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- ESCAPE
Aastha Awasthi Sometimes I wonder Which is right The bower of darkness Or the shower of light? The dark assures Calm and composure. The light promises A dazzling exposure. But I stand here. Right on the threshold. And both the sides Are sights to behold. You can say that I am indecisive. I've been unsure. Meek and submissive. The dark I enjoy. It's complacent stagnation. The light is alluring It's an irresistible exhilaration. But then I'm no hero. I've faults many. The darkness is a shelter. It hides weakness any. Will the light be So very protective? Or will it be harsh. And cruelly invective? And the truth is That light doesn't last long It is darkness which Has the more endearing song I'm too scared to be Seduced by the light. But deep in the dark I dream of shining bright. *****
- पंचिंग बैग
निम्मी अरोड़ा बेटा घर में घुसते ही बोला, “मम्मी कुछ खाने को दे दो यार बहुत भूख लगी है। यह सुनते ही मैंने कहा,"बोला था ना ले जा कुछ कॉलेज, सब्जी तो बना ही रखी थी।” बेटा बोला, “यार मम्मी अपना ज्ञान ना अपने पास रखा करो। अभी जो कहा हूँ वो कर दो बस और हाँ, रात को ढंग का खाना बनाना। पहले ही मेरा दिन अच्छा नहीं गया है।” कमरे में गई तो उसकी आंख लग गई थी। मैंने जाकर उसको जगा दिया कि कुछ खा कर सो जाए। चीख कर वो मेरे ऊपर आया कि जब आँख लग गई थी तो उठाया क्यों तुमने? मैंने कहा तूने ही तो कुछ बनाने को कहा था। वो बोला, “मम्मी एक तो कॉलेज में टेंशन ऊपर से तुम यह अजीब से काम करती हो। दिमाग लगा लिया करो कभी तो।” तभी घंटी बजी तो बेटी भी आ गई थी। मैंने प्यार से पूछा, “आ गई मेरी बेटी कैसा था दिन?” बैग पटक कर बोली, “मम्मी आज पेपर अच्छा नहीं हुआ।” मैंने कहा, “कोई बात नहीं। अगली बार अच्छा कर लेना।” मेरी बेटी चीख कर बोली, “अगली बार क्या रिजल्ट तो अभी खराब हुआ ना। मम्मी यार तुम जाओ यहाँ से। तुमको कुछ नहीं पता।” मैं उसके कमरे से भी निकल आई। शाम को पतिदेव आए तो उनका भी मुँह लाल था। थोड़ी बात करने की कोशिश की, जानने की कोशिश कि तो वो भी झल्ला के बोले, “यार मुझे अकेला छोड़ दो। पहले ही बॉस ने क्लास ले ली है और अब तुम शुरू हो गई।” आज कितने सालों से यही सुनती आ रही थी। सबकी पंचिंग बैग मैं ही थी। हम औरतें भी ना अपनी इज्ज़त करवानी आती ही नहीं। मैं सबको खाना खिला कर कमरे में चली गई। अगले दिन से मैंने किसी से भी पूछना कहना बंद कर दिया। जो जैसा कहता कर के दे देती। पति आते तो चाय दे देती और अपने कमरे में चली जाती। पूछना ही बंद कर दिया कि दिन कैसा था? बेटा कॉलेज और बेटी स्कूल से आती तो मैं कुछ ना बोलती ना पूछती। यह सिलसिला काफी दिन चला। संडे वाले दिन तीनों मेरे पास आए और बोले तबियत ठीक है ना? क्या हुआ है इतने दिनों से चुप हो। बच्चे भी हैरान थे। थोड़ी देर चुप रहने के बाद में बोली। मैं तुम लोगो की पंचिंग बैग हूँ क्या? जो आता है अपना गुस्सा या अपना चिड़चिड़ापन मुझपे निकाल देता है। मैं भी इंतज़ार करती हूं तुम लोंगो का। पूरा दिन काम करके कि अब मेरे बच्चे आएंगे, पति आएंगे दो बोल बोलेंगे प्यार के और तुम लोग आते ही मुझे पंच करना शुरु कर देते हो। अगर तुम लोगों का दिन अच्छा नहीं गया तो क्या वो मेरी गलती है? हर बार मुझे झिड़कना सही है? कभी तुमने पूछा कि मुझे दिन भर में कोई तकलीफ तो नहीं हुई। तीनों चुप थे। सही तो कहा मैंने दरवाजे पे लटका पंचिंग बैग समझ लिया है मुझे। जो आता है मुक्का मार के चलता बनता है। तीनों शरमिंदा थे। दोस्तों हर माँ, हर बीवी अपने बच्चों और पति के घर लौटने का इंतज़ार करती है। उनसे पूछती है कि दिन भर में सब ठीक था या नहीं। लेकिन कभी-कभी हम उनको ग्रांटेड ले लेते हैं। हर चीज़ का गुस्सा उन पर निकालते हैं। कभी-कभी तो यह ठीक है लेकिन अगर ये आपके घरवालों की आदत बन जाए तो आप आज से ही सबका पंचिंग बैग बनना बंद कर दें। सभी महिलाओं को समर्पित* तुम… खुद को कम मत आँको, खुद पर गर्व करो। क्योंकि तुम हो तो थाली में गर्म रोटी है। ममता की ठंडक है, प्यार की ऊष्मा है। तुमसे, घर में संझा बाती है घर घर है। घर लौटने की इच्छा है। क्या बना है रसोई में आज झांककर देखने की चाहत है। तुमसे, पूजा की थाली है, रिश्तों के अनुबंध हैं पड़ोसी से संबंध हैं। घर की घड़ी तुम हो, सोना जागना खाना सब तुमसे है। त्योहार होंगे तुम बिन? तुम्हीं हो दीवाली का दीपक, होली के सारे रंग, विजय की लक्ष्मी, रक्षा का सूत्र! हो तुम। इंतजार में घर का खुला दरवाजा हो, रोशनी की खिडक़ी हो ममता का आकाश तुम ही हो। समंदर हो तुम प्यार का, तुम क्या हो… खुद को जानो! उन्हें बताओ जो तुम्हें जानते नहीं, कहते हैं। तुम करती क्या हो। ******
- विश्वास
मुंशी प्रेमचंद उन दिनों मिस जोसी बम्बई सभ्य-समाज की राधिका थी। थी तो वह एक छोटी सी कन्या पाठशाला की अध्यापिका पर उसका ठाट-बाट, मान-सम्मान बड़ी-बडी धन-रानियों को भी लज्जित करता था। वह एक बड़े महल में रहती थी, जो किसी जमाने में सतारा के महाराज का निवास-स्थान था। वहॉँ सारे दिन नगर के रईसों, राजों, राज-कमचारियों का तांता लगा रहता था। वह सारे प्रांत के धन और कीर्ति के उपासकों की देवी थी। अगर किसी को खिताब का खब्त था तो वह मिस जोशी की खुशामद करता था। किसी को अपने या संबधी के लिए कोई अच्छा ओहदा दिलाने की धुन थी तो वह मिस जोशी की अराधना करता था। सरकारी इमारतों के ठेके; नमक, शराब, अफीम आदि सरकारी चीजों के ठेके; लोहे-लकड़ी, कल-पुरजे आदि के ठेके सब मिस जोशी ही के हाथो में थे। जो कुछ करती थी वही करती थी, जो कुछ होता था उसी के हाथो होता था। जिस वक्त वह अपनी अरबी घोड़ो की फिटन पर सैर करने निकलती तो रईसों की सवारियां आप ही आप रास्ते से हट जाती थी, बड़े दुकानदार खड़े हो-हो कर सलाम करने लगते थे। वह रूपवती थी, लेकिन नगर में उससे बढ़कर रूपवती रमणियां भी थी। वह सुशिक्षिता थीं, वक्चतुर थी, गाने में निपुण, हंसती तो अनोखी छवि से, बोलती तो निराली घटा से, ताकती तो बांकी चितवन से; लेकिन इन गुणो में उसका एकाधिपत्य न था। उसकी प्रतिष्ठा, शक्ति और कीर्ति का कुछ और ही रहस्य था। सारा नगर ही नही; सारे प्रान्त का बच्चा जानता था कि बम्बई के गवर्नर मिस्टर जौहरी मिस जोशी के बिना दामों के गुलाम है। मिस जोशी की आंखो का इशारा उनके लिए नादिरशाही हुक्म है। वह थिएटरो में दावतों में, जलसों में मिस जोशी के साथ साये की भॉँति रहते है। और कभी-कभी उनकी मोटर रात के सन्नाटे में मिस जोशी के मकान से निकलती हुई लोगो को दिखाई देती है। इस प्रेम में वासना की मात्रा अधिक है या भक्ति की, यह कोई नही जानता। लेकिन मिस्टर जौहरी विवाहित है और मिस जौशी विधवा, इसलिए जो लोग उनके प्रेम को कलुषित कहते है, वे उन पर कोई अत्याचार नहीं करते। बम्बई की व्यवस्थापिका-सभा ने अनाज पर कर लगा दिया था और जनता की ओर से उसका विरोध करने के लिए एक विराट सभा हो रही थी। सभी नगरों से प्रजा के प्रतिनिधि उसमें सम्मिलित होने के लिए हजारो की संख्या में आये थे। मिस जोशी के विशाला भवन के सामने, चौड़े मैदान में हरी-भरी घास पर बम्बई की जनता उपनी फरियाद सुनाने के लिए जमा थी। अभी तक सभापति न आये थे, इसलिए लोग बैठे गप-शप कर रहे थे। कोई कर्मचारी पर आक्षेप करता था, कोई देश की स्थिति पर, कोई अपनी दीनता पर—अगर हम लोगो में अगड़ने का जरा भी सामर्थ्य होता तो मजाल थी कि यह कर लगा दिया जाता, अधिकारियों का घर से बाहर निकलना मुश्किल हो जाता। हमारा जरुरत से ज्यादा सीधापन हमें अधिकारियों के हाथों का खिलौना बनाए हुए है। वे जानते हैं कि इन्हें जितना दबाते जाओ, उतना दबते जायेगें, सिर नहीं उठा सकते। सरकार ने भी उपद्रव की आंशका से सशस्त्र पुलिस बुला ली। उस मैदान के चारों कोनो पर सिपाहियों के दल डेरा डाले पड़े थे। उनके अफसर, घोड़ों पर सवार, हाथ में हंटर लिए, जनता के बीच में निश्शंक भाव से घोंड़े दौड़ाते फिरते थे, मानों साफ मैदान है। मिस जोशी के ऊंचे बरामदे में नगर के सभी बड़े-बड़े रईस और राज्याधिकारी तमाशा देखने के लिए बैठे हुए थे। मिस जोशी मेहमानों का आदर-सत्कार कर रही थीं और मिस्टर जौहरी, आराम-कुर्सी पर लेटे, इस जन-समूह को घृणा और भय की दृष्टि से देख रहे थे। सहसा सभापति महाशय आपटे एक किराये के तांगे पर आते दिखाई दिये। चारों तरफ हलचल मच गई, लोग उठ-उठकर उनका स्वागत करने दौड़े और उन्हें ला कर मंच पर बैठा दिया। आपटे की अवस्था ३०-३५ वर्ष से अधिक न थी; दुबले-पतले आदमी थे, मुख पर चिन्ता का गाढ़ा रंग-चढ़ा हुआ था। बाल भी पक चले थे, पर मुख पर सरल हास्य की रेखा झलक रही थी। वह एक सफेद मोटा कुरता पहने थे, न पांव में जूते थे, न सिर पर टोपी। इस अद्धर्नग्न, दुर्बल, निस्तेज प्राणी में न जाने कौल-सा जादू था कि समस्त जनता उसकी पूजा करती थी, उसके पैरों में न जाने कौन सा जादू था कि समस्त जरत उसकी पूजा करती थी, उसके पैरो पर सिर रगड़ती थी। इस एक प्राणी के हाथों में इतनी शक्ति थी कि वह क्षण मात्र में सारी मिलों को बंद करा सकता था, शहर का सारा कारोबार मिटा सकता था। अधिकारियों को उसके भय से नींद न आती थी, रात को सोते-सोते चौंक पड़ते थे। उससे ज्यादा भंयकर जन्तु अधिकारियों की दृष्टि में दूसरा न था। ये प्रचंड शासन-शक्ति उस एक