमारा काम भी नहीं। अब तो जो हैं, जहाँ हैं वही सब कुछ। वही रास्ता हमारा। हमारा रास्ता अलग है सभी से। जाए रहे हैं माय को देखने। एगो ओही से माया-ममता है।" यह कहते हुए उसने आँखें पौँछी। यह सुनकर कुसुम की आँखों से भी एक बूँद लुढ़की और गाल पर अटक गई। फिर सुंदरी बोली, "और जानती हो? अब तो मन भी नहीं होता भेंट करने का? क्‍या करना है मिलके? हमैं सब त्याग दिए, भूल गए। एक बहिन है और एक भाई। मेरे बाद पहिले बहन रेनु हुई। ओकरा बाद गोपी। दोनों मेरे घर से निकल जाने के बाद हुए। उनको बचपन में, फिर एक बार जवान होने पर देखा था। फिर अबकी बार कहीं। फिर अब। नहीं - अब शायद देखना न हो पाएगा - इसके बाद। उ, अपना घर-दुआर मैं मगन है। दुलहा, बाल-बच्चा, खेत-पथार। हमको याद रखी होगी एक खिस्सा की 'तरह...। उसको बहुतै बाद मैं, होसमंद होने पर पता चला था कि एक उसकी बहिन है जो खोजवा है।" कुसुम बोली, "ये सुंदरी! तुमको तो उहो मालूम कि तुम्हारा जनमभूमि कहाँ है? मतारी-बाप कौन है? हमें तो ओहू नय पता। हम तो जानते ही नहीं कि कौन हमरा माय-बाप है? हम कौन हि फिर थोड़ी देर चुप रहने के बाद कुसुम बोली,"जाने दे सुंदर की। हम सबको उ, सब नहीं सोचना चाहिए। हमको भी तो उसी ने बनाया जिसने मरद-मानुस बनाया, जनी-जात बनाया। काहै सोच करैँ हम? पेड़ में भी देख तो सब पेड़ों में फूल-बीज कहाँ होत है? हम भी हैं उसी तरह। लेकिन हैं तो उसी के हाथ के बनाए। वही रामजी हमें भी बनाए हैं।" कुसुम कभी-कभी उसको सुंदर की बोल देती थी। "हाँ, पर कोन सोचता है अडसे? फिर हमें सबसे अलग क्यों रखा गया जैसे अछूत हैं हम? हमें कौन गुदानता है? रास्ते चलते सब देखिकै हँस देते हैं? का हम हँसने की चीज हैं?" सुंदरी बोली। "नहीं मानेगा तो क्या हुआ? सच्चाई तो इहे है न कि हम भी भगवान के बनाए हुए हैं।" "अपना को संतोष दे ले कुसुमी। बाकी सोच के देख कि पिलुआ-पतारी में भी एक ठो मरद होत है त एगो मउगी।" दुख से उसका चेहरा तमतमा उठा। इसके बाद दोनों ही चुप हो गई। कोई शब्द न फूटा किसी के मुँह से। दूसरे दिन सवेरे-सवेरे दोनों निकल पड़ीं। उन्होंने सुबह वाली रेल पकड़ ली थी कि रेल में गाते हुए जाएँगी। रास्ते में कुछ कमाई भी हो जाएगी। एक डब्बे मैं सुंदरी चढ़ी। उसके पीछे-पीछे कुसुम भी। दरवाजे से भीतर घुसकर जब बर्थ के पास पहुँचीं तो दोनों खड़ी हो गई। उन्हें देखकर कुछ लोग मुस्कुराने लगे। औरतें शरमा गई उनके चेहरे पर पसरी पुरुष की छाया देख। पुरुषों को उनके चेहरे मैं औरतों के चेहरे की मूर्ति दिख रही थी। इन दोनों अर्धनारीश्वरों को देखकर पूरा डब्बा कौतुक के मूड मैं आ गया था। एक छिपी-छिपी मुस्कुराहट सबके चेहरे पर तैरने लगी थी। सुंदरी ने आहत होकर कुसुम की ओर देखा जैसे कहती हो, "देख - ये लोग कैसे मुस्कुरा रहे हैं!" को यह सब देखते हुए एक जमाना बीत चुका थाय क्योंकि वह उम्र में सुंदरी से काफी बड़ी थी। वह निर्विकार बनी रही। अभी तो पैसे कमाना जरूरी था। अतः सुंदरी ने एक फिल्‍मी गीत शुरू कर दिया। वह गाते हुए आगे-आगे चल रही थी। पीछे-पीछे कुसुम हाथ पसारे हुए चल रही थी। कुछ लोगों ने पैसे निकाले, परंतु कुछ कंजूस इन्हें देखकर भी अनदेखा कर रहै थे और गंभीर बने बैठे थे कि कुछ देना न पड़े। गाते-गाते उनकी यह भाव-भंगिमा देखकर सुंदरी का दिल घृणा से भर गया - संवैदनहीन। ईश्वर ने सब कुछ दिया है। सारे अंग बनाकर भी ईश्वर इन लोगों के भीतर दिल रखना भूल गया। मन तो किया कुसुम से बोले, "कुसुमी! ये जो मुँह छुपा रहे हैं, इनके आगे तो हाथ पसार मत।" लेकिन मजबूरीवश कुछ कह न पाई। वह देखती रह गई थी, कुसुम का हाथ उन पत्थरों के आगे भी पसरा हुआ था। नोट-सिक्‍्के बटोरते हुए दोनों आगे बढ़ती चली रही थीं। डिब्बे का अंत आ गया तो सुंदरी ने कुसुम से पूछा, "क्या कहती है? आगे चलें?" यह कहने के बाद उसने अपने नकली उरोजों पर आँचल डालकर उन्हें इतनी हिफाजत से ढँक लिया था कि वैसे कोई स्त्री भी न करती। ऐसे उसके नारी-रूप की बराबरी करने वाली कोई न थी। कुसुम