top of page

Search Results

921 results found with an empty search

  • आखिरी प्रणाम

    सुरेश बाबू मिश्रा रमनदीप उस झाड़ी की तलाश कर रहा था जहां उसने बैग में अपना लैपटाप छुपा कर रखा था। रमनदीप को अच्छी तरह याद है कि उसने उस झाड़ी के पास बी का चिन्ह बनाया था। बी का मतलब भारत। वह उस चिन्ह को ढूढ़ रहा था। काफी देर तक तलाश करने के बाद आखिर उसे वह झाड़ी मिल ही गई। झाड़ी में छिपाए गए बैग में अपने लैपटाप को सुरक्षित देखकर उसके चेहरे पर एक अनोखी चमक आ गई थी। उत्सुकतावश उसने लैपटाप आन करके देखा। उसके द्वारा इकट्ठी की गई सारी गोपनीय सूचनाएं एवं डाटाज पूरी तरह से सुरक्षित थे। यह देखकर उसकी सारी थकान उड़न छू हो गई थी और उसका पूरा शरीर एक अनोखे रोमांच से भर गया था। उसने अपना लैपटाप जिस बैग में रखा था उसे उठाकर पीठ टांग लिया। रमनदीप कुछ देर सुस्ताने के लिए वहीं जमीन पर बैठ गया। बीते दिनों की घटनाएं चलचित्र की भांति उसकी आँखों के सामने घूमने लगीं। रमनदीप सिंह भारतीय सेना की इंटेलीजेंस कोर का जांबाज जासूस था। उसे एक गोपनीय मिशन पर पाकिस्तान भेजा गया था। वह कई दिनों से भेष बदलकर पाकिस्तान में रह रहा था और बड़े गोपनीय तरीके से अपने मिशन पर काम कर रहा था। उसे पाकिस्तान आए दो सप्ताह से अधिक हो गए थे। उसे पाकिस्तान में चल रहे आतंकवादी शिविर के बारे में सूचनाएं एकत्र करने के लिए भेजा गया था। वह अपने मिशन में काफी हद तक कामयाब रहा। आतंकवादी कैम्पों की काफी सूचनाएं एकत्र कर उसने अपने लैपटॉप में अपलोड कर ली थीं। वह एक सूफी फकीर की वेशभूषा में घूमा करता था, इसलिए किसी को उस पर कोई सन्देह नहीं हुआ था। परन्तु कल एक आतंकवादी शिविर का फोटो लेते हुए पाकिस्तानी पुलिस के एक जवान ने उसे देख लिया। उसे रमनदीप पर शक हो गया। तब से पाकिस्तानी पुलिस उसका पीछा कर रही थी। किसी तरह से वह पुलिस के जवानों को चकमा देकर पी.ओ.के. के इस पहाड़ी इलाके में आकर छुप गया था। यह तो अच्छा हुआ कि उसने कुछ दिन पहले अपना लैपटाप वाला बैग यहीं पहाड़ी पर एक झाड़ी में छुपाकर रख दिया था जो आज उसे सही सलामत मिल गया। पाकिस्तानी पुलिस अब भी उसे ढूंढ़ रही थी, इसलिए खतरा अभी टला नहीं था। रमनदीप पंजाब प्रान्त के होशियारपुर जिले के एक गांव का रहने वाला था। उसके पिता सेना के रिटायर्ड कर्नल थे। उन्होंने 1965 और 1971 के युद्ध में भाग लिया था और असाधारण शौर्य का प्रदर्शन किया था। रमनदीप ने देशभक्ति का ककहरा उन्हीं से सीखा था। उसकी माँ रमनदीप से बेहद प्रेम करती थी क्योंकि वह उनका इकलौता बेटा था। उसके पिता के पास काफी खेती भी थी और उनके परिवार की गिनती सम्पन्न परिवारों में होती थी। रमनदीप के तीन बहिनें थीं दो बड़ी और एक उससे छोटी। रमनदीप को ध्यान आया कि आज से लगभग एक महीने बाद उसकी छोटी बहिन रजवन्त कौर की शादी है। शादी में घर जाने के लिए उसने छुट्टी की एप्लीकेशन अपने आफीसर को इस मिशन पर आने से काफी पहले ही दे दी थी। तीन साल पहले रमनदीप की शादी हो चुकी थी। उसकी पत्नी सुरजीत कौर बेहद सुन्दर और शालीन थी। अपनी शादी के बाद इन तीन सालों में वह कुल मिलाकर बमुश्किल एक महीने ही घर पर अपनी पत्नी के साथ बिता पाया था, मगर सुरजीत कौर ने कभी कोई शिकायत नहीं की। उसने घर के कामकाज को बहुत अच्छी तरह से संभाल रखा था और वह सबका बहुत ख्याल रखती। रमनदीप सोचने लगा कि सेना के जासूस का काम कितना कठिन और चुनौतीपूर्ण है। उसे हर समय प्राण हथेली पर रखकर काम करना पड़ता है। दुश्मन की कब उस पर नजर पड़ जाए कुछ पता नहीं। उसका हर मिशन खतरों से भरा होता है। विडम्बना तो देखो उसके घर वालों या देश के लोगों को उसके जोखिमपूर्ण कार्यों की कोई जानकारी नहीं हो पाती है। मिशन अत्यन्त गोपनीय होने के कारण उसके कामों और उपलब्धियों के बारे में मीडिया में भी न तो कुछ छपता है और न चैनलों पर कुछ दिखाया जाता है। एक जासूस तो यही सोचकर हर समय खुश रहता है कि उसका पूरा जीवन भारत माता की सेवा में समर्पित है। रमनदीप ने सोचा कि इस मिशन को पूरा करने के बाद वह अपनी छोटी बहिन की शादी में गांव जाएगा और कम से कम एक माह गांव में ही अपनी पत्नी और परिवार के साथ बिताएगा। वह इन्हीं ख्यालों में खोया हुआ था कि उसे एक फर्लांग दूर की झाड़ियों में कुछ हलचल सी दिखाई दी। वह चैकन्ना हो गया। उसने अपने मोबाइल में उस स्थान की लोकेशन देखी। भारतीय सीमा यहां से केवल बीस किलोमीटर दूर रह गई थी। उसने सूफी फकीर की वेशभूषा उतार दी और बैग में से निकालकर इण्डियन मिलिट्री इंटेलीजेन्स कोर की डेस पहन ली। उसने अपने बैग को ठीक तरह से पीठ पर टांगा और वहां से निकलने के बारे में सोचने लगा। जिधर झाड़ियों में हलचल दिखाई दी थी उसके विपरीत दिशा में वह कोहनियों के बल रेंगता हुआ आगे बढ़ने लगा। उसने ऐसा करने में बहुत कठिनाई हो रही थी मगर वह खड़े होने का खतरा मोल लेना नहीं चाहता था उसके लिए वह लैपटाप और उसमें एकत्र डाटा सुरक्षित अपने हेड क्र्वाटर पहुंचाना था। वह करीब एक घन्टे तक इसी प्रकार रेंगता रहा। अब वह उस स्थान से लगभग एक किलोमीटर दूर निकल आया था। उसकी श्वांस फूल रही थी इसलिए वह कुछ देर तक वहीं बैठा रहा फिर उसने खड़े होकर चारों तरफ देखा। चारों तरफ दूर-दूर तक सन्नाटा था। वह धीरे-धीरे भारतीय सीमा की ओर बढ़ने लगा। वह पूरी तरह से सतर्क था और सावधानी पूर्वक आगे की ओर बढ़ रहा था। अभी वह तीन-चार किलोमीटर ही दूर पहुंचा होगा कि उसे तीन-चार पाकिस्तानी सैनिक टहलते हुए दिखाई दिए। शायद वहां कहीं आस-पास पाकिस्तानी चेक पोस्ट रही होगी। किसी तरह से उन सैनिकों की नजर से छुपता-छिपाता रमनदीप वहां से निकलने में सफल रहा। अब वह तेज कदमों से चलने लगा था। वह किसी तरह पाकिस्तानी सीमा को पार कर भारत की सीमा में प्रवेश कर जाना चाहता था। उसका मिशन पूरा हो चुका था और अब उसे अपने हेड क्वार्टर पहुंचकर यह लैपटॉप अधिकारियों को सौंपना था। शाम का धुंधलका छाने लगा था। रमनदीप ने मोबाइल में एक बार फिर लोकेशन देखी। भारतीय सीमा अब केवल चार-पांच किमी दूर रह गयी थी। रमनदीप तेजी से भारतीय सीमा की ओर बढ़ने लगा, तभी उसे चार-पांच पाकिस्तानी सैनिक बिल्कुल सामने से आते दिखाई दिये। उनकी नजर शायद रमनदीप पर पड़ चुकी थी वे सीधे उसी की ओर आ रहे थे। अब बचने का कोई रास्ता नहीं था। रमनदीप ने कुछ क्षण सोचा फिर उसने बैग से एक छोटा हैण्ड ग्रेनेड निकाल कर उन सैनिकों को टारगेट बनाकर उनकी ओर फेंका। बहुत तेज धमाका हुआ और क्षण भर में ही पाकिस्तानी सैनिक जमीन पर गिरकर छटपटाने लगे। रमनदीप पूरी ताकत से भारतीय सेना की ओर भागा। वह काफी दूर तक दौड़ता चला गया। अब उसे भारतीय सीमा साफ दिखाई देने लगी इसलिए उसका मन उत्साह से भर गया तभी अचानक पाकिस्तानी सीमावर्ती पोस्ट से रमनदीप को टारगेट करके फायरिंग शुरू हो गई। रमनदीप भारतीय सेना का एक प्रशिक्षित कमांडो था। वह मार्शल आर्ट में काफी दक्ष था। गोलियों की बौछार में से बचकर कैसे निकलना है इस कला को वह बखूबी जानता था। इसलिए शत्रु की गोलियों से बचता हुआ वह लगातार भारतीय सीमा की ओर बढ़ रहा था। आखिरकार वह भारतीय सीमा पर पहुंचने में सफल हो गया था। काफी सावधानी बरतने के बावजूद शत्रु पक्ष की कई गोलियों ले उसके शरीर को छलनी कर दिया जिनमें से लगातार रक्त बह रहा था। असहनीय पीड़ा के बावजूद वह भारतीय सीमा में घुसने के लिए पहाड़ियों पर घुटने एवं कुहनियों के बल रेंगकर आगे बढ़ने का प्रयास कर रहा था। पाकिस्तानी पोस्ट से अब फायरिंग बन्द हो गई थी। उधर भारतीय सीमा में स्थित सेना की द्रास सेक्टर पोस्ट के जांबाज सैनिक सीमा पर गश्त कर रहे थे। रात का अंधेरा चारों ओर फैल गया था। हड्डियों तक को तपा देने वाली सर्द हवाएं चल रही थीं मगर इससे सैनिकों के जोश में कोई कमी नहीं आई थी। वे पूरी मुस्तैदी के साथ अपनी ड्यूटी को अंजाम दे रहे थे। अचानक उनकी नजर रमनदीप पर पड़ी जो घुटनों और कोहनी के बल रेंगकर भारतीय सीमा में घुसने का प्रयास कर रहा था। किसी आने वाले खतरे को भांपकर सेना के जवान सतर्क हो गए थे। उन्होंने अपनी राइफलें लोड कर लीं और पूरी सावधानी से उस दिशा की ओर बढ़ने लगे जिधर से वह आदमी हमारे देश की सीमा में घुसने का प्रयास कर रहा था। सैनिकों ने उसे चारों ओर से घेर लिया। मगर वे यह देखकर हैरान रह गए कि उसके पूरे शरीर में गोलियों के घाव थे और उनसे खून वह रहा था। उसकी पीठ पर एक बैग टंगा हुआ था। वह अब भी आगे बढ़ने का प्रयास कर रहा था। अपने चारों ओर भारतीय सेना के जवानों को देखकर रमनदीप के चेहरे पर खुशी की एक अनोखी चमक आ गई थी। उसके शरीर से बहुत अधिक खून वह चुका था और उसकी श्वांस रुक-रुक कर चल रही थी। उसने भारत की मिट्टी को हाथ में लेकर अपने माथे से लगाया। फिर उसने सिर झुकाकर धरती को चूमा और भारत माता की जय के उद्घोष के साथ अपने जीवन की अन्तिम श्वांस ली। भारतीय सेना के जवान उसे ऐसा करते देख हैरान से खड़े थे। उन्होंने उसकी तलाशी ली। उसकी जेब से उसका आईडेन्टिटी कार्ड मिला जिससे पता चला कि वह इण्डियन मिलिट्री इन्टेलीजेन्स कोर का जासूस रमनदीप सिंह था। जिसे एक गोपनीय मिशन पर पाकिस्तान भेजा गया था। उसके बाएं हाथ की मुट्ठी में एक मुड़ा-तुड़ कागज का टुकड़ा था। एक जवान ने उसकी मुट्ठी खोलकर वह कागज का टुकड़ा निकाला। उसमें लिखा था-मैंने अपना मिशन सफलतापूर्वक पूरा किया। मेरे बैग में जो लैपटाप है उसमें पाकिस्तान में चल रहे आतंकवादी टेनिंग कैम्पों के फोटो हैं। प्लीज इसे हेडक्वार्टर पहुंचा देना। लौटते समय पाकिस्तानी सैनिकों ने अंधाधुंध फायरिंग कर मुझे बुरी तरह घायल कर दिया। मगर मुझे इस बात की बेहद खुशी है कि मैंने भारत माता की गोद में अपने जीवन की अन्तिम श्वास ली। भारत माता को उसके पुत्र का आखिरी प्रणाम। तेरा वैभव अमर रहे माँ, हम दिन चार रहे ना रहें। जय हिन्द। भारत माता की जय। रमनदीप का पत्र पढ़कर सेना के जवानों की आँखों की कोरें गीली हो गईं थीं। उन्होंने सैल्यूट देकर भारत माता के इस सच्चे सपूत को अपनी श्रद्धांजलि दी। *********