हड्डी के आदमी से थरथर कांपती थी, क्योंकि उस हड्डी में एक पवित्र, निष्कलंक, बलवान और दिव्य आत्मा का निवास था। २ आपटे नें मंच पर खड़ें हो कर पहले जनता को शांत चित्त रहने और अहिंसा-व्रत पालन करने का आदेश दिया। फिर देश में राजनितिक स्थिति का वर्णन करने लगे। सहसा उनकी दृष्टि सामने मिस जोशी के बरामदे की ओर गई तो उनका प्रजा-दुख पीड़ित हृदय तिलमिला उठा। यहां अगणित प्राणी अपनी विपत्ति की फरियाद सुनने के लिए जमा थे और वहां मेंजो पर चाय और बिस्कुट, मेवे और फल, बर्फ और शराब की रेल-पेल थी। वे लोग इन अभागों को देख-देख हंसते और तालियां बजाते थे। जीवन में पहली बार आपटे की जबान काबू से बाहर हो गयी। मेघ की भांति गरज कर बोले— ‘इधर तो हमारे भाई दाने-दाने को मुहताज हो रहे है, उधर अनाज पर कर लगाया जा रहा है, केवल इसलिए कि राजकर्मचारियों के हलवे-पूरी में कमी न हो। हम जो देश के राजा हैं, जो छाती फाड़ कर धरती से धन निकालते हैं, भूखों मरते हैं; और वे लोग, जिन्हें हमने अपने सुख और शाति की व्यवस्था करने के लिए रखा है, हमारे स्वामी बने हुए शराबों की बोतले उड़ाते हैं। कितनी अनोखी बात है कि स्वामी भूखों मरें और सेवक शराबें उड़ायें, मेवे खायें और इटली और स्पेन की मिठाइयां चलें! यह किसका अपराध है? क्या सेवकों का? नहीं, कदापि नहीं, हमारा ही अपराध है कि हमने अपने सेवकों को इतना अधिकार दे रखा है। आज हम उच्च स्वर से कह देना चाहते हैं कि हम यह क्रूर और कुटिल व्यवहार नहीं सह सकते। यह हमारें लिए असह्य है कि हम और हमारे बाल-बच्चे दानों को तरसें और कर्मचारी लोग, विलास में डूबें हुए हमारे करूण-क्रन्दन की जरा भी परवा न करते हुए विहार करें। यह असह्य है कि हमारें घरों में चूल्हें न जलें और कर्मचारी लोग थिएटरों में ऐश करें, नाच-रंग की महफिलें सजायें, दावतें उड़ायें, वेश्याओं पर कंचन की वर्षा करें। संसार में और ऐसा कौन देश होगा, जहां प्रजा तो भूखी मरती हो और प्रधान कर्मचारी अपनी प्रेम-क्रिड़ा में मग्न हो, जहां स्त्रियां गलियों में ठोकरें खाती फिरती हों और अध्यापिकाओं का वेष धारण करने वाली वेश्याएं आमोद-प्रमोद के नशें में चूर हों---- ३ एकाएक सशस्त्र सिपाहियों के दल में हलचल पड़ गई। उनका अफसर हुक्म दे रहा था—सभा भंग कर दो, नेताओं को पकड़ लो, कोई न जाने पाए। यह विद्रोहात्म व्याख्यान है। मिस्टर जौहरी ने पुलिस के अफसर को इशारे पर बुलाकर कहा—और किसी को गिरफ्तार करने की जरुरत नहीं। आपटे ही को पकड़ो। वही हमारा शत्रु है। पुलिस ने डंडे चलने शुरु किये। और कई सिपाहियों के साथ जाकर अफसर ने अपटे को गिरफ्तार कर लिया। जनता ने त्यौरियां बदलीं। अपने प्यारे नेता को यों गिरफ्तार होते देख कर उनका धैर्य हाथ से जाता रहा। लेकिन उसी वक्त आपटे की ललकार सुनाई दी—तुमने अहिंसा-व्रत लिया है और अगर किसी ने उस व्रत को तोड़ा तो उसका दोष मेरे सिर होगा। मैं तुमसे सविनय अनुरोध करता हूं कि अपने-अपने घर जाओं। अधिकारियों ने वही किया जो हम समझते थे। इस सभा से हमारा जो उद्देश्य था वह पूरा हो गया। हम यहां बलवा करने नहीं, केवल संसार की नैतिक सहानुभूति प्राप्त करने के लिए जमा हुए थे, और हमारा उद्देश्य पूरा हो गया। एक क्षण में सभा भंग हो गयी और आपटे पुलिस की हवालात में भेज दिए गये। ४ मिस्टर जौहरी ने कहा—बच्चा बहुत दिनों के बाद पंजे में आए हैं, राज-द्रोह का मुकदमा चलाकर कम से कम १० साल के लिए अंडमान भेंजूगां। मिस जोशी—इससे क्या फायदा? ‘क्यों? उसको अपने किए की सजा मिल जाएगी।’ ‘लेकिन सोचिए, हमें उसका कितना मूल्य देना पड़ेगा। अभी जिस बात को गिने-गिनाये लोग जानते हैं, वह सारे संसार में फैलेगी और हम कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं रहेंगें। आप अखबारों में संवाददाताओं की जबान तो नहीं बंद कर सकते।’ ‘कुछ भी हो मैं इसे जेल में सड़ाना चाहता हूं। कुछ दिनों के लिए तो चैन की नींद नसीब होगी। बदनामी से डरना ही व्यर्थ है। हम प्रांत के सारे समाचार-पत्रों को अपने सदाचार का राग अलापने के लिए मोल ले सकते हैं। हम प्रत्येक लांछन को झूठ साबित कर सकते हैं, आपटे पर मिथ्या दोषारोपरण का अपराध लगा सकते हैं।’ ‘मैं इससे सहज उपाय बतला सकती हूं। आप आपटे को मेरे हाथ में छोड़ दीजिए। मैं उससे मिलूंगी और उन यंत्रों से, जिनका प्रयोग करने में हमारी जाति सिद्धहस्त है, उसके आंतरिक भावों और विचारों की थाह लेकर आपके सामने रख दूंगी। मैं ऐसे प्रमाण खोज निकालना चाहती हूं जिनके उत्तर में उसे मुंह खोलने का साहस न हो, और संसार की सहानुभूति उसके बदले हमारे साथ हो। चारों ओर से यही आवाज आये कि यह कपटी ओर धूर्त था और सरकर ने उसके साथ वही व्यवहार किया है जो होना चाहिए। मुझे विश्वास है कि वह षंड्यंत्रकारियों का मुखिया है और मैं इसे सिद्ध कर देना चाहती हूं। मैं उसे जनता की दृष्टि में देवता नहीं बनाना चाहतीं हूं, उसको राक्षस के रुप में दिखाना चाहती हूं। ‘ऐसा कोई पुरुष नहीं है, जिस पर युवती अपनी मोहिनी न डाल सके।’ ‘अगर तुम्हें विश्वास है कि तुम यह काम पूरा कर दिखाओंगी, तो मुझे कोई आपत्ति नहीं है। मैं तो केवल उसे दंड देना चाहता हूं।’ ‘तो हुक्म दे दीजिए कि वह इसी वक्त छोड़ दिया जाय।’ ‘जनता कहीं यह तो न समझेगी कि सरकार डर गयी?’ ‘नहीं, मेरे ख्याल में तो जनता पर इस व्यवहार का बहुत अच्छा असर पड़ेगा। लोग समझेगें कि सरकार ने जनमत का सम्मान किया है।’ ‘लेकिन तुम्हें उसके घर जाते लोग देखेंगे तो मन में क्या कहेंगे?’ ‘नकाब डालकर जाऊंगी, किसी को कानोंकान खबर न होगी।’ ‘मुझे तो अब भी भय है कि वह तुम्हे संदेह की दृष्टि से देखेगा और तुम्हारे पंजे में न आयेगा, लेकिन तुम्हारी इच्छा है तो आजमा देखों।’ यह कहकर मिस्टर जौहरी ने मिस जोशी को प्रेममय नेत्रों से देखा, हाथ मिलाया और चले गए। आकाश पर तारे निकले हुए थे, चैत की शीतल, सुखद वायु चल रही थी, सामने के चौड़े मैदान में सन्नाटा छाया हुआ था, लेकिन मिस जोशी को ऐसा मालूम हुआ मानों आपटे मंच पर खड़ा बोल रहा है। उसक शांत, सौम्य, विषादमय स्वरुप उसकी आंखों में समाया हुआ था। ५ प्रातःकाल मिस जोशी अपने भवन से निकली, लेकिन उसके वस्त्र बहुत साधारण थे और आभूषण के नाम शरीर पर एक धागा भी न था। अलंकार-विहीन हो कर उसकी छवि स्वच्छ, जल की भांति और भी निखर गयी। उसने सड़क पर आकर एक तांगा लिया और चली। अपटे का मकान गरीबों के एक दूर के मुहल्ले में था। तांगेवाला मकान का पता जानता था। कोई दिक्कत न हुई। मिस जोशी जब मकान के द्वार पर पहुंची तो न जाने क्यों उसका दिल धड़क रहा था। उसने कांपते हुए हाथों से कुंडी खटखटायी। एक अधेड़ औरत निकलकर द्वार खोल दिय। मिस जोशी उस घर की सादगी देख दंग रह गयी। एक किनारें चारपाई पड़ी हुई थी, एक टूटी आलमारी में कुछ किताबें चुनी हुई थीं, फर्श पर खिलने का डेस्क था ओर एक रस्सी की अलगनी पर कपड़े लटक रहे थे। कमरे के दूसरे हिस्से में एक लोहे का चूल्हा था और खाने के बरतन पड़े हुए थे। एक लम्बा-तगड़ा आदमी, जो उसी अधेड़ औरत का पति था, बैठा एक टूटे हुए ताले की मरम्मत कर रहा था और एक पांच-छ वर्ष का तेजस्वी बालक आपटे की पीठ पर चढ़ने के लिए उनके गले में हाथ डाल रहा था। आपटे इसी लोहार के साथ उसी घर में रहते थे। समाचार-पत्रों के लेख लिखकर जो कुछ मिलता उसे दे देते और इस भांति गृह-प्रबंध की चिंताओं से छुट्टी पाकर जीवन व्यतीत करते थें। मिस जोशी को देखकर आपटे जरा चौंके, फिर खड़े होकर उनका स्वागत किया और सोचने लगे कि कहां बैठाऊं। अपनी दरिद्रता पर आज उन्हें जितनी लाज आयी उतनी और कभी न आयी थी। मिस जोशी उनका असमंजस देखकर चारपाई पर बैठ गयी और जरा रुखाई से बोली---मैं बिना बुलाये आपके यहां आने के लिए क्षमा मांगती हूं किंतु काम ऐसा जरुरी था कि मेरे आये बिना पूरा न हो सकता। क्या मैं एक मिनट के लिए आपसे एकांत में मिल सकती हूं। आपटे ने जगन्नाथ की ओर देख कर कमरे से बाहर चले जाने का इशारा किया। उसकी स्त्री भी बाहर चली गयी। केवल बालक रह गया। वह मिस जोशी की ओर बार-बार उत्सुक आंखों से देखता था। मानों पूछ रहा हो कि तुम आपटे दादा की कौन हो? मिस जोशी ने चारपाई से उतर कर जमीन पर बैठते हुए कहा---आप कुछ अनुमान कर सकते हैं कि इस वक्त क्यों आयी हूं। आपटे ने झेंपते हुए कहा---आपकी कृपा के सिवा और क्या कारण हो सकता है? मिस जोशी---नहीं, संसार इतना उदार नहीं हुआ कि आप जिसे गांलियां दें, वह आपको धन्यवाद दे। आपको याद है कि कल आपने अपने व्याख्यान में मुझ पर क्या-क्या आक्षेप किए थे? मैं आपसे जोर देकर कहती हूं कि वे आक्षेप करके आपने मुझपर घोर अत्याचार किया है। आप जैसे सहृदय, शीलवान, विद्वान आदमी से मुझे ऐसी आशा न थी। मैं अबला हूं, मेरी रक्षा करने वाला कोई नहीं है? क्या आपको उचित था कि एक अबला पर मिथ्यारोपण करें? अगर मैं पुरुष होती तो आपसे ड्यूल खेलने का आग्रह करती। अबला हूं, इसलिए आपकी सज्जनता को स्पर्श करना ही मेरे हाथ में है। आपने मुझ पर जो लांछन लगाये हैं, वे सर्वथा निर्मूल हैं। आपटे ने दृढ़ता से कहा---अनुमान तो बाहरी प्रमाणों से ही किया जाता है। मिस जोशी—बाहरी प्रमाणों से आप किसी के अंतस्तल की बात नहीं जान सकते। आपटे—जिसका भीतर-बाहर एक न हो, उसे देख कर भ्रम में पड़ जाना स्वाभाविक है। मिस जाशी—हां, तो वह आपका भ्रम है और मैं चाहती हूं कि आप उस कलंक को मिटा दे जो आपने मुझ पर लगाया है। आप इसके लिए प्रायश्चित करेंगे? आपटे---अगर न