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  • रूसेड़ी बीनणी

    जब कभी कुछ भी न चल रहा होता है, तब बहुत कुछ मौन होकर घटा करता है। हर घटनाओं का अंत दुखांत हो यह जरूरी नहीं। अचानक आँख खुली...! अरे! रात के ढाई बज गये। एकल स्लीपर सीट पर सोया-सोया गूलल मैप पर देखा जोधपुर आ गया क्या? कंडेक्टर ने आवाज दी......पावटा, राई का बाग, जोधपुर वाले आ जाओं। तुरंत नीचे उतर गया सीट से। और बस से नीचे आ गया। 13 दिन पहले आया था तो पता था रास्ते का। राई बाग बस स्टेण्ड पर आ गया। और वहाँ कुर्सियों पर घोड़े बेच कर तो क्या थे ही नहीं बेचने को, लेकिन सो गया। 5 बजे उठा। 30 रूपयें देकर सुलभ शौचालय में तरोताजा होकर आया। वापस घर लौटने की टिकट बनवाई। जेब में रूपये 40 बचे थे। तो एटीएम से रूपये निकाल कर टिकट बनवाई। थोड़ी देर बाद.....! जिसका इंतजार था बार-बार फोन चेक कर रहा था। वही हुआ...! कभी-कभी चिंताओं के घेरें में जकड़ा आदमी भी बहुत खुश होता है क्योंकि वहाँ कोई प्रतिशोध या विषाद नहीं होता इसलिए कुछ चिंताओं का परिणाम सुखदायी होता है। पहुँच गये क्या गुड़िया के पापा...! तबीयत तो ठीक है न आपकी, गले में आराम आया थोड़ा बहुत। आराम से जाकर वापस आ जाओं....! हाँ! पहुँच गया। रात ढाई बजे उतर गया था। तबीयत ठीक है। तुम कैसी हो! दवा ले रही हो न! भूल तो नहीं रहीं न लेना। ना ओ! खाना जल्दी खाना सीख लो। तेरी आदत है देर से खाना खाने की। हूँ खास्यूँ। पेट में बेबी लात मारसी तेर्र बी न भूख लाग सी जणा।फेर्र मन्न बोल्ल सी थारों बेबी मेर्र लात मार्र। (वो मैसेज टाईप कर रही थी......) मैं बार-बार उस मैसेज को पढ़ रहा था। जो सिर्फ मैसेज भर न था। सुबह उठते ही पूछना अपने पति से 'आप कैसे है?' गुड़िया के पापा!..... जाकर वापस आ जाओं! कितनी भावुक होगी जब उसने ऐसा कहा....! जाकर वापस आ जाओं.....! इंतज़ार करती बैचेन आँखें, हृदय में एक सूनापन पति के पास न होने पर! क्या समझ सकेगा पुरूष अपनी पत्नी के हृदय के मर्म को या शब्दों के छल में ही बेवकूफ बनाता रहेगा हमेशा। मेरी पत्नी सबसे अच्छी है, और नहीं तो कम से कम मुझसे तो अच्छी है इसमें कोई संशय है। (इतने में मैसेज आया) 'मैं थार सूँ कोनी बोलूँ, मैं रूसेड़ी हूँ।' क्या! कल की रूसी हुई है तू! हाँ! थार्र के फर्क पड़्ड़ है! क्यूँ रूसी तो,मन्न तो बेरो कोनी क्यूँ रूसी तू। बता न के बात होई,प्लीज! मेरी सयाणी प्यारी सी बावली है न। बता न! ओ गुड़िया की मम्मा! थार के फर्क पड़े है? मन्न मनाया भी कोनी....! क्या हुआ होगा! मैंने क्या कहा ऐसा! कुछ समझ में नहीं आ रहा। वो रूठी है पर क्यों! क्या हृदय की कोमलता पर मैंने कोई आघात किया या मेरे किसी व्यवहार से,बात से कोई चोट पड़ी दिल को। फ्लैशबैक में जाकर सोचता हूँ तो कुछ याद नहीं आ रहा। पत्नी कहाँ बेवजह रूठी होगी,कुछ तो है जिसका मुझे आभास ही नहीं, पर मूर्खों को कहाँ कुछ याद रहता है वो तो बकते रहते है बस। कोई बीज वाक्य कहाँ उनके पास होते है। ऐ गुड़िया की मम्मा! मान जा न। मेरी प्यारी पत्नी है न, सॉरी! बस! रहने दो। आपको पता नहीं तो सॉरी क्यों बोल रहे है। तू सच में नाराज है। हाँ! उसने प्यार का संदेश भेजा गुड़िया के पापा को। ओ! मतलब तुम मुझसे प्यार नहीं करती गुड़िया के पापा को प्यार करती हो। हाँ! गुड़िया के पापा को करती हूँ प्यार! आपसे नहीं। चोखो जणा रह तू रूसेड़ी! मैं कर ही स्यूँ प्यार! मैं कोनी रूस्यों तू रूसी है। वो खुश हो गई। चूमने वाला ईमोजी भेजी। हूँ! अब मन्न बेरो पड़गो तू रूसेड़ी कोनी,बस! मजा ले है मेरा! ना! सच में रूठी हूँ। ठीक है जणा मैं सर(उसके जीजाजी) ने फोन कर कह दे स्यूँ ' म्हाली बावली तो रूसगी' कुण मन्ना कर्यो थान्न। अभी करो! ना! न कर सकूँ जणा तू बोल्ल कह दो। कह दो कोई कोनी मन्ना करें। (मैंने मुँह फुलाया झूठमूठ। पर उसको नहीं पता) दीदी कन्न मेरा फोन नं. है। ना! मेरे पास तो है। मैं दीदी को फोन कर कह देस्यूँ, छोटी दीदी के मोबाइल नम्बर है पास। मैं कह दूँगा। फिर ले दीदी चिड़ायेगी रोज तुमको। हूँ! कह दो।