ने कहा, "एक डिब्बा अउर देख लैं।" यह कहते हुए दोनों अगले डब्बे की ओर चलीं। कुसुम ने डब्बे मैं चढ़ते हुए कहा, "अब हम गाते हैं।" सुंदरी ने पूछा, "कौन वाला गाओगी?" कुसुम बोली, "झूठी देखी प्रीत जगत की।" सुंदरी बोली, "फिर वही गितवा। अपन गीत रख अपने पास। भजन सुनिके इहाँ कोई पइसा न टसकाएगा। इन सालन के चटकदार गीत सुनाव, नैन मटकका कर, तबही मिली पइसा। तू छोड़ दे। हम ही गाते हैं।" यह सुनकर सदा शांत रहने वाली कुसुम की भी हँसी छूट गई। बोली, "ठीक है। तो तू ही गा।" सुंदरी ने दूसरा फिल्‍मी गीत शुरू किया। कुसुम के मन मैं वह भजन गूँजता रह गया जिसे गाने का वह मन बना चुकी थी, "ऐसी देखी प्रीत जगत की" और जिसे अक्सर वह खुद के लिए गाती थी, खुद ही सुनती थी। रैल रुकी तो दोनों उतरीं और गाँव जाने वाली बस में सवार हो गई। बस मैं खलासी और ड्राइवर की आँखें उन्हें वैसे ही घूर रही थीं, जैसे वे गर्म-गर्म जलेबियाँ हों। उन्हें देखकर सुंदरी ने हिकारत से मुँह चमकाकर घुमा लिया। बस ने उन्हें गाँव के सीमांत पर उतार दिया। यहाँ से मिट॒टी वाली सड़क थी जो गाँव तक जाती थी। उसके बाद खेतों की पगडंडी। दोनों चल दीं उस ओर। सुंदरी का मन हरे-भरे खेतों को देखकर हरा हो गया था। दिशाओं के पट खोलकर खुली हवा चली आ रही थी। दोनों के चेहरों पर 'ताजगी छा गई। सुंदरी का गोरा रंग खिलकर खूब चिकना और गुलाबी हो गया। दोनों ने पान खा लिया था। एक अजब उल्लास से भरी हुई दोनों चली जा रही थीं। खेतों की पगडंडी पर सँभाल-सँभालकर पैर डाल रही थीं। गाँव आने पर कुछ बच्चे, कुछ नौजवान इन्हें मुस्कुराकर देखने लगे थे। सब सोच रहे थे कि क्‍या बात है कि दोनों खोजवा चली आ रही हैं। किसी पर ध्यान न देते हुए सुंदरी ने कहा, "चल अपने घर की ओर ले चलती हूँ देखना। पर इहाँ किसी से मिलना नहीं है। सिर्फ जाना है अनजान बनकर।" वे एक बड़े घर के बाहर पहुँची। वह घर पूरा संपन्‍न लग रहा था देखने से। कुसुम हैरत से देखती रह गई थी अपनी ठुडडी पर ओठों के नीचे उँगली दबाएँ हुए। कुछ गर्व मैं भरकर सुंदरी ने उसे देखा। वे दोनों कुछ देर रुक गई वहाँ पर। कुसुम बोल उठी, "हाँ, बहुते हैं तुम्हारे माई-बाउजी।" सुंदरी बोली, 'त ओसे का? हमें क्या मिला उनका? बस, खाली जनम दिए। अठर त कुछो नाहीं। छोड़ - कुसुम।" "तो माई से भेंट कैसे करोगी?" "हाँ, शिवाला पर। बाकिर अभी जना तो दें कि हम आ गए हैं।" वे दोनों अहाते के भीतर चली गई। सुंदरी अपने ही घर के भीतर जाने मैं ठिठक रही थी। कदम आगे नहीं बढ़ रहे थे, लग रहा था जैसे किसी अपरिचित के आँगन मैं जा रही हो। उसने पहले बाहर से ही झाँका। एक औरत दिखाई दी। वह पहचान गई कि यह उसकी बहन रेनु थी जो अब बहुत बदल गई थी। उसकी देह गदरा गई थी और अब वह पूरी तरह से प्रौढ़ा दिखाई दे रही थी। बहन को देखने के बाद वह आँगन के भीतर गई और नाटक करते हुए बोली, "इहाँ पर सादी- ब्याह हुआ है? हमको मालूम हुआ।" स्त्री-पुरुष के बीच की कड़ी आवाज सुनकर रेनु ने उलटकर देखा और उसके पास चली आई। अपनी किन्नर बहन को देखकर उसकी नजर मैं पहचान उभर आई। उस पहचान को उसने आवाज मैं घुलने से रोक दिया। पर खुशी की मुस्कुराहट बिखेरे बिना न रह सकी। बोली, "हाँ, तुम लोग आ गई? अच्छा, माई से कहती हूँ।" वह सामने वाली कोठरी मैं चली गई जहाँ उसकी माँ बैठी हुई थी पलंग पर। उसने कहा, "माई! माया दीदी आई है।" सुंदरी का वास्तविक नाम था, उसके माता-पिता द्वारा दिया हुआ। जिंदगी में वह क्षण कभी न आया कि वह अपने नाम को अपने माता-पिता द्वारा पुकारे जाते हुए सुनती। यह सुनते ही उसकी माँ बाहर आँगन मैं आई। पर सुंदरी को सामने खड़ी देखकर भी उसे संबोधित न कर सकी। क्या बोले, समझ नहीं पा रही थी। बस खड़ी देखती रही। आवाज मुँह तक आकर रुक गई थी। आँखों में खुशी के साथ एक बेबसी थी। सुंदरी ने ही कहा, "सादी-ब्याह हुआ है। बहुरिया को दिखाओ। आसीरवाद दे देवें।" सुंदरी आँगन मैं एक ओर खड़ी चारों ओर नजर दौड़ा रही थी कि परिवार का कोई सदस्य दिखाई दे जाए। पिता अब नहीं