top of page

Search Results

921 results found with an empty search

  • अपूरणीय क्षति

    नीति और निहाल माता पिता बनने की खबर सुनकर बहुत ही उत्साहित थे और अपने मन में अपने अजन्मे बच्चे की तस्वीर को सजाने लगे थे। बच्चे के जन्म के बाद वे उसका क्या नाम रखेंगे ,उसे कौन से स्कूल में पढाएंगे, बड़ा होकर उसे क्या बनाएंगे इत्यादि इत्यादि सोच कर दोनों ही बहुत अधिक प्रसन्न हो रहे थे। उनके साथ घर के सभी सदस्य भी आने वाले मेहमान की बेसब्री से प्रतीक्षा कर रहे थे। नीति की इंजीनियरिंग का वह अंतिम वर्ष था जिसके पश्चात उसे बीटेक की डिग्री मिलने वाली थी। घर के कामकाज के साथ-साथ नीति पढ़ाई में भी बहुत ही तेज और होशियार थी। वह जिस भी काम को करती थी बहुत ही शिद्दत के साथ करती थी, चाहे, फिर वह घर का काम हो अथवा पढ़ाई लिखाई। गर्भावस्था के पांचवे महीने में उसके एग्जाम की डेट शीट आई और वह जी जान से पढ़ाई में जुट गई। पढ़ाई में कभी-कभी वह इतना अधिक मशगूल हो जाती थी कि उसे अपने खाने-पीने तक का ध्यान नहीं रहता था। पिछले महीने ही चेकअप करने के पश्चात डॉक्टर ने उसे अच्छी डाइट लेने की सलाह दी थी क्योंकि उसके शरीर में खून की कमी थी। परंतु परीक्षाओं के दबाव में नीति इन सब बातों को दरकिनार कर अपना ध्यान केवल और केवल अपने आने वाले एग्जाम पर ही केंद्रित करना चाहती थी इसलिए वह खाने-पीने में कोताही बरतने लगी। अभी उसके पेपर शुरू भी नहीं हुए थे कि उसे कुछ अजीब सा महसूस होने लगा। उसे बार-बार यह शंका होती थी कि उसके गर्भ में पल रहे बच्चे की हलचल कुछ ज्यादा नहीं है। परंतु पढ़ाई के बोझ तले दबे होने की वजह से वह इन बातों को अपना वहम सोच कर एक तरफ करती रही। अपनी मां से जब उसने यह बात शेयर की तो उसकी मां ने उसे समझाया कि पढ़ाई पर ज्यादा ध्यान ना देते हुए उसे अपने बच्चे पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए और यदि बच्चे की हलचल कम महसूस हो रही है तो उसे दिन में दो से तीन बार शक्कर वाला मीठा पानी पीना चाहिए क्योंकि गर्भ में कभी-कभी बच्चे सुस्त पड़ जाते हैं और मीठा पानी और तरल पदार्थ शरीर के भीतर जाने से बच्चे पुन: हिलना डुलना शुरू कर देते हैं। उनके लिए मीठा पानी एनर्जी बूस्टर का काम करता है जिससे उनकी मूवमेंट अच्छी हो जाती है। मां की बात पर भी ज्यादा ध्यान ना देते हुए नीति पढ़ाई में ही व्यस्त रही और उसने मीठा पानी 2 से 3 बार तो क्या दिन में एक बार भी नहीं पिया। 3 से 4 दिन बीत जाने के पश्चात जब उसे बच्चे की हलचल बिल्कुल महसूस होनी बंद हो गई तो अंतत: उसने यह बात अपनी सासू मां को बताई। सासू मां उसकी यह बात सुनकर काफी चिंतित हुई और तुरंत उसे डॉक्टर के पास ले गई। डॉक्टर ने उसका चेकअप किया और उसे बिना कुछ बताए केबिन के बाहर चली गई। डॉक्टर का यह व्यवहार देखकर सासू मां काफी घबरा गई। निहाल भी कुछ समझ नहीं पा रहा था कि आखिर माजरा क्या है, क्यों डॉक्टर कुछ जवाब नहीं दे रही है। उनके बार-बार पूछने के बाद डॉक्टर ने बताया कि उन्हें बच्चे की धड़कनें कुछ समझ नहीं आ रही है इसलिए बच्चे की सही पोजीशन देखने के लिए उन्हें अब नीति का अल्ट्रासाउंड करना पड़ेगा जिसके लिए अभी उन्हें थोड़ा इंतजार करना होगा क्योंकि अल्ट्रासाउंड करने के लिए उनका रेडियोलॉजिस्ट शहर के बाहर है और उन्हें दूसरा रेडियोलॉजिस्ट पास वाले हॉस्पिटल से बुलाना होगा। 1 घंटा बीत जाने के पश्चात अल्ट्रासाउंड की रिपोर्ट डॉक्टर ने निहाल और उसकी मां के साथ साझा की। डॉक्टर ने बताया कि बच्चे की धड़कन बंद हो चुकी है और वह भीतर ही अपना दम तोड़ चुका है। यदि जल्दी ही उसे बाहर नहीं निकाला गया तो नीति की जान को भी खतरा हो सकता है। साथ वाले कमरे में लेटी नीति ने उनकी बातें सुन ली। सुनकर उसकी चीख निकल पड़ी वह जोर-जोर से रोने लगी और "यह सब झूठ है, ऐसा नहीं हो सकता, मेरे बच्चे को कुछ नहीं हुआ है "कहकर उठने की कोशिश करने लगी। परंतु जैसे ही उसने उठने की कोशिश की उसे चक्कर आया और वह बेहोश होकर वहीं गिर पड़ी। पास खड़ी नर्स ने बामुश्किल उसे संभाला और बिस्तर पर लेटाया। नीति की प्रीमेच्योर डिलीवरी की गई और नीति के अत्यंत कष्ट सहने के बाद उसके मृत शिशु को बाहर निकाला गया जिसे देखकर नीति के ससुराल वाले और सगे संबंधी फूट-फूट कर रोने लगे। होश में आने के बाद नीति को पछतावा हुआ कि उसने समय रहते अपनी मां और डॉक्टर की बात मानकर अच्छी डाइट क्यों नहीं ली, क्यों वह परीक्षाओं में इतनी उलझी रही, क्यों उसने अपने कैरियर को अपने बच्चे से अधिक महत्व दिया, क्यों वह उसको बचा नहीं पाई। अगर वह उस समय अपने खानपान पर उचित ध्यान देती तो शायद आज उसका अजन्मा बच्चा उस से सदा-सदा के लिए दूर नहीं होता। नीति आज भी अपने उस अजन्मे बच्चे की हत्या के लिए खुद को जिम्मेदार और गुनहगार मानती है और प्रायश्चित की अग्नि में दिन-रात जलती है क्योंकि उसका यह दुख अब जीवन भर उसके साथ ही रहेगा। ***********

  • एक हमसफर ....

