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- कद
सुरेश बाबू मिश्रा कमलनाथ ऑफिस जाने के लिए तैयार हो गए। उन्होंने अपना बैग उठाया और अपनी पत्नी विनीता के कमरे की ओर गए। अपने ममेरे भाई शैलेन्द्र और अपनी पत्नी की हंसी की आवाज को सुनकर उनके कदम ठिठक गए। तभी शैलेन्द्र की आवाज सुनाई पड़ी, “भाभी! भइया की यह हालत मुझसे देखी नहीं जाती। हमें उन्हें सारी बातें साफ-साफ बता देनी चाहिए।“ “मुझे सब कुछ अपने आप पता चला जाएगा, तुम्हें बताने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी बच्चू।” कमलनाथ मन ही मन बुदबुदाए। उनके चेहरे पर एक रहस्यमयी मुस्कराहट तैर गई। “विनीता मेरा मोबाइल नहीं मिल रहा है। देखना कहीं तुम्हारे कमरे में तो नहीं हैं? यह कहते हुए कमलनाथ कमरे में पहुंच गए। विनीता और शैलेन्द्र दोनों बैड पर बैठे हुए थे और आपस में हंस-हंस कर बातें कर रहे थे। विनीता ने मोबाइल ढूंढ़कर कमलनाथ को पकड़ा दिया। कमलनाथ आफिस के लिए चल दिये। वे बड़े तनाव में थे। शैलेन्द्र उनका ममेरा भाई था। पिछले पांच-छः दिनों से वह उनके यहां ठहरा हुआ था। कमलनाथ की शादी के पाँच-छः वर्ष हो गए थे। शादी के बाद शैलेन्द्र पहली बार उनके घर आया था। शैलेन्द्र ने विनीता को शादी में ही देखा था मगर विगत पाँच-छः दिनों में दोनों इतने घुल-मिल गए थे कि मानो कि एक-दूसरे को वर्षों से जानते हों। दोनों हर समय साथ-साथ रहते और एक पल के लिए भी एक-दूसरे से अलग नहीं होते। घन्टों बैड पर बैठकर बातें करते, हंसते, खिलखिलाते, टी.वी. पर साथ-साथ पिक्चर और सीरियल देखते। कमलनाथ के मन में दोनों की यह नजदीकी कांटे की तरह चुभती। दोनों के बीच देवर-भाभी का रिश्ता था। इसलिए वे किसी से कुछ कह भी नहीं सकते थे। दोनों के बीच क्या खिचड़ी पक रही है यह जानने के लिए आज उन्होंने अपना मोबाइल रिकार्डिंग पर लगाकर विनीता के बैड पर रख दिया था। कमलनाथ मोबाइल में रिकार्ड दोनों के बीच हुई बातचीत सुनने के लिए बड़े बेताब थे। उन्होंने घड़ी पर नजर डाली अभी आफिस खुलने में बीस मिनट बाकी थे। एक जगह सड़क पर भीड़-भाड़ कम देखकर मोटरसाइकिल खड़ी की और मोबाइल ऑन कर रिकार्डिंग सुनने लगे। वे जैसे-जैसे मोबाइल में दर्ज बातें सुन रहे वैसे-वैसे उनके चेहरे का रंग बदलता जा रहा था। विनीता की आवाज थी- “दाम्पत्य जीवन में शान्ति बनाए रखने के लिए पत्नी अपने सीने पर पत्थर की शिला रख लेती है मगर पति अपने सीने पर छोटा सा कंकड़ भी बर्दाश्त नहीं कर पाता है। शादी के बाद वह अपनी लेडीज सहकर्मियों के साथ अक्सर पिक्चर या सैर सपाटे को जाते थे। इन्होंने कभी नहीं सोचा कि ऐसे में मेरे दिल पर क्या गुजरती होगी। उन्हें यह अहसास कराने के लिए तुम्हारी मदद से हम दोनों के बीच नजदीकी दिखाने का नाटक किया तो जनाब कितने बेचैन हो उठे हैं। इन्हें न अपने भाई पर विश्वास है और न अपनी पत्नी पर। इन्हें लग रहा है कि मेरे और तुम्हारे बीच कोई चक्कर चल रहा है।“ कमलनाथ को अपने ऊपर बड़ी ग्लानि हो रही थी। उन्हें अपनी तुलना में विनीता का कद आज बहुत बड़ा लग रहा था। ************
- जाने-अनजाने