करूं तो मुझसे बड़ा दुरात्मा संसार में न होगा। मिस जोशी—आप मुझपर विश्वास करते हैं। आपटे—मैंने आज तक किसी रमणी पर विश्वास नहीं किया। मिस जोशी—क्या आपको यह संदेह हो रहा है कि मैं आपके साथ कौशल कर रही हूं? आपटे ने मिस जोशी की ओर अपने सदय, सजल, सरल नेत्रों से देख कर कहा—बाई जी, मैं गंवार और अशिष्ट प्राणी हूं। लेकिन नारी-जाति के लिए मेरे हृदय में जो आदर है, वह श्रद्धा से कम नहीं है, जो मुझे देवताओं पर हैं। मैंने अपनी माता का मुख नहीं देखा, यह भी नहीं जानता कि मेरा पिता कौन था; किंतु जिस देवी के दया-वृक्ष की छाया में मेरा पालन-पोषण हुआ उनकी प्रेम-मूर्ति आज तक मेरी आंखों के सामने है और नारी के प्रति मेरी भक्ति को सजीव रखे हुए है। मै उन शब्दों को मुंह से निकालने के लिए अत्यंत दु:खी और लज्जित हूं जो आवेश में निकल गये, और मै आज ही समाचार-पत्रों में खेद प्रकट करके आपसे क्षमा की प्रार्थना करुंगा। मिस जोशी का अब तक अधिकांश स्वार्थी आदमियों ही से साबिका पड़ा था, जिनके चिकने-चुपड़े शब्दों में मतलब छुपा हुआ था। आपटे के सरल विश्वास पर उसका चित्त आनंद से गद्गद हो गया। शायद वह गंगा में खड़ी होकर अपने अन्य मित्रों से यह कहती तो उसके फैशनेबुल मिलने वालों में से किसी को उस पर विश्वास न आता। सब मुंह के सामने तो ‘हां-हां’ करते, पर बाहर निकलते ही उसका मजाक उड़ाना शुरु करते। उन कपटी मित्रों के सम्मुख यह आदमी था जिसके एक-एक शब्द में सच्चाई झलक रही थी, जिसके शब्द अंतस्तल से निकलते हुए मालूम होते थे। आपटे उसे चुप देखकर किसी और ही चिंता में पड़े हुए थें। उन्हें भय हो रहा था अब मैं चाहे कितना क्षमा मांगू, मिस जोशी के सामने कितनी सफाइयां पेश करूं, मेरे आक्षेपों का असर कभी न मिटेगा। इस भाव ने अज्ञात रुप से उन्हें अपने विषय की गुप्त बातें कहने की प्रेरणा की जो उन्हें उसकी दृष्टि में लघु बना दें, जिससे वह भी उन्हें नीच समझने लगे, उसको संतोष हो जाए कि यह भी कलुषित आत्मा है। बोले—मैं जन्म से अभागा हूं। माता-पिता का तो मुंह ही देखना नसीब न हुआ, जिस दयाशील महिला ने मुझे आश्रय दिया था, वह भी मुझे १३ वर्ष की अवस्था में अनाथ छोड़कर परलोक सिधार गयी। उस समय मेरे सिर पर जो कुछ बीती उसे याद करके इतनी लज्जा आती हे कि किसी को मुंह न दिखाऊं। मैंने धोबी का काम किया; मोची का काम किया; घोड़े की साईसी की; एक होटल में बरतन मांजता रहा; यहां तक कि कितनी ही बार क्षुधासे व्याकुल होकर भीख मांगी। मजदूरी करने को बुरा नहीं समझता, आज भी मजदूरी ही करता हूं। भीख मांगनी भी किसी-किसी दशा में क्षम्य है, लेकिन मैंने उस अवस्था में ऐसे-ऐसे कर्म किए, जिन्हें कहते लज्जा आती है—चोरी की, विश्वासघात किया, यहां तक कि चोरी के अपराध में कैद की सजा भी पायी। मिस जोशी ने सजल नयन होकर कहा—आज यह सब बातें मुझसे क्यों कर रहे हैं? मैं इनका उल्लेख करके आपको कितना बदनाम कर सकतीं हूं, इसका आपको भय नहीं है? आपटे ने हंसकर कहा—नहीं, आपसे मुझे भय नहीं है। मिस जोशी—अगर मैं आपसे बदला लेना चाहूं, तो? आपटे---जब मैं अपने अपराध पर लज्जित होकर आपसे क्षमा मांग रहा हूं, तो मेरा अपराध रहा ही कहाँ, जिसका आप मुझसे बदला लेंगी। इससे तो मुझे भय होता है कि आपने मुझे क्षमा नहीं किया। लेकिन यदि मैंने आपसे क्षमा न मांगी तो मुझसे तो बदला न ले सकतीं। बदला लेने वाले की आंखें यो सजल नहीं हो जाया करतीं। मैं आपको कपट करने के अयोग्य समझता हूं। आप यदि कपट करना चाहतीं तो यहां कभी न आतीं। मिस जोशी—मै आपका भेद लेने ही के लिए आयी हूं। आपटे---तो शौक से लीजिए। मैं बतला चुका हूं कि मैंने चोरी के अपराध में कैद की सजा पायी थी। नासिक के जेल में रखा गया था। मेरा शरीर दुर्बल था, जेल की कड़ी मेहनत न हो सकती थी और अधिकारी लोग मुझे कामचोर समझ कर बेंतो से मारते थे। आखिर एक दिन मैं रात को जेल से भाग खड़ा हुआ। मिस जोशी—आप तो छिपे रुस्तम निकले! आपटे--- ऐसा भागा कि किसी को खबर न हुई। आज तक मेरे नाम वारंट जारी है और ५०० रु0 का इनाम भी है। मिस जोशी----तब तो मैं आपको जरुर पकड़ा दूंगी। आपटे---तो फिर मैं आपको अपना असल नाम भी बता देता हूं। मेरा नाम दामोदर मोदी है। यह नाम तो पुलिस से बचने के लिए रख छोड़ा है। बालक अब तक तो चुपचाप बैठा हुआ था। मिस जोशी के मुंह से पकड़ाने की बात सुनकर वह सजग हो गया। उन्हें डांटकर बोला—हमाले दादा को कौन पकड़ेगा? मिस जोशी---सिपाही और कौन? बालक---हम सिपाही को मालेंगे। यह कहकर वह एक कोने से अपने खेलने वाला डंडा उठा लाया और आपटे के पास वीरोचिता भाव से खड़ा हो गया, मानो सिपाहियों से उनकी रक्षा कर रहा है। मिस जोशी---आपका रक्षक तो बड़ा बहादुर मालूम होता है। आपटे----इसकी भी एक कथा है। साल-भर होता है, यह लड़का खो गया था। मुझे रास्ते में मिला। मैं पूछता-पूछता इसे यहां लाया। उसी दिन से इन लोगों से मेरा इतना प्रेम हो गया कि मैं इनके साथ रहने लगा। मिस जोशी---आप अनुमान कर सकते हैं कि आपका वृतान्त सुनकर मैं आपको क्या समझ रही हूं। आपटे---वही, जो मैं वास्तव में हूं---नीच, कमीना धूर्त.... मिस जोशी---नहीं, आप मुझ पर फिर अन्याय कर रहे है। पहला अन्याय तो क्षमा कर सकती हूं, यह अन्याय क्षमा नहीं कर सकती। इतनी प्रतिकूल दशाओं में पड़कर भी जिसका हृदय इतना पवित्र, इतना निष्कपट, इतना सदय हो, वह आदमी नहीं देवता है। भगवन्, आपने मुझ पर जो आक्षेप किये वह सत्य हैं। मैं आपके अनुमान से कहीं भ्रष्ट हूं। मैं इस योग्य भी नहीं हूं कि आपकी ओर ताक सकूं। आपने अपने हृदय की विशालता दिखाकर मेरा असली स्वरुप मेरे सामने प्रकट कर दिया। मुझे क्षमा कीजिए, मुझ पर दया कीजिए। यह कहते-कहते वह उनके पैंरो पर गिर पड़ी। आपटे ने उसे उठा लिया और बोले----ईश्वर के लिए मुझे लज्जित न करो। मिस जोशी ने गद्गद कंठ से कहा---आप इन दुष्टों के हाथ से मेरा उद्धार कीजिए। मुझे इस योग्य बनाइए कि आपकी विश्वासपात्री बन सकूं। ईश्वर साक्षी है कि मुझे कभी-कभी अपनी दशा पर कितना दुख होता है। मैं बार-बार चेष्टा करती हूं कि अपनी दशा सुधारुं; इस विलासिता के जाल को तोड़ दूं, जो मेरी आत्मा को चारों तरफ से जकड़े हुए है, पर दुर्बल आत्मा अपने निश्चय पर स्थित नहीं रहती। मेरा पालन-पोषण जिस ढंग से हुआ, उसका यह परिणाम होना स्वाभाविक-सा मालूम होता है। मेरी उच्च शिक्षा ने गृहिणी-जीवन से मेरे मन में घृणा पैदा कर दी। मुझे किसी पुरुष के अधीन रहने का विचार अस्वाभाविक जान पडता था। मैं गृहिणी की जिम्मेदारियों और चिंताओं को अपनी मानसिक स्वाधीनता के लिए विष-तुल्य समझती थी। मैं तर्कबुद्धि से अपने स्त्रीत्व को मिटा देना चाहती थी, मैं पुरुषों की भांति स्वतंत्र रहना चाहती थी। क्यों किसी की पांबद होकर रहूं? क्यों अपनी इच्छाओं को किसी व्यक्ति के सांचे में ढालू? क्यों किसी को यह अधिकार दूं कि तुमने यह क्यों किया, वह क्यों किया? दाम्पत्य मेरी निगाह में तुच्छ वस्तु थी। अपने माता-पिता की आलोचना करना मेरे लिए अचित नहीं, ईश्वर उन्हें सद्गति दे, उनकी राय किसी बात पर न मिलती थी। पिता विद्वान् थे, माता के लिए ‘काला अक्षर भैंस बराबर’ था। उनमें रात-दिन वाद-विवाद होता रहता था। पिताजी ऐसी स्त्री से विवाह हो जाना अपने जीवन का सबसे बड़ा दुर्भाग्य समझते थे। वह यह कहते कभी न थकते थे कि तुम मेरे पांव की बेड़ी बन गयीं, नहीं तो मैं न जाने कहां उड़कर पहुंचा होता। उनके विचार मे सारा दोष माता की अशिक्षा के सिर था। वह अपनी एकमात्र पुत्री को मूर्खा माता से संसर्ग से दूर रखना चाहते थे। माता कभी मुझसे कुछ कहतीं तो पिताजी उन पर टूट पड़ते—तुमसे कितनी बार कह चुका कि लड़की को डांटो मत, वह स्वयं अपना भला-बुरा सोच सकती है, तुम्हारे डांटने से उसके आत्म-सम्मान का कितना धक्का लगेगा, यह तुम नहीं जान सकतीं। आखिर माताजी ने निराश होकर मुझे मेरे हाल पर छोड़ दिया और कदाचित् इसी शोक में चल बसीं। अपने घर की अशांति देखकर मुझे विवाह से और भी घृणा हो गयी। सबसे बड़ा असर मुझ पर मेरे कालेज की लेडी प्रिंसिपल का हुआ जो स्वयं अविवाहित थीं। मेरा तो अब यह विचार है कि युवको की शिक्षा का भार केवल आदर्श चरित्रों पर रखना चाहिए। विलास में रत, कालेजों के शौकिन प्रोफेसर विद्यार्थियों पर कोई अच्छा असर नहीं डाल सकते। मैं इस वक्त ऐसी बात आपसे कह रही हूं। पर अभी घर जाकर यह सब भूल जाऊंगी। मैं जिस संसार में हूं, उसकी जलवायु ही दूषित है। वहां सभी मुझे कीचड़ में लतपत देखना चाहते है। मेरे विलासासक्त रहने में ही उनका स्वार्थ है। आप वह पहले आदमी हैं जिसने मुझ पर विश्वास किया है, जिसने मुझसे निष्कपट व्यवहार किया है। ईश्वर के लिए अब मुझे भूल न जाइयेगा। आपटे ने मिस जोशी की ओर वेदना पूर्ण दृष्टि से देखकर कहा—अगर मैं आपकी कुछ सेवा कर सकूं तो यह मेरे लिए सौभाग्य की बात होगी। मिस जोशी! हम सब मिट्टी के पुतले हैं, कोई निर्दोर्ष नहीं। मनुष्य बिगड़ता है तो परिस्थितियों से, या पूर्व संस्कारों से। परिस्थितियों का त्याग करने से ही बच सकता है, संस्कारों से गिरने वाले मनुष्य का मार्ग इससे कहीं कठिन है। आपकी आत्मा सुन्दर और पवित्र है, केवल परिस्थितियों ने उसे कुहरे की भांति ढंक लिया है। अब विवेक का सूर्य उदय हो गया है, ईश्वर ने चाहा तो कुहरा भी फट जाएगा। लेकिन सबसे पहले उन परिस्थितियों का त्याग करने को तैयार हो जाइए। मिस जोशी—यही आपको करना होगा। आपटे ने चुभती हुई निगाहों से देख कर कहा—वैद्य