(उसको पता है मेरे पास नम्बर नहीं है।) ओ रूसेड़ी बीनणी! मान भी जा। वरना मैं कहानी लिख दूँगा। 'रूसेणी बीनणी' छपवा भी दूँगा। लिख दो! छपा दो! मैं सेमिनार में शोधपत्र पढ़ते समय बोल दूँगा मेरी बावली रूसरी है। हूँ! कह दियों। मन्न कोई कोनी जाण्ण। ऊई! ये तो है। गुड़िया की मम्मा मान जा न। अब थे जाओं। सेमिनार अच्छे से अटेंड करना। मूड ऑफ मत करो। मैं ठीक हूँ। ओ रूसेड़ी बीनणी। रूसरी भी है और बोल्ल भी है। कितनी प्यारी हो रूप तुम। मेरी रूप मुझे बहुत प्रिय है। बस! बस! मसको मत लगाओं। ठीक है। गुड़िया के पापा मैं अब काम करूँगी। सेमिनार की अच्छे से तैयारी कर लो। नाश्ता तो कर लिया न। मैं सोचने लग गया। पत्नी का संसार पति के संसार से बिल्कुल विपरीत होता है। पत्नी रूठी हो फिर भी अपने पति, बच्चें, सास-ससुर घर भर की जिम्मेदारी निभाती है भले हीं आँखों की कोर में आँसुओं का सागर लहराता हो, उसका आँचल हमेशा से प्रेम से भीगा रहता है। पुरूष कितना निष्ठुर और कर्कश होता दो मीठे बोल भी नहीं बोल सकता। सुधरना पड़ेगा मुझे तो! पर सुधारूँ क्या समझ नहीं आ रहा। उदासी तो नहीं पर मन में अजनबीपन स्वयं के प्रति अवश्य उभर आया। उदास मेरी बावली होने नहीं देती।भले। उदासी झलकने से पहले ही प्रेम का लेप लगा देती है और मुझे पता भी नहीं चलता उनकी मन की दशा का। औढ़ लेती है प्रेम की चादर और छुपा लेती है वो मर्म जिनसे पुरूष का व्यक्तित्व तिरोहित हो जाता है किन्तु स्त्री देवी की पदवी तक पहुँच जाती है। मन में कितना कुछ चल पड़ा। पत्नी रूठी है फिर भी चिंता है उसे अपने जीवन को छोड़ सबकी। मैं उसे जब-जब बावली कहता हूँ वो खुशी से झूम उठती है। परिन्दें की भाँति आकाश में उड़ना चाहती है। मैं कहता हूँ तुम बहुत मीठी हो तो बोलती है मैं तो तीखी हूँ सब यही समझते है। मैं कहता हूँ मीठा मीठे का स्वाद कैसे जाने। तो बोलती है, थे ही हो मीठा मैं तो तीखी हूँ। तुम बहुत प्यारी हूँ रूप! जिन्होंने तुमको कुछ न समझा,मैंने उसको कुछ न समझा। वो खुश हो जाती है वो चाहती मेरा एकनिष्ठ अनन्य समर्पित प्रेम। वो जानती है सीधी-साधी प्रेम की भाषा,निश्छलता बच्चों सी, चहती है चिड़िया-सी सारे दिन। मेरे घर संसार जीवन को महकाया करती है। जब वो रूसेड़ी बीनणी होती है तब पता नहीं लगने देती वो रूसी हुई है वो जिस दिन ज्यादा प्रेम प्रकट करती तब पता लगता है वो रूसी हुई है। संसार भर के पुरूष स्त्री को अपने-अपने नजरियें से देखते है और उसी के अनुकूल उसे ढालते है, स्त्री के नजरियें से पुरूष का ढलना ही पुरूषार्थ का सबसे बड़ा धर्म है। *******

  • पर्यावरण प्रदूषण एक चिंतनीय विषय

    "अरे सुरभि क्या हुआ कल से तुम मुंह फुला कर क्यों बैठी हो, कुछ तो बताओ। देखो, इतने सुंदर चेहरे पर उदासी बिल्कुल नहीं फबती, तुम तो हंसती खिलखिलाती हुई ही अच्छी लगती हो। सुबह से शाम तक तुम्हारी बक-बक सुनकर ही दिल को चैन आता है या यूं कहो कि तुम्हारी आवाज जिस दिन ना सुनूं, उस दिन मेरा दिन ही अच्छा नहीं जाता", सोमेश ने सुरभि को प्रेमपूर्वक छेड़ते हुए कहा। सोमेश की इस बात के जवाब में सुरभि मुंह बनाने लगी। "जाओ सोमेश,ज्यादा बातें न बनाओ, मुझे तुमसे कोई बात नहीं करनी, एक तो इतना बड़ा कॉन्ट्रैक्ट तुमने यूं ही हाथों से जाने दिया, इतना बड़ा नुकसान हुआ है हमें, क्या तुम्हें इस बात का अंदाजा नहीं। वैसे तो दुनिया भर में एक सफल व्यापारी होने का तमगा लिए फिरते हो, पर इतना सुनहरा अवसर तुमने जानबूझकर गंवा दिया। जाओ मुझे तुमसे कोई बात ही नहीं करनी, कहते हुए सुरभि ने सोमेश का हाथ दूसरी तरफ झटक दिया। सोमेश ने सुरभि को प्यार से समझाया, "देखो सुरभि, तुम्हारी बात बिलकुल ठीक है। मैं मानता हूं कि यह कॉन्ट्रैक्ट ना लेने से हमारा बहुत बड़ा नुकसान हुआ है, परंतु क्या यह सच नहीं है कि हमारे इस नुकसान के सामने पर्यावरण को होने वाला नुकसान बहुत बड़ा होता जिसकी भरपाई हमारे साथ-साथ हमारी आगे आने वाली पीढ़ियों तक को भी करनी पड़ती। यदि मैं यह