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  • एक शिष्य का सफरनामा

    वर्ष 2013-14 में मेरी फेशबुक पर एक मित्रता निवेदन आया, मेंने देखा नाम था सपना सोनी।मित्रता निवेदन स्वीकार ने के बाद निरंतर साहित्य संबंधित चर्चाएँ होती रहीं।उस वक्त वह अपनी मानसिक रोग से पीड़ित बेटी के दुख से बेहद आहत थीं, उनका दिल करता था कि बेटी के साथ दिल खोल कर उससे बात करे उस पर अपना ममत्व लुटाए, पर ला इलाज बीमारी के चलते वह चाह कर भी अपनी बेटी के साथ अपनी भावनाओं को साझा नहीं कर पातीं थीं। सपना सोनी को अपनी बेटी से जो कुछ कहने की इच्छा होती थी, उन भावनाओं को वह कविता के रूप में अपनी डायरी में सजोती जा रहीं थीं।उनमें से कुछ दिल को छूले ने बाली रचनाओं में से किसी एक रचना को कभी कभार अपनी फेशबुक की टाइमलाइन पर भी पोस्ट करती रहतीं थीं।यह बात अलग है कि अब वह बिटिया रानी इस दुनिया में नहीं रही। वार्तालाप के दौरान एक दिन उन्होंने कविता परिमार्जन हेतु आग्रह किया जिसे मेंने सहर्ष स्वीकारते हुए अपनी क्षमतानुसार उनकी रचनाओं को परिमार्जित करता रहा। इसी दौरान मेरे परम मित्र दिल्ली के मसहूर शायर आदरणीय मंगल नसीम जी उनके समपर्क में आए और उन्होंने सपना सोनी को एक बेटी की तरह ग़जल की विधवत शिक्षादी।साथ ही सपना सोनी की शुरीली आवाज में कविता पाठ करते देख उनको मंचों पर कविता पाठ करने के अवसर मुहैया कराए। उसके बाद सपना सोनी हर रोज कविता के नए नए सोपान लिखती गईं और मंचों से ले कर तमाम टी.वी चैनलों पर कविता पाठ करती नजर आईं।उन्होंने तमाम अवसरों पर मुझ से गुरुशिष्या के कर्तव्यों के निर्वहन हेतु रूबरू मुलाकात करने के प्रयास किये, किन्तु ऐसा कोई अवसर नहीं मिला कि रूबरू मिल सकें । संयोग से एक बार मसहूर कवि/लेखक आदरणीय साहित्य मनीषी ज्ञान पीठ पुरस्कार से सम्मानित श्रद्धेय प्रो. नामवर सिंहजी द्वारा स्थापित नारायणी साहित्य अकादमी के तत्वावधान में आयोजित अखिल भारतीय कवि सम्मेलन हेतु मैं अहमदाबाद से दिल्ली की यात्रा पर था। संयोग से उस दिन 27- जुलाई 2018 गुरु पूर्णिमा थी। मैं जिस रेलगाड़ी में था वह सुबह करीब 9:00 बजे राजस्थान के दौसा स्टेशन पर पहुंची। राजस्थान की चर्चित और सुप्रसिद्ध कवियत्री सपना सोनी जी अपने जीवन साथी मनोज कुमार सोनी के साथ सुबह से मेरी रेलगाड़ी के पहुचने की प्रतीक्षा करती दौसा स्टेशन पर मिलीं। उन्होंने शाल, नारियल, वस्त्र और स्वरचित पुस्तक "मनकाझरना" देकर फूल हार से अकिंचन को गुरु की उपाधि से सम्मानित किया जोकि, मेरे साहित्य लेखन के लिए सबसे बड़ी उपाधि थी। यसस्वीभव: का आशीर्वाद देकर मैं पुनः अपनी रेलगाड़ी में जा बैठा। चूँकि उस स्टेशन पर उस रेलगाड़ी के रुकने का कुल समय 5 मिनट ही था। आज वही सपना सोनी तमाम टी.वी. चैनलों पर कविता पाठ करते हुए मसहूर कवि / लेखक और सोनी सब पर प्रख्यात टी.वी. धारावाहिक तारक मेहता का उलटा चसमा में तारक मेहता के अभिनय में नजर आने बाले आदरणीय शैलेन्द्र लोढाजी द्वारा संचालित शेमारू टी. वी. चैनल पर धारावाहिक वाह भाई वाह कार्यक्रम तक के सफरना मे की कुछ यादें आप सबके साथ साझा करते हुए गौरव महसूस कर रहा हूँ। साथ ही कामना करता हूँ कि सपना सोनी साहित्य के हर रोज नए आयामों को छुएँ। इसी शुभाषीश के साथ आप सब को मेरा सादर नमन। ********

  • दो रुपए

    कस्बे के किनारे तंग गलियों की एक बस्ती। छोटे-छोटे कमरे के मकान, कोठरी, नंगी ईटों पर डगमगाती टीन की चादरें, कच्ची मिट्टी की दीवारें, फूंस के छप्पर का घूंघट ओढ़े आंधी तूफान, बरसात, धूप, लालची नजरों से अपने अस्तित्व को बचाने की कोशिश में बहुत थकी सी पर खड़ी है। सूर्यास्त के बाद अंधेरे में डूब जाती यह बस्ती। बस मिट्टी के तेल की ठिवरी, लालटेन, बरसात में कड़कती बिजली से ही दिखाई देती है। कई पीढ़ी की यही जीवन शैली। कोठरी के दरवाजे पर एक फटा मैला पर्दा, बैठने उठने को एक चरमराई चारपाई, पानी का घड़ा उस पर एक गिलास। गृहस्ती के नाम पर एक लोहे का संदूक, पीछे खुली जगह में मिट्टी का चूल्हा, पिचके काले पड़ चुके अल्मुनियम के चंद बर्तन। ईटों पर सजी घर की परचून, दाल, चावल, आटा, मसाले के टेढ़े मेढ़े डिब्बे। एक दो जोड़ी खूंटी पर टंगी धोती, ब्लाउज, पेटीकोट, अंगोछा। सजने सवरने के लिए आले में रखी लालता, सुरमेदानी, बिंदी, नाखूनी, दांत की मिस्सी, गुलाबी रंग, कुछ नकली गहने बुंदे, झुमकी, चेन, कमरबंद, पायल। एक और चीज जो जरूरी वह आइना हर घर में होता है। बस्ती में एक कुआं जो उन सब का एक क्लब है। हर सुबह, शाम, दोपहर मिलजुल कर सुख-दुख, हंसी मजाक की साझेदारी, आपस में गम हल्का करने का एक ही स्थान। रात के अंधेरे में एक ही आवाज तैरती और गूंजती है। मसलती कलियों का क्रंदन, युवती की सिसकियां प्रोडा की फुसफुसाहट, गाली गलौज, दूध पीते बच्चों का रोना और मर्द की बेशर्म, बहसी क्रूरतम हंसी के ठहाके, चौखट पर वृद्धा की खांसी की ठन ठन। दिन की उदासी शाम होते ही चहल-पहल में बदल जाती है। लाला गिरधारी लाल दुकान बंद कर नए कुर्ता धोती में इत्र की फुलौरी लगाए पान चबाते गली में घुसते हैं। लाइन से कमरों के दरवाजों का पर्दा हटता है और एक मंडी सज जाती है। लालाजी पूरी गली पर एक नजर डालते हैं और फिर एक दरवाजे पर ठहर जाते हैं। पूछते हैं क्या भाव है? पेट की आग होठों पर एक नकली हंसी में बदल जाती है और शर्माती हुई एक आवाज बोली बस दो रुपए। लालाजी बोले मेरे दादाजी तो अठन्नी दे देते थे। साहब महंगाई कितनी बढ़ गई है। और वह हाथ पकड़ कर अपनी ओर खींच लेती है। टूटे दरवाजे की सांकल बंद हो जाती है। चौखट पर बैठी बूढ़ी काकी की खांसी और तेज हो जाती है। मनुष्य की सभ्यता का सबसे पुराना व्यापार। देह मंडी। एक अंधेरा संसार खरीद-फरोख्त बस दो रुपए। *******

  • लस्सी का कुल्हड़

    एक दूकान पर लस्सी का ऑर्डर देकर हम सब दोस्त- आराम से बैठकर एक दूसरे की खिंचाई और हंसी-मजाक में लगे ही थे कि, लगभग 70-75 साल की बुजुर्ग स्त्री पैसे मांगते हुए हमारे सामने हाथ फैलाकर खड़ी हो गई। उनकी कमर झुकी हुई थी, चेहरे की झुर्रियों में भूख तैर रही थी। नेत्र भीतर को धंसे हुए किन्तु सजल थे। उनको देखकर मन में न जाने क्या आया कि मैंने जेब में सिक्के निकालने के लिए डाला हुआ हाथ वापस खींचते हुए उनसे पूछ लिया: दादी लस्सी पियोगी? मेरी इस बात पर दादी कम अचंभित हुईं और मेरे मित्र अधिक क्योंकि अगर मैं उनको पैसे देता तो बस 5 या 10 रुपए ही देता लेकिन लस्सी तो 40 रुपए की एक है। इसलिए लस्सी पिलाने से मेरे गरीब हो जाने की और उस बूढ़ी दादी के द्वारा मुझे ठग कर अमीर हो जाने की संभावना बहुत अधिक बढ़ गई थी। दादी ने सकुचाते हुए हामी भरी और अपने पास जो मांग कर जमा किए हुए 6-7 रुपए थे, वो अपने कांपते हाथों से मेरी ओर बढ़ाए। मुझे कुछ समझ नहीं आया तो मैने उनसे पूछा, ये किस लिए? इनको मिलाकर मेरी लस्सी के पैसे चुका देना बाबूजी। भावुक तो मैं उनको देखकर ही हो गया था। रही बची कसर उनकी इस बात ने पूरी कर दी। एकाएक मेरी आंखें छलछला आईं और भरभराए हुए गले से मैने दुकान वाले से एक लस्सी बढ़ाने को कहा। उन्होने अपने पैसे वापस मुट्ठी मे बंद कर लिए और पास ही जमीन पर बैठ गई। अब मुझे अपनी लाचारी का अनुभव हुआ क्योंकि मैं वहां पर मौजूद दुकानदार, अपने दोस्तों और कई अन्य ग्राहकों की वजह से उनको कुर्सी पर बैठने के लिए नहीं कह सका। डर था कि कहीं कोई टोक ना दे। कहीं किसी को एक भीख मांगने वाली बूढ़ी महिला के उनके बराबर में बिठाए जाने पर आपत्ति न हो जाये। लेकिन वो कुर्सी जिस पर मैं बैठा था, मुझे काट रही थी। लस्सी कुल्लड़ों में भरकर हम सब मित्रों और बूढ़ी दादी के हाथों मे आते ही मैं अपना कुल्लड़ पकड़कर दादी के पास ही जमीन पर बैठ गया क्योंकि ऐसा करने के लिए तो मैं स्वतंत्र था। इससे किसी को आपत्ति नहीं हो सकती थी। हां, मेरे दोस्तों ने मुझे एक पल को घूरा, लेकिन वो कुछ कहते उससे पहले ही दुकान के मालिक ने आगे बढ़कर दादी को उठाकर कुर्सी पर बैठा दिया और मेरी ओर मुस्कुराते हुए हाथ जोड़कर कहा: ऊपर बैठ जाइए साहब! मेरे यहां ग्राहक तो बहुत आते हैं, किन्तु इंसान तो कभी-कभार ही आता है। दुकानदार के आग्रह करने पर मैं और बूढ़ी दादी दोनों कुर्सी पर बैठ गए हालांकि दादी थोड़ी घबराई हुई थी मगर मेरे मन में एक असीम संतोष था।