    प्रतापगढ़ से लालगंज का सफर बहुत कष्टदायक था। मेटाडोर यात्रियों से खचाखच भरी थी और तेज ठंड में भी उमस और उलझन महसूस हो रही थी। हर तरह की सांसें एक दूसरे से उलझ रही थी और एक ऐसी गंध का निर्माण कर रही थी, जो असहनीय होती जा रही थी। पाद की गंध, इत्र की सुगन्ध और सांसों से झिरती, प्याज, लहसुन, सिगरेट-बीड़ी और तम्बाकू-खैनी की रसगंध एकसार होकर बेचैन किए थी। मैं अपनी किस्मत को कोस रहा था कि पहले मैं ड्राइवर की बगल वाली सीट पर बैठा था, अकेला। परन्तु जब ड्राइवर कम कंडक्टर ने एक-एक करके तीन आदमी उस सीट पर बैठाये तो मैं झुंझला कर बोल उठा, आप गाड़ी कैसे चलाओगे,? खुद कहाँ बैठोगे? ‘यह मेरा काम है, मैं कर लूंगा। ‘उसने गर्व मिश्रित साधिकार घोषणा कीं।’ मैंने असमंजस में आकर पीछे बैठना ही बेहतर समझा। वहाँ, कमोवेश गिरने का डर तो नहीं रहेगा, और उस समय पीछे की सीटें पूर्णरूपेण भरी नहीं थीं, और मुझे तनिक भी आशंका नहीं थी कि, पीछे की स्थिति भी बदतर हो जायेगी। वैसे भी ड्राइवर के साथ वाली जगह पर इस इलाके के प्रभावशाली लोग ही बैठते थे। इस जगह पर उनका अघोषित आरक्षण था। मुझ जैसे का उनके साथ बैठना उन्हें असहज बना रहा था। एक दो बार इशारों से और वाक्यों से मुझे पीछे आराम से बैठने की सलाह, ड्राइवर और तथाकथित उच्च लोग दे चुके थे। परन्तु वहाँ बैठकर मैं भी अपने को विशिष्ट समझने का भाव लिए था। मेरे वहाँ से उतर कर पीछे चले जाने से, उन लोगों के चेहरे से हार्दिक संतुष्टि का भाव प्रगट हो रहा था। मेटाडोर के पीछे वाले हिस्से में दो लम्बी-लम्बी सीटें थीं, जिन पर चार-चार लोग आसानी से बैठ सकते थे। परन्तु उसने देखते ही देखते उनमें छै-छै व्यक्ति खिसका-खिसका कर व्यवस्थित कर दिए थे। मैं आगे और पीछे की सीटों पर बैठने की प्राथमिकताओं और उपयोगिताओं के गणित में उलझ कर रह गया था। मेरे सामने की सीट पर चार औरतें थीं और दो आदमी। उसमें तीन औरतें और दोनों आदमी साठ-सत्तर के आसपास बूढ़े और थके थे। सिर्फ एक औरत जवान थी, शायद काली सी। वह घूंघट लिए थी और उसकी गोद में एक डेढ़ साल का बच्चा था, उस जैसा ही। उस बच्चे वाली औरत के दांत सफेद मोती जैसे थे जो घूंघट में चमक रहे थे। बच्चा अकसर रो उठता था, जिसे चुप कराने के लिए उसे छाती से सटाकर दूध पिलाना पड़ता था, जिसके लिए उसे काफी सावधानी रखनी पड़ती थी, कि कोई नजर उसका पोषण अंग देख न ले। जिस सीट पर मैं बैठा था उसमें एक कम उम्र का जवान लड़का गेट की तरफ, दो अधेड़ औरतें, एक मुच्छड़ अधेड़, एक मैं और मेरे बगल में, ड्राइवर की सीट के एकदम पीछे एक पर्दानशीन। ड्राइवर के साथ एक पुलिस वाला एक ठेकेदार और एक अध्यापक था, जो जोर-जोर से बातें और बहस कर रहे थे। एक तो बोरियों की तरह ठुसे, ऊपर से बोरियत का आलम, कहीं कोई खूबसूरती का चिह्न नहीं था। मैं कसमसाया और अन्दर चारों तरफ नजर दौड़ाई, मगर अफसोस उस यात्रियों से भरी मेटाडोर में कहीं कोई रोमांस लायक नहीं था। सारे चेहरे थके बोझिल और बूढ़े थे। ज्यादातर अधेड़ मुच्छड़ या झुर्रियों भरे चेहरे थे। मैं खूबसूरती की तलाश में था। बच्चे वाली काली नवयौवना घूंघट की आड़ से अकसर मुझे देख लेती थी, जब मेरी नजरें कहीं और होती थी। उसका चेहरा तो ठीक से नहीं देख पाता था परन्तु पोषण वाली जगह अकसर दृष्टि पड़ जाती थी। वह झट से बच्चे का दूध छुटाकर अपने को पूरा ढक लेती थी। मेरी खूबसूरती की तलाश पर्दानशीन पर आकर अटक गई थी। वह बुरके में थी। लड़की, नवयुवती या स्त्री? उसका कोई भी अंग, या कोर नहीं दिख रहा था, जिससे खूबसूरत, बदसूरत का अंदाजा लग सकें। खूबसूरती की खोज में असफल, निराश और यह सोच कर कि सुन्दरता के दर्शन दुर्लभ हैं, मैंने आंखें बंद कर लीं। कुछेक पलों बाद मैंने आंखें खोलीं तो देखा घूंघट वाली अपने बच्चे को दूध पिला रहा थी, मगर उसकी आंखें मुझ पर स्थिर थीं मैं अचकचाया और अपनी दृष्टि पर्दानशीन पर फेर दी। उसकी आंखें भी महीन जालियों में कैद थीं। बड़ी कोफ्त हो रही थी। अचानक उसने बुरके की जेब से हाथ बाहर निकाला और अपने चेहरे पर फेरते हुए मद्धिम स्वर में कहा, ‘‘आह! क्या आफत है? मेरी सांस न घुट जाये।‘‘ उसके हाथ और साइड से चेहरे की झलक पाकर, मुझे आभास हो गया कि यह लड़की बला की खूबसूरत होगी। मुझे लगा सुन्दरता हर जगह होती है, तलाश करनी पड़ती है। मैं उसे कनखियों से देख लेता। अब मेरा ध्यान सिर्फ उसी पर केन्द्रित था कि कैसे पूर्ण चांद दिख जाये! मैंने एक नजर चारों ओर दौड़ाई, सब ऊब और ऊँघ रहे थे। सायं के सात बज रहे थे। रात का अंधेरा घिर आया था। गाड़ी अपनी गति से चल रही थी और हर आधा-एक किमी पर गाड़ी रुकती सवारियां उतारती और चढ़ाती थी। परन्तु यात्रियों की गुणवत्ता में कोई सुधार नहीं आ रहा था। पर्दानशीन हसीना ने व्याकुल होकर अपने चेहरे के हिजाब को उलट दिया और मेरी तरफ मुखातिब होकर बोली, ‘बड़ी बेबसी है, घुटन है।‘ मैं हतप्रभ उसकी ओर अपलक निहारता ही रह गया। उसके चेहरे पर अजीब सा आकर्षण और सम्मोहन था, जिसने मुझे मंत्रमुग्ध कर दिया था। वह बला की खूबसूरत थी और उसका बदन तराशा हुआ था। उसकी आंखों में बेपनाह गहराई थी। वह मेरी तरफ उत्सुक नजरों से देख रही थी। मैं प्रतिक्रिया विहीन, भावशून्य अवस्था में शब्दहीन और अर्ध व्याकुल था। कई सारी जोड़ी आंखें, उस पर केन्द्रित हो गयीं तो झट से उसने अपना चेहरा ढक लिया और मैं चेतन अवस्था में आ गया। मैंने सोचा इश्क करने के लिए उससे ज्यादा उपर्युक्त कोई नहीं होगा। कम से कम जिंदगी में एक अदद गर्लफ्रेन्ड होना जरूरी है, जिससे मैं अभी तक महरूम था। मेरी तलाश पूर्ण हो चुकी थी। मैंने मन ही मन अपनी दीदी का शुक्रिया अदा किया, जिन्होंने कुछ समय के लिए छुट्टियों में अपने साथ रहने को बुलाया था। लीलापुर आ गया था। कई सवारियां उतरी थीं। बच्चे वाली औरत गायब थी, वह कब उतर गई पता ही न चला। यहाँ पर कोई सवारी नहीं चढ़ी। मेटाडोर कुछ हल्की हो गयी थी। राहत सी महसूस हो रही थी कुछ तरह की गंधों और उमस से निजात मिली थी। ‘ठीक से बैठ जाइये।‘ हसीना बोली। मैं खिसक के बैठ गया। उसने खाली स्थान की पूर्ति कर दी। अब भी उसका जिस्म मेरे शरीर के सम्पर्क में था। काफी अच्छा लग रहा था। मैं सीट को बायें हांथ से पकड़े था, सम्भावित धचके से बचने के लिए। उसने कुछ सोचा और अपनी हथेली मेरे हाथ पर टिका दी। एक करंट हाथों से होता हुआ मन मस्तिष्क पर पहुंच गया। खून का प्रवाह रूक गया, प्यार का आवेग चल पड़ा। मैं बुखार में दग्ध हो उठा था। मैं जड़वत वैसा ही बैठा रहा। ‘नये हो?‘ मेरा हलक सूख गया। हाँ, और आप? ‘यहीं की हूँ। लाल गंज घर है। प्रताप गढ़ में सर्विस करती हूँ। ‘आप स्टूडेंन्ट हैं?‘ ‘सही अनुमान है, आपका। इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में एम0ए0 का छात्र हूँ। एक लम्बी खामोशी। सफर जारी था। उसकी हथेली हल्के-हल्के मेरी हथेली को दबा रही थी। मादकता की अनुभूति हो रही थी। लालगंज आने वाला था, ड्राइवर ने चेताया, किराया निकाल कर रख लो। लालगंज में उस समय बिजली आ रही थी इस कारण रोशन हो रहा था लालगंज। मेटाडोर एक झटके से रूकी और हम दोंनों एकदम सट गये। लड़की ने मेरी तरफ मद्धिम खुमार भरी, उत्सुक नजरों से देखा। उसकी निगाहें शायद खुलकर दिल का राज कह देना चाहती थी, मगर कामयाब न हो सकी। उन आंखों में एक हल्की सी चमक पैदा हुई, परन्तु गुम हो गई। सारे यात्री मेटाडोर से उतरते जाते और किराया देते जाते थे। ड्राइवर ने उसकी तरफ देखा, लड़की ने मेरी तरफ देखा। ड्राइवर बोला, ‘साथ में हो?‘ हम दोंनों में से कोई नहीं बोला। उसने दोनों का किराया मेरे से काट लिया। हम दोंनों साथ-साथ चल रहे थे। कालाकांकर रोड में दीदी का घर था, मैं एक बार पहले भी आ चुका था। शायद उस हसीना का घर भी उधर होगा। एकदम से लालगंज की बिजली गुम हो गयी और वह मुझसे सट गई। उसने मेरी बांह पकड़ ली थी और बाह पकड़े-पकड़े ही चल रही थी। रोमान्टिकता फिर चल पड़ी थी। मैंने फ्रेंड बनाने की गरज से उसका नाम पूछा। ‘तरन्नुम।‘ और आपका? ‘आनन्द। मुझसे दोस्ती करोगी? ‘जरूर। क्यों नहीं?‘ मैंने अपना कान्टेक्ट नम्बर दिया। उसने नहीं दिया। रास्ता खामोशी और रोमांस से तय हो रहा था। मैं प्रसन्नता के उच्चतम शिखर पर था गर्वानुभूति से घिरा हुआ। अप्रत्याशित रूप से उस हसीन दोस्त का मिलना किसी सौगात से कम नहीं था। अचानक वह रुकी, उसने मेरी हथेली, अपनी हथेलियों से रगड़ी, और बोली ‘काम ..............काम नहीं करोगे?‘ ‘काम।.............काम का मतलब? लड़की ने अपने दोनों हाथों की अंगुलियों से मेरी दोनों हथेलियों को गुदगुदाया .......काम ........नहीं जानते.......? उसने मेरी आंखों में अपनी आंखें डाल दीं। उसकी आंखों में नशा था, आमंत्रण था। मगर मैं संज्ञा शून्य हो चुका था। उसका यह रूप देखकर मैं पाषाण बन चुका था। मेरी कल्पनाओं और भावनाओं को भयानक आघात लगा था। हसीना फिर लड़की में तबदील हो चुकी थी। ‘तो, ये काम करती हो?‘ ‘हां, क्या करें,? मजबूरी है।‘ ऐसी क्या मजबूरी है? मैं नार्मल हो चुका था। उसकी आंखें नम थीं। गला रूंध गया था। उसने धीमे और बोझिल आवाज में कहा। हम अब्बू अम्मी को मिलाकर दस जने का परिवार। अब्बू बढ़ई का काम करते हैं। खाने के लाले पड़े रहते हैं। फिर बढ़ई गिरि कभी चलती है, कभी नहीं। घर का खाना-खर्चा और भाई बहिनों की पढ़ाई लिखाई कैसे चले? अब्बू की बढ़ईगीरी से दो जने का भी खर्चा नहीं निकल सकता। मैं घर में सबसे बड़ी, मुझे भी तो घर की जिम्मेदारी निभानी है। नवीं पास, मैं और क्या काम कर सकती हूँ। मैं आगे नहीं पढ़ पाई तो क्या मेरे भाई बहिन भी पढ़ाई-लिखाई से महरूम रहें? उन्हें तो योग्य बना दूँ। उसने मेरा हाथ छोड़ दिया था और कुछ अलग हट कर खड़ी हो गई थी। ‘ऐसी मजबूरी की दास्तान तो हर गलत काम करने वाला सुना देता है।‘ उसने गमगीन अविश्वसनीय निगाहों से मुझे देखा भर था और मेरी बर्फ पिघलने लगी थी। लड़की कुछ पल रूकी फिर उसने मेरी नजरों में झांका। शायद मेरी आंखों में अपनी बातों की सच्चाई परख रही हो, और फिर बोली आज शहर के होटल में बुलाया था, परन्तु कस्टमर शाम को ही वापस दिल्ली लौट गया। इसलिए मेरा काम नहीं हुआ। मैंने सोचा तुम नये हो तलाश में भी दिखे शायद एक रात की दुल्हन का अनुभव करना चाहोगे? परन्तु तुम तो .......। खैर............। यह पहली बार नहीं है कि काम से खाली लौटी हूँ।‘ उस लड़की की आंखों में निराशा, हताशा पसर गई थी और मैं मुजरिम की तरह खड़ा, अपना गुनाह कबूल करने की तरफ अग्रसर था। मुझे लगा, मुझे दण्ड मिलना चाहिए, उस गुनाह की सजा जो मैंने अनजाने में की थी। उसकी उम्मीदों को ठोकर मारकर। मैंने अपना पर्स निकाला और कुछ एक रूपये छोड़कर, सारे रूपये उसकी हथेली में रखकर उसकी मुटठी बंद कर दी। उसकी नरम और नाजुक हथेलियां बर्फ की तरह ठंडी पड़ चुकी थीं। ‘गुड बाई।‘ मैंने जल्दी में कहा, और तेज कदमों से उसे छोड़कर बढ़ गया था। मैं उससे इतनी दूर आ गया था कि वह हसीन बला पूरी तरह नजरों से ओझल हो चुकी थी। ********

  • जो पास है वही खास है।

    यह सत्य है कि जीवन में हर व्यक्ति की कुछ इच्छाएं, आकांक्षाएं, अभिलाषाएं और चाहतें होती हैं और ऐसा होना गलत भी नहीं है। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और समाज में रहते हुए इन सब चाहतों का आकांक्षाओं का होना स्वाभाविक ही है। जिंदगी में आगे बढ़ने के लिए भी इनकी मौजूदगी अति आवश्यक हो जाती है क्योंकि यदि इंसान के मन से इच्छाओं का ही अंत हो जाए तो उसका जीवन नीरस हो जाता है आगे बढ़ने की उसकी सभी इच्छाएं वही खत्म हो जाती हैं। हमारी इच्छाएं , आकांक्षाएं हमें आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित और प्रेरित करती हैं। अपनी इच्छाओं को पूरा करने के लिए हम मेहनत करते हैं, संघर्ष करते हैं और मनचाहा प्राप्त करने के लिए जी तोड़ कोशिश करते हैं। परंतु यदि यही इच्छाएं, आकांक्षाएं, अभिलाषाएं, महत्वकांक्षा का रूप ले लेती हैं, तो एक सीमा के पश्चात यह हमारे लिए दुख का कारण बन सकती हैं। जैसा कि मैंने ऊपर भी कहा कि इच्छाएं और आकांक्षाएं रखना कतई गलत नहीं है परंतु यदि यह महत्वकांक्षा बन जाती है और हमारे ऊपर हावी होने लगती है तो उन्हें उसी वक्त रोकने की भी उतनी ही आवश्यकता हो जाती है जितनी की इच्छाओं को तमाम उम्र अपने जीवन में बनाए रखने की। अक्सर देखा जाता है कि हमारे पास जो चीजें उपलब्ध होती हैं हमें उन में संतोष नहीं होता है। एक सीमा तक तो यह बात सही प्रतीत होती है कि हमें हमेशा ऊंचाइयों की ओर देखना चाहिए, आगे बढ़ने का प्रयास करना चाहिए जीवन में तरक्की और प्रगति हासिल करने के लिए सदैव प्रयासरत रहना चाहिए। किसी भी परिस्थिति में हार नहीं माननी चाहिए, अपने उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए हमें यथासंभव प्रयत्न करने चाहिए और जब तक अपना लक्ष्य प्राप्त ना कर लें हमें रुकना नहीं चाहिए। परंतु प्रत्येक वस्तु और बात की एक सीमा भी तय होती है और हमें उस सीमा का हमेशा ध्यान रखना चाहिए। यदि कभी हमारी महत्वकांक्षा इस कदर बढ़ जाती है कि वह हम पर हावी होने लगती हैं तो हमारे जीवन से खुशियों और सुखों का ह्रास होने लगता है, हमारी बेचैनियां बढ़ने लगती हैं और हम हमेशा व्यथित रहना प्रारंभ कर देते हैं। मन में उपापोह की स्थिति सी बनी रहती है। दूसरे के महलों को देखकर अपनी झोपड़ी में आग लगा देना कहां की समझदारी है ।हमें अपने सीमित संसाधनों के भीतर रहकर ही अपने जीवन को आगे बढ़ाना चाहिए। दूसरों के पास रखी चीजों की चमक दमक को देखकर हमें खुश अवश्य होना चाहिए परंतु वैसा ही सब कुछ हमें भी मिल जाए इस चीज के लिए उन्मादी होना भी सही नहीं है। दूसरों की होड़ करना गलत नहीं है, परंतु उस होड को प्रतिस्पर्धा ना समझ कर जुनून समझ लेना समझदारी नहीं कही जा सकती। इस प्रकार का उन्माद हमें हम से ही दूर कर देता है और हम अपने साथ-साथ अपनों से भी दूर होने लगते हैं। बात यदि रिश्तों की जाए तो यदि हम अपने किसी रिश्ते के प्रति कुछ कमी महसूस करते हैं अर्थात यदि हम अपने संबंधों से संतुष्ट नहीं होते हैं तो हमें उसकी जड़ में विद्यमान समस्या का निराकरण और समाधान ढूंढना चाहिए ना कि उस संबंध को तोड़कर किसी अन्य संबंध मे से खुद को जोड़ लेना चाहिए। रिश्ते हमारे जीवन की बुनियाद होते हैं, रिश्तों की डोर इतनी कच्ची नहीं होनी चाहिए कि आप जब चाहे उन्हें तोड़ सकें क्योंकि रिश्ते टूटने से केवल रिश्ते ही नहीं टूटते, अपितु हमसे हमारे अपने भी छूट जाते हैं और अपनों के बिना जिंदगी क्या होती है यह केवल वह इंसान समझ सकता है जिसने जीवन में कभी अपनों को खोया हो। आप लोगों ने अक्सर सुना पढा होगा कि जो पास है वही खास है। यह बात शत प्रतिशत सत्य है क्योंकि जो आपके पास होता है वही अक्सर अपना होता है। दूसरे लोग हमारे मित्र, हमारे संबंधी, हमारे रिश्तेदार हो सकते हैं परंतु हर रिश्ते की अपनी एक गरिमा, एक सीमा होती है। रिश्तों में असमंजस लेकर चलना सही नहीं, हर रिश्ते में शीशे सी पारदर्शिता और स्पष्टता का होना बहुत ही आवश्यक है। अक्सर हमारे पास जो रिश्ते, जो संबंध होते हैं वही हमारे जीवन में कारगर सिद्ध होते हैं। रिश्तों में तनाव तो आते जाते रहते ही हैं, परंतु उन तनावों के चलते रिश्तों को ही खत्म कर देना किसी भी सूरत में सही नहीं माना जा सकता। जो हमारे पास है उसे भूल कर जो हमारे पास नहीं है उसके पीछे दौड़ना मूर्खता ही कही जा सकती है। माना कि, खूबसूरती और अच्छाई हमें आकर्षित करती है परंतु आकर्षण और खिंचाव कभी भी स्थाई नहीं हो सकते। इसलिए रिश्तों को बेवजह गलतफहमियों का शिकार न होने दें, उनको असमय तिलांजलि ना दें, उन्हें संभाले और उनकी खूबसूरती को बढ़ाने के लिए अपना शत प्रतिशत दें। ऐसा कर आपको आत्म संतुष्ट तो मिलेगी ही साथ ही साथ हमारी रिश्तों के प्रति समझदारी भी पहले से कहीं अधिक विकसित होगी। **********