रहे थे। न भाई दिखाई दे रहा था और न ही बहन का बेटा। बहू तो कोठरी में होगी। तभी अपनी पायल की झंकार से ऑगन को गुँजाती हुई एक ओर से बहू आती दिखाई दी। उसके हाथों में कुछ खाने की सामग्री थी। सुंदरी की माँ का दिल तड़प रहा था कि वह सुंदरी को कलेजे सै लगा ले। बुलाकर भीतर बैठाए। परंतु मजबूर थी। अतः खड़ी-खड़ी सारे दृश्य को निहार रही थी चुपचाप। कुछ न कह सकती थी। नौंकर-दाई, नाते-रिश्ते सब जैसे छिपे हुए कैमरे थे। कहाँ क्या क्लिक हो जाए? सतर्क थी। दो महरियाँ आँगन मैं काम कर रही थीं। अभी उनकी नजर भी सुंदरी और कुसुम पर थी कि वे क्‍या करती हैं? क्‍या गाती हैं? बहू सुंदरी के पास आई तो उसने कहा, "आय-हाय! चाँद जैसी बहू उतार लाई हो। एहवात बना रहे बहू का। दूधे नहाय पूर्तों फले।" सुंदरी ने अपना झोला फैलाकर कागज मैं बाँधी खाद्य-सामग्री ले ली। फिर जैसे उसने एलान किया, "अब हम जा रही हैं शिवाला की ओर।" यह कहकर अर्थ-भरी आँखों से एक बार माँ को, फिर रैनु को देखा। उसके बाद अपनी नजरें आँगन मैं चारो ओर दौड़ाई। बड़ा-सा आँगन। काम करती हुई महरियाँ। अरा-पूरा घर। फिर सूनी नजरों से माँ और बहन को देखते हुए मुँह घुमाकर बाहर निकल गई। उसके पीछे-पीछे कुसुम भी। उन दोनों के जाते ही एक महरी ने कहा, "ये लो। ये तो बिना नाचे-गाए चली गई।" "तो आई किसलिए थीं?" दूसरी ने कहा। हूँ… देखो ना" दूसरी व्यंग्य से मुस्कुराई। इस पर सुंदरी की माँ ने तड़पकर कहा,"बिचारियों ने कुछ नेग-निछावर भी तो नहीं लिया। आई, आशीर्वाद दैकर चली गई।" घर से बाहर निकलकर सुंदरी और कुसुम कच्ची सड़क पर आई तो कुसुम ने पूछा, "माई से कैसे मिलोगी? अभी तो देखा-देखी भी नए हुई ठीक से?" माई से सुनाए तो दिया कि जा रहे हैं शिवाला पर। उँहँ आएगी सब।" दोनों एक निर्जन शिवालय पर पहुँच गई थीं जो गाँव के बाहर पड़ता था। वह शिवालय काफी प्राचीन था जिससे सटा हुआ एक विशाल बरगद का पेड़ था। दूर-दूर तक फैली उसकी डालियों से मोटी-मोटी जड़ें लटक-लटककर को छू रही थीं। गाँव के लोग कहते थे कि इस पर शंकर जी का साँप रहता है, जो काटता नहीं है, पर अक्सर आस-पास घूमता हुआ दिखाई दे जाता है। वहीं पास मैं एक कनेर का पेड़ था। दुनिया-भर के पीले फूल उसके नीचे झर-झर कर गिरे हुए थे। मंदिर के आस-पास पसरी हुई नीरवता बरगद की घनी पत्तियों में छिपी चिड़ियोँ की निश्चित और निर्भय बतियाहट के रवरों से टूट रही थी। कभी-कभी दूर से टेरते किसी पंछी का तेज स्वर सुनाई दे जाता। ऐसे तो सन्‍नाटे की झंकार ही गूँज रही थी। कुसुम चली उसकी छाया मैं बैठने तो सुंदरी ने कहा, "वहीं बैठेगी? शंकर जी के साँप से भैंट करेगी क्या?" कुसुम डर गई, "क्या…. साँप?" "अरे नहीं कुछ नहीं बैठ, जहाँ मन करता हो। कुछ नए होगा।" "नहीं-नही, चल मंदिरवा के ओसारे में। वहीं बैठेंगी।" सुंदरी ने देखा वहाँ एक खूब साफ-सुथरा कुआँ है तो उसका मन कुएँ के गर्भ का पानी पीने के लिए मचल उठा। वह चल दी कुएँ से पानी निकालने। डोल कुएँ मैं गिराने लगी तो कुसुम भी चली आई। सुंदरी ने पानी का डोल ऊपर खींचा और बोली, "पहिले तू पी ले पानी।" कुसुम अपने पैरों पर बैठ गई और ओक से पानी पीने लगी। ऊपर से सुंदरी पानी गिरा रही थी। जब वह पीकर उठी तो उसकी जगह सुंदरी बैठ गई ओक मुँह तक ले जाकर। कुसुम डोल से पानी गिराकर उसे पानी पिलाने लगी। बहुत दिनों बाद शैवाल की महक वाला ठंडा पानी सुंदरी के कंठ से फिसलता हुआ कलेजे तक उतर रहा था। बहुत दिनों बाद पानी में बसे हरेपन के स्वाद से वह तृप्त हो गई। पीकर उसने डकार ली। फिर चल दी आँचल से मुँह पॉँछती मंदिर के ओसारे में बैठने। दूर से आती हुई ठंडी हवा से दोनों की आँखें झपकने लगीं तो वहीं चादर बिछाकर दोनों लेट गई। लेटे-लेटे सुंदरी कुसुम से बोली, "हाँ तो तुम्हें साँप का खिस्सा नहीं मालूम न?" "नाहीं।" ई बरगद की जड़ी में एक जोड़ा नाग-नागिन रहता है कौना जमाना से, कोई नहीं जाने। कोई कहता है कि शंकर जी का साँप है तो कोई कहता है कि शंकरे जी हैं। पर एक बार तो हमहीं