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- अपने काम से काम रखिये
डॉ. कृष्णकांत श्रीवास्तव एक पठान के पास एक बकरा और एक घोडा था। जिन्हें वो बहुत प्यार करता था। एक बार अचानक घोडा बीमार पड़ गया और बैठ गया। वो अब चल फिर नहीं सकता था। पठान को इस बात की बड़ी चिंता हुयी। उसने घोड़े के इलाज के लिए डॉक्टर को बुलाया। डॉक्टर ने जांच पड़ताल करने के बाद पठान को बताया कि.... “आपके घोड़े को बहुत खतरनाक बीमारी हुयी है। मैं इसे 4 दिन लगातार दवाई दूंगा। अगर ये चौथे दिन तक खड़ा हो गया तो बच जाएगा। यदि यह चौथे दिन तक खड़ा न हुआ तो मजबूरन इसे मारना पड़ेगा।” यह सुन कर पठान को बहुत दुःख हुआ। लेकिन वह कर भी क्या सकता था। डॉक्टर के जाने के बाद बकरे ने घोड़े को समझाने की कोशिश की। “देखो, तुम कल एक बार जब डॉक्टर आये तो उठ जाना। वर्ना वो तुम्हें मार देंगे।” लेकिन घोड़े पर इस बात का कोई असर न हुआ। वह दूसरे दिन न उठा। बकरे ने उसे दूसरे दिन भी समझाया। पर घोडा तो जैसे कान में रूई डाले बैठा था। तीसरे दिन डॉक्टर फिर आया। उसने देखा कि घोड़ा फिर से खड़ा नहीं हुआ। “बस एक दिन और अगर यह न खड़ा हुआ तो कल इसका आखिरी दिन होगा।” इतना कह कर डॉक्टर चला गया। तब बकरे ने एक आखिरी कोशिश करनी चाही। “देखो, मैं तुम्हारे भले के लिए ही कह रहा हूँ। जिन्दगी दुबारा नहीं मिलती। तुम्हें ज्यादा कुछ नहीं करना। अपनी जान बचने के लिए बस एक बार उठ कर दौड़ना है।” घोड़े ने बकरे की सलाह पर इस बार विचार किया। उसने सोच लिया अगर एक बार हिम्मत करने से जान बच सकती है तो क्यों न कोशिश कर ली जाए। अगले दिन डॉक्टर आया और जैसे ही घोड़े के पास गया तो घोड़ा अचानक से उठा और दौड़ने लगा। डॉक्टर खुश हो गया और बोला, “बधाई हो, आपका घोड़ा बच गया। अब इसे नहीं मारना पड़ेगा।” यह खबर सुन पठान बहुत खुश हुआ और तुरंत बोला.... “डॉक्टर साहब आज खुश कर दिया आपने। मैं आज बहुत खुश हूँ और इसी ख़ुशी में आज बकरा कटेगा”! सीख : आज के ज़माने में बस अपने काम से काम रखिये। नहीं तो किसी और को बचाने के चक्कर में आप भी बकरे की तरह कट जाओगे। ******
- दिव्या
आरती गौतम वो रेलवे स्टेशन पर अकेला बैठा फोन पर बिजी था कि उसके बगल में कोई सुंदर सी औरत आकर बैठ गयी। औरत के चेहरे पर नजर पङी तो वो अचानक ठिठक सा गया। ये तो वही लङकी थी जो उसकी जिंदगी थी। औरत ने उसकी तरफ देखा भी नहीं वो चेहरे पर से पसीना पोछतें हुए अपना टिकट देख रही थी। अचानक से वो बोल पङा "दिव्या"। किसी ने नाम लिया तो लङकी ने अपनी बङी बङी आंखें से उस शख्स पर टिका दी और आंखो ही आंखो में पुछा "कौन?” वो बोला "अरे मैं राहुल हुं पहचाना नही क्या? हाँ, पहचान लिया मगर ये क्या बाबाओ जैसी दाङी रख रखी है? वो बोला हाँ बहुत बदल गया हुं, मगर तुम तो जरा भी नहीं बदली। इतने साल बाद देख रहा हुं अकेली यहां क्या कर रही हो? तुम्हारे पति, और बच्चे कहां हैं? वो उदास हो गयी और बोली बच्चे हुए ही नहीं। पति से शादी के 5 साल बाद तलाक हो गया था। अकेली ही रहती हुं। तुम सुनाओ अपनी तुम्हारी बीवी कैसी और बच्चे कितने हैं? कहां रहते हो? मेरी शादी के बाद तुमने गांव ही छोङ दिया ? वो बोला.... तुम तो मिली नहीं इसलिये शादी की नहीं, माँ के साथ इसी शहर में रहता हुं। प्राईवेट जॉब करता हुं, और मैंने गांव नही छोङा था, तेरे भाईयों ने छोङने पर मजबूर कर दिया था। ये सब सुनकर लङकी के आंखों में आँसू आ गये। उसी समय उसकी ट्रेन भी आ गयी और वो उठकर जाने लगी... राहुल ने उठकर आगे बङकर उसका हाथ पीछे पकङ लिया और बोला.. ये ट्रेन मिस कर दो ना, अगली ट्रेन से चली जाना। वो बिना पीछे मुङे बोली...