रोगी को जबरदस्ती दवा पिलाता है। मिस जोशी – मैं सब कुछ करुगीं। मैं कड़वी से कड़वी दवा पियूंगी यदि आप पिलायेंगे। कल आप मेरे घर आने की कृपा करेंगे, शाम को? आपटे---अवश्य आऊंगा। मिस जोशी ने विदा देते हुए कहा---भूलिएगा नहीं, मैं आपकी राह देखती रहूंगी। अपने रक्षक को भी लाइएगा। यह कहकर उसने बालक को गोद मे उठाया ओर उसे गले से लगा कर बाहर निकल आयी। गर्व के मारे उसके पांव जमीन पर न पड़ते थे। मालूम होता था, हवा में उड़ी जा रही है, प्यास से तड़पते हुए मनुष्य को नदी का तट नजर आने लगा था। ६ दूसरे दिन प्रात:काल मिस जोशी ने मेहमानों के नाम दावती कार्ड भेजे और उत्सव मनाने की तैयारियां करने लगी। मिस्टर आपटे के सम्मान में पार्टी दी जा रही थी। मिस्टर जौहरी ने कार्ड देखा तो मुस्कराये। अब महाशय इस जाल से बचकर कहां जायेगे। मिस जोशी ने उन्हें फसाने के लिए यह अच्छी तरकीब निकाली। इस काम में निपुण मालूम होती है। मैने समझा था, आपटे चालाक आदमी होगा, मगर इन आन्दोलनकारी विद्राहियों को बकवास करने के सिवा और क्या सूझ सकती है। चार ही बजे मेहमान लोग आने लगे। नगर के बड़े-बड़े अधिकारी, बड़े-बड़े व्यापारी, बड़े-बड़े विद्वान, समाचार-पत्रों के सम्पादक, अपनी-अपनी महिलाओं के साथ आने लगे। मिस जोशी ने आज अपने अच्छे-से-अच्छे वस्त्र और आभूषण निकाले हुए थे, जिधर निकल जाती थी मालूम होता था, अरुण प्रकाश की छटा चली आरही है। भवन में चारों ओर सुगंध की लपटे आ रही थीं और मधुर संगीत की ध्वनि हवा में गूंज रहीं थी। पांच बजते-बजते मिस्टर जौहरी आ पहुंचे और मिस जोशी से हाथ मिलाते हुए मुस्करा कर बोले—जी चाहता है तुम्हारे हाथ चूम लूं। अब मुझे विश्वास हो गया कि यह महाशय तुम्हारे पंजे से नहीं निकल सकते। मिसेज पेटिट बोलीं---मिस जोशी दिलों का शिकार करने के लिए ही बनाई गई है। मिस्टर सोराब जी---मैंने सुना है, आपटे बिलकुल गंवार-सा आदमी है। मिस्टर भरुचा---किसी यूनिवर्सिटी में शिक्षा ही नहीं पायी, सभ्यता कहां से आती? मिस्टर भरुचा---आज उसे खूब बनाना चाहिए। महंत वीरभद्र डाढ़ी के भीतर से बोले---मैंने सुना है नास्तिक है। वर्णाश्रम धर्म का पालन नहीं करता। मिस जोशी---नास्तिक तो मै भी हूं। ईश्वर पर मेरा भी विश्वास नहीं है। महंत---आप नास्तिक हों, पर आप कितने ही नास्तिकों को आस्तिक बना देती हैं। मिस्टर जौहरी---आपने लाख की बात कहीं मंहत जी! मिसेज भरुचा—क्यों महंत जी, आपको मिस जोशी ही न आस्तिक बनाया है क्या? सहसा आपटे लोहार के बालक की उंगली पकड़े हुए भवन में दाखिल हुए। वह पूरे फैशनेबुल रईस बने हुए थे। बालक भी किसी रईस का लड़का मालूम होता था। आज आपटे को देखकर लोगो को विदित हुआ कि वह कितना सुदंर, सजीला आदमी है। मुख से शौर्य निकल रहा था, पोर-पोर से शिष्टता झलकती थी, मालूम होता था वह इसी समाज में पला है। लोग देख रहे थे कि वह कहीं चूके और तालियां बजायें, कही कदम फिसले और कहकहे लगायें पर आपटे मंचे हुए खिलाड़ी की भांति, जो कदम उठाता था वह सधा हुआ, जो हाथ दिखलाता था वह जमा हुआ। लोग उसे पहले तुच्छ समझते थे, अब उससे ईर्ष्या करने लगे, उस पर फबतियां उड़ानी शुरु कीं। लेकिन आपटे इस कला में भी एक ही निकला। बात मुंह से निकली ओर उसने जवाब दिया, पर उसके जवाब में मालिन्य या कटुता का लेश भी न होता था। उसका एक-एक शब्द सरल, स्वच्छ, चित्त को प्रसन्न करने वाले भावों में डूबा होता था। मिस जोशी उसकी वाक्यचातुरी पर फुल उठती थी? सोराब जी---आपने किस यूनिवर्सिटी से शिक्षा पायी थी? आपटे---यूनिवर्सिटी में शिक्षा पायी होती तो आज मैं भी शिक्षा-विभाग का अध्यक्ष होता। मिसेज भरुचा—मैं तो आपको भयंकर जंतु समझती थी? आपटे ने मुस्करा कर कहा—आपने मुझे महिलाओं के सामने न देखा होगा। सहसा मिस जोशी अपने सोने के कमरे में गयी ओर अपने सारे वस्त्राभूषण उतार फेंके। उसके मुख से शुभ्र संकल्प का तेज निकल रहा था। नेंत्रो से दबी ज्योति प्रस्फुटित हो रही थी, मानों किसी देवता ने उसे वरदान दिया हो। उसने सजे हुए कमरे को घृणा से देखा, अपने आभूषणों को पैरों से ठुकरा दिया और एक मोटी साफ साड़ी पहनकर बाहर निकली। आज प्रात:काल ही उसने यह साड़ी मंगा ली थी। उसे इस नये वेश में देख कर सब लोग चकित हो गये। कायापलट कैसी? सहसा किसी की आंखों को विश्वास न आया; किंतु मिस्टर जौहरी बगलें बजाने लगे। मिस जोशी ने इसे फंसाने के लिए यह कोई नया स्वांग रचा है। ‘मित्रों! आपको याद है, परसों महाशय आपटे ने मुझे कितनी गांलियां दी थी। यह महाशय खड़े हैं। आज मैं इन्हें उस दुर्व्यवहार का दण्ड देना चाहती हूं। मैं कल इनके मकान पर जाकर इनके जीवन के सारे गुप्त रहस्यों को जान आयी। यह जो जनता की भीड़ गरजते फिरते है, मेरे एक ही निशाने पर गिर पड़े। मैं उन रहस्यों के खोलने में अब विलंब न करुंगी, आप लोग अधीर हो रहे होगें। मैंने जो कुछ देखा, वह इतना भंयकर है कि उसका वृतांत सुनकर शायद आप लोगों को मूर्छा आ जायेगी। अब मुझे लेशमात्र भी संदेह नहीं है कि यह महाशय पक्के देशद्रोही है....’ मिस्टर जौहरी ने ताली बजायी ओर तालियों के हॉल गूंज उठा। मिस जोशी---लेकिन राज के द्रोही नहीं, अन्याय के द्रोही, दमन के द्रोही, अभिमान के द्रोही--- चारों ओर सन्नाटा छा गया। लोग विस्मित होकर एक दूसरे की ओर ताकने लगे। मिस जोशी---गुप्त रुप से शस्त्र जमा किए है और गुप्त रुप से हत्याऍं की हैं......... मिस्टर जौहरी ने तालियां बजायी और तालियां का दौगड़ा फिर बरस गया। मिस जोशी—लेकिन किस की हत्या? दु:ख की, दरिद्रता की, प्रजा के कष्टों की, हठधर्मी की ओर अपने स्वार्थ की। चारों ओर फिर सन्नाटा छा गया और लोग चकित हो-हो कर एक दूसरे की ओर ताकने लगे, मानो उन्हें अपने कानों पर विश्वास नहीं है। मिस जोशी—महाराज आपटे ने डकैतियां की और कर रहे हैं--- अब की किसी ने ताली न बजायी, लोग सुनना चाहते थे कि देखे आगे क्या कहती है। ‘उन्होंने मुझ पर भी हाथ साफ किया है, मेरा सब कुछ अपहरण कर लिया है, यहां तक कि अब मैं निराधार हूं और उनके चरणों के सिवा मेरे लिए कोई आश्रय नहीं है। प्राण्धार! इस अबला को अपने चरणों में स्थान दो, उसे डूबने से बचाओ। मैं जानती हूं तुम मुझे निराश न करोंगें।’ यह कहते-कहते वह जाकर आपटे के चरणों में गिर पड़ी। सारी मण्डली स्तंभित रह गयी। ७ एक सप्ताह गुजर चुका था। आपटे पुलिस की हिरासत में थे। उन पर चार अभियोग चलाने की तैयारियां चल रहीं थी। सारे प्रांत में हलचल मची हुई थी। नगर में रोज सभाएं होती थीं, पुलिस रोज दस-पांच आदमियां को पकड़ती थी। समाचार-पत्रों में जोरों के साथ वाद-विवाद हो रहा था। रात के नौ बज गये थे। मिस्टर जौहरी राज-भवन में मेंज पर बैठे हुए सोच रहे थे कि मिस जोशी को क्यों कर वापस लाएं? उसी दिन से उनकी छाती पर सांप लोट रहा था। उसकी सूरत एक क्षण के लिए आंखों से न उतरती थी। वह सोच रहे थे, इसने मेरे साथ ऐसी दगा की! मैंने इसके लिए क्या कुछ नहीं किया? इसकी कौन-सी इच्छा थी, जो मैने पूरी नहीं की इसी ने मुझसे बेवफाई की। नहीं, कभी नहीं, मैं इसके बगैर जिंदा नहीं रह सकता। दुनिया चाहे मुझे बदनाम करे, हत्यारा कहे, चाहे मुझे पद से हाथ धोना पड़े, लेकिन आपटे को नहीं छोड़ूगां। इस रोड़े को रास्ते से हटा दूंगा, इस कांटे को पहलू से निकाल बाहर करुंगा। सहसा कमरे का दरवाजा खुला और मिस जाशी ने प्रवेश किया। मिस्टर जौहरी हकबका कर कुर्सी पर से उठ खड़े हुए, यह सोच रहे थे कि शायद मिस जोशी ने निराश होकर मेरे पास आयी हैं, कुछ रुखे, लेकिन नम्र भाव से बोले---आओ बाला, तुम्हारी याद में बैठा था। तुम कितनी ही बेवफाई करो, पर तुम्हारी याद मेरे दिल से नहीं निकल सकती। मिस जोशी---आप केवल जबान से कहते है। मिस्टर जौहरी—क्या दिल चीरकर दिखा दूं? मिस जोशी—प्रेम प्रतिकार नहीं करता, प्रेम में दुराग्रह नहीं होता। आप मेर खून के प्यासे हो रहे हैं, उस पर भी आप कहते हैं, मैं तुम्हारी याद करता हूं। आपने मेरे स्वामी को हिरासत में डाल रखा है, यह प्रेम है! आखिर आप मुझसे क्या चाहते हैं? अगर आप समझ रहे हों कि इन सख्तियों से डर कर मै आपकी शरण आ जाऊंगी तो आपका भ्रम है। आपको अख्तियार है कि आपटे को काले पानी भेज दें, फांसी चढ़ा दें, लेकिन इसका मुझ पर कोई असर न होगा। वह मेरे स्वमी हैं, मैं उनको अपना स्वामी समझती हूं। उन्होने अपनी विशाल उदारता से मेरा उद्धार किया। आप मुझे विषय के फंदो में फंसाते थे, मेरी आत्मा को कलुषित करते थे। कभी आपको यह खयाल आया कि इसकी आत्मा पर क्या बीत रही होगी? आप मुझे आत्मशुन्य समझते थे। इस देवपुरुष ने अपनी निर्मल स्वच्छ आत्मा के आकर्षण से मुझे पहली ही मुलाकात में खींच लिया। मैं उसकी हो गयी और मरते दम तक उसी की रहूंगी। उस मार्ग से अब आप हटा नहीं सकते। मुझे एक सच्ची आत्मा की जरुरत थी, वह मुझे मिल गयी। उसे पाकर अब तीनों लोक की सम्पदा मेरी आंखो में तुच्छ है। मैं उनके वियोग में चाहे प्राण दे दूं, पर आपके काम नहीं आ सकती। मिस्टर जौहरी---मिस जोशी। प्रेम उदार नहीं होता, क्षमाशील नहीं होता। मेरे लिए तुम सर्वस्व हो, जब तक मैं समझता हूं कि तुम मेरी हो। अगर तुम मेरी नहीं हो सकती तो मुझे इसकी क्या चिंता हो सकती है कि तुम किस दिशा में हो? मिस जोशी—यह आपका अंतिम निर्णय है? मिस्टर जौहरी—अगर मैं कह दूं कि हां, तो? मिस जोशी ने सीने से पिस्तौल निकाल कर कहा---तो पहले आप की लाश जमीन पर फड्रकती होगी और आपके बाद मेरी, बोलिए। यह आपका अंतिम निर्णय निश्चय है? यह कहकर मिस जोशी ने जौहरी की तरफ पिस्तौल सीधा किया। जौहरी कुर्सी से उठ खड़े हुए और मुस्कर बोले—क्या तुम मेरे लिए कभी इतना साहस कर सकती थीं? जाओं, तुम्हारा आपटे तुम्हें मुबारक हो। उस पर से अभियोग उठा लिया जाएगा। पवित्र प्रेम ही मे यह साहस है। अब मुझे विश्वास हो गया कि तुम्हारा प्रेम पवित्र है। अगर कोई पुराना पापी भविष्यवाणी कर सकता है तो मैं कहता हूं, वह दिन दूर नहीं है, जब तुम इस भवन की स्वामिनी होगी। आपटे ने मुझे प्रेम के क्षेत्र में नहीं, राजनीति के क्षेत्र में भी परास्त कर दिया। सच्चा आदमी एक मुलाकात में ही जीवन बदल सकता है, आत्मा को जगा सकता है और अज्ञान को मिटा कर प्रकाश की ज्योति फैला सकता है, यह आज सिद्ध हो गया। ********