  • डर के आगे जीत है

    मां-बाप की इकलौती बेटी होने के कारण शेफाली बहुत ही नाज़ों से पली-बढ़ी थी। घर के सभी छोटे बड़े शेफाली को बहुत ही स्नेह देते थे और उसकी हर ज़िद को बिना किसी सवाल जवाब के पूरा भी करते थे क्योंकि शेफाली के अलावा घर में कोई और बच्चा नहीं था। उसे तनिक भी कष्ट या परेशानी का अनुभव ना होने पाए, इसलिए उसकी हर छोटी बड़ी समस्या को घर के बड़े अपने स्तर पर ही सुलझा लिया करते थे। उसे कभी मौका ही नहीं दिया गया कि वह आगे बढ़कर कोई जिम्मेदारी ले, संघर्ष करे, दर्द को महसूस करना सीखे। इसलिए दुनियादारी से अनजान शेफाली के मन में कई चीजों को लेकर डर और असुरक्षा की भावना घर कर गई। कांटे भर की चुभन उससे बर्दाश्त नहीं होती थी। कई चीजों के प्रति मन में डर रखने वाली शेफाली धीरे-धीरे जवान हुई और उसकी शादी हो गई। दुख, तकलीफ, दर्द, पीड़ा क्या होते हैं, उसे इस बात का कोई अनुभव और एहसास ही नहीं था। इसलिए शादी के बाद जब वह पहली बार प्रेग्नेंट हुई तो उसे इस बात का भय दिन-रात सताता था कि 9 महीने पश्चात डिलीवरी के समय होने वाले दर्द को वह कैसे बर्दाश्त कर पाएगी क्योंकि उसने अपने मस्तिष्क में कुछ इस प्रकार के संशय या यूं कहें कि डर बैठाकर रखे थे कि डिलीवरी के समय महिलाओं को असहनीय पीड़ा होती है, कई महिलाएं तो वहीं दम भी तोड़ देती हैं, कईयों की सर्जरी भी करनी पड़ जाती है, और डिलीवरी के बाद मानों उनका दूसरा जन्म ही होता है। 9 महीने का यह समय उसने दिन रात चिंता में भयभीत होकर ही निकाला। समय आने पर जब उसे लेबर रूम में ले जाया गया तो वह बहुत अधिक घबरा रही थी। उसे भी अन्य महिलाओं की तरह उसी पीड़ा का अनुभव हुआ। 4 से 5 घंटे ऐसे असहनीय दर्द को घूंट-घूंट पीने के पश्चात शेफाली ने एक प्यारी सी बिटिया को जन्म दिया जिसकी झलक पाते ही शेफाली अपनी सारी पीड़ा और तकलीफें पल भर में भूल गई। इस प्रकार अंतत: उसने अपने इस डर पर भी स्वाभाविक तरीके से जीत हासिल की। सच ही कहते हैं कि प्रकृति बहुत महान है जो सही समय आने पर हमें सब कुछ सहना सिखा ही देती है। **************

  • बढ़ता फैशन, घटते संस्कार

    परिवर्तन जीवन का नियम है। 10 साल पहले जैसे हम थे वैसे अब नहीं हैं और 10 साल बाद भी हम वैसे नहीं रहेंगे जैसे हम आज हैं। कहने का अर्थ यह है कि समय के साथ-साथ हमारे विचार, खानपान, शिक्षा, बोलचाल, रहन-सहन एवं पहनने ओढ़ने के तरीकों में बदलाव आता है। समय के अनुसार चलने में ही समझदारी मानी जाती है, यह बात नितांत सही है। समय के अनुसार स्वयं को ना बदलने वाले लोग अक्सर शिकायती प्रवृत्ति के बन जाते हैं और दुखी रहने लगते हैं। चूंकि वे समय के अनुसार अपने आप को नहीं ढाल सके इस बात की उन्हें खासा परेशानी रहती है और इसी परेशानी के चलते वे किसी अन्य को भी बदलते देखना स्वीकार नहीं कर पाते हैं जिसके कारण उनके विचारों में मतभेद होता है और धीरे-धीरे वह मतभेद मनभेद में परिवर्तित होने लगता है। बात बदलते समय के अनुसार स्वयं को बदलने तक ही है तो उचित है, किंतु आज की वर्तमान पीढ़ी समय बदलाव की आड़ में अपनी मनमानी करने पर आमादा दिखाई देती है जो किसी भी सूरत में स्वीकार्य नहीं है, क्योंकि उनकी इस प्रवृत्ति से हमारी संस्कृति और सभ्यता निश्चित रूप से प्रभावित होती है। बढ़ते फैशन की बात की जाए तो फैशन से हमारा तात्पर्य केवल बदलाव से होना चाहिए। किंतु युवा पीढ़ी फैशन के अर्थ को किसी दूसरी दिशा में ले जाकर सोचती है। उनके अनुसार फैशन के नाम पर कुछ भी पहनना ही फैशन है। यह बात सही है कि अपने मन मुताबिक कपड़े पहनना घूमना फिरना खाना पीना रहना सहना हमारे मौलिक अधिकारों में से एक है किंतु, फैशन के नाम पर कुछ भी पहनकर अपने को आधुनिक कहलाना एक सीमा तक ही सही माना जा सकता है। निसंदेह प्रत्येक जनरेशन कुछ बदलावों के साथ आगे आती है, जो कि एक विकासशील समाज की पहचान भी है। फैशन की इस अंधाधुंध दौड़ में आज की जनरेशन पाश्चात्य सभ्यता और संस्कृति को अपनाने में लगी है। अगर यह कहा जाए कि युवा पीढ़ी भौतिकवादी सभ्यता के पीछे क्रेजी (उन्मादी) हो रही है तो कोई अतिशयोक्ति ना होगी। फैशन के नाम पर अंग प्रदर्शन करना एवं इस प्रकार के वस्त्र पहनना जो देखने में अजीब लगें एवं हम पर बिल्कुल न फब रहे हों, किसी भी दृष्टि से सही नहीं कहे जा सकते। अब बात यह उठेगी कि वस्त्रों के अजीब लगने का क्या मापदंड या क्राइटेरिया है। हो सकता है किसी एक को एक पहनावा अजीब लगता हो वहीं दूसरी ओर, वही पहनावा किसी अन्य के लिए सामान्य हो। हां, यह बिल्कुल सही है, ऐसा हो सकता है। परंतु एक आयु के पश्चात प्रत्येक व्यक्ति को इस बात की समझ आ ही जाती है कि जो वस्त्र उसने पहने हैं वे वाकई में उस पर फब भी रहे हैं अथवा नहीं, अथवा कहीं उसने कुछ ऐसे वस्त्र तो धारण नहीं कर लिए हैं जो फैशन के नाम पर सिर्फ़ नग्नता का ही प्रदर्शन कर रहे हैं। उन्नति, प्रगति, विकास और आगे बढ़ने से तात्पर्य यह कदापि नहीं होता कि हम फैशन को अपना मोहरा बनाएं और कुछ भी ऐसा पहनावा धारण करें जो एक सभ्य समाज में पहनने लायक ना होता हो। यहां इस बात पर कुछ लोगों का यह तर्क होगा कि कमी कभी हमारे वस्त्रों में नहीं होती, अपितु उन लोगों की नजरों में होती है जो उन वस्तुओं पर भद्दे कमेंट करते हैं। काफी हद तक यह बात सही है किंतु बात जब हमारे संस्कारों की आती है तो हमें यह सोचना और समझना चाहिए कि अश्लीलता का प्रदर्शन करने वाले कपड़े कभी भी किसी के लिए स्टाइलिश नहीं कहे जा सकते। बात यहां स्त्री या पुरुष की बिलकुल नहीं है। जिन वस्त्रों को पहनकर हम असहज महसूस करें वे वस्त्र हमारे लिए कदापि पहनावे योग्य नहीं हो सकते। जिन वस्त्रों को धारण करने के पश्चात हमारे मन में संशय और डर की स्थिति बनी रहे उन्हें पहनने की आखिर आवश्यकता ही क्यों है। हम जो भी पहने सबसे पहले वह हमें स्वयं को हर दृष्टि से उचित एवं आरामदेह लगने चाहिएं, उसके पश्चात ही हमें दूसरों की दृष्टि से अपने पहनावे का विश्लेषण करना चाहिए।यहां यह बात स्पष्ट कर देनी भी अत्यंत आवश्यक है कि हम हर चीज के लिए समाज के दूसरे लोगों की सोच पर निर्भर नहीं कर सकते और ना ही हमें यह करने की आवश्यकता है, क्योंकि वही बात है कि कुछ तो लोग कहेंगे लोगों का काम है कहना, परंतु कुछ चीजें ऐसी होती हैं जिनके लिए जब तक हमारा दिल और दिमाग गवाही ना दें हमें उन चीजों पर अमल नहीं करना चाहिए। यह सत्य है कि हम जो भी कार्य करते हैं हमारी अंतरात्मा सबसे पहले हमें बताती है कि क्या ऐसा करना हमारे लिए सही है अथवा नहीं। खुद को सौम्य, सुंदर, आकर्षक एवं सुरक्षित महसूस कराने के लिए ही वस्त्रों का धारण किया जाता है इसमें संदेह नहीं, किंतु यदि हमारे वही वस्त्र हमें असुरक्षा के घेरे में लाकर खड़ा कर दें, तो हमें अपने पहनावे पर गौर फरमाने की आवश्यकता है। वर्तमान युग में कुछ लोग बढ़ते फैशन के चलते अपने संस्कारों की तिलांजलि देने से भी पीछे नहीं हटते। अपने माता पिता अथवा पुरानी पीढ़ी को दकियानूसी सोच का टैग लगाने वाला यह वर्ग अपनी मनमानी कर कुछ भी पहनने के लिए तैयार रहता है क्योंकि उनके अनुसार तन पर जितने कम वस्त्र होंगें,उतने ही वे अधिक आधुनिक कहलाएंगे। अर्थात आधुनिक दिखने की उनकी इस चाह में अपने बदन को दूसरों की निगाहों का निशाना बनते देखने में वे तनिक भी असहज महसूस नहीं करते। वहीं दूसरी तरफ जब उनके माता-पिता अथवा अभिभावक उन्हें समझाते हैं कि तन पर फबने वाले कपड़े ही पहनने चाहिएं तो वे पलटकर उनको जवाब देने से भी नहीं चूकते, अपितु उनका विरोध भी करते हैं और कभी-कभी तो स्थिति इतनी खराब हो जाती है कि वे अपने बड़े बुजुर्गों की आयु तक का ख्याल नहीं रखते और उनकी हर बात को काटना शुरू कर देते हैं। कभी-कभी कुछ आपत्तिजनक शब्दों का प्रयोग करने से भी उन्हें गुरेज नहीं होता क्योंकि वे हर कीमत पर सिर्फ और सिर्फ अपनी इच्छाओं को पूरा करना चाहते हैं बिना यह सोचे कि उनके बड़े अपने अनुभवों के आधार पर ही उन्हें समझा रहे हैं, उनका मार्गदर्शन कर रहे हैं। कभी-कभी बदलते फैशन के साथ-साथ सोच भी बदलने लगती है व चीजों और रिश्तों के प्रति लोगों का नजरिया भी बदलने लगता है ।यह बदलाव अगर अच्छे के लिए हो, अपनों को करीब लाने या उनके करीब जाने के लिए हो, चीजों में सुधार लाने के लिए हो तो कोई परेशानी नहीं, किंतु, यदि यह बदलाव अपनों से अपनों को दूर करने लगे, संबंधों में खटास पैदा करने लगे और मनों में दूरियां उत्पन्न करने लगे तो इस दिशा में सोचने की अत्यंत आवश्यकता है। फैशन और संस्कारों की जब बात चल ही रही है तो इस बात को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि बढ़ते फैशन के हिसाब से खुद को चलाने के लिए लोग अक्सर गलत आदतों का शिकार भी होते देखे गए हैं। अपनी पहुंच के बाहर बाजार में बिकने वाली चीजों के प्रति आकर्षण का पैदा होना स्वाभाविक है, किंतु यदि जेब में इतने पैसे ना हों कि अपने मन मुताबिक चीजों को क्रय किया जा सके तो मन में असंतोष उत्पन्न होता है, मानसिक उथल-पुथल होती है और इस उथल-पुथल में कुछ गलत एवं अनैतिक करने की सोच भी स्वत: ही विकसित होती है। आजकल एक नई बात और ट्रेंड में देखी जा रही है कि पाश्चात्य सभ्यता और संस्कृति के साथ-साथ हमारे युवा और या यूं कहें प्रत्येक आयु वर्ग के लोग फिल्मी जगत की हस्तियों को अपना आदर्श मानते हैं और उनके खान पान, रहन-सहन, आदतों और पहनावे को ज्यों का त्यों अपनाना फैशन समझते हैं। फिल्मी जगत और सेलिब्रिटीज के ग्लैमर की चकाचौंध में अंधे होकर वे यह तक भूल जाते हैं कि पर्दे पर दिखाई जाने वाली फिल्मों का वास्तविकता से बहुत ज्यादा लेना देना नहीं होता है। रियल और रील लाइफ में आकाश पाताल का अंतर होता है।फिल्मी हस्तियां तो केवल मनोरंजन और पैसा कमाने की मंशा से ही रुपहले पर्दे पर छाए रहते हैं। उनका अंधानुकरण करना मूर्खता ही कहलाएगा। बिना यह जाने समझे कि दूसरों की हूबहू नकल करने का क्या परिणाम होगा, हमें किसी के पीछे नहीं भागना चाहिए, उनकी नकल नहीं करनी चाहिए। आप जैसे हैं, सदा वैसे ही रहें क्योंकि आप की मौलिकता एवम स्वाभाविकता ही आप की असली पहचान होती है और उसे गंवाने का अर्थ यह है है कि हम अपने आप से ही दूर होते जा रहे हैं। अपने मूलभूत संस्कारों से दूरी बनाना भला कहां की समझदारी है। फैशन के नाम पर यदि हमें अपने आप और अपनों से दूरी बनाने पड़े तो इससे दुखद और कुछ नहीं हो सकता अक्सर देखने को मिलता है कि चीज़ों का फैशन हर छोटे अंतराल के बाद बदल जाता है। पुरानी चीजों का स्थान एक अवधि के बाद नई चीजें लेने लगती हैं। फैशन के नाम पर यदि हम भी इसी प्रकार अपने को थोड़े-थोड़े अंतराल के बाद बदलते रहे, तो वह दिन दूर नहीं जब हम स्वयं ही यह भूल जाएंगे कि वस्तुत: हम हैं कौन, हमारा असली अस्तित्व क्या है। यहां मैं एक बात स्पष्ट कर देना चाहती हूं कि फैशन करना गलत नहीं है। समय के अनुसार चलना ही समझदारी कहलाती है और जो व्यक्ति समय के अनुसार नहीं चलता वह पिछड़ जाता है, यह भी सत्य है। परंतु, फैशन के नाम पर हमें क्या खरीदना है क्या नहीं, क्या अपनाना है क्या नहीं, इसकी समझ भी बहुत मायने रखती है। दूसरों के महलों को देखकर अपनी झोपड़ी में आग लगाना कतई सही नहीं है। समाज में विभिन्न प्रकार के वर्गों के लोग रहते हैं, परंतु सभी का आर्थिक स्तर तो एक जैसा नहीं हो सकता। इसलिए हमें सदैव उतने ही पैर पसारने चाहिएं जितनी हमारी चादर हो। कहने का मतलब यह है कि हमें अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण करना आना चाहिए। अपने मस्तिष्क में एक बात हमें बिठा लेनी चाहिए कि बाहरी सुंदरता कभी भी आंतरिक सुंदरता की बराबरी नहीं कर सकती। फैशन अपनाकर निसंदेह आप स्वयं को बाहरी तरीके से बहुत सुंदर बना सकते हैं। किंतु यदि आंतरिक सुंदरता का अभाव है तो बहुत जल्द वह बाहरी सुंदरता भी आपके आस पास के सभी लोगों को अखरने लगती है। अपने रीति-रिवाजों, परंपराओं, नैतिक मूल्यों एवं संस्कारों को महत्व देते हुए ही हमें समय के अनुसार आगे बढ़ना चाहिए। ये संस्कार तो हमारी धरोहर होते हैं, हमारी पहचान होते हैं, हमारी शान होते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि खुद को आधुनिक दिखाने की चाह में हम यह कदाचित नहीं भूल सकते कि हमारी संस्कृति अत्यधिक समृद्ध एवं पुरातन है। अपनी सांस्कृतिक विरासत को हमें अपने साथ लेकर चलना होगा। साथ ही साथ आगे आने वाली अपनी पीढ़ियों को भी इस विरासत को सौंपना होगा, उन्हें इसका सांस्कृतिक महत्व समझाना होगा ताकि वे भी इसे अमूल्य पूंजी समझकर सदैव संजो कर रखें और समय आने पर नेक्स्ट जेनरेशन को सादर प्रेषित करें। भारत की तो संस्कृति ही सादा जीवन उच्च विचार वाली रही है। बाह्य आडंबर, चकाचौंध, ढोंग और दिखावे से दूर हमारी संस्कृति की विश्व में अपनी एक अलग और विशिष्ट पहचान है, इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता। अपनी संस्कृति को हमें बिल्कुल वैसे ही हीरे की तरह तराशना होगा जिस प्रकार हमारे पूर्वजों ने इसे तराशा कर समृद्ध बनाया और सुरक्षित तरीके से हम तक पहुंचाया। संस्कारों को भूलकर कभी भी किसी भी प्रकार के फैशन की वकालत नहीं की जा सकती। संस्कारों ने हमें सदियों से बांधकर रखा है। रोज बदलते फैशन के वशीभूत होकर हमें अपने संस्कारों को कदापि नहीं भूलना चाहिए और अपनी संस्कृति और सभ्यता का मान और सम्मान सदैव बनाए रखना चाहिए। *************