थक गयी हुं अकेले चलते चलते हमेंशा के लिये क्यों नहीं रोक लेते? फिर दोनो रो कर एक दुसरे से लिपट गये। ******
- रक्षाबंधन
ब्रिज उमराव भाई बहन का प्यार, यह राखी का त्योहार। बहना दूर से चलकर आई, कम न हो अपना प्यार।। प्रेम प्यार सुचिता का संगम, न हो मलाल मन में जड़ जंगम। भ्रात प्रेम की धारा बहती, मन में न साल न कोई गम।। नहीं कामना कुछ पाने की, भैया तू निश्चिंत रहे। प्रेम दिवस पर मिल तेरे से, हर पलछिन आनंद रहे।। स्नेह प्रेम की यह गंगा, अविरल बहती रहे सदा। मिल जाना जब सुमिरन आये, यहां-वहां यूं यदा कदा।। स्नेह प्यार का यह सागर, लहरों से संस्कारित हो। ज्यों दरार पटती वर्षा से, आत्म प्रेम आधारित हो।। धन वैभव नेपथ्य की बातें, सुमधुर सागर उमड़ रहा। ज्यों नदिया दरिया से मिलती, नभ में बादल घुमड़ रहा।। अश्क बह रहे गालों पर, आंखों में शैलाब उठा। खुशियों की धारा बह निकली, दोनों को ही जुदा जुदा।। शक की कहीं भी जगह न हो, आशंका भागे दूर दूर। प्रीति की डोर बंधे ऐसी, तन मन हो जाये मजबूर।। आशा विश्वास प्रेम श्रद्धा, इर्द गिर्द पहरा देती। स्नेह प्रेम की धार बहे, तन मन को नहला देती।। ******
- किसान की चतुराई
डॉ. कृष्णकांत श्रीवास्तव रहमत नगर में माधो नाम का एक किसान रहता था। उसके पास कई सारे खेत थे। लेकिन, उसका खेत पहाड़ी क्षेत्र में होने के कारण वहाँ सिंचाई के लिए नदी का पानी नहीं पहुँच पाता था। जिसके कारण उसे बारिश पर निर्भर रहना पड़ता था। कभी-कभी बारिश न होने की वजह से उसके खेतों में लगी फसल सूख जाती थी। माधो अक्सर सोचा करता कि वह अपने उन खेतों को बेचकर कही अच्छी और उपजाऊ खेत खरीद ले। लेकिन, उसके खेतों की कोई अच्छी कीमत नहीं दे रहा था। एक दिन माधो अपने खेतों को देखकर वापस घर को जा रहा था। बीच रास्ते में उसने एक खेत में एक बौने को खोदाई करते हुए देखा। उसने बौने से पूछा क्यों भाई! यहाँ पर खोदाई क्यों कर रहे हो। बौना बहुत चालाक था। उसने एक पोटली में कुछ कंकड़ डालकर एक सोने का सिक्का डाल दिया था। बौना उस पोटली को किसान को दिखाते हुए कहा – “इस पूरे खेत में इस तरह की बहुत सारी पोटली हैं। किसान को लालच आ गया। उसने बौने से कहा – “इस रहस्य के बारें में अब मुझे भी पता हो गया हैं तो अब इस खजाने का हकदार मैं भी हूँ। बौने ने कहा – हाँ, हाँ क्यों नहीं इसके पहले कोई तीसरा व्यक्ति आए हम दोनों पूरे खेत की जुताई करके सिक्कों की पोटली को निकल लेते हैं। बौने और किसान मिलकर पूरे खेत की जुताई कर लिए। लेकिन, उन्हें कुछ नहीं मिला। दरअसल, बौना बहुत आलसी था। वह अपना काम अकेले नहीं करना चाहता था। किसान बुद्धिमान और चतुर था। वह बौने की सारी चतुराई समझ गया। उसने बौने से कहा – तुम्हारी गलती की