  • कफ़न

    प्रेमचंद झोंपड़े के द्वार पर बाप और बेटा दोनों एक बुझे हुए अलाव के सामने चुपचाप बैठे हुए थे और अंदर बेटे की जवान बीबी बुधिया प्रसव-वेदना में पछाड़ खा रही थी। रह-रहकर उसके मुँह से ऐसी दिल हिला देने वाली आवाज़ निकलती थी, कि दोनों कलेजा थाम लेते थे। जाड़ों की रात थी, प्रकृति सन्नाटे में डूबी हुई, सारा गाँव अंधकार में लय हो गया था। घीसू ने कहा—“मालूम होता है, बचेगी नहीं। सारा दिन दौड़ते हो गया, जा देख तो आ।” माधव चिढ़कर बोला—“मरना ही है तो जल्दी मर क्यों नहीं जाती? देखकर क्या करूँ?” “तू बड़ा बेदर्द है बे! साल-भर जिसके साथ सुख-चैन से रहा, उसी के साथ इतनी बेवफ़ाई!” “तो मुझसे तो उसका तड़पना और हाथ-पाँव पटकना नहीं देखा जाता।” चमारों का कुनबा था और सारे गाँव में बदनाम। घीसू एक दिन काम करता तो तीन दिन आराम करता। माधव इतना कामचोर था कि आध घंटे काम करता तो घंटे भर चिलम पीता। इसलिए उन्हें कहीं मज़दूरी नहीं मिलती थी। घर में मुठ्ठी-भर भी अनाज मौजूद हो, तो उनके लिए काम करने की क़सम थी। जब दो-चार फ़ाक़े हो जाते तो घीसू पेड़ पर चढ़कर लकड़ियाँ तोड़ लाता और माधव बाज़ार से बेच लाता और जब तक वह पैसे रहते, दोनों इधर-उधर मारे-मारे फिरते। गाँव में काम की कमी न थी। किसानों का गाँव था, मेहनती आदमी के लिए पचास काम थे। मगर इन दोनों को उसी वक़्त बुलाते, जब दो आदमियों से एक का काम पाकर भी संतोष कर लेने के सिवा और कोई चारा न होता। अगर दोनों साधु होते, तो उन्हें संतोष और धैर्य के लिए, संयम और नियम की बिलकुल ज़रूरत न होती। यह तो इनकी प्रकृति थी। विचित्र जीवन था इनका! घर में मिट्टी के दो-चार बर्तन के सिवा कोई संपत्ति नहीं। फटे चीथड़ों से अपनी नग्नता को ढाँके हुए जिए जाते थे। संसार की चिंताओं से मुक्त! कर्ज़ से लदे हुए। गालियाँ भी खाते, मार भी खाते, मगर कोई ग़म नहीं। दीन इतने कि वसूली की बिलकुल आशा न रहने पर भी लोग इन्हें कुछ-न-कुछ कर्ज़ दे देते थे। मटर, आलू की फ़सल में दूसरों के खेतों से मटर या आलू उखाड़ लाते और भून-भानकर खा लेते या दस-पाँच ऊख उखाड़ लाते और रात को चूसते। घीसू ने इसी आकाश-वृत्ति से साठ साल की उम्र काट दी और माधव भी सपूत बेटे की तरह बाप ही के पद-चिह्नों पर चल रहा था, बल्कि उसका नाम और भी उजागर कर रहा था। इस वक़्त भी दोनों अलाव के सामने बैठकर आलू भून रहे थे, जो कि किसी खेत से खोद लाए थे। घीसू की स्त्री का तो बहुत दिन हुए, देहांत हो गया था। माधव का ब्याह पिछले साल हुआ था। जब से यह औरत आई थी, उसने इस ख़ानदान में व्यवस्था की नींव डाली थी और इन दोनों बे-ग़ैरतों का दोज़ख़ भरती रहती थी। जब से वह आई, यह दोनों और भी आलसी और आरामतलब हो गए थे। बल्कि कुछ अकड़ने भी लगे थे। कोई कार्य करने को बुलाता, तो निर्ब्याज भाव से दुगुनी मज़दूरी माँगते। वही औरत आज प्रसव-वेदना से मर रही थी और यह दोनों इसी इंतज़ार में थे कि वह मर जाए, तो आराम से सोएँ। घीसू ने आलू निकालकर छीलते हुए कहा—“जाकर देख तो, क्या दशा है उसकी? चुड़ैल का फिसाद होगा, और क्या? यहाँ तो ओझा भी एक रुपया माँगता है!” माधव को भय था, कि वह कोठरी में गया, तो घीसू आलुओं का बड़ा भाग साफ़ कर देगा। बोला-“मुझे वहाँ जाते डर लगता है।” “डर किस बात का है, मैं तो यहाँ हूँ ही।” “तो तुम्हीं जाकर देखो न?” “मेरी औरत जब मरी थी, तो मैं तीन दिन तक उसके पास से हिला तक नहीं था! और फिर मुझसे लजाएगी कि नहीं? जिसका कभी मुँह नहीं देखा, आज उसका उघड़ा हुआ बदन देखूँ! उसे तन की सुध भी तो न होगी? मुझे देख लेगी तो खुलकर हाथ-पाँव भी न पटक सकेगी!” “मैं सोचता हूँ कोई बाल-बच्चा हो गया तो क्या होगा? सोंठ, गुड़, तेल, कुछ भी तो नहीं है घर में!” “सब कुछ आ जाएगा। भगवान दें तो! जो लोग अभी एक पैसा नहीं दे रहे हैं, वे ही कल बुलाकर रुपए देंगे। मेरे नौ लड़के हुए, घर में कभी कुछ न था, मगर भगवान ने किसी-न-किसी तरह बेड़ा पार ही लगाया।” जिस समाज में रात-दिन मेहनत करने वालों की हालत उनकी हालत से कुछ बहुत अच्छी न थी, और किसानों के मुक़ाबले में वे लोग, जो किसानों की दुर्बलताओं से लाभ उठाना जानते थे, कहीं ज़ियादा संपन्न थे, वहाँ इस तरह की मनोवृत्ति का पैदा हो जाना कोई अचरज की बात न थी। हम तो कहेंगे, घीसू किसानों से कहीं ज़ियादा विचारवान था और किसानों के विचार-शून्य समूह में शामिल होने के बदले बैठकबाज़ों की कुत्सित मंडली में जा मिला था। हाँ, उसमें यह शक्ति न थी, कि बैठकबाज़ों के नियम और नीति का पालन करता। इसलिए जहाँ उसकी मंडली के और लोग गाँव के सरगना और मुखिया बने हुए थे, उस पर सारा गाँव उँगली उठाता था। फिर भी उसे यह तसकीन तो थी ही कि अगर वह फटेहाल है तो कम-से-कम उसे किसानों की-सी जी-तोड़ मेहनत तो नहीं करनी पड़ती, और उसकी सरलता और निरीहता से दूसरे लोग बेजा फ़ायदा तो नहीं उठाते! दोनों आलू निकाल-निकालकर जलते-जलते खाने लगे। कल से कुछ नहीं खाया था। इतना सब्र न था कि ठंडा हो जाने दें। कई बार दोनों की ज़बानें जल गईं। छिल जाने पर आलू का बाहरी हिस्सा ज़बान, हलक और तालू को जला देता था और उस अंगारे को मुँह में रखने से ज़ियादा ख़ैरियत इसी में थी कि वह अंदर पहुँच जाए। वहाँ उसे ठंडा करने के लिए काफ़ी सामान थे। इसलिए दोनों जल्द-जल्द निगल जाते। हालाँकि इस कोशिश में उनकी आँखों से आँसू निकल आते। घीसू को उस वक़्त ठाकुर की बरात याद आई, जिसमें बीस साल पहले वह गया था। उस दावत में उसे जो तृप्ति मिली थी, वह उसके जीवन में एक याद रखने लायक़ बात थी, और आज भी उसकी याद ताज़ी थी, बोला-“वह भोज नहीं भूलता। तब से फिर उस तरह का खाना और भरपेट नहीं मिला। लड़की वालों ने सबको भर पेट पूरियाँ खिलाई थीं, सबको! छोटे-बड़े सबने पूरियाँ खाईं और असली घी की! चटनी, रायता, तीन तरह के सूखे साग, एक रसेदार तरकारी, दही, चटनी, मिठाई, अब क्या बताऊँ कि उस भोज में क्या स्वाद मिला। कोई रोक-टोक नहीं थी, जो चीज़ चाहो, माँगो, जितना चाहो खाओ। लोगों ने ऐसा खाया, ऐसा खाया, कि किसी से पानी न पिया गया। मगर परोसने वाले हैं कि पत्तल में गर्म-गर्म, गोल-गोल सुवासित कचौरियाँ डाल देते हैं। मना करते हैं कि नहीं चाहिए, पत्तल पर हाथ रोके हुए हैं, मगर वह हैं कि दिए जाते हैं। और जब सबने मुँह धो लिया, तो पान-इलायची भी मिली। मगर मुझे पान लेने की कहाँ सुध थी? खड़ा हुआ न जाता था। चटपट जाकर अपने कंबल पर लेट गया। ऐसा दिल-दरियाव था वह ठाकुर! माधव ने इन पदार्थों का मन-ही-मन मज़ा लेते हुए कहा—“अब हमें कोई ऐसा भोज नहीं खिलाता।” “अब कोई क्या खिलाएगा? वह ज़माना दूसरा था। अब तो सबको किफ़ायत सूझती है। शादी-ब्याह में मत ख़र्च करो, क्रिया-कर्म में मत ख़र्च करो। पूछो, ग़रीबों का माल बटोर-बटोरकर कहाँ रखोगे? बटोरने में तो कमी नहीं है। हाँ, ख़र्च में किफ़ायत सूझती है!” “तुमने एक बीस पूरियाँ खाई होंगी?” “बीस से ज़ियादा खाई थीं!” “मैं पचास खा जाता!” “पचास से कम मैंने न खाई होंगी। अच्छा पका था। तू तो मेरा आधा भी नहीं है।”