  • स्वाध्याय,जीवन की अनिवार्यता है।

    हमारे शास्त्रों में गुरु की महिमा का प्रसंग वर्णन बड़े विस्तार से किया गया है। परंतु हम उसी संत को गुरु की श्रेणी में रख सकते हैं जो मनुष्य में सत्य मार्ग पर चलने की सच्ची प्रेरणा उत्पन्न कर सकता हो। जो, शिष्य के ज्ञान के अंधकार को हरकर, ज्ञान की दिव्य ज्योति प्रदान कर सकता हो और भगवत प्राप्ति के पावन पथ पर अग्रसर होने की सामर्थ उत्पन्न कर सकता हो। परंतु भौतिक युग में ऐसे गुरुओं का मिलना न केवल कठिन अपितु असंभव प्रतीत होता है। गुरुओं के रूप में समाज में उपस्थित वंचक गुरुओं द्वारा भोली भाली जनता को ठगे जाने की संभावनाएं बहुत प्रबल हो जाती है। अतः निरापद मार्ग का अनुसरण कर वंचक गुरुओं के मायाजाल से बचा जा सकता है। यहां निरापद मार्ग का सीधा अभिप्राय यह है कि हमें परमपिता परमेश्वर को ही अपने गुरु के रुप में वरण कर लेना चाहिए। हमारे महापुरुषों ने कहा है, “कृष्णं वंदे जगतगुरुम्” अर्थात भगवान श्री कृष्ण की वंदना जगत गुरु के रुप में की जाती है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी हनुमान चालीसा में हनुमान जी महाराज को ही गुरु रूप में वर्णित किया है। जै जै जै हनुमान गोसाईं । कृपा करेहु गुरुदेव की नाई।। इसी प्रकार संतों ने भगवान शिव को प्रथम गुरु के रुप में स्वीकार्य किया है। संतों का अनुसरण करते हुए, हम आपको भी जिस देव में श्रद्धा टिकती हो उसे ही मानसिक रूप से गुरु के रुप में वरण कर लेना चाहिए। इसके साथ ही वेदों, उपनिषदों व महापुरुषों की पुस्तकों के स्रोतों से ज्ञानार्जन की प्रक्रिया अपनानी चाहिए। पुस्तकों के माध्यम से संत महात्माओं के साथ किया गया सत्संग चिरस्थाई होता है। ऐसे सत्संग से प्राप्त संत महात्माओं की जीवन की कल्याणकारी बातों को हमें अपने जीवन में उतारने का प्रयास करना चाहिए। यह सत्संग हमारे चरित्र को कहीं अधिक प्रभावी ढंग से संत महात्माओं के रूप में स्थापित करने में सफल हो सकता है। सत्संग की तो बड़ी महिमा है परंतु सत्संग में सन्निकटता की आवश्यकता नहीं है। यथासंभव दूरी बना कर भी सत्संग का सुख प्राप्त किया जा सकता है। ऐसा कर वंचक गुरुओं के दृष्टि दोष से बचकर कल्याणकारी दृष्टिकोण को सफलतापूर्वक आत्मसात किया जा सकता है। स्वाध्याय वह विधि है, जिसके द्वारा ज्ञान प्राप्ति एवं जीवन की विसंगतियों व समस्याओं को दूर करने की क्षमता उत्पन्न हो जाती है। दिनचर्या में एक निश्चित समय स्वाध्याय को अवश्य दिया जाना चाहिए। जिससे मनुष्य को सत्य साहित्य के अध्ययन का लाभ मिलेगा। ज्ञान के अभाव में मनुष्य की स्थिति एक दृष्टिहीन व्यक्ति के जैसी हो जाती है। वह व्यक्ति संसार में रहकर भी समस्त ज्ञान भंडार से दूर हो जाता है। संसार के सारे दुख अज्ञान और आशक्ति से ही पैदा होते हैं। अज्ञानी व्यक्ति पाप प्रलोभनों में पड़कर व्यसन के गर्त में गिर जाता है। व्यक्ति के शारीरिक व मानसिक दुखों को ज्ञान के द्वारा ही नष्ट किया जा सकता है। अर्थात भौतिक जीवन की सफलता एवं आध्यात्मिक जीवन की पूर्णता के लिए ज्ञान के सोपान का प्राप्त होना परम आवश्यक है। अनेकों लोग किसी को धारा-प्रवाह बोलते एवं भाषण देते देखकर मंत्रमुग्ध जैसे हो जाते हैं और वक्ता के ज्ञान एवं प्रतिभा की भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगते हैं। कभी-कभी यह भी मान लेते हैं कि इस व्यक्ति पर माता सरस्वती की प्रत्यक्ष कृपा है। उसके ज्ञान के पट खुल गए हैं, तभी तो ज्ञान का अविरल स्रोत इनके मुख से शब्दों के रूप में अविरल बहता चला जा रहा है। श्रोताओं का इस प्रकार आश्चर्य चकित हो जाना अस्वाभाविक भी नहीं है। सफल वक्ता अथवा समर्थ लेखक जिस विषय को ले लेते हैं, उस पर घण्टों बोलते या लिखते चले जाते हैं, और यह प्रमाणित कर देते हैं कि उनका अमुक विषय पर ज्ञान अपरिमित है। यह कोई मंत्र सिद्धि का परिणाम नहीं है। यह सारा चमत्कार उनके उस स्वाध्याय का सुफल होता है, जिसे वे किसी दिन भी, किसी अवस्था में नहीं छोड़ते। उनके जीवन का कदाचित ही कोई ऐसा अभागा दिन जाता होगा, जिसमें वे मनोयोगपूर्वक घण्टों स्वाध्याय न करते हों। स्वाध्याय उनके जीवन का एक अंग और प्रतिदिन की अनिवार्य आवश्यकता बन जाता है। जिस दिन वे अपनी इस आवश्यकता की पूर्ति नहीं कर पाते, उस दिन वे अपने तन-मन और आत्मा में एक भूख, एक रिक्तता का कष्ट अनुभव किया करते हैं। यदि हम सिख पंथ के पथ प्रदर्शक गुरु नानक देव महाराज की बात करें तो हम पाते हैं कि उन्होंने अपने आप को परमात्मा के समक्ष पूर्ण समर्पित कर रखा था। उन्हीं के शब्दों में नानकु एकु कहै अरदासि। जीउ पिंड सभु तेरै पासि।। जब ऐसे महान व्यक्तित्व तक परमपिता परमेश्वर के शरण में रहकर मानवता की रक्षा के लिए प्रयासरत रह सकते हैं। तो सामान्य व्यक्ति द्वारा ईश्वर को अपना आध्यात्मिक गुरु स्वीकार्य करने में क्या कठिनाई हो सकती है। महाभारत में भीष्म पितामह ने भी स्वाध्याय को ही मनुष्य का सर्वोच्च धर्म माना है। पशु व मानव योनि के वैज्ञानिक वर्गीकरण के अनुसार ज्ञान ही ऐसा गुण है, जो मनुष्य को पशु योनि से अलग खड़ा कर देता है। यह ज्ञान ही है जिसके अभाव में मनुष्य पशुवत् व्यवहार करना प्रारंभ कर देता है। जिस प्रकार स्थूल शरीर के पोषण के लिए पौष्टिक भोजन की आवश्यकता होती है, ठीक उसी प्रकार मानसिक विकास व प्रगति के लिए ज्ञान की आवश्यकता होती है। अज्ञानता व्यक्ति के मानसिक विकास को विकृत कर देता है। अंततः मानसिक विकृति, व्यक्ति के चारित्रिक व आध्यात्मिक प्रगति को बाधित कर देती है। व्यक्ति एक संकीर्ण परिवेश में विचरण करने के लिए बाध्य हो जाता है। धार्मिक अथवा आध्यात्मिक क्षेत्र में कोई व्यक्ति नित्य पूजा अर्चना करता है, आसन लगाता है, जाप व कीर्तन में मग्न रहता है, व्रत-उपवास व दान-दक्षिणा देता है, किन्तु शास्त्रों अथवा सद्ग्रन्थों का अध्ययन और विचारों का चिन्तन-मनन नहीं करता है। वह सोच लेता है कि जब मैं इतना जाप तप करता हूँ तो इसके बाद अध्ययन की कोई आवश्यकता नहीं रह जाती। आत्म-ज्ञान अथवा परमात्म अनुभूति करा देने के लिए इतना ही पर्याप्त है तो निश्चय ही वह भ्रम में है। केवल स्वाध्याय ही वह विधि है जो व्यक्ति को जीवन का वास्तविक दर्शन कराती है। व्यक्ति को अहंकार से बचाती है। जीवन का लक्ष्य प्राप्त करती है। लोक व्यवहार सिखाती है और मस्तिष्क की उर्वरा शक्ति को बढ़ाती है। इसलिए तल्लीनता पूर्वक स्वाध्याय करना चाहिए। हल्के स्तर की पुस्तकों को पढ़ने से बचना चाहिए। ऐसी पुस्तकें व्यक्ति के मस्तिष्क की ग्रहण क्षमता को कमजोर कर देती है। चारित्रिक उज्ज्वलता, स्वाध्याय का एक साधारण और मनोवैज्ञानिक फल है। सद्ग्रन्थों के निरन्तर अध्ययन एवं मनन से संस्कारों की स्थापना होती हैं, जिससे व्यक्ति का चित्त अपने आप दुष्कृत्यों से विमुख हो जाता है। स्वाध्यायी व्यक्ति पर कुसंग का भी प्रभाव नहीं पड़ने पाता, इसका एक वैज्ञानिक कारण है। स्वाध्याय, व्यक्ति के हृदय को सकारात्मकता के विद्युत चुंबकीय तरंगों से ओतप्रोत कर उसके चारों ओर एक ऐसा अभेद्य आवरण उत्पन्न कर देता है जिसे आसुरी शक्तियां भेद नहीं पाती है, और स्वाध्यायी व्यक्ति विकृत सोच के व्यक्तियों के संपर्क में आने से बच जाता है। जिसकी स्वाध्याय में रुचि है और जो उसको जीवन का एक ध्येय मानता है, वह आवश्यकताओं से निवृत्त होकर अपना सारा समय स्वाध्याय में लगाता है। उसके पास कोई फालतू समय ही नहीं रहता, जिससे वह दूषित वातावरण से अवांछनीय तत्व ग्रहण कर लाये। स्वाध्याय जीवन विकास के लिये एक अनिवार्य आवश्यकता है, जिसे हर व्यक्ति को पूरी करना चाहिये। अनेक लोग परिस्थितिवश अथवा प्रारम्भिक प्रमादवश पढ़-लिख नहीं पाते और जब आगे चल कर उन्हें शिक्षा और स्वाध्याय के महत्व का ज्ञान होता है, तब हाथ मल-मल कर पछताते रहते है। स्वाध्याय से जहाँ संचित ज्ञान सुरक्षित रहता है, वहीं उस कोष में नवीन वृद्धि भी होती रहती है। स्वाध्याय से विरत हो होकर जीने वाला व्यक्ति अपने ज्ञान रूपी पूंजी को सदा के लिए खो बैठता है। अंत में परमपिता परमेश्वर से यही प्रार्थना है कि वह हमें भावी जीवन में स्वाध्याय द्वारा अपनी योग्यता बढ़ाने में मदद करें। **********

  • जादुई सांप की कहानी

    एक गांव में एक ब्राह्मण रहता था। वह आसपास के गांव में भिक्षा मांगकर अपना और अपने परिवार का पेट पाला करता था। एक बार ब्राह्मण को लगने लगा की उसे बहुत कम भिक्षा मिल रही है जिससे उसके परिवार का गुजारा बहुत मुश्किल से हो रहा है। इसलिए उसने सोचा मुझे राजा से मदद लेनी चाहिए। ब्राह्मण राजदरवार जाने के लिए घर से निकल पड़ा। जब वह जंगल में से गुजर रहा था तो उसे एक पेड़ के पास एक सांप दिखाई दिया। सांप ब्राह्मण को प्रणाम करके बोला, “हे ब्राह्मण महाराज, आज सुबह सुबह कहाँ जाने के लिए निकल पड़े?” ब्राह्मण ने अपनी समस्या सांप को बताई, “मैं राजा से सहायता लेने के लिए जा रहा हूँ।” सांप ने कहा, “मुझे पता है आप क्या समस्या लेकर जा रहे हो। तुम्हारे घर में इस समय बहुत गरीबी छाई हुई है इसलिए राजा से मदद लेने जा रहे हो।” ब्राह्मण ने कहा, “सांप आप तो सब जानते हो!” सांप ने कहाँ, “हाँ ब्राह्मण, मैं जादुई सांप हूँ और भविष्यवाणी कर सकता हूँ कि आगे क्या होने वाला है?” ब्राह्मण ने कहा, “कैसी भविष्यवाणी?” सांप ने कहा, “हे ब्राह्मण महाराज मैं तुम्हे एक भविष्यवाणी सुनाता हूँ तुम वह राजा को बता सकते हो। लेकिन मेरी यह शर्त है कि राजा से मिलने वाले धन से आधा तुम मुझे दोगे।” ब्राह्मण ने शर्त मानली। सांप ने कहा, “राजा से कहना की इस साल अकाल पड़ेगा इसलिए प्रजा को बचाने के लिए जो भी उपाय करना हो कर लेना।” ब्राह्मण ने सांप को धन्यवाद दिया और राजदरवार के लिए रवाना हो गया। अगले ही दिन वह राजदरवार में पहुँच गया। ब्राह्मण ने सिपाही से कहा, “राजा से कहो कि एक ब्राह्मण आया है जो भविष्यवाणी करता है।” राजा ने ब्राह्मण को राजदरवार में बुलाकर पूछा, “बताओ तुम भविष्य के बारे में क्या जानते हो?” ब्राह्मण ने सांप द्वारा की गई भविष्यवाणी राजा को सुनाई। राजा ने भविष्यवाणी सुनी और कुछ धन देकर ब्राह्मण को विदा किया। वापस लौटते हुए ब्राह्मण ने सोचा,”यदि सांप को आधा धन दिया तो मेरा धन जल्दी समाप्त हो जायेगा।” इसलिए ब्राह्मण रास्ता बदलकर अपने गांव चला गया। भविष्यवाणी के अनुसार बहुत बड़ा अकाल पड़ा। लेकिन राजा ने पहले से ही जानकारी होने के कारन बहुत से इंतजाम कर लिए थे इसलिए राजा को कोई समस्या नहीं हुई। एक साल बीत गया। ब्राह्मण का धन धीरे-धीरे खत्म हो गया और ब्राह्मण फिरसे राजा से मदद मांगने के लिए चल दिया। रास्ते में उसे फिर वही सांप मिला। अभिनन्दन करने के बाद सांप ने ब्राह्मण से कहा, “आधा धन देने के शर्त पर मैं तुम्हे एक भविष्यवाणी सुनाऊँगा। तुम मेरी भविष्यवाणी राजा को बता सकते हो। राजा से कहना इस साल भयंकर युद्ध होगा इसलिए जो भी तैयारी करनी है कर लो।” आधा धन देने का वादा कर सांप से विदा लेकर ब्राह्मण राजदरवार पहुँचा। राजा ने बहुत सम्मान के साथ ब्राह्मण का स्वागत किया और एक और भविष्यवाणी करने के लिए कहा।” ब्राह्मण ने राजा से कहा, “महाराज इस साल एक बहुत भयंकर युद्ध होने वाला है। आपको जो भी तैयारी करनी है अभी से करलो।” इस बार राजा ने ब्राह्मण को पहले से भी अधिक धन देकर विदा किया। अब रास्ते में फिर ब्राह्मण ने सोचा यदि सांप मिला तो आधा धन मांगेगा। इतने सारे धन का आधामैं उसे क्यों दू? क्यों न सांप को लाठी से मार दिया जाए। हाथ में लाठी लिए ब्राह्मण जब सांप के पास पहुँचा तो सांप खतरा देखकर बिल में जाने लगा। ब्राह्मण ने सांप के पीछे से लाठी से वार किया जिससे सांप की पूंछ कट गई। लेकिन सांप जीवित बच गया। सांप के भविष्यवाणी के अनुसार इस साल राजा के पड़ोसी राज्य से भयंकर युद्ध हुआ। लेकिन पहले से ही बहुत अच्छी तैयारी होने के कारन राजा युद्ध जीत गए। दो साल में ब्राह्मण का धन धीरे-धीरे फिरसे खत्म हो गया और उसके सामने फिरसे घर का संकट शुरू हो गया। उसने एक बार फिरसे राजा से मदद मांगने की सोची। एक दिन सुबह सुबह राजदरवार जाने के लिए नगर की और प्रस्थान किया। जंगल में पहुँचा तो ब्राह्मण सांप के आगे से नजर छुपाकर निकलने लगा। तभी सांप ने कहा, “हे ब्राह्मण महाराज, इस बार मिलकर नहीं जाओगे?” ब्राह्मण कुछ न बोल सका और नजरे नीची करके खड़ा रहा।” सांप ने कहा, “राजा से कहना इस बार राज्य में धर्म की स्थापना होगी, सब अच्छे काम होंगे, राजा और प्रजा सब सुख से होंगे। ध्यान रखना जो भी धन मिले उसका आधा मुझे देकर जाना।” ब्राह्मण ने आधा धन देने का वचन दिया और राजदरवार की और रवाना हो गया। राजदरवार पहुँचने पर ब्राह्मण का विशेष स्वागत किया गया। राजा ने पिछले दो भविष्यवाणी के लिए ब्राह्मण को बहुत बहुत धन्यवाद दिया और आने वाले समय के बारे में भी पूछा। तो ब्राह्मण ने कहा, “महाराज, इस बार राज्य में धर्म की स्थापना होगी। राजा तथा प्रजा सुख और चैन की जिंदगी बिताएंगे। सब लोक अच्छा सोचेंगे और अच्छे काम करेंगे।” राजा ने ब्राह्मण को बहुत सारा धन देकर विदा किया। गांव वापस लौटते हुए ब्राह्मण ने सोचा, “जब राजा ने थोड़ा धन दिया तो वह एक साल में समाप्त हो गया। जब ज्यादा धन दिया तो वह दो साल में समाप्त हो गया। सांप से गद्दारी की वह अलग। इस बार मैं सांप का सारा हिसाब कर दूंगा।” सांप के पास पहुँचकर ब्राह्मण ने सारा धन सांप के पास रख दिया और सांप से तीनो बार का धन लेने के लिए कहा। सांप ने कहा, “ब्राह्मण महाराज, जब अकाल पड़ा तो तुम रास्ता बदलकर निकल गए, जब युद्ध हुआ तो तुमने मेरी पूंछ काट दी जिससे मेरा बहुत मजाक उड़ाया गया। अब जब राज्य में धर्म की स्थापना हो गई है, मैंने भविष्यवाणी की थी की लोग अच्छे काम करेंगे तुम भी धर्म के रास्ते पर आ गए हो। हम जंगली जानबरों को धन की क्या जरुरत? यह सारा धन तुम ले जाओ। ख़ुशी से जीवन बिताओ और किसी के साथ कभी भी धोखा मत करो।” सांप को धन्यवाद देकर ब्राह्मण अपने गांव आ गया। और उसने निर्णय लिया की अब कभी भी किसी को धोखा नहीं देगा। लालच इंसान को भटका देता है तो कभी भी लालच और धोखाधड़ी न करें। *************