- सौदा
महेश कुमार केशरी "मुझे ये सब कुछ ठीक नहीं लग रहा है? "जग्गू बाबू ने निर्विकार भाव से निर्लिप्त होकर जैसे अपने आप से कहा। लेकिन, पता नहीं कैसे ये बात प्रमोद बाबू के कानों में चली गई थी। वो बैठक से बाहर जा रहें थें। शायद किचेन से प्लेट लेने। और तभी जग्गू बाबू की बात प्रमोद बाबू के कानों में पड़ी थी। आज प्रमोद के बड़े बेटे प्रयाग की शादी की बात चल रही थी। और लड़की वाले आज प्रयाग के फैमिली से मिलने आये थें। ऋचा नोएड़ा में किसी बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी में काम करती है। वैसे प्रमोद बाबू का बेटा प्रयाग भी सॉफ्टवेयर इंजीनियर है, मुंबई में। चौबीस लाख का सालाना पैकेज मिलता है। शादी के बाद प्रयाग, ऋचा को लेकर मुंबई में रहेगा। एक बड़ा फ्लैट खरीदा है, उसने मुंबई में साढ़े चार करोड़ का। "नहीं, कुछ नहीं, ऐसे ही।" जग्गू बाबू टालने की गरज से बोले। लेकिन, प्रमोद ने अपने पिता के मन को टटोला - "ठीक है, आप मुझे अपना नहीं समझते तो मत बताईये।" "अरे, नहीं-नहीं ऐसी कोई बात नहीं है। तुम बैठो मेरे पास।" और जग्गू बाबू ने प्रमोद का हाथ खींचकर वहीं सोफे पर अपने पास बिठा लिया और बोले - "तुम जानते हो मुझे, सबसे खराब बात क्या लगी कि लड़की वालों ने प्रयाग को सैलरी सीट दिखाने को कहा। क्या उनको हमारी बात पर विश्वास नहीं था? और प्रयाग को देखो उसने भी अपनी सैलरी सीट तपाक से दिखा दिया। पुराने समय में लोग लड़के का खानदान, गुण-दोष, चाल-चरित्र देखते थें। अभी के समय में लोग सैलरी सीट देखने लगे हैं। आदमी में लाख ऐब हों। सब तनख्वाह छुपा लेती है। आखिर, ये कैसा समय आ गया है? जब हम सौदा करने लगे हैं। रिश्ते नहीं।" "अरे पापा, आप भी किन पुराने ख्यालातों में गुम रहने वाले इंसानों में से हैं। अभी जमाना बदल गया है। लोग शान से दिखावा करते हैं। ऋचा के माँ-बाप ने भी तो ऋचा की सैलरी सीट दिखाई थी। ऋचा का सालाना पैकेज बारह लाख का है। जब लड़की वाले होकर सैलरी सीट दिखा सकते हैं। तो हम लड़के वाले होकर सैलरी सीट क्यों ना दिखायें? आखिर हम उनसे कम हैं क्या किसी बात में। प्रमोद बाबू ने गर्व के साथ सीना तानकर कहा था। और, आजकल हर जगह ऐसा ही हो रहा है। सब लोग ऐसा ही कर रहें हैं।" इतना कहकर वो उठने को हुए। तभी जग्गू बाबू ने प्रमोद को टोका -"अभी मेरी बात खत्म नहीं हुई है, बैठो।" प्रमोद बाबू वहीं सोफे पर फिर बैठ गये। जग्गू बाबू ने प्रमोद का हाथ अपने हाथों में लेते हुए कहा - "बेटे, प्रमोद इसी लालच और दिखावे ने हमें कहीं का नहीं छोड़ा है। अभी प्रयाग की शादी नहीं हुई है। और वो हमसे अलग एक फ्लैट खरीदकर रहने के लिये तैयारी कर रहा है। आखिर, इसी लालच और दिखावे ने आदमी को स्वार्थी और कमजोर बना दिया है। एकल परिवार की सोच बढ़ा दी है। पता नहीं इतना पैसा लोग कमाकर क्या करेंगें? जिसको देखो वही पैसे की पीछे भाग रहा है। एक मिनट रूककर साँस लेने की फुरसत भी नहीं है आज के आदमी के पास। दिनरात पैसा कमाते हैं। बच्चों को पढ़ाते हैं। बच्चे देश-विदेश में जाकर सेटल हो जाते हैं। फिर, वहीं के होकर रह जाते हैं। ना कभी आना ना कभी जाना। कभी गलती से दो दिनों के लिये आ भी गये। तो माँ-बाप से मिलने आने से पहले ही जाने का टिकट भी करवा लते हैं। दो-दिन के लिये आते हैं तो अपनी व्यस्तता दिन भर गिनवाते रहते हैं। आज अलाने से मीटिंग कैंसल करनी पड़ी है। आज फलाने बच्चे का स्कूल मिस हो गया। कभी दो मिनट फोन पर ढँग से बात हो गई, तो हो गई। नहीं तो वो भी नहीं। इतनी आपा-धापी वाली जिंदगी हमें तो कभी रास नहीं आई बेटा। सही मायने में हमारा पुराना ग्रामीण ढाँचा वाला पारिवारिक जीवण ही अच्छा था। शादी में जाते थें, तो महीनों रहकर आते थें। गाँव में हँसी-कहकहे महीनों गूँजते रहते थें। संबंधो में एक तरह की मिठास थी, अपनापन था। वो सबकुछ अब नहीं बचा है। संयुक्त परिवार था। तब लोग साथ मिल-जुलकर रहते थें। खाते थे, पीते थें। आज की तरह एक-दूसरे को पछाड़कर आगे बढ़ने की होड़ तब हममें नहीं थी। आज कल शादी नहीं हो रही है, बेटा। सौदा हो रहा है सौदा। एक बात और मैं कहना चाहूँगा, तुमसे। मेरा क्या है बेटा मैं तो कुछ दिनों का मेहमान हूँ। तुम अपना देख लो, अपनी पत्नी का देख लो। बूढ़ापा तुम्हें अकेले ही काटना है। अच्छा, अब चलता हूँ। चार बज गये हैं। थोड़ा घूमकर आता हूँ।" जग्गू बाबू सोफे की टेक लेकर खड़े हुए। और छड़ी खटखटाते हुए बाहर हवाखोरी के लिये निकल पड़े। *******
- A Better Planet
Ahana Gupta Increasing population, increasing pollution, What will happen of the nation? People dying day by day, To stop pollution there is no way. Diseases spreading all around, Way to stop pollution yet not found. Increasing garbage every day, To manage it is the only way. Different dustbins should be in use, Don't forget to follow the three R's rule. Stop throwing garbage just anywhere, Everyone should be aware. Keep your surroundings clean in and out, Spreading the message of cleanliness, it's all about Maintain cleanliness all around, If you want the society safe and sound. Don't destroy the nature for selfish means, Make it a pleasant place for human beings. If we keep the earth clean and green, It will be the best place ever seen. ******
- सच्चा सुख
राजीव कपूर एक बार एक स्वामी जी भिक्षा माँगते हुए एक घर के सामने खड़े हुए और उन्होंने आवाज लगायी, भिक्षा दे दे माते! घर से महिला बाहर आयी। उसने उनकी झोली मे भिक्षा डाली और कहा, “महात्मा जी, कोई उपदेश दीजिए!” स्वामी जी बोले, “आज नहीं, कल दूँगा। कल खीर बना के देना।” दूसरे दिन स्वामी जी ने पुन: उस घर के सामने आवाज दी – भिक्षा दे दे माते! उस घर की स्त्री ने उस दिन खीर बनायीं, जिसमे बादाम-पिस्ते भी डाले थे। वह खीर का कटोरा लेकर बाहर आयी। स्वामी जी ने अपना कमंडल आगे कर दिया। वह स्त्री जब खीर डालने लगी, तो उसने देखा कि कमंडल में गोबर और कूड़ा भरा पड़ा है। उसके हाथ ठिठक गए। वह बोली, “महाराज! यह कमंडल तो गन्दा है।” स्वामी जी बोले, “हाँ, गन्दा तो है, किन्तु खीर इसमें डाल दो।” स्त्री बोली, “नहीं महाराज, तब तो खीर ख़राब हो जायेगी। दीजिये यह कमंडल, में इसे शुद्ध कर लाती हूँ।” स्वामी जी बोले, मतलब जब यह कमंडल साफ़ हो जायेगा, तभी खीर डालो गी न ?” स्त्री ने कहा, “जी महाराज !” स्वामी जी बोले, मेरा भी यही उपदेश है। मन में जब तक चिन्ताओ का कूड़ा-कचरा और बुरे संस्करो का गोबर भरा है, तब तक उपदेशामृत का कोई लाभ न होगा। यदि उपदेशामृत पान करना है, तो प्रथम अपने मन को शुद्ध करना चाहिए, कुसंस्कारो का त्याग करना चाहिए, तभी सच्चे सुख और आनन्द की प्राप्ति होगी। क्योंकि आपकी अच्छी सोच ही आपके कार्य को निर्धारित करती है। सदैव प्रसन्न रहिये। जो प्राप्त है, पर्याप्त है। *******
- बेबसी
महेश कुमार केशरी मंदिर से लौटते वक्त केतकी को उसकी सहेली सुलोचना रास्ते में मिल गई थी। दोनों बहुत दिनों के बाद मिली थीं। दोनों मे़ं बातें होने लगी। हालचाल पूछने के बाद केतकी ने सुलोचना से पूछा- "और, बता, तेरी दोनों बेटियाँ कैसी हैं? स्कूल जा रहीं हैं या नहीं?" सुलोचना ह़ँसते हुए ही बोली- "हाँ जा रहीं हैं। एक छठी में पढ़ रही है। दूसरी आठवीं में पढ़ रही है।" तभी केतकी की नजर सुलोचना की बाँहों पर चली गई। जहाँ नीले-स्याह धब्बे उभर आये थें। केतकी से रहा ना गया तो उसकी बाँहों की तरफ इशारा करते हुए कौतूहल वश पूछा लिया- "सुलोचना, ये तेरी बाहों पर नीले धब्बे कैसे पड़ गयें हैं? देखो तो, गोरी, बाँहें कैसी काली पड़ गयी हैं।" केतकी के अपनत्व और मिठास भरे व्यवहार को सुनकर सुलोचना की आँखें भर आईं। माँ, जिंदा थीं तो हाल-चाल लेतीं थीं। पिता को छोड़कर अब तो कोई हाल-चाल लेना वाला भी नहीं रहा। बाहों पर के स्याह नीले धब्बे बादल बनकर केतकी की आँखों से बरसने लगे - "अरे, छोड़ो भी अब तो ये रोज-रोज की बात हो गई है। कर्मा रोज दारु पीकर आता है। और, मुझे रोज मारता-पीटता है। बच्चे छोटे-छोटे हैं, अभी, नहीं तो बच्चों को लेकर मायके अपने पिता के पास चली जाती। क्या करूँ बहुत मजबूर हू़ँ।" दु:ख की एक महीन रेखा सलवटों से भरे सुलोचना के चेहरे पर उभर आयी थीं। जहाँ सुख कभी उगा ही नहीं था। *******
- हमारे माता-पिता