  • आधुनिक सच

    मियां-बीबी दोनों मिल खूब कमाते हैं तीस लाख का पैकेज दोनों ही पाते हैं सुबह आठ बजे नौकरियों पर जाते हैं रात ग्यारह तक ही वापिस आते हैं अपने परिवारिक रिश्तों से कतराते हैं अकेले रह कर वह कैरियर बनाते हैं कोई कुछ मांग न ले वो मुंह छुपाते हैं भीड़ में रहकर भी अकेले रह जाते हैं मोटे वेतन की नौकरी छोड़ नहीं पाते हैं अपने नन्हे मुन्ने को पाल नहीं पाते हैं फुल टाइम की मेड ऐजेंसी से लाते हैं उसी के जिम्मे वो बच्चा छोड़ जाते हैं परिवार को उनका बच्चा नहीं जानता है केवल आया 'आंटी' को ही पहचानता है दादा-दादी, नाना-नानी कौन होते है ? अनजान है सबसे किसी को न मानता है आया ही नहलाती है आया ही खिलाती है टिफिन भी रोज़ रोज़ आया ही बनाती है यूनिफार्म पहना के स्कूल कैब में बिठाती है छुट्टी के बाद कैब से आया ही घर लाती है नींद जब आती है तो आया ही सुलाती है जैसी भी उसको आती है लोरी सुनाती है उसे सुलाने में अक्सर वो भी सो जाती है कभी जब मचलता है तो टीवी दिखाती है जो टीचर मैम बताती है वही वो मानता है देसी खाना छोड कर पीजा बर्गर खाता है वीक एन्ड पर मॉल में पिकनिक मनाता है संडे की छुट्टी मौम-डैड के संग बिताता है वक्त नहीं रुकता है तेजी से गुजर जाता है वह स्कूल से निकल के कालेज में आता है कान्वेन्ट में पढ़ने पर इंडिया कहाँ भाता है आगे पढाई करने वह विदेश चला जाता है वहाँ नये दोस्त बनते हैं उनमें रम जाता है मां-बाप के पैसों से ही खर्चा चलाता है धीरे-धीरे वहीं की संस्कृति में रंग जाता है माता पिता से रिश्ता पैसों का रह जाता है कुछ दिन में उसे काम वहीं मिल जाता है जीवन साथी शीघ्र ढूंढ वहीं बस जाता है माँ बाप ने जो देखा ख्वाब वो टूट जाता है बेटे के दिमाग में भी कैरियर रह जाता है बुढ़ापे में माँ-बाप अब अकेले रह जाते हैं जिनकी अनदेखी की उनसे आँखें चुराते हैं क्यों इतना कमाया ये सोच के पछताते हैं घुट घुट कर जीते हैं खुद से भी शरमाते हैं हाथ पैर ढीले हो जाते, चलने में दुख पाते हैं दाढ़-दाँत गिर जाते, मोटे चश्मे लग जाते हैं कमर भी झुक जाती, कान नहीं सुन पाते हैं वृद्धाश्रम में दाखिल हो, जिंदा ही मर जाते हैं : ***********

  • नाच न जाने आंगन टेढ़ा

    ईश्वर की बनाई इस सृष्टि में भांति-भांति के लोग हैं, जिनमें विभिन्न प्रकार की कमियां और खूबियां देखने को मिलती हैं। यह जरूरी नहीं कि एक व्यक्ति में सिर्फ कमियां ही हों और उसी प्रकार यह भी आवश्यक नहीं कि किसी एक व्यक्ति में सभी अच्छाइयां ही देखने को मिले। ईश्वर की बनाई इस दुनिया में सभी लोग अपनी-अपनी विशेषताएं लेकर जन्मे हैं। इन विशेषताओं के साथ प्रभु ने प्रत्येक व्यक्ति या यूं कहें कि सृष्टि की हर वस्तु में कोई ना कोई कसर बाकी छोड़ी है। ईश्वर की इस लीला के पीछे शायद यही कारण हो सकता है कि यदि ईश्वर ने सभी को सर्वगुण संपन्न बनाया होता तो इस विश्व में किसी को किसी की जरूरत ही ना रह जाती और अहंकारवश सभी अपने को सर्वश्रेष्ठ मानते और जिसका परिणाम सृष्टि का अंत होता। इस प्रकार की स्थिति उत्पन्न न होने पाए इसलिए परमात्मा ने सभी व्यक्तियों को अलग-अलग खूबियों से नवाजा है। ईश्वर प्रदत्त इन खूबियों और कमियों को हमें दिल से स्वीकार करना चाहिए ना कि अपनी कमियों को छुपाना चाहिए और खूबियों का बढ़-चढ़कर बखान करना चाहिए। कुछ लोगों की आदत होती है कि वे अपनी कमियों का ठीकरा दूसरों के सिर फोड़ने से बाज नहीं आते अर्थात ‘नाच ना आवे आंगन टेढ़ा’ वाली कहावत ऐसे ही अवसरों पर चरितार्थ होती दिखाई देती है। जहां लोग अपनी कमियों को छुपाने के लिए दूसरे लोगों में कमियां निकालना शुरू कर देते हैं। वह अक्सर भूल जाते हैं कि कमी तो उनके भी भीतर है। जिस प्रकार हम अपनी अपनी खूबियों पर नाज करते हैं उसी प्रकार हमें दूसरे के खूबियों की भी सराहना करनी आना चाहिए। दूसरों की अच्छाइयों और खूबियों से हमें कुछ नया सीखना चाहिए और अपनी कमियों को दूर करने हेतु यथासंभव कोशिश करनी चाहिए। अपनी कमियों को छुपाकर हम आत्म संतुष्टि का अनुभव करते हैं। दूसरों को यह जताकर कि वे केवल खूबियों के पुतले हैं, वे न केवल स्वयं को धोखे में रखते हैं, अपितु दूसरों को भी बेवकूफ बनाने का निरर्थक प्रयास करते हैं। निरर्थक प्रयास इसलिए कहा क्योंकि ईश्वर ने सभी को दिमाग दिया है जिसके माध्यम से सभी लोग यह सोचने समझने की सामर्थ्य, क्षमता और शक्ति रखते हैं कि सामने वाला जो कह रहा है उसमें कितनी सच्चाई है। दूसरे व्यक्ति को एक सीमा तक ही हम मूर्ख बना सकता है। समय बीतने के साथ-साथ सभी को वास्तविक स्थिति समझ आने लगती है। यहां बात दूसरे लोगों को संतुष्ट अथवा खुश करने की नहीं है क्योंकि यदि हम हमेशा दूसरों के बारे में ही सोचते रहेंगे तो स्वयं के विषय में कब सोचेंगे। दूसरों को संतुष्ट करने से पहले हमारा अपने लिए भी कर्तव्य बनता है कि हम स्वयं को संतुष्ट करें। आत्म संतुष्टि सबसे बड़ा धन समझा जाता है। जब हम स्वयं ही अपनी किसी बात से सरोकार नहीं रखेंगे। अपने किसी निर्णय पर स्वयं भरोसा नहीं करेंगे। तो हम स्वयं में आत्मविश्वास पैदा नहीं कर पाएंगे और आत्मविश्वास ना होने की स्थिति में हम दूसरों के समक्ष ज्यादा देर तक खड़े नहीं रह पाएंगे। इसलिए बेहतर यही होगा है कि अपनी कमियों को स्वीकार करें और खूबियों को निखारने का हर संभव प्रयास करें। कमियों को सुधारने वाला व्यक्ति उन लोगों से महान होता है जो अपनी गलतियों और कमियों को छुपाने का प्रयास करते हैं। ईश्वर ने जैसा हमें बनाया है, हमें अपने उस रूप को ही पूरे दिल से स्वीकार करना चाहिए और प्रतिदिन ईश्वर का आभार व्यक्त करना चाहिए कि उन्होंने हमें मनुष्य का जीवन दिया और जिसकी वजह से ही हम इस सुंदर सृष्टि को देख पाए। हां इतना जरूर है कि अपनी कमियों को सुधारने का प्रयास हमें कभी नहीं छोड़ना चाहिए, साथ ही साथ अपनी खूबियों पर भी घमंड नहीं करना चाहिए क्योंकि रंग रूप अति क्षणिक होता है। समय बदलते देर नहीं लगती, परिवर्तन ही सृष्टि का नियम है। ईश्वर के प्रति अपनी कृतज्ञता ज्ञापित करने के लिए हमें समाज में रहते हुए एक दूसरे की सहायता करनी चाहिए और मानव कल्याण के लिए सदैव प्रयासरत रहना चाहिए। ********