  • हिंदी हमारा अभिमान

    जिस देश की माटी में हम पल बढ़कर बड़े हुए हैं, उस माटी के प्रति हमारा लगाव और प्रेम होना स्वाभाविक है। देश की वन संपदा, जीव-जंतु, नदी, नाले, झरने, पहाड़, पशु-पक्षी आदि इन सबसे हमारा आत्मीय संबंध अपने आप ही स्थापित हो जाता है। सोचिए यदि देश की इन चीजों से हमारा इतना लगाव है तो देश की भाषा जिस के बिना हम मूक ही कहलाएंगे, से हमारा क्या रिश्ता होगा, क्या संबंध होगा। किसी भी देश की भाषा उस देश के निवासियों के अंतर्मन और मस्तिष्क के भावों को आधार प्रदान करती है। भाषा का प्रयोग कर हम अपने भावों को दूसरों तक प्रेषित कर सकते हैं और उन्हें समझा सकते हैं कि हमारे मन मस्तिष्क में इस वक्त क्या चल रहा है। बिना भाषा का प्रयोग किए हमारे व्यवहार के आधार पर ही कोई इस बात का अंदाजा नहीं लगा सकता कि आखिर हम कहना क्या चाहते हैं। संकेतों और हाव-भाव को समझना इतना आसान नहीं होता जितना बोल कर अपने आप को व्यक्त करना। हर चीज हाव भाव और अपने संकेतों के माध्यम से नहीं समझाई जा सकती। उन बातों को दूसरों को समझाने के लिए हमें शब्दों का प्रयोग करना ही पड़ता है, भाषा का सहारा लेना ही पड़ता है। हम सभी भारत देश के निवासी हैं और इस बात पर हमें गर्व भी है। भारत देश में अनेक प्रकार की बोलियों और भाषाओं को बोला जाता है। विविधता में एकता का प्रतीक है हमारा भारत राष्ट्र। चूंकि भारत में अनेक राज्य हैं और प्रत्येक राज्य की अपनी एक विशिष्ट अलग पहचान है, अलग बोली है, अलग भाषा है किंतु इतना सब होते हुए भी हम सभी भारतवासी एक हैं और एक दूसरे की भाषा को भली प्रकार सहजता और आसानी से समझ सकते हैं। भारत में चाहे जितनी भी भाषाएं और बोलियों को बोला जाता हो, किंतु यहां हिंदी का अपना एक विशिष्ट स्थान है। हिंदी भारत देश के भाल की बिंदी है अर्थात यह शिरोधार्य है। अपने राष्ट्र की भाषा का सम्मान करना अपने माता के सम्मान करने के बराबर ही है। जिस प्रकार हम अपने माता-पिता और पूर्वजों का आदर सत्कार करते हैं उसी प्रकार हमारे हृदयों में अपनी भाषा के प्रति भी सम्मान होना चाहिए और यह सम्मान किसी को दिखाने के लिए नहीं, अपितु महसूस करने के लिए होना चाहिए, सच्चे दिल से होना चाहिए। निसंदेह, हिंदी बोलते समय प्रत्येक भारतवासी को गर्व एवम अतुलनीय हर्ष का अनुभव होता है। जब विदेशों में भी लोग हिंदी भाषा का प्रयोग करते हैं और हिंदी बोलते समय खुद को सम्मानित महसूस करते हैं, तो यह देख खुशी के मारे हमारा सीना चौड़ा हो जाता है। जरा सोचिए, हिंदी भाषी ना होने के बावजूद भी विदेशों में हिंदी के प्रति क्रेज किस प्रकार बढ़ता जा रहा है, विदेश में रहने वाले लोग हिंदी बोल कर खुद को सम्मानित महसूस करते हैं और एक नई भाषा सीखकर गौरवान्वित भी। जब हिंदी भाषी ना होने के बावजूद दुनिया के अनेक देश हिंदी के प्रति अपने हृदय में यह आदर और सम्मान रख सकते हैं तो हम तो हैं ही हिंदी वासी, हमारे लिए तो हिंदी हमारी माता के समान है और अपनी माता के सम्मान को बरकरार रखना हम सबका परम दायित्व बनता है। अपने इस दायित्व को निभाने में हमें किसी प्रकार की कोताही नहीं बरतनी चाहिए और पूरी ईमानदारी और गर्व भाव के साथ इस जिम्मेदारी को दिल से निभाना चाहिए। निसंदेह हमारे राष्ट्र में हिंदी का अत्यधिक सम्मान किया जाता है और हिंदी के प्रति सम्मान को प्रकट करने के लिए हम हिंदी का जम कर प्रयोग करते हैं और हिंदी प्रयोग करने में खुद को गौरवान्वित भी महसूस करते हैं, किंतु कहा जाता है ना कि अपवाद तो हर जगह पाए जाते हैं। हमारी हिंदी भाषा भी इन अपवादों से खुद को बचा नहीं पाई है। कहने का तात्पर्य है कि आज हमारे देश के लाखों लोग हिंदी भाषा बोलने में शर्म का अनुभव करते हैं व्यक्तिगत अपवादों को छोड़ भी दें तो भी अनेक प्रकार के सरकारी और गैर सरकारी दोनों ही प्रकार के शिक्षण संस्थानों और कार्यालयों में हिंदी प्रयोग को क्लिष्ट समझा जाता है और इसके स्थान पर विदेशी भाषाओं के प्रयोग को सहज समझकर प्रयोग किया जाता है। यह अति दुखद है। विदेशी भाषाओं को बोलना, सीखना और लिखना कदापि गलत नहीं, अपितु यह तो बहुत ही अच्छी बात है कि हम दूसरे देश की भाषाओं को सीखने में रुचि दिखा रहे हैं और अपने सामान्य ज्ञान में निरंतर वृद्धि भी कर रहे हैं जो आने वाले समय में अंतरराष्ट्रीय संबंधों को मज़बूत बनाने में भी एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। किंतु विदेशी भाषाओं को सीखकर अपने ही देश में उनका वर्चस्व स्थापित करने की अनुमति देना यह सरासर गलत है। अपनी भाषाओं के स्थान पर विदेशी भाषाओं को प्रयोग करना भी गलत है। अपनी भाषाओं के साथ-साथ विदेशी भाषाओं का प्रयोग स्वीकार्य हो सकता है। किंतु, विदेशी भाषाओं से अपनी भाषा को रिप्लेस करना किसी भी सूरत में स्वीकार्य नहीं है। वर्तमान में अनेक कार्यालयों, संस्थानों और कंपनियों में हिंदी का ना के बराबर प्रयोग किया जाता है। हिंदी के स्थान पर विदेशी भाषा का प्रयोग करने में ही वहां गर्व का अनुभव किया जाता है। वहां हिंदी बोलने वाले कर्मचारियों को हेय दृष्टि से देखा जाता है, ऐसा करना ना केवल अनैतिकता की श्रेणी में आता है अपितु अपने राष्ट्र के सम्मान पर भी यह एक प्रहार ही है। भारत के असंख्य लोग हिंदी बोलने में शर्म का अनुभव करते हैं क्योंकि उनके अनुसार विदेशी भाषाओं के सामने हिंदी फीकी लगती है और हिंदी बोलने पर उनका अपमान होता है। इस प्रकार की सोच बेहद निंदनीय है ,शर्मनाक है। निज भाषा के प्रति इस प्रकार की घटिया सोच या निम्न स्तर की मानसिकता ही हिंदी के पतन का मुख्य कारण बनती जा रही है हिंदी के उत्थान की जिम्मेदारी हम सभी पर है। विदेशों तक में जिस भाषा को इतना प्यार और सम्मान दिया जा रहा है उस भाषा की अपने ही घर में, अपने ही देश में इस प्रकार की दुखद स्थिति को देखकर मन आहत होता है। क्यों लोग यह भूल जाते हैं कि हमारी अपनी भाषा ही हमारी उन्नति का मार्ग प्रशस्त करती है। विदेशी भाषाओं को सीखना सिखाना उस स्थिति में स्वीकार किया जा सकता है जब हम अपनी भाषाओं को प्रमुखता देकर अपनाएं और जिस प्रकार विदेशी लोग अपनी भाषा के प्रति गौरव महसूस करते हैं, उसी प्रकार हम भी अपनी भाषा के गौरव को बनाए रखने की दिशा में हर संभव प्रयास करें। देश के बाहर इसके सम्मान को और भी ऊंचा उठाने के हमें अपने सार्थक प्रयत्न करने चाहिएं। हिंदी हमारा गौरव है, हमारा सम्मान है, हमारा अभिमान है, यह बात हमें कदापि नहीं भूलनी चाहिए। कुछ लोगों की निम्न स्तर की मानसिकता के चलते हम हिंदी को बिसरा नहीं सकते। हिंदी का भविष्य बहुत उज्ज्वल है इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि विदेशों में आजकल हिंदी भाषी लोगों को अत्यधिक सम्मान और आदर की दृष्टि से देखा जाता है। भारत की ही तरह वहां पर भी हिंदी साहित्य को सीखने की ललक लोगों में देखी जाती है। जिस प्रकार हमारे देश में हिंदी साहित्य को समृद्ध करने के लिए समय-समय पर विभिन्न प्रकार की प्रतियोगिताएं आयोजित की जाती हैं, वहां पर भी इसी प्रकार की प्रतियोगिताएं आयोजित करने का चलन चल पड़ा है। भारत की संस्कृति को विदेशी लोग अतिचार से अपना रहे हैं और सराह रहे हैं। निसंदेह हिंदी के प्रति पूरे विश्व का प्रेम हिंदी को एक ऐसे स्तर पर लेकर जाएगा जहां हिंदी ना केवल भारत में अपितु पूरे विश्व में अपना परचम लहराएगी। अब वह दिन दूर नहीं जब हिंदी ना केवल भारत की,अपितु समूचे विश्व के लिए गौरव का विषय बनेगी। इस बात से हम इनकार नहीं कर सकते कि वर्तमान में हिंदी की दशा शोचनीय है, किंतु हम सब मिलकर अपने सामूहिक प्रयासों से हिंदी साहित्य के क्षेत्र में एक क्रांति लेकर आएंगे और हिंदी को इसका वास्तविक अधिकार और स्थान दिला कर रहेंगे। हिंदी हमारी आत्मा में बसती है। किसी ने सही ही कहा है कि - आप चाहे दुनिया की जितनी भी भाषाएं क्यों न सीख लें किंतु दुख, तकलीफ और यहां तक की सपनों की दुनिया में भी आप अपनी मातृभाषा में ही संवाद करते हैं, बात करते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि हम हिंदी भाषी हिंदी के सम्मान पर अब कोई आंच नहीं आने देंगे, हम इसके गौरव को बढ़ाएंगे और कहीं भी इसका अपमान नहीं होने देंगे। हम हिंदी भाषा के प्रचार-प्रसार में अपना महत्वपूर्ण योगदान देंगे क्योंकि हिंदी है तो हम हैं ,हिंदी है तो हमारा राष्ट्र है। अपने राष्ट्र के अस्तित्व को संरक्षित करने अपनी संस्कृति को अगली पीढ़ियों तक हस्तांतरित करने हेतु हमें अपनी भाषा को स्नेह पूर्वक सिंचित करना होगा और इसके प्रयोग में गर्व महसूस करना होगा। यदि हमें अपनी सभ्यता और संस्कृति को बनाए रखना है तो हमें हिंदी को हर हाल में उसकी जगह दिलानी होगी। ***********