डॉ. कृष्ण कांत श्रीवास्तव एक बार की बात है, एक जंगल में सेब का एक बड़ा पेड़ था। एक बच्चा रोज उस पेड़ पर खेलने आया करता था। वह कभी पेड़ की डाली से लटकता, कभी फल तोड़ता और कभी उछल-कूद करता था। सेब का पेड़ उस बच्चे से काफ़ी खुश रहता था। कई साल इस तरह बीत गये। अचानक एक दिन बच्चा कहीं चला गया और फिर लौट के नहीं आया, पेड़ ने उसका काफ़ी इंतज़ार किया पर वह नहीं आया। अब तो पेड़ उदास हो गया। कई वर्ष बाद वह बच्चा फिर से पेड़ के पास आया, पर वह अब कुछ बड़ा हो गया था। पेड़ उसे देखकर काफ़ी खुश हुआ और उसे अपने साथ खेलने के लिए कहा। पर बच्चा उदास होते हुए बोला कि अब वह बड़ा हो गया है। अब वह उसके साथ नहीं खेल सकता। बच्चा बोला कि अब मुझे खिलौने से खेलना अच्छा लगता है पर मेरे पास खिलौने खरीदने के लिए पैसे नहीं है। पेड़ बोला उदास ना हो तुम मेरे फल तोड़ लो और उन्हें बेच कर खिलौने खरीद लो। बच्चा खुशी-खुशी फल तोड़ के ले गया लेकिन वह फिर बहुत दिनों तक वापस नहीं आया। पेड़ बहुत दुखी हुआ। अचानक बहुत दिनों बाद बच्चा वापस आया अब जवान हो गया था, पेड़ बहुत खुश हुआ और उसे अपने साथ खेलने के लिए कहा पर लड़के ने कहा कि वह पेड़ के साथ नहीं खेल सकता। अब मुझे कुछ पैसे चाहिए क्योंकि मुझे अपने बच्चों के लिए घर बनाना है। पेड़ बोला मेरी शाखाएँ बहुत मजबूत हैं, तुम इन्हें काट कर ले जाओ और अपना घर बना लो। अब लड़के ने खुशी-खुशी सारी शाखाएँ काट डालीं और लेकर चला गया। वह फिर कभी वापस नहीं आया। बहुत दिनों बात जब वह वापस आया तो बूढ़ा हो चुका था। पेड़ बोला मेरे साथ खेलो पर वह बोला कि अब मैं बूढ़ा हो गया हूँ, अब नहीं खेल सकता। पेड़ उदास होते हुए बोला कि अब मेरे पास न फल हैं और न ही लकड़ी अब मैं तुम्हारी मदद भी नहीं कर सकता। बूढ़ा बोला कि अब उसे कोई सहायता नहीं चाहिए बस एक जगह चाहिए जहाँ वह बाकी जिंदगी आराम से गुजर सके। पेड़ ने उसे अपने जड़ में पनाह दी और बूढ़ा हमेशा वहीं रहने लगा। सार - हमारे माता-पिता भी इसी पेड़ समान हैं, जो हमेशा हमारा सानिध्य चाहते हैं। परंतु हम अपनी जरूरत पर ही उनके नजदीक आते हैं। हमें अपना कुछ वक्त माता-पिता की सेवा में अवश्य व्यतीत करना चाहिए। ******
- एक था वाणासुर
आचार्य अंबरासन दैत्यराज बलि के सौ पुत्र थे। जिनमें वाणासुर सबसे बड़ा था। वाणासुर न सिर्फ आयु में ही अपने अन्य भाइयों से बड़ा था, अपितु बल, गुण और ओजस्विता में भी उन सबसे बढ़-चढ़कर था। उसके एक हजार भुजाएं थीं। वह परम शिव भक्त था और प्रतिदिन कैलाश पर्वत पर जाकर शिव के सम्मुख नृत्य किया करता था। अपने हाथों से विभिन्न वाद्य यंत्र बजाता और भगवान शिव को प्रसन्न करने की चेष्टाएं किया करता था। शिव प्रसन्न हुए और उससे वर मांगने को कहा, “बोलो पुत्र, क्या वर मांगते हो?” वाणासुर बोला, “भगवन, मेरे मन में किसी दुर्बल की उत्पीड़ित करने की अथवा देवताओं पर विजय प्राप्त करने की तनिक भी कामना नहीं है। यदि आप मुझसे प्रसन्न हैं तो मुझे यह वर दीजिए कि आप मेरे नगर के रक्षक बन जाएं। इससे मुझे आपका प्रतिदिन सान्निध्य प्राप्त होता रहेगा।” “तथास्तु!” कहकर शिव अंतर्धान हो गए। अपने दिए गए वरदान के फलस्वरूप शिव और पार्वती कैलाश छोड़कर दैत्यपुरी शोणितपुर में आकार बस गए। वाणासुर की एक पुत्री थी। जिसका नाम उषा था। वह मां पार्वती से संगीत की शिक्षा प्राप्त करने लगी। उषा यौवन काल की दहलीज पर पहुंच चुकी थी। एक दिन उसने शिव-पार्वती को एकांत में रमण करते देखा तो उसके मन में वासना पैदा होने लगी। वह पति प्राप्त करने की इच्छा करने लगी। पार्वती उसे संगीत की शिक्षा देतीं, तो उषा का शिक्षा में मन न लगता। उसे भांति-भांति के विचार सताते रहते। पार्वती उसके विचारों को समझकर बोलीं, “क्या बात है उषा, आजकल तुम्हारा ध्यान कहाँ कहीं ओर अटका रहता है। मैं समझ गई। तू पति प्राप्त करने की कामना करने लगी है। थोड़े दिन धैर्य रख बेटी। अपने में तुझे एक पुरुष दिखाई देगा। वही भविष्य में तेरा जीवन साथी बनेगा।” इधर वाणासुर शिव से कह रहा था, “भगवन, आपने मुझे हजार भुजाएं तो दे दीं किंतु अब वह मुझे भार स्वरूप लगने लगी हैं। बेकार पड़े-पड़े मेरी बाहों में खुजली होने लगती है। मैं युद्ध करना चाहता हूं, जिससे मेरा आलस्य दूर हो सके। लेकिन कोई मेरी जोड़ का व्यक्ति धरा पर है ही नहीं।” भगवान शिव समझ गए कि वाणासुर के मन में अभिमान पनप उठा। वे बोले, “अदिह्र मत होओ पुत्र, तुमसे युद्ध करने योग्य व्यक्ति भी धरा पर अवतरित हो गया है। शीघ्र ही तुम्हारी यह इच्छा भी पूर्ण होने वाली है।” वाणासुर बोला, “लेकिन कब और मुझे मालूम कैसे होगा कि अमुक व्यक्ति ही मेरी बराबरी का है।” शिव ने उसे एक ध्वजा देकर कहा, “यह ध्वजा ले जाकर अपने भवन के द्वार पर लगा दो। जिस दिन यह अपने आप नीचे गिर जाए, उस दिन समझ लेना कि तुम्हारा प्रतिद्वंद्वी आ पहुंचा।” मनुष्य के जब बुरे दिन आते हैं तो उसकी बुद्धि स्वयं ही भ्रष्ट हो जाती है। भगवान शिव द्वारा क्रोध में कहे गए वह वचन सुनकर भी वाणासुर प्रसन्न हो गया और उसने खुशी-खुशी ध्वजा को ले जाकर अपने भवन पर गाड़ दिया। फिर वह प्रतीक्षा करने लगा कि देखें, ध्वजा कब गिरती है। दूसरी ओर वाणासुर के महल में उषा अपनी सखी चित्रलेखा से बात कर रही थी। चित्रलेखा वाणासुर के मंत्री कुंभांड की पुत्री थी। उषा के मुंह पर व्याकुलता देखकर चित्रलेखा ने पूछा, “क्या बात है सखी, आज तुम बहुत उद्विग्न हो। शरीर तो स्वस्थ है न?” उषा ने आह से भरते हुए कहा, “मेरे शरीर को कुछ नहीं हुआ है चित्रलेखा, मैं एक स्वप्न को लेकर व्याकुल हूं। रात स्वप्न में मैंने देखा कि एक परम तेजस्वी कामदेव के समान सुंदर युवक से मेरा विवाह हो गया है। फिर जब सपना टूटा तो सब कुछ गायब था। कुछ भी हो सखी, मैं तो तन मन से उस युवक को अपना पति मान चुकी हूं। मां भगवती ने भी मुझसे यही कहा था कि एक पुरुष तुझे स्वप्न में दिखाई देगा, वही तेरा पति बनेगा। तू मेरा एक काम कर दे।” चित्रलेखा बोली, “कहो राजकुमारी, तुम्हारा हर काम करके मुझे अतीव प्रसन्नता होगी। तुम काम तो बताओ।” उषा बोली, “तू तो चित्रकार है। अपनी कल्पना से कुछ ऐसे युवकों के चित्र बना, जैसे मैंने तुझसे उस स्वप्न पुरुष के बारे में बताया है। फिर मैं उसे पहचान लूंगी।” चित्रलेखा ने अपनी कल्पना के आधार पर चित्र बनाने आरंभ कर दिए और उन्हें उषा को दिखाने लगी। अंत में एक चित्र को देखकर उषा खुशी से चिल्ला उठी, “यही है, बिल्कुल यही है सखी, यही युवक रात को मेरे सपने में आया था।” चित्रलेखा चित्र को गौर से देखने लगी। मायावी दैत्य की पत्नी होने कारण चित्रलेखा स्वयं भी बहुत मायाविनी थी। उसने अनिरुद्ध को पहचान लिया, “अरे, यह तो अनिरुद्ध का रेखाचित्र है सखी, अनिरुद्ध प्रद्युम्न का पुत्र है और श्री कृष्ण का पौत्र है। वे लोग द्वारिका में रहते हैं।” उषा बोली, “कुछ करो सखी, कैसे भी हो मुझे इस युवक से मिला दो। तुम तो स्वयं अच्छी मायाविनी हो। द्वारिका जाकर इस युवक को उठा लाओ।” चित्रलेखा माया से द्वारिका पहुंची और सोते हुए अनिरुद्ध को बिस्तर समेत उठा लाई। सुबह जब अनिरुद्ध की आंख खुली और उसने अपने सामने उषा व चित्रलेखा को बैठे देखा तो आश्चर्य से बोला, “म…मैं कहां हूं और यह कौन-सी जगह है। तुम कौन हो?” चित्रलेखा बोली, “तुम इस समय शोणितपुर में राजकुमारी उषा के अतिथि हो यादव कुलनंदन, इन्हें पहचानो। कल रात तुम इनसे सपने में मिले थे।” कुछ क्षण बाद ही अनिरुद्ध को तुरंत याद आ गया कि राजकुमारी उषा को उसने भी सपने में देखा था और स्वप्न में ही उन्होंने परस्पर विवाह किया था। उसने अनुरागमयी दृष्टि से उषा की ओर देखा। फिर चित्रलेखा दोनों प्रेमियों को वहां छोड़कर चुपचाप बाहर निकल गई। काफी दिनों तक उन दोनों का गुपचुप प्रेम चलता रहा। चित्रलेखा के अलावा कोई तीसरा व्यक्ति नहीं जानता था कि राजकुमारी उषा ने अनिरुद्ध को अपने अंत:पुर में रखा हुआ है। लेकिन ऐसी बातें छुपती ही कहां है। अंत:पुर के रक्षकों द्वारा एक दिन वाणासुर तक यह समाचार पहुंची और क्रोध से भभकता हुआ वाणासुर अंत:पुर के में दाखिल हो गया। उसने राजकुमारी से कहा, “राजकुमारी, कौन है जिसे तूने अपने अंत:पुर में छिपा रखा है। शीघ्र बता अन्यथा…।” अचानक अपने पिता को अंत:पुर में आया देख राजकुमारी उषा सहम गई। किंतु अनिरुद्ध निर्भीक भाव से वाणासुर के सामने आकर बोला, “मुझे अनिरुद्ध कहते हैं। कृष्ण मेरे दादा हैं और पिता प्रद्युम्र हैं। हम लोग द्वारिका में रहते हैं।” अनिरुद्ध की बात सुनकर वाणासुर तलवार लिए अनिरुद्ध की ओर झपटकर बोला, “तेरी हिम्मत कैसे हुई कि तू वाणासुर की पुत्री के अंत:पुर में दाखिल हो गया। मैं अभी-तेरे टुकड़े-टुकड़े करता हूं।” अनिरुद्ध बोला, “मैं स्वयं नहीं आया दैत्यराज, लाया गया हूं। यकीन नहीं हो तो अपनी पुत्री से पूछ लो।” लेकिन वाणासुर ने उसकी बात का विश्वास नहीं किया। कुछ देर तक दोनों में युद्ध चलता रहा। फिर वाणासुर ने अनिरुद्ध को बंदी बना लिया। अनिरुद्ध के बंदी बनाने की खबर नारद द्वारा द्वारिका पहुंच गई। यह खबर सुनकर द्वारिका वासियों में क्रोध भर गया। कृष्ण अपनी सेना सहित शोणितपुर पर आक्रमण करने के लिए चल पड़े। कृष्ण सेना और दैत्य सेनाएं आपस में भिड़ गईं। कृष्ण और वाणासुर में भयंकर युद्ध छिड़ गया। दोनों ओर से अनेक प्रकार के अस्त्र-शस्त्रों का प्रयोग किया जाने लगा। वाणासुर के पुरपालक होने के कारण वाणासुर की ओर से भगवान शिव भी अपने गणों सहित मैदान में आ डटे। लेकिन कृष्ण के तीखे बाणों और सुदर्शन चक्र की मार से घबराकर दैत्य सेना भाग खड़ी हुई। शिवगण भी पीछे हट गए और स्वयं शिव भी कृष्ण के अमोघ अस्त्र से बेहोश हो गए। फिर श्री कृष्ण ने अपने चक्र से वाणासुर की भुजाएं काटनी शुरू कर दीं। उसकी भुजाएं कट-कटकर जमीन पर गिरने लगीं। पर तभी शिव की बेहोशी टूट गई। वे कृष्ण के पास पहुंचकर बोले, “आपका चक्र अमोघ है। किंतु मैंने इसे अभय-दान दिया है। मैं इसका रक्षक हूं। आप वाणासुर का हनन न करें।” भगवान शिव की बात सुनकर कृष्ण ने अपना चक्र झुका लिया, फिर बोले, “आपका प्रिय मेरा भी प्रिय है, देवाधिदेव, मैंने नृसिंह अवतार लेते समय प्रहलाद को वचन दिया था कि उसके किसी भी वशंज का वध नहीं करूंगा लेकिन इसने आपका अपमान किया है देव, इसे दंड तो मिलना ही चाहिए। इसके अधिकांश भुजाएं तो मैंने चक्र से पहले ही काट दी हैं। किंतु जीवन दान तो तभी मिल सकता है जब यह चतुर्भुज रहकर आपकी सेवा करे।” यह कहकर कृष्ण ने वाणासुर की शेष भुजाएं भी काट दीं और हजार भुजाओं में से उन्होंने सिर्फ चार भुजाएं शेष छोड़ दीं। फिर वाणासुर ने अनिरुद्ध और उषा का विवाह कर दिया। दोनों के विवाह बंधन में बंधने के बाद वाणासुर ने शोणितपुर छोड़ दिया और भगवान शिव के साथ ही उनके धाम कैलाश पर्वत पर चला गया। वह जब तक जिया, भगवान शिव की आराधना में लीन रहा और मरने के बाद उसे शिव लोक में स्थान मिला। ************