रतन चंद 'रत्नेश' स्टॉपेज पर खड़ा मैं लोकल बस की प्रतीक्षा कर रहा था। इस बस से फिलहाल मुझे अंतरराज्यीय बस-अड्डे तक जाना था। वहाँ जाकर ही निर्णय लेना था कि अब कहाँ पहुँचना है? कहीं दूर नहीं, बस वहाँ से पंद्रह-बीस किलोमीटर दूर कहीं राह में किसी गाँव से लगते स्टॉपेज पर उतर जाना था। फिर हरे-भरे खेतों के बीच से गाँव की ओर जाती राह पर टहलते हुए उधर की ओर निकल जाना था। उसके बाद दो-चार घंटे यों ही गाँव या खेतों के आसपास गुजारकर वापस लौट आना था। शहर की भागमभाग और एकरस जीवन से इस तरह पीछा छुड़ाकर 'रिलैक्स' होने की यह मेरी बहुत पुरानी आदत है। युवावस्था में तो महीने में दो-तीन चक्कर इस तरह लग जाते थे। कैमरा साथ हुआ करता था और ग्राम्य-जीवन की कई तस्वीरों को उसमें कैद कर लिया करता था। अब उम्र ढलने के साथ-साथ यह दौरा कई महीनों के अंतराल पर जा पहुँचा है। घर से दूर कहीं जाने की इच्छा ही नहीं होती अब। वैसे कैमरा अब भी साथ होता है और अब वह डिजिटल भी है। पहले वाला साढ़े तीन सौ का कैमरा अब भी संभाले हुए हूँ हालांकि उसे इस्तेमाल में लाने की अब जरूरत भी नहीं रह गई है। फोटो खींचने में भी बहुत चूजी हो गया हूँ जबकि डिजिटल कैमरे में खर्चे का सवाल तंग नहीं करता। विगत कुछ दिनों से एक अनजानी सी उदासी जब तब घेर रही थी। कभी देर रात परेशान करती तो अपना मनपसंद किताब पढ़ते। सोचा, उसी पुराने कारगर फार्मूले को अपनाऊँ। बस आई तो खचाखच भरी हुई थी। नौ-दस बजे के दरमियान ऐसा होना स्वाभाविक है। पिछले द्वार से किसी तरह जगह बनाते हुए मैं भी बस के अंदर दाखिल हुआ और पीछे जाकर एक डंडे का सहारा लेकर खड़ा हो गया। कंडक्टर अपनी आदतन आवाज में जोर से बोले जा रहा था 'बगैर टिकट कोई न रहे... अपना-अपना टिकट ले लो।' कंडक्टर के इर्द-गिर्द थोड़ी सी जगह बनी तो मैं भी दस रुपए थामे उसकी ओर बढ़ा। कंडक्टरों के एक से रहने वाले चेहरे के साथ जैसे ही उसने मेरे नोट की ओर हाथ बढ़ाया कि मुझसे आँखें मिलते ही वह अपनी सीट से खड़ा हो गया 'आइए सर।' अब उसके चेहरे पर मुस्कुराहट थी जो उसने अब तक शायद कहीं छुपाकर रखी थी। आसपास खडे लोगों के चेहरे मेरे चेहरे पर प्रश्न बनाने लगे। मुझे सीट की नितांत आवश्यकता थी। उम्र जो ऐसी ठहरी। अत: उसके सीट छोड़ने पर मैं कंडक्टर-सीट पर जा बैठा। वह पास ही मेरे बगल में खड़ा था। मैंने फिर से दस रुपए का नोट उसकी ओर बढ़ाया। उसने उसी तरह मुस्कुराते हुए कहा, 'क्यों शर्मिंदा करते हैं सर?' असल में उस समय शर्मिंदा मैं हो रहा था। अब तक गौर से उसके चेहरे के हर भाव की सूक्ष्मता से पड़ताल करता रहा था परंतु मुझे उसमें कहीं भी अपना परिचित नज़र नहीं आ रहा था। किराये के पैसे न लेने पर मैं शर्मिंदगी के साथ-साथ परेशानी का भी अनुभव कर रहा था, इसलिए मैंने स्पष्ट शब्दों में उससे कह दिया, 'लगता है मुझे पहचानने में आपसे गलती हो रही है।' वह हँस पड़ा, 'गलती मुझसे नहीं, आपसे हो रही है सर।' उसके ऐसा कहने पर मुझे अपनी साठ की उम्र छूने का दोष दिखने लगा। फिर भी अपने विश्वास को दृढ़ बनाये रखते हुए मन-ही-मन कहा, ऐसा तो पहले कभी हुआ नहीं। मैं उसे लगातार पहचानने की कोशिश कर रहा था। अपने से बड़ों को अंकल या सर कहना आम बात है। फिर भी मैं उस कंडक्टर में उन्हें तलाशने लगा जिन्हें बचपन में ट्यूशन पढ़ाया हो। उन दिनों नौकरी के साथ-साथ अतिरिक्त आय के लिए मैं बच्चों की ट्यूशनें लिया करता था, परंतु वे भी अधिक नहीं