  • प्रेरणा का स्रोत

    एक बार एक राजा की सेवा से प्रसन्न होकर एक साधू नें उसे एक ताबीज दिया और कहा की राजन इसे अपने गले मे डाल लो और जिंदगी में कभी ऐसी परिस्थिति आये कि जब तुम्हे लगे कि बस अब तो सब ख़तम होने वाला है, परेशानी के भंवर मे अपने को फंसा पाओ, कोई प्रकाश की किरण नजर ना आ रही हो, हर तरफ निराशा और हताशा हो तब तुम इस ताबीज को खोल कर इसमें रखे कागज़ को पढ़ना, उससे पहले नहीं। राजा ने वह ताबीज अपने गले मे पहन लिया। एक बार राजा अपने सैनिकों के साथ शिकार करने घने जंगल मे गया। एक शेर का पीछा करते करते राजा अपने सैनिकों से अलग हो गया और दुश्मन राजा की सीमा मे प्रवेश कर गया,घना जंगल और सांझ का समय, तभी कुछ दुश्मन सैनिकों के घोड़ों की टापों की आवाज राजा को आई और उसने भी अपने घोड़े को एड लगाई, राजा आगे-आगे दुश्मन सैनिक पीछे पीछे। बहुत दूर तक भागने पर भी राजा उन सैनिकों से पीछा नहीं छुडा पाया। भूख प्यास से बेहाल राजा को तभी घने पेड़ों के बीच मे एक गुफा सी दिखी, उसने तुरंत स्वयं और घोड़े को उस गुफा की आड़ मे छुपा लिया। और सांस रोक कर बैठ गया, दुश्मन के घोड़ों के पैरों की आवाज धीरे-धीरे पास आने लगी। दुश्मनों से घिरे हुए अकेले राजा को अपना अंत नजर आने लगा, उसे लगा की बस कुछ ही क्षणों में दुश्मन उसे पकड़ कर मौत के घाट उतार देंगे। वो जिंदगी से निराश हो ही गया था, कि उसका हाथ अपने ताबीज पर गया और उसे साधू की बात याद आ गई। उसने तुरंत ताबीज को खोल कर कागज को बाहर निकाला और पढ़ा। उस पर्ची पर लिखा था -“यह भी कट जाएगा“ राजा को अचानक ही जैसे घोर अन्धकार मे एक ज्योति की किरण दिखी, डूबते को जैसे कोई सहारा मिला। उसे अचानक अपनी आत्मा मे एक अकथनीय शान्ति का अनुभव हुआ। उसे लगा कि सचमुच यह भयावह समय भी कट ही जाएगा, फिर मैं क्यों चिंतित होऊं। अपने प्रभु और अपने पर विश्वास रख उसने स्वयं से कहा कि हाँ, यह भी कट जाएगा। और हुआ भी यही ,दुश्मन के घोड़ों के पैरों की आवाज पास आते आते दूर जाने लगी, कुछ समय बाद वहां शांति छा गई। राजा रात मे गुफा से निकला और किसी तरह अपने राज्य मे वापस आ गया। दोस्तों, यह सिर्फ किसी राजा की कहानी नहीं है यह हम सब की कहानी है।हम सभी परिस्थिति, काम, तनाव के दवाव में इतने जकड जाते हैं कि हमे कुछ सूझता नहीं है, हमारा डर हम पर हावी होने लगता है, कोई रास्ता, समाधान दूर-दूर तक नजर नहीं आता, लगने लगता है कि बस, अब सब ख़तम, है ना? जब ऐसा हो तो २ मिनट शांति से बेठिये ,थोड़ी गहरी-गहरी साँसे लीजिये। अपने आराध्य को याद कीजिये और स्वयं से जोर से कहिये –यह भी कट जाएगा।आप देखिएगा एकदम से जादू सा महसूस होगा, और आप उस परिस्थिति से उबरने की शक्ति अपने अन्दर महसूस करेंगे। आजमाया हुआ है। बहुत कारगर है। आशा है जैसे यह सूत्र मेरे जीवन मे मुझे प्रेरणा देता है, आपके जीवन मे भी प्रेरणादायक सिद्ध होगा।

  • बुलिंग, आज की ज्वलंत समस्या

    पुरानी कहावत है कि संसार में सदियों से ताकतवर कमजोर को दबाता आया है और यह कहावत सृष्टि के प्रत्येक जीव पर लागू होती है। यह बात हमें अपने आसपास भी अक्सर दृष्टिगत होती है कि जो व्यक्ति स्वयं को अक्षम महसूस करते हैं उन्हें उनसे सक्षम और मजबूत व्यक्ति अक्सर दबाते हैं और उनकी अक्षमता का फायदा उठाते हुए उन पर अपनी सक्षमता का रौब जमाते हैं। मनुष्य हो अथवा कोई अन्य जीव जंतु, यह सभी पर समान रूप से लागू होता है। सृष्टि की शुरुआत से ही यह चलता आया है कि कमजोर सदैव ताकतवर के सामने दबते ही आए हैं। अपनी कमजोरी को छुपाने के लिए या यूं कहें अपनी कमजोरी के बोझ तले दबे हुए व्यक्ति अपने से अधिक मजबूत, ताकतवर और सशक्त व्यक्ति की सभी बातें मानने के लिए स्वयं को मजबूर और लाचार महसूस करते हैं, उन्हें चाहे अनचाहे उनके सामने झुकना होता है अन्यथा वह उनको फेस नहीं कर पाते, उनका सामना नहीं कर पाते और नाहक ही हास का पात्र बन जाते हैं। उपरोक्त स्थिति को अंग्रेजी भाषा में बुलिंग कहा जाता है। बुलिंग का हिंदी अर्थ यदि देखा जाए तो बुलिंग एक ऐसी स्थिति है जिसमें ताकतवर अपने से कमजोर को दबाता है, वहीं दूसरी ओर कमजोर व्यक्ति अपने से अधिक मजबूत लोगों के सामने झुकते हैं और यदि ऐसा नहीं होता है तो कमजोर व्यक्ति के लिए मुश्किलें खड़ी होने लगती हैं जिससे कभी-कभी वे तनाव की स्थिति में भी आ जाते हैं। बुलिंग कई प्रकार की हो सकती है जिसका शिकार अधिकतर ना केवल बच्चे अपितु अन्य अनेक बड़े लोग (विशेषत: महिलाएं) भी आसानी से हो जाते हैं। सोशल मीडिया के इस दौर में बुली होना आम हो गया है। गली मोहल्ले, ऑफिस या स्कूल में भी इस प्रकार की घटनाएं अक्सर घटित होती रहती हैं। आज के हमारे इस आलेख में हम बच्चों से संबंधित बूलिंग के बारे में कुछ जानकारियां साझा करेंगे। हम में से अधिकतर लोग बुलीइंग क्या होती है, से भली भांति परिचित हैं। किंतु कभी-कभी ऐसा होता है कि सब कुछ जानने के पश्चात भी हम स्थिति से अवगत नहीं हो पाते और समस्याएं विकराल रूप धारण कर लेती हैं। बच्चों के संदर्भ में यदि बात की जाए तो अक्सर हमारे बच्चे स्कूल और कोचिंग एकेडमी, या ट्यूशन सेंटर्स में इसका शिकार होते हैं और संकोचवश या यूं कहें डर के मारे बच्चे अपनी बात आसानी से किसी से कह भी नहीं पाते, किसी के साथ शेयर भी नहीं कर पाते। ऐसा होने पर समस्याएं बढ़ने लगती हैं और कभी-कभी उनका परिणाम बहुत ही घातक सिद्ध होता है। विद्यालय में अक्सर सीनियर या ताकतवर बच्चे अपने से छोटी कक्षाओं के बच्चों को डराते हैं धमकाते हैं और उन पर हुकूमत जमाते हैं। कमजोर और जूनियर्स अक्सर बुलिंग का शिकार होते हैं, उनके बड़े उनको दबाते रहते हैं और वे चाहकर भी उनके खिलाफ कुछ नहीं कर पाते हैं। ऐसी स्थिति में वे खुद को और भी अधिक बेबस और कमजोर महसूस करते हैं और अपनी इसी बेबसी के चलते वे शर्मिंदा भी होते हैं जिस की वजह से वे अपनी समस्या किसी के साथ साझा नहीं कर पाते। यहां तक कि कभी-कभी वे माता-पिता से भी अपने मन की बात नहीं कर पाते क्योंकि उनके दिल में एक प्रकार का अनदेखा सा डर बैठ चुका होता है और उस डर के कारण ही वे सदैव, असुरक्षित, डरे-डरे और सहमे-सहमे से रहते हैं। सोशल मीडिया के इस युग में बुलिंग की समस्या और भी खराब और भयंकर रूप लेती जा रही है जिस पर लगाम कसी जानी अति आवश्यक है। कभी-कभी बुलिंग इस कदर बच्चों को परेशान कर डालती है कि बच्चे अपना आत्मविश्वास खो बैठते हैं और कभी-कभी तो वे अपनी जीवन लीला ही समाप्त कर लेते हैं जो कि अत्यधिक दर्दनाक है। अपने मन की कमजोरी के चलते वे किसी के समक्ष स्थिति को स्पष्ट नहीं कर पाते और असमंजस का शिकार होने लगते हैं। इसी असमंजसता की स्थिति का सामना जब वे नहीं कर पाते तो उनके कदम गलत दिशा में उठने लगते हैं। माता-पिता के प्रति उनका विश्वास खत्म होने लगता है और जो नहीं होना चाहिए उनके साथ फिर वही होता है। गली मोहल्ले या पार्क में भी अक्सर इसी प्रकार की स्थितियां देखने को मिल जाती है। बुलिंग का उम्र से कोई लेना देना नहीं होता छोटे से छोटे बच्चे से लेकर बड़ी उम्र के लोगों तक में यह स्थिति देखने को मिल सकती है। अक्सर बड़े बुजुर्ग भी बुलिंग का शिकार होते हैं और अपनी सहायता के लिए वे किसी के पास भी जाने में संकोच का अनुभव करते हैं जिसकी वजह से स्थिति और अधिक बिगड़ने लगती है और अनियंत्रित हो जाती है। महिलाएं भी बुलिंग से पीछे नहीं हैं, महिलाओं को अक्सर सोशल मीडिया पर बुलिंग का शिकार होते देखा जाता है। प्रतिदिन अखबारों, समाचार पत्रों और मैगजींस में इस तरह की खबरें आती रहती हैं जिसमें कहीं ना कहीं महिलाओं के साथ बुलिंग की घटनाएं घटित होती दिखाई बताई गईं होती हैं और जिसके फलस्वरूप महिलाएं या तो अवसाद में चली जाती हैं अथवा आत्महत्या का शिकार होने लगती हैं। बुलिंग का शिकार होने वाले लोगों का आंकड़ा दिन-प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा है। पिछले कुछ वर्षों का रिकार्ड उठाकर देखा जाए तो बुलिंग संबंधी समस्याएं पहले से बढ़ी ही हैं। बुलिंग की समस्या पर यथासंभव नियंत्रण पाने के लिए सबसे अहम और महत्वपूर्ण भूमिका माता-पिता की होती है। माता-पिता को अपने बच्चों पर विश्वास कायम रखना चाहिए और अपने बच्चों को घर से बाहर निकलने से पहले भली प्रकार समझाना चाहिए कि किसी भी प्रकार की अनहोनी की स्थिति में वे सबसे पहले अपनी अंतर्निहित शक्तियों का प्रयोग करेंगे, गलत के समक्ष नहीं झुकेंगे और सदैव सही का साथ देते हुए अपने मन की हर बात उनसे साझा करेंगे, कभी हिचकिचाएंगे नहीं और संकोच का अनुभव ना करते हुए स्थिति को जस के तस स्पष्ट करेंगे । बच्चों के मन में माता-पिता को यह भाव उत्पन्न करना चाहिए कि उनके माता-पिता का साथ उनके साथ सदैव है। वे उन्हें किसी भी मुश्किल स्थिति में नहीं रहने देंगे और यदि कभी कोई समस्या आ भी जाएगी तो उसको वे बाहर निकाल लेंगे। इतना विश्वास जब बच्चों का अपने माता-पिता के प्रति होने लगेगा तो निसंदेह बुलिंग जैसी समस्याएं भी हमारे बच्चों का कुछ नहीं बिगाड़ पाएंगी, इसके विपरीत बच्चे खुद को पहले से कहीं अधिक आत्मविश्वासी और सक्षम तथा सशक्त महसूस करने लगेंगे और विभिन्न स्थितियों में भी स्वयं को ताकवर महसूस कर समक्ष खड़ी स्थितियों का सामना डट कर कर पाएंगे। यह सत्य है कि आज के भागदौड़ भरे जीवन में हम सभी की जिंदगी में बहुत अधिक उलझ गई हैं किसी के पास किसी के लिए समय ही नहीं है किंतु ऐसी स्थिति में भी अपने मूल्यवान समय से कुछ समय निकालकर अपने बच्चों के साथ व्यतीत करना चाहिए, उनके मन की बात जानने का प्रयास करना चाहिए और उन्हें यह एहसास करवाना चाहिए कि आप हर पल, हर क्षण, हर प्रकार की स्थिति में उनके साथ हैं और कभी उन्हें धोखा नहीं देंगे। गलती होने की स्थिति में भी आप उन्हें भली प्रकार समझाएंगे और उनका साथ देंगे ना कि उनकी छोटी-छोटी गलतियों पर उन्हें डांट फटकार लगाएंगे। अभिभावकों और माता-पिता का फर्ज बनता है कि वे अपने बच्चों से खुलकर बात करें, उन्हें बुलिंग का अर्थ समझाएं और सदैव सतर्क रहने के लिए कहें। बच्चों को समझाया जाए कि गलत के प्रति वे अपनी आवाज बुलंद करें, अन्याय को सहन ना करें और मजबूती से no कहने की आदत को खुद में विकसित करें। अपने बच्चों को साइबर सिक्योरिटी संबंधित नियमों और प्रावधानों से भली प्रकार अवगत कराएं ताकि किसी मुश्किल और अवांछित स्थिति और प्रतिकूल समय में यदि वे आप तक ना भी पहुंच पाएं तो इस प्रकार की सुविधाओं का लाभ उठाकर वे अपनी रक्षा स्वयं कर सकें। एक बार यदि सिर्फ एक बार आपके बच्चों के मन में आपके प्रति विश्वास उत्पन्न हो गया तो यकीन मानिए वे कभी भी बुलिंग जैसी समस्याओं का शिकार नहीं होंगे और यदि होंगे भी तो वे उस स्थिति का निपटारा स्वयं करने में सशक्तता का अनुभव करेंगे, और अपने मन की हर छोटी बड़ी बात भी आपसे जरूर साझा करेंगे और फिर इस प्रकार की समस्याएं खुद-ब-खुद दूर होकर खत्म होने लगेंगी। बच्चे हमारे हैं तो निसंदेह हम सभी की जिम्मेदारी बनती है कि हम अपने बच्चों को सचेत बनाएं, सावधान बनाएं और जागरूक बनाएं ताकि कोई भी उन्हें कमजोर समझ कर स्थिति का फायदा उठाने की सोच तक ना सके। अपनी इस जिम्मेदारी का पूर्ण ईमानदारी एवं दृढ़ता से निर्वाह करें और अपने बच्चों को सुरक्षित रखने के साथ-साथ एक स्वस्थ और सुरक्षित समाज के निर्माण की नींव को मजबूत करने में भी अपना यथासंभव योगदान देने का प्रयास करें। याद रहे, सुरक्षित समाज ही एक स्वस्थ समाज की कल्पना को साकार कर सकता है। ******