आलू खाकर दोनों ने पानी पिया और वहीं अलाव के सामने अपनी धोतियाँ ओढ़कर पाँव पेट में डाले सो रहे। जैसे दो बड़े-बड़े अजगर गेंडुलिया मारे पड़े हों। और बुधिया अभी तक कराह रही थी। (2) सवेरे माधव ने कोठरी में जाकर देखा, तो उसकी स्त्री ठंडी हो गई थी। उसके मुँह पर मक्खियाँ भिनक रही थीं। पथराई हुई आँखें ऊपर टँगी हुई थीं। सारी देह धूल से लथपथ हो रही थी। उसके पेट में बच्चा मर गया था। माधव भागा हुआ घीसू के पास आया। फिर दोनों ज़ोर-ज़ोर से हाय-हाय करने और छाती पीटने लगे। पड़ोस वालों ने यह रोना-धोना सुना, तो दौड़े हुए आए और पुरानी मर्यादा के अनुसार इन अभागों को समझाने लगे। मगर ज़ियादा रोने-पीटने का अवसर न था। कफ़न की और लकड़ी की फ़िक्र करनी थी। घर में तो पैसा इस तरह ग़ायब था, जैसे चील के घोंसले में माँस? बाप-बेटे रोते हुए गाँव के ज़मींदार के पास गए। वह इन दोनों की सूरत से नफ़रत करते थे। कई बार इन्हें अपने हाथों से पीट चुके थे। चोरी करने के लिए, वादे पर काम पर न आने के लिए। पूछा—“क्या है बे घिसुआ, रोता क्यों है? अब तो तू कहीं दिखलाई भी नहीं देता! मालूम होता है, इस गाँव में रहना नहीं चाहता।” घीसू ने ज़मीन पर सिर रखकर आँखों में आँसू भरे हुए कहा—“सरकार! बड़ी विपत्ति में हूँ। माधव की घरवाली रात को गुज़र गई। रात-भर तड़पती रही सरकार! हम दोनों उसके सिरहाने बैठे रहे। दवा-दारू जो कुछ हो सका, सब कुछ किया, मुदा वह हमें दग़ा दे गई। अब कोई एक रोटी देने वाला भी न रहा मालिक! तबाह हो गए। घर उजड़ गया। आपका ग़ुलाम हूँ, अब आपके सिवा कौन उसकी मिट्टी पार लगाएगा। हमारे हाथ में तो जो कुछ था, वह सब तो दवा-दारू में उठ गया। सरकार ही की दया होगी, तो उसकी मिट्टी उठेगी। आपके सिवा किसके द्वार पर जाऊँ।” ज़मींदार साहब दयालु थे। मगर घीसू पर दया करना काले कंबल पर रंग चढ़ाना था। जी में तो आया, कह दें, चल, दूर हो यहाँ से। यूँ तो बुलाने से भी नहीं आता, आज जब ग़रज़ पड़ी तो आकर ख़ुशामद कर रहा है। हरामख़ोर कहीं का, बदमाश! लेकिन यह क्रोध या दंड देने का अवसर न था। जी में कुढ़ते हुए दो रुपए निकालकर फेंक दिए। मगर सांत्वना का एक शब्द भी मुँह से न निकला। उसकी तरफ़ ताका तक नहीं। जैसे सिर का बोझ उतारा हो। जब ज़मींदार साहब ने दो रुपए दिए, तो गाँव के बनिए-महाजनों को इनकार का साहस कैसे होता? घीसू ज़मींदार के नाम का ढिंढोरा भी पीटना ख़ूब जानता था। किसी ने दो आने दिए, किसी ने चारे आने। एक घंटे में घीसू के पास पाँच रुपए की अच्छी रक़म जमा हो गई। कहीं से अनाज मिल गया, कहीं से लकड़ी। और दोपहर को घीसू और माधव बाज़ार से कफ़न लाने चले। इधर लोग बाँस-वाँस काटने लगे। गाँव की नर्म दिल स्त्रियाँ आ-आकर लाश देखती थीं और उसकी बेकसी पर दो बूँद आँसू गिराकर चली जाती थीं। (3) बाज़ार में पहुँचकर घीसू बोला-“लकड़ी तो उसे जलाने-भर को मिल गई है, क्यों माधव!” माधव बोला—“हाँ, लकड़ी तो बहुत है, अब कफ़न चाहिए।” “तो चलो, कोई हलक़ा-सा कफ़न ले लें।” “हाँ, और क्या! लाश उठते-उठते रात हो जाएगी। रात को कफ़न कौन देखता है?” “कैसा बुरा रिवाज है कि जिसे जीते जी तन ढाँकने को चीथड़ा भी न मिले, उसे मरने पर नया कफ़न चाहिए।” “कफ़न लाश के साथ जल ही तो जाता है।” “और क्या रखा रहता है? यही पाँच रुपए पहले मिलते, तो कुछ दवा-दारू कर लेते।” दोनों एक-दूसरे के मन की बात ताड़ रहे थे। बाज़ार में इधर-उधर घूमते रहे। कभी इस बाज़ार की दूकान पर गए, कभी उसकी दूकान पर! तरह-तरह के कपड़े, रेशमी और सूती देखे, मगर कुछ जँचा नहीं। यहाँ तक कि शाम हो गई। तब दोनों न जाने किस दैवी प्रेरणा से एक मधुशाला के सामने जा पहुँचे। और जैसे किसी पूर्व निश्चित व्यवस्था से अंदर चले गए। वहाँ ज़रा देर तक दोनों असमंजस में खड़े रहे। फिर घीसू ने गद्दी के सामने जाकर कहा—“साहूजी, एक बोतल हमें भी देना।” उसके बाद कुछ चिखौना आया, तली हुई मछली आईं और दोनों बरामदे में बैठकर शांतिपूर्वक पीने लगे। कई कुज्जियाँ ताबड़तोड़ पीने के बाद दोनों सरूर में आ गए। घीसू बोला—“कफ़न लगाने से क्या मिलता? आख़िर जल ही तो जाता। कुछ बहू के साथ तो न जाता।” माधव आसमान की तरफ़ देखकर बोला, मानों देवताओं को अपनी निष्पापता का साक्षी बना रहा हो-“दुनिया का दस्तूर है, नहीं लोग बामनों को हज़ारों रुपए क्यों दे देते हैं? कौन देखता है, परलोक में मिलता है या नहीं!” “बड़े आदमियों के पास धन है, फ़ूँके। हमारे पास फूँकने को क्या है?” “लेकिन लोगों को जवाब क्या दोगे? लोग पूछेंगे नहीं, कफ़न कहाँ है?” घीसू हँसा-“अबे, कह देंगे कि रुपए कमर से खिसक गए। बहुत ढूँढ़ा, मिले नहीं। लोगों को विश्वास न आएगा, लेकिन फिर वही रुपए देंगे।” माधव भी हँसा, इस अनपेक्षित सौभाग्य पर बोला—“बड़ी अच्छी थी बेचारी! मरी तो ख़ूब खिला-पिलाकर!” आधी बोतल से ज़ियादा उड़ गई। घीसू ने दो सेर पूरियाँ मँगाई। चटनी, अचार, कलेजियाँ। शराबख़ाने के सामने ही दूकान थी। माधव लपककर दो पत्तलों में सारे सामान ले आया। पूरा डेढ़ रुपया ख़र्च हो गया। सिर्फ़ थोड़े से पैसे बच रहे। दोनों इस वक़्त इस शान में बैठे पूरियाँ खा रहे थे जैसे जंगल में कोई शेर अपना शिकार उड़ा रहा हो। न जवाबदेही का ख़ौफ़ था, न बदनामी की फ़िक्र। इन सब भावनाओं को उन्होंने बहुत पहले ही जीत लिया था। घीसू दार्शनिक भाव से बोला—“हमारी आत्मा प्रसन्न हो रही है तो क्या उसे पुन्न न होगा?” माधव ने श्रद्धा से सिर झुकाकर तसदीक़ की— ज़रूर से ज़रूर होगा। भगवान, तुम अंतर्यामी हो। उसे बैकुंठ ले जाना। हम दोनों हृदय से आशीर्वाद दे रहे हैं। आज जो भोजन मिला वह कभी उम्र-भर न मिला था।” एक क्षण के बाद माधव के मन में एक शंका जागी। बोला—“क्यों दादा, हम लोग भी एक-न-एक दिन वहाँ जाएँगे ही?” घीसू ने इस भोले-भाले सवाल का कुछ उत्तर न दिया। वह परलोक की बातें सोचकर इस आनंद में बाधा न डालना चाहता था। “जो वहाँ हम लोगों से पूछे कि तुमने हमें कफ़न क्यों नहीं दिया तो क्या कहोगे?” “कहेंगे तुम्हारा सिर!” “पूछेगी तो ज़रूर!” “तू कैसे जानता है कि उसे कफ़न न मिलेगा? तू मुझे ऐसा गधा समझता है? साठ साल क्या दुनिया में घास खोदता रहा हूँ? उसको कफ़न मिलेगा और बहुत अच्छा मिलेगा!” माधव को विश्वास न आया। बोला—“कौन देगा? रुपए तो तुमने चट कर दिए। वह तो मुझसे पूछेगी। उसकी माँग में तो सेंदुर मैंने डाला था।” “कौन देगा, बताते क्यों नहीं?” “वही लोग देंगे, जिन्होंने अबकी दिया। हाँ, अबकी रुपए हमारे हाथ न आएँगे।” ज्यों-ज्यों अँधेरा बढ़ता था और सितारों की चमक तेज़ होती थी, मधुशाला की रौनक भी बढ़ती जाती थी। कोई गाता था, कोई डींग मारता था, कोई अपने संगी के गले लिपटा जाता था। कोई अपने दोस्त के मुँह में कुल्हड़ लगाए देता था। वहाँ के वातावरण में सुरूर था, हवा में नशा। कितने तो यहाँ आकर एक चुल्लू में मस्त हो जाते थे। शराब से ज़ियादा यहाँ की हवा उन पर नशा करती थी। जीवन की बाधाएँ यहाँ खींच लाती थीं और कुछ देर के लिए यह भूल जाते थे कि वे जीते हैं या मरते हैं। या न जीते हैं, न मरते हैं। और यह दोनों बाप-बेटे अब भी मज़े ले-लेकर चुसकियाँ ले रहे थे। सबकी निगाहें इनकी ओर जमी हुई थीं। दोनों कितने भाग्य के बली हैं! पूरी बोतल बीच में है। भरपेट खाकर माधव ने बची हुई पूरियों का पत्तल उठाकर एक भिखारी को दे दिया, जो खड़ा इनकी ओर भूखी आँखों से देख रहा था। और देने के गौरव, आनंद और उल्लास का अपने जीवन में पहली बार अनुभव किया। घीसू ने कहा—“ले जा, ख़ूब खा और आशीर्वाद दे! जिसकी कमाई है, वह तो मर गई। मगर तेरा आशीर्वाद उसे ज़रूर पहुँचेगा। रोएँ-रोएँ से आशीर्वाद दो, बड़ी गाढ़ी कमाई के पैसे हैं!” माधव ने फिर आसमान की तरफ़ देखकर कहा- “वह बैकुंठ में जाएगी दादा, बैकुंठ की रानी बनेगी।” घीसू खड़ा हो गया और जैसे उल्लास की लहरों में तैरता हुआ बोला—“हाँ, बेटा बैकुंठ में जाएगी। किसी को सताया नहीं, किसी को दबाया नहीं। मरते-मरते हमारी ज़िंदगी की सबसे बड़ी लालसा पूरी कर गई। वह न बैकुंठ जाएगी तो क्या ये मोटे-मोटे लोग जाएँगे, जो ग़रीबों को दोनों हाथों से लूटते हैं, और अपने पाप को धोने के लिए गंगा में नहाते हैं और मंदिरों में जल चढ़ाते हैं? श्रद्धालुता का यह रंग तुरंत ही बदल गया। अस्थिरता नशे की ख़ासियत है। दु:ख और निराशा का दौरा हुआ। माधव बोला- “मगर दादा, बेचारी ने ज़िंदगी में बड़ा दुख भोगा। कितना दुख झेलकर मरी!” वह आँखों पर हाथ रखकर रोने लगा। चीखें मार-मारकर। घीसू ने समझाया—“क्यों रोता है बेटा, ख़ुश हो कि वह माया-जाल से मुक्त हो गई, जंजाल से छूट गई। बड़ी भाग्यवान थी, जो इतनी जल्द माया-मोह के बंधन तोड़ दिए। और दोनों खड़े होकर गाने लगे— “ठगिनी क्यों नैना झमकावे! ठगिनी!” पियक्कड़ों की आँखें इनकी ओर लगी हुई थीं और यह दोनों अपने दिल में मस्त गाए जाते थे। फिर दोनों नाचने लगे। उछले भी, कूदे भी। गिरे भी, मटके भी। भाव भी बताए, अभिनय भी किए। और आख़िर नशे में मदमस्त होकर वहीं गिर पड़े। ********