  • "माँ की ममता"

    बाहर बारिश हो रही थी, और अन्दर क्लास चल रही थी। तभी टीचर ने बच्चों से पूछा - अगर तुम सभी को 100-100 रुपया दिए जाए तो तुम सब क्या-क्या खरीदोगे? किसी ने कहा - मैं वीडियो गेम खरीदुंगा। किसी ने कहा - मैं क्रिकेट का बेट खरीदुंगा। किसी ने कहा - मैं अपने लिए प्यारी सी गुड़िया खरीदुंगी। तो, किसी ने कहा - मैं बहुत सी चॉकलेट्स खरीदुंगी। एक बच्चा कुछ सोचने में डुबा हुआ था टीचर ने उससे पुछा - तुम क्या सोच रहे हो, तुम क्या खरीदोगे ? बच्चा बोला -टीचर जी मेरी माँ को थोड़ा कम दिखाई देता है तो मैं अपनी माँ के लिए एक चश्मा खरीदूंगा! टीचर ने पूछा - तुम्हारी माँ के लिए चश्मा तो तुम्हारे पापा भी खरीद सकते है तुम्हें अपने लिए कुछ नहीं खरीदना? बच्चे ने जो जवाब दिया उससे टीचर का भी गला भर आया ! बच्चे ने कहा - मेरे पापा अब इस दुनिया में नहीं हैं। मेरी माँ लोगों के कपड़े सिलकर मुझे पढ़ाती है, और कम दिखाई देने की वजह से वो ठीक से कपड़े नहीं सिल पाती है। इसीलिए मैं मेरी माँ को चश्मा देना चाहता हुँ, ताकि मैं अच्छे से पढ़ सकूँ बड़ा आदमी बन सकूँ, और माँ को सारे सुख दे सकूँ। टीचर - बेटा तेरी सोच ही तेरी कमाई है। ये 100 रूपये मेरे वादे के अनुसार और ये 100 रूपये और उधार दे रहा हूँ। जब कभी कमाओ तो लौटा देना और मेरी इच्छा है, तू इतना बड़ा आदमी बने कि तेरे सर पे हाथ फेरते वक्त मैं धन्य हो जाऊं। 20 वर्ष बाद। बाहर बारिश हो रही है, और अंदर क्लास चल रही है। अचानक स्कूल के आगे जिला कलेक्टर की बत्ती वाली गाड़ी आकर रूकती है स्कूल स्टाफ चौकन्ना हो जाता हैं। स्कूल में सन्नाटा छा जाता हैं। मगर ये क्या? जिला कलेक्टर एक वृद्ध टीचर के पैरों में गिर जाते हैं, और कहते हैं – सर, मैं उधार के 100 रूपये लौटाने आया हूँ। पूरा स्कूल स्टॉफ स्तब्ध। वृद्ध टीचर झुके हुए नौजवान कलेक्टर को उठाकर भुजाओं में कस लेता है, और रो पड़ता हैं। दोस्तों - मशहूर होना, पर मगरूर मत बनना। साधारण रहना, कमज़ोर मत बनना। वक़्त बदलते देर नहीं लगती। शहंशाह को फ़कीर, और फ़क़ीर को शहंशाह बनते, देर नही लगती। **********

  • मां तुम बहुत याद आती हो

    मां तुम बहुत याद आती हो मैं जब भी देखती हूं मंदिर में माता की मूरत कोई करुणा तुम्हारी आंखों की मेरी आंखों में उतर आती है झर-झर बहते हैं अश्रु नयनों से मेरे चाहूं मैं कितना पर रोक इन पर न लगा पाती हूं मैं क्या करूं मां, मुझे तुम्हारी याद बहुत आती है मैं जब निवाला रोटी का मुंह तक लाती हूं भरपेट खाने के बाद भी मुझे और खिलाने की तेरी वो जिद याद आती है खो जाती हूं तब मैं मां बस तुम्हारे ही खयालों में तेरे हाथों की खुशबू मेरे स्वाद को कई गुना बढ़ा जाती है मैं क्या करूं मां, मुझे तुम्हारी याद बहुत आती है जब कभी देखती हूं मैं विदाई किसी दुल्हन की मुझे ममता तेरी बरबस याद आ जाती है कितना तड़पी थी तू मुझसे जुदा होने के ख्याल से तेरी उस तड़प से मेरी बेचैनियाँ बढ़ जाती हैं मैं क्या करूं मां, मुझे तुम्हारी याद बहुत आती है जब आती हूं घर मैं दिन भर की भाग दौड़ के बाद तुम्हारे आंचल की वो ठंडी छांव याद आती है कैसे तुम करती थी रह भूखी हर शाम मेरा इंतजार तेरे समर्पण की हर छोटी बड़ी बात मेरी आंखें नम कर जाती है मैं क्या करूं मां, मुझे तुम्हारी याद बहुत आती है जब भी होती हूं मैं असमंजस घिरी मुश्किलों के बीच अपनी सभी परेशानियों में तेरी दी हर सीख याद आती है क्या ये संभव नहीं अब मां कि तुम्हारी गोद में मैं सोऊं सिर रखकर क्यों शादी के बाद बेटियां इतनी पराई हो जाती हैं मैं क्या करूं मां, मुझे तुम्हारी याद बहुत आती है