देखें रहें। ठीक हमरा सामने छत्तर काढ़ के खड़ा हो गया। साक्षात भोले बाबा लेखन। बाकिर काटा-उटा नए, जैसे आसीरबाद दे रहा होय" ऐसा कहते हुए सुंदरी के रोंगटे खड़े हो गए। उसने कहा, "देख, हमरे रोएँ खड़े हो गए हैं। उ, भोले बाबा रहैं और साथ में पारबत्ती जी। एक अउर साँप था।" कुसुम ने आश्चर्य से कहा, हू? बाप रै। हम तो डरिए जाते।" "नाहीं, कौनो डर नाहीं - ईहा के कौंनो लड़िका-बूढ़-जवान से पूछो। सबकै मालूम है ई बात। सब कहेगा हम ईहा देखा, उहाँ देखा। बाकि साँप आज तक केहुको काटा नए है। बड़ा जगता मंदिर है। भागे से कोई उ, साँप को देख पाता है।" फिर तरह-तरह की बातें होने लगीं। कहते-सुनते कुछ समय बीता। तब सुंदरी ने सूने रास्ते की ओर देखा जिस पर दो स्त्री चली आ रही थीं। वह बोली, "देख, उहे, माय आय रही है। उसके साथ रेनु है। पता नहीं आज गोपी क्यों नहीं दिखाई दिया? बहिन पुत भी नहीं।" उन दोनों के नजदीक पहुँचते ही वह उठी। पहले माँ से, फिर बहन से गले लगकर मिली। वृद्धा ने पूछा, "कैसी है तू माया? मेरी बेटी! तू आँगन में आई, पर मैं किसी से कह न सकी कि मेरा बच्चा आया है। तुझे आँगन मैं अजनबी की तरह खड़ा रहने दिया। बैठा न सकी। पानी तक के लिए पूछ न सकी तुझे। यही तो मेरा भाग्य है।" यह कहकर वह अपनी आँखों से निकलते हुए आँसुओं को पोंछने लगी। "अच्छा-अच्छा! अब रोय मत। अभी थोड़ा देर हमरे साथ बोल-बतिया ले। रो नहीं। हमें अच्छी तो हूँ। देखिए रही है।" सुंदरी अपनी माँ को मंदिर के ओसारे में बैठाते हुए बोली। उसे बैठाने के बाद उसके बगल मैं बैठ गई। रेनु भी वहीं बैठी हुई थी। थोड़ी दूर पर कुसुम थी। शायद यह दूरी उसने स्वयं बना ली थी कि उनकी आपसी बातों में उसके कारण कोई खलल न पहुँचे। सब खुलकर अपना दुख-सुख कह-सुन सकें। "अच्छा, तू अपनै बारे मैं बता। तू एतना दुब्बर काहै होए गई है? हड्डी-हड्डी तो निकल आई है।" सुंदरी बोली। "मुझे छोड़ दे। अब क्‍या करना है मुझे? उठ जाऊँ संसार से, अब तो यही चाहती हूँ जीकर क्‍या करना है? अब सारी पिछली बातें याद आने लगी है।" वृद्धा बोली। "क्या?" इतना रूप दिया भगवान ने, पर उसका माथा खराब हो गया था कि तुझे ऐसा बना दिया। फिर भी, जैसी भी थी रहती मेरे आँगन मैं। पर सब उठा ले गए मुझसे छल करके। मैं सो रही थी। हमेशा इसी डर से दरवाजा बंद करके सोती थी। उस दिन तुझे लेकर सोई तो आँख लग गई। किवाड़ खुले हुए थे। तभी सब उठा ले गए दे दिया तुम्हें खोजवा को अहूँ... हूँ... हैँ...।" कहकर वह अपनी छाती पीटने लगी थी। सुंदरी ने कहा, "माई! भूल जा उ सब बात। जो हमरे किस्मत मैं था, सोई हुआ। किस्मत का लिखा ना मिटत है, माई। तू काहै रोती अठर छाती पीटती है? एमे तोहार दोस ना है।" वृद्धा ने उसकी ठुडडी पकड़ ली और कहा, "अब तो जाने कब मिलना होगा। मैं रहूँ... न रहूँ।" "नहीं-नहीं, ई सब मत बोल। हम फिर आएँगे भेंट करने।" सुंदरी अपने झोले मैं से मिठाई का डब्बा निकाल लाई। माँ को देते हुए बोली, "लो माई, बड़का दोकान से खरीदा है। खाना।" बहन की ओर देखते हुए बोली, "तुझे अब देख रही हूँ जब तुम्हारे बेटा का बियाह होय गया। चलो, देखकर संतोष तो हुआ। माई को देखना। गोपी तो है ही। पर तू भी देखना। हम तो रमता जोगी। संसार के माया-मोह से तो अभिए छूटि गए हैं... गोपी कड़सा है? दिखाई नए दिया।" "ठीक है। वह शहर गया है। सवेरे ही निकल गया।" रेनु बोली। और "राजू?" 'वह भी साथ में गया है।" "हमरा भागे खराब है। उसकी दुलहिन को तो देखे, बाकिर उसको नए देख सके। अब पता नहीं कब देख भी पाएँगे, कि नाहीं।" सुंदरी कुछ उदास होती हुई बोली। "नहीं दिदिया, ऐसे क्‍यों कहती हो? देखोगी क्‍यों नहीं?" "हाँ सायद कहीं देख पाए! पर कोय उम्मेद नाहीं।" मंदिर के ओसारे पर ये तीन औरतें पास-पास बैठी रहीं। बातें जितनी हुर्ईई, उससे अधिक स्नेह-भरी दृष्टि का लेन-देन हुआ। जितना कुछ कहा गया, उससे अधिक अनकहै को सुना और महसूसा गया। झिर-झिर हवा चल रही थी और एक अजीब शांति से नहाया हुआ था सब कुछ मंदिर, प्रांगण, बरगद, कनेर