थे। मुश्किल से बीस एक छात्र-छात्राओं को अंग्रेजी और मैथ पढ़ाया हूँगा। अधिकतर बच्चे मुझसे इन दो विषयों की ही ट्यूशनें लिया करते थे परंतु मैंने इन छात्रों की संख्या इतनी नहीं बढ़ने दी कि परिवार की जिम्मेदारियों से विमुख हो जाता। बहरहाल उन सबको एक-एक कर जल्दी से याद किया परंतु कोई भी चेहरा इससे मेल नहीं खाया। फिर मैंने अपने दिमाग पर अधिक जोर भी नहीं डाला, न ही अन्य दूसरे चेहरों में उसे तलाशने की जद्दोज़हद की। अंतत: यह अपना परिचय देगा ही जब उसने मुझे पहचान लिया है। बस में भीड़ धीरे-धीरे घटती गई और अब सीटें भी खाली होने लगी थीं। मैंने उसकी सीट छोड़ दी और पास ही दूसरी सीट पर बैठ गया। 'मैंने तुम्हें बिल्कुल नहीं पहचाना।' मैंने उससे कहा। मेरे प्रश्न का उत्तर देने के वजाय उसने कहा, 'आप तो बिल्कुल वैसे ही हैं सर। शायद मैं बदल गया हूँ।' वाकई मेरा कद, वजन, डीलडौल हमेशा एक-सा रहा है। इस उम्र में भी सिर के बाल अधिकतर काले हैं। सिर्फ कलम सफेद हुए हैं या फिर मूंछें। मैंने हँसकर उससे कहा, 'तुम बदल गए या मैं सठिया गया हूँ, क्या पता?... पर अब तो बता दो, कौन हो तुम? इतना आदर-मान दे रहे हो, किराये के पैसे भी नहीं ले रहे?' इससे पहले कि वह मेरे प्रश्नों का उत्तर देकर मुझे आश्वस्त करता, अगला स्टॉपेज आ गया जहाँ सात-आठ सवारियाँ बस पर सवार हुईं। वह उनका टिकट काटने में व्यस्त हो गया। मेरे मन में उथल-पुथल बढ़ती जा रही थी। मैं उसे टिकट काटते ध्यान से देखता रहा पर सचमुच पहचानने में असफल रहा। उस समय मेरे सामने कई ऐसे उम्रदराज आकर खड़े हो गए जिन्होंने कुछेक वर्षों बाद मुझे पहचानने से इनकार कर दिया था। बाद में जब उन्हें अपना परिचय दिया तो वे बड़े गर्मजोशी से मिले। टिकट काट लेने के बाद वह मेरे मुखातिब हुआ। 'आप अब भी ज़ीरकपुर में ही रह रहे हैं? ' मैं मुस्कुरा उठा और लगा, जैसे सिर से एक भारी बोझ उतर गया हो। मेरे लिए सबसे खुशी की बात यह थी कि मेरी याददास्त अब भी सलामत थी जिस पर अब तक मुझे शक होने लगा था। मैंने उससे कहा, 'देखा, मैंने पहले ही कहा था कि तुमसे भूल हो रही है। मैं कभी ज़ीरकपुर में नहीं रहा हूँ।' ऐसा सुनने के बावजूद उसके चेहरे के हावभाव में मेरे प्रति तनिक भी बदलाव नहीं आया। वह पहले की तरह ही मुस्कुराता रहा। शायद उसने मुकम्मल तौर पर मान लिया था कि मैं सठिया गया हूँ। वह अपनी पहचान को बरकरार रखना चाहता था। मैं भी हार मानने वाला नहीं था। कहा, 'क्यों भूल हो गई न? होता है कभी-कभी ऐसा। कहते हैं कि इस दुनिया में एक ही शक्ल के सात व्यक्ति होते हैं। उनमें से ही आपका कोई ऐसा है जिसकी शक्ल मुझसे मिलती हो। तुमने उसे मुझमें पहचान लिया। यह लो...अब तो किराये के यह दस रुपए पकड़ो। कहीं चेकिंग हुई तो मैं खामख्वाह रगड़ा जाऊँगा।' मैंने वही नोट फिर से उसके आगे बढ़ाया परंतु उसने लेने से इनकार कर दिया और पूछा, 'आजकल आप कहाँ रह रहे हैं?' मैंने अपने आवास वाले इलाके के बारे में उसे बताया तो उसने कहा, 'एक दिन आऊँगा जरूर आपके घर। आंटीजी कैसी हैं?' मैंने कहा, 'वे तो ठीक हैं परंतु तुम अब भी गलत हो।' मेरे कहे पर वह जोर से हँसा। सवारियों के साथ-साथ बस ड्राइवर भी मिरर में हमारी ओर देखने लगा। थोड़ी ही देर में अंतरराज्यीय बस-अड्डा आ गया। कंडक्टर