  • नमक का दारोगा

    जब नमक का नया विभाग बना और ईश्वरप्रदत्त वस्तु के व्यवहार करने का निषेध हो गया तो लोग चोरी-छिपे इसका व्यापार करने लगे। अनेक प्रकार के छल-प्रपंचों का सूत्रपात हुआ, कोई घूस से काम निकालता था, कोई चालाकी से। अधिकारियों के पौ-बारह थे। पटवारीगिरी का सर्वसम्मानित पद छोड-छोडकर लोग इस विभाग की बरकंदाजी करते थे। इसके दारोगा पद के लिए तो वकीलों का भी जी ललचाता था। यह वह समय था जब ऍंगरेजी शिक्षा और ईसाई मत को लोग एक ही वस्तु समझते थे। फारसी का प्राबल्य था। प्रेम की कथाएँ और शृंगार रस के काव्य पढकर फारसीदाँ लोग सर्वोच्च पदों पर नियुक्त हो जाया करते थे। मुंशी वंशीधर भी जुलेखा की विरह-कथा समाप्त करके सीरी और फरहाद के प्रेम-वृत्तांत को नल और नील की लडाई और अमेरिका के आविष्कार से अधिक महत्व की बातें समझते हुए रोजगार की खोज में निकले। उनके पिता एक अनुभवी पुरुष थे। समझाने लगे, 'बेटा! घर की दुर्दशा देख रहे हो। ॠण के बोझ से दबे हुए हैं। लडकियाँ हैं, वे घास-फूस की तरह बढती चली जाती हैं। मैं कगारे पर का वृक्ष हो रहा हूँ, न मालूम कब गिर पडूँ! अब तुम्हीं घर के मालिक-मुख्तार हो। 'नौकरी में ओहदे की ओर ध्यान मत देना, यह तो पीर का मजार है। निगाह चढावे और चादर पर रखनी चाहिए। ऐसा काम ढूँढना जहाँ कुछ ऊपरी आय हो। मासिक वेतन तो पूर्णमासी का चाँद है, जो एक दिन दिखाई देता है और घटते-घटते लुप्त हो जाता है। ऊपरी आय बहता हुआ स्रोत है जिससे सदैव प्यास बुझती है। वेतन मनुष्य देता है, इसी से उसमें वृध्दि नहीं होती। ऊपरी आमदनी ईश्वर देता है, इसी से उसकी बरकत होती हैं, तुम स्वयं विद्वान हो, तुम्हें क्या समझाऊँ। 'इस विषय में विवेक की बडी आवश्यकता है। मनुष्य को देखो, उसकी आवश्यकता को देखो और अवसर को देखो, उसके उपरांत जो उचित समझो, करो। गरजवाले आदमी के साथ कठोरता करने में लाभ ही लाभ है। लेकिन बेगरज को दाँव पर पाना जरा कठिन है। इन बातों को निगाह में बाँध लो यह मेरी जन्म भर की कमाई है। इस उपदेश के बाद पिताजी ने आशीर्वाद दिया। वंशीधर आज्ञाकारी पुत्र थे। ये बातें ध्यान से सुनीं और तब घर से चल खडे हुए। इस विस्तृत संसार में उनके लिए धैर्य अपना मित्र, बुध्दि अपनी पथप्रदर्शक और आत्मावलम्बन ही अपना सहायक था। लेकिन अच्छे शकुन से चले थे, जाते ही जाते नमक विभाग के दारोगा पद पर प्रतिष्ठित हो गए। वेतन अच्छा और ऊपरी आय का तो ठिकाना ही न था। वृध्द मुंशीजी को सुख-संवाद मिला तो फूले न समाए। महाजन कुछ नरम पडे, कलवार की आशालता लहलहाई। पडोसियों के हृदय में शूल उठने लगे। जाडे के दिन थे और रात का समय। नमक के सिपाही, चौकीदार नशे में मस्त थे। मुंशी वंशीधर को यहाँ आए अभी छह महीनों से अधिक न हुए थे, लेकिन इस थोडे समय में ही उन्होंने अपनी कार्यकुशलता और उत्तम आचार से अफसरों को मोहित कर लिया था। अफसर लोग उन पर बहुत विश्वास करने लगे। नमक के दफ्तर से एक मील पूर्व की ओर जमुना बहती थी, उस पर नावों का एक पुल बना हुआ था। दारोगाजी किवाड बंद किए मीठी नींद सो रहे थे। अचानक ऑंख खुली तो नदी के प्रवाह की जगह गाडियों की गडगडाहट तथा मल्लाहों का कोलाहल सुनाई दिया। उठ बैठे। इतनी रात गए गाडियाँ क्यों नदी के पार जाती हैं? अवश्य कुछ न कुछ गोलमाल है। तर्क ने भ्रम को पुष्ट किया। वरदी पहनी, तमंचा जेब में रखा और बात की बात में घोडा बढाए हुए पुल पर आ पहुँचे। गाडियों की एक लम्बी कतार पुल के पार जाती देखी। डाँटकर पूछा, 'किसकी गाडियाँ हैं। थोडी देर तक सन्नाटा रहा। आदमियों में कुछ कानाफूसी हुई तब आगे वाले ने कहा-'पंडित अलोपीदीन की। 'कौन पंडित अलोपीदीन? 'दातागंज के। मुंशी वंशीधर चौंके। पंडित अलोपीदीन इस इलाके के सबसे प्रतिष्ठित जमींदार थे। लाखों रुपए का लेन-देन करते थे, इधर छोटे से बडे कौन ऐसे थे जो उनके ॠणी न हों। व्यापार भी बडा लम्बा-चौडा था। बडे चलते-पुरजे आदमी थे। ऍंगरेज अफसर उनके इलाके में शिकार खेलने आते और उनके मेहमान होते। बारहों मास सदाव्रत चलता था। मुंशी ने पूछा, 'गाडियाँ कहाँ जाएँगी? उत्तर मिला, 'कानपुर । लेकिन इस प्रश्न पर कि इनमें क्या है, सन्नाटा छा गया। दारोगा साहब का संदेह और भी बढा। कुछ देर तक उत्तर की बाट देखकर वह जोर से बोले, 'क्या तुम सब गूँगे हो गए हो? हम पूछते हैं इनमें क्या लदा है? जब इस बार भी कोई उत्तर न मिला तो उन्होंने घोडे को एक गाडी से मिलाकर बोरे को टटोला। भ्रम दूर हो गया। यह नमक के डेले थे। पंडित अलोपीदीन अपने सजीले रथ पर सवार, कुछ सोते, कुछ जागते चले आते थे। अचानक कई गाडीवानों ने घबराए हुए आकर जगाया और बोले-'महाराज! दारोगा ने गाडियाँ रोक दी हैं और घाट पर खडे आपको बुलाते हैं। पंडित अलोपीदीन का लक्ष्मीजी पर अखंड विश्वास था। वह कहा करते थे कि संसार का तो कहना ही क्या, स्वर्ग में भी लक्ष्मी का ही राज्य है। उनका यह कहना यथार्थ ही था। न्याय और नीति सब लक्ष्मी के ही खिलौने हैं, इन्हें वह जैसे चाहती हैं नचाती हैं। लेटे ही लेटे गर्व से बोले, चलो हम आते हैं। यह कहकर पंडितजी ने बडी निश्ंचितता से पान के बीडे लगाकर खाए। फिर लिहाफ ओढे हुए दारोगा के पास आकर बोले, 'बाबूजी आशीर्वाद! कहिए, हमसे ऐसा कौन सा अपराध हुआ कि गाडियाँ रोक दी गईं। हम ब्राह्मणों पर तो आपकी कृपा-दृष्टि रहनी चाहिए। वंशीधर रुखाई से बोले, 'सरकारी हुक्म। पं. अलोपीदीन ने हँसकर कहा, 'हम सरकारी हुक्म को नहीं जानते और न सरकार को। हमारे सरकार तो आप ही हैं। हमारा और आपका तो घर का मामला है, हम कभी आपसे बाहर हो सकते हैं? आपने व्यर्थ का कष्ट उठाया। यह हो नहीं सकता कि इधर से जाएँ और इस घाट के देवता को भेंट न चढावें। मैं तो आपकी सेवा में स्वयं ही आ रहा था। वंशीधर पर ऐश्वर्य की मोहिनी वंशी का कुछ प्रभाव न पडा। ईमानदारी की नई उमंग थी। कडककर बोले, 'हम उन नमकहरामों में नहीं है जो कौडियों पर अपना ईमान बेचते फिरते हैं। आप इस समय हिरासत में हैं। आपको कायदे के अनुसार चालान होगा। बस, मुझे अधिक बातों की फुर्सत नहीं है। जमादार बदलूसिंह! तुम इन्हें हिरासत में ले चलो, मैं हुक्म देता हूँ। पं. अलोपीदीन स्तम्भित हो गए। गाडीवानों में हलचल मच गई। पंडितजी के जीवन में कदाचित यह पहला ही अवसर था कि पंडितजी को ऐसी कठोर बातें सुननी पडीं। बदलूसिंह आगे बढा, किन्तु रोब के मारे यह साहस न हुआ कि उनका हाथ पकड सके। पंडितजी ने धर्म को धन का ऐसा निरादर करते कभी न देखा था। विचार किया कि यह अभी उद्दंड लडका है। माया-मोह के जाल में अभी नहीं पडा। अल्हड है, झिझकता है। बहुत दीनभाव से बोले, 'बाबू साहब, ऐसा न कीजिए, हम मिट जाएँगे। इज्जत धूल में मिल जाएगी। हमारा अपमान करने से आपके हाथ क्या आएगा। हम किसी तरह आपसे बाहर थोडे ही हैं। वंशीधर ने कठोर स्वर में कहा, 'हम ऐसी बातें नहीं सुनना चाहते। अलोपीदीन ने जिस सहारे को चट्टान समझ रखा था, वह पैरों के नीचे खिसकता हुआ मालूम हुआ। स्वाभिमान और धन-ऐश्वर्य की कडी चोट लगी। किन्तु अभी तक धन की सांख्यिक शक्ति का पूरा भरोसा था। अपने मुख्तार से बोले, 'लालाजी, एक हजार के नोट बाबू साहब की भेंट करो, आप इस समय भूखे सिंह हो रहे हैं। वंशीधर ने गरम होकर कहा, 'एक हजार नहीं, एक लाख भी मुझे सच्चे मार्ग से नहीं हटा सकते। धर्म की इस बुध्दिहीन दृढता और देव-दुर्लभ त्याग पर मन बहुत झुँझलाया। अब दोनों शक्तियों में संग्राम होने लगा। धन ने उछल-उछलकर आक्रमण करने शुरू किए। एक से पाँच, पाँच से दस, दस से पंद्रह और पंद्रह से बीस हजार तक नौबत पहुँची, किन्तु धर्म अलौकिक वीरता के साथ बहुसंख्यक सेना के सम्मुख अकेला पर्वत की भाँति अटल, अविचलित खडा था। अलोपीदीन निराश होकर बोले, 'अब इससे अधिक मेरा साहस नहीं। आगे आपको अधिकार है। वंशीधर ने अपने जमादार को ललकारा। बदलूसिंह मन में दारोगाजी को गालियाँ देता हुआ पंडित अलोपीदीन की ओर बढा। पंडितजी घबडाकर दो-तीन कदम पीछे हट गए। अत्यंत दीनता से बोले, 'बाबू साहब, ईश्वर के लिए मुझ पर दया कीजिए, मैं पच्चीस हजार पर निपटारा करने का तैयार हूँ। 'असम्भव बात है। 'तीस हजार पर? 'किसी तरह भी सम्भव नहीं। 'क्या चालीस हजार पर भी नहीं। 'चालीस हजार नहीं, चालीस लाख पर भी असम्भव है। 'बदलूसिंह, इस आदमी को हिरासत में ले लो। अब मैं एक शब्द भी नहीं सुनना चाहता। धर्म ने धन को पैरों तले कुचल डाला। अलोपीदीन ने एक हृष्ट-पुष्ट मनुष्य को हथकडियाँ लिए हुए अपनी तरफ आते देखा। चारों ओर निराश और कातर दृष्टि से देखने लगे। इसके बाद मूर्छित होकर गिर पडे। दुनिया सोती थी पर दुनिया की जीभ जागती थी। सवेरे देखिए तो बालक-वृध्द सबके मुहँ से यही बात सुनाई देती थी। जिसे देखिए वही पंडितजी के इस व्यवहार पर टीका-टिप्पणी कर रहा था, निंदा की बौछारें हो रही थीं, मानो संसार से अब पापी का पाप कट गया। पानी को दूध के नाम से बेचने वाला ग्वाला, कल्पित रोजनामचे भरने वाले अधिकारी वर्ग, रेल में बिना टिकट सफर करने वाले बाबू लोग, जाली दस्तावेज बनाने वाले सेठ और साकार यह सब के सब देवताओं की भाँति गर्दनें चला रहे थे। जब दूसरे दिन पंडित अलोपीदीन अभियुक्त होकर कांस्टेबलों के साथ, हाथों में हथकडियाँ, हृदय में ग्लानि और क्षोभ भरे, लज्जा से गर्दन झुकाए अदालत की तरफ चले तो सारे शहर में हलचल मच गई। मेलों में कदाचित ऑंखें इतनी व्यग्र न होती होंगी। भीड के मारे छत और दीवार में कोई भेद न रहा। किंतु अदालत में पहुँचने की देर थी। पं. अलोपीदीन इस अगाध वन के सिंह थे। अधिकारी वर्ग उनके भक्त, अमले उनके सेवक, वकील-मुख्तार उनके आज्ञा पालक और अरदली, चपरासी तथा चौकीदार तो उनके बिना मोल के गुलाम थे। उन्हें देखते ही लोग चारों तरफ से दौडे। सभी लोग विस्मित हो रहे थे। इसलिए नहीं कि अलोपीदीन ने यह कर्म किया, बल्कि इसलिए कि वह कानून के पंजे में कैसे आए? ऐसा मनुष्य जिसके पास असाध्य साधन करने वाला धन और अनन्य वाचालता हो, वह क्यों कानून के पंजे में आए? प्रत्येक मनुष्य उनसे सहानुभूति प्रकट करता था। बडी तत्परता से इस आक्रमण को रोकने के निमित्त वकीलों की एक सेना तैयार की गई। न्याय के मैदान में धर्म और धन में यध्द ठन गया। वंशीधर चुपचाप खडे थे। उनके पास सत्य के सिवा न कोई बल था, न स्पष्ट भाषण के अतिरिक्त कोई शस्त्र। गवाह थे, किंतु लोभ से डाँवाडोल। यहाँ तक कि मुंशीजी को न्याय भी अपनी ओर कुछ खिंचा हुआ दीख पडता था। वह न्याय का दरबार था, परंतु उसके कर्मचारियों पर पक्षपात का नशा छाया हुआ था। किंतु पक्षपात और न्याय का क्या मेल? जहाँ पक्षपात हो, वहाँ न्याय की कल्पना नहीं की जा सकती। मुकदमा शीघ्र ही समाप्त हो गया। डिप्टी मजिस्ट्रेट ने अपनी तजवीज में लिखा, पं. अलोपीदीन के विरुध्द दिए गए प्रमाण निर्मूल और भ्रमात्मक हैं। वह एक बडे भारी आदमी हैं। यह बात कल्पना के बाहर है कि उन्होंने थोडे लाभ के लिए ऐसा दुस्साहस किया हो। यद्यपि नमक के दरोगा मुंशी वंशीधर का अधिक दोष नहीं है, लेकिन यह बडे खेद की बात है कि उसकी उद्दंडता और विचारहीनता के कारण एक भलेमानुस को कष्ट झेलना पडा। हम प्रसन्न हैं कि वह अपने काम में सजग और सचेत रहता है, किंतु नमक के मुकदमे की बढी हुई नमक से हलाली ने उसके विवेक और बुध्दि को भ्रष्ट कर दिया। भविष्य में उसे होशियार रहना चाहिए। वकीलों ने यह फैसला सुना और उछल पडे। पं. अलोपीदीन मुस्कुराते हुए बाहर निकले। स्वजन बाँधवों ने रुपए की लूट की। उदारता का सागर उमड पडा। उसकी लहरों ने अदालत की नींव तक हिला दी। जब वंशीधर बाहर निकले तो चारों ओर उनके ऊपर व्यंग्यबाणों की वर्षा होने लगी। चपरासियों ने झुक-झुककर सलाम किए। किंतु इस समय एक कटु वाक्य, एक-एक संकेत उनकी गर्वाग्नि को प्रज्ज्वलित कर रहा था। कदाचित इस मुकदमे में सफल होकर वह इस तरह अकडते हुए न चलते। आज उन्हें संसार का एक खेदजनक विचित्र अनुभव हुआ। न्याय और विद्वत्ता, लंबी-चौडी उपाधियाँ, बडी-बडी दाढियाँ, ढीले चोगे एक भी सच्चे आदर का पात्र नहीं है। वंशीधर ने धन से बैर मोल लिया था, उसका मूल्य चुकाना अनिवार्य था। कठिनता से एक सप्ताह बीता होगा कि मुअत्तली का परवाना आ पहुँचा। कार्य-परायणता का दंड मिला। बेचारे भग्न हृदय, शोक और खेद से व्यथित घर को चले। बूढे मुंशीजी तो पहले ही से कुडबुडा रहे थे कि चलते-चलते इस लडके को समझाया था, लेकिन इसने एक न सुनी। सब मनमानी करता है। हम तो कलवार और कसाई के तगादे सहें, बुढापे में भगत बनकर बैठें और वहाँ बस वही सूखी तनख्वाह! हमने भी तो नौकरी की है और कोई ओहदेदार नहीं थे। लेकिन काम किया, दिल खोलकर किया और आप ईमानदार बनने चले हैं। घर में चाहे ऍंधेरा हो, मस्जिद में अवश्य दिया जलाएँगे। खेद ऐसी समझ पर! पढना-लिखना सब अकारथ गया। इसके थोडे ही दिनों बाद, जब मुंशी वंशीधर इस दुरावस्था में घर पहुँचे और बूढे पिताजी ने समाचार सुना तो सिर पीट लिया। बोले- 'जी चाहता है कि तुम्हारा और अपना सिर फोड लूँ। बहुत देर तक पछता-पछताकर हाथ मलते रहे। क्रोध में कुछ कठोर बातें भी कहीं और यदि वंशीधर वहाँ से टल न जाता तो अवश्य ही यह क्रोध विकट रूप धारण करता। वृध्द माता को भी दु:ख हुआ। जगन्नाथ और रामेश्वर यात्रा की कामनाएँ मिट्टी में मिल गईं। पत्नी ने कई दिनों तक सीधे मुँह बात तक नहीं की। इसी प्रकार एक सप्ताह बीत गया। सांध्य का समय था। बूढे मुंशीजी बैठे-बैठे राम नाम की माला जप रहे थे। इसी समय उनके द्वार पर सजा हुआ रथ आकर रुका। हरे और गुलाबी परदे, पछहिए बैलों की जोडी, उनकी गर्दन में नीले धागे, सींग पीतल से जडे हुए। कई नौकर लाठियाँ कंधों पर रखे साथ थे। मुंशीजी अगवानी को दौडे देखा तो पंडित अलोपीदीन हैं। झुककर दंडवत् की और लल्लो-चप्पो की बातें करने लगे- 'हमारा भाग्य उदय हुआ, जो आपके चरण इस द्वार पर आए। आप हमारे पूज्य देवता हैं, आपको कौन सा मुँह दिखावें, मुँह में तो कालिख लगी हुई है। किंतु क्या करें, लडका अभागा कपूत है, नहीं तो आपसे क्या मुँह छिपाना पडता? ईश्वर निस्संतान चाहे रक्खे पर ऐसी संतान न दे। अलोपीदीन ने कहा- 'नहीं भाई साहब, ऐसा न कहिए। मुंशीजी ने चकित होकर कहा- 'ऐसी संतान को और क्या कँ? अलोपीदीन ने वात्सल्यपूर्ण स्वर में कहा- 'कुलतिलक और पुरुखों की कीर्ति उज्ज्वल करने वाले संसार में ऐसे कितने धर्मपरायण मनुष्य हैं जो धर्म पर अपना सब कुछ अर्पण कर सकें! पं. अलोपीदीन ने वंशीधर से कहा- 'दरोगाजी, इसे खुशामद न समझिए, खुशामद करने के लिए मुझे इतना कष्ट उठाने की जरूरत न थी। उस रात को आपने अपने अधिकार-बल से अपनी हिरासत में लिया था, किंतु आज मैं स्वेच्छा से आपकी हिरासत में आया हूँ। मैंने हजारों रईस और अमीर देखे, हजारों उच्च पदाधिकारियों से काम पडा किंतु परास्त किया तो आपने। मैंने सबको अपना और अपने धन का गुलाम बनाकर छोड दिया। मुझे आज्ञा दीजिए कि आपसे कुछ विनय करूँ। वंशीधर ने अलोपीदीन को आते देखा तो उठकर सत्कार किया, किंतु स्वाभिमान सहित। समझ गए कि यह महाशय मुझे लज्जित करने और जलाने आए हैं। क्षमा-प्रार्थना की चेष्टा नहीं की, वरन् उन्हें अपने पिता की यह ठकुरसुहाती की बात असह्य सी प्रतीत हुई। पर पंडितजी की बातें सुनी तो मन की मैल मिट गई। पंडितजी की ओर उडती हुई दृष्टि से देखा। सद्भाव झलक रहा था। गर्व ने अब लज्जा के सामने सिर झुका दिया। शर्माते हुए बोले- 'यह आपकी उदारता है जो ऐसा कहते हैं। मुझसे जो कुछ अविनय हुई है, उसे क्षमा कीजिए। मैं धर्म की बेडी में जकडा हुआ था, नहीं तो वैसे मैं आपका दास हूँ। जो आज्ञा होगी वह मेरे सिर-माथे पर। अलोपीदीन ने विनीत भाव से कहा- 'नदी तट पर आपने मेरी प्रार्थना नहीं स्वीकार की थी, किंतु आज स्वीकार करनी पडेगी। वंशीधर बोले- 'मैं किस योग्य हूँ, किंतु जो कुछ सेवा मुझसे हो सकती है, उसमें त्रुटि न होगी। अलोपीदीन ने एक स्टाम्प लगा हुआ पत्र निकाला और उसे वंशीधर के सामने रखकर बोले- 'इस पद को स्वीकार कीजिए और अपने हस्ताक्षर कर दीजिए। मैं ब्राह्मण हूँ, जब तक यह सवाल पूरा न कीजिएगा, द्वार से न हटूँगा। मुंशी वंशीधर ने उस कागज को पढा तो कृतज्ञता से ऑंखों में ऑंसू भर आए। पं. अलोपीदीन ने उनको अपनी सारी जायदाद का स्थायी मैनेजर नियत किया था। छह हजार वाषक वेतन के अतिरिक्त रोजाना खर्च अलग, सवारी के लिए घोडा, रहने को बँगला, नौकर-चाकर मुफ्त। कम्पित स्वर में बोले- 'पंडितजी मुझमें इतनी सामर्थ्य नहीं है कि आपकी उदारता की प्रशंसा कर सकूँ! किंतु ऐसे उच्च पद के योग्य नहीं हूँ। अलोपीदीन हँसकर बोले- 'मुझे इस समय एक अयोग्य मनुष्य की ही जरूरत है। वंशीधर ने गंभीर भाव से कहा- 'यों मैं आपका दास हूँ। आप जैसे कीर्तिवान, सज्जन पुरुष की सेवा करना मेरे लिए सौभाग्य की बात है। किंतु मुझमें न विद्या है, न बुध्दि, न वह स्वभाव जो इन त्रुटियों की पूर्ति कर देता है। ऐसे महान कार्य के लिए एक बडे मर्मज्ञ अनुभवी मनुष्य की जरूरत है। अलोपीदीन ने कलमदान से कलम निकाली और उसे वंशीधर के हाथ में देकर बोले- 'न मुझे विद्वत्ता की चाह है, न अनुभव की, न मर्मज्ञता की, न कार्यकुशलता की। इन गुणों के महत्व को खूब पा चुका हूँ। अब सौभाग्य और सुअवसर ने मुझे वह मोती दे दिया जिसके सामने योग्यता और विद्वत्ता की चमक फीकी पड जाती है। यह कलम लीजिए, अधिक सोच-विचार न कीजिए, दस्तखत कर दीजिए। परमात्मा से यही प्रार्थना है कि वह आपको सदैव वही नदी के किनारे वाला, बेमुरौवत, उद्दंड, कठोर परंतु धर्मनिष्ठ दारोगा बनाए रखे। वंशीधर की ऑंखें डबडबा आईं। हृदय के संकुचित पात्र में इतना एहसान न समा सका। एक बार फिर पंडितजी की ओर भक्ति और श्रध्दा की दृष्टि से देखा और काँपते हुए हाथ से मैनेजरी के कागज पर हस्ताक्षर कर दिए। अलोपीदीन ने प्रफुल्लित होकर उन्हें गले लगा लिया। ********