का पेड़, कुआँ और सामने कुछ दूर तक फैला हुआ मैदान। अचालक सुंदरी उठी। अपना आँचल सँभालते हुए बोली, "अच्छा माई! अब साँझ होय रही है। हमें बस पकड़ना है। तुझे भी घर जाना है। तू भी चलते-चलते थक जाएगी। धीरे-धीरे जाना। फिर मिलेंगे। कोनो बात का चिंता मत करना।" उसकी माँ भी उठी। स्नेहकातर होकर अपने कमजोर हाथों से सुंदरी का गाल छूती हुई उसकी छुड्डी पकड़कर उसे कई पलों तक देखती रही। कुछ बोल न सकी। सुंदरी ने माँ को पकड़ लिया और उसके गाल से अपना सटा लिया। माँ के गाल की गोरी कोमल त्वचा बुढ़ा के और भी कोमल लग रही थी सटने पर। सीने से चिपकी उसकी सूती साड़ी का मुलायम एहसास वह अपने कलेजे में सँजोती रही। अलग हुई तो देखा माँ रो रही थी। सुंदरी ने उसकी बुढ़ाई झुर्रीदार पल्रकों को डँगलियों से पोंछ दिया। सुंदरी की माँ डगमगाते कदमों से सीढ़ियाँ उतरने लगी। उसके पैरों की डगमगाहट बुढ़ापे की कम और भावविहवलता अधिक थी। रेनु ने उसे सँभाल रखा था। वह उसे पकड़कर ले जा रही थी। जब वे दोनों कुछ दूर निकल गई तो सुंदरी और कुसुम भी चल दीं अपनी राह पर। ********

  • संबंध सुहाना है

    लीला तिवानी है प्रेम से जग प्यारा, सुंदर है सुहाना है जिस ओर नज़र जाए, बस प्रेम-तराना है बादल का सागर से, सागर का धरती से धरती का अंबर से, संबंध सुहाना है तारों का चंदा से, चंदा का सूरज से सूरज का किरणों से, संबंध सुहाना है सखियों का राधा से, राधा का मोहन से मोहन का मुरली से, संबंध सुहाना है पेड़ों का पत्तों से, पत्तों का फूलों से फूलों का खुशबू से, संबंध सुहाना है जन-जन में प्रेम झलके, हर मन में प्रेम छलके मन का इस छलकन से, संबंध सुहाना है। *******

  • जिंदगी जहां ले जाए

    डॉ. जहान सिंह ‘जहान’ अभ्रक की विशाल पहाड़ियां, घने जंगल से गुजरती पतली पगडंडियां। रात में अनगिनत जुगनूओं से टिमटिमाता क्षेत्र। झरनों से गिरते पानी का अद्भुत संगीत। सम्मोहन से जकड़े हुए अंधेरा। अगर कुछ सुनाई पड़ रहा था तो अपनी सांसे। या यदा-कदा खौफनाक जानवरों का चीत्कार जो सिर्फ सिहरन और भय पैदा कर देता। इस जादुई सन्नाटे को तोड़ रहा था तो जीप का हॉर्न। ठा0 भूपेंद्र सिंह रूपगढ़ के जमीदार बड़ी कद-काठी, घुड़सवारी और शिकार का खानदानी शौक। पचास साल पार कर चुके लेकिन नौजवानों जैसी फुर्ती, अचूक निशानेबाज। पड़ोस के चालीस गांव में दबदबा। उनकी मां ठकुराइन रूप कुंवर अपनी शान और संस्कार विरासत में दे गई थीं। ठा0 भूपेंद्र सिंह दस हाकारो और तमाम लाव लश्कर के साथ तीन दिनों से जंगल में डेरा डाले थे। पता चला कि आज की रात नदी पार जंगली सूअरों का झुंड आया है। जो ठाकुर साहब के नए लगाए चाय के बागान से गुजरेगा। शायद नया चाय का बागान उजड़ ना जाए। इस चिंता से शेर के शिकार का प्लान बदलकर अपना पूरा दलबल लेकर सोना नदी की तरफ चल दिए। जब घड़ी देखी तो सुबह के 3:00 बज चुके थे। बोझल आंखें गजब की थकान और सर्द रात अजीब सी उलझन पैदा कर रही थी। लेकिन किस में हिम्मत जो चू चपड कर सके। सब थके से शिकार के नशे में बस चले जा रहे थे। झाड़ियों की सरसराहट ने अचानक जीप को तुरंत ब्रेक लगाकर रोकने को मजबूर कर दिया। ठाकुर साहब की पीछे वाली जीप भी चीं करके रुक गई। पीछे से आवाज आई कि काफिला क्यों रोका गया। ड्राइवर गुलजारी ने होठों पर उंगली रखकर चुप रहने का संकेत दिया और सर्च लाइट डाली तो बड़ी चमकीली आंखें दिखाई पड़ी। सर्च लाइट घुमा कर देखी तो दो नहीं है सैकड़ों जोड़ें स्थिर गति से निहार रहे थे। ठाकुर साहब को समझने में जरा भी देर नहीं लगी कि खूंखार जंगली सूअरों का हमला होने वाला है। एक भयानक विशाल भारी-भरकम दो-दो फुट नुकीले वीरो वाला सूअर आक्रमक मुद्रा में समूह का नेतृत्व कर रहा था। ठाकुर साहब दे दो नाली बंदूक निकाल कर धायं-धायं दो फायर दाग दिए। सूअर तेजी से पलटा और भागने की कोशिश में तार की लगी झाड़ी में फंस गया। खून से लथपथ तारों से उलझ कर पेट से अंतडियां बाहर झांकने लगी थी। पर ना जाने किस पुकार पर अनोखी