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- उपन्यास सम्राट प्रेमचंद
धनपत राय श्रीवास्तव, जो प्रेमचंद नाम से जाने जाते हैं, का जन्म ३१ जुलाई १८८० को वाराणसी जिले (उत्तर प्रदेश) के लमही गाँव में हुआ था। वो हिन्दी और उर्दू के सर्वाधिक लोकप्रिय उपन्यासकार, कहानीकार एवं विचारक थे। उनकी माता का नाम आनन्दी देवी तथा पिता का नाम मुंशी अजायबराय था जो लमही में डाकमुंशी थे। प्रेमचंद की आरंभिक शिक्षा फ़ारसी में हुई। सात वर्ष की अवस्था में उनकी माता तथा चौदह वर्ष की अवस्था में उनके पिता का देहान्त हो गया जिसके कारण उनका प्रारंभिक जीवन संघर्षमय रहा। प्रेमचंद के जीवन का साहित्य से क्या संबंध है इस बात की पुष्टि रामविलास शर्मा के इस कथन से होती है कि- "सौतेली माँ का व्यवहार, बचपन में शादी, पण्डे-पुरोहित का कर्मकाण्ड, किसानों और क्लर्कों का दुखी जीवन-यह सब प्रेमचंद ने सोलह साल की उम्र में ही देख लिया था। इसीलिए उनके ये अनुभव एक जबर्दस्त सचाई लिए हुए उनके कथा-साहित्य में झलक उठे थे।" उनकी बचपन से ही पढ़ने में बहुत रुचि थी। 13 वर्ष की उम्र में ही उन्होंने तिलिस्म-ए-होशरुबा पढ़ लिया और उन्होंने उर्दू के मशहूर रचनाकार रतननाथ 'शरसार', मिर्ज़ा हादी रुस्वा और मौलाना शरर के उपन्यासों से परिचय प्राप्त कर लिया। उनकी बचपन से ही पढ़ने में बहुत रुचि थी। १३ साल की उम्र में ही उन्होंने तिलिस्म-ए-होशरुबा पढ़ लिया और उन्होंने उर्दू के मशहूर रचनाकार रतननाथ 'शरसार', मिर्ज़ा हादी रुस्वा और मौलाना शरर के उपन्यासों से परिचय प्राप्त कर लिया। उनका पहला विवाह पंद्रह साल की उम्र में हुआ। १९०६ में उनका दूसरा विवाह शिवरानी देवी से हुआ जो बाल-विधवा थीं। वे सुशिक्षित महिला थीं जिन्होंने कुछ कहानियाँ और प्रेमचंद घर में शीर्षक पुस्तक भी लिखी। उनकी तीन संताने हुईं-श्रीपत राय, अमृत राय और कमला देवी श्रीवास्तव। १८९८ में मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद वे एक स्थानीय विद्यालय में शिक्षक नियुक्त हो गए। नौकरी के साथ ही उन्होंने पढ़ाई जारी रखी। १९१० में उन्होंने अंग्रेजी, दर्शन, फारसी और इतिहास विषयसहित इंटर पास किया। १९१९ में बी.ए.[2] पास करने के बाद वे शिक्षा विभाग के इंस्पेक्टर पद पर नियुक्त हुए। १९२१ ई. में असहयोग आंदोलन के दौरान महात्मा गाँधी के सरकारी नौकरी छोड़ने के आह्वान पर स्कूल इंस्पेक्टर पद से त्यागपत्र दे दिया। इसके बाद उन्होंने लेखन को अपना व्यवसाय बना लिया। मर्यादा, माधुरी आदि पत्रिकाओं में वे संपादक पद पर कार्यरत रहे। इसी दौरान उन्होंने प्रवासीलाल केसाथ मिलकर सरस्वती प्रेस भी खरीदा तथा हंस और जागरण निकाला। प्रेस उनके लिए व्यावसायिक रूप से लाभप्रद सिद्ध नहीं हुआ। १९३३ ई. में अपने ऋण को पटाने के लिए उन्होंने मोहनलाल भवनानी के सिनेटोन कंपनी में कहानी लेखक के रूप में काम करने का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। फिल्म नगरी प्रेमचंद को रास नहीं आई। वे एक वर्ष का अनुबंध भी पूरा नहीं कर सके और दो महीने का वेतन छोड़कर बनारस लौट आए। उनका स्वास्थ्य निरंतर बिगड़ता गया। लम्बी बीमारी के बाद ८ अक्टूबर १९३६ को उनका निधन हो गया। साहित्यिकजीवन प्रेमचंद के साहित्यिक जीवन का आरंभ १९०१ से हो चुका था | आरंभ में वे नवाब राय के नाम से उर्दू में लिखते थे। प्रेमचंद के लेख पहली रचना के अनुसार उनकी पहली रचना अपने मामा पर लिखा व्यंग्य थी, जो अब अनुपलब्ध है। शायद उनका वह नाटक था जो उन्होंने अपने मामा जी के प्रेम और उस प्रेम के फलस्वरूप चमारों द्वारा उनकी पिटाई पर लिखा था। इसका जिक्र उन्होंने ‘पहली रचना’नाम के अपने लेख में किया है।" उनका पहला उपलब्ध लेखन उर्दू उपन्यास 'असरारे मआबिद' है जो धारावाहिक रूप में प्रकाशित हुआ। इसका हिंदी रूपांतरण देवस्थान रहस्य नाम से हुआ। प्रेमचंद का दूसरा उपन्यास 'हमखुर्मा व हमसवाब' है जिसका हिंदी रूपांतरण 'प्रेमा' नाम से १९०७ में प्रकाशित हुआ। १९०८ ई. में उनका पहला कहानी संग्रह सोज़े-वतन प्रकाशित हुआ। देशभक्ति की भावना से ओतप्रोत इस संग्रह को अंग्रेज़ सरकार ने प्रतिबंधित कर दिया और इसकी सभी प्रतियाँ जब्त कर लीं और इसके लेखक नवाब राय को भविष्य में लेखन न करने की चेतावनी दी। इसके कारण उन्हें नाम बदलकर लिखना पड़ा। 'प्रेमचंद' नाम से उनकी पहली कहानी बड़े घर की बेटी ज़माना पत्रिका के दिसम्बर १९१० के अंक में प्रकाशित हुई। १९१५ ई. में उस समय की प्रसिद्ध हिंदी मासिक पत्रिका सरस्वती के दिसम्बर अंक में पहली बार उनकी कहानी सौत नाम से प्रकाशित हुई। १९१८ ई. में उनका पहला हिंदी उपन्यास सेवासदन प्रकाशित हुआ। इसकी अत्यधिक लोकप्रियता ने प्रेमचंद को उर्दू से हिंदी का कथाकार बना दिया। हालाँकि उनकी लगभग सभी रचनाएँ हिंदी और उर्दू दोनों भाषाओं में प्रकाशित होती रहीं। उन्होंने लगभग ३०० कहानियाँ तथा डेढ़ दर्जन उपन्यास लिखे। १९२१ में असहयोग आंदोलन के दौरान सरकारी नौकरी से त्यागपत्र देने के बाद वे पूरी तरह साहित्य सृजन में लग गए। उन्होंने कुछ महीने मर्यादा नामक पत्रिका का संपादन किया। इसके बाद उन्होंने लगभग छह वर्षों तक हिंदी पत्रिका माधुरी का संपादन किया। उन्होंने १९३० में बनारस से अपना मासिक पत्र हंस का प्रकाशन शुरू किया। १९३२ ई. में उन्होंने हिंदी साप्ताहिक पत्र जागरण का प्रकाशन आरंभ किया। उन्होंने लखनऊ में १९३६ में अखिल भारतीय प्रगतिशील लेखक संघ के सम्मेलन की अध्यक्षता की। उन्होंने मोहन दयाराम भवनानी की अजंता सिनेटोन कंपनी में कथा-लेखक की नौकरी भी की। १९३४ में प्रदर्शित फिल्म मजदूर की कहानी उन्होंने ही लिखी थी। मरणोपरांत उनकी कहानियाँ "मानसरोवर" नाम से ८ खंडों में प्रकाशित हुईं। प्रेमचंद साहित्य की वैचारिक यात्रा आदर्श से यथार्थ की ओर उन्मुख है। सेवासदन के दौर में वे यथार्थवादी समस्याओं को चित्रित तो कर रहे थे लेकिन उसका एक आदर्श समाधान भी निकाल रहे थे। १९३६ तक आते-आते महाजनी सभ्यता, गोदान और कफ़न जैसी रचनाएँ अधिक यथार्थपरक हो गईं, किंतु उसमें समाधान नहीं सुझाया गया। अपनी विचारधारा को प्रेमचंद ने आदर्शोन्मुख यथार्थवादी कहा है। इसके साथ ही प्रेमचंद स्वाधीनता संग्राम के सबसे बड़े कथाकार हैं। इस अर्थ में उन्हें राष्ट्रवादी भी कहा जा सकता है। प्रेमचंद मानवतावादी भी थे और मार्क्सवादी भी। प्रगतिवादी विचारधारा उन्हें प्रेमाश्रम के दौर से ही आकर्षित कर रही थी। प्रेमचंद ने १९३६ में उन्होंने प्रगतिशील लेखक संघ के पहले सम्मेलन को सभापति के रूप में संबोधन किया था। उनका यही भाषण प्रगतिशील आंदोलन के घोषणा पत्र का आधार बना। इस अर्थ में प्रेमचंद निश्चित रूप से हिंदी के पहले प्रगतिशील लेखक कहे जा सकते हैं। रचनाएँ बहुमुखी प्रतिभासंपन्न प्रेमचंद ने उपन्यास, कहानी, नाटक, समीक्षा, लेख, सम्पादकीय, संस्मरण आदि अनेक विधाओं में साहित्य की सृष्टि की। उनकी ख्याति कथाकार के तौर पर हुई और अपने जीवन काल में ही वे ‘उपन्यास सम्राट’की उपाधि से सम्मानित हुए। उपन्यास · असरारेमआबिद- उर्दू साप्ताहिक आवाज-ए-खल्क़ में 8 अक्टूबर 1903 से 1 फरवरी 1905 तक धारावाहिक रूप में प्रकाशित हुआ। कालान्तर में यह हिन्दी में देवस्थान रहस्य नाम से प्रकाशित हुआ। · हमखुर्माव हमसवाब- इसका प्रकाशन 1907 ई. में हुआ। बाद में इसका हिन्दी रूपान्तरण 'प्रेमा' नाम से प्रकाशित हुआ। · किशना- इसके सन्दर्भ में अमृतराय लिखते हैं