  • क्रोध

    डॉ कृष्ण कांत श्रीवास्तव एक संत भिक्षा में मिले अन्न से अपना जीवत चला रहे थे। वे रोज अलग-अलग गांवों में जाकर भिक्षा मांगते थे। एक दिन वे गांव के बड़े सेठ के यहां भिक्षा मांगने पहुंचे। सेठ ने संत को थोड़ा अनाज दिया और बोला कि गुरुजी मैं एक प्रश्न पूछना चाहता हूं। संत ने सेठ से अनाज लिया और कहा कि ठीक है पूछो। सेठ ने कहा कि मैं ये जानना चाहता हूं कि लोग लड़ाई-झगड़ा क्यों करते हैं? संत कुछ देर चुप रहे और फिर बोले कि ने मैं यहां भिक्षा लेने आया हूं, तुम्हारे मूर्खतापूर्ण सवालों के जवाब देने नहीं आया। ये बात सुनते ही सेठ एकदम क्रोधित हो गया। उसने खुद से नियंत्रण खो दिया और बोला कि तू कैसा संत है, मैंने दान दिया और तू मुझे ऐसा बोल रहा है। सेठ ने गुस्से में संत को खूब बातें सुनाई। संत चुपचाप सुन रहे थे। उन्होंने एक भी बार पलटकर जवाब नहीं दिया। कुछ देर बाद सेठ का गुस्सा शांत हो गया, तब संत ने उससे कहा कि भाई जैसे ही मैंने तुम्हें कुछ बुरी बातें बोलीं, तुम्हें गुस्सा आ गया। गुस्से में तुम मुझ पर चिल्लाने लगे। अगर इसी समय पर मैं भी क्रोधित हो जाता तो हमारे बीच बड़ा झगड़ा हो जाता। क्रोध ही हर झगड़े का मूल कारण है और शांति हर विवाद को खत्म कर सकती है। अगर हम क्रोध ही नहीं करेंगे तो कभी भी वाद-विवाद नहीं होगा। जीवन में सुख-शांति चाहते हैं तो क्रोध को नियंत्रित करना चाहिए। क्रोध को काबू करने के लिए रोज ध्यान करें। भगवान के मंत्रों का जाप करें। सीख - अगर कोई गुस्सा कर भी रहा है तो हमें उसका जवाब शांति से देना चाहिए। जैसे ही हमने शांति को छोड़ा और क्रोध किया तो छोटी सी बात भी बड़ा नुकसान कर सकती है। *************

  • My Dad

    Ahana Gupta When life is not smooth, Who makes us switch our mood? When all leave our hands, Who with us always stands? Whether time is good or bad, Who's always there is dad. He works all day even when tired, To give us all that we desired. His clothes and shoes are never old, He goes where our happiness is sold. In stormy times he is always bold, Our hand is what he always holds. He never has fears and always hides tears, Hot or cold for us he bears. He cares for us but never shows, Love is what he always owes. When we are sad, he always knows, When we were down, he always rose. Strong and brave from head to toes, A superman in front of whom the whole world bows. Daughter's first love and son's first hero, All we gave you was just like zero. Happiness is all that we can give, His love and care will always live. ******

  • पानी की बूंद

    डॉ कृष्ण कांत श्रीवास्तव दीपक फुटबॉल का बहुत अच्छा खिलाड़ी था, परंतु मन का कुछ चंचल था| उसका मन किसी एक काम में नहीं लगता था| वह कभी फुटबॉल खेलता तो कभी क्रिकेट में अपना कैरियर ढूंढता| दीपकअपने स्कूल में फुटबॉल के साथ-साथ क्रिकेट को भी बहुत समय देता था| दीपक ने सोचा कि मैं खेलों में ही अपना कैरियर बनाऊंगा| अतः उसने निश्चय किया कि वह अधिक से अधिक समय खेलों के अभ्यास करने में ही व्यतीत करेगा| दीपक की खेल में रुचि देखकर उनके पिता ने दीपक के लिए एक अच्छे फुटबॉल प्रशिक्षक की व्यवस्था कर दी| दीपक अपने प्रशिक्षक की देखरेख में फुटबॉल का प्रशिक्षण लेने लगा परंतु उसका चंचल मन समय-समय दूसरे खेलों के लिए भी मचलता रहता था| और दीपक प्रशिक्षक की अनुपस्थिति में अपने साथियों के साथ क्रिकेट खेलने के लिए चला जाया करता था| समय बीता दीपक के प्रशिक्षक ने दीपक से कहा, “बेटा, मैं तुम्हें फुटबॉल का अच्छा अभ्यास करवा रहा हूं| तुम्हें अपना मन क्रिकेट से हटाकर फुटबॉल में ही लगाना चाहिए| जिससे तुम फुटबॉल की सभी बारीकियों को ठीक से समझ जाओ| मैंने तुम्हें दोनों ही खेलों को खेलते हुए देखा है| एक प्रशिक्षक की नजर से मैं महसूस करता हूं कि तुम फुटबॉल की बारीकियों को जितनी अच्छी तरह पकड़ते हो, उतना अच्छा प्रदर्शन क्रिकेट में नहीं कर पाते| इसलिए यह मेरा सुझाव है कि तुम अपना अधिक से अधिक समय फुटबॉल को ही दो और इसी में अपनी प्रवीणता साबित करो|” प्रशिक्षक दीपक को समझाते हुए कहा कि मैं तुझे फुटबॉल की अच्छी प्रैक्टिस करवा रहा हूं| तुम मन लगाकर इसी कार्य को करते रहो| यदि तुम निरंतर प्रयास करते रहे तो निश्चित मानो एक दिन तुम फुटबॉल के अच्छे खिलाड़ी के रूप में उभरोगे| यदि इसके साथ-साथ अन्य खेलों में भी अपनी रुचि रखोगे तो तुम फुटबॉल में उतना अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाओगे, जितना दूसरे लोग करेंगे| परंतु दीपक ने अपने प्रशिक्षक की बात को हवा में उड़ा हवा में उड़ा दिया| समय बीता और राष्ट्रीय खेलों के चयन के लिए प्रतियोगिता का समय निकट आ गया| सभी प्रतियोगी अपने-अपने खेलों का कठिन परिश्रम करने लगे| दीपक भी कठिन परिश्रम कर रहा था परंतु समय मिलने पर वह क्रिकेट पर भी अपना ध्यान केंद्रित कर देता था| दीपक को अपने खेलों पर बहुत विश्वास था और समझ रहा था कि उसका चयन तो अवश्य ही हो जाएगा| प्रतियोगिताका समय निकट देखकर दीपक के सभी साथी अपने अपने खेलों के प्रशिक्षण में लग गए, दीपक भी अपनी तैयारी करने लगा परंतु उसका चंचल मन तो एक जगह स्थिर रहता ही नहीं था| वह कभी क्रिकेट का अभ्यास करता है तो कभी फुटबॉल का| दीपक के पिता भी बोले, “बेटा, केवल फुटबॉल का ही अभ्यास करो,अपने समय को जाया मत करो,कोई भी व्यक्ति दो भिन्न-भिन्न प्रतियोगिताओं में अपना सर्वश्रेष्ठ नहीं दे सकता| परंतुदीपक को लगता कि वह दोनों ही खेलों में सफलता प्राप्त कर सकता है| परीक्षण शुरू हुआ, सभी खिलाड़ियों ने अपनी अपनी रूचि के खेलों में अपना प्रदर्शन दिखाया| दीपक ने फुटबॉल के साथ-साथ क्रिकेट की भी परीक्षा| जब परिणाम का समय आया तो दिखा कि दीपक के लगभग सभी साथी अपने-अपने खेलों के लिए चयनित कर लिए गए, परंतु दीपक इस चयन प्रक्रिया से बाहर कर दिया गया| दीपक ने तो दो प्रतियोगिताओं की परीक्षा दी थी| उसका प्रदर्शन भी बेहतर था,परंतु किसी भी खेल में उसकी प्रवीणता अपने दूसरे साथियों से कुछ कम ही थी| जिस कारण उसे ना तो फुटबॉल में और ना ही क्रिकेट में चयनित किया गया| यह सुनकर दीपक बहुत रोया और उसने निश्चय किया कि आज के बाद वह अपनी पूरी क्षमता केवल एक ही खेल में लगा देगा| कुछ समय बाद जब पुनः चयन की प्रक्रिया आरंभ हुई तो दीपक का प्रदर्शन सर्वश्रेष्ठ था| उसे ना केवल फुटबॉल के खेल के लिए चयनित किया गया बल्कि उसे उस खेल का कप्तान भी नियुक्त किया गया| इस कहानी से हमको यह शिक्षा मिलती है कि जीवन मे हम जो भी काम काम करें उस पर अपना पूरा ध्यान केंद्रित करें और उसका निरंतर अभ्यास भी करें| कहते हैं कि पानी की बूंदेभी पत्थर पर निरंतर गिरकर अपना निशान छोड़ देती| ***********