ताकत से भागा जा रहा था। वर्षों बाद इतना बड़ा शिकार छोड़ना नहीं चाह रहे थे। सुबह की पै फटने वाली थी। पुराने शिकारी का शौक, खून के दाग देखते हुए पहाड़ी की ढलान पर पीछा करने लगे। मीलों की दूरी तय करने के बाद अचानक एक बड़ी झाड़ी पर रास्ता खत्म हो गया। ठाकुर साहब ने बंदूक से फिर निशाना लेते हुए झाड़ी के पीछे गए तो उनकी मौत दिखी झांका तो दिल दहलाने वाला दृश्य था। वह एक माँ थी। अपने छोटे-छोटे बच्चों के बीच आकर दम तोड़ रही थी। आंखों में आंसू दर्द से चिन्ह आरती हुई बच्चों को दुलार कर प्यार कर रही थी। इतने पुराने शिकारी का भी एक बार दिल दहल गया। वापस आने का मन बना ही रहे थे। तो अचानक ख्याल आया कि इस तड़प-तड़प के जान देने से तो अच्छा होगा कि इसको तुरंत मृत्यु प्राप्त हो जाए। बिना सोचे दो गोलियां और दाग दी। बच्चे डर से दूर जाकर दुबक गए, यह कौन सी शक्ति थी। जो घायल मां को इतनी दूर खींच लाई। शायद मां का बच्चों से प्यार। यह ठाकुर साहब भूपेंद्र सिंह के जीवन का आखिरी शिकार था। जिसने हमेशा के लिए हृदय परिवर्तन कर दिया है कि बेगुनाह जानवरों की हत्या नहीं होनी चाहिए। उनमें भी किसी बच्चे की मां हो सकती है। घाटी के किनारे लगे कैंप में दोपहर 2:00 बजे ठाकुर भूपेंद्र ने एक लंबी अंगड़ाई लेकर आंखें खोली। तेज धूप लेकिन हवाओं में शरद लहर एक अजीब एहसास। जब कभी इतनी दूर तक आते हैं। इस क्षेत्र में तो एक याद उनको परेशान करने लगती है वह है। वहां से तीन मील दूरी पर स्थित माधवगढ़ की हवेली। जिसकी मालकिन राजकुमारी जगरानी जो अपनी खूबसूरती के लिए दूर-दूर तक जानी जाती है। घुड़सवारी, तीरंदाजी का बचपन से ही शौक। उनके पति राजा गोपालराय सोनापुर के मेले में घोड़े से गिरकर घायल ऐसे हुए कि बिस्तर पकड़ा और कुछ समय बाद महल में ही दम तोड़ दिया। अचानक उनकी मृत्यु के बाद पूरी देख-रेख की जिम्मेदारी राजकुमारी जगरानी ने संभाली। अंग्रेजों का शिकंजा कसता जा रहा था। जमीनों के लगान, लेनदेन के झगड़े बढ़ते जा रहे थे। आए दिन कोर्ट कचहरी का आना-जाना। सरकारी दखलअंदाजी इतनी हो गई थी कि कभी-कभी तो विधवा राजकुमारी जगरानी जो अपने इलाके में छोटी पंडिताइन के नाम से ज्यादा प्रसिद्ध थी, को भी कलेक्टर, तहसीलदार, जज से मिलने के लिए सोनापुर आने-जाने की जरूरत पड़ने लगी। ठाकुर भूपेंद्र सिंह की कुछ जमीदारी सोनापुर क्षेत्र में पड़ती थी। लगान वसूलने और जमा करने के दौरान दोनों लोगों की मुलाकात कभी-कभी कलेक्टर साहब के बंगले में हो जाती थी। वक्त बीत गया, कब वह दोनों एक दूसरे के करीब आए गए पता ही नहीं चला। छोटी पंडिताइन का पैर ऐसा फिसला कि ठाकुर के आंगन तक आ गया। ठाकुरों के घरों में उन पुराने समय में औरतें विरोध जता तो सकती थी लेकिन कुछ कर नहीं सकती थी। ठकुराइन भी शुरू की बेचैनी के बाद शांत हो गई। और अपना नसीब मानकर जीवन व्यतीत करने लगी। छोटी पंडिताइन और ठाकुर के चर्चे इलाके में आग की तरह फैले लगे। दोनों परिवार के लोगों में रंजिश भी रही झगड़े भी हुए। कोर्ट कचहरी, पंचायत भी लगी पर बाद में समाज सिर्फ एक मूकदर्शक बनकर रह गया। दोनों की जिंदगी कहां से कहां ले गई थी। जंगल की कोठी पर मिलना हफ्तों पड़े रहना। सिर्फ छोटी पंडिताइन के प्रेम ने समाज की सब बेड़ियां तोड डाली। विधवा का समाज में खुला प्रेम प्रसंग लोगों की आंखों में किरकिरी थी। कुंवर अरुण प्रताप सिंह, ठाकुर साहब का छोटा लड़का, एक बिगड़ैल रईसजादा की तरह गुंडई और दबंगई करने में लिप्त रहने लगा। उसका शराब, वेश्या, खून खराबा ही शौक रह गया था। एक रात शराब और मुजरे की दावत में किसी तवायफ ने जहर देकर कुंवर की जीवन लीला समाप्त कर दी। ठाकुर भूपेंद्र सिंह को हवेली से घृणा हो गई। और उन्होंने जंगल में पहाड़ियों के बीच एक कोठी बनवाई और दिन के कामकाज के बाद रात वहीं पर विश्राम करने लगे। छोटी पंडिताइन का मेलजोल और प्रगाढ़ हो गया। विधवा का ध्यान जायदाद की तरफ क्या काम हुआ कि परिवार के लोगों ने अंग्रेजों से मिलकर जायदाद