कि- "उसकी समालोचना अक्तूबर-नवम्बर 1907 के 'ज़माना' में निकली।" इसी आधार पर 'किशना' का प्रकाशन वर्ष 1907 ही कल्पित किया गया। · रूठीरानी- इसे सन् 1907 में अप्रैल से अगस्त महीने तक ज़माना में प्रकाशित किया गया। · जलवएईसार- यह सन् 1912 में प्रकाशित हुआ था। · सेवासदन- 1918 ई. में प्रकाशित सेवासदन प्रेमचंद का हिन्दी में प्रकाशित होने वाला पहला उपन्यास था। यह मूल रूप से उन्होंने 'बाजारे-हुस्न' नाम से पहले उर्दू में लिखा गया लेकिन इसका हिन्दी रूप 'सेवासदन' पहले प्रकाशित हुआ। यह स्त्री समस्या पर केन्द्रित उपन्यास है जिसमें दहेज-प्रथा, अनमेल विवाह, वेश्यावृत्ति, स्त्री-पराधीनता आदि समस्याओं के कारण और प्रभाव शामिल हैं। डॉ रामविलास शर्मा 'सेवासदन' की मुख्य समस्या भारतीय नारी की पराधीनता को मानते हैं। · प्रेमाश्रम (1922)- यहकिसान जीवन पर उनका पहला उपन्यास है। इसका मसौदा भी पहले उर्दू में 'गोशाए-आफियत' नाम से तैयार हुआ था लेकिन इसे पहले हिंदी में प्रकाशित कराया। यह अवध के किसान आन्दोलनों के दौर में लिखा गया। इसके सन्दर्भ में वीर भारत तलवार किसान राष्ट्रीय आन्दोलन और प्रेमचन्द:1918-22 पुस्तक में लिखते हैं कि- "1922 में प्रकाशित 'प्रेमाश्रम' हिंदी में किसानों के सवाल पर लिखा गया पहला उपन्यास है। इसमें सामंती व्यवस्था के साथ किसानों के अन्तर्विरोधों को केंद्र में रखकर उसकी परिधि के अन्दर पड़नेवाले हर सामाजिक तबके का-ज़मींदार, ताल्लुकेदार, उनके नौकर, पुलिस, सरकारी मुलाजिम, शहरी मध्यवर्ग-और उनकी सामाजिक भूमिका का सजीव चित्रण किया गया है।"[14] · रंगभूमि (1925)- इसमेंप्रेमचंदएक अंधे भिखारी सूरदास को कथा का नायक बनाकर हिंदी कथा साहित्य में क्रांतिकारी बदलाव का सूत्रपात करते हैं। · निर्मला (1925)- यहअनमेल विवाह की समस्याओं को रेखांकित करने वाला उपन्यास है। · कायाकल्प (1926) · अहंकार - इसका प्रकाशन कायाकल्प के साथ ही सन् 1926 ई. में हुआ था। अमृतराय के अनुसार यह "अनातोल फ्रांस के 'थायस' का भारतीय परिवेश में रूपांतर है।"[15] · प्रतिज्ञा (1927)- यहविधवा जीवन तथा उसकी समस्याओं को रेखांकित करने वाला उपन्यास है। · गबन (1928)- उपन्यासकी कथा रमानाथ तथा उसकी पत्नी जालपा के दाम्पत्य जीवन, रमानाथ द्वारा सरकारी दफ्तर में गबन, जालपा का उभरता व्यक्तित्व इत्यादि घटनाओं के इर्द-गिर्द घूमती है। · कर्मभूमि (1932)-यहअछूत समस्या, उनका मन्दिर में प्रवेश तथा लगान इत्यादि की समस्या को उजागर करने वाला उपन्यास है। · गोदान (1936)- यहउनका अन्तिम पूर्ण उपन्यास है जो किसान-जीवन पर लिखी अद्वितीय रचना है। इस पुस्तक का अंग्रेजी अनुवाद 'द गिफ्ट ऑफ़ काओ' नाम से प्रकाशित हुआ। · मंगलसूत्र (अपूर्ण)- यह प्रेमचंद का अधूरा उपन्यास है जिसे उनके पुत्र अमृतराय ने पूरा किया। इसके प्रकाशन के संदर्भ में अमृतराय प्रेमचंद की जीवनी में लिखते हैं कि इसका-"प्रकाशन लेखक के देहान्त के अनेक वर्ष बाद 1948 में हुआ।" कहानी इनकी अधिकतर कहानियोँ में निम्न व मध्यम वर्ग का चित्रण है। डॉ॰ कमलकिशोर गोयनका ने प्रेमचंद की संपूर्ण हिंदी-उर्दू कहानी को प्रेमचंद कहानी रचनावली नाम से प्रकाशित कराया है। उनके अनुसार प्रेमचंद ने अपने जीवन में लगभग 300 से अधिक कहानियाँ तथा 18 से अधिक उपन्यास लिखे है| इनकी इन्हीं क्षमताओं के कारण इन्हें कलम का जादूगर कहा जाता है| प्रेमचंद का पहला कहानी संग्रह सोज़े वतन (राष्ट्र का विलाप) नाम से जून 1908 में प्रकाशित हुआ। इसी संग्रह की पहली कहानी दुनिया का सबसे अनमोल रतन को आम तौर पर उनकी पहली प्रकाशित कहानी माना जाता रहा है। डॉ॰ गोयनका के अनुसार कानपुर से निकलने वाली उर्दू मासिक पत्रिका ज़माना के अप्रैल अंक में प्रकाशित सांसारिक प्रेम और देश-प्रेम (इश्के दुनिया और हुब्बे वतन) वास्तव में उनकी पहली प्रकाशित कहानी है। कुछ कहानियों का शीर्षक इस प्रकार है - अन्धेर, अनाथ लड़की, अपनी करनी, अमृत, अलग्योझा, आखिरी तोहफ़ा, आखिरी मंजिल, आत्म-संगीत, आत्माराम, दो बैलों की कथा, आल्हा, इज्जत का खून, इस्तीफा, ईदगाह, ईश्वरीय न्याय, उद्धार, एक आँच की कसर, एक्ट्रेस, कप्तान साहब, कर्मों का फल, क्रिकेट मैच, कवच, कातिल, कोई दुख न हो तो बकरी खरीद ला, कौशल़, खुदी, गैरत की कटार, गुल्ली डण्डा, घमण्ड का पुतला, ज्योति, जेल, जुलूस, झाँकी, ठाकुर का कुआँ, तेंतर, त्रिया-चरित्र, तांगेवाले की बड़, तिरसूल, दण्ड, दुर्गा का मन्दिर, देवी, देवी - एक और कहानी, दूसरी शादी, दिल की रानी, दो सखियाँ, धिक्कार, धिक्कार - एक और कहानी, नेउर, नेकी, नबी का नीति-निर्वाह, नरक का मार्ग, नैराश्य इत्यादि। ***********
- अंतिम बार
"बाबू, ई प्योर शीशम के लकड़ी हौ।चमक नहीं देखत हौ, और हल्का कितना हौ लईकन सब पचासों साल बैठी तबो कुछ ना होई। "सीताराम बढ़ई की कही ये बातें जैसे लगती हैं कल की ही बात हो, लेकिन, इस बात को सुने अवधेश को सालों हो गये। अवधेश ने कमरे को एक बार फिर निहारा। करीने से सजे हुए बेंच और टेबल, जिस पर जगह-जगह धूल जम गई थी। सामने लगी ट्यूबलाइट उसको जैसे मुँह चिढ़ा रही थी। वो अपने अवचेतन में कहीं गहरा धँसता चला गया। आज से दस साल पहले जब उसने ये कोचिंग इंस्टीटयूट शुरू किया था। ये सोचकर कि जो तकलीफ उसे गाँव में उठानी पड़ी है। वो तकलीफ आसपास के लोगों को नहीं उठानी पड़े।वो, शिक्षक ही बनेगा। कितना अच्छा तो पेशा है।समाज में लोग कितना सम्मान देते हैं। सब लोग प्रणाम सर..... प्रणाम सर कहते नहीं थकते, और, उसे शुरू से किताबों से कितना लगाव रहा है।खुद भी पढ़ो और दूसरे लोगों को भी शिक्षित करो, लेकिन, इधर कोरोना के कारण पिछले एक-सवा साल से कोचिंग बंद थी। सरकार सब कुछ खोलने की अनुमति देती है, लेकिन कोचिंग इंस्टीटयूट पर जैसे उसे पाला मार जाता है। जिम, रेडिमेड, शापिंग माल, बस, ट्रेन, हवाई जहाज सब खुल गये हैं, लेकिन, सरकार को पढाई से ही चिढ़ है।कोचिंग वाले टैक्स नहीं देते ना! इसलिए भी सरकार इन लोगों को कोचिंग इंस्टीटयूट खोलने की अनुमति नहीं देती। अगर वो भी कोई जिम या शापिंग माल चलाता तो क्या सरकार उसको रोक लेती? नहीं, बिल्कुल नहीं! वो बहुत कोशिश करता रहा कि वो अपना कोचिंग इंस्टीटयूट बंद ना करे, लेकिन, घर में छोट-छोटे बच्चे हैं।उनके खाने पीने के लाले पड़ गये हैं। पिताजी को डॉक्टर को दिखाना है। दिसंबर आधा गुजर गया है।माँ का स्वेटर भी लेना है। ठंढ़ से काँपती रहती है। आखिर बूढ़ी काया में ताकत ही कितनी होती है। स्वेटर जगह-जगह से फट गया है, और स्वेटर के कुछ हिस्से तो छीजकर आर-पार भी दिखने लगे हैं।कई दिनों से माँ कह रही है। घर के अंदर तो पहन सकती हूँ, लेकिन, बाहर निकलते मुझे शर्म आती है। आखिर, लोग क्या कहेंगे।एक शिक्षक की माँ फटा हुआ स्वेटर पहने हुए है। रमा ने भी कई बार शॉल के लिए तगादा कर दिया है।कहती है आँगनबाड़ी जाते हुए ठंढ़ लगती है। अब रमा को शॉल भी एक दो दिन में खरीदकर देता हूँ। आखिर रमा की आँगनबाड़ी वाली नौकरी ना होती तो आज वे लोग कहीं भीख माँग रहे होते। उसको मिलने वाले छह हजार रूपये से ही तो घर अब तक चल रहा है।नहीं तो इस आपदा काल में कौन किसकी मदद करता है? सबसे जरूरी काम है पिताजी को डॉक्टर को दिखाना। उनकी खाँसी रुकती ही नहीं। आखिर, कितने दिनों तक मेडिकल से लेकर सिरप पिलाई जाये। सारी कंपनियों के सिरप एक-एक करके देख लिए। जितने रूपये सिरप और गोलियों पर खर्च किये।