कॉन्ट्रैक्ट ले लेता तो एक बार फिर न जाने ना कितने ही पेड़ कटते और खेती योग्य भूमि को उद्योग में तब्दील करने के लिए एक बार फिर धरती माता का शोषण होता, एक बार फिर प्रकृति चीत्कार उठती। पर्यावरण और प्रकृति का वह करूणा भरा रूदन स्वर मैं नहीं सुन पाता और मेरे मन में सदा-सदा के लिए एक टीस और पश्चाताप रह जाता कि मैं अपने पर्यावरण को प्रदूषित होने से नहीं बचा पाया, अपितु मैंने तो जानबूझकर प्रकृति को प्रदूषित करने में अपना योगदान दिया है।" प्रकृति के प्रति सोमेश का अगाध प्रेम और चिंता देखकर सुरभि की आंखों में आंसू आ गए। अब उसे अपने पति पर अति गर्व महसूस हो रहा था। सोमेश की पीठ थपथपाते हुए सुरभि ने जो कहा वह नितांत सराहनीय है। सुरभि के शब्द थे, "उमेश, आज मुझे तुम पर बहुत ज्यादा गर्व महसूस हो रहा है। आज के आधुनिक युग में जहां पैसा कमाने की दौड़ में हर इंसान अंधा हो चला है और अपने इस अंधेपन में उसे यह भी नजर नहीं आता कि तरक्की और प्रगति हासिल करने की होड़ में वह अपने ही पर्यावरण को दूषित कर रहा है, अपनी ही प्रकृति की सुंदरता को खराब कर रहा है, वहां तुम हर संभव प्रयास कर रहे हो कि पर्यावरण और प्रकृति संरक्षित रहे इसे थोड़ा सा भी नुकसान ना पहुंचे।" "आज के समय में जहां लोग इंसानों तक के बारे में नहीं सोचते, वहां तुमने प्रकृति के बारे में सोचा और इतना अच्छा सोचा, यह देख कर आज मैं फूली नहीं समा रही हूं। अब मैं तुमसे बिल्कुल नाराज नहीं हूं, अपितु मैं स्वयं भी प्रण लेती हूं कि आज के बाद मैं प्रकृति के संरक्षण और पर्यावरण को प्रदूषण से बचाने के लिए हर संभव प्रयास करूंगी। मैं न तो स्वयं ऐसा कोई कार्य करूंगी जिससे प्रदूषण फैले और न ही किसी अन्य को ही ऐसा कोई कार्य करने दूंगी।" ******

  • खाली कागज का कमाल

    तुषार भूख से व्याकुल था। सुबह से चाय तक पीने को नहीं मिली थी। इस अनजान जगह में अपहरण करके लाए हुए चार दिन हो चुके थे किंतु वह अभी तक अपने उस अपहरणकर्ता को ढंग से पहचान भी नहीं पाया है। पहचाने भी कैसे, उसका लगभग आधा चेहरा तो बड़े फ्रेम के काले चश्मे में छिपा रहता है। मम्मी-पापा, पप्पू-सोनू, दादी माँ चार दिन से कितने परेशान होंगे। किसी से खाना भी नहीं खाया गया होगा। पापा ने शायद अखबार में फोटो निकलवाया होगा। थाने में भी रिपोर्ट लिखाई होगी। सोचते-सोचते वह फिर रोने लगा। वह भी कितना पागल था, जो बातों में आ गया। इस तरह अपहरण करके ले जाने के कितने क़िस्से-कहानियाँ वह पढ़ता-सुनता रहा है फिर भी अपना अपहरण करा बैठा। हैड मास्टर साहब ने बुलाकर कहा था, "तुषार तुम्हारे घर से किसी का फोन आया है कि आज ड्राइवर कार लेकर तुम्हें लेने नहीं आ सकेगा वे फैक्ट्री के रमेश नाम के नौकर को भेज रहे हैं, वह काला चश्मा लगाता है, तुमको पहचानता भी है, उसके साथ टैक्सी करके आ जाना।' छुट्टी के समय स्कूल के गेट पर पहुँचते ही काला चश्मा लगाए हुए एक आदमी आगे आया "चलिए छोटे साहब।' "तुमने मुझे कैसे पहचान लिया,...मैंने तो तुम्हें पहले कभी नहीं देखा।' "पहले मैं चश्मा नहीं लगाता था। कुछ दिन पहले आँख का ऑपरेशन करवाया है, तभी से लगाने लगा हूँ. इसीलिए आप नहीं पहचान पा रहे हैं।' "चलो जल्दी से टैक्सी पकड़ो। बहुत ठंडी हवा है, सर्दी लग रही है।' पास में खड़ी एक टैक्सी में वे बैठ गए थे जिसे एक सरदार जी चला रहे थे। तभी उसने चौंक कर कहा - "रमेश टैक्सी गलत रास्ते पर जा रही है।' "खैर चाहते हो तो चुपचाप बैठो, खबरदार जो शोर मचाया।' टैक्सी के चारों तरफ के शीशे बंद थे। चिल्लाने पर भी आवाज बाहर नहीं जा सकती थी। इसीलिए वह सहम कर चुप हो गया। न जाने कितनी सड़कें, चौराहे, गलियाँ, मोड़ पार करने के बाद एक सुनसान जगह कुछ खँडहरों के बीच टैक्सी उन्हें उतार कर चली गई। एक-दो घंटे बाद रात घिर आई थी। चारों तरफ गहरा अंधेरा था। एक-दूसरे को ठीक से देख पाना भी मुश्किल था। तब उसे बहुत पैदल चलना पड़ा, उसके बाद एक कोठरी में बंद कर दिया गया था। दरवाजे पर ताला खुलने की आवाज से उसका ध्यान भंग हुआ। उसने अंदाजा लगाया कि चश्मे वाला आदमी खाना लेकर आया होगा, दरवाजा खुलने के साथ ही हल्का सा प्रकाश भी कमरे में घुस आया। उसकी नजर चश्मे वाले के पैरों पर पड़ी। उसके दोनों पैरों में छह-छह उँगली थीं। तभी उसे अपने घर में काम कर चुके एक नौकर रमुआ का ख्याल आया। उसने अपने मम्मी-पापा से सुना था कि उसके हाथ-पैरों में छह-छह उँगलियाँ थीं... रंग गोरा था, एक आँख की पुतली पर सफेदी फैली थी। जब वह स्वयं चार-पाँच वर्ष का था तभी अलमारी में से गहने निकालते हुए मम्मी ने रमुआ को पकड़ा था...