बस से उतरकर द्वार के पास खड़ा हो गया और मेरे उतरने की प्रतीक्षा करने लगा। मैं जब उतरा तो वह अनुरोध करने लगा, 'सर आइए, थोड़ी-थोड़ी चाय पीते हैं।' पर न जाने क्यों अब मैं उससे जल्दी से पीछा छुड़ा लेना चाहता था। कहा, 'अभी जल्दी में हूँ। चाय नहीं पीऊँगा। तुम मेरे घर तो आ ही रहे हो किसी दिन, उसी दिन इकट्ठे चाय पीएंगे।' वह मुझसे विदा लेकर बस-अड्डे की भीड़ में कहीं खो गया। मैं वहाँ खड़ा-खड़ा सोचता रहा... परंतु उसने मेरे घर का पूरा पता तो लिया ही नहीं।' ******************
- आईना
सम्पदा ठाकुर हमारा मन ही हमारा आईना है जिसको देख कर भी हम हमेशा अनदेखा कर देते हैं वह मुझे हर वक्त कुछ ना कुछ बताना चाहता है सही और गलत दिखाना चाहता है सच और झूठ अच्छा बुरा जो भी हो वह हमें बताना चाहता है पर हम मन की बातों को कहां सुनते है मन की बातों को अनसुना कर उसे तो बस नजर अंदाज करते जाते हैं और बस करते हैं अपनी मनमानी यह सोचते हुए हम जो कर रहे हैं बस यही सही है हमारे किए को कोई नहीं देख रहा पर हम यह भूल जाते हैं हमारा मन ही है जो हर पल हमारे साथ होता है अच्छे बुरे हर कर्मों को यह हर पल देख रहा होता है मन जिसके पास हमारे सारे किए धरे का हिसाब होता है क्योंकि यही तो ईश्वर का निवास होता है इसलिए मन की आवाज को कभी अनसुना ना करें मन की आवाज अवश्य सुने क्योंकि वह हर पल सही होता है और यही सच है। *****
- NATURE AND ITS ELEMENTS
-Avighna Gautam Earth! Our mother Earth, Full of beauty and admiring worth, We thankless humans have no time, to stand still and admire it sometime. The dancing maiden beauty of the woods, carries chastity in its heart with lots of goods. The bushy tail of the quirky fox, and the serene sound of the lake’s talks. And oh! how I carry , in my heart a joyful bit, from all the stress and work, I quit And watch the blossoming flowers, And see the bees preparing honey jars I always liked to go for a stroll And sit amongst the bushes on the green knoll Between the tremendously beautiful nature With the chirping birds, being a heavenly creature For my little galloping pony Is ready to swing again Through the forest and along the the river and through the lording mountains Down from the mountains to Reaching the tranquil river my little pony’s trembling foot gives my heart natural shivers. The shepherd boy running all over the realm, with his sheep and cattle followed by him. Deep into the night dark sky, glazing at shining moon and stars getting dim. Oh! How I love to sit around the river, with no motion around. Creeping against the sleeping meadow, and admiring the calm clouds. The forest being so wide and deep, with hiding squirrels and bees in sleep, the nature is a creation of heavenly goodness, with its aspects rambling about full of happiness. The earth, fire, water and wind, All are the kids of nature. They are the gods and the elements, coz, they are the reason of our fulfilment. Earth, the land