  • बाज की सीख

    एक समय की बात है, एक बहेलिया जंगल में पक्षियों का शिकार करने गया। बहेलिया ने दाना डाला और जाल बिछाकर पक्षियों के जाल में फंसने का इंतजार करने लगा। बहुत प्रयास करने के बाद बहेलिये ने जाल में एक बाज पकड़ लिया। बहेलिया जब बाज को बेचने के लिए बाजार की ओर जाने लगा तब रास्ते में बाज ने बहेलिया से कहा, “तुम मुझे लेकर क्यों जा रहे हो?” बहेलिया बोला, “मैं तुम्हें मारकर तुम्हारा गोश्त बाजार में बेच दूंगा।” बाज बहुत डर गया, उसने सोचा कि अब तो मेरी मृत्यु निश्चित है। बाज कुछ देर यूँ ही शांत रहा और फिर कुछ सोचकर शिकारी से बोला, “देखो भाई, मुझे जितना जीवन जीना था वह तो मैंने जी लिया और अब मेरा अंतिम समय आ गया है, लेकिन मरने से पहले मेरी एक अंतिम इच्छा है। जिसे मैं पूरी करना चाहता हूं।” “बताओ अपनी इच्छा, बताओ?”, बहेलिया ने बड़ी ही उत्सुकता से पूछा। बाज ने बताना शुरू किया - मरने से पहले मैं तुम्हें दो सीख देना चाहता हूँ, जो कि तुम्हारे जीवन में बहुत काम आएंगी, इसे तुम ध्यान से सुनना और सदा याद रखना। पहली सीख तो यह कि किसी की बातों का बिना प्रमाण व बिना सोचे-समझे विश्वास मत करना। दूसरी यह कि यदि तुम्हारे साथ कुछ बुरा हो, तुम्हारे हाथ से कुछ छूट जाए या तुम्हारा कोई बड़ा नुकसान हो जाए तो उसके लिए कभी दुखी मत होना। बहेलिया ने बाज की बात सुनी और अपने रास्ते आगे बढ़ता रहा। कुछ समय बाद बाज ने बहेलिया से कहा, “बहेलिया, एक बात बताओ, अगर मैं तुम्हें कोई ऐसी वस्तु दे दूं जिससे कि तुम रातों रात बहुत अमीर व्यक्ति बन जाओ तो क्या तुम मुझे अपने चंगुल से आजाद कर दोगे?” बहेलिया फ़ौरन रुका और बोला, “क्या है वो चीज, जल्दी बताओ, हां यदि तुम मुझे ऐसी वस्तु देते हो तो मैं तुझे आजाद कर दूंगा?” बाज बोला, “ दरअसल, बहुत पहले मुझे राजमहल के करीब एक हीरा मिला था, जिसे उठा कर मैंने एक गुप्त स्थान पर रख दिया था। वह हीरा अत्यंत मूल्यवान है। अगर आज मैं मर जाऊँगा तो वो हीरा ऐसे ही बेकार चला जाएगा, इसलिए मैंने सोचा कि अगर तुम उसके बदले मुझे छोड़ दो तो मेरी जान भी बच जायेगी और तुम्हारी गरीबी भी हमेशा के लिए मिट जायेगी।” यह सुनते ही बहेलिया ने बिना कुछ सोचे समझे बाज को आजाद कर दिया और हीरा लेकर आने को कहा। बाज तुरंत उड़ कर नजदीक के पेड़ की एक ऊँची साखा पर जा बैठा और बोला, “कुछ देर पहले ही मैंने तुम्हें एक सीख दी थी कि किसी की भी बातों का तुरंत विश्वास मत करना लेकिन तुमने उस सीख का पालन नही किया। दरअसल, मेरे पास कोई हीरा वीरा नहीं है और अब मैं तुम्हारे बंधन से मुक्त हो गया हूँ।” यह सुनते ही बहेलिया मायूस हो गया और अपनी गलती पर पछताने लगा, तभी बाज फिर बोला, तुम मेरी दूसरी सीख भी भूल गए कि अगर तुम्हारे साथ कुछ बुरा हो तो उसके लिए तुम कभी पछतावा मत करना। सार - हमें किसी अनजान व्यक्ति पर आसानी से विश्वास नहीं करना चाहिए और किसी प्रकार का नुक्सान होने या असफलता मिलने पर दुखी भी नहीं होना चाहिए, बल्कि उस बात से सीख लेकर भविष्य में सतर्क रहना चाहिए। ******

  • असली मदद

    मैं कईं दिनों से बेरोजगार था, एक एक रूपये की कीमत जैसे करोड़ों लग रही थी, इस उठापटक में था कि कहीं नौकरी लग जाए। आज एक इंटरव्यू था, पर दूसरे शहर जाने के लिए जेब में सिर्फ दस रूपये थे। मुझे कम से कम दो सौ रुपयों की जरूरत थी। अपने इकलौते इन्टरव्यू वाले कपड़े रात में धो, पड़ोसी की प्रेस माँग के तैयार कर पहन, अपने योग्यताओं की मोटी फाइल बगल में दबाकर, दो बिस्कुट खा के निकला। लिफ्ट ले, पैदल जैसे तैसे चिलचिलाती धूप में तरबतर बस! इस उम्मीद में स्टेंड पर पहुँचा कि शायद कोई पहचान वाला मिल जाए, जिससे सहायता लेकर इन्टरव्यू के स्थान तक पहुँच सकूँ। काफी देर खड़े रहने के बाद भी कोई नहीं दिखा। मन में घबराहट और मायूसी थी, क्या करूँगा अब कैसे पहुँचूगा? पास के मंदिर पर जा पहुंचा, दर्शन कर सीढ़ियों पर बैठा था। मेरे पास में ही एक भिखारी बैठा था, उसके कटोरे में मेरी जेब और बैंक एकाउंट से भी ज्यादा पैसे पड़े थे। मेरी नजरें और हालात समझ के बोला, "कुछ मदद चाहिए क्या?" मैं बनावटी मुस्कुराहट के साथ बोला, "आप क्या मदद करोगे?" "चाहो तो मेरे पूरे पैसे रख लो" वो मुस्कुराता बोला, मैं चौंक गया!! उसे कैसे पता मेरी जरूरत! मैनें कहा "क्यों"...? "शायद आपको जरूरत है" वो गंभीरता से बोला। "हाँ है तो, पर तुम्हारा क्या, तुम तो दिन भर माँग के कमाते हो?" मैने उस का पक्ष रखते हुए कहा। वो हँसता हुआ बोला, "मैं नहीं माँगता साहब, लोग डाल जाते हैं मेरे कटोरे में, पुण्य कमाने के लिए। मैं तो भिखारी हूँ, मुझे इनका कोई मोह नहीं। मुझे सिर्फ भूख लगती है, वो भी एक टाइम और कुछ दवाइयाँ। बस! "मैं तो खुद ये सारे पैसे मंदिर की पेटी में डाल देता हूँ।" वो सहज था कहते कहते। मैनें हैरानी से पूछा, "फिर यहाँ बैठते क्यों हो..?" "जरूरतमंदों की मदद करने!!" कहते हुए वो मंद मंद मुस्कुरा रहा था। मैं उसका मुँह देखता रह गया। उसने दो सौ रुपये मेरे हाथ पर रख दिए और बोला, "जब हो तब लौटा देना।" मैं उसका धन्यवाद जताता हुआ वहाँ से अपने गंतव्य तक पहुँचा। मेरा इंटरव्यू हुआ और सलेक्शन भी। मैं खुशी खुशी वापस आया, सोचा उस भिखारी को धन्यवाद दे दूँ। मैं मंदिर पहुँचा, बाहर सीढ़़ियों पर भीड़ लगी थी, मैं घुस के अंदर पहुँचा, देखा वही भिखारी मरा पड़ा था। मैं भौंचक्का रह गया। मैने दूसरों से पूछा यह कैसे हुआ? पता चला, वो किसी बीमारी से परेशान था। सिर्फ दवाईयों पर जिन्दा था। आज उसके पास दवाइयाँ नहीं थी और न उन्हें खरीदने के पैसे। मैं अवाक सा उस भिखारी को देख रहा था। अपनी दवाईयों के पैसे वो मुझे दे गया था। जिन पैसों पे उसकी जिंदगी का दारोमदार था, उन पैसों से मेरी ज़िंदगी बना दी थी। भीड़ में से कोई बोला, अच्छा हुआ मर गया। ये भिखारी भी साले बोझ होते हैं, कोई काम के नहीं। मेरी आँखें डबडबा आयी। वो भिखारी कहाँ था, वो तो मेरे लिए भगवान ही था। नेकी का फरिश्ता। मेरा भगवान। मित्रों, हममें से कोई नहीं जानता कि भगवान कौन हैं और कहाँ हैं? किसने देखा है भगवान को? बस इसी तरह मिल जाते हैं। *********