  • खुशी का रिमोट

    आधुनिक जीवन की स्पर्धा में हम भागते जा रहे हैं। इस भाग दौड़ में हम अपने उद्देश्य को भूल गए। हमारे जीवन का उद्देश्य ख़ुशी है। कहते हैं, ख़ुशी से बड़ी खुराक नहीं चिंता जैसा मर्ज नहीं। जीवन में प्रगति करना आवश्यक है, जिसके लिए हमें कड़ी मेहनत करनी पड़ती है। लेकिन जीवन में दो बातें हमें ख़ुशी से दूर ले जाती हैं। एक इच्छा दूसरी ईर्ष्या। इच्छाओं का अंत नहीं है। एक के बाद एक पैदा होती रहती हैं। हम उनको पूरा करने में ही सारा जीवन बिता देते हैं और ख़ुशी का वास्तविक आनंद नहीं उठा पाते। ये इच्छाएं भौतिक वस्तुओं की ओर आकर्षित करती हैं। जो कि हमारे आराम के साधन हैं। भौतिक साधनों से आराम तो मिल सकता है परन्तु ख़ुशी नहीं होती। हम अपने आप को प्रसन्नचित अनुभव नहीं कर सकते। कहते हैं "इच्छा मात्रम अविद्या"। कभी सोचते गाड़ी ले लूँ, तब ख़ुशी मिले खूब धन एकत्र कर लूँ तब मिले, अच्छा घर हो तब मिले, नौकरी में प्रमोशन हो या बिज़नेस अच्छा चले तब ख़ुशी मिले। लेकिन यह सब इच्छाएं हैं जो एक पूरी होने के बाद दूसरी जन्म लेती हैं और पूरी न होने पर दुःख व अशांति पैदा करती हैं। अब इससे अधिक महत्त्वपूर्ण है ईर्ष्या। आज हम अपने से ज्यादा दूसरों को देखते हैं। हमारी खुशियां भी दूसरों पर निर्भर हैं। कुछ सामान्य उदहारण - मानो आप कोई महत्त्वपूर्ण कार्य कर रहे हैं और अचानक आपके घर क़ी बिजली चली जाती है, तो आप परेशान हो जाते दुःखी हो जाते। आप सबसे पहले देखते हैं, बगल वाले घर की गयी कि नहीं। अगर उनके घर क़ी भी गयी तो आप संतुष्ट हो गए। आपका दुःख दूर हो गया शिकायत भी नहीं करेंगे। इसी प्रकार आप नयी गाड़ी खरीद कर लाये, अच्छी गाड़ी, ऊँचा मॉडल आप खुश हैं। एक दो दिन बाद आप उसी गाड़ी से घूम रहे हैं और पास से उसी कंपनी के ऊँचे मॉडल क़ी गाड़ी आपके पास से निकल गई। अब आप क़ी ख़ुशी गयी, सोचने लगे मैं ये वाली ले लेता। इसी प्रकार आप जानते हैं कि आपका बेटा पढ़ाई में कमजोर है, फिर भी परीक्षा के बाद रिजल्ट लेकर वो आप के पास आता है और अपने परीक्षा के अंक बताता है, उसके अंक आपके अपेक्षा से कहीं अधिक होते हैं तो आप बहुत खुश होते हैं। कुछ देर बाद आप और बच्चों के अंको के बारे में अथवा उच्चतम अंक पूछते हैं तो वो आपके बच्चे के अंक से बहुत ज्यादा होते अब आपकी ख़ुशी गायब। विचार करें आपकी ख़ुशी किसमे थी। आपके बच्चे के अच्छे अंको में या दूसरों के बच्चों के कम अंको में। इसी प्रकार यदि आपका बेटा पढाई में बहुत तेज है आप जानते है वो बहुत अच्छे अंको से पास होगा या टॉप करेगा परन्तु परिणाम आने पर उसके अंक अच्छे नहीं होते तो आप दुःखी हो जाते हैं। फिर आप और बच्चों के अंक पूछते हैं जिस पर वो अपने अंक ही उच्चतम बताता है तो आप फिर बहुत खुश हो जाते हैं। यह उदाहरण इस बात को सत्यार्थ करता है कि आपको अपने बच्चे की पढाई या अंको से ख़ुश या दुःखी नहीं हैं, वरन दूसरों के बच्चों की तुलना में आपकी ख़ुशी निर्भर करती है। इस प्रकार परचिन्तन भी आपके अन्दर नाकारात्मक ऊर्जा पैदा करता है। अपने से ज्यादा औरों पर ध्यान देते हुए अंदर-अंदर दुखी होना यह ईर्ष्या है। अगर पड़ोस में सम्पन्नता आये तो आप तुरंत कहेंगे कहीं से दो नंबर का पैसा आ गया होगा। अगर दूसरे के बच्चे ने प्रतियोगी परीक्षा उत्तीर्ण कर अच्छी नौकरी प्राप्त कर ली तो आप कहेंगे जुगाड़ लग गया या पैसा खिलाया होगा। यही नकारात्मकता आपको दुखी करती है। प्रत्येक व्यक्ति हर कार्य एवं निर्णय सोच समझ कर लेता है और अपने अनुसार सर्वश्रेष्ठ निर्णय ही लेता है। परन्तु जब वह निर्णय हमारे विचारों के अनुकूल नहीं होता तो हम बिना सोचे समझे उसे गलत सिद्ध करने का प्रयास प्रारंभ कर देते हैं। किसी भी बात, मामले या प्रकरण पर लिए गए निर्णय से ज्यादा महत्पूर्ण है कि वो निर्णय किस समय और किन परिस्थितियों में लिया गया। सर्वदा दूसरों की उपलब्धियों पर नकारात्मक विचार रखना बुद्धिमानी नहीं होती। परचिन्तन हमारी ख़ुशी में बहुत घातक होता है। हम सदैव दूसरे में बुराई देखते हैं। हर व्यक्ति में अच्छाई बुराई दोनों होती हैं, निर्भर इस पर करता हैं कि हम उसकी अच्छाइयों को देखते हैं या बुराइयों को। अगर अच्छाइयां देखेंगे तो अच्छाई दिखेगी बुराई देखेंगे तो सदैव बुराई दिखेगी। इसी प्रकार बुराई देखते-देखते हमारी आदत ही सब में बुराई देखने की हो जाएगी फिर वही बुराई देखना हमारे संस्कार बन जायेंगे। तब ख़ुशी कैसे हासिल होगी। हम जब दूसरों को देखते हैं,उनकी गतिविधियों,कार्यों इत्यादि पर विचार करते तो एकदम न्यायधीश के तरह तुरंत निर्णय दे देते हैं। वो गलत हैं। वहीं जब हमको कोई हमारी कमियां दिखता हैं तो हम वकील बन उस पर जिरह करने लगते हैं। तो हमारी जीवन की खुशियां दूसरों के प्रति ईर्ष्या व व्यर्थ चिंतन में व्यतीत होने लगती है। वास्तव में आज हमने अपनी ख़ुशी का रिमोट दूसरों के हाथों में दे रखा हैं। जब रिमोट ही दूसरे के पास हैं तो उसके ही संचालित करने पर हम खुश और दुखी होंगे। यदि हम अपनी इन नकारात्मक सोच को बदलना चाहते हैं। तो हमें प्रत्येक व्यक्ति के कार्यों को सकारात्मक दृष्टिकोण से देखना चाहिए। हमारी सकारात्मक सोच हमें सदैव संतुष्ट और प्रसन्नचित रहने में हमारी मदद करेगी। तब हमारी ख़ुशी का रिमोट हमारे हांथों में होगा न कि दूसरों के हांथों में। ********