  • ऊँचाई

    अटल बिहारी वाजपेयी ऊँचे पहाड़ पर, पेड़ नहीं लगते, पौधे नहीं उगते, न घास ही जमती है। जमती है सिर्फ़ बर्फ़, जो कफ़न की तरह सफ़ेद और मौत की तरह ठंडी होती है खेलती, खिलखिलाती नदी, जिसका रूप धारण कर, अपने भाग्य पर बूँद-बूँद रोती है। ऐसी ऊँचाई, जिसका परस, पानी को पत्थर कर दे, ऐसी ऊँचाई जिसका दरस हीन भाव भर दे, अभिनंदन की अधिकारी है, आरोहियों के लिए आमंत्रण है, उस पर झंडे गाड़े जा सकते हैं, किंतु कोई गौरैया, वहाँ नीड़ नहीं बना सकती, न कोई थका-माँदा बटोही, उसकी छाँव में पल भर पलक ही झपका सकता है। सच्चाई यह है कि केवल ऊँचाई ही काफ़ी नहीं होती, सबसे अलग-थलग, परिवेश से पृथक, अपनों से कटा-बँटा, शून्य में अकेला खड़ा होना, पहाड़ की महानता नहीं, मजबूरी है। ऊँचाई और गहराई में आकाश-पाताल की दूरी है। जो जितना ऊँचा, उतना एकाकी होता है, हर भार को स्वयं ढोता है, चेहरे पर मुस्कानें चिपका, मन ही मन रोता है। ज़रूरी यह है कि ऊँचाई के साथ विस्तार भी हो, जिससे मनुष्य, ठूँठ-सा खड़ा न रहे, औरों से घुले-मिले, किसी को साथ ले, किसी के संग चले। भीड़ में खो जाना, यादों में डूब जाना, स्वयं को भूल जाना, अस्तित्व को अर्थ, जीवन को सुगंध देता है। धरती को बौनों की नहीं, ऊँचे क़द के इंसानों की ज़रूरत है। इतने ऊँचे कि आसमान छू लें, नए नक्षत्रों में प्रतिभा के बीज बो लें, किंतु इतने ऊँचे भी नहीं, कि पाँव तले दूब ही न जमे, कोई काँटा न चुभे, कोई कली न खिले। न वसंत हो, न पतझड़, हो सिर्फ़ ऊँचाई का अंधड़, मात्र अकेलेपन का सन्नाटा। मेरे प्रभु! मुझे इतनी ऊँचाई कभी मत देना, ग़ैरों को गले न लगा सकूँ, इतनी रुखाई कभी मत देना। ****

  • चीखती आवाजें....

    महेश कुमार केशरी रागिनी को रोज की तरह दफ्तर से लौटते हुए आज फिर से देर हो गई थी। सूरज अपनी ढलान पर था, और पश्चिम दिशा में डुबकी लगाने को आतुर दिख रहा था। सर्दियों में शाम बहुत जल्दी हो जाती है। आसमाने में चाँद और तारे अपनी मौजूदगी का एहसास कराने लगे थें। ठंढ़ ने ठिठुराना शुरू भी कर दिया था। हवा का एक झोंका रागिनी के बदन में जैसे सूई चुभो गया। "पता नहीं, आज भी ऑटो मिलेगी या नहीं।" जैसे वो अपने आप से बुदबुदायी। तभी नरेश अंकल जो उसके पड़ोस में ही रहते थें। और बहुत ही भले आदमी थें। अपनी मोटर साईकिल रोककर बोले - "चलो रागिनी, घर चलना है ना। मैं तुम्हें छोड़ देता हूँ।" रागिनी को एक बार लगा जैसे वो कह दे। हाँ अंकल चलिये, चलते हैं। लेकिन, ये कहते- कहते वो अचानक से रूक गई। जैसे उसकी जुबान लड़खड़ा रही हो। बलात्, मुस्कुराते हुए बोली- "नहीं अंकल मेरी कैब आ रही है। आप जाइये। मैं आ जाऊँगी।" नरेश अंकल अपना सा मुँह लेकर मोटर साईकिल से आगे बढ़ गये। लेकिन, रागिनी को गहरा क्षोभ हुआ। अपने इस व्यवहार से। लेकिन वो मजबूर थी। ऐसा करने के लिये। वो आये दिन लोगों की पीठ पीछे की बातें सुनती तो उसका कलेजा छलनी हो जाता। एक दिन मिसेज शर्मा के मुँह से भी सुना था - "बड़ी चालू चीज है, रागिनी। कॉलोनी के कई मर्दों को फाँस रखा है। तभी तो नरेश जी, उसे लाते- जाते हैं।" कॉलोनी के लोगों को जब भी देखती वो बातें करते-करते अचानक से रूक जाते। और उसके जाते ही जोर का ठहाका मारकर हँसने लगते। रागिनी को ये हँसी अक्सर चुभती है। लोग जो कहना चाहते हैं सामने क्यों नहीं कहते? पीठ पीछे सब किसी ना किसी की निजी जिंदगी को किसी मर्द के साथ जोड़कर आनंद लेते हैं। एक दिन किसी ने मिसेज चड्ढा के मुँह से सुना था - "नरेश भी कम स्याना नहीं है। नये-नये शिकार तलाशता रहता है। तभी तो, उसकी बीबी मायके में ज्यादा रहती है। नरेश इधर-उधर से ही तो काम चलाता है। रागिनी सोसाईटी का माहौल खराब कर रही है। पक्का छिनाल है छिनाल। सौ चूहे खाकर बिल्ली हज को चली। बड़ी सती-सावित्री बनती है। हु़ँह ...!" सच, औरत की सबसे बड़ी दुश्मन औरत ही है। नींद में भी ये बातें उसका पीछा करती रहतीं हैं। "कमबख्त बेअक्ल औरतें। बात करने के लिये इन्हें ऐसे ही गँदे टॉपिक चाहिये।" तभी एक ऑटो वहाँ से गुजरा। रागिनी ने इशारा से ऑटो रूकवाया। फिर ऑटो वाले से पूछा- "रोहिणी चलोगे... ?" ऑटो वाले ने हाँ में सिर हिलाया।" वो ऑटो में सवार हो गई। लेकिन उसे जैसे कोई पीछे से आवाज दे रहा था। या कोई बार-बार कह रहा था। बहुत चालू औरत है ....रागिनी...l पक्का छिनाल है..छिनाल .... ! सौ .. चूहे खाके ...बिल्ली हज को चली..। पता नहीं रागिनी और ऐसी काम-काजी महिलायें ऐसी आवाजें ना जाने कितनी सदियों से सुनती आ रहीं हैं। आवाज है कि पीछा ही नहीं छोडती। *******

  • THE CLOUD LEFT BEHIND

    Aastha Awasthi Up the sky, clouds float by All the while I just smile Staring up above, Oh! The clouds… I love, It’s merely a vacation Just in your imagination.. Those dark clouds covered my heart's sky, And all my emotions flew with them high. In the fleecy fleet of clouds passing by.. A small lonely cloud rested with a sigh.. The fleet of mighty clouds weren't kind They left that insane cloud behind.. My smile encountered with that cloud's pain Piercing my heart turning my eyes rain He held those clouds of truth above… When all had gone but none had love. Each day each night each rain he fought, Each gray and blue did stain his thoughts. How could they float like weightless hopes, But cry and flood unending slopes.. How could they shape such cotton soft, But rage too rough, leaving all dirt aloft. How could I dare to love such wrath, How could I dream to pave its path? Listening this remorse I cried out loud !! "There is a silver lining on every cloud.." He glanced at me, then smiled and replied. And said "indeed you're right my child." "The world can want you anything to be But it just depends on what you see.." I can relate myself to the pain of thy. When can I meet you again in the sky? "Meet me where the end begins.. in echoes Where your world is mine and mine is yours" I wish I could just stare without any care But there comes a time of an end to prime I hope this be a world for me For I have been a world to none So I may find my home in thee If thee my god and I thy son.. "Oh child, Love me enough to let me go.. I shall always remember the trust you owe" “I didn’t tell you that light will stop all gloominess But remember! There will always Be a light in every darkness” *****

  • जीवन एक संघर्ष

    डॉ कृष्ण कांत श्रीवास्तव एक बार एक किसान परमात्मा से बड़ा नाराज हो गया। कभी बाढ़ आ जाये, कभी सूखा पड़ जाए, कभी धूप बहुत तेज हो जाए तो कभी ओले पड़ जाये। हर बार कुछ ना कुछ कारण से उसकी फसल थोड़ी ख़राब हो जाये। एक दिन बड़ा तंग आकर उसने परमात्मा से कहा, देखिये प्रभु, आप परमात्मा हैं, लेकिन लगता है आपको खेती बाड़ी की ज्यादा जानकारी नहीं है, एक प्रार्थना है कि एक साल मुझे मौका दीजिये, जैसा मैं चाहू वैसा मौसम हो, फिर आप देखना मैं कैसे अन्न के भण्डार भर दूंगा। परमात्मा मुस्कुराये और कहा ठीक है, जैसा तुम कहोगे वैसा ही मौसम दूंगा, मैं दखल नहीं करूँगा। किसान ने गेहूं की फ़सल बोई, जब धूप चाही, तब धूप मिली, जब पानी तब पानी। तेज धूप, ओले, बाढ़, आंधी तो उसने आने ही नहीं दी, समय के साथ फसल बढ़ी और किसान की ख़ुशी भी, क्योंकि ऐसी फसल तो आज तक नहीं हुई थी। किसान ने मन ही मन सोचा अब पता चलेगा परमात्मा को, कि फ़सल कैसे करते हैं, बेकार ही इतने बरस हम किसानो को परेशान करते रहे। फ़सल काटने का समय भी आया, किसान बड़े गर्व से फ़सल काटने गया, लेकिन जैसे ही फसल काटने लगा एकदम से छाती पर हाथ रख कर बैठ गया। गेहूं की एक भी बाली के अन्दर गेहूं नहीं था, सारी बालियाँ अन्दर से खाली थी, बड़ा दुखी होकर उसने परमात्मा से कहा, प्रभु ये क्या हुआ? तब परमात्मा बोले, “ये तो होना ही था, तुमने पौधों को संघर्ष का ज़रा सा भी मौका नहीं दिया। ना तेज धूप में उनको तपने दिया, ना आंधी ओलों से जूझने दिया, उनको किसी प्रकार की चुनौती का अहसास जरा भी नहीं होने दिया, इसीलिए सब पौधे खोखले रह गए, जब आंधी आती है, तेज बारिश होती है ओले गिरते हैं तब पौधा अपने बल से ही खड़ा रहता है, वो अपना अस्तित्व बचाने का संघर्ष करता है और इस संघर्ष से जो बल पैदा होता है वह ही उसे शक्ति देता है, उर्जा देता है, उसकी जीवटता को उभारता है। सोने को भी कुंदन बनने के लिए आग में तपने, हथौड़ी से पिटने, गलने जैसी चुनौतियो से गुजरना पड़ता है तभी उसकी स्वर्णिम आभा उभरती है, उसे अनमोल बनाती है।”उसी तरह जिंदगी में भी अगर संघर्ष ना हो, चुनौती ना हो तो आदमी खोखला ही रह जाता है, उसके अन्दर कोई गुण नहीं आ पाता। ये चुनौतियाँ ही हैं जो आदमी रूपी तलवार को धार देती हैं, उसे सशक्त और प्रखर बनाती हैं, अगर प्रतिभाशाली बनना है तो चुनोतियाँ तो स्वीकार करनी ही पड़ेंगी, अन्यथा हम खोखले ही रह जायेंगे। अगर जिंदगी में प्रखर बनना है, प्रतिभाशाली बनना है, तो संघर्ष और चुनौतियों का सामना तो करना ही पड़ेगा। ************