  • नाग-पूजा

    प्रात:काल था। आषढ़ का पहला दौंगड़ा निकल गया था। कीट-पतंग चारों तरफ रेंगते दिखायी देते थे। तिलोत्तमा ने वाटिका की ओर देखा तो वृक्ष और पौधे ऐसे निखर गये थे जैसे साबुन से मैने कपड़े निखर जाते हैं। उन पर एक विचित्र आध्यात्मिक शोभा छायी हुई थी मानों योगीवर आनंद में मग्न पड़े हों। चिड़ियों में असाधारण चंचलता थी। डाल-डाल, पात-पात चहकती फिरती थीं। तिलोत्तमा बाग में निकल आयी। वह भी इन्हीं पक्षियों की भॉँति चंचल हो गयी थी। कभी किसी पौधे की देखती, कभी किसी फूल पर पड़ी हुई जल की बूँदो को हिलाकर अपने मुँह पर उनके शीतल छींटे डालती। लाज बीरबहूटियॉँ रेंग रही थी। वह उन्हें चुनकर हथेली पर रखने लगी। सहसा उसे एक काला वृहत्काय सॉँप रेंगता दिखायी-दिया। उसने पिल्लाकर कहा—अम्मॉँ, नागजी जा रहे हैं। लाओ थोड़ा-सा दूध उनके लिए कटोरे में रख दूं। अम्मॉँ ने कहा—जाने दो बेटी, हवा खाने निकले होंगे। तिलोत्तमा—गर्मियों में कहॉँ चले जाते हैं ? दिखायी नहीं देते। मॉँ—कहीं जाते नहीं बेटी, अपनी बॉँबी में पड़े रहते हैं। तिलोत्तमा—और कहीं नहीं जाते ? मॉँ—बेटी, हमारे देवता है और कहीं क्यों जायेगें ? तुम्हारे जन्म के साल से ये बराबर यही दिखायी देतें हैं। किसी से नही बोलते। बच्चा पास से निकल जाय, पर जरा भी नहीं ताकते। आज तक कोई चुहिया भी नहीं पकड़ी। तिलोत्तमा—तो खाते क्या होंगे ? मॉँ—बेटी, यह लोग हवा पर रहते हैं। इसी से इनकी आत्मा दिव्य हो जाती है। अपने पूर्वजन्म की बातें इन्हें याद रहती हैं। आनेवाली बातों को भी जानते हैं। कोई बड़ा योगी जब अहंकार करने लगता है तो उसे दंडस्वरुप इस योनि में जन्म लेना पड़ता है। जब तक प्रायश्चित पूरा नहीं होता तब तक वह इस योनि में रहता है। कोई-कोई तो सौ-सौ, दो-दो सौं वर्ष तक जीते रहते हैं। तिलोत्तमा—इसकी पूजा न करो तो क्या करें। मॉँ—बेटी, कैसी बच्चों की-सी बातें करती हो। नाराज हो जायँ तो सिर पर न जाने क्या विपत्ति आ पड़े। तेरे जन्म के साल पहले-पहल दिखायी दिये थे। तब से साल में दस-पॉँच बार अवश्य दर्शन दे जाते हैं। इनका ऐसा प्रभाव है कि आज तक किसी के सिर में दर्द तक नहीं हुआ। २ कई वर्ष हो गये। तिलोत्तमा बालिका से युवती हुई। विवाह का शुभ अवसर आ पहुँचा। बारात आयी, विवाह हुआ, तिलोत्तमा के पति-गृह जाने का मुहूर्त आ पहुँचा। नयी वधू का श्रृंगार हो रहा था। भीतर-बाहर हलचल मची हुई थी, ऐसा जान पड़ता था भगदड़ पड़ी हुई है। तिलोत्तमा के ह्रदय में वियोग दु:ख की तरंगे उठ रही हैं। वह एकांत में बैठकर रोना चाहती है। आज माता-पिता, भाईबंद, सखियॉँ-सहेलियॉँ सब छूट जायेगी। फिर मालूम नहीं कब मिलने का संयोग हो। न जाने अब कैसे आदमियों से पाला पड़ेगा। न जाने उनका स्वभाव कैसा होगा। न जाने कैसा बर्ताव करेंगे। अममाँ की ऑंखें एक क्षण भी न थमेंगी। मैं एक दिन के लिए कही, चली जाती थी तो वे रो-रोकर व्यथित हो जाती थी। अब यह जीवनपर्यन्त का वियोग कैसे सहेंगी ? उनके सिर में दर्द होता था जब तक मैं धीरे-धीरे न मलूँ, उन्हें किसी तरह कल-चैन ही न पड़ती थी। बाबूजी को पान बनाकर कौन देगा ? मैं जब तक उनका भोजन न बनाऊँ, उन्हें कोई चीज रुचती ही न थी? अब उनका भोजन कौन बानयेगा ? मुझसे इनको देखे बिना कैसे रहा जायगा? यहॉँ जरा सिर में दर्द भी होता था तो अम्मॉं और बाबूजी घबरा जाते थे। तुरंत बैद-हकीम आ जाते थे। वहॉँ न जाने क्या हाल होगा। भगवान् बंद घर में कैसे रहा जायगा ? न जाने वहॉँ खुली छत है या नहीं। होगी भी तो मुझे कौन सोने देगा ? भीतर घुट-घुट कर मरुँगी। जगने में जरा देर हो जायगी तो ताने मिलेंगे। यहॉँ सुबह को कोई जगाता था, तो अम्मॉँ कहती थीं, सोने दो। कच्ची नींद जाग जायगी तो सिर में पीड़ा होने लगेगी। वहॉँ व्यंग सुनने पड़ेंगे, बहू आलसी है, दिन भर खाट पर पड़ी रहती है। वे (पति) तो बहुत सुशील मालूम होते हैं। हॉँ, कुछ अभिमान अवश्य हैं। कहों उनका स्वाभाव निठुर हुआ तो............? सहसा उनकी माता ने आकर कहा-बेटी, तुमसे एक बात कहने की याद न रही। वहॉं नाग-पूजा अवश्य करती रहना। घर के और लोग चाहे मना करें; पर तुम इसे अपना कर्तव्य समझना। अभी मेरी ऑंखें जरा-जरा झपक गयी थीं। नाग बाबा ने स्वप्न में दर्शन दिये। तिलोत्तमा—अम्मॉँ, मुझे भी उनके दर्शन हुए हैं, पर मुझे तो उन्होंले बड़ा विकाल रुप दिखाया। बड़ा भंयंकर स्वप्न था। मॉँ—देखना, तुम्हारे धर में कोई सॉँप न मारने पाये। यह मंत्र नित्य पास रखना। तिलोत्तमा अभी कुछ जवाब न देने पायी थी कि अचानक बारात की ओर से रोने के शब्द सुनायी दिये, एक क्षण में हाहाकर मच गया। भंयकर शोक-घटना हो गयी। वर को सौंप ने काट लिया। वह बहू को बिदा कराने आ रहा था। पालकी में मसनद के नीचे एक काला साँप छिपा हुआ था। वर ज्यों ही पालकी में बैठा, साँप ने काट लिया। चारों ओर कुहराम मच गया। तिलात्तमा पर तो मनों वज्रपात हो गया। उसकी मॉँ सिर पीट-पीट रोने लगी। उसके पिता बाबू जगदीशचंद्र मूर्च्छित होकर गिर पड़े। ह्रदयरोग से पहले ही से ग्रस्त थे। झाड़-फूँक करने वाले आये, डाक्टर बुलाये गये, पर विष घातक था। जरा देर में वर के होंठ नीले पड़ गये, नख काले हो गये, मूर्छा आने लगी। देखते-देखते शरीर ठंडा पड़ गया। इधर उषा की लालिमा ने प्रकृति को अलोकित किया, उधर टिमटिमाता हुआ दीपक बुझ गया। जैसे कोई मनुष्य बोरों से लदी हुई नाव पर बैठा हुआ मन में झुँझलाता है कि यह और तेज क्यों नहीं चलती , कहीं आराम से बैठने की जगह नहीं, राह इतनी हिल क्यों रही हैं, मैं व्यर्थ ही इसमें बैठा; पर अकस्मात् नाव को भँवर में पड़ते देख कर उसके मस्तूल से चिपट जाता है, वही दशा तिलोत्तमा की हुई। अभी तक वह वियोगी दु:ख में ही मग्न थी, ससुराल के कष्टों और दुर्व्यवस्थाओं की चिंताओं में पड़ी हुई थी। पर, अब उसे होश आया की इस नाव के साथ मैं भी डूब रही हूँ। एक क्षण पहले वह कदाचित् जिस पुरुष पर झुँझला रही थी, जिसे लुटेरा और डाकू समझ रही थी, वह अब कितना प्यारा था। उसके बिना अब जीवन एक दीपक था; बुझा हुआ। एक वृक्ष था; फल-फूल विहीन। अभी एक क्षण पहले वह दूसरों की इर्ष्या का कारण थी, अब दया और करुणा की। थोड़े ही दिनों में उसे ज्ञात हो गया कि मैं पति-विहीन होकर संसार के सब सुखों से वंचित हो गयी। ३ एक वर्ष बीत गया। जगदीशचंद्र पक्के धर्मावलम्बी आदमी थे, पर तिलोत्तमा का वैधव्य उनसे न सहा गया। उन्होंने तिलोत्तमा के पुनर्विवाह का निश्चय कर लिया। हँसनेवालों ने तालियॉँ बाजायीं पर जगदीश बाबू ने हृदय से काम लिया। तिलात्तमा पर सारा घर जान देता था। उसकी इच्छा के विरुद्ध कोई बात न होने पाती यहॉँ तक कि वह घर की मालकिन बना दी गई थी। सभी ध्यान रखते कि उसकी रंज ताजा न होने पाये। लेकिन उसके चेहरे पर उदासी छायी रहती थी, जिसे देख कर लोगों को दु:ख होता था। पहले तो मॉँ भी इस सामाजिक अत्याचार पर सहमत न हुई; लेकिन बिरादरीवालों का विरोध ज्यों-ज्यों बढ़ता गया उसका विरोध ढीला पड़ता गया। सिद्धांत रुप से तो प्राय: किसी को आपत्ति न थी किन्तु उसे व्यवहार में लाने का साहस किसी में न था। कई महीनों के लगातार प्रयास के बाद एक कुलीन सिद्धांतवादी, सुशिक्षित वर मिला। उसके घरवाले भी राजी हो गये। तिलोत्तमा को समाज में अपना नाम बिकते देख कर दु:ख होता था। वह मन में कुढ़ती थी कि पिताजी नाहक मेरे लिए समाज में नक्कू बन रहे हैं। अगर मेरे भाग्य में सुहाग लिखा होता तो यह वज्र ही क्यों गिरता। तो उसे कभी-कभी ऐसी शंका होती थी कि मैं फिर विधवा हो जाऊँगी। जब विवाह निश्चित हो गया और वर की तस्वीर उसके सामने आयी तो उसकी ऑंखों में ऑंसू भर आये। चेहरे से कितनी सज्जनता, कितनी दृढ़ता, कितनी विचारशीलता टपकती थी। वह चित्र को लिए हुए माता के पास गयी और शर्म से सिर झुकाकर बोली-अम्मॉं, मुँह मुझे तो न खोलना चाहिए, पर अवस्था ऐसी आ पड़ी है कि बिना मुँह खोले रहा नहीं जाता। आप बाबूजी को मना कर दें। मैं जिस दशा में हूँ संतुष्ट हूँ। मुझे ऐसा भय हो रहा है कि अबकी फिर वही शोक घटना............. मॉँ ने सहमी हुई ऑंखों से देख कर कहा—बेटी कैसी अशगुन की बात मुँह से निकाल रही हो। तुम्हारे मन में भय समा गया है, इसी से यह भ्रम होता है। जो होनी थी, वह हो चुकी। अब क्या ईश्वर क्या तुम्हारे पीछे पड़े ही रहेंगे ? तिलोत्तमा—हॉँ, मुझे तो ऐसा मालूम होता है ? मॉँ—क्यों, तुम्हें ऐसी शंका क्यों होती है ? तिलोत्तमा—न जाने क्यो ? कोई मेरे मन मे बैठा हुआ कह रहा है कि फिर अनिष्ट होगा। मैं प्रया: नित्य डरावने स्वप्न देखा करती हूँ। रात को मुझे ऐसा जान पड़ता है कि कोई प्राणी जिसकी सूरत सॉँप से बहुत मिलती-जुलती है मेरी चारपाई के चारों ओर घूमता है। मैं भय के मारे चुप्पी साध लेती हूँ। किसी से कुछ कहती नहीं। मॉँ ने समझा यह सब भ्रम है। विवाह की तिथि नियत हो गयी। यह केवल तिलोत्तमा का पुनर्संस्कार न था, बल्कि समाज-सुधार का एक क्रियात्मक उदाहरण था। समाज-सुधारकों के दल दूर से विवाह सम्मिलित होने के लिए आने लगे, विवाह वैदिक रीति से हुआ। मेहमानों ने खूब वयाख्यान दिये। पत्रों ने खूब आलोचनाऍं कीं। बाबू जगदीशचंद्र के नैतिक साहस की सराहना होने लगी। तीसरे दिन बहू के विदा होने का मुहूर्त था। जनवासे में यथासाध्य रक्षा के सभी साधनों से काम लिया गया था। बिजली की रोशनी से सारा जनवास दिन-सा हो गया था। भूमि पर रेंगती हुई चींटी भी दिखाई देती थी। केशों में न कहीं शिकन थी, न सिलवट और न झोल। शामियाने के चारों तरफ कनातें खड़ी कर दी गयी थी। किसी तरफ से कीड़ो-मकोड़ों के आने की संम्भावना न थी; पर भावी प्रबल होती है। प्रात:काल के चार बजे थे। तारागणों की बारात विदा हो रही थी। बहू की विदाई की तैयारी हो रही थी। एक तरफ शहनाइयॉँ बज रही थी। दूसरी तरफ विलाप की आर्त्तध्वनि उठ रही थी। पर तिलोत्तमा की ऑंखों में ऑंसू न थे, समय नाजुक था। वह किसी तरह घर से बाहर निकल जाना चाहती थी। उसके सिर पर तलवार लटक रही थी। रोने और सहेलियों से गले मिलने में कोई आनंद न था। जिस प्राणी का फोड़ा चिलक रहा हो उसे जर्राह का घर बाग में सैर करने से ज्यादा अच्छा लगे, तो क्या आश्चर्य है। वर को लोगों ने जगया। बाजा बजने लगा। वह पालकी में बैठने को चला कि वधू को विदा करा लाये। पर जूते में पैर डाला ही था कि चीख मार कर पैर खींच लिया। मालूम हुआ, पॉँव चिनगारियों पर पड़ गया। देखा तो एक काला साँप जूते में से निकलकर रेंगता चला जाता