नीलकंठ
गुलशन नंदा असावधानी से पर्दा उठाकर ज्यों ही आनंद ने कमरे में प्रवेश किया, वह सहसा रुक गया। सामने सोफे पर हरी साड़ी में सुसज्जित एक लड़की बैठी कोई पत्रिका देखने में तल्लीन थी। आनंद को देखते ही वह चौंककर उठ खड़ी हुई। 'आप!' सकुवाते स्वर में उसने पूछा, 'जी, मैं रायसाहब घर पर हैं क्या?' 'जी नहीं, अभी ऑफिस से नहीं लौटे।' 'और मालकिन। आनंद ने पायदान पर जूते साफ करते हुए पूछा। 'जरा मार्किट तक गई हैं। 'घर में और कोई नहीं?' 'संध्या है, उनकी बेटी! अभी आती है।' वह साड़ी का पल्लू ठीक करती हुई बोली।...