उतने में तो किसी अच्छे डॉक्टर को दिखला देते, लेकिन, डॉक्टर भी पाँच सौ से कम में नहीं मानेगा।कोरोना के समय में एक तो डॉक्टर सामने से देखते नहीं। आनलाइन दिखलाना है तो दिखलाओ नहीं तो जै राम जी की। उसने बेंच को छुआ तो धूल के साथ-साथ जैसे उसके हाथ में अतीत के खुरचन भी आ गये। टीचर्स डे और वसंत पंचमी पर कितना सजाते थे छात्र इस इंस्टीटयूट को। कैसा लकदक करता था यही इंस्टीटयूट छात्र-छात्राओं के हँसी ठहाकों से। अवधेश को कमरे की एक-एक चीज से प्रेम था। उसने इंटीरियर डिजाइनर से अपने इंस्टीटयूट को सजवाया था। गुलाबी पेंट, बढ़ियाँ कार्पेट, अच्छी कुर्सी और मेज।शानदार ब्लैकबोर्ड, टेबल के ऊपर सजे भाँति-भाँति के पेन।कैसे वो सफेद कमीज और काली पैंट पहन कर नियम से सुबह छह बजे ही नाश्ता-पानी करके चल देता था।फिर, देर रात गये ही घर लौटता।उसने नीचे ऊपर सब मिलाकर तीन-चार कमरे ले रखे थे। दो तीन और लड़को को भी रख लिया था। पहले काम के घंटे बढ़ते गये।उसके अंदर एक जूनून सा छाने लगा। फिर, छात्रों की बढ़ती संख्या को देखकर उसने रूम बढ़ा दिये। फिर, टीचर भी बढ़ाने पड़े।मिला जुलाकर साठ-सत्तर हजार रूपये महीने में वो कमा ही लेता था। फिर, धीरे-धीरे नई तकनीक आने से उसने कुछ कम्प्यूटर भी खरीद लिये और भी कई कमरे किराये पर ले लिये थे। और स्टाफ़ बढाया। खूब मेहनत करने लगा। वो अपने साथ-साथ और लोगों को भी रोजगार दे सकता है। ये सोचकर ही उसका सीना गर्व से चौड़ा हो जाता था, और हमेशा उसे इस बात की खुशी रही।सब लोग हँसी खुशी से जी रहे थें। तभी कोरोना ने दस्तक दी और सबकुछ जहाँ का तहाँ जमकर रह गया।रोज सड़कों पर दौड़ने वाली उसकी स्कुटी घर में एक किनारे खड़ी हो गई। कभी-कभार कोई सामान लाने जाना होता तो, स्कुटी के भाग खुलते और वो रोड़ पर दौड़ती।नियमित आनेवाले टीचर्स अब दिखने बंद हो गये। पहले उसने औने-पौने दाम में कम्प्यूटर बेचे।शुरूआती दौर में तो तीन-चार महीने का लंबा लॉकडाउन लगा। अचानक से आने वाले पैसे आने बंद हो गये।खर्च ज्यों-का-त्यों।बहुत बचत करने की आदत शुरू से नहीं रही। पैसा आता था तो पता नहीं चलता था।कितना भी खर्च कर लो।कोई फर्क नहीं पड़ता था, लेकिन, अचानक से पैसे आने बंद होने से दिमाग जैसे सुन्न पड़ने लगा। जरुरी चीजों को तो नहीं टाला जा सकता था, लेकिन, गैर जरूरी चीजों पर सख्त पाबंदी लगा दी गई।चाऊमिन, पिज़्ज़ा मोमोज़ सब बंद। फिर, इंस्टीटयूट के मकान मालिक का तगादा बढ़ने लगा। नीचे के अतिरिक्त लिए गये कमरे को गैर जरूरी समझकर छोड़ दिया गया।ये सोचकर कि पता नहीं कितना लंबा लॉकडाउन चलेगा, और हर महीने का किराया भी चढ़ता जायेगा। सारे-के-सारे कम्प्यूटर पहले ही बिक चुके थें। कमरे वैसे भी खाली ही थे।सारे फर्नीचर को दो कमरों में समेटा गया, और कमरों की चाभी साल भर पहले ही मकान मालिक को सौंप दी गई। ये सोचकर कि आज नहीं तो कल जब सब कुछ ठीक-ठाक हो जायेगा तो फिर, से कमरे को किराये पर ले लिया जायेगा। लेकिन, जब दूसरी लहर आयी और फिर, डेढ़ दो महीने का लॉकडाउन लगा, तो रमा जैसे बिफरती हुई बोली- "क्या, कोचिंग इंस्टीटयूट के अलावा दूसरा कोई काम नहीं है? पेपर बेचो, सब्जी बेचो, फल बेचो कुछ भी करो। लेकिन, अब घर की हालत मुझसे देखी नहीं जाती, और मेरी आँगनबाड़ी की कमाई से कुछ होने जाने वाला नहीं है। वो ऊँट के मुँह में जीरा का फोरन जैसा साबित हो रहा है। तुम जल्दी कुछ करो। नहीं तो मैं बच्चों को लेकर अपने मायके चली जाऊँगी।" और यही सोचकर अवधेश ने ये फैसला किया था, कि अब और इंतजार करना मूर्खता के सिवाय कुछ नहीं है। हो सकता है सालों कोरोना खत्म ना हो।तब तो सालों उसका इंस्टीटयूट बंद रहेगा। रमा ठीक कहती है। मुझे अपना इंस्टीटयूट बंद करके कोई और काम करना चाहिए।नहीं तो घर कैसे चलेगा? और यही सोचकर उसने एक जरूरत मंद संस्था को बहुत कम कीमत पर अपना फर्नीचर बेचने का फैसला किया था। "भैया, आटो वाला आ गया है, सामान लेने।" रघुवीर ने टोका तो अवधेश अतीत के नर्म बिस्तर से हकीकत की ठोस जमीन पर गिरा। " हुँ... हाँ... कौन रघुवीर अच्छा आटो वाला आ गया। चलो अच्छा है।" अवधेश के भीतर कुछ पिघला, कार्पेट, दीवार, टेबल या छत या कि दस साल का सुहाना सफर और उसकी आँखे भींगनें लगी। उसने आखिरी बार कमरे को गौर से निहारा। लगा जैसे सब कुछ छूटा जा रहा है, और वो किसी भी कीमत पर उसे नहीं छोड़ना चाहता। रघुवीर ने पूछा- "क्या हुआ भईया..?" लेकिन, अवधेश, रघुवीर की बातों का कोई जबाब नही दे सका। बस भर्राये गले से बोला- "कुछ नहीं रघुवीर.. l" शाम का धुँधलका गहराने लगा था। उसे लगा कमरे को पलटकर अंतिम बार देख ले। लेकिन, उसकी हिम्मत नहीं पड़ी।धीरे-धीरे नीम अंधेरे में वो सीढ़ियों से नीचे उतर गया। ************
- खाली कागज का कमाल
तुषार भूख से व्याकुल था। सुबह से चाय तक पीने को नहीं मिली थी। इस अनजान जगह में अपहरण करके लाए हुए चार दिन हो चुके थे किंतु वह अभी तक अपने उस अपहरणकर्ता को ढंग से पहचान भी नहीं पाया है। पहचाने भी कैसे, उसका लगभग आधा चेहरा तो बड़े फ्रेम के काले चश्मे में छिपा रहता है। मम्मी-पापा, पप्पू-सोनू, दादी माँ चार दिन से कितने परेशान होंगे। किसी से खाना भी नहीं खाया गया होगा। पापा ने शायद अखबार में फोटो निकलवाया होगा। थाने में भी रिपोर्ट लिखाई होगी। सोचते-सोचते वह फिर रोने लगा। वह भी कितना पागल था, जो बातों में आ गया। इस तरह अपहरण करके ले जाने के कितने क़िस्से-कहानियाँ वह पढ़ता-सुनता रहा है फिर भी अपना अपहरण करा बैठा। हैड मास्टर साहब ने बुलाकर कहा था, "तुषार तुम्हारे घर से किसी का फोन आया है कि आज ड्राइवर कार लेकर तुम्हें लेने नहीं आ सकेगा वे फैक्ट्री के रमेश नाम के नौकर को भेज रहे हैं, वह काला चश्मा लगाता है, तुमको पहचानता भी है, उसके साथ टैक्सी करके आ जाना।' छुट्टी के समय स्कूल के गेट पर पहुँचते ही काला चश्मा लगाए हुए एक आदमी आगे आया "चलिए छोटे साहब।' "तुमने मुझे कैसे पहचान लिया,...मैंने तो तुम्हें पहले कभी नहीं देखा।' "पहले मैं चश्मा नहीं लगाता था। कुछ दिन पहले आँख का ऑपरेशन करवाया है, तभी से लगाने लगा हूँ. इसीलिए आप नहीं पहचान पा रहे हैं।' "चलो जल्दी से टैक्सी पकड़ो। बहुत ठंडी हवा है, सर्दी लग रही है।' पास में खड़ी एक टैक्सी में वे बैठ गए थे जिसे एक सरदार जी चला रहे थे। तभी उसने चौंक कर कहा - "रमेश टैक्सी गलत रास्ते पर जा रही है।' "खैर चाहते हो तो चुपचाप बैठो, खबरदार जो शोर मचाया।' टैक्सी के चारों तरफ के शीशे बंद थे। चिल्लाने पर भी आवाज बाहर नहीं जा सकती थी। इसीलिए वह सहम कर चुप हो गया। न जाने कितनी सड़कें, चौराहे, गलियाँ, मोड़ पार करने के बाद एक सुनसान जगह कुछ खँडहरों के बीच टैक्सी उन्हें उतार कर चली गई। एक-दो घंटे बाद रात घिर आई थी। चारों तरफ गहरा अंधेरा था। एक-दूसरे को ठीक से देख पाना भी मुश्किल था। तब उसे बहुत पैदल चलना पड़ा, उसके बाद एक कोठरी में बंद कर दिया गया था। दरवाजे पर ताला खुलने की आवाज से उसका ध्यान भंग हुआ। उसने अंदाजा लगाया कि चश्मे वाला आदमी खाना लेकर आया होगा, दरवाजा खुलने के साथ ही हल्का सा प्रकाश भी कमरे में घुस आया। उसकी नजर चश्मे वाले के पैरों पर पड़ी। उसके दोनों पैरों में छह-छह उँगली थीं। तभी उसे अपने घर में काम कर चुके एक नौकर रमुआ का ख्याल आया। उसने अपने मम्मी-पापा से सुना था कि उसके हाथ-पैरों में छह-छह उँगलियाँ थीं... रंग गोरा था, एक आँख की पुतली पर सफेदी फैली थी। जब वह स्वयं चार-पाँच वर्ष का था तभी अलमारी में से गहने निकालते हुए मम्मी ने रमुआ को पकड़ा था...