constructed of soil, Inside it the hottest fire plate boils. Then wide in the environment we go, The wind and water where freely flow. Fire, a hot gas flowing, bright light flames showing. Sun is the brightest source of light, Due to it we see and enjoy flying kite The ice and the gases daughter, it is now the serene water. Flowing in the calmest lakes and the loudest seas, It is the source of rain called out by trees. Last but not the least is the air, Comprising of quadruple layers. we breathe into it And offer our prayers, The nature is so stunning, Oh my! The Sun , The Moon, The Fire, The sky though we have no time to stand and stare, yet these elements are so humble and full of care. **********
- Donkey No, You are gentle
Dr. Jahan Singh ‘JAHAN’ You are beautiful and dutiful ! You are gentle and faithful ! Your look is serene and temper is cool ! Still human fools call you fool ! Patent your name as abuse it ! Among themselves they also use it ! Hey Humans did no good to the nature ! You did no wrong to the nature ! You are gentle and faithful ! You serve them in Sand Mountain and dense forest ! In all weathers even without rest ! But for you this derogatory name ! To them it is big Shame Shame ! You are gentle that's your name ! You are beautiful, dutiful and faithful ! Donkey no, gentle is your name ! *********
- मंथन मन का
ममता खरे खुद से करती हूँ बातें, खुद ही खुश हो जाती हूँ। इस झंझावाती दुनियाँ से, अब मोह नहीं मै लगाती हूँ। बाहर से है भीड़ भरी, पर अंतस भारी सूनापन। स्पनंद रिक्त हृदय उनसे, अब भेद न मन के बताती हूँ। माया का मोह नहीं फिर भी, दंभ द्वेष ने जिनको जकड़ा। ऐसी मायावी दुनियाँ में, अब डुबकी नहीं लगाती हूँ। कितनी हूँ मैं सही गलत, अब मुझको होता फर्क नहीं। द्वंद्व झटक सन्मार्ग सफ़र, निशदिन करती जाती हूँ । ये वृथा व्यथा का सदियों से, घिरता आया ताना बाना। पल भर न भटके मन मेरा, अब प्रण मैं रोज उठाती हूँ। ******
- दुख की सरिता गहरी
महेन्द्र मुकुंन्द दुख की सरिता गहरी, अँखियाँ, जल बरसाना धीरे-धीरे, मेरा प्रण प्रियतम-सागर में, जा मिल जाना धीरे-धीरे। बागों में कलिकाओं पर, मंडराता था जो यौवन-मद में, अलि नहिं देखा पीछे फिर, उनका मुरझाना धीरे-धीरे। अभिलाषा-गोपन हिय की, अधरों तक पहुंची तो यह देखा, पत्थर से टकरा सब टूटा, ताना-बाना धीरे-धीरे। बंधन में क्यों बाँधा ऐसा, पर-प्रेमालय बंदी करके, इस घर में ही जीवन जीना, या मर जाना धीरे-धीरे। कानों में जब पिय-पग की, आहट आये तो धीरज रखना, भीगी-भीगी पलकों पर तुम, स्मित लाना धीरे-धीरे। ******
- अगर जन्म उत्सव है।