  • सनकी

    महेश कुमार केशरी नहीं इस बार कभी जोर से दिल नहीं धड़का थाl ना ही कभी कोई ऐसी खुशी महसूस हुई थीl जैसी बीस साल पहले उसको देखकर होती थीl कभी-कभी सोचता हूँ कि वो शायद एक लड़कपन के दिनों की एक गलती थीl जब उसे दिल दे बैठा थाl तारा कब की जा चुकी थीl तारा से इस तरह उसने कभी बेरूखी से बात नहीं की थीl जितना वो आज उससे बेरूखी कर गयाl और, आश्चर्य ये कि अंगद को किसी तरह का कोई मलाल भी नहीं थाl बल्कि, वो तो खुश थाl अपने उस व्यवहार के लिये कि तारा को सरेआम झाड़ दिया थाl दसियों ग्राहकों के सामनेl उस समय उसके दिमाग के तने स्नायुओं को कितनी राहत मिली थीl जब उसने तारा से साफ-साफ कह दिया था- "कि नहीं मैम, मैं इस दूकान का मालिक जरूर हूँl लेकिन, मैं भी नियमों से बँधा हूँl माफ कीजिये, मैं आपकी कोई मदद इस मामले में नहीं कर सकता l आपको मैं, एक्सचेंज करने की सुविधा बिल्कुल भी नहीं दे सकताl और, हाँ मैं ऐसा आपके साथ ही नहीं कर रहा हूँl मैं, अपने सभी ग्राहकों के साथ एक जैसा ही व्यहवार करता हूँl नो मतलब, नोl" उसे खुद भी पता है, कि वो इसी शहर की फोर्टिन-बी कालोनी के सी-ब्लाक में रहती हैl यहाँ तक कि उसने उसका घर भी देखा हैl लेकिन फिर भी वो तारा को पैसे जमा करने के बावजूद भी सामान घर ले जाकर अपनी माँ या भाभी को दिखाने की इजाजत नहीं देताl" तारा की छोटी बहन कंचन ने अनुरोध किया -"प्लीज, सर मुझे पूरा विश्वास है, कि मेरी माँ और भाभी को ये साड़ी जरूर पसंद आयेगीl प्लीज, सर, सिर्फ एक घँटे के लिये ले जाने दो ना, ये साड़ीl प्लीज मैं तुरंत लौटा दूँगीl " "रहने दो जिद क्यों कर रही है? जब नहीं दे रहें हैं तोl चल कहीं दूसरी जगह देखते हैंl यही एक दूकान थोड़े है, पूरे मथुरा मेंl" यही ऐंठन तारा में आज से बीस साल पहले भी थीl आज भी उसकी ऐंठन कम नहीं हुई हैl निहायत बद-दिमाग और कम अक्ल की लड़की है, ताराl अंगद को कभी-कभी अफसोस होता है कि उसको प्यार भी हुआ था, तो इस कम अक्ल की बेवकूफ अक्खड़ लड़की सेl वो भी तो गधा ही हैl उसकी अक्ल पर ही पर्दा पड़ गया थाl जो तारा से प्यार कर बैठा थाl" इन बीस सालों में क्या-क्या बदला है? तारा कितनी खूबसूरत थी, बीस साल पहलेl अब तो गोरा चेहरा काला पड़ गया हैl चेहरे पर पहली वाली मुस्कुराहट नहीं रहीl तारा शक्ल से तो खूबसूरत थीl लेकिन, धोखेबाज लड़की हैl सामान लेने आती थी तो कैसे मुसकुराती थीl मैं तारीखों को कैलेंडर में मार्क करके रखता थाl उसकी पसंद की सोनपापडी,पेठा अमावट सारी चीजें उसके आते ही पैक कर देता थाl लेकिन, उसकी मुस्कुराहट धोखा दे गई थीl" मैं कभी-कभी सोचता हूँ, कि मैं किससे प्रेम करता था? उससे या उसके चेहरे सेl अगर उसको मुझसे प्रेम नहीं थाl तो वो मुझे देखकर मुस्कुराती क्यों थी? नहीं शायद मैं ही गलती पर थाl सामान्य शिष्टाचार वश भी तो लोग मुस्कुराते हैंl ये भी तो हो सकता है, कि उसकी तरफ से ना होl चलो कोई बात नहींl ना हो तो ना ही सहीl लेकिन कम-से-कम संकेत तो देना ही चाहिये थाl लेकिन, लड़की है बेचारी कैसे संकेत देती? साथ में उसकी माँ भी तो होती थीl इधर चेहरा कैसा काला पड़ गया है, तारा काl ठीक ही हुआl भगवान के घर देर है, अंधेर नहींl ऊपर वाले की लाठी में आवाज नहीं होतीl मेरा लेटर उसने अपने बाप को दिखाया थाl मेरा भगवान गवाह है कि मैनें भगवान से कभी कम श्रद्धा नहीं रखी तारा परl मेरा खुदा तो तारा ही थीl मैनें तो शादी तक के बारे में सोच लिया थाl अपने बच्चों के नाम तक रख लिये थेंl लेकिन, एक दिन उसने कहा कि नहीं धरती और आकाश कभी नहीं मिल सकतेl मैनें उसे भरोसा दिलाया था, कि देखो उधर समुंद्र की तरफ जहाँ से सूरज निकल रहा हैl वहाँ, क्षितिज हैl जहाँ धरती और आकाश आपस में मिलते हैंl उस वक्त तारा हँसी थीl तुम जागती आँखों से सपने मत देखोl क्षितिज कहीं नहीं होताl सब आँखों का भ्रम हैl जैसे रेगिस्तान में मृग-मारिचीका के कारण होता हैl पानी कहीं नहीं होताl केवल पानी के होने का भ्रम होता हैl प्रेम भी कुछ-कुछ वैसा ही होता हैl फिर, अचानक मुझे याद आया कि उसने अपने बाप के सामने क्या कहा था -"जो, चीज मुझे नहीं लेना होती थी l उसे ये जबरजस्ती दे देते थें l " "मैं तुमसे आखिरी बार पूछ रही हूँ, कि मैं इसे खरीद कर ले जा रही हूँl अगर पसंद नहीं आयेगी तो वापस कर लोगे ना? "तारा की आवाज में इस बार भी वही अकड़ थीl जो आज से बीस साल पहले हुआ करती थीl पता नहीं अंगद के दिमाग के तंतु तनते चले गयेl दाँत भींचते चले गयेl दिमाग में खून का रफ्तार दूने वेग से बहने लगाl दिल की धड़कनें फिर बढ़ गईंl पाँव लड़खड़ाने लगेl उस दिन दूकान में भीड़ भी बहुत ज्यादा थीl दसियों पुरूष और महिला ग्राहकों को निबटा रहा था वोl तभी तारा ने वो सवाल उससे दोहराकर पूछा थाl "उसकी आवाज अचानक, जोर से चीखीl मैं मोर्चे से एक बार पीछे हट चुका हूँl बहुत चोट खाई थीl उस समय मैने़ंl अब इतना ताब नहीं रहा हैl कि बार-बार मोर्चे पर पीछे हटूँl" "मैं,सामान की बात कर रही हूँl" "उस समय भी मैं कोई सामान नहीं थाl आज भी नहीं हूँl बहुत खेल लिया था उस समय तुमने मेरे दिल सेl अब और नहींl तुम लड़कियों की मर्दों के दिलों से खेलने की ये रवायत अब हमेशा के लिये खत्म होनी चाहियेl तुमने मुझे बरबाद कर दियाl" "मैनें किसी के दिल से नहीं खेला हैl" "खेला है, मेरे दिल सेl" "इसका, कोई सबूत है, तुम्हारे पासl" "पूछो, अपने दिल पर हाथ रखकर, कि तुमने कभी मुझसे प्यार नहीं किया?" "लो, दिल पर हाथ रखकर कसम खाती हूँ, कि कभी तुमसे प्यार नहीं कियाl" "मैं, तुमसे प्रेम करता थाl मुझे सालों नींद नहीं आईl किताब पढ़ता था, तो मुझे कुछ समझ में नहीं आता थाl किताबों की इबारत में तुम्हारा ही चेहरा दिखाई पड़ता थाl" "तुम्हारा, चेहरा पहले की तरह गोरा नहीं रहाl ये काला क्यों पड़ता जा रहा है? तुम इतनी बदसूरत तो कभी नहीं थीl" "दवाई, रिएक्शन कर गई थीl" "झूठ, तुम्हें ईश्वर ने सजा दी हैl झूठ बोलने कीl और हमेशा ऐसी सजा तुमलोगों को ईश्वर देगाl अगर फिर मेरे जैसे बेकसों को घोखा दिया तो और बद्दुआएँ लगेंगीl" "ओह ! क्या सच? मैं अपनी गलती मानती हूँl" "शायद, तुम ठीक कह रहे होl तभी मेरा चेहरा इतना खराब होता जा रहा हैl ईश्वर ने तुम्हारी आहों की सजा दी हैl" "क्या, तुमने कभी मुझे बद्दुआएँ थी?" " धत्, भला, प्रेम करने वाला कभी अपनी प्रेमिका को बद्दुआएँ दे सकता है! बिल्कुल नहीं!" "सच!" "सच! तुम्हारी कसम!" "तुम झूठ बोल रहे होl" "मैनें ईश्वर से भी ज्यादा तुमसे प्रेम किया है, ताराl प्रेम में आदमी कभी झूठ नहीं बोलताl" "मैं तुमसे कितनी बार कह चुका हूँl मैं ये एक्सचेंज बिल्कुल भी नहीं करूँगाl तुम्हारे लिये कोई अलग से नियम नहीं बनेगाl समझीं तुमl अब अपना ये वाहियात शक्ल मुझे कभी मत दिखानाl दफा हो जाओ यहाँ सेl कभी मत आना मेरी दूकान पेl जाओ नहीं तो धक्के मार कर निकाल दूँगाl पाजी कहीं कीl चल भाग यहाँ सेl" तारा और उसकी बहन डरकर दूकान से बाहर निकल गईंl बाहर आकर कंचन, तारा से बोली - "दीदी, आपको जानता था, वो?" तारा झेंपते हुए बोली - "पता नहीं कोई सनकी थाl" उस रात, तारा को सारी रात नींद नहीं आई थीl *********