पापा के आने तक वह भाग चुका था। रमुआ की उसे याद नहीं है पर अब वह चश्मे में छिपी उसकी आँखें देखना चाहता था। वह कागज में रोटी- सब्जी रख कर उसे खाने को दे गया था। दरवाजे में कई सुराख थे जिसमें से काफी रोशनी अंदर आ सकती थी किंतु उस पर बाहर से किसी कपड़े का पर्दा डाल दिया गया था जिससे कमरे में अंधेरा रहता और वह बाहर भी नहीं देख सकता था। भूख उसे तेजी से लगी थी। मोटी-मोटी रोटियों को छूते ही उसे फिर माँ याद आ गई। माँ के हाथ के बने करारे परांठे याद आ गए। मन न होते हुए भी उसने रोटी खाई व लोटे से पानी पी गया। अभी वह गिलास में चाय देकर बाहर निकला ही था कि कमरे में रोशनी की एक रेखा देखकर उसने किवाड़ की दरार से बाहर झाँका। वह आदमी चश्मा हाथ में लिए सरदार से बातें कर रहा था। यह देखकर उसकी खुशी का ठिकाना न रहा कि उसकी एक आँख खराब थी उसमें सफेदी फैली थी। उसने प्रसन्नता से अपनी पीठ स्वयं थपथपाई कि वह भी कहानी के पात्रों जैसा नन्हा जासूस हो गया है। तभी उसकी आशा पुन: निराशा में बदल गई। ठीक है उसने जासूसी करके अपहरणकर्ता का पता लगा लिया है, उसे पहचान लिया है लेकिन क्या फायदा.. यह जानकारी वह घर या पुलिसवालों तक कैसे पहुँचाए, पाँच दिन हो चुके हैं। किसी भी दिन यह मुझे मार डालेंगे। वह फिर सुबकने लगा। किवाड़ों पर हुई खटपट की आवाज सुनकर उसने सोचा, अभी तो वह चाय देकर गया था पुन: क्यों आ रहा है.. क्या पता कहीं दूसरी जगह ले जाए या हो सकता है मार ही दे। चश्मे वाले ने उसके हाथ में एक लिफाफा थमाया और कहा, "पेन तुम्हारे बस्ते में होगा, कागज भी होगा। अपने पापा को पत्र लिखो कि जिंदा देखना चाहते हैं तो माँगी हुई रकम बताई हुई जगह पर पहुँचा दें। पुलिस को बताने की कोशिश हर्गिज़ न करें वर्ना बेटे को हमेशा के लिए खो देंगे।' किसी के खाँसने की आवाज सुन कर वह बाहर जाते हुए बोला, "दरवाजे का पर्दा हटा देता हूँ, कमरे में रोशनी हो जाएगी। जल्दी से पत्र लिख दो, लिफाफे पर पता भी लिख दो, मैं अभी आकर ले जाऊँगा।' "वाह बेटे, तुम तो बहुत तेज हो। जैसा मैंने कहा था वैसा ही लिख दिया। पत्र को खाली कागज में क्यों लपेट दिया है ?' उसने कागज को उलट-पलट कर देखते हुए कहा। "थोड़ी देर पहले आप कह रहे थे बादल हो रहे हैं, पानी बरस सकता है। इसीलिए पत्र को खाली कागज में लपेट दिया है। लिफाफा भीग भी जाए तो पत्र न भीगे। अक्षर मिट गए तो पापा पढ़ेंगे कैसे। फिर मुझे कैसे ले जाएँगे।' "शाबाश ठीक किया तुमने।' पत्र गए तीन दिन हो चुके थे। इस बीच वह सोते-जागते तरह-तरह की कल्पनाएँ करता रहा था। सपने में कभी उसे चश्मे वाला छुरा लिए अपनी तरफ आता हुआ दिखता। कभी सब बीमार माँ के पास बैठे हुए दिखाई देते। कभी उदास खड़े पापा दिखते, कभी रोती हुई बहन दिखती। तभी उसे एक तेज आवाज सुनाई दी- "तुषार... तुषार, तुम कहाँ हो' अरे यह तो पापा की आवाज है। वह चौंक कर उठा और दरवाजा पीटने लगा -" पापा मैं यहाँ हूँ, इस कोठरी में।' तभी ताला तोड़ने की आवाज आई। दरवाजा खुलते ही पहले दरोगा जी अंदर आए फिर पापा आए। वह पापा से लिपट कर जोर-जोर से रोने लगा।...पापा भी उसे सीने से लगाए रो रहे थे - "मेरे बेटे मैं आ गया, तू ठीक तो है न?' घर जाते हुए उसने रास्ते में पूछा - "पापा उस दिन कार मुझे लेने क्यों नहीं आई थी।' "बेटे फोन पर किसी ने कहा था कि आज स्कूल में फंक्शन है। तुषार को लेने के लिए कार दो घंटे लेट भेजना, ऐसा कई बार हो चुका है... हमें क्या पता था कि धोखा हो सकता है।' घर पर उसे देखने वालों की भीड़ इकट्ठी थी। सब इतने खुश थे, जैसे कोई उत्सव हो। सबको मिठाई बाँटी जा रही थी। तभी उसने पूछा- "मम्मी उस घर का पता कैसे लगा?' "जब अपहरणकर्ता का ही पता लग गया फिर उसके घर का पता लगाना कौन सा मुश्किल था।...सब तेरे उस पत्र के साथ आए खाली कागज का कमाल है।' "माँ, उस कागज को पढ़ा किसने ? मैंने तो अंधेरे में तीर मारा था। मुझे उम्मीद नहीं थी कि कोई उसे पढ़ पाएगा।' पप्पू ने गर्व से सीना फुलाकर कहा - "भैया मैंने पढ़ा था।' "तूने! तूने कैसे पढ़ा ?' "चार-पाँच दिन पहले तुम्हारे दोस्त संदीप भैया आए थे। उदास थे, बहुत देर बैठे रहे। वही बता रहे थे कि अपहरण वाले दिन उन्होंने तुम को एक पेन्सिल दी थी जिसका लिखा कागज पर दिखाई नहीं देता। उन्होंने पढ़ने की तरकीब भी बताई थी। तुम्हारे पत्र के साथ आए खाली कागज को पापा ने उलट-पलट कर बेकार समझ कर फेंक दिया था। मैं तब खाना खा रहा था। मुझे संदीप भैया की बात याद आ गई। मैंने कागज उठा लिया और उस पर दाल की गर्म कटोरी रख कर घुमादी।....देखते ही देखते कागज पर लिखे तुम्हारे अक्षर चमकने लगे। बिना पढ़े ही मैं उसे लेकर पापा के पास गया। पत्र से पता लग गया कि अपहरण रमुआ ने किया है फिर क्या था, घर में हलचल मच गई। पापा तभी पुलिस स्टेशन गए और उनकी सहायता से तुम्हें ढूँढ़ लाए।' तभी पापा खुशी से चहकते हुए घर में घुसे और कुर्सी पर आराम से बैठते हुए बोले- "साला रमुआ भी पकड़ में आ गया है।' फिर कुछ ठहर कर पूछा - "तुषार बेटे उस खाली कागज का रहस्य क्या था?' "भैया क्या वह जादू की पेन्सिल थी?' "अरे नहीं, जादू कैसा, असल में वह पेन्सिल मोम की थी इसीलिए उसके लिखे अक्षर कागज पर दिखाई नहीं दे रहे थे। पप्पू ने उस पर गर्म कटोरी रख दी, गर्मी पाकर मोम पिघल गया और अक्षर स्पष्ट दिखने लगे, यही उसका रहस्य था।' "भाई कुछ भी हो खाली कागज ने कमाल कर दिखाया। वर्ना पता नहीं तुझे फिर से देख भी पाते या नहीं।' माँ की आँखों में हर्ष के आँसू थे।' *****************
- बदरंग जिंदगी
दामोदर को एहसास हुआ कि उसे फिर, से पेशाब लग गई है।पता नहीं उसका गुर्दा खराब हो गया है, या शायद कोई और बात है।अब, बिना डॉक्टर को दिखाये उसे कैसे पता चलेगा कि उसको बार-बार पेशाब क्यों आता है? ऐसा नहीं है कि उसने डॉक्टर को नहीं दिखाया। उसने कई-कई डॉक्टरों को दिखाया, लेकिन, समस्या ज्यों की त्यों बनी हुई है। उसे लगातार पेशाब आना बंद ही नहीं होता है। वो आखिर करे भी तो क्या करे? अब उसका डॉक्टरों पर से जैसे विश्वास ही उठ गया है। उसे लगता है कि उसके मर्ज की दवा शायद अब किसी भी डॉक्टर के पास नहीं है। कभी-कभी उसे ऐसा भी लगता है कि वो एक ऐसे जँगल में पहुँच गया जहाँ से उसे बाहर निकलने का रास्ता ही नहीं सूझ रहा है, और, वो उसी जँगल में आजीवन भटकता रहकर कहीं मर-खप जायेगा। उसे अपने जीवन में सब कुछ अच्छा लगता है, लेकिन, उसे अच्छा नहीं लगता कि उसे बार-बार पेशाब आये।