आचार्य जहान सिंह अगर जन्म उत्सव है, तो मृत्यु क्यों नही। आने-जाने वाला एक ही, फिर जश्न क्यों नही।। आने वाला, एक अनजान मेहमान। न जाने कैसा होगा वो इन्सान।। उस पर सब इतने मेहरबान। जश्न मनाये पूरा खानदान।। नाचगान-संगीत, दिल खोलकर दान। ऐसा क्या खास है श्रीमान।। जाने वाला, जाना पहचाना मेहमान। जांचा-परखा और वर्ता इन्सान।। बरसों का साथ, हर काम में उसका हाथ।। अच्छा-सच्चा समर्पित सिपाही। कर्म, दायित्व का निर्वाही।। सुख-दुख में एक समान। उसके परीक्षाफल में पहला स्थान।। किया उसने आपका नाम रोशन। उसके लिए कोई नही जश्न।। वो उत्सव का हकदार। तुम उसके कर्जदार।। ग़म-विलाप, दुख जिसके कंधों पर। लांधकर भेज देते है घाट पर।। अजनबी के लिए उत्सव। घर की शान के लिए बस आँसू।। 'जहान' यह तेरा कैसा ईमान। जब आने-जाने वाला, एक ही इन्सान।। ********
- सफलता की सीख
बहुत समय पहले की बात है, एक गांव में एक किसान रहता था। उसे अपने खेत में काम करने वालों की बड़ी ज़रुरत रहती थी लेकिन ऐसी खतरनाक जगह, जहाँ आये दिन आंधी-तूफ़ान आते रहते हों, कोई काम करने को तैयार नहीं होता था। किसान ने एक दिन शहर के अखबार में इश्तहार दिया कि उसे खेत में काम करने वाले एक मजदूर की ज़रुरत है। किसान से मिलने कई लोग आये लेकिन जो भी उस जगह के बारे में सुनता, वो काम करने से मना कर देता। अंततः एक सामान्य कद का पतला-दुबला अधेड़ व्यक्ति किसान के पास पहुंचा। किसान ने उससे पूछा, “क्या तुम इन परिस्थितयों में काम कर सकते हो?” “हाँ, बस जब हवा चलती है तब मैं सोता हूँ।” व्यक्ति ने उत्तर दिया। किसान को उसका उत्तर थोडा अजीब लगा लेकिन चूँकि उसे कोई और काम करने वाला नहीं मिल रहा था इसलिए उसने उस व्यक्ति को काम पर रख लिया। मजदूर मेहनती निकला, वह सुबह से शाम तक खेतों में भ्रमण करता, किसान भी उससे काफी संतुष्ट था। कुछ ही दिन बीते थे कि एक रात अचानक ही जोर-जोर से हवा बहने लगी, किसान अपने अनुभव से समझ गया कि अब तूफ़ान आने वाला है। वह तेजी से उठा, हाथ में लालटेन ली और मजदूर केझोपड़े की तरफ दौड़ा। “जल्दी उठो, देखते नहीं तूफ़ान आने वाला है, इससे पहले कि सब कुछ तबाह हो जाए कटी फसलों को बाँध कर ढक दो और बाड़ेके गेट को भी रस्सियोंसे कस दो।” किसान चीखा। मजदूर बड़े आराम से पलटा और बोला, “नहीं जनाब, मैंने आपसे पहले ही कहा था कि जब हवा चलती है तो मैं सोता हूँ।” यह सुन किसान का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुँच गया, जी में आया कि उस मजदूर को गोली मार दे, पर अभी वो आने वाले तूफ़ान से चीजों को बचाने के लिए भागा। किसान खेत में पहुंचा और उसकी आँखें आश्चर्य से खुली रह गयी, फसल की गांठें अच्छे से बंधी हुई थीं और तिरपाल से ढकी भी थी, उसके गाय-बैल सुरक्षित बंधे हुए थे और मुर्गियां भी अपने दडबों में थीं। बाड़े का दरवाज़ा भी मजबूती से बंधा हुआ था। सभी चीजें बिलकुल व्यवस्थित थी। नुक्सान होने की कोई संभावना नहीं बची थी। किसान अब मजदूर की यह बात कि “जब हवा चलती है तब मैं सोता हूँ।” समझ चुका था, और अब वो भी चैन से सो सकता था। हमारी ज़िन्दगी में भी कुछ ऐसे तूफ़ान आने तय हैं, ज़रुरत इस बात की है कि हम उसकी पहले से तैयारी रखें ताकि मुसीबत आने पर हम चैन से सो सकें। सार- यदि विद्यार्थी वर्षभर पढ़ाई करें तो परीक्षा के समय वह आराम से रह सकते हैं। ******
- दिल्ली में …