में लूटपाट खींचा-घसोटी चालू कर दी। राजकुमारी का भतीजा गंगा देवराय अंग्रेजों का पिट्ठू बन गया। और जमीदारी की जड़ खोदने में लग गया। छोटी पंडिताइन को रास्ते से हटाने की सोचने लगा। एक दिन डाकू लक्खा को काफी मोटी रकम देकर जगरानी को मरवाने की पेशकश कर दी। एक खुशगवार शाम को ठाकुर साहब और राजकुमारी जगरानी पैदल घूमते-घूमते नदी के किनारे तक आ गए। हाथों में हाथ प्यार में गाफिल जोड़ी अचानक घोड़ों की टॉप सुनकर ठिठक गई। ठाकुर का हाथ फौरन पिस्तौल पर चला गया। और राजकुमारी सिमटकर बाजुओं में आ गई। एक क्षण में पंडिताइन ने भी हमेशा साथ रहने वाली पिस्टल हाथ में ले ली। वह बचपन से ही अचूक निशानेबाज थी। अचानक एक भारी-भरकम शरीर का काला आदमी पगड़ी बांधे दोनाली हाथ में लिए घोड़े पर सवार आमने-सामने आ गया। दोनों को समझने में देर नहीं लगी कि दोनों डाकुओं से घिर गए हैं। ठाकुर ने कड़कती आवाज में पूछा कौन? जवाब आया सरकार हम लक्खा डाकू हूं। हमारी आपसे कोई दुश्मनी नहीं है। हमारे मां-बाप ने आपका नमक खाया है। लेकिन सरकार राजकुमारी जगरानी मेरे हवाले कर दो। लक्खा तुम जानते हो कि ठाकुर भूपेंद्र सिंह अपने मातहतों का स्वागत ही नहीं। उनकी रक्षा भी करना जानते हैं। अगर राजकुमारी को ले जाना है। तो तुम मुझे मार कर ही ले जा सकते हो। वरना अपने घर लौट जाओ। और कोठी पर आकर जो चाहना वह ले जाना। सरकार हमारी मजबूरी है। गंगा देव राय ने इस काम के लिए मुझे पूरी 50 गिन्नी दी हैं। लक्खा जिस काम के पैसे ले लेता है। उसे अपनी जान लगाकर भी पूरा करता है। तो लक्खा सावधान अब जंग होगी। जो जीतेगा वह राजकुमारी को ले जाएगा। ठाकुर की जिद और डाकू का कॉल आमने-सामने था। निर्णय विधाता के हाथ में। तभी एक खूंखार जानवर के दहाड़ ने की भयानक चीतकार ने सबका ध्यान विचलित कर दिया। ठाकुर भूपेंद्र सिंह असंतुलित हो गए और पैर से फिसलकर पहाड़ी के नीचे बह रहे दरिया में गिर पड़े। राजकुमारी देखते ही चीख पड़ी बचाओ-बचाओ। डाकू लक्खा बहसी हंसी हंस रहा था। उसने सोचा कि ठाकुर साहब की बिना हत्या किए। उसका कॉल पूरा हो रहा था। वह राजकुमारी की तरफ बढ़ा और पकड़कर घोड़े पर बैठाने की कोशिश करनी चाही। राजकुमारी बहादुर और निशानेबाज भी थी। उसने ताबड़तोड़ दो फायर कर दिए। देखते ही देखते लक्खा ढेर हो गया। साहसी राजकुमारी जगरानी ने बिना वक्त गंवाए दरिया में छलांग लगा दी। इससे पहले कि ठाकुर का दल उस पर हावी हो पाता। राजकुमारी भी दरिया में डूबने उतराने लगी। ठाकुर भूपेंद्र सिंह धारा के विपरीत बहाव में राजकुमारी के करीब पहुंचने की कोशिश कर रहे थे। राजकुमारी भी पूरे साहस से ठाकुर साहब की तरफ पहुंचने के लिए दरिया से लड़ रही थी। ठाकुर ने किसी तरह राजकुमारी की चुनरी पकड़ ली। और दोनों करीब आ गए। थके बोझिल लेकिन चेहरों पर विजय थी। राजकुमारी ने फूलती सांस में पूछा। अब हम कहां जाएंगे? ठाकुर भूपेंद्र सिंह ने कहा उसी आत्मविश्वास से भरी आवाज में “जिंदगी जहां ले जाए।” *******

  • पत्थर का दर्द

    डॉ. कृष्ण कांत श्रीवास्तव बहुत पहले की बात है। एक शिल्पकार मूर्ति बनाने के लिए जंगल में पत्थर ढूंढने गया। वहाँ उसको एक बहुत ही अच्छा पत्थर मिल गया। जिसको देखकर वह बहुत खुश हुआ और वह सोचने लगा कि यह मूर्ति बनाने के लिए बहुत ही उपयुक्त है। जब वह घर की ओर लौट रहा था, तो उसको एक और पत्थर मिला। शिल्पकार ने उस पत्थर को भी अपने साथ ले लिया। घर आकर उसने पत्थर पर अपने औजारों से कारीगरी करना प्रारंभ कर दिया। औजारों की चोट जब पत्थर पर हुई, तो पत्थर बोला कि शिल्पकार मुझको छोड़ दो। तुम्हारे औजारों के प्रहार से मुझे बहुत दर्द हो रहा है। अगर तुम मुझ पर चोट करोगे तो मै बिखर कर अलग हो जाऊंगा। तुम किसी और पत्थर पर मूर्ति बना लो। पत्थर की बात सुनकर शिल्पकार को दया आ गयी। उसने पत्थर को छोड़ दिया और दूसरे पत्थर को लेकर मूर्ति बनाने लगा। वह पत्थर कुछ नहीं बोला। कुछ समय में शिल्पकार ने उस पत्थर से बहुत अच्छी भगवान की मूर्ति