था। देखते-देखते गायब हो गया। वर ने एक सर्द आह भरी और बैठ गया। ऑंखों में अंधेरा छा गया। एक क्षण में सारे जनवासे में खबर फैली गयी, लोग दौड़ पड़े। औषधियॉँ पहले ही रख ली गयी थीं। सॉँप का मंत्र जाननेवाले कई आदमी बुला लिये गये थे। सभी ने दवाइयॉँ दीं। झाड़-फूँक शुरु हुई। औषधियॉँ भी दी गयी, पर काल के समान किसी का वश न चला। शायद मौत सॉँप का वेश धर कर आयी थी। तिलोत्तमा ने सुना तो सिर पीट लिया। वह विकल होकर जनवासे की तरफ दौड़ी। चादर ओढ़ने की भी सुधि न रही। वह अपने पति के चरणों को माथे से लगाकर अपना जन्म सफल करना चाहती थी। घर की स्त्रियों ने रोका। माता भी रो-रोकर समझाने लगी। लेकिन बाबू जगदीशचन्द्र ने कहा-कोई हरज नहीं, जाने दो। पति का दर्शन तो कर ले। यह अभिलाषा क्यों रह जाय। उसी शोकान्वित दशा में तिलोत्तमा जनवासे में पहुँची, पर वहॉँ उसकी तस्कीन के लिए मरनेवाले की उल्टी सॉँसें थी। उन अधखुले नेत्रों में असह्य आत्मवेदना और दारुण नैराश्य। ४ इस अद्भुत घटना का सामाचार दूर-दूर तक फैल गया। जड़वादोगण चकित थे, यह क्या माजरा है। आत्मवाद के भक्त ज्ञातभाव से सिर हिलाते थे मानों वे चित्रकालदर्शी हैं। जगदीशचन्द्र ने नसीब ठोंक लिया। निश्चय हो गया कि कन्या के भाग्य में विधवा रहना ही लिखा है। नाग की पूजा साल में दो बार होने लगी। तिलोत्तमा के चरित्र में भी एक विशेष अंतर दीखने लगा। भोग और विहार के दिन भक्ति और देवाराधना में कटने लगे। निराश प्राणियों का यही अवलम्ब है। तीन साल बीत थे कि ढाका विश्वविद्यालय के अध्यापक ने इस किस्से को फिर ताजा किया। वे पशु-शास्त्र के ज्ञाता थे। उन्होंने साँपों के आचार-व्यवहार का विशेष रीति से अध्ययन किया। वे इस रहस्य को खोलना चाहते थे। जगदीशचंद्र को विवाह का संदेश भेजा। उन्होंने टाल-मटोल किया। दयाराम ने और भी आग्रह किया। लिखा, मैने वैज्ञानिक अन्वेषण के लिए यह निश्चय किया है। मैं इस विषधर नाग से लड़ना चाहता हूँ। वह अगर सौ दॉँत ले कर आये तो भी मुझे कोई हानि नहीं पहुँचा सकता, वह मुझे काट कर आप ही मर जायेगा। अगर वह मुझे काट भी ले तो मेरे पास ऐसे मंत्र और औषधियॉँ है कि मैं एक क्षण में उसके विष को उतार सकता हूँ। आप इस विषय में कुछ चिंता न किजिए। मैं विष के लिए अजेय हूँ। जगदशीचंद्र को अब कोई उज्र न सूझा। हॉँ, उन्होंने एक विशेष प्रयत्न यह किया कि ढाके में ही विवाह हो। अतएब वे अपने कुटुम्बियों को साथ ले कर विवाह के एक सप्ताह पहले गये। चलतेसमय अपने संदूक, बिस्तर आदि खूब देखभाल कर रखे कि सॉँप कहीं उनमें उनमें छिप कर न बैठा जाय। शुभ लगन में विवाह-संस्कार हो गया। तिलोत्तमा विकल हो रही थी। मुख पर एक रंग आता था, एक रंग जाता था, पर संस्कार में कोई विध्न-बाधा न पड़ी। तिलोत्तमा रो धो-कर ससुराल गयी। जगदीशचंद्र घर लौट आये, पर ऐसे चिंतित थे जैसे कोई आदमी सराय मे खुला हुआ संदूक छोड़ कर बाजार चला जाय। तिलोत्तमा के स्वभाव में अब एक विचित्र रुपांतर हुआ। वह औरों से हँसती-बोलती आराम से खाती-पीती सैर करने जाती, थियेटरों और अन्य सामाजिक सम्मेलनों में शरीक होती। इन अवसरों पर प्रोफेसर दया राम से भी बड़े प्रेम का व्यवहार करती, उनके आराम का बहुत ध्यान रखती। कोई काम उनकी इच्छा के विरुद्ध न करती। कोई अजनबी आदमी उसे देखकर कह सकता था, गृहिणी हो तो ऐसी हो। दूसरों की दृष्टि में इस दम्पत्ति का जीवन आदर्श था, किन्तु आंतरिक दशा कुछ और ही थी। उनके साथ शयनागार में जाते ही उसका मुख विकृत हो जाता, भौंहें तन जाती, माथे पर बल पड़ जाते, शरीर अग्नि की भॉँति जलने लगता, पलकें खुली रह जाती, नेत्रों से ज्वाला-सी निकलने लगती और उसमें से झुलसती हुई लपटें निकलती, मुख पर कालिमा छा जाती और यद्यपि स्वरुप में कोई विशेष अन्तर न दिखायी देखायी देता; पर न जाने क्यों भ्रम होने लगता, यह कोई नागिन है। कभी –कभी वह फुँकारने भी लगतीं। इस स्थिति में दयाराम को उनके समीप जाने या उससे कुछ बोलने की हिम्मत न पड़ती। वे उसके रुप-लावण्य पर मुग्ध थे, किन्तु इस अवस्था में उन्हें उससे घृणा होती। उसे इसी उन्माद के आवेग में छोड़ कर बाहर निकल आते। डाक्टरों से सलाह ली, स्वयं इस विषय की कितनी ही किताबों का अध्ययन किया; पर रहस्य कुछ समझ में न आया, उन्हें भौतिक विज्ञान में अपनी अल्पज्ञता स्वीकार करनी पड़ी। उन्हें अब अपना जीवन असह्य जान पड़ता। अपने दुस्साहस पर पछताते। नाहक इस विपत्ति में अपनी जान फँसायी। उन्हें शंका होने लगी कि अवश्य कोई प्रेत-लीला है ! मिथ्यावादी न थे, पर जहॉँ बुद्धि और तर्क का कुछ वश नहीं चलता, वहॉँ मनुष्य विवश होकर मिथ्यावादी हो जाता है। शनै:-शनै: उनकी यह हालत हो गयी कि सदैव तिलोत्तमा से सशंक रहते। उसका उन्माद, विकृत मुखाकृति उनके ध्यान से न उतरते। डर लगता कि कहीं यह मुझे मार न डाले। न जाने कब उन्माद का आवेग हो। यह चिन्ता ह्रदय को व्यथित किया करती। हिप्नाटिज्म, विद्युत्शक्ति और कई नये आरोग्यविधानों की परीक्षा की गयी । उन्हें हिप्नाटिज्म पर बहुत भरोसा था; लेकिन जब यह योग भी निष्फल हो गया तो वे निराश हो गये। ५ एक दिन प्रोफेसर दयाराम किसी वैज्ञनिक सम्मेलन में गए हुए थे। लौटे तो बारह बज गये थे। वर्षा के दिन थे। नौकर-चाकर सो रहे थे। वे तिलोत्तमा के शयनगृह में यह पूछने गये कि मेरा भोजन कहॉँ रखा है। अन्दर कदम रखा ही था कि तिलोत्तमा के सिरंहाने की ओर उन्हें एक अतिभीमकाय काला सॉँप बैठा हुआ दिखायी दिया। प्रो. साहब चुपके से लौट आये। अपने कमरे में जा कर किसी औषधि की एक खुराक पी और पिस्तौल तथा साँगा ले कर फिर तिलोत्तमा के कमरे में पहुँचे। विश्वास हो गया कि यह वही मेरा पुराना शत्रु है। इतने दिनों में टोह लगाता हुआ यहॉँ आ पहुँचा। पर इसे तिलोत्तामा से क्यों इतना स्नेह है। उसके सिरहने यों बैठा हुआ है मानो कोई रस्सी का टुकड़ा है। यह क्या रहस्य है! उन्होंने साँपों के विषय में बड़ी अदभूत कथाऍं पढ़ी और सुनी थी, पर ऐसी कुतूहलजनक घटना का उल्लेख कहीं न देखा था। वे इस भॉँति सशसत्र हो कर फिर कमरे में पहुँचे तो साँप का पात न था। हॉँ, तिलोत्तमा के सिर पर भूत सवार हो गया था। वह बैठी हुई आग्ये हुई नेत्रों के द्वारा की ओर ताक रही थी। उसके नयनों से ज्वाला निकल रही थी, जिसकी ऑंच दो गज तक लगती। इस समय उन्माद अतिशय प्रचंड था। दयाराम को देखते ही बिजली की तरह उन पर टूट पड़ी और हाथों से आघात करने के बदले उन्हें दॉँतों से काटने की चेष्टा करने लगी। इसके साथ ही अपने दोनों हाथ उनकी गरदन डाल दिये। दयाराम ने बहुतेरा चाहा, ऐड़ी-चोटी तक का जोर लगा कि अपना गला छुड़ा लें, लेकिन तिलोत्तमा का बाहुपाश प्रतिक्षण साँप की केड़ली की भॉँति कठोर एवं संकुचित होता जाता था। उधर यह संदेह था कि इसने मुझे काटा तो कदाचित् इसे जान से हाथ धोना पड़े। उन्होंने अभी जो औषधि पी थी, वह सर्प विष से अधिक घातक थी। इस दशा में उन्हें यह शोकमय विचार उत्पन्न हुआ। यह भी कोई जीवन है कि दम्पति का उत्तरदायित्व तो सब सिर पर सवार, उसका सुख नाम का नहीं, उलटे रात-दिन जान का खटका। यह क्या माया है। वह सॉँप कोई प्रेत तो नही है जो इसके सिर आकर यह दशा कर दिया करता है। कहते है कि ऐसी अवस्था में रोगी पर चोट की जाती है, वह प्रेत पर ही पड़ती हैं नीचे जातियों में इसके उदाहरण भी देखे हैं। वे इसी हैंसंबैस में पड़े हुए थे कि उनका दम घुटने लगा। तिलात्तमा के हाथ रस्सी के फंदे की भॉँति उनकी गरदन को कस रहे थें वे दीन असहाय भाव से इधर-उधर ताकने लगे। क्योंकर जान बचे, कोई उपाय न सूझ पड़ता था। साँस लेना। दुस्तर हो गया, देह शिथिल पड़ गयी, पैर थरथराने लगे। सहसा तिलोत्तमा ने उनके बाँहों की ओर मुँह बढ़ाया। दयाराम कॉँप उठे। मृत्यु ऑंखें के सामने नाचने लगी। मन में कहा—यह इस समय मेरी स्त्री नहीं विषैली भयंकर नागिन है: इसके विष से जान बचानी मुश्किल है। अपनी औषधि पर जो भरोसा था, वह जाता रहा। चूहा उन्मत्त दशा में काट लेता है तो जान के लाले पड़ जाते है। भगवान् ? कितन विकराल स्वरुप है ? प्रत्यक्ष नागिन मालूम हो रही है। अब उलटी पड़े या सीधी इस दशा का अंत करना ही पड़ेगा। उन्हें ऐसा जान पड़ा कि अब गिरा ही चाहता हूँ। तिलोत्तमा बार-बार सॉँप की भॉँति फुँकार मार कर जीभ निकालते हुए उनकी ओर झपटती थी। एकाएक वह बड़े कर्कश स्वर से बोली—‘मूर्ख ? तेरा इतना साहस कि तू इस सुदंरी से प्रेमलिंगन करे।’ यह कहकर वह बड़े वेग से काटने को दौड़ी। दयाराम का धैर्य जाता रहा। उन्होंने दहिना हाथ सीधा किया और तिलोत्तमा की छाती पर पिस्तौल चला दिया। तिलोत्तमा पर कुछ असर न हुआ। बाहें और भी कड़ी हो गयी; ऑंखों से चिनगारियॉँ निकलने लगी। दयाराम ने दूसरी गोली दाग दी। यह चोट पूरी पड़ी। तिलोत्तमा का बाहु-बंधन ढीला पड़ गया। एक क्षण में उसके हाथ नीचे को लटक गये, सिर झ्रुक गया और वह भूमि पर गिर पड़ी। तब वह दृश्य देखने में आया जिसका उदाहराण कदाचित् अलिफलैला चंद्रकांता में भी न मिले। वही फ्लँग के पास, जमीन पर एक काला दीर्घकाय सर्प पड़ा तड़प रहा था। उसकी छाती और मुँह से खून की धारा बह रही थी। दयाराम को अपनी ऑंखों पर विश्वास न आता था। यह कैसी अदभुत प्रेत-लीला थी! समस्या क्या है किससे पूछूँ ? इस तिलस्म को तोड़ने का प्रयत्न करना मेरे जीवन का एक कर्त्तव्य हो गया। उन्होंने सॉँगे से सॉँप की देह मे एक कोचा मारा और फिर वे उसे लटकाये हुए ऑंगन में लाये। बिलकुल बेदम हो गया था। उन्होंने उसे अपने कमरे में ले जाकर एक खाली संदूक में बंदकर दिया। उसमें भुस भरवा कर बरामदे में लटकाना चाहते थे। इतना बड़ा गेहुँवन साँप किसी ने न देखा होगा। तब वे तिलोत्तमा के पास गये। डर के मारे कमरे में कदम रखने की हिम्मत न पड़ती थी। हॉँ, इस विचार से कुछ तस्कीन होती थी कि सर्प प्रेत मर गया है तो उसकी जान बच गयी होगी। इस आशा और भय की दशा में वे अन्दर गये तो तिलोत्तमा आईने के सामने खड़ी केश सँवार रही थी। दयाराम को मानो चारों पदार्थ मिल गये। तिलोत्तमा का मुख-कमल खिला हुआ था। उन्होंने कभी उसे इतना प्रफुल्लित न देखा था। उन्हें देखते ही वह उनकी ओर प्रेम से चली और बोली—आज इतनी रात तक कहॉँ रहे ? दयाराम प्रेमोन्नत हो कर बोले—एक जलसे में चला गया था। तुम्हारी तबीयत कैसी हे ? कहीं दर्द नहीं है ? तिलोत्तमा ने उनको आश्चर्य से देख कर पूछा—तुम्हें कैसे मालूम हुआ ? मेरी छाती में ऐसा दर्द हो रहा है, जैस चिलक पड़ गयी हो। ***************