  • स्वीकृति

    अनजान "सिया की शादी तय होने की बधाई, दीदी।" सुधा ने भानजी की शादी तय होने की शुभकामनाएं देते हुए कहा "सुधा,15 मार्च की शादी है।" माला ने बताया "दीदी, मैं आज ही फ्लाइट बुक कर देती हूँ॑।" सुधा बोली यह बात जनवरी माह की थी। फरवरी के आखिरी सप्ताह में सिया की होने वाली दादी सास की तबीयत बिगड़ गई, उनको दमा का जानलेवा अटैक पड़ा। शादी प्रीपोन करनी पड़ी। दादीजी के हॉस्पिटल में रहते-रहते शादी साधारण से समारोह में कर दी गई। कुछ दिन पश्चात दादीजी की मृत्यु हो गई। सुधा कनाडा रहती है, वह अपने बेटे सुदर्शन और बेटी सुमति के साथ भारत मार्च में आ पाई। सुधा के पति काम की अधिकता की वजह से नहीं आ पाए। सिया इसी शहर में अपने सास, ननद व पति के साथ रहती है। अगली सुबह माला, माला के पति मनोज, सुधा, सुदर्शन व सुमति के साथ सिया के घर पहुंची। माला ने समधन सरलाजी को फोन पर कल ही सिया की मौसी सुधा के आने के बारे में बता दिया था। सरलाजी ने सभी का दिल खोलकर स्वागत किया। सिया मौसी से मिलकर बहुत खुश हुई। सिया के पति सार्थक ने आज छुट्टी ले ली है। माला ने सिया की ननद सुकन्या के बारे में पूछा तो सरला जी ने बुलाया। सुकन्या ने सभी को अभिवादन किया। सिया और सुकन्या ने नाश्ता लगाया। हलवा, पकौड़ी, सैंडविच, पोहा, अप्पे और मिनी उत्तपम नारियल चटनी के साथ थे। उधर बड़े लोग बातें कर रहे थे, इधर सुदर्शन, सुमति, सिया और सार्थक की चौकड़ी जम गई। सरलाजी ने मनुहार कर सबको दोपहर का भोजन करने के लिए मना लिया। तभी सुकन्या ने आकर कहा,"मम्मी, अब मैं चलती हूँ।" माला ने पूछा तो सुकन्या ने बताया कि वह आज हॉफडे लीव पर थी, अब ऑफिस निकलना है। सुधा ने सुकन्या के जाने के बाद सरलाजी से कहा कि उनकी बेटी बहुत प्यारी है। सरलाजी ने सुधा को बताया कि सुकन्या एक फर्म में चार्टेड एकाउंटेंट है। इन्कम टैक्स रिटर्न की तारीख नजदीक आने से काम ज्यादा है। सुधा को माला ने आने से पहले बता दिया था कि सुकन्या सार्थक से दो साल छोटी है। तीन वर्ष पहले सुकन्या का विवाह हुआ था परन्तु उसके पति का विवाह के आठ महीने बाद एक्सीडेंट में आकस्मिक निधन हो गया। ससुराल वालों ने उसे मनहूस कहकर घर से निकाल दिया था। अब वह अपने मायके में रहती है। स्वभाव की बेहद सरल है, सिया और सुकन्या बहनों की तरह रहती हैं। सबने दोपहर का भोजन खाया। सुकन्या सभी सब्जियां व खीर बनाकर रख गई थी, रोटी सिया ने गरमागरम सबको सेंक कर खिला दी। खाने के बाद सभी खीर का लुत्फ़ उठा रहे थे कि पड़ोस में रहने वाली सिया की चाची सास रीताजी आ गईं। अभिवादन के आदान-प्रदान के बाद रीताजी ने पूछा,"सुकन्या नहीं दिखाई दे रही है?" सरलाजी ने बताया,"सुकन्या ऑफिस गई है।" रीताजी ने मुंह बनाते हुए कहा,"पता था, आप सब आने वाले हों, फिर भी सारा काम सिया पर छोड़ कर ऑफिस चली गई। वैसे अच्छा ही किया जो चली गई। ऐसे लोगों की छाया भी अशुभ होती है। सरला भाभी, आप मुझे बताती मैं काम्या को भेज देती। वह चुटकियों में काम निबटा देती।" बोलते हुए फोन कर काम्या को बुलवा लिया। सुधा ने देख लिया कि सरलाजी की आंखें डबडबा गईं। सुधा ने पूछा,"ऐसे लोग! मतलब?" रीताजी बोली,"अरे आपको नहीं पता। सुकन्या विधवा है। साल भर के अंदर ही अपने पति को खा गई।" रीताजी की अनर्गल बातें सुनकर अब तक वहां बैठे सभी लोगों को बहुत गुस्सा आने लगा था। सुधा से रहा न गया, बोली,"हद है। आप अपनी भतीजी के बारे में अपशब्द कहे जा रहीं हैं।" रीताजी तिलमिलाकर बोली, "मैं क्या झूठ बोल रही हूँ? उसके ससुराल वालों ने उसे मनहूस कह धक्के मारकर घर से निकाल दिया था, आपको शायद मालूम नहीं है।" सुधा बोली,"मुझे सब मालूम है, सुकन्या पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा है। आपको ऐसी बातें करना शोभा नहीं देता है।" फिर मुड़कर सरलाजी से सुधा ने कहा, "माफ कीजिएगा सरलाजी पर मैं गलत बात सहन नहीं कर पाती हूँ।" सरलाजी ने आंखों ही आंखों में सुधा का शुक्रिया अदा किया। रीताजी जो बिल्कुल झेंप चुकी थीं, बात पलटते हुए बोली, "चलिए, रहने दीजिए मेरी बेटी काम्या से मिलिए। इसने एम बी ए किया है।" काम्या ने सबको अभिवादन किया। अपनी आदत से मजबूर रीताजी बोली, "आपने मेरी बात काट दी पर सुकन्या सिया का हाथ बंटाने के लिए छुट्टी तो ले ही सकती थी।" सुधा ने बताया, "सुकन्या अभी गई है। उसने आधे दिन की छुट्टी ली थी।" अब तो रीताजी से कुछ कहते न बना। आखिरकार वह अपने मतलब की बात कहने से खुद को रोक न सकी। दरअसल सिया से उन्हें पता चल गया था कि सिया की मौसी कनाडा में रहती हैं, वह आज अपने बेटे और बेटी के साथ मिलने आने वाली हैं। उन्होंने कहा, "मेरी बेटी बहुत गुणी है, आपके बेटे के साथ बिल्कुल राम सीता की जोड़ी लगेगी।" यह सुन सुधा और सुदर्शन ने आंखों आंखों में ही कुछ बातें कर ली। सुधा ने कहा, "रीताजी, सुदर्शन ‌के लिए हमें लड़की मिल गई है।" रीताजी ने सिया को ताने मारा, "अरे! तुम तो कह रहीं थीं, तुम्हारी मौसी लड़की ढूंढ रही है।" सिया हड़बड़ा गई। सुधा ने मुस्कुराते हुए कहा,"रीताजी, उसे नहीं मालूम है। सही बात तो यह है कि सुदर्शन और मेरे अलावा किसी को नहीं पता है। स्वयं लड़की को भी नहीं, वह हां कहें तो बात आगे बढ़ेगी।" सभी ने प्रश्नवाचक निगाहों से सुधा को देखा। इतने में घंटी बजी, सुकन्या अंदर आ गई। वह हाथ मुंह धोकर किचन में जाकर चाय और स्नैक्स लेकर आई। सुकन्या के बैठने के बाद सुधा ने कहा, "सुकन्या, मैं बिना लाग-लपेट के तुमसे कुछ पूछना चाहती हूँ।" "जी आंटी, कहिए।" सुकन्या बोली। "सुदर्शन माइक्रोसॉफ्ट में प्रोजेक्ट मैनेजर हैं। क्या तुम इससे शादी करना चाहोगी? तुम्हारी इच्छा है, हां या ना कह सकती हों। हमें बुरा नहीं लगेगा।" सुदर्शन की सहमति थी तो उसे तो पता ही था। सुमति और सिया की तो खुशी का ठिकाना नहीं रहा। सुकन्या हतप्रभ रह गई, बोली, "आंटी, मैं विधवा हूँ।" सुधा ने कहा, "बेटा, मैं और सुदर्शन तुम्हारे बारे में सब जानते हैं।" सुदर्शन ने कहा, "मुझे देखते ही बहुत अपनी सी लगी हों, सुकन्या। तुम्हारी हां का मुझे इंतज़ार है। वैसे जो तुम कहोगी, हमें स्वीकार होगा।" रीताजी तुनक कर काम्या के साथ चलती बनीं। सुकन्या ने माँ, भाई और भाभी को देखा। सभी ने हां का संकेत दिया। सुकन्या भी समझ गई थी‌ कि वे दिल के साफ़ और सच्चे लोग हैं। सुकन्या ने सिर झुके झुके हां में हिलाया। घर भर में खुशी की लहर दौड़ गई। *********