ज्यादा पेशाब आने से उसे बार-बार पेशाब करने काम को छोड़कर जाना पड़ता है। उसके मालिक, यानि कारखाने के मालिक, उसकी इस हरकत पर बड़ी बारीक नजर रखे हुए रहते हैं, और वो तब मन ही मन भीतर से कटकर रह जाता है। जब, मालिक उसे टेढ़ी नजर से देखते हैं, और, मन ही मन गुर्राते हैं। और भला गुर्राये भी क्यों ना? उसे छह हजार रुपये महीने भी तो देते हैं, और वो इधर साल भर से काम भी तो ठीक से नहीं कर पा रहा है। उसको कभी-कभी खुद भी लगता है कि वो काम छोड़ दे, और अपने घर पर ही रहे। तब तक, जब तक की उसकी बार-बार पेशाब करने वाली बीमारी खत्म ना हो जाये, लेकिन अगर वो काम छोड़ देगा तो खायेगा क्या? बार-बार ये सवाल उसके दिमाग में कौंध जाता है। अमन की उम्र भी भला क्या है? मात्र उन्नीस साल! इतने कम उम्र में ही उसने पूरे घर की जिम्मेदारी संभाल ली है। ऐसे उम्र में दूसरे बच्चे जब बाप के पैसे पर कहीं किसी कॉलेज में अय्याशी कर रहे होते हैं। उस समय अमन सारे घर को देखने लगा है। आखिर क्या होता है आजकल छ: हजार रूपये में? आज अगर अमन को मिलने वाले पँद्रह हजार रूपये उसको नहीं मिलते तो क्या वो घर चला पाता? नहीं बिल्कुल नहीं! और अमन हर महीने याद करके उसकी दवा ऑनलाइन खरीदकर भेज देता है। नहीं तो उसकी सैलरी में तो वो अपनी दवा तक नहीं खरीद पाता। आज एक दवा खरीदने जाओ तो, वो दो सौ रूपये का मिलता है, लेकिन अगले महीने जाओ तो कंपनी उसी दवा पर दस-बीस फीसदी रेट बढ़ा देती है, और, आजकल डॉक्टर के केबिन के बाहर मरीजों से ज्यादा उसे मेडिकल रि-पर्जेंटेटिव वाले लड़के ही दिखाई देते हैं। मरीजों को ठेलते-ठालते अंदर घुसने को बेताब दिख पड़ते हैं ये लड़के! जो, थोड़ी बहुत भी नैतिकता डॉक्टरों में बची थी। वो इन कमबख़्त दवा कंपनियों ने खत्म कर रखी है।रोज एक दवा कंपनी बाजार में उतर जाती है और, उसके ऊपर दबाव होता है, अपने प्रोडक्ट की मार्केटिंग का। जहाँ चूकते-चूकते आखिरकार डॉक्टर भी हथियार डाल ही देते हैं।रोज एक नया चेहरा वैसे ही एक कृत्रिम मुस्कुराहट ओढ़े हुए उनके केबिन में दाखिल हो जाता है, और ना चाहते हुए भी वो उनकी दवा मरीजों को लिख देते हैं।दवाओं पर मनमाना दाम कंपनी लगाती है और कंपनी के टार्गेट और मुनाफे के बीच फँस जाते हैं उसके जैसे लोग। उसको लगा वो कुछ देर और रूका तो उसका पेशाब पैंट में ही निकल जायेगा। लोग उसकी इस बीमारी पर बुरा सा मुँह बनाते हैं।खास कर उसके सहकर्मी, और उसने अपनी बहुत देर से दबी हुई इच्छा आखिरकार, दिनेश को बताई। दिनेश उसका साथी है। रोज काम करने बैरकपुर से रघुनाथपुर वो दिनेश की मोटर साइकिल से ही आता जाता है। उसके पास अपनी मोटरसाइकिल नहीं है। उसका घर, दिनेश के घर के बगल में ही है इसलिए वो उसकी मोटरसाइकिल से ही काम पर आता जाता है। "दिनेश मैं आता हूँ, पेशाब करके।" इतना कहकर वो निपटने के लिए जाने लगा, लेकिन, तभी दिनेश की बात को सुनकर रूक गया। दिनेश ने कारखाने से छुट्टी होने के बाद अभी कारखाने का गेट बंद ही किया था कि दामोदर की इस अप्रत्याशित बात को सुनकर झुँझला पड़ा- "अगर, तुम्हें पेशाब करने जाना ही था, तो कारखाना बंद होने से पहले ही चले जाते, और हाँ, अभी तुम थोड़ी देर पहले भी तो पेशाब करने गये थे।पता नहीं तुमको कितना बार पेशाब लगता है? एक हमलोग हैं। कारखाना में घुसने के बाद बहुत मुश्किल से दो या ज्यादा से ज्यादा तीन बार जाते होंगे, लेकिन, तुमको तो दिन भर में पचास बार पेशाब लगता है।पता नहीं क्या हो गया है तुम्हें? किसी अच्छे डॉक्टर को क्यों नहीं दिखाते?" दामोदर के चेहरे पर जमाने भर की कातरता उभर आई। उसके सूखे हुए बदरंग चेहरे पर नजर पड़ते ही दिनेश का दिल भी डूबने लगा, और वो उसकी परेशानी को समझते हुए बोला - "ठीक है जाओ, लेकिन, जरा जल्दी आना। आज मुझे मेरे बेटे को पार्क लेकर जाना है। घूमाने के लिए। वो पिछले कई हफ्तों से कह रहा है। पापा, आप कभी मुझे पार्क लेकर नहीं जाते। आज अगर मैं जल्दी नहीं गया तो वो फिर सो जायेगा और कल फिर, से वही तमाशा करेगा घूमने जाने के लिए। अखिर, इन मालिक लोगों के लिए सुबह नौ बजे से रात को नौ बजे तक काम करते-करते अपने बाल-बच्चों को कहीं घूमाने का समय ही नहीं मिल पाता।" "हाँ आता हूँ।" कहकर दामोदर जल्दी से पान मसाला की एक पुड़िया फाड़कर अपने मुँह में डालता हुआ, पेशाब करने चला गया। दामोदर, सेठ घनश्याम दास के यहाँ पिछले बीस सालों से काम करता आ रहा। दिनेश अभी नया-नया है। दोनों गाड़ी पर बैठे और, अपने गंतव्य की ओर चल पड़े। बात के छोर को दिनेश ने पकड़ा- "तुम्हे ये बीमारी कब से हुई है, और तुम इसका इलाज क्यों नहीं करवाते दामोदर?" दामोदर बोला- "अरे भईया इलाज की मत पूछो। पिछले लॉकडाउन में, मैं अपनी सोसाइटी की गेट पर खड़ा-खड़ा ही बेहोश होकर गिर पड़ा था। वो, तो बगल के एक दुकानदार ने देख लिया, और सोसाइटी के गार्ड की मदद से मुझे मेरठ भिजवाया। सात दिनों तक "जैक" हास्पिटल में रहा। एक दिन का पँद्रह हजार रुपये चार्ज था वहाँ का।केवल सात दिनों में ही एक लाख रूपये से ज्यादा उड़ गये। फिर, मेरे लड़के ने नर्सरी हास्पिटल में मुझे भर्ती कराया। तब जाकर अभी मेरी हालत में कुछ सुधार आया है। अगर वो, दुकानदार और गार्ड़ ना होते तो आज मैं तुम्हारे सामने जिंदा ना होता।" "और, सारा खर्चा कहाँ से आया। सेठजी ने कुछ मदद की या नहीं?" दिनेश बाइक चलता हुआ बोला। "अरे, मुझे कहाँ होश था। लड़का बता रहा था उसने मालिक को फोन करके पैसे माँगे थे, लेकिन मालिक की सुई दो हजार पर अटकी हुई थी। बड़ी हील-हुज्जत के बाद उन्होंने पाँच हजार रूपये दिए।" "बाकी के पैसों का इंतजाम कैसे हुआ?" "कुछ अगल-बगल से कर्ज लिया, और बाकी मेरे ससुर जी ने लगभग चार लाख रूपये देकर मेरी मदद की। तब जाकर मेरी जान बची।" मोटर साइकिल एक मेडिकल स्टोर के बगल से गुजरी। दामोदर ने दिनेश को गाड़ी रोकने के लिए कहा। और, वो लपकता हुआ मेडिकल स्टोर की तरफ बढ़ गया। उसकी दवा खत्म हो गयी थी। उसने दुकानदार को पर्ची दिखाई दुकानदार ने पर्ची को बड़े गौर से देखा और दवाई निकालकर उसने काउंटर पर रख दिया और दामोदर से बोला- "इस बार भी कंपनी ने दवा का दाम बढ़ा दिया है। उसनें एम. आर. पी. पर नजर डालते हुए कहा। पिछले बार ये दो सौ पचास रुपये की आती थी, अब दो सौ सत्तर रूपये लगेंगे। क्या करूँ दे दूँ?" दामोदर ने जेब में हाथ डाला, और पैसे गिने एक-दो उसके पास दो सौ रूपये थे। उसी में उसे रास्ते में घर के लिए एक लीटर दूध भी लेना था। पैसा नहीं बचेगा उसने दुकानदार से कहा- "फिलहाल मुझे दो दिन की दो गोली दे दो। बाकी जब तनख्वाह मिलेगी तब आकर ले जाऊँगा।" दवा लेकर खुदरा पैसा उसने जेब के हवाले किया और वापस आकर बाइक पर बैठ गया। रास्ते में उसने एक लीटर दूध भी लिया। घर, पहुँचकर उसने हाथ मुँह धोया और पलंग पर लेट गया।तब तक उसकी पत्नी रूची चाय बनाकर ले आयी।एक प्याली उसने दामोदर को दी और दूसरी प्याली खुद लेकर चाय पीने लगी। चाय पीते-पीते वो, बोली- "आज, घर का मकान मालिक, आया था और घर का किराया भी माँग रहा था। कह रहा था कि दो महीने का किराया तो पूरा हो ही गया है, और, अब तीसरा महीना भी लगने वाला है। आप लोग जल्दी से जल्दी किराया दीजिये नहीं तो घर खाली कर दीजिए।" "ये हरीश भी अजीब आदमी है। वो जानता है, कि अभी कोविड़ का समय है, और ऐसी नाजुक स्थिति है। यहाँ हम लोग दाने-दाने को तरस रहे हैं। एक टाइम माड़-भात तो एक टाइम पानी या शर्बत पीकर ही काम चला रहे हैं। एक तो खाने-पीने वाले राशन की परेशानी। उस पर से हर महीने का किराया। आखिर कहाँ से लाकर दे आदमी इस गाढ़े समय में किराया? इन ढ़ाई महीनों में वो पहले ही अपने जान पहचान के सभी लोगों से कर्ज ले चुका है। अभी उसने पहले से लिए कर्ज को ही नहीं चुकाया है, तो ये कमरे का किराया कहाँ से लाकर देगा? उसको भी सोचना चाहिए। दो-ढ़ाई महीने से दुकान बंद है। जब मालिक से पैसा मिलेगा तब उसको किराया भी मिल ही जायेगा।कौन से हम भागे जा रहे हैं?" दामोदर को लगा जैसे उसके सीने पर किसी ने बहुत भारी पत्थर रख दिया हो। जिससे उसका साँस फूलने लगा हो, और अब तब में उसका दम घुट जायेगा, और वो वहीं पलंग पर खत्म हो जायेगा। वो उठकर पलंग पर बैठ गया। "आज माँ का फोन भी आया था।कह रही थीं कि एक बार में ना सही लेकिन, किस्तों में ही चार लाख रुपये थोड़ा-थोड़ा करके लौटा दें। मेरी छोटी बहन निम्मो की शादी तय हो गयी है। अगले साल कोई अच्छा सा लगन देखकर पिताजी निम्मो की शादी कर देना चाहते हैं। तुमसे सीधे-सीधे कहते नहीं बना तो, उन्होंने माँ से फोन करके कहलवाया है।" रुची ने डरते-डरते धीरे से कहा। "ठीक है, उनका भी कर्ज, हम लोग चुका देंगे, लेकिन, थोड़ा समय चाहिए।" दामोदर छत को घूरते हुए बोला। रात काफी गहरा चुकी थी।रुची कब की सो गई थी। लेकिन, दामोदर को नींद नहीं आ रही थी। रह-रह कर वो बदरंग हो चुकी दीवार और छत को घूरता जा रहा था।उसे कभी-कभी ये भी लगता है कि उस दीवार और छत की तरह ही उसकी जिंदगी भी बदरंग हो गई है। एक दम बेकार पपड़ी छोड़ती, और सीलन से भरी हुई! क्या पाया आज उसने पचास-पचपन साल की उम्र में? कुछ भी तो नहीं! ताउम्र वो खटता रहा लेकिन, उसके हाथ में क्या लगा? सिवाये शून्य के! एक नपी तौली जिंदगी जो, खुशी से ज्यादा उसे दु:ख ही देती रही।ज्यादातर वक्त अभाव में ही बीता।अचानक उसे लगा कि उसे फिर, से पेशाब लग गया है, वो उठकर फारिग होने चला गया। आकर वापस लेटा तो रूची की नींद खुल गई। उबासी लेती हुई रूची ने पूछा- "क्या हुआ नींद नहीं आ रही है क्या?" "नहीं। लगता है पलंग में खटमल हो गये हैं, और मुझे काट रहे हैं।" दामोदर बिछौना ठीक करता हुआ बोला। रूची ने अच्छा कहा और उबासी लेती हुई फिर, से सो गई। उसके बगल वाला कमरा उसकी बेटी प्रीती का है। पापा के आने की आहट पाकर उसने जल्दी से अपने कमरे की बत्ती बंद कर ली। लेकिन, दामोदर के दिमाग में एक नई दुश्चिंता ने घर करना शुरू कर दिया। आखिर इस साल प्रीति का पच्चीसवाँ लगने वाला है। आखिर कबतक जवान लड़की को कोई घर में रखेगा। कल को कहीं कुछ ऊँच-नीच हो गई तो! तमाम दुश्चिंताओं के बीच दामोदर रात भर करवटें बदलता रहा। लेकिन, उसे नींद नहीं आई। *********
- जीवन की प्राथमिकताएं
शिक्षक ने आज कक्षा में प्रवेश करते ही मेज पर एक बड़ा सा खाली शीशे का जार रख दिया। शिक्षक ने जार को पत्थर के बड़े-बड़े टुकड़ों से भर दिया। जार को पूरा भरने के बाद उन्होंने छात्रों से पूछा क्या जार भर गया है? इस पर सभी छात्रों ने सामूहिक शब्दों में कहा “हाँ, जार भर गया है।” तब शिक्षक ने छोटे-छोटे कंकड़ो से भरा एक डिब्बा उठाया और उन्हें जार में भरने लगे। जार को थोडा हिलाने पर ये कंकड़ पत्थरों के बीच व्यवस्थित हो गए। एक बार फिर उन्होंने छात्रों से पूछा कि क्या जार भर गया है? सभी ने पुनः हाँ में उत्तर दिया। तभी शिक्षक ने एक रेत से भरा डिब्बा निकाला और उसमें भरी रेत को जार में डालने लगे। रेत ने बची-खुची जगह भी भर दी। एक बार फिर उन्होंने पूछा कि क्या जार भर गया है? इस बार सभी ने एक साथ उत्तर दिया, “हाँ, अब तो यह पूरी तरह भर गया है।” लेकिन अब शिक्षक ने पानी से भरी एक बोतल को इस जार में उड़ेल दिया। शिक्षक छात्रों को संबोधित करते हुए बोले कि देखो छात्रों, जार ने एक बोतल पानी को भी अपने अंदर समा लिया। ऐसा कह कर शिक्षक ने छात्रों को समझाना शुरू किया, “मैं चाहता हूँ कि आप इस बात को समझें कि ये जार आपके जीवन का एक प्रतिबिंब है। बड़े-बड़े पत्थर आपके जीवन की ज़रूरी वस्तुएं हैं- जैसे आप का परिवार, आपका जीवन साथी, आपके माता पिता, आपका स्वास्थ्य इत्यादि। यह सभी ऐसी वस्तुएं है कि अगर आपकी बाकी सारी वस्तुएं खो भी जाएँ और सिर्फ ये रहे तो भी आपकी ज़िन्दगी पूर्ण रहेगी। जार में पड़े छोटे कंकर उन वस्तुओं को दर्शाते हैं जिनकी हमारे जीवन में आवश्यकता तो है परंतु यदि प्राथमिकता के तौर पर देखा जाए तो ऐसी वस्तुओं को हम दूसरी श्रेणी की प्राथमिकता में रख सकते हैं जैसे हमारी नौकरी, हमारी कार, हमारी साइकिल इत्यादि। जार में पड़ी रेत और पानी बाकी सभी छोटी-मोटी चीजों को दर्शाती हैं। अगर आप जार को पहले रेत और पानी से भर देंगे तो कंकडों और पत्थरों के लिए कोई जगह नहीं बचेगी। यही आपके जीवन के साथ होता है। अगर आप अपना सारा समय और उर्जा छोटी-छोटी चीजों में लगा देंगे तो आपके पास कभी उन चीजों के लिए समय नहीं होगा जो आपके जीवन के लिए परम आवश्यक हैं। उन चीजों पर ध्यान दीजिये जो आपके जीवन की खुशी के लिए आवश्यक है। अपने बच्चों के साथ खेलिए, अपने जीवन साथी के साथ घूमने जाइए, अपने परिवार के साथ देशाटन पर जाइए और खूबसूरत छुट्टियां बिताइए। ऐसा न कर, यदि आप अपना सारा वक्त ऑफिस अथवा व्यापार में ही व्यतीत कर देते हैं तो आप जीवन के इन महत्वपूर्ण क्षणों से दूर हो जाएंगे। आपकी जिंदगी नीरस व तनावपूर्ण व्यतीत होने लगेगी। अपने जीवन की प्राथमिकताओं को पहचाने, इनके अतिरिक्त सभी वस्तुएं रेत के समान हैं। सार - यदि मनुष्य अपने जीवन की प्राथमिकताओं को न पहचान कर व्यर्थ के कार्यों में अपने को व्यस्त रखता है तो ऐसे मनुष्यों का जीवन नीरस व उत्साहहीन व्यतीत होता है। ******
- सिरफिरा हाथी
बहुत समय पहले की बात है। गांव में एक अध्यापक रहते थे। उनके अनेकों विद्यार्थी थे। एक दिन अध्यापक ने अपने सभी विद्यार्थियों को अपने पास बुलाया और बड़े प्यार से समझाया, विद्यार्थियों सभी जीवों में ईश्वर का वास होता है इसलिए हमें सबका आदर व सत्कार करना चाहिए। कुछ दिनों बाद अध्यापक जी ने अपने प्रांगण में एक विशाल हवन का आयोजन किया। हवन की लकड़ी के लिए कुछ विद्यार्थियों को पास के जंगल में भेजा गया। विद्यार्थी हवन के लिए लकड़ियाँ चुन रहे थे कि तभी वहाँ एक सिरफिरा हाथी आ धमका। सभी विद्यार्थी शोर मचा कर जान बचाने के लिए भागने लगे, “भागो…। हाथी आया…सिरफिरा हाथी आया…।” लेकिन उन सबके बीच एक आदर्श विद्यार्थी ऐसा भी था जो इस खतरनाक परिस्थिति में भी डरा नहीं और शांत खड़ा रहा। उसे ऐसा करते देख उसके साथियों को बड़ा ही आश्चर्य हुआ और उनमे से एक बोला, “ये तुम क्या कर रहे हो? देखते नहीं सिरफिरा हाथी इधर ही आ रहा है, भागो और जल्द से जल्द अपनी जान बचाओ।” इस पर विद्यार्थी बोला, “तुम लोग जाओ और बचाओ अपनी जान, मुझे इस हाथी से कोई भय नहीं है । अध्यापक जी ने कहा था, कि हर जीव में ईश्वर का वास होता है इसलिए भागने कि कोई जरुरत नहीं क्योंकि ईश्वर हमें हानि नहीं पहुंचा सकता।”ऐसा कह कर वह वहीं खड़ा रहा और जैसे ही हाथी पास आया वह विद्यार्थी उस सिरफिरे हाथी को नमन करने लगा। लेकिन हाथी तो सिरफिरा था और कहां रुकने वाला था, वह सामने आने वाली हर एक चीज को तहस नहस करता जा रहा था। जैसे ही विद्यार्थी उसके सामने आया हाथी ने उसे अपनी सूड़ से उठाया और एक ओर जोर से पटक कर आगे बढ़ गया। विद्यार्थी के शरीर पर बहुत चोट आई, वह घायल हो कर वहीं बेहोश हो गया। काफी समय बाद जब उसे होश आया तो वह आश्रम में था और अध्यापक जी उसके सामने खड़े थे। अध्यापक जी बोले, “सिरफिरे हाथी को आते देखकर भी तुम वहाँ से हटे क्यों नहीं जबकि तुम्हें पता था कि वह तुम्हें चोट ही नहीं पहुंचा सकता बल्कि जान से मार भी सकता था।” तब विद्यार्थी बोला, “अध्यापक जी आपने ही तो कुछ दिन पहले समझाया था कि सभी जीवों में ईश्वर का वास होता है। यही कारण था कि मैं भागा नहीं, मैंने नमस्कार करना ही उचित समझा।” इस पर अध्यापक जी ने विद्यार्थी को समझाया, “बेटा तुम मेरी आज्ञा मानते हो ये बहुत अच्छी बात है मगर मैंने ये भी तो सिखाया है कि विपरीत परिस्थितियों में अपना विवेक नहीं खोना चाहिए। हाथी आ रहा था, यह तो तुमने देखा और वह सिरफिरा है यह भी तुम्हें ज्ञात हो गया था। फिर भी हाथी को तुमने ईश्वर का रूप समझा। मगर बाकी विद्यार्थियों ने जब तुम्हें रोका तो भी तुम्हें क्यों कुछ समझ नहीं आया। उन्होंने तो तुम्हें मना किया था। अन्य विद्यार्थियों की बात का तुमने विश्वास क्यों नहीं किया। उनकी बात मान लेते तो तुम्हें इतनी अधिक तकलीफ का सामना नहीं करना पड़ता, तुम्हारी ऐसी हालत भी नहीं होती। जल में भी ईश्वर का वास है पर किसी जल को लोग देवता पर चढ़ाते हैं और किसी जल का लोग नहाने धोने में प्रयोग करते हैं। हमेशा देश, काल और परिस्थिति को ध्यान में रखकर ही आपना निर्णय लेना चाहिए।” सार - हमें दूसरों कि बात का अनुसरण तो जरुर करना चाहिए मगर विशेष परिस्थिति में अपने विवेक का प्रयोग करने से नहीं चूकना चाहिए। परिस्थितियों के अनुसार निर्णय को परिवर्तित करने में ही बुद्धिमानी है। *******