पापा के आने तक वह भाग चुका था। रमुआ की उसे याद नहीं है पर अब वह चश्मे में छिपी उसकी आँखें देखना चाहता था। वह कागज में रोटी- सब्जी रख कर उसे खाने को दे गया था। दरवाजे में कई सुराख थे जिसमें से काफी रोशनी अंदर आ सकती थी किंतु उस पर बाहर से किसी कपड़े का पर्दा डाल दिया गया था जिससे कमरे में अंधेरा रहता और वह बाहर भी नहीं देख सकता था। भूख उसे तेजी से लगी थी। मोटी-मोटी रोटियों को छूते ही उसे फिर माँ याद आ गई। माँ के हाथ के बने करारे परांठे याद आ गए। मन न होते हुए भी उसने रोटी खाई व लोटे से पानी पी गया। अभी वह गिलास में चाय देकर बाहर निकला ही था कि कमरे में रोशनी की एक रेखा देखकर उसने किवाड़ की दरार से बाहर झाँका। वह आदमी चश्मा हाथ में लिए सरदार से बातें कर रहा था। यह देखकर उसकी खुशी का ठिकाना न रहा कि उसकी एक आँख खराब थी उसमें सफेदी फैली थी। उसने प्रसन्नता से अपनी पीठ स्वयं थपथपाई कि वह भी कहानी के पात्रों जैसा नन्हा जासूस हो गया है। तभी उसकी आशा पुन: निराशा में बदल गई। ठीक है उसने जासूसी करके अपहरणकर्ता का पता लगा लिया है, उसे पहचान लिया है लेकिन क्या फायदा.. यह जानकारी वह घर या पुलिसवालों तक कैसे पहुँचाए, पाँच दिन हो चुके हैं। किसी भी दिन यह मुझे मार डालेंगे। वह फिर सुबकने लगा। किवाड़ों पर हुई खटपट की आवाज सुनकर उसने सोचा, अभी तो वह चाय देकर गया था पुन: क्यों आ रहा है.. क्या पता कहीं दूसरी जगह ले जाए या हो सकता है मार ही दे। चश्मे वाले ने उसके हाथ में एक लिफाफा थमाया और कहा, "पेन तुम्हारे बस्ते में होगा, कागज भी होगा। अपने पापा को पत्र लिखो कि जिंदा देखना चाहते हैं तो माँगी हुई रकम बताई हुई जगह पर पहुँचा दें। पुलिस को बताने की कोशिश हर्गिज़ न करें वर्ना बेटे को हमेशा के लिए खो देंगे।' किसी के खाँसने की आवाज सुन कर वह बाहर जाते हुए बोला, "दरवाजे का पर्दा हटा देता हूँ, कमरे में रोशनी हो जाएगी। जल्दी से पत्र लिख दो, लिफाफे पर पता भी लिख दो, मैं अभी आकर ले जाऊँगा।' "वाह बेटे, तुम तो बहुत तेज हो। जैसा मैंने कहा था वैसा ही लिख दिया। पत्र को खाली कागज में क्यों लपेट दिया है ?' उसने कागज को उलट-पलट कर देखते हुए कहा। "थोड़ी देर पहले आप कह रहे थे बादल हो रहे हैं, पानी बरस सकता है। इसीलिए पत्र को खाली कागज में लपेट दिया है। लिफाफा भीग भी जाए तो पत्र न भीगे। अक्षर मिट गए तो पापा पढ़ेंगे कैसे। फिर मुझे कैसे ले जाएँगे।' "शाबाश ठीक किया तुमने।' पत्र गए तीन दिन हो चुके थे। इस बीच वह सोते-जागते तरह-तरह की कल्पनाएँ करता रहा था। सपने में कभी उसे चश्मे वाला छुरा लिए अपनी तरफ आता हुआ दिखता। कभी सब बीमार माँ के पास बैठे हुए दिखाई देते। कभी उदास खड़े पापा दिखते, कभी रोती हुई बहन दिखती। तभी उसे एक तेज आवाज सुनाई दी- "तुषार... तुषार, तुम कहाँ हो' अरे यह तो पापा की आवाज है। वह चौंक कर उठा और दरवाजा पीटने लगा -" पापा मैं यहाँ हूँ, इस कोठरी में।' तभी ताला तोड़ने की आवाज आई। दरवाजा खुलते ही पहले दरोगा जी अंदर आए फिर पापा आए। वह पापा से लिपट कर जोर-जोर से रोने लगा।...पापा भी उसे सीने से लगाए रो रहे थे - "मेरे बेटे मैं आ गया, तू ठीक तो है न?' घर जाते हुए उसने रास्ते में पूछा - "पापा उस दिन कार मुझे लेने क्यों नहीं आई थी।' "बेटे फोन पर किसी ने कहा था कि आज स्कूल में फंक्शन है। तुषार को लेने के लिए कार दो घंटे लेट भेजना, ऐसा कई बार हो चुका है... हमें क्या पता था कि धोखा हो सकता है।' घर पर उसे देखने वालों की भीड़ इकट्ठी थी। सब इतने खुश थे, जैसे कोई उत्सव हो। सबको मिठाई बाँटी जा रही थी। तभी उसने पूछा- "मम्मी उस घर का पता कैसे लगा?' "जब अपहरणकर्ता का ही पता लग गया फिर उसके घर का पता लगाना कौन सा मुश्किल था।...