- रक्षाबंधन
महेश कुमार केशरी आज रक्षा बंधन का त्योहार था। संजीव कहीं बाहर जाने वाला था। तभी मोबाईल की घंटी बजी। कोई नया नंबर था। चूँकि आज रक्षा बंधन था। इसलिये संजीव को डर था कि कहीं बहनों ने फोन ना किया हो। इसलिये उसने नज़रअंदाज़ करते हुए फोन काट दिया। इस बार संजीव की ये हरकत जगदंबा बाबू को नागवार गुजरी। अखबार एक तरफ रखते हुए संजीव से बोले, उठा लो तुम्हारी बहनों का नहीं है। क्योंकि, तुम्हारी बहनें जानतीं हैं कि मेरा भाई पैसों या अन्य जरूरतों को लेकर मेरा फोन नहीं उठाता। इसलिये अक्सर वो मेरे नंबर पर ही फोन करतीं हैं। तुम्हारे नंबर पर नहीं।" संजीव बढ़ती मँहगाई और घर के खर्चों से पहले ही परेशान था। अपने पिता से गुस्साते हुए बोला, आपको, ही सात बेटियों के बाद बेटा चाहिये था। आखिर, आपने एक बेटी से ही क्यों नहीं संतोष कर लिया था? एक बेटी तो ठीक ही थी। एक बेटे की चाहत में आप लगातार सात बेटियाँ पैदा करते चले गये। अगर, आप एक बेटी पर ही संतोष कर लेते तो मेरी जान सांसत में तो नहीं पड़ती।" अभी वो और भी बहुत कुछ कहने की सोच रहा था कि दरवाजे पर की कॉलबेल बजी। और संजीव अपनी बात कहते-कहते रूक गया। दरवाजा खोला तो दरवाजे पर अपनी बड़ी बहन लक्ष्मी को देखा। निशांत ने मामा को उलाहना देते हुए कहा- "मामा, कब से आपको फोन कर रहा था। आप फोन क्यों नहीं उठा रहे थें?" लक्ष्मी ने तंज किया- "मामा को लगा होगा मैनें फोन किया है। जेब ढीली करनी पड़ेगी। इसलिये फोन नहीं उठा रहा होगा। क्यों ठीक कह रही हूँ ना मैं?" लक्ष्मी ने संजीव को छेड़ा। संजीव इस सच्चाई को सुनकर जमीन में जैसे गड़ सा गया। औपचारिकतावश झुककर बड़ी बहन लक्ष्मी के पाँव छुए। साथ में भगना निशांत भी था। निशांत ने झुककर अपने मामा संजीव के पाँव छुए। लक्ष्मी अपने ही क्वार्टर और उसमें रखे फर्नीचर को देखकर मुग्ध हुए जा रही थी। अतीत जैसे जोंक की तरह उसके आत्मा को जकड़ता जा रहा था। अम्मा से जिद करके उसने क्रोशिये का काम सीखा था। जड़ी-मोती के निर्जीव तोते आज बीस साल पहले की कहानी कह रहें थें। लक्ष्मी की जब शादी हुई थी। उसके पति एक मामूली क्लर्क थें। बाद में स्थिति कुछ खराब हुई तो भाई और भाभी ने आँखें फेर लीं। संजीव सातों बहनों में से किसी का फोन कभी नहीं उठाता था। बेकार के खर्चों और आकस्मिक जरूरतों को बेवक्त झेलना उसे गैर-मुनासिब लगता। घर में रखा अचार का मर्तबान। तुलसी-पिंड़ा। उसकी अलमारी। सारी चीजें अपनी जगह ज्यों-की-त्यों जमा थीं। इन बीस सालों में किसी शरणार्थी की तरह वो ही बिलग हो गई थी घर से। अंतस में कुछ भींगने लगा तो उसने रूमाल से आँखों के कोर पोंछे। "और, सब घर में कैसे हैं, पापा? "लक्ष्मी की आवाज काँप रही थी। "सब, ठीक है, बेटा। बैठो ना। दामाद जी कैसे हैं?" जगदंबा बाबू की आवाज भी भींगने लगी थी। "पापा, इन बीस वर्षों में राजीव जी ने बहुत संघर्ष किया। और आज उसी क्लर्क की हैसियत से उठकर कंपनी के डायरेक्टर बन गये। आज लाखों रूपये का पैकेज है। निशांत, का एक फ्राँस की कंपनी में सलैक्शन हो गया है। कोठी, और बागान हम लोग छोड़कर कहीं जा नहीं सकते। इधर राजीव भी परमानेंट फ्राँस शिफ्ट होने की सोच रहें हैं। निशांत (एक फ्राँसिसी लड़की) जेनी से प्रेम करता है। वो भी सॉफ्टवेयर इंजीनियर है, फ्राँस में। अगले महीने हमारे घर पर ही एँगेजमेंट होगी। संजीव - सुनंदा भाभी और पापा आप सब आईयेगा। फ्राँस में राजीव ने कुछ प्रापर्टी खरीदी है। उनका भी वहीं बिजनेस हो रहा है। पापा, मैं आपसे एक बात कहना चाह रही थी। हमारे अब्राड़ शिफ्ट होने के बाद हमारा नोएड़ा वाला घर खाली रहेगा। हमलोग तो अब्रोड शिफ्ट हो रहें हैं। राजीव जी ने एक फैसला किया है, कि हम अपना मकान संजीव और भाभी के नाम कर दें। ताकि भईया और भाभी और उनके बच्चों को रिटायरमेंट के बाद इधर-उधर ना भटकना पड़े। संजीव, अब मेरी ये आखिरी ख्वाहिश जरूर पूरी कर देना। आज रक्षाबंधन है। आज मैं अपने भाई को गिफ्ट दूँगी। जब हमारी परिस्थिति खराब थी। तब हम बहनों ने तुमसे बहुत कुछ लिया। लेकिन, आज ऊपर वाले की दया से हमारी सब बहनें अपने-अपने घरों में खुश हैं। इस बार मैं कुछ लेने नहीं देने आयी हूँ। इस घर ने और आपलोगों ने मुझे बहुत कुछ दिया है। संजीव मेरी बात मान लो। संजीव का भी गला रूँधने लगा था। उसने अपनी सहमति दे दी। सुनंदा पास में ही आकर ना जाने कब से खड़ी थी। उसने लक्ष्मी के पाँव छुए। फिर पूजा की थाली लेकर आई। थाली में राखी, रोली, कपूर और मिठाई थी। लक्ष्मी ने संजीव के लालाट पर तिलक लगाया और कलाई पर राखी बाँधी। फिर, आरती की। स्निग्धता और प्रेम एकाकार होकर लक्ष्मी की आँखों से बह रहे थें। उन आँखों में अपने भाई और अपने इस घर, की तरक्की के लिये ईश्वर से अनंत प्रार्थनायें थीं। राखी बाँधने के बाद लक्ष्मी चलने को हुई। तो संजीव ने अपनी बहन को एक पाँच सौ रूपये का एक नोट दिया। लेकिन, लक्ष्मी ने पाँच सौ का नोट ये कहते हुए लौटा दिया कि लक्ष्मी हमेशा देने के लिये आती है। लेने के लिये नहीं। संजीव ने मनुहार करते हुए कहा - "दीदी, आज के दिन तो कम-से-कम रूक जाओ।" लक्ष्मी दरवाजे तक जाती हुई बोली- "आज, केवल भाई से ही नहीं बल्कि अपनी छ: बहनों से मिलने भी निकली हूँ। और, कौन कहता है, कि रक्षाबंधन केवल भाईयों से मिलने का दिन होता है? ये दिन तो अपनी बहनों से मिलने का दिन भी होता है। उन्हें भी तो निशांत के एंगेजमेंट में बुलाना है। वैसे भी पीहर में हमारे लिये एक शाम से ज्यादा का समय नहीं होता। या मैनें ज्यादा कह दिया। कुछ घंटे ही हमारा पीहर में बसेरा होता है। शादी के बाद हम लड़कियाँ चिंडियाँ हो जातीं हैं। अपने ही घर में कुछ घंटों की मेहमान!" और, लक्ष्मी चिंड़ियाँ, बनकर अपने बाबुल के घोंसले से उड़ गई। आज, संजीव अपने ही नजरों में इतना गिर गया था, कि वो, अपने आप से ही आँखें नहीं मिला पा रहा था। आँखों से पश्चाताप के आँसू बह रहे थें। ************
- एक था राजा
डॉ कृष्ण कांत श्रीवास्तव बहुत समय पहले की बात है। किसी राज्य में एक राजा राज करता था। राजा की तीन खूबसूरत रानियां थी। राजा अपनी पहली पत्नी के व्यवहार और बातचीत से अत्याधिक प्रभावित था और उसे बहुत प्यार करता था। राजकाज के सभी कार्यों में राजा अपनी इस पत्नी को साथ रखता था। राजा की दूसरी पत्नी तीनों में सबसे अधिक सुंदर और युद्ध विद्या में निपुण थी, इसलिए राजा अपने दूसरे नंबर की पत्नी को भी बहुत अधिक महत्व देता था। विपरीत परिस्थितियों में राजा की दूसरी पत्नी राजा के साथ कंधे से कंधा मिलाकर उनकी मदद करती थी। इसलिए राजा अपनी दूसरी पत्नी के साथ मित्रवत व्यवहार करता था और जब भी कोई परेशानी होती तो वह अपनी दूसरी पत्नी से सुझाव लेता था। राजा की तीसरी पत्नी असाधारण सुंदर तो थी परंतु बातचीत और युद्ध विद्या में उतनी निपुण नहीं थी। वह धार्मिक प्रवृत्ति की थी और अपने पति की लंबी उम्र के लिए सभी धार्मिक अनुष्ठान इत्यादि अवश्य करती थी। राजा अपनी तीसरी पत्नी से प्यार नहीं करता था, लेकिन उसकी तीसरी पत्नी उसको बहुत प्यार करती थी। राजा अपने राजकाज के कामो में बहुत ही व्यस्त रहता था। धीरे-धीरे राजा का स्वास्थ्य खराब रहने लगा। राजा को एक ऐसे असाध्य रोग ने घेर लिया जिसके कारण उसके बचने की बहुत ही कम उम्मीद रह गयी। अनेकों वैद्य राजा के उपचार में लग गए परंतु रोग था जो ठीक होने का नाम ही नहीं ले रहा था। राजा को आभास हो गया कि अब उसका अंत समय निकट है। राजा को मौत का भय सताने लगा। भय के कारण राजा अकेले नहीं मरना चाहता था। उसने अपनी पहली पत्नी को बुलाया और बोला, “मेरा अंत समय निकट है, कृपा कर आप हमारे साथ ऊपर भगवान के घर ऊपर चलो।” यह सुनकर वह बोली, “मैं आपके साथ नहीं जा सकती। मैं तो अभी और जीना चाहती हूं।” पहली पत्नी की बात सुनकर राजा बहुत निराश हुआ। उसके बाद राजा ने अपनी दूसरी पत्नी को याद किया। जब उसने सुना कि उसके पति उसको अपने साथ ले जाना चाहते हैं तो वह उनसे जाकर बोली, “मैं तो अभी जवान हूं मेरी उम्र ही क्या है? मैं आप के साथ नहीं जाउंगी। मैं आपके मरने के बाद दूसरी शादी कर लूंगी।” यह सुनकर राजा बहुत ही दुखी हुआ। अपनी दोनों पत्नियों की बात सुनने के बाद राजा ने अपनी तीसरी पत्नी को बुलाया ही नहीं। परंतु उसकी तीसरी पत्नी खुद चलकर आ गयी और बोली, “महाराज, मैं आपके साथ भगवान के घर चलने को तैयार हूं। जब आप ही ना होंगे तो हमारा इस संसार में रहने का क्या फायदा।” उसकी बात सुनकर राजा बहुत खुश हुआ। फिर दूसरे ही पल निराश होकर बोला, “मैंने पूरी जिन्दगी तुमको प्यार नहीं किया और आज तुम बिना शर्त मेरे साथ ऊपर भगवान के घर तक चलने के लिए तैयार हो गई। निश्चित तौर पर मुझसे अपने जीवन में बहुत बड़ी भूल हो गई, जो मैं तुमको पहचान नहीं सका। मैं इस भूल के लिए अपने को कभी माफ नहीं कर पाऊंगा।” मुझे मालूम है कि ईश्वर के घर सभी को अकेले ही जाना होता है। मैं तो केवल आप सभी लोगों की परीक्षा ले रहा था। आप मेरी इस परीक्षा में उत्तीर्ण हो गई, इसलिए मैं अपना राजपाट और सभी धन संपत्ति आपके हवाले करके जाता हूं। ऐसा कहकर राजा ने अपने प्राण त्याग दिए। यह कहानी हमें बताती है कि जीवन में प्यार उससे करो जो आपको प्यार करता हो, उससे नहीं जिसे आप पसंद करते हो। ********