- संगत का प्रभाव
एक राजा का तोता मर गया। उन्होंने कहा- मंत्रीप्रवर! हमारा पिंजरा सूना हो गया। इसमें पालने के लिए एक तोता लाओ। तोते सदैव तो मिलते नहीं। राजा पीछे पड़ गये तो मंत्री एक संत के पास गये और कहा- भगवन्! राजा साहब एक तोता लाने की जिद कर रहे हैं। आप अपना तोता दे दें तो बड़ी कृपा होगी। संत ने कहा- ठीक है, ले जाओ। राजा ने सोने के पिंजरे में बड़े स्नेह से तोते की सुख-सुविधा का प्रबन्ध किया। तोता ब्रह्ममुहूर्त में बोलने लगा- जय भगवान,,, ओम् तत्सत्.... ओम् तत्सत् ... उठो राजा! उठो महारानी! दुर्लभ मानव-तन मिला है। यह सोने के लिए नहीं, भजन करने के लिए मिला है। चित्रकूट के घाट पर भई संतन की भीर। तुलसीदास चंदन घिसै तिलक देत रघुबीर।।' कभी रामायण की चौपाई तो कभी गीता के श्लोक उसके मुँह से निकलते। पूरा राजपरिवार बड़े सवेरे उठकर उसकी बातें सुना करता था। राजा कहते थे कि तोता क्या मिला, एक संत मिल गये। हर जीव की एक निश्चित आयु होती है। एक दिन वह तोता मर गया। राजा, रानी, राजपरिवार और पूरे राष्ट्र ने हफ़्तों शोक मनाया। झण्डा झुका दिया गया। किसी प्रकार राजपरिवार ने शोक संवरण किया और राजकाज में लग गये। पुनः राजा साहब ने कहा-- मंत्रीवर! खाली पिंजरा सूना-सूना लगता है, एक तोते की व्यवस्था करें! मंत्री ने इधर-उधर देखा, एक कसाई के यहाँ वैसा ही तोता एक पिंजरे में टँगा था। मंत्री ने कहा कि राजा साहब चाहते की ये तोता उन्हें मिले। कसाई ने कहा कि हम आपके राज्य में ही तो रहते हैं। हम नहीं भी देंगे तब भी आप उठा ही ले जायेंगे। मंत्री ने कहा-- नहीं नहीं, हमारी विनती है। कसाई ने बताया कि किसी बहेलिये ने एक वृक्ष से दो तोते पकड़े थे। एक को उसने महात्माजी को दे दिया था और दूसरा मैंने खरीद लिया था। राजा को चाहिये तो आप ले जाएं। अब कसाईवाला तोता राजा के पिंजरे में पहुँच गया। राजपरिवार बहुत प्रसन्न हुआ। सबको लगा कि वही तोता जीवित होकर चला आया है। दोनों की नासिका, पंख, आकार, चितवन सब एक जैसे थे। लेकिन बड़े सवेरे तोता उसी प्रकार राजा को बुलाने लगा जैसे वह कसाई अपने नौकरों को उठाता था कि.. उठ! हरामी के बच्चे! राजा बन बैठा है। मेरे लिए ला अण्डे, नहीं तो पड़ेंगे डण्डे! ये ही बात बार बार दोहराने लगा राजा को इतना क्रोध आया कि उसने तोते को पिंजरे से निकाला और गर्दन मरोड़कर किले से बाहर फेंक दिया। दोनों तोते, सगे भाई थे। एक की गर्दन मरोड़ दी गयी, तो दूसरे के लिए झण्डे झुक गये, भण्डारा किया गया, शोक मनाया गया। आखिर भूल कहाँ हो गयी ? अन्तर था तो संगति का ! सत्संग की कमी थी। संगत ही गुण होत है, संगत ही गुण जाय। बाँस फाँस अरु मीसरी, एकै भाव बिकाय।। पूरा सद्गुरु ना मिला, मिली न साँची सीख। भेष जती का बनाय के, घर-घर माँगे भीख। शिक्षा :- अपने बच्चों को उच्चशिक्षा के साथ साथ अच्छे संस्कार भी दीजिए ताकि वो जहां भी जाये सबका समान करे और अपने आचरण से खुद के साथ परिवार का नाम भी रोशन करे। ***********
- ग्रहण (Part 2)
लगभग बारह वर्ष पूर्व का वह दिन मेरी आँखों के सामने जीवंत हो उठा। मैं क्लीनिक में मरीज देख रही थी। एक दंपत्ति अपनी तेरह-चौदह साल की बेटी के साथ क्लीनिक पर आए। बच्ची दर्द में थी और एक ही बात बोले जा रही थी, ‘‘मुझे इंजेक्शन लगा दीजिए। मुझे मार दीजिए। मुझे नहीं जीना है।’’ रोते हुए उसके पिता ने बताया कि वह लोग एक रिश्तेदार के घर गृह प्रवेश में गए थे। बेटी का दसवीं का बोर्ड था तो वह अपने शिक्षक की प्रतीक्षा में घर पर ही रुक गई थी। हम जब शाम को लौटे तो बेटी इस हाल में मिली। वह शिक्षक दरिंदा निकला। वह हाथ जोड़कर बोले, ‘‘हम पुलिस के पास नहीं जाना चाहते डॉक्टर। उसका तो कुछ नहीं होगा हमारी लड़की बदनाम हो जाएगी। हम इसकी परीक्षा के बाद यह शहर ही छोड़ देंगे। हमारी मदद कर दीजिए।’’ मैं उनकी पीड़ा को समझ सकती थी। मेरे जेठ की बेटी इस हादसे से गुजरी थी। जेठ जी स्वयं पुलिस में थे। पर क्या लाभ हुआ पुलिस, कोर्ट, कचहरी इन सब का तनाव और समाज की हिकारत भरी नजर, वह बेचारी नहीं झेल पाई और साल पूरा होते-होते पंखे से लटक कर मर गई। मैं बच्ची के इलाज के साथ-साथ उसकी काउंसलिंग भी करने लगी। वह जब घबराती अपनी मम्मी के साथ मेरे पास आ जाती। फिर धीरे-धीरे अकेले आने लगी। दूसरे शहर जा कर भी वह फोन से संपर्क में रही। फिर एक दिन मैंने उससे कहा, ‘‘देखो बेटा तुम 12वीं में आ गई हो, और अब पूरी तरह से ठीक हो गई हो। तुम्हारे लिए जरूरी है कि तुम इस दुर्घटना को भूल जाओ। इसके लिए तुम्हें मुझे भी भूलना होगा।’’ ‘‘आपको ?....आपको कैसे भूल सकती हूँ मैं? मेरी माँ ने मुझे जन्म दिया है, पर यह नई ज़िंदगी आपकी दी हुई है।’’ वो कांपती हुई आवाज में बोली थी। ‘‘माँ कह रही हो तो माँ की बात मानो। सब कुछ भूल कर एक नई जिंदगी जियो। जब शादी करोगी तो मुझे जरूर बताना, मैं आऊंगी।’’ ‘‘शादी?...... मैं..... मैं ...मुझसे कौन शादी करेगा?’’ ‘‘क्यों तुमने कौन सा पाप किया है? तुम शादी करोगी और एक आम ज़िन्दगी जीओगी। बस इस दुर्घटना का जिक्र किसी से कभी नहीं करना। मैंने अपनी मेडिकल फाइल में भी तुम्हारा असली नाम नहीं लिखा है। उसमें तुम छाया हो। तुम अपने असली नाम के साथ आराम से जियो और आठ साल के लंबे अंतराल के बाद आज अचानक वही छाया, प्रिया के रूप में मेरे सामने थी। बेटे की आवाज से मैं वापस वर्तमान में लौट आई। ‘‘माँ, इसे क्या हुआ?’’ ‘‘डर गई है। बिना गलती के गिल्टी महसूस कर रही है।’’ प्रिया के सिर पर हाथ फेरते हुए मैंने जवाब दिया। ‘‘बिना गलती के कैसे? इसी की वजह से तो आप इतना थकीं।’’ प्रिया की ओर देखते हुए ऋतिक बोला। ‘‘.......... प्रिया सिर उठाकर अपलक ऋतिक को देख रही थी।’’ ‘‘अब तुम्हारी सजा ये है प्रिया, कि अब तुम माँ के लिए चाय बना कर लाओ और जो बचे उसमें से थोड़ी सी मुझे भी दे देना।’’ कमरे का वातावरण थोड़ा हल्का हो गया। तकिया की टेक के सहारे दोनों ने मुझे बैठा दिया। चाय पीते हुए मैंने प्रिया की ओर देखा। ‘‘प्रिया चाय तो तुमने अच्छी बनाई है। चलो रसोई में तुम पास हो गई। पर अभी तुम्हारी परीक्षा बाकी है। मेरी बहू बनने के लिए तुम्हें एक परीक्षा और पास करनी होगी।’’ प्रिया और ऋतिक दोनों एक दूसरे की ओर देखने लगे। ‘‘माँ?’’ ऋतिक हिचकता सा बोला। ‘‘तुम्हें ऐतराज है क्या?’’ ‘‘न, न....नहीं माँ।’’ ‘‘तुम्हें प्रिया?’’ नहीं... बिल्कुल नहीं। ‘‘ठीक है, फिर ऋतिक तुम अपने कमरे में जाओ मुझे अकेले प्रिया से बात करनी है। उसके बाद तुम्हें बुला लेंगे।’’ ‘‘जी’’ चकित सा ऋतिक खड़ा हो गया और प्रिया की ओर देखता हुआ बाहर चला गया। प्रिया अब सीधे मेरी ओर देख रही थी। “प्रिया, मुझे तुमसे एक वादा चाहिए।’’ ‘‘माँ, मुझ जैसी ग्रहण लगी लड़की को आप जानते बूझते हुए क्यों स्वीकार रही हैं अपने इतने लायक बेटे के लिए। आप मना भी तो कर सकती हैं।’’ क्यों मना करूंगी, तुम्हारे जैसी कोमल हृदय वाली बेटी, मेरी बहू बने यही तो हमेशा चाहा है मैंने। तुमसे, तुम्हारे साथ से, मेरे बेटे की खुशियाँ हैं। यह खुशी मैं उसे देना चाहती हूँ। बस एक वादा चाहिए तुमसे।’’ ‘‘कौन सा वादा माँ?’’ ‘‘कभी, किसी भी कमजोर पल में उस हादसे का जिक्र ऋतिक से नहीं करोगी। यही वादा चाहिए मुझे।’’ ‘‘इतनी बड़ी बात छुपाना क्या उचित होगा?’’ ‘‘प्रिया जिंदगी में बहुत से हादसे होते हैं। क्या हम हमेशा उनका बोझा पीठ पर ढोते रहते हैं? वे घट कर अतीत हो जाते हैं। यही होना भी चाहिए ।’’ ‘‘.....वह मौन मुझे देख रही थी। प्रिया, मेरा बेटा बहुत सुलझा हुआ है फिर भी मैं नहीं चाहती कि किसी अनचाहे अतीत का काला साया मेरे बेटे बहू के जीवन में बेचैनियाँ लाए। इसीलिये...।’’ ‘‘आपकी भावना समझ सकती हूँ। माँ, मैं आपसे वादा करती हूँ, मेरे मरने तक इस बात का जिक्र मेरी जुबान पर कभी नहीं आएगा।’’ प्रिया मेरा हाथ पकड़े हुए थी। ‘‘प्रिया, अपने मम्मी पापा से कहना कि जब वे आएंगे तो हम पहली बार मिल रहे होंगे। यह याद रखेंगे।’’ ‘माँ, आप बहुत महान हैं।’ भावुकता में प्रिया मेरे गले लग गई। प्यार से उसकी पीठ थपथपा कर मैंने कहा ,‘अब ऋतिक को बुला लो।’ प्रिया के साथ ऋतिक कमरे में आया तो उसके चेहरे पर प्रश्न साफ दिखाई दे रहा था। ‘तेरी प्रिया, मेरी परीक्षा में पास हो गई। यह चाँद सी सुंदर लड़की मुझे बहू के रूप में स्वीकार है।’ ‘चाँद में तो दाग होता है माँ। ग्रहण लगता है।’ ऋतिक ने प्रिया को छेड़ने के अंदाज में कहा। ‘चांद उस ग्रहण के साथ ही तो पूर्ण होता है बेटा। वैसे ही हम सब भी अनेक अच्छाई और बुराई के पुतले हैं और हमें एक दूसरे को संपूर्णता में स्वीकारना होता है। प्रिया हम दोनों को हमारी कमियों के साथ स्वीकारेगी और हम दोनों को भी प्रिया को उसकी सारी अच्छाई और सारी बुराई के साथ उसे स्वीकारना होगा।’ ‘मैं ..तो ...माँ...।” ‘मैं जानती हूँ। तू उसे छेड़ रहा है। ......अच्छा अब तुम दोनों रसोई से कुछ लाकर खिलाओ तो मुझे, भूख लग गई है।’ उठते हुए प्रिया बोली, ‘मैं लाती हूँ माँ।’ ‘........और हां प्रिया, अपने मम्मी-पापा से बोलना मुझसे जल्दी आकर मिलें। और उन्हें यह भी बता देना कि मुझे शादी की जल्दी है।’ ऋतिक और प्रिया के चेहरे खिल उठे और दोनों मुस्कुराते हुए कमरे से बाहर चले गए। समाप्त *********************
- ग्रहण (Part 1)
कल से मेरे पैर धरती पर नहीं पड़ रहे हैं। रात उत्तेजना के मारे नींद नहीं आई। इस पल की कितनी प्रतीक्षा थी मुझे। रात जब खाने के बाद ऋतिक मेरे कमरे में आया तो मुझे लगा शायद उसे कुछ चाहिए। मेरे पूछने पर उसने अपनी दोनों बाहें मेरे गले में डाल दीं। ‘‘नहीं माँ, मुझे कुछ बताना था आपको।’’ शर्म से गुलाबी हो आए उसके गोरे मुखड़े को देखकर मेरे चेहरे पर प्यार भरी मुस्कान तैर गई। तो तुझे मेरी बहू मिल गई।’’ ‘‘अगर आप उसे स्वीकारेंगी तो.....।’’ वह सीधे मेरी आंखों में देख रहा था। ‘‘तू जानता है, तेरी खुशी से बढ़कर मेरे लिए और कुछ भी नहीं। कौन है वह खुशनसीब, जिसने मेरे बेटे के दिल की घंटी बजाई है?’’ बेटे के गाल पर प्यार की चपत लगाते हुए मैंने पूछा। ‘‘माँ, प्रिया नाम है उसका। मेरे साथ एमबीए किया है उसने। हम ढाई साल से एक-दूसरे को जानते हैं और पसंद करते हैं। उसको भी अपने शहर में अच्छी नौकरी मिल गई है।’’ ‘‘कब मिलवाओगे?’’ मेरा सीधा प्रश्न था। ‘‘माँ, कल सुबह नाश्ते पर बुला लेता हूँ।’’ ‘‘बुला नहीं लेता हूँ। जाकर ले आना उसे। अब जा सो जा।’’ मेरी आँखें, मेरा स्वर सब खुशी में डूबा हुआ था। रात करवटें बदलते कटी और सुबह चार बजे ही मैंने बिस्तर छोड़ दिया और रसोई में घुस गई। मन करता यह भी बना लूँ, वह भी बना लूँ। सात बजे तक मेरी रसोई तरह-तरह के पकवानों से महकने लगी। ‘‘माँ, क्या-क्या बना लिया आपने? पूरा घर महक रहा है। आप क्या रात भर बनाती रही हैं?’’ आश्चर्य और प्यार दोनों ऋतिक के स्वर में था। ‘‘मेरी बहू पहली बार आ रही है। यह दिन एक बार ही आता है। तुम चाय पियो मैं नहा कर आती हूँ।’’ ऋतिक के जाने के बाद मैंने हल्के गुलाबी रंग की साड़ी पहनी। सच्चे मोती की माला और टॉप्स पहनकर शीशे के सामने खड़ी हुई और अपने कटे हुए बालों में ब्रश करने लगी। आज कितने सालों बाद सिंगार करने का मन हुआ था मेरा। ‘‘माँ-माँ ......’’ ऋतिक के स्वर से मैं चौंक गई। ‘‘माँ, प्रिया आ गई।’’ ऋतिक मेरे सामने खड़ा था। ‘‘अरे, दरवाजा किसने खोला?’’ ‘‘खुला था माँ, शायद आप बंद करना भूल गईं थीं।’’ ‘‘हां यही हुआ होगा।” बैठक में घुसते ही प्रिया से मेरी नजर मिली और हम दोनों ही जड़ हो गए। मेरे पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई। लगा जैसे पूरा कमरा घूमने लगा है। खुद को संभालना मुश्किल हो गया। ऋतिक ने सहारा देकर मुझे बैठाया। माँ,...माँ... क्या हुआ आपको?’’ मैं चेतना शून्य होती जा रही थी। बंद होती आँखों से देखा ऋतिक और प्रिया दोनों मेरे ऊपर झुके हुए थे, और मुझे पुकार रहे थे। मुझे उनकी आवाजें दूर से आती प्रतीत हो रही थीं। जब होश आया तो देखा मैं अपने पलंग पर लेटी हुई थी। ऋतिक और प्रिया के साथ साथ डॉ. रजत भी मेरे कमरे में बैठे हुए थे। ‘‘माँ, क्या हुआ आपको?’’ परेशान ऋतिक की आँखें डबडबाई हुई थीं। मेरा हाथ उसके हाथ में था। ‘‘बेटा, मैं ठीक हूँ।” ‘‘डॉक्टर रागिनी, आप दोस्त को तो डॉक्टर मानती ही नहीं हैं। मैंने कितनी बार आपसे कहा थोड़ा अपनी सेहत का ध्यान रखिए। पर......‘‘डाक्टर रजत फिर से उठकर डाक्टर रागनी का ब्लडप्रेशर नापने लगे। ‘‘मम्मी की तबीयत खराब चल रही थी? पर अंकल मम्मी ने तो कुछ भी नहीं बताया कभी। क्या हुआ है उन्हें?’’ ऋतिक परेशान हो उठा। ‘कुछ नहीं बेटा, तेरे रजत अंकल ऐसे ही बोलते रहते हैं।’ मैंने बेटे का हाथ स्नेह से दबाया। ‘‘कोई यूं ही बेहोश नहीं हो जाता मम्मी। अंकल आप बताइए ना?’’ ऋतिक बहुत परेशान था और इस परेशानी में प्रिया को भी भूल गया था। जो मेरे पैरों के पास चुपचाप बैठी हुई थी और मुश्किल से अपने आंसुओं को संभाले थी। ‘‘इतना परेशान होने वाली भी बात नहीं है ऋतिक। तुम्हारी मम्मी को थोड़ा आराम करने की जरूरत है। बहुत थका देती हैं खुद को। वैसे पूरा चेकअप करा लेना हमेशा अच्छा होता है। मैंने कुछ टेस्ट लिख दिए हैं। करा लेना। इतना ब्लड प्रेशर बढ़ना ठीक बात नहीं है।’’ ऋतिक की पीठ थपथपा कर रजत बोले। ‘‘जी अंकल।” ‘‘अच्छा अब सब कंट्रोल में है। मां को आराम कराओ। परेशान मत हो। मैं चलता हूँ। वैसे अब जरूरत नहीं पड़ेगी पर मैं एक फोन कॉल की ही दूरी पर हूँ।’’ उठते हुए डॉ. रजत बोले। ‘‘अरे , अंकल चाय......।’’ ‘‘मम्मी को ठीक होने दो, फिर साथ में पीते हैं।” ‘‘प्रिया, मम्मी का ध्यान रखना। मैं अंकल को छोड़ कर आता हूँ।’’ कहते हुए ऋतिक कमरे के बाहर चला गया। ‘‘सॉरी आंटी, मुझे बिल्कुल नहीं पता था कि ऋतिक आपका बेटा है।’’ उसकी आँख अब बरसने लगी थी। “प्रिया, मेरे पास आओ।’’ मैंने उसका हाथ अपने हाथ में ले लिया, ‘‘आंटी, नहीं प्रिया, माँ बोलो।’’ वह फफक-फफक कर रोने लगी और अपना सिर मेरे सीने पर रख दिया। स्नेह से मैं उसके सिर पर हाथ फेरने लगी। अतीत मुझ पर हावी होता जा रहा था। क्रमशः………….. *********************