कमलेश पाण्डेय 'कमल' पूत सपूत हुआ है उसकी, लगी नौकरी दिल्ली में, अब घर कम आता ज़्यादातर, रहता है वह दिल्ली में। अम्मा बाबू नें देखी थी, सुन्दर और सुशील बहू, पूत व्याह कर लाया बीवी, रहती है जो दिल्ली में। बहू का दिल ना लगा गाँव में, रहती थी बेचैन यहाँ, देह तो उसकी रही गाँव में, दिल रहता था दिल्ली में। अम्मा बाबू जी ने चाहा, बहू यहीं पर रह जाये, बहू की ज़िद से हार पूत, ले आया उसको दिल्ली में। पूत सपूत बने इस खातिर, सब तकलीफ उठाया था, पेट काटकर अपना उसको, पढ़ने भेजा दिल्ली में। गाँव की खेती और गृहस्थी, बूढ़े कन्धे झेल रहे, बेटा बहू मंगाकर पिज्जा, करें नाश्ता दिल्ली में। बारिश में टूटे छप्पर से, गाँव में पानी टपक रहा, बेटा बहू फ्लैट में बैठे, चाय पी रहे दिल्ली में। मजदूरी करता बेटा और, बहू सम्भाले घर सारा, मंगरू अब आराम कर रहा, नहीं पढ़ाया दिल्ली में। पूत सपूत वही जो, सुख-दुख में मां-बाप के साथ रहे, वह सपूत कैसे कहलाये, रहता है जो दिल्ली में। *********
- मलाल
डा. किरण पांचाल मैं रूठा, तुम भी रूठ गए, फिर मनाएगा कौन? आज दरार है, कल खाई होगी, फिर भरेगा कौन? मैं चुप, तुम भी चुप, इस चुप्पी को फिर तोडे़गा कौन? छोटी बात को, लगा लोगे दिल से, तो रिश्ता फिर निभाएगा कौन? दुखी मैं भी और तुम भी बिछड़कर, सोचो हाथ फिर बढ़ाएगा कौन? न मैं राजी न तुम राजी, फिर माफ़ करने का बड़प्पन दिखाएगा कौन? डूब जाएगा, यादों में दिल कभी, तो फिर धैर्य बंधायेगा कौन? एक अहम् मेरे, एक तेरे भीतर भी, इस अहम् को फिर हराएगा कौन? ज़िंदगी किसको मिली है सदा के लिए? फिर इन लम्हों में अकेला रह जाएगा कौन? मूंद ली दोनों में से, गर किसी दिन एक ने आँखें, तो कल इस बात पर फिर पछतायेगा कौन? **********
- WINTERS
-Avighna Gautam It was the day of freezing tail, The sky was engulfed with snowy dales. People were wrapped and operating twitter, Guess what! It was the first day of winter. I, too like all was wrapped in my blanket, With my freezing nose poked into a book, Engrossed in reading poems like “The Brook.” The clock was ticking again and again, With its alarm yelling at me. It stared me and said,” Get up young boy, The snow has covered the tree”. 6 a.m. was the time in my clock, I rather wanted to read than to talk. My feet were freezing just like ice, And the phone kept ringing twice and thrice. Slowly, I thought it was the time to leave bed, My hands were numb and my face was red. I didn’t want to get up at all, But after all I wanted to go for a stroll. Now I thought, let’s get to work, I got off the bed by giving a jerk. It was too cold outside the cover, I manifested not to take a shower. I walked out of my bed and saw, The sight of today was so low. As I touched the window pane, Outside ran a snowy train. I thumped out of my freezed room, Seeing all over the house, All I found was, Silence, loneliness a cat and a mouse. My parents were asleep in the room upstairs, I was the first one to give my eyes and outer spare. No one except me was awake, Now what for breakfast, should I make? I went outside and wandered about, The garden, the flowers and the racoon’s freezing snout. All were engaged in overcoming, The coldest, piercing, frosty winter shout. ***********