सब तेरे उस पत्र के साथ आए खाली कागज का कमाल है।' "माँ, उस कागज को पढ़ा किसने ? मैंने तो अंधेरे में तीर मारा था। मुझे उम्मीद नहीं थी कि कोई उसे पढ़ पाएगा।' पप्पू ने गर्व से सीना फुलाकर कहा - "भैया मैंने पढ़ा था।' "तूने! तूने कैसे पढ़ा ?' "चार-पाँच दिन पहले तुम्हारे दोस्त संदीप भैया आए थे। उदास थे, बहुत देर बैठे रहे। वही बता रहे थे कि अपहरण वाले दिन उन्होंने तुम को एक पेन्सिल दी थी जिसका लिखा कागज पर दिखाई नहीं देता। उन्होंने पढ़ने की तरकीब भी बताई थी। तुम्हारे पत्र के साथ आए खाली कागज को पापा ने उलट-पलट कर बेकार समझ कर फेंक दिया था। मैं तब खाना खा रहा था। मुझे संदीप भैया की बात याद आ गई। मैंने कागज उठा लिया और उस पर दाल की गर्म कटोरी रख कर घुमादी।....देखते ही देखते कागज पर लिखे तुम्हारे अक्षर चमकने लगे। बिना पढ़े ही मैं उसे लेकर पापा के पास गया। पत्र से पता लग गया कि अपहरण रमुआ ने किया है फिर क्या था, घर में हलचल मच गई। पापा तभी पुलिस स्टेशन गए और उनकी सहायता से तुम्हें ढूँढ़ लाए।' तभी पापा खुशी से चहकते हुए घर में घुसे और कुर्सी पर आराम से बैठते हुए बोले- "साला रमुआ भी पकड़ में आ गया है।' फिर कुछ ठहर कर पूछा - "तुषार बेटे उस खाली कागज का रहस्य क्या था?' "भैया क्या वह जादू की पेन्सिल थी?' "अरे नहीं, जादू कैसा, असल में वह पेन्सिल मोम की थी इसीलिए उसके लिखे अक्षर कागज पर दिखाई नहीं दे रहे थे। पप्पू ने उस पर गर्म कटोरी रख दी, गर्मी पाकर मोम पिघल गया और अक्षर स्पष्ट दिखने लगे, यही उसका रहस्य था।' "भाई कुछ भी हो खाली कागज ने कमाल कर दिखाया। वर्ना पता नहीं तुझे फिर से देख भी पाते या नहीं।' माँ की आँखों में हर्ष के आँसू थे।' *****************

  • जीवन की प्राथमिकताएं

    शिक्षक ने आज कक्षा में प्रवेश करते ही मेज पर एक बड़ा सा खाली शीशे का जार रख दिया। शिक्षक ने जार को पत्थर के बड़े-बड़े टुकड़ों से भर दिया। जार को पूरा भरने के बाद उन्होंने छात्रों से पूछा क्या जार भर गया है? इस पर सभी छात्रों ने सामूहिक शब्दों में कहा “हाँ, जार भर गया है।” तब शिक्षक ने छोटे-छोटे कंकड़ो से भरा एक डिब्बा उठाया और उन्हें जार में भरने लगे। जार को थोडा हिलाने पर ये कंकड़ पत्थरों के बीच व्यवस्थित हो गए। एक बार फिर उन्होंने छात्रों से पूछा कि क्या जार भर गया है? सभी ने पुनः हाँ में उत्तर दिया। तभी शिक्षक ने एक रेत से भरा डिब्बा निकाला और उसमें भरी रेत को जार में डालने लगे। रेत ने बची-खुची जगह भी भर दी। एक बार फिर उन्होंने पूछा कि क्या जार भर गया है? इस बार सभी ने एक साथ उत्तर दिया, “हाँ, अब तो यह पूरी तरह भर गया है।” लेकिन अब शिक्षक ने पानी से भरी एक बोतल को इस जार में उड़ेल दिया। शिक्षक छात्रों को संबोधित करते हुए बोले कि देखो छात्रों, जार ने एक बोतल पानी को भी अपने अंदर समा लिया। ऐसा कह कर शिक्षक ने छात्रों को समझाना शुरू किया, “मैं चाहता हूँ कि आप इस बात को समझें कि ये जार आपके जीवन का एक प्रतिबिंब है। बड़े-बड़े पत्थर आपके जीवन की ज़रूरी वस्तुएं हैं- जैसे आप का परिवार, आपका जीवन साथी, आपके माता पिता, आपका स्वास्थ्य इत्यादि। यह सभी ऐसी वस्तुएं है कि अगर आपकी बाकी सारी वस्तुएं खो भी जाएँ और सिर्फ ये रहे तो भी आपकी ज़िन्दगी पूर्ण रहेगी। जार में पड़े छोटे कंकर उन वस्तुओं को दर्शाते हैं जिनकी हमारे जीवन में आवश्यकता तो है परंतु यदि प्राथमिकता के तौर पर देखा जाए तो ऐसी वस्तुओं को हम दूसरी श्रेणी की प्राथमिकता में रख सकते हैं जैसे हमारी नौकरी, हमारी कार, हमारी साइकिल इत्यादि। जार में पड़ी रेत और पानी बाकी सभी छोटी-मोटी चीजों को दर्शाती हैं। अगर आप जार को पहले रेत और पानी से भर देंगे