- आखरी नाव
डॉ. जहान सिंह ‘जहान’ असम के घने जंगलों में खासी पहाड़ियों के बीच ब्रह्मपुत्र की उपनदी गरगई के किनारे पर बसी एक छोटी ढोंग बस्ती। गोल छप्पर नुमा झोपड़ी कुछ टूटे पत्थर और लकड़ी के बने आकार जिन्हें मकान कह सकते हैं। नंगे खेलते बच्चे, भोंकते कुत्ते, कीचड़ की सौगात में लिपटी गाय, भैंस, बकरियां, तीखे लाल, नीले, काले, पीले रंगों के कपड़े। शाल, चादर से यौवन ढकने की कोशिश करती युवतियां नई दुनिया से बहुत दूर दैनिक कार्यों में उल्झी। छोटे-छोटे पानी के गड्ढे, उन में हलचल करती मछलियां, इधर-उधर भागते मुर्गे, मुर्गियां। पान, सुपारी, मक्का, धान ही उनकी पूजी, जिसे बड़ी सफाई से टूटी झल्लियों या मिट्टी के बर्तनों में संजोकर कोने में रखती स्त्रियां। कपड़ों के टुकड़ों को कमर में बांधे हुक्का पीते, पान सुपारी खाते, अलसाये मर्द या तो मछली पकड़ने में या कंकड़ों के टुकड़ों से कोई शतरंज का जैसा खेल खेलने में ही लगे रहते। अमावस्या या पूर्णिमा को हाट-बाजार कर लेना बस। बाकी जीवन जीने का संघर्ष महिलाओं पर निर्भर रहता है। लगातार यही सामान्य जिंदगी जिसमें केवल रोटी, कपड़ा और मकान की जद्दोजहद ही शामिल रहती है। लेकिन यही सोया हुआ गांव कार्तिक मास में एक नगर के संसाधनों से सुसज्जित हो जाता है। यहां एक विशाल मेला दुर्गा पूजा के साथ लगना शुरू होता है। और पूरे एक मास तक चलता है। इसी बस्ती से कुछ दूर एक दुर्गम रास्ते पर ऊंची पहाड़ी है। जहां ‘काल मठ’ स्थापित है। जो दूर-दूर तक अपनी तांत्रिक विद्या के लिए जाना जाता है। इस पर फहराता लाल पताका, शंख घड़ियाल की ध्वनि स्वतः लोगों का ध्यान आकर्षित करती है। रोशनी का साधन उस पर जलती हुई मशाल जो वहां आने वालों को बहुत दूर से सम्मोहित करती है। और लोग खिचे चले आते हैं। ऐसा विश्वास कि वहां जाने वालों की हर मनोकामना पूरी होती है। खासतौर पर यदि मठाधीश तांत्रिक ‘स्वामी काल भैरव आनंद’ स्वयं आशीर्वाद देदें। मेले में आने जाने वाले मर्द, स्त्रियां सब कोशिश करते हैं कि उनके दर्शन हो जाए। कुछ आस्था विश्वास पर कुछ जिज्ञासा बस और विदेशी पर्यटक शोध कार्य की भावना पहुंच से पहुंचते रहते हैं। गोवहारी का मेट्रो जीवन, तेज दौड़ती जिंदगी। इंजीनियर सुबोध बरुआ ने अपनी इंजीनियरिंग की शिक्षा प्राप्त कर एक प्रसिद्ध बहुराष्ट्रीय कंपनी में सीनियर पद पर इस नगर में नौकरी कर ली। उनकी योग्य पत्नी डॉ. देवो मालती गोगोई बही के महिला कॉलेज में समाजशास्त्र की शिक्षिका है। छात्र-छात्राओं, विभाग एवं अपनी कॉलोनी में प्रसिद्ध एवं प्रिय है। इन दोनों के प्यार, पति-पत्नी के रिश्ते और अच्छे इंसान का लोग उदाहरण देते हैं। अगर कोई कमी थी तो शादी के बाद इतने वर्षों में मां-बाप ना बनने की। दोनों को आपस में कोई मलाल नहीं था। क्योंकि शिक्षित एवं समझदार हैं। लेकिन समाज की नजरें कभी-कभी विचलित कर देती थीं। हर वर्ष इंजीनियर सुबोध दो माह के लिए अमेरिका रहते थे। इन गर्मियों के अवकाश में डॉ. देवो मालती अपनी ससुराल में आ जाती है। जो टोंग बस्ती से चालीस मील की दूरी पर है। ससुराल में सब कुछ ठीक होते हुए भी सास का ताना, पिछड़े इलाके होने से हर औरत मर्द की कुछ ना कुछ इस प्रकार की छींटाकशी ‘बांझ स्त्री’ का संबोधन, तीज त्यौहार की पूजा में शामिल ना होने देना। बच्चों के जन्म पर किसी को प्यार से आशीर्वाद ना देने देना। बरगद पूजा में शामिल ना करना। कुंवारी लड़कियों को देर रात तक साथ में खेलने ना देना। इन छोटी-छोटी लेकिन तीखी बातों ने डॉ. मालती के जीवन में इतनी कड़वाहट भर दी कि सब कुछ होते हुए जीवन आधारहीन निरुद्देश प्रतीत होने लगा। पढ़ी-लिखी होने के नाते, सब सहज तरीके से सहन करती। डॉ. मालती अंदर से बिखर चुकी थी। मेले की चर्चा कई बार सुनी ‘काल मठ’ के स्वामी की शक्तियों के बारे में गांव की औरतों की आए दिन बातचीत से डॉक्टर मालती को अनायास ‘काल मठ’ ने सम्मोहित करना प्रारंभ कर दिया। और इंजीनियर सुबोध के आने पर ‘काल मठ’ जाने का मन बना लिया। उसने सुबोध से कहा कि मैं यहां दो महीने से बोर हो रही हूं। चलो पास में ही मेला लगा है, घूम आए। मेरा मन भी बहल जाएगा। अमेरिका से आए सुबोध को मेले में जाने का प्रस्ताव अटपटा सा जरूर लगा। फिर भी मालती की खुशी के लिए हां कर दी। मठ तक पहुंचने के लिए नदी पार करनी पड़ती है। इस कार्य के लिए एक ही मोटर बोट चलती है। जो यात्रियों को इस पार से उस पार पहुंचाती है। मेले का शोर, चाट, मिठाई, फलों की दुकान, कपड़े, इत्र, मिट्टी के खिलौनों से लेकर लोकगीत, नाटक, नृत्य-मंडली, जादू, सर्कस, नट के कर्तव्य, मौत का कुआं, एक मिनट में फोटो, पर्यटन, टॉकीज में चलचित्र, एक बिल्कुल नया अनुभव सुबोध और मालती को। मालती ने सुबोध से निवेदन किया कि उस मठ में एक बहुत सिद्ध तांत्रिक रहते हैं, चलो दर्शन करें। मैं एक समाजशास्त्री हूं और आप तकनीकी वैज्ञानिक। जिज्ञासा के अनुरूप एक अच्छा अनुभव होगा। सुबोध तुरंत जवाब दिया, “I don't believe in such things if you want to go you can, I will enjoy here.” मालती का अंतर्द्वंद जिज्ञासा और कुछ प्राप्त करने की उत्कंठा ने बरबस चलने को मजबूर कर दिया। मालती बोली, “You'll Wait here till I Returns.” सुबोध ने बड़ी नम्रता से Yes बोला। मालती चल दी, रास्ता दुर्गम घुमावदार सीढ़ियां और घना जंगल ज्यादातर यात्री वापस लौट रहे थे। शाम होने को थी, कुछ बरसात की संभावना बन रही थी। जो इस क्षेत्र में सामान्य बात है। मालती थकी हारी ऊपर पहुंची। अंधेरा होने लगा था, लेकिन अंदर एक अनोखी इच्छाशक्ति प्रेरणा सूत्र का कार्य कर रही थी। अंधेरा होने लगा था। काल मठ द्वार पर अजीब सा सन्नाटा। मालती बिना रुके अंदर चली गई और तांत्रिक स्वामी काल भैरव आनंद के कक्ष में प्रवेश कर गई। अद्भुत आकर्षण लाल तमतमाता हुआ चेहरा, सुदृढ़ शरीर, बलिष्ठ भुजाएं, रुद्राक्ष के माला से लिपटी गर्दन, चौड़ी छाती, चारों तरफ जलती आग, बंद आंखें, ललाट पर सूर्य की किरणें जैसा प्रकाश बिखेरता तिलक। एक अजीब सी वातावरण में सम्मोहक खुशबू। मालती के अंदर मां बनने की इच्छा का ज्वालामुखी फूट पड़ा। उसने अनचाहे अनजाने में अपने वत्र उतार दिए और नग्न अवस्था में पुकार कर बोली। “काल भैरव स्वामी” देख मेरी तरफ मैं भी नारी हूं। मुझसे मेरी नारी होने का अधिकार कोई नहीं छीन सकता। बिना “मां” का स्वरूप लिए नारी अधिकार हीन होती है। स्वामी तांत्रिक आंख खुलते हैं। आंखों से अचानक तेज रोशनी निकलती है और आकाश में भयानक बिजली कड़कती है। मालती भय से तांत्रिक की बाहों में समा जाती है। मालती के शरीर में अनगिनत ज्वालामुखी फूटने का एहसास होता है। बाहर बहुत तेज बारिश होने लगती है। मालती अर्थ चेतना अवस्था से जब वापस आती है, तो घबरा कर अपने को ठीक करती है। शरीर में अजीब सा दर्द, लेकिन अंदर पूर्ण तृप्ति, संतोष एवं सुख की चरम सीमा की अनुभूति। बहुत देर होने से सुबोध भी ‘मठ’ के पास पहुंच गया। बाहर से सुबोध की आवाज आती है, “यदि पूजा-पाठ हो गया हो तो चलो।” तब तक हूटर की आवाज जोर-जोर से सुनाई देती है। यह जाने वाली आखरी नाव है। आज 23 अक्टूबर है। यदि नाव मिली तो कल अमेरिका जाने वाली फ्लाइट छूट जाएगी। तेज कदमों से सुबोध और मालती नाव की तरफ चल पड़े। बरसात हो रही थी। रुक-रुक कर बिजली भी कड़क रही थी। आज ना जाने क्यों मालती को सुबोध का हाथ पकड़ना अच्छा लग रहा था। अंदर की क्षणिक उत्पन्न हुई आत्मग्लानि, मालती ने अपने चेहरे पर हाथ फेरते हुए दरिया में त्याग दी। मैं एक स्त्री हूं। मुझे पूर्ण जीने का अधिकार है। यह प्राकृतिक का सत्य है। जिसे झूठलाया नहीं जा सकता। रात में सुबोध की अमेरिकी यात्रा की कहानी सुनते और प्यार करते-करते कब दोनों सो गए पता ही नहीं चला। समय आगे बढ़ा और मालती मां बनी। एक सुंदर सी कन्या को जन्म दिया। खबर से सुबोध के घर में खुशी छा गई। वहीं गर्मी का अवकाश, गांव का मेला, मालती का मठ में पहुंचना, स्वामी के दर्शन की लालसा में। लेकिन पुजारी ने बताया कि पिछले 23 अक्टूबर को स्वामी जी ब्रह्मलीन हो गए हैं। और उनके सिंहासन पर ‘मालती’ के फूल रखे हैं, आप दर्शन कर ले। मालती की आंखें नम थी। सुबोध कुछ समझ पाता उससे पहले मालती ने पूछा, “क्या जीवन स्थानांतरित किया जा सकता है?, नहीं मालूम।” आखरी नाव का हूटर जाने का संकेत दे रहा था। ********