  • शंखनाद

    भानु चौधरी अपने गॉँव के मुखिया थे। गॉँव में उनका बड़ा मान था। दारोगा जी उन्हें टाटा बिना जमीन पर न बैठने देते। मुखिया साहब को ऐसी धाक बँधी हुई थी कि उनकी मर्जी बिना गॉँव में एक पत्ता भी नहीं हिल सकता था। कोई घटना, चाहे, वह सास-बहु का विवाद हो, चाहे मेड़ या खेत का झगड़ा, चौधरी साहब के शासनाधिकारी को पूर्णरुप से सचते करने के लिए काफी थी, वह तुरन्त घटना स्थल पर पहुँचते, तहकीकात होने लगती गवाह और सबूत के सिवा किसी अभियोग को सफलता सहित चलाने में जिन बातों की जरुरत होती है, उन सब पर विचार होता और चौधरी जी के दरबार से फैसला हो जाता। किसी को अदालत जाने की जरुरत न पड़ी। हॉँ, इस कष्ट के लिए चौधरी साहब कुछ फीस जरुर लेते थे। यदि किसी अवसर पर फीस मिलने में असुविधा के कारण उन्हें धीरज से काम लेना पड़ता तो गॉँव में आफत मच जाती थी; क्योंकि उनके धीरज और दरोगा जी के क्रोध में कोई घनिष्ठ सम्बन्ध था। सारांश यह है कि चौधरी से उनके दोस्त-दुश्मन सभी चौकन्ने रहते थे। २ चौधरी माहश्य के तीन सुयोग्य पुत्र थे। बड़े लड़के बितान एक सुशिक्षित मनुष्य थे। डाकिये के रजिस्टर पर दस्तखत कर लेते थे। बड़े अनुभवी, बड़े नीति कुशल। मिर्जई की जगह कमीज पहनते, कभी-कभी सिगरेट भी पीते, जिससे उनका गौरव बढ़ता था। यद्यपि उनके ये दुर्व्यसन बूढ़े चौधरी को नापसंद थे, पर बेचारे विवश थे; क्योंकि अदालत और कानून के मामले बितान के हाथों में थे। वह कानून का पुतला था। कानून की दफाएँ उसकी जबान पर रखी रहती थीं। गवाह गढ़ने में वह पूरा उस्ताद था। मँझले लड़के शान चौधरी कृषि-विभाग के अधिकारी थे। बुद्धि के मंद; लेकिन शरीर से बड़े परिश्रमी। जहॉँ घास न जमती हो, वहॉँ केसर जमा दें। तीसरे लड़के का नाम गुमान था। वह बड़ा रसिक, साथ ही उद्दंड भी था। मुहर्रम में ढोल इतने जोरों से बजाता कि कान के पर्दे फट जाते। मछली फँसाने का बड़ा शौकीन था बड़ा रँगील जवान था। खँजड़ी बजा-बजाकर जब वह मीठे स्वर से ख्याल गाता, तो रंग जम जाता। उसे दंगल का ऐसा शौक था कि कोसों तक धावा मारता; पर घरवाले कुछ ऐसे शुष्क थे कि उसके इन व्यसनों से तलिक भी सहानुभूति न रखते थे। पिता और भाइयों ने तो उसे ऊसर खेत समझ रखा था। घुड़की-धमकी, शिक्षा और उपदेश, स्नेह और विनय, किसी का उस पर कुछ भी असर नहीं हुआ। हॉँ, भावजें अभी तक उसकी ओर से निराश न हुई थी। वे अभी तक उसे कड़वी दवाइयॉँ पिलाये जाती थी; पर आलस्य वह राज रोग है जिसका रोग कभी नहीं सँभलता। ऐसा कोई बिराल ही दिन जाता होगा कि बॉँक गुमान को भावजों के कटुवाक्य न सुनने पड़ते हों। ये बिषैले स्वर कभी-कभी उसे कठोर ह्रदय में चुभ जाते; किन्तु यह घाव रात भर से अधिक न रहता। भोर होते ही थकना के साथ ही यह पीड़ा भी शांत हा जाती। तड़का हुआ, उसने हाथ-मुँह धोया, बंशी उठायी और तालाब की ओर चल खड़ा हुआ। भावजें फूलों की वर्षा किया करती; बूढ़े चौधरी पैतरे बदलते रहते और भाई लोग तीखी निगाह से देखा करते, पर अपनी धुन का पूरा बॉँका गुमान उन लोगों के बीच से इस तरह अकड़ता चला जाता, जैसे कोई मस्त हाथी कुत्तों के बीच से निकल जाता है। उसे सुमार्ग पर लाने के लिए क्या-क्या उपाय नही किये गये। बाप समझाता-बेटा ऐसी राह चलो जिसमें तुम्हें भी पैसें मिलें और गृहस्थी का भी निर्वाह हो। भाइयों के भरोसे कब तक रहोगे? मैं पका आम हूँ-आज टपक पड़ा या कल। फिर तुम्हारा निबाह कैसे होगा? भाई बात भी न पूछेगे; भावजों का रंग देख रहे हो। तुम्हारे भी लड़के बाले है, उनका भार कैसे सँभालोगे? खेती में जी न लगे, कास्टि-बिली में भरती करा दूँ? बाँका गुमनान खड़ा-खड़ा यह सब सुनता, लेकिन पत्थर का देवता था, कभी न पसीजता! इन माहश्य के अत्याचार का दंड उसकी स्त्री बेचारी को भोगना पड़ता था। मेहनत के घर के जितने काम होते, वे उसी के सिर थोपे जाते। उपले पाथती, कुंए से पानी लाती, आटा पीसती और तिस पर भी जेठानानियॉँ सीधे मुँह बात न करती, वाक्य बाणों से छेदा करतीं। एक बार जब वह पति से कई दिन रुठी रही, तो बॉँके गुमान कुछ नर्म हुए। बाप से जाकर बोले-मुझे कोई दूकान खोलवा दीजिए। चौधरी ने परमात्मा को धन्यवाद दिया। फूले न समाये। कई सौ रुपये लगाकर कपड़े की दूकान खुलवा दी। गुमान के भाग जगे। तनजेब के चुन्नटदार कुरते बनवाये, मलमल का साफा धानी रंग में रँगवाया। सौदा बिके या न बिके, उसे लाभ ही होना था! दूकान खुली हुई है, दस-पाँच गाढ़े मित्र जमे हुए हैं, चरस की दम और खयाल की तानें उड़ रही हैं— चल झपट री, जमुना-तट री, खड़ो, नटखट री। इस तरह तीन महीने चैन से कटे। बॉँके गुमान ने खूब दिल खोल कर अरमान निकाले, यहॉँ तक कि सारी लागत लाभ हो गयी। टाट के टुकड़े के सिवा और कुछ न बचा। बूढ़े चौधरी कुऍं में गिरने चले, भावजों ने घोर आन्दोलन मचाया-अरे राम! हमारे बच्चे और हम चीथड़ों को तरसें, गाढ़े का एक कुरता भी नसीब न हो, और इतनी बड़ी दूकान इस निखट्टू का कफ़न बन गई। अब कौन मुँह दिखायेगा? कौन मुँह लेकर घर में पैर रखेगा? किंतु बॉँके गुमान के तेवर जरा भी मैले न हुए। वही मुँह लिए वह फिर घर आया और फिर वही पुरानी चाल चलने लगा। कानूनदां बिताने उनके ये ठाट-बाट देकर जल जाता। मैं सारे दिन पसीना बहाऊँ, मुझे नैनसुख का कुरता भी न मिले, यह अपाहिज सारे दिन चारपाई तोड़े और यों बन-ठन कर निकाले? एसे वस्त्र तो शायद मुझे अपने ब्याह में भी न मिले होंगे। मीठे शान के ह्रदय में भी कुछ ऐसे ही विचार उठते थे। अंत में यह जलन सही न गयी, और अग्नि भड़की; तो एक दिन कानूनदाँ बितान की पत्नी गुमनाम के सारे कपड़े उठा लायी और उन पर मिट्टी का तेल उँड़ेल कर आग लगा दी। ज्वाला उठी, सारे कपड़े देखत-देखते जल कर राख हो गए। गुमान रोते थे। दोनों भाई खड़े तमाशा देखते थे। बूढ़े चौधरी ने यह दृश्य देखा, और सिर पीट लिया। यह द्वेषाग्नि हैं। घर को जलाकर तक बुझेगी। ३ यह ज्वाला तो थोड़ी देर में शांत हो गयी, परन्तु ह्रदय की आग ज्यों की त्यों दहकती रही। अंत में एक दिन बूढ़े चौधरी ने घर के सब मेम्बरों को एकत्र किया और गूढ़ विषय पर विचार करने लगे कि बेड़ा कैसे पार हो। बितान से बोले-बेटा, तुमने आज देखा कि बात की बात में सैकड़ों रुपयों पर पानी फिर गया। अब इस तरह निर्वाह होना असम्भव है। तुम समझदार हो, मुकदमे-मामले करते हो, कोई ऐसी राह निकालो कि घर डूबने से बचे। मैं तो चाहता था कि जब तक चोला रहे, सबको समेटे रहूँ, मगर भगवान् के मन में कुछ और ही है। बितान की नीतिकुशलता अपनी चतुर सहागामिनी के सामने लुप्त हो जाती थी। वह अभी उसका उत्तर सोच ही रहे थे कि श्रीमती जी बोल उठीं-दादा जी! अब समुझाने-बुझाने से काम नहीं चलेगा, सहते-सहते हमारा कलेजा पक गया। बेटे की जितनी पीर बाप को होगी, भाइयों को उतनी क्या, उसकी आधी भी नहीं हो सकती। मैं तो साफ कहती हूँ-गुमान को तुम्हारी कमाई में हक है, उन्हें कंचन के कौर खिलाओ और चॉँदी के हिंडाले में झुलाओ। हममें न इतना बूता है, न इतना कलेजा। हम अपनी झोपड़ी अलग बना लेगें। हॉँ, जो कुछ हमारा हो, वह हमको मिलना चाहिए। बॉँट-बखरा कर दीजिए। बला से चार आदमी हँसेगे, अब कहॉँ तक दुनिया की लाज ढोवें? नीतिज्ञ बितान पर इस प्रबल वक्तृता का जो असर हुआ, वह उनके विकासित और पुमुदित चेहरे से झलक रहा था। उनमें स्वयं इतना साहस न था कि इस प्रस्ताव का इतनी स्पष्टता से व्यक्त कर सकते। नीतिज्ञ महाशय गंभीरता से बोले-जायदाद मुश्तरका, मन्कूला या गैरमन्कूला, आप के हीन-हायात तकसीम की जा सकती है, इसकी नजीरें मौजूद है। जमींदार को साकितुलमिल्कियत करने का कोई इस्तहक़ाक़ नहीं है। अब मंदबुद्धि शान की बारी आयी, पर बेचारा किसान, बैलों के पीछे ऑंखें बंद करके चलने वाला, ऐसे गूढ़ विषय पर कैसे मुँह खोलता। दुविधा में पड़ा हुआ था। तब उसकी सत्यवक्ता धर्मपत्नी ने अपनी जेठानी का अनुसरण कर यह कठिन कार्य सम्पन्न किया। बोली-बड़ी बहन ने जो कुछ कहा, उसके सिवा और दूसरा उपाय नहीं। कोई तो कलेजा तोड़-तोड़ कर कमाये मगर पैसे-पैसे को तरसे, तन ढॉँकने को वस्त्र तक न मिले, और कोई सुख की नींद सोये, हाथ बढ़ा-बढ़ा के खाय! ऐसी अंधेरे नगरी में अब हमारा निबाह न होगा। शान चौधरी ने भी इस प्रस्ताव का मुक्तकंठ से अनुमोदन किया। अब बूढ़े चौधरी गुमान से बोले-क्यों बेटा, तुम्हें भी यह मंजूर है? अभी कुछ नहीं बिगड़ा। यह आग अब भी बुझ सकती है। काम सबको प्यारा है, चाम किसी को नहीं। बोलो, क्या कहते हो? कुछ काम-धंधा करोगे या अभी ऑंखें नहीं खुलीं? गुमान में धैर्य की कमी न थी। बातों को इस कान से सुन कर उस कान से उड़ा देना उसका नित्य-कर्म था। किंतु भाइयों की इस जन-मुरीदी पर उसे क्रोध आ गया। बोला-भाइयों की जो इच्छा है, वही मेरे मन में भी लगी हुई है। मैं भी इस जंजाल से भागना चाहता हूँ। मुझसे न मंजूरी हुई, न होगी। जिसके भाग्य में चक्की पीसना बदा हो, वह पीसे! मेरे भाग्य में चैन करना लिखा है, मैं क्यों अपना सिर ओखली में दूँ? मैं तो किसी से काम करने को नहीं कहता। आप लोग क्यों मेरे पीछे पड़े हुए है। अपनी-अपनी फिक्र कीजिए। मुझे आध सेर आटे की कमी नही है। इस तरह की सभाऍं कितनी ही बार हो चुकी थीं, परन्तु इस देश की सामाजिक और राजनीतिक सभाओं की तरह इसमें भी कोई प्रयोजन सिद्ध नहीं होता था। दो-तीन दिन गुमान ने घर पर खाना नहीं खाया। जतन सिंह ठाकुर शौकीन आदमी थे, उन्हीं की चौपाल में पड़ा रहता। अंत में बूढ़े चौधरी गये और मना के लाये। अब फिर वह पुरानी गाड़ी अड़ती, मचलती, हिलती चलने लगी। ४ पांडे घर के चूहों की तरह, चौधरी के धर में बच्चें भी सयाने थे। उनके लिए घोड़े मिट्टी के घोड़े और नावें कागज की नावें थीं। फलों के विषय में उनका ज्ञान असीम था, गूलर और जंगली बेर के सिवा कोई ऐसा फल न था जिसे बीमारियों का घर न समझते हों, लेकिन गुरदीन के खोंचे में ऐसा प्रबल आकर्षण था कि उसकी ललकार सुनते ही उनका सारा ज्ञान व्यर्थ हो जाता साधारण बच्चों की तरह यदि सोते भी हो; तो चौंक पड़ते थे। गुरदीन उस था। गॉँव में साप्ताहिक फेरे लगाता था। उसके शुभागमन की प्रतीक्षा और आकांक्षा में कितने ही बालकों को बिना किंडरागार्टन की रंगीन गोलियों के ही, संख्याऍं और दिनों के नाम याद हो गए थे। गुरदीन बूढ़ा-सा, मैला-कुचैला आदमी था; किन्तु आस-पास में उसका नाम उपद्रवी लड़कों के लिए हनुमान-मंत्र से कम न था। उसकी आवाज सुनते ही उसके खोंचे पर लड़कों का ऐसा धावा होता कि मक्खियों की असंख्य सेना को भी रण-स्थल से भागना पड़ता था। और जहॉँ बच्चों के लिए मिठाइयॉँ थीं, वहॉँ गुरदीन के पास माताओं के लिए इससे भी ज्यादा मीठी बातें थी। मॉँ कितना ही मना करती रहे, बार-बार पैसा न रहने का बहाना करे पर गुरदीन चटपट मिठाईयों का दोनों बच्चों के हाथ में रख ही देता और स्नहे-पूर्ण भाव से कहता--बहू जी, पैसों की कोई चिन्ता न करो, फिर मिलते रहेंगे, कहीं भागे थोड़े ही जाते हैं। नारायण ने तुमको बच्चे दिए हैं, तो मुझे भी उनकी न्योछावर मिल जाती है, उन्हीं की बदौलत मेरे बाल-बच्चे भी जीते हैं। अभी क्या, ईश्वर इनका मौर तो दिखावे, फिर देखना कैसा ठनगन करता हूँ। गुरदीन का यह व्यवहारा चाहे वाणिज्य-नियमों के प्रतिकूल ही क्यों न हो, चाहे, ‘नौ नगद सही, तेरह उधार नही’ वाली कहावत अनुभव-सिद्ध ही क्यों न हो, किन्तु मिष्टाभाषी गुरदीन को कभी अपने इस व्यवहार पर पछताने या उसमें संशोन करने की जरुरत नहीं हुई। मंगल का शुभ दिन था। बच्चे बड़े बेचैनी से अपने दरवाजे पर खड़े गुरदीन की राह देख रहे थे। कई उत्साही लड़के पेड़ पर चढ़ गए और कोई-कोई अनुराग से विवश होकर गॉँव के बाहर निकल गए थे। सूर्य भगवान् अपना सुनहला गाल लिए पूरब से पश्चिम जा पहुँचे थे, इतने में ही गुरदीन आता हुआ दिखाई दिया। लड़कों ने दौड़कर उसका दामन पकड़ा और आपस में खींचातानी होने लगी। कोई कहता था मेरे घर चलो; कोई अपने घर का न्योता देता था। सबसे पहले भानु चौधरी का मकान पड़ा। गुरदीन अपना खोंचा उतार दिया। मिठाइयों की लूट शुरु हो गयी। बालको और स्त्रियों का ठट्ट लग गया। हर्ष और विषाद, संतोष और लोभ, ईर्ष्या ओर क्षोभ, द्वेष और जलन की नाट्यशाला सज गयी। कनूनदॉँ बितान की पत्नी अपने तीनों लड़कों को लिए हुए निकली। शान की पत्नी भी अपने दोनों लड़कों के साथ उपस्थित हुई। गुरदीन ने मीठी बातें करनी शुरु की। पैसे झोली में रखे, धेले की मिठाई दी और धेले का आशीर्वाद। लड़के दोनो लिए उछलते-कूदते घर में दाखिल हुए। अगर सारे गॉँव में कोई ऐसा बालक था जिसने गुरदीन की उदारता से लाभ उठाया हो, तो वह बॉँके गुमान का लड़का धान था। यह कठिन था कि बालक धान अपने भाइयों-बहनों को हँस-हँस और उलल-उछल कर मिठाइयॉँ खाते देख कर सब्र कर जाय! उस पर तुर्रा यह कि वे उसे मिठाइयॉँ दिख-दिख कर ललचाते और चिढ़ाते थे। बेचारा धान चीखता और अपनी मात का ऑंचल पकड़-पकड़ कर दरवाजे की तरफ खींचता था; पर वह अबला क्या करे। उसका ह्रदय बच्चे के लिए ऐंठ-ऐंठ कर रह जाता था। उसके पास एक पैसा भ्री नहीं था। अपने दुर्भाग्य पर, जेठानियों की निष्ठुरता पर और सबसे ज्यादा अपने पति के निखट्टूपन पर कुढ़-कुढ़ कर रह जाती थी। अपना आदमी ऐसा निकम्मा न होता, तो क्यों दूसरों का मुँह देखना पड़ता, क्यों दूसरों के धक्के खाने पड़ते ? उठा लिया और प्यार से दिलासा देने लगी-बेटा, रोओ मत, अबकी गुरदीन आवेगा तो तुम्हें बहुत-सी मिठाई ले दूँगी, मैं इससे अच्छी मिठाई बाजार से मँगवा दूँगी, तुम कितनी मिठाई खाओग! यह कहते कहते उसकी ऑंखें भर अयी। आह! यह मनहूस मंगल आज ही फिर आवेगा; और फिर ये ही बहाने करने पड़ेगे! हाय, अपना प्यारा बच्चा धेले की मिठाई को तरसे और घर में किसी का पत्थर-सा कलेजा न पसीजे! वह बेचारी तो इन चिंताओं में डूबी हुई थी ओर धान किसी तरह चुप ही न होता था। जब कुछ वश न चला, तो मॉँ की गोद से जमीन पर उतर कर लोठने लगा और रो-रो कर दुनिया सिर पर उठा ली। मॉँ ने बहुत बहलाया, फुसलाया, यहॉँ तक कि उसे बच्चे के इस हठ पर क्रोध भी आ गया। मानव ह्रदय के रहस्य कभी समझ में नहीं आते। कहॉँ तो बच्चे को प्यार से चिपटाती थी, ऐसी झल्लायी की उसे दो-तीन थप्पड़ जोर से लगाये और घुड़कर कर बोली-चुप रह आभगे! तेरा ही मुँह मिठाई खाने का है? अपने दिन को नहीं रोता, मिठाई खाने चला है। बाँका गुमान अपनी कोठरी के द्वार पर बैठा हुआ यह कौतुक बड़े ध्यान से देख रहा था। वह इस बच्चे को बहुत चाहता था। इस वक्त के थप्पड़ उसके ह्रदय में तेज भाले के समान लगे और चुभ गया। शायद उसका अभिप्राय भी यही था। धुनिया रुई को धुनने के लिए तॉँत पर चोट लगाता है। जिस तरह पत्थर और पानी में आग छिपी रहती है, उसी तरह मनुष्य के ह्रदय में भी, चाहे वह कैसा ही क्रूर और कठोर क्यों न हो, उत्कृष्ट और कोमल भाव छिपे रहते हैं। गुमान की ऑंखें भर आयी। ऑंसू की बूँदें बहुधा हमारे ह्रदय की मुलिनता को उज्जवल कर देती हैं। गुमान सचेत हो गया। उसने जा कर बच्चे का गोद में उठा लिया और अपनी पत्नी से करुणोत्पादक स्वर में बोला-बच्चे पर इतना क्रोध क्यों करती हो? तुम्हारा दोषी मैं हूँ, मुझको जो दंड चाहो, दो। परमात्मा ने चाहा तो कल से लोग इस घर में मेरा और मेरे बाल-बच्चों का भी आदर करेंगे। तुमने आज मुझे सदा के लिए इस तरह जगा दिया, मानों मेरे कानों में शंखनाद कर मुझे कर्म-पथ में प्रवेश का उपदेश दिया हो। **********

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