  • प्रायश्चित

    भगवती चरण वर्मा अगर कबरी बिल्ली घर-भर में किसी से प्रेम करती थी तो रामू की बहू से, और अगर रामू की बहू घर-भर में किसी से घृणा करती थी तो कबरी बिल्ली से। रामू की बहू, दो महीने हुए मायके से प्रथम बार ससुराल आई थी, पति की प्यारी और सास की दुलारी, चौदह वर्ष की बालिका। भंडार-घर की चाभी उसकी करधनी में लटकने लगी, नौकरों पर उसका हुक्म चलने लगा, और रामू की बहू घर में सब कुछ; सासजी ने माला ली और पूजा-पाठ में मन लगाया। लेकिन ठहरी चौदह वर्ष की बालिका, कभी भंडार-घर खुला है तो कभी भंडार-घर में बैठे-बैठे सो गई। कबरी बिल्ली को मौक़ा मिला, घी-दूध पर अब वह जुट गई। रामू की बहू की जान आफ़त में और कबरी बिल्ली के छक्के-पंजे। रामू की बहू हाँडी में घी रखते-रखते ऊँघ गई और बचा हुआ घी कबरी के पेट में। रामू की बहू दूध ढककर मिसरानी को जिन्स देने गई और दूध नदारद। अगर बात यहीं तक रह जाती, तो भी बुरा न था, कबरी रामू की बहू से कुछ ऐसा परच गई थी कि रामू की बहू के लिए खाना-पीना दुश्वार। रामू की बहू के कमरे में रबड़ी से भरी कटोरी पहुँची और रामू जब आए तब तक कटोरी साफ़ चटी हुई। बाज़ार से बालाई आई और जब तक रामू की बहू ने पान लगाया बालाई ग़ायब। रामू की बहू ने तय कर लिया कि या तो वही घर में रहेगी या फिर कबरी बिल्ली ही। मोर्चाबंदी हो गई, और दोनों सतर्क। बिल्ली फँसाने का कठघरा आया, उसमें दूध बालाई, चूहे, और भी बिल्ली को स्वादिष्ट लगने वाले विविध प्रकार के व्यंजन रखे गए, लेकिन बिल्ली ने उधर निगाह तक न डाली। इधर कबरी ने सरगर्मी दिखलाई। अभी तक तो वह रामू की बहू से डरती थी; पर अब वह साथ लग गई, लेकिन इतने फ़ासिले पर कि रामू की बहू उस पर हाथ न लगा सके। कबरी के हौसले बढ़ जाने से रामू की बहू को घर में रहना मुश्किल हो गया। उसे मिलती थीं सास की मीठी झिड़कियाँ और पतिदेव को मिलता था रूखा-सूखा भोजन। एक दिन रामू की बहू ने रामू के लिए खीर बनाई। पिस्ता, बादाम, मखाने और तरह-तरह के मेवे दूध में ओटे गए, सोने का वर्क चिपकाया गया और खीर से भरकर कटोरा कमरे के एक ऐसे ऊँचे ताक़ पर रखा गया, जहाँ बिल्ली न पहुँच सके। रामू की बहू इसके बाद पान लगाने में लग गई। उधर बिल्ली कमरे में आई, ताक़ के नीचे खड़े होकर उसने ऊपर कटोरे की ओर देखा, सूँघा, माल अच्छा है, ताक़ की ऊँचाई अंदाज़ी। उधर रामू की बहू पान लगा रही है। पान लगाकर रामू की बहू सासजी को पान देने चली गई और कबरी ने छलाँग मारी, पंजा कटोरे में लगा और कटोरा झनझनाहट की आवाज़ के साथ फ़र्श पर। आवाज़ रामू की बहू के कान में पहुँची, सास के सामने पान फेंककर वह दौड़ी, क्या देखती है कि फूल का कटोरा टुकड़े-टुकड़े, खीर फ़र्श पर और बिल्ली डटकर खीर उड़ा रही है। रामू की बहू को देखते ही कबरी चपत। रामू की बहू पर ख़ून सवार हो गया, न रहे बाँस, न बजे बाँसुरी, रामू की बहू ने कबरी की हत्या पर कमर कस ली। रात-भर उसे नींद न आई, किस दाँव से कबरी पर वार किया जाए कि फिर ज़िंदा न बचे, यही पड़े-पड़े सोचती रही। सुबह हुई और वह देखती है कि कबरी देहरी पर बैठी बड़े प्रेम से उसे देख रही है। रामू की बहू ने कुछ सोचा, इसके बाद मुस्कुराती हुई वह उठी। कबरी रामू की बहू के उठते ही खिसक गई। रामू की बहू एक कटोरा दूध कमरे के दरवाज़े की देहरी पर रखकर चली गई। हाथ में पाटा लेकर वह लौटी तो देखती है कि कबरी दूध पर जुटी हुई है। मौक़ा हाथ में आ गया, सारा बल लगाकर पाटा उसने बिल्ली पर पटक दिया। कबरी न हिली, न डुली, न चीख़ी, न चिल्लाई, बस एकदम उलट गई। आवाज़ जो हुई तो महरी झाड़ू छोड़कर, मिसरानी रसोई छोड़कर और सास पूजा छोड़कर घटनास्थल पर उपस्थित हो गईं। रामू की बहू सर झुकाए हुए अपराधिनी की भाँति बातें सुन रही है। महरी बोली- अरे राम! बिल्ली तो मर गई। माँजी, बिल्ली की हत्या बहू से हो गई, यह तो बुरा हुआ। मिसरानी बोली- माँजी, बिल्ली की हत्या और आदमी की हत्या बराबर है, हम तो रसोई न बनाएँगी, जब तक बहू के सिर हत्या रहेगी। सास जी बोलीं- हाँ, ठीक तो कहती हो, अब जब तक बहू के सर से हत्या न उतर जाए, तब तक न कोई पानी पी सकता है, न खाना खा सकता है, बहू, यह क्या कर डाला? महरी ने कहा- फिर क्या हो, कहो तो पंडितजी को बुलाय लाई। सास की जान-में-जान आई- अरे हाँ, जल्दी दौड़ के पंडितजी को बुला लो। बिल्ली की हत्या की ख़बर बिजली की तरह पड़ोस में फैल गई—पड़ोस की औरतों का रामू के घर ताँता बँध गया। चारों तरफ़ से प्रश्नों की बौछार और रामू की बहू सिर झुकाए बैठी। पंडित परमसुख को जब यह ख़बर मिली, उस समय वह पूजा कर रहे थे। ख़बर पाते ही वे उठ पड़े—पंडिताइन से मुस्कुराते हुए बोले- भोजन न बनाना, लाला घासीराम की पतोहू ने बिल्ली मार डाली, प्रायश्चित होगा, पकवानों पर हाथ लगेगा। पंडित परमसुख चौबे छोटे-से मोटे-से आदमी थे। लंबाई चार फीट दस इंच और तोंद का घेरा अट्ठावन इंच। चेहरा गोल-मटोल, मूँछ बड़ी-बड़ी, रंग गोरा, चोटी कमर तक पहुँचती हुई। कहा जाता है कि मथुरा में जब पसेरी ख़ुराकवाले पंडितों को ढूँढ़ा जाता था, तो पंडित परमसुखजी को उस लिस्ट में प्रथम स्थान दिया जाता था। पंडित परमसुख पहुँचे और कोरम पूरा हुआ। पंचायत बैठी—सासजी, मिसरानी, किसनू की माँ, छन्नू की दादी और पंडित परमसुख। बाक़ी स्त्रियाँ बहू से सहानुभूति प्रकट कर रही थीं। किसनू की माँ ने कहा- पंडितजी, बिल्ली की हत्या करने से कौन नरक मिलता है? पंडित परमसुख ने पत्रा देखते हुए कहा- बिल्ली की हत्या अकेले से तो नरक का नाम नहीं बतलाया जा सकता, वह महूरत भी मालूम हो, जब बिल्ली की हत्या हुई, तब नरक का पता लग सकता है। यही कोई सात बजे सुबह—मिसरानीजी ने कहा। पंडित परमसुख ने पत्रे के पन्ने उलटे, अक्षरों पर उँगलियाँ चलाईं, माथे पर हाथ लगाया और कुछ सोचा। चेहरे पर धुंधलापन आया, माथे पर बल पड़े, नाक कुछ सिकुड़ी और स्वर गंभीर हो गया- हरे कृष्ण! हे कृष्ण! बड़ा बुरा हुआ, प्रातःकाल ब्रह्म-मुहूर्त में बिल्ली की हत्या! घोर कुंभीपाक नरक का विधान है! रामू की माँ, यह तो बड़ा बुरा हुआ। रामू की माँ की आँखों में आँसू आ गए- तो फिर पंडितजी, अब क्या होगा, आप ही बतलाएँ! पंडित परमसुख मुस्कुराए- रामू की माँ, चिंता की कौन-सी बात है, हम पुरोहित फिर कौन दिन के लिए हैं? शास्त्रों में प्रायश्चित का विधान है, सो प्रायश्चित से सब कुछ ठीक हो जाएगा। रामू की माँ ने कहा- पंडितजी, इसीलिए तो आपको बुलवाया था, अब आगे बतलाओ कि क्या किया जाए? किया क्या जाए, यही एक सोने की बिल्ली बनवाकर बहू से दान करवा दी जाए—जब तक बिल्ली न दे दी जाएगी, तब तक तो घर अपवित्र रहेगा, बिल्ली दान देने के बाद इक्कीस दिन का पाठ हो जाए। छन्नू की दादी बोली- हाँ और क्या, पंडितजी ठीक तो कहते हैं, बिल्ली अभी दान दे दी जाए और पाठ फिर हो जाए। रामू की माँ ने कहा- तो पंडितजी, कितने तोले की बिल्ली बनवाई जाए? पंडित परमसुख मुस्कुराए, अपनी तोंद पर हाथ फेरते हुए उन्होंने कहा- बिल्ली कितने तोले की बनवाई जाए? अरे रामू की माँ, शास्त्रों में तो लिखा है कि बिल्ली के वज़न-भर सोने की बिल्ली बनवाई जाए। लेकिन अब कलियुग आ गया है, धर्म-कर्म का नाश हो गया है, श्रद्धा नहीं रही। सो रामू की माँ, बिल्ली के तौल भर की बिल्ली तो क्या बनेगी, क्योंकि बिल्ली बीस-इक्कीस सेर से कम की क्या होगी, हाँ, कम-से-कम इक्कीस तोले की बिल्ली बनवाकर दान करवा दो और आगे तो अपनी-अपनी श्रद्धा! रामू की माँ ने आँखें फाड़कर पंडित परमसुख को देखा- अरे बाप रे! इक्कीस तोला सोना! पंडितजी यह तो बहुत है, तोला-भर की बिल्ली से काम न निकलेगा? पंडित परमसुख हँस पड़े- रामू की माँ! एक तोला सोने की बिल्ली! अरे रुपया का लोभ बहू से बढ़ गया? बहू के सिर बड़ा पाप है, इसमें इतना लोभ ठीक नहीं! मोल-तोल शुरू हुआ और मामला ग्यारह तोले की बिल्ली पर ठीक हो गया। इसके बाद पूजा-पाठ की बात आई। पंडित परमसुख ने कहा- उसमें क्या मुश्किल है, हम लोग किस दिन के लिए हैं रामू की माँ, मैं पाठ कर दिया करुँगा, पूजा की सामग्री आप हमारे घर भिजवा देना। पूजा का सामान कितना लगेगा? अरे, कम-से-कम में हम पूजा कर देंगे, दान के लिए क़रीब दस मन गेहूँ, एक मन चावल, एक मन दाल, मन-भर तिल, पाँच मन जौ और पाँच मन चना, चार पसेरी घी और मन-भर नमक भी लगेगा। बस, इतने से काम चल जाएगा। अरे बाप रे! इतना सामान! पंडितजी इसमें तो सौ-डेढ़ सौ रुपया ख़र्च हो जाएगा—रामू की माँ ने रुआँसी होकर कहा। फिर इससे कम में तो काम न चलेगा। बिल्ली की हत्या कितना बड़ा पाप है, रामू की माँ! ख़र्च को देखते वक़्त पहले बहू के पाप को तो देख लो! यह तो प्रायश्चित है, कोई हँसी-खेल थोड़े ही है—और जैसी जिसकी मरजादा, प्रायश्चित में उसे वैसा ख़र्च भी करना पड़ता है। आप लोग कोई ऐसे-वैसे थोड़े हैं, अरे सौ-डेढ़ सौ रुपया आप लोगों के हाथ का मैल है। पंडि़त परमसुख की बात से पंच प्रभावित हुए, किसनू की माँ ने कहा- पंडितजी ठीक तो कहते हैं, बिल्ली की हत्या कोई ऐसा-वैसा पाप तो है नहीं—बड़े पाप के लिए बड़ा ख़र्च भी चाहिए। छन्नू की दादी ने कहा- और नहीं तो क्या, दान-पुन्न से ही पाप कटते हैं। दान-पुन्न में किफ़ायत ठीक नहीं। मिसरानी ने कहा- और फिर माँजी आप लोग बड़े आदमी ठहरे। इतना ख़र्च कौन आप लोगों को अखरेगा। रामू की माँ ने अपने चारों ओर देखा—सभी पंच पंडितजी के साथ। पंडित परमसुख मुस्कुरा रहे थे। उन्होंने कहा- रामू की माँ! एक तरफ़ तो बहू के लिए कुंभीपाक नरक है और दूसरी तरफ़ तुम्हारे ज़िम्मे थोड़ा-सा ख़र्चा है। सो उससे मुँह न मोड़ो। एक ठंडी साँस लेते हुए रामू की माँ ने कहा- अब तो जो नाच नचाओगे नाचना ही पड़ेगा। पंडित परमसुख ज़रा कुछ बिगड़कर बोले- रामू की माँ! यह तो ख़ुशी की बात है—अगर तुम्हें यह अखरता है तो न करो, मैं चला—इतना कहकर पंडितजी ने पोथी-पत्रा बटोरा। अरे पंडितजी—रामू की माँ को कुछ नहीं अखरता—बेचारी को कितना दुःख है—बिगड़ो न!—मिसरानी, छन्नू की दादी और किसनू की माँ ने एक स्वर में कहा। रामू की माँ ने पंडितजी के पैर पकड़े—और पंडितजी ने अब जमकर आसन जमाया। और क्या हो? इक्कीस दिन के पाठ के इक्कीस रुपए और इक्कीस दिन तक दोनों बखत पाँच-पाँच ब्राह्मणों को भोजन करवाना पड़ेगा, कुछ रुककर पंडित परमसुख ने कहा- सो इसकी चिंता न करो, मैं अकेले दोनों समय भोजन कर लूँगा और मेरे अकेले भोजन करने से पाँच ब्राह्मण के भोजन का फल मिल जाएगा। यह तो पंडितजी ठीक कहते हैं, पंडितजी की तोंद तो देखो! मिसरानी ने मुस्कुराते हुए पंडितजी पर व्यंग किया। अच्छा तो फिर प्रायश्चित का प्रबंध करवाओ, रामू की माँ ग्यारह तोला सोना निकालो, मैं उसकी बिल्ली बनवा लाऊँ—दो घंटे में मैं बनवाकर लौटूँगा, तब तक सब पूजा का प्रबंध कर रखो—और देखो पूजा के लिए… पंडितजी की बात ख़त्म भी न हुई थी कि महरी हाँफती हुई कमरे में घुस आई और सब लोग चौंक उठे। रामू की माँ ने घबराकर कहा—अरी क्या हुआ री? महरी ने लड़खड़ाते स्वर में कहा—माँजी, बिल्ली तो उठकर भाग गई! *********

bottom of page