तो कंकडों और पत्थरों के लिए कोई जगह नहीं बचेगी। यही आपके जीवन के साथ होता है। अगर आप अपना सारा समय और उर्जा छोटी-छोटी चीजों में लगा देंगे तो आपके पास कभी उन चीजों के लिए समय नहीं होगा जो आपके जीवन के लिए परम आवश्यक हैं। उन चीजों पर ध्यान दीजिये जो आपके जीवन की खुशी के लिए आवश्यक है। अपने बच्चों के साथ खेलिए, अपने जीवन साथी के साथ घूमने जाइए, अपने परिवार के साथ देशाटन पर जाइए और खूबसूरत छुट्टियां बिताइए। ऐसा न कर, यदि आप अपना सारा वक्त ऑफिस अथवा व्यापार में ही व्यतीत कर देते हैं तो आप जीवन के इन महत्वपूर्ण क्षणों से दूर हो जाएंगे। आपकी जिंदगी नीरस व तनावपूर्ण व्यतीत होने लगेगी। अपने जीवन की प्राथमिकताओं को पहचाने, इनके अतिरिक्त सभी वस्तुएं रेत के समान हैं। सार - यदि मनुष्य अपने जीवन की प्राथमिकताओं को न पहचान कर व्यर्थ के कार्यों में अपने को व्यस्त रखता है तो ऐसे मनुष्यों का जीवन नीरस व उत्साहहीन व्यतीत होता है। ******

  • ग्रहण (Part 2)

    लगभग बारह वर्ष पूर्व का वह दिन मेरी आँखों के सामने जीवंत हो उठा। मैं क्लीनिक में मरीज देख रही थी। एक दंपत्ति अपनी तेरह-चौदह साल की बेटी के साथ क्लीनिक पर आए। बच्ची दर्द में थी और एक ही बात बोले जा रही थी, ‘‘मुझे इंजेक्शन लगा दीजिए। मुझे मार दीजिए। मुझे नहीं जीना है।’’ रोते हुए उसके पिता ने बताया कि वह लोग एक रिश्तेदार के घर गृह प्रवेश में गए थे। बेटी का दसवीं का बोर्ड था तो वह अपने शिक्षक की प्रतीक्षा में घर पर ही रुक गई थी। हम जब शाम को लौटे तो बेटी इस हाल में मिली। वह शिक्षक दरिंदा निकला। वह हाथ जोड़कर बोले, ‘‘हम पुलिस के पास नहीं जाना चाहते डॉक्टर। उसका तो कुछ नहीं होगा हमारी लड़की बदनाम हो जाएगी। हम इसकी परीक्षा के बाद यह शहर ही छोड़ देंगे। हमारी मदद कर दीजिए।’’ मैं उनकी पीड़ा को समझ सकती थी। मेरे जेठ की बेटी इस हादसे से गुजरी थी। जेठ जी स्वयं पुलिस में थे। पर क्या लाभ हुआ पुलिस, कोर्ट, कचहरी इन सब का तनाव और समाज की हिकारत भरी नजर, वह बेचारी नहीं झेल पाई और साल पूरा होते-होते पंखे से लटक कर मर गई। मैं बच्ची के इलाज के साथ-साथ उसकी काउंसलिंग भी करने लगी। वह जब घबराती अपनी मम्मी के साथ मेरे पास आ जाती। फिर धीरे-धीरे अकेले आने लगी। दूसरे शहर जा कर भी वह फोन से संपर्क में रही। फिर एक दिन मैंने उससे कहा, ‘‘देखो बेटा तुम 12वीं में आ गई हो, और अब पूरी तरह से ठीक हो गई हो। तुम्हारे लिए जरूरी है कि तुम इस दुर्घटना को भूल जाओ। इसके लिए तुम्हें मुझे भी भूलना होगा।’’ ‘‘आपको ?....आपको कैसे भूल सकती हूँ मैं? मेरी माँ ने मुझे जन्म दिया है, पर यह नई ज़िंदगी आपकी दी हुई है।’’ वो कांपती हुई आवाज में बोली थी। ‘‘माँ कह रही हो तो माँ की बात मानो। सब कुछ भूल कर एक नई जिंदगी जियो। जब शादी करोगी तो मुझे जरूर बताना, मैं आऊंगी।’’ ‘‘शादी?...... मैं..... मैं ...मुझसे कौन शादी करेगा?’’ ‘‘क्यों तुमने कौन सा पाप किया है? तुम शादी करोगी और एक आम ज़िन्दगी जीओगी। बस इस दुर्घटना का जिक्र किसी से कभी नहीं करना। मैंने अपनी मेडिकल फाइल में भी तुम्हारा असली नाम नहीं लिखा है। उसमें तुम छाया हो। तुम अपने असली नाम के साथ आराम से जियो और आठ साल के लंबे अंतराल के बाद आज अचानक वही छाया, प्रिया के रूप में मेरे सामने थी। बेटे की आवाज से मैं वापस वर्तमान में लौट आई। ‘‘माँ, इसे क्या हुआ?’’ ‘‘डर गई है। बिना गलती के गिल्टी महसूस कर रही है।’’ प्रिया के सिर पर हाथ फेरते हुए मैंने जवाब दिया। ‘‘बिना गलती के कैसे? इसी की वजह से तो आप इतना थकीं।’’ प्रिया की ओर देखते हुए ऋतिक बोला। ‘‘.......... प्रिया सिर उठाकर अपलक ऋतिक को देख रही थी।’’ ‘‘अब तुम्हारी सजा ये है प्रिया, कि अब तुम माँ के लिए चाय बना कर लाओ और जो बचे उसमें से थोड़ी सी मुझे भी दे देना।’’ कमरे का वातावरण थोड़ा हल्का हो गया। तकिया की टेक के सहारे दोनों ने मुझे बैठा दिया। चाय पीते हुए मैंने प्रिया की ओर देखा। ‘‘प्रिया चाय तो तुमने अच्छी बनाई है। चलो रसोई में तुम पास हो गई। पर अभी तुम्हारी परीक्षा बाकी है। मेरी बहू बनने के लिए तुम्हें एक परीक्षा और पास करनी होगी।’’ प्रिया और ऋतिक दोनों एक दूसरे की ओर देखने लगे। ‘‘माँ?’’ ऋतिक हिचकता सा बोला। ‘‘तुम्हें ऐतराज है क्या?’’ ‘‘न, न....नहीं माँ।’’ ‘‘तुम्हें प्रिया?’’ नहीं... बिल्कुल नहीं। ‘‘ठीक है, फिर ऋतिक तुम अपने कमरे में जाओ मुझे अकेले प्रिया से बात करनी है। उसके बाद तुम्हें बुला लेंगे।’’ ‘‘जी’’ चकित सा ऋतिक खड़ा हो गया और प्रिया की ओर देखता हुआ बाहर चला गया। प्रिया अब सीधे मेरी ओर देख रही थी। “प्रिया, मुझे तुमसे एक वादा चाहिए।’’ ‘‘माँ, मुझ जैसी ग्रहण लगी लड़की को आप जानते बूझते हुए क्यों स्वीकार रही हैं अपने इतने लायक बेटे के लिए। आप मना भी तो कर सकती हैं।’’ क्यों मना करूंगी, तुम्हारे जैसी कोमल हृदय वाली बेटी, मेरी बहू बने यही तो हमेशा चाहा है मैंने। तुमसे, तुम्हारे साथ से, मेरे बेटे की खुशियाँ हैं। यह खुशी मैं उसे देना चाहती हूँ। बस एक वादा चाहिए तुमसे।’’ ‘‘कौन सा वादा माँ?’’ ‘‘कभी, किसी भी कमजोर पल में उस हादसे का जिक्र ऋतिक से नहीं करोगी। यही वादा चाहिए मुझे।’’ ‘‘इतनी बड़ी बात छुपाना क्या उचित होगा?’’ ‘‘प्रिया जिंदगी में बहुत से हादसे होते हैं। क्या हम हमेशा उनका बोझा पीठ पर ढोते रहते हैं? वे घट कर अतीत हो जाते हैं। यही होना भी चाहिए ।’’ ‘‘.....वह मौन मुझे देख रही थी। प्रिया, मेरा बेटा बहुत सुलझा हुआ है फिर भी मैं नहीं चाहती कि किसी अनचाहे अतीत का काला साया मेरे बेटे बहू के जीवन में बेचैनियाँ लाए। इसीलिये...।’’ ‘‘आपकी भावना समझ सकती हूँ। माँ, मैं आपसे वादा करती हूँ, मेरे मरने तक इस बात का जिक्र मेरी जुबान पर कभी नहीं आएगा।’’ प्रिया मेरा हाथ पकड़े हुए थी। ‘‘प्रिया, अपने मम्मी पापा से कहना कि जब वे आएंगे तो हम पहली बार मिल रहे होंगे। यह याद रखेंगे।’’ ‘माँ, आप बहुत महान हैं।’ भावुकता में प्रिया मेरे गले लग गई। प्यार से उसकी पीठ थपथपा कर मैंने कहा ,‘अब ऋतिक को बुला लो।’ प्रिया के साथ ऋतिक कमरे में आया तो उसके चेहरे पर प्रश्न साफ दिखाई दे रहा था। ‘तेरी प्रिया, मेरी परीक्षा में पास हो गई। यह चाँद सी सुंदर लड़की मुझे बहू के रूप में स्वीकार है।’ ‘चाँद में तो दाग होता है माँ। ग्रहण लगता है।’ ऋतिक ने प्रिया को छेड़ने के अंदाज में कहा। ‘चांद उस ग्रहण के साथ ही तो पूर्ण होता है बेटा। वैसे ही हम सब भी अनेक अच्छाई और बुराई के पुतले हैं और हमें एक दूसरे को संपूर्णता में स्वीकारना होता है। प्रिया हम दोनों को हमारी कमियों के साथ स्वीकारेगी और हम दोनों को भी प्रिया को उसकी सारी अच्छाई और सारी बुराई के साथ उसे स्वीकारना होगा।’ ‘मैं ..तो ...माँ...।” ‘मैं जानती हूँ। तू उसे छेड़ रहा है। ......अच्छा अब तुम दोनों रसोई से कुछ लाकर खिलाओ तो मुझे, भूख लग गई है।’ उठते हुए प्रिया बोली, ‘मैं लाती हूँ माँ।’ ‘........और हां प्रिया, अपने मम्मी-पापा से बोलना मुझसे जल्दी आकर मिलें। और उन्हें यह भी बता देना कि मुझे शादी की जल्दी है।’ ऋतिक और प्रिया के चेहरे खिल उठे और दोनों मुस्कुराते हुए कमरे से बाहर चले गए। समाप्त *********************

  • ग्रहण (Part 1)

    कल से मेरे पैर धरती पर नहीं पड़ रहे हैं। रात उत्तेजना के मारे नींद नहीं आई। इस पल की कितनी प्रतीक्षा थी मुझे। रात जब खाने के बाद ऋतिक मेरे कमरे में आया तो मुझे लगा शायद उसे कुछ चाहिए। मेरे पूछने पर उसने अपनी दोनों बाहें मेरे गले में डाल दीं। ‘‘नहीं माँ, मुझे कुछ बताना था आपको।’’ शर्म से गुलाबी हो आए उसके गोरे मुखड़े को देखकर मेरे चेहरे पर प्यार भरी मुस्कान तैर गई। तो तुझे मेरी बहू मिल गई।’’ ‘‘अगर आप उसे स्वीकारेंगी तो.....।’’ वह सीधे मेरी आंखों में देख रहा था। ‘‘तू जानता है, तेरी खुशी से बढ़कर मेरे लिए और कुछ भी नहीं। कौन है वह खुशनसीब, जिसने मेरे बेटे के दिल की घंटी बजाई है?’’ बेटे के गाल पर प्यार की चपत लगाते हुए मैंने पूछा। ‘‘माँ, प्रिया नाम है उसका। मेरे साथ एमबीए किया है उसने। हम ढाई साल से एक-दूसरे को जानते हैं और पसंद करते हैं। उसको भी अपने शहर में अच्छी नौकरी मिल गई है।’’ ‘‘कब मिलवाओगे?’’ मेरा सीधा प्रश्न था। ‘‘माँ, कल सुबह नाश्ते पर बुला लेता हूँ।’’ ‘‘बुला नहीं लेता हूँ। जाकर ले आना उसे। अब जा सो जा।’’ मेरी आँखें, मेरा स्वर सब खुशी में डूबा हुआ था। रात करवटें बदलते कटी और सुबह चार बजे ही मैंने बिस्तर छोड़ दिया और रसोई में घुस गई। मन करता यह भी बना लूँ, वह भी बना लूँ। सात बजे तक मेरी रसोई तरह-तरह के पकवानों से महकने लगी। ‘‘माँ, क्या-क्या बना लिया आपने? पूरा घर महक रहा है। आप क्या रात भर बनाती रही हैं?’’ आश्चर्य और प्यार दोनों ऋतिक के स्वर में था। ‘‘मेरी बहू पहली बार आ रही है। यह दिन एक बार ही आता है। तुम चाय पियो मैं नहा कर आती हूँ।’’ ऋतिक के जाने के बाद मैंने हल्के गुलाबी रंग की साड़ी पहनी। सच्चे मोती की माला और टॉप्स पहनकर शीशे के सामने खड़ी हुई और अपने कटे हुए बालों में ब्रश करने लगी। आज कितने सालों बाद सिंगार करने का मन हुआ था मेरा। ‘‘माँ-माँ ......’’ ऋतिक के स्वर से मैं चौंक गई। ‘‘माँ, प्रिया आ गई।’’ ऋतिक मेरे सामने खड़ा था। ‘‘अरे, दरवाजा किसने खोला?’’ ‘‘खुला था माँ, शायद आप बंद करना भूल गईं थीं।’’ ‘‘हां यही हुआ होगा।” बैठक में घुसते ही प्रिया से मेरी नजर मिली और हम दोनों ही जड़ हो गए। मेरे पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई। लगा जैसे पूरा कमरा घूमने लगा है। खुद को संभालना मुश्किल हो गया। ऋतिक ने सहारा देकर मुझे बैठाया। माँ,...माँ... क्या हुआ आपको?’’ मैं चेतना शून्य होती जा रही थी। बंद होती आँखों से देखा ऋतिक और प्रिया दोनों मेरे ऊपर झुके हुए थे, और मुझे पुकार रहे थे। मुझे उनकी आवाजें दूर से आती प्रतीत हो रही थीं। जब होश आया तो देखा मैं अपने पलंग पर लेटी हुई थी। ऋतिक और प्रिया के साथ साथ डॉ. रजत भी मेरे कमरे में बैठे हुए थे। ‘‘माँ, क्या हुआ आपको?’’ परेशान ऋतिक की आँखें डबडबाई हुई थीं। मेरा हाथ उसके हाथ में था। ‘‘बेटा, मैं ठीक हूँ।” ‘‘डॉक्टर रागिनी, आप दोस्त को तो डॉक्टर मानती ही नहीं हैं। मैंने कितनी बार आपसे कहा थोड़ा अपनी सेहत का ध्यान रखिए। पर......‘‘डाक्टर रजत फिर से उठकर डाक्टर रागनी का ब्लडप्रेशर नापने लगे। ‘‘मम्मी की तबीयत खराब चल रही थी? पर अंकल मम्मी ने तो कुछ भी नहीं बताया कभी। क्या हुआ है उन्हें?’’ ऋतिक परेशान हो उठा। ‘कुछ नहीं बेटा, तेरे रजत अंकल ऐसे ही बोलते रहते हैं।’ मैंने बेटे का हाथ स्नेह से दबाया। ‘‘कोई यूं ही बेहोश नहीं हो जाता मम्मी। अंकल आप बताइए ना?’’ ऋतिक बहुत परेशान था और इस परेशानी में प्रिया को भी भूल गया था। जो मेरे पैरों के पास चुपचाप बैठी हुई थी और मुश्किल से अपने आंसुओं को संभाले थी। ‘‘इतना परेशान होने वाली भी बात नहीं है ऋतिक। तुम्हारी मम्मी को थोड़ा आराम करने की जरूरत है। बहुत थका देती हैं खुद को। वैसे पूरा चेकअप करा लेना हमेशा अच्छा होता है। मैंने कुछ टेस्ट लिख दिए हैं। करा लेना। इतना ब्लड प्रेशर बढ़ना ठीक बात नहीं है।’’ ऋतिक की पीठ थपथपा कर रजत बोले। ‘‘जी अंकल।” ‘‘अच्छा अब सब कंट्रोल में है। मां को आराम कराओ। परेशान मत हो। मैं चलता हूँ। वैसे अब जरूरत नहीं पड़ेगी पर मैं एक फोन कॉल की ही दूरी पर हूँ।’’ उठते हुए डॉ. रजत बोले। ‘‘अरे , अंकल चाय......।’’ ‘‘मम्मी को ठीक होने दो, फिर साथ में पीते हैं।” ‘‘प्रिया, मम्मी का ध्यान रखना। मैं अंकल को छोड़ कर आता हूँ।’’ कहते हुए ऋतिक कमरे के बाहर चला गया। ‘‘सॉरी आंटी, मुझे बिल्कुल नहीं पता था कि ऋतिक आपका बेटा है।’’ उसकी आँख अब बरसने लगी थी। “प्रिया, मेरे पास आओ।’’ मैंने उसका हाथ अपने हाथ में ले लिया, ‘‘आंटी, नहीं प्रिया, माँ बोलो।’’ वह फफक-फफक कर रोने लगी और अपना सिर मेरे सीने पर रख दिया। स्नेह से मैं उसके सिर पर हाथ फेरने लगी। अतीत मुझ पर हावी होता जा रहा था। क्रमशः………….. *********************

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