  • दो बैलों की कथा

    जानवरों में गधा सबसे ज्यादा बुध्दिहीन समझा जाता है। हम जब किसी आदमी को पल्ले दर्जे का बेवकूफ कहना चाहते हैं, तो उसे गधा कहते हैं। गधा सचमुच बेवकूफ है, या उसके सीधेपन, उसकी निरापद सहिष्णुता ने उसे यह पदवी दे दी है, इसका निश्चय नहीं किया जा सकता। गायें सींग मारती हैं, ब्यायी हुई गाय तो अनायास ही सिंहनी का रूप धारण कर लेती है। कुत्ता भी बहुत गरीब जानवर है, लेकिन कभी-कभी उसे भी क्रोध आ ही जाता है। किन्तु गधे को कभी क्रोध करते नहीं सुना, न देखा। जितना चाहे गरीब को मारो, चाहे जैसी खराब, सडी हुई घास सामने डाल दो, उसके चेहरे पर कभी असंतोष की छाया भी न दिखाई देगी। वैशाख में चाहे एकाध बार कुलेल कर लेता हो, पर हमने तो उसे कभी खुश होते नहीं देखा। उसके चेहरे पर एक स्थायी विषाद स्थायी रूप से छाया रहता है। सुख-दु:ख, हानि-लाभ, किसी भी दशा में उसे बदलते नहीं देखा। ॠषियों-मुनियों के जितने गुण हैं, वे सभी उसमें पराकाष्ठा को पहुँच गए हैं, पर आदमी उसे बेवकूफ कहता है। सद्गुणों का इतना अनादर कहीं न देखा। कादचित सीधापन संसार के लिए उपयुक्त नहीं है। देखिए न, भारतवासियों की अफ्रीका में क्यों दुर्दशा हो रही है? क्यों अमेरिका में उन्हें घुसने नहीं दिया जाता? बेचारे शराब नहीं पीते, चार पैसे कुसमय के लिए बचाकर रखते हैं, जी तोडकर काम करते हैं, किसी से लडाई-झगडा नहीं करते, चार बातें सुनकर गम खा जाते हैं, फिर भी बदनाम हैं। कहा जाता है, वे जीवन के आदर्श को नीचा करते हैं। अगर वे भी ईंट का जवाब पत्थर से देना सीख जाते, तो शायद सभ्य कहलाने लगते। जापान की मिसाल समाने है। एक ही विजय ने उसे संसार की सभ्य जातियों में गण्य बना दिया। लेकिन गधे का एक छोटा भाई और भी है, जो उससे कम ही गधा है, और वह है 'बैल। जिस अर्थ में हम गधा का प्रयोग करते हैं, कुछ उसी से मिलते-जुलते अर्थ में 'बछिया के ताऊ का भी प्रयोग करते हैं। कुछ लोग बैल को शायद बेवकूफों में सर्वश्रेष्ठ कहेंगे, मगर हमारा विचार ऐसा नहीं है। बैल कभी-कभी मारता भी है, कभी-कभी अडियल बैल भी देखने में आता है। और भी कई रीतियों से अपना असंतोष प्रकट कर देता है, अतएव उसका स्थान गधे से नीचा है। झूरी काछी के दोनों बैलों के नाम थे हीरा और मोती। दोनों पछाई जाति के थे- देखने में सुन्दर, काम में चौकस, डील में ऊँचे। बहुत दिनों से साथ रहते-रहते दोनों में भाईचारा हो गया था। दोनों आमने-सामने या आसपास बैठे हुए एक-दूसरे से मूक भाषा में विचार-विनिमय करते थे। एक दूसरे के मन की बात कैसे समझ जाता था, हम नहीं कह सकते। अवश्य ही उनमें कोई ऐसी गुप्त शक्ति थी, जिससे जीवों में श्रेष्ठता का दावा करने वाला मनुष्य वंचित है। दोनों एक-दूसरे को चाटकर और सूँघकर अपना प्रेम प्रकट करते, कभी-कभी दोनों सींग भी मिला लिया करते थे- विग्रह के नाते से नहीं, केवल विनोद के भाव से, आत्मीयता के भाव से, जैसे दोस्तों में घनिष्ठता होते ही धौल-धप्पा होने लगता है। इसके बिना दोस्ती कुछ फुसफुसी, कुछ हल्की-सी रहती है, जिस पर ज्यादा विश्वास नहीं किया जा सकता। जिस वक्त ये दोनों बैल हल या गाडी में जोत दिए जाते और गर्दन हिला-हिलाकर चलते उस वक्त हर एक की यही चेष्टा होती थी कि ज्याद-से-ज्यादा बोझ मेरी ही गर्दन पर रहे। दिनभर के बाद दोपहर या संध्या को दोनों खुलते, तो एक-दूसरे को चाट-चूटकर अपनी थकान मिटा लेते। नाँद में खली-भूसा पड जाने के बाद दोनों साथ उठते, साथ नाँद में मुँह डालते और साथ ही बैठते थे। एक मुँह हटा लेता तो दूसरा भी हटा लेता था। संयोग की बात है, झूरी ने एक बार गोईं को ससुराल भेज दिया। बैलों को क्या मालूम वे क्यों भेजे जा रहे हैं। समझे, मालिक ने हमे बेच दिया। अपना यों बेचा जाना उन्हें अच्छा लगा या बुरा, कौन जाने पर झूरी के साले गया को घर तक गोईं ले जाने में दाँतों पसीना आ गया। पीछे से हाँकता तो दोनों दाएँ-बाएँ भागते, पगहिया पकडकर आगे से खींचता तो दोनों पीछे को जोर लगाते। मारता तो दोनों सींग नीचे करके हुँकरते। अगर ईश्वर ने उन्हें वाणी दी होती, तो झूरी से पूछते- तुम हम गरीबों को क्यों निकाल रहे हो? हमने तो तुम्हारी सेवा करने में कोई कसर नहीं उठा रखी। अगर इतनी मेहनत से काम न चलता था, और काम ले लेते, हमें तो तुम्हारी चाकरी में मर जाना कबूल था। हमने कभी दाने-चारे की शिकायत नहीं की। तुमने जो कुछ खिलाया वह सिर झुकाकर खा लिया, फिर तुमने हमें इस जालिम के हाथों क्यों बेच दिया? संध्या समय दोनों बैल अपने नए स्थान पर पहुँचे। दिनभर के भूखे थे, लेकिन जब नाँद में लगाए गए, तो एक ने भी उसमें मुँह न डाला। दिल भारी हो रहा था। जिसे उन्होंने अपना घर समझ रखा था, वह आज उनसे छूट गया था। यह नया घर, नया गाँव, नए आदमी, उन्हें बेगानों से लगते थे। दोनों ने अपनी मूक भाषा में सलाह की, एक-दूसरे को कनखियों से देखा और लेट गए। जब गाँव में सोता पड गया, तो दोनों ने जोर मारकर पगहे तुडा डाले और घर की तरफ चले। पगहे बहुत मजबूत थे। अनुमान न हो सकता था कि कोई बैल उन्हें तोड सकेगा: पर इन दोनों में इस समय दूनी शक्ति आ गई थी। एक-एक झटके में रस्सियाँ टूट गईं। झूरी प्रात: सोकर उठा, तो देखा कि दोनों बैल चरनी पर खडे हैं। दोनों ही गर्दनों में आधा-आधा गराँव लटक रहा है। घुटने तक पाँव कीचड से भरे हैं और दोनों की ऑंखों में विद्रोहमय स्नेह झलक रहा है। झूरी बैलों को देखकर स्नेह से गद्गद् हो गया। दौडकर उन्हें गले लगा लिया। प्रेमालिंगन और चुम्बन का वह दृश्य बडा ही मनोहर था। घर और गाँव के लडके जमा हो गए और तालियाँ बजा-बजाकर उनका स्वागत करने लगे। गाँव के इतिहास में यह घटना अभूतपूर्व न होने पर भी महत्वपूर्ण थी। बाल-सभा ने निश्चय किया, दोनों पशु-वीरों को अभिनंदन-पत्र देना चाहिए। कोई अपने घर से रोटियाँ लाया, कोई गुड, कोई चोकर, कोई भूसी। एक बालक ने कहा- ऐसे बैल किसी के पास न होंगे। दूसरे ने समर्थन किया- इतनी दूर से दोनों अकेले चले आए। तीसरा बोला- बैल नहीं हैं वे, उस जनम के आदमी हैं। इसका प्रतिवाद करने का किसी को साहस न हुआ। झूरी की स्त्री ने बैलों को द्वार पर देखा, तो जल उठी। बोली- कैसे नमक-हराम बैल हैं कि एक दिन वहाँ काम न किया, भाग खडे हुए। झूरी अपने बैलों पर यह आक्षेप न सुन सका- नमकहराम क्यों हैं? चारा-दाना न दिया होगा, तो क्या करते? स्त्री ने रोब के साथ कहा- बस, तुम्हीं तो बैलों को खिलाना जानते हो, और तो सभी पानी पिला-पिलाकर रखते हैं। झूरी ने चिढाया- चारा मिलता तो क्यों भागते? स्त्री चिढी- भागे इसलिए कि वे लोग तुम जैसे बुध्दुओं की तरह बैलों को सहलाते नहीं। खिलाते हैं, तो रगडकर जोतते भी हैं। ये दोनों ठहरे कामचोर, भाग निकले। अब देखूँ? कहाँ से खली और चोकर मिलता है, सूखे भूसे के सिवा कुछ न दूँगी, खाएँ चाहे मरें। वही हुआ। मजूर को बडी ताकीद कर दी गई कि बैलों को खाली सूखा भूसा दिया जाए। बैलों ने नाँद में मुँह डाला तो फीका-फीका। न कोई चिकनाहट, न कोई रस। क्या खाएँ? आशा भरी ऑंखों से द्वार की ओर ताकने लगे। झूरी ने मजूर से कहा- थोडी-सी खली क्यों नहीं डाल देता बे? 'मालिकन मुझे मार ही डालेंगी। 'चुराकर डाल आ। 'ना दादा, पीछे से तुम भी उन्हीं की-सी कहोगे। दूसरे दिन झूरी का साला फिर आया और बैलों को ले चला। अबकी उसने दोनों को गाडी में जोता। दो-चार बार मोती ने गाडी को सडक की खाई में गिराना चाहा, पर हीरा ने संभाल लिया। वह ज्यादा सहनशील था। संध्या समय घर पहुँचकर उसने दोनों को मोटी रस्सियों से बाँधा और कल की शरारत का मजा चखाया। फिर वही सूखा भूसा डाल दिया। अपने दोनों बैलों को खली, चूनी सब कुछ दी। दोनों बैलों का ऐसा अपमान कभी न हुआ था। झूरी इन्हें फूल की छडी से भी न छूता था। उसकी टिटकार पर दोनों उडने लगते थे। यहाँ मार पडी। आहत-सम्मान की व्यथा तो थी ही, उस पर मिला सूखा भूसा! नाँद की तरफ ऑंखें तक न उठाईं। दूसरे दिन गया ने बैलों को हल में जोता, पर इन दोनों ने जैसे पाँव न उठाने की कसम खा ली थी। वह मारते-मारते थक गया, पर दोनों ने पाँव न उठाया। एक बार जब उस निर्दयी ने हीरा की नाक पर खूब डण्डे जमाए, तो मोती का गुस्सा काबू के बाहर हो गया। हल लेकर भागा। हल, रस्सी, जुआ, जोत, सब टूट-टाट कर बराबर हो गया। गले में बडी-बडी रस्सियाँ न होती तो दोनों पकडाई में न आते। हीरा ने मूक भाषा में कहा- भागना व्यर्थ है। मोती ने उत्तर दिया- तुम्हारी तो इसने जान ही ले ली थी। 'अबकी बडी मार पडेगी। 'पडने दो, बैल का जन्म लिया है तो मार से कहाँ तक बचेंगे। 'गया दो आदमियों के साथ दौडा आ रहा है। दोनों के हाथों में लाठियाँ हैं। मोती बोला- कहो तो दिखा दूँ कुछ मजा मैं भी। लाठी लेकर आ रहा है। हीरा ने समझाया- नहीं भाई! खडे हो जाओ। 'मुझे मारेगा, तो मैं भी एक-दो को गिरा दूँगा। 'नहीं। हमारी जाति का यह धर्म नहीं है। मोती दिल में ऐंठकर रह गया। गया आ पहुँचा और दोनों को पकडकर ले चला। कुशल हुई कि उसने इस वक्त मारपीट न की, नहीं तो मोती भी पलट पडता। उसके तेवर देखकर गया और उसके सहायक समझ गए कि इस वक्त टाल जाना ही मसलहत है। आज दोनों के सामने फिर वही सूखा भूसा लाया गया। दोनों चुपचाप खडे रहे। घर के लोग भोजन करने लगे। उस वक्त छोटी-सी लडकी दो रोटियाँ लिए निकली, और दोनों के मुँह में देकर चली गई। उस एक रोटी से इनकी भूख तो क्या शांत होती, पर दोनों के हृदय को मानो भोजन मिल गया। यहाँ भी किसी सज्जन का बास है। लडकी भैरो की थी। उसकी माँ मर चुकी थी। सौतेली माँ मारती रहती थी, इसलिए इन बैलों से उसे एक प्रकार की आत्मीयता हो गई थी। दोनों दिनभर जोते जाते, डण्डे खाते, अडते। शाम को थान पर बाँध दिए जाते और रात को वही बालिका उन्हें दो रोटियाँ खिला जाती। प्रेम के इस प्रसाद की यह बरकत थी कि दो-दो गाल सूखा भूसा खाकर भी दोनों दुर्बल न होते थे, मगर दोनों की ऑंखों में, रोम-रोम में विद्रोह भरा हुआ था। एक दिन मोती ने मूक भाषा में कहा- अब तो नहीं सहा जाता हीरा! 'क्या करना चाहते हो? 'एकाध को सीगों पर उठाकर फेंक दूँगा। 'लेकिन जानते हो, वह प्यारी लडकी, जो हमें रोटियाँ खिलाती है, उसी की लडकी है, जो इस घर का मालिक है। यह बेचारी अनाथ न हो जाएगी? 'तो मालकिन को न फेंक दूँ। वही तो उस लडकी को मारती है। 'लेकिन औरत जात पर सींग चलाना मना है, यह भूले जाते हो। 'तुम तो किसी तरह निकलने ही नहीं देते। बताओ, तुडाकर भाग चलें। 'हाँ, यह मैं स्वीकार करता, लेकिन इतनी मोटी रस्सी टूटेगी कैसे? 'इसका उपाय है। पहले रस्सी को थोडा-सा चबा लो। फिर एक झटके में जाती है। रात को जब बालिका रोटियाँ खिलाकर चली गई, दोनों रस्सियाँ चबाने लगे, पर मोटी रस्सी मुँह में न आती थी। बेचारे बार-बार जोर लगाकर रह जाते थे। सहसा घर का द्वार खुला और वही बालिका निकली। दोनों सिर झुकाकर उसका हाथ चाटने लगे। दोनों की पूँछें खडी हो गईं। उसने उनके माथे सहलाए और बोली- खोले देती हूँ। चुपके से भाग जाओ, नहीं तो यहाँ लोग मार डालेंगे। आज घर में सलाह हो रही है कि इनकी नाकों में नाथ डाल दी जाएँ। उसने गराँव खोल दिया, पर दोनों चुपचाप खडे रहे। मोती ने अपनी भाषा में पूछा- अब चलते क्यों नहीं? हीरा ने कहा- चलें तो लेकिन कल इस अनाथ पर आफत आएगी। सब इसी पर संदेह करेंगे। सहसा बालिका चिल्लाई- दोनों फूफा वाले बैल भागे जा रहे हैं। ओ दादा! दोनों बैल भागे जा रहे हैं, जल्दी दौडो। गया हडबडाकर भीतर से निकला और बैलों को पकडने चला। वे दोनों भागे। गया ने पीछा किया। और भी तेज हुए। गया ने शोर मचाया। फिर गाँव के कुछ आदमियों को भी साथ लेने के लिए लौटा। दोनों मित्रों को भागने का मौका मिल गया। सीधे दौडते चले गए। यहाँ तक कि मार्ग का ज्ञान न रहा। जिस परिचित मार्ग से आए थे, उसका यहाँ पता न था। नए-नए गाँव मिलने लगे। तब दोनों एक खेत के किनारे खडे होकर सोचने लगे, अब क्या करना चाहिए? हीरा ने कहा- मालूम होता है, राह भूल गए। 'तुम भी बेतहाशा भागे। वहीं उसे मार गिराना था। 'उसे मार गिराते, तो दुनिया क्या कहती? वह अपना धर्म छोड दे, लेकिन हम अपना धर्म क्यों छोडें? ********

bottom of page