बना दी। गांव के लोग मूर्ति बनने के बाद उसको लेने आये। गांव वालों ने सोचा कि हमें नारियल फोड़ने के लिए एक और पत्थर की जरुरत होगी। उन्होंने वहाँ रखे पहले पत्थर को भी अपने साथ ले लिया। मूर्ति को ले जाकर उन्होंने मंदिर में सजा दिया और मूर्ति के सामने उसी पत्थर को रख दिया जिसने शिल्पकार से प्रहार करने को मना किया था। अब जब भी कोई दर्शनार्थी मंदिर में दर्शन करने आता तो मूर्ति की फूलों से पूजा करता, दूध से स्नान कराता और उस पत्थर पर नारियल फोड़ता था। जब लोग उस पत्थर पर नारियल फोड़ते तो पत्थर बहुत परेशान होता। उसको दर्द होता और वह चिल्लाता लेकिन कोई उसकी सुनने वाला नहीं था। एक दिन एकांत का समय पाकर उस पत्थर ने मूर्ति बने पत्थर से बात की और कहा कि तुम तो बड़े मजे से हो। लोग तुम्हारी पूजा करते है। तुमको दूध से स्नान कराते हैं और लड्डुओं का प्रसाद चढ़ाते हैं। लेकिन मेरी तो किस्मत ही ख़राब है, मुझ पर लोग नारियल फोड़ कर जाते हैं। जिससे मुझे बड़ा कष्ट होता है। इस पर मूर्ति बने पत्थर ने कहा कि जब शिल्पकार तुम पर कारीगरी कर रहा था, यदि तुम उस समय उसको नहीं रोकते तो आज मेरी जगह तुम होते। लेकिन तुमने आसान रास्ता चुना, इसलिए तुम अभी दुःख उठा रहे हो और पूरा जीवन यूं ही दुःख उठाते रहोगे। उस पत्थर को मूर्ति बने पत्थर की बात समझ आ गयी। उसने कहा कि अब से मैं भी कोई शिकायत नहीं करूँगा। इसके बाद लोग आकर उस पर नारियल फोड़ते। नारियल टूटने से उस पर भी नारियल का पानी गिरता और अब लोग मूर्ति को प्रसाद का भोग लगाकर उस पत्थर पर रखने लगे। सीख: जीवन के प्रथम पड़ाव में जो मनुष्य मेहनत करते हैं और कष्टों को सहकर अपने व्यक्तित्व का विकास करते हैं। उनका शेष जीवन सम्मान सहित आराम से व्यतीत होता है। *******

  • FALL OF A FEATHER

    Aastha Awasthi Death so languid As fiery as a feather That kisses the face of its demise as ever A Tale of Death the fall of a Feather A voice of dreams just gone forever There were hundreds of feathers like it Oblivious and happy Playing with glee They were all puppets in a useless scheme I wondered why it wasn't like esteem Tons of conversations but not a single one with it Room full of feathers but no friends to greet View of its lonely corner everyone in a jolly cart While it was suffocating on tears that tear her apart Once it was too with all of them The others on the wings of the heaven they said But it couldn't keep up with the glory of them It tried n' tried its best But it still went in vain Pain was a pinch of salt Always the right amount Not a life without knives nor a death with smiles For it was forever the last in the line Defenceless little thing that was barely even alive The dark couldn't help dragging this easy blame To the edge of its mind where the evils claim Just a little push was all that it took To fall from grace for falling loose Nobody looked back nobody needed evermore No one even realized it wasn't there anymore Smiles and hopes all faded to none As it kept falling and falling alone Down as it goes Limbs flailing around It chokes; it suffers in this peaceful town Water in the throat freezing up its heart Right up to the end before it could even start Selfish it may be as it fall from its palm Not a hero of any sort and it found its calm Sun was on the horizon Casting shadows flake On the ghastly waters of this tranquil lake That can rival the sky in its beauty and art Just close your eyes and let go at last Death as languid as a fiery feather That kisses the face of its demise as ever ********

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