भरपाई करने के लिए तुम्हें कुछ दंड भोगना पड़ेगा। अगले दो वर्षों तक जो कुछ तुम्हारे खेत में लगाया जाएगा उसका आधा हिस्सा मेरा होगा। बौना बोल – “मुझे मंजूर हैं मगर जमीन के ऊपर जो उगेगा वह सब मेरा होगा और जमीन के नीचे जो कुछ उगेगा वह तुम्हारा होगा। किसान उसकी बात से सहमत हो गया। उसने कहा - “लेकिन, फसल मैं उगाऊँगा।” बौना बहुत आलसी था। उसने हाँ कर दी। किसान अगले दो साल तक जमीन के अंदर होने वाले फसल आलू, गाजर और मोमफ़ली लगाई। फसल कटने के बाद बौने को सिर्फ पत्ते मिलते थे। जबकि किसान को अच्छे फसल मिलती थी। इस तरह से किसान ने बौने को सबक सीखा दिया। बौना लालच और आलस की वजह से कही का नहीं हुआ। सीख : लालची और आलसी व्यक्ति को हर जगह धोखा ही मिलता हैं। ******
- चरित्रहीन
ममता पाण्डेय ये वक्त है आने का? मनोहर से रहा न गया। क्या करूं। काम ही ऐसा है? घर में घुसते हुए रागिनी ने जवाब दिया। रात ग्यारह बजने को है। कौन सा काम कंपनी करवाती है जो समय से नहीं छोड़ती? तुम कहना क्या चाहते हो? रागिनी की त्योरियां चढ़ गई। ऐसा रोज-रोज नहीं चलेगा। अपने बॉस से कह दो कि समय से छोड़ा करे। इतनी रात छोड़ने का क्या तुक? देर से आती हूं तो वे छुड़वाने की भी जिम्मेदारी लेते हैं। मैं उन्हीं की गाड़ी से आई हूं। तो भी, तुम्हें समय का ख्याल रखना चाहिए। मीटिंग में फंस गई थी। बोल दो कि मीटिंग समय से रखा करे। ‘वे मुझे 15 लाख सालाना देते हैं, जो तुम्हारी तनख्वाह से दुगनी है। वे हमारे हिसाब से नहीं बल्कि मुझे उनके हिसाब से चलना होगा। नौकरी छोड़ दो। आवेश में आकर कह रहे हो। वर्ना तुम अच्छी तरह जानते हो कि मैं न कमाऊं तो न फ्लैट की किस्त भर पाएगी न ही कार का लोन। मुझे क्या मालूम था कि उसकी इतनी बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी। कीमत? कैसी कीमत? मैं क्या बाजार में बिकने जाती हूं? रागिनी हत्थे से उखड़ गई। मेरे कहने का यह मतलब नहीं था। फिर क्या था? नौकरी तुम्हारी पसंद थी। वर्ना मैं तुम्हारी नौकरी से संतुष्ट थी। रागिनी ने जो कहा वह सत्य था। मनोहर हर हालत में प्रोफेशनल लड़की चाहता था। कई रिश्ते आए, उनमें से उसने रागिनी को पसंद किया। उस समय वह एमबीए करके एक कंपनी में मैनेजर पद पर थी। शादी के बाद उसने नौकरी छोड़ दी और दिल्ली आ गई। यहां उसकी रत्तीमात्र नौकरी की इच्छा नहीं थी। मगर मनोहर ने जिद की। कहने लगा, ‘दिल्ली में रहना है तो रुपया होना चाहिए। फ्लैट लेने हैं, आने-जाने के लिए कार खरीदनी है। बच्चों को अच्छे स्कूल में पढ़ाना है। कहां से होगा यह सब। मैं एक सरकारी बैंक का कर्मचारी हूं। मेरी आय सीमित है इसलिए तुम्हारा काम करना बेहद जरूरी है। मनोहर ने इतना कुछ रागिनी के ऊपर लाद दिया कि वह दबाव में आ गई। उसे लगा मनोहर ने जितना कुछ सोच रखा है वह सचमुच में आसान नहीं था। लिहाजा उसे नौकरी करनी ही पड़ेगी। शुरू-शुरू में सब ठीक था। वह समय से घर आ जाती थी। शाम अक्सर दोनों घूमने निकल जाते थे। बिस्तर पर आते ही रागिनी पड़ गई। मनोहर उसके करीब होना चाहता था मगर उसने मना कर दिया। मुझे सोने दो। बहुत थकी हूं रागिनी उनींदी सी बोली। थकी तो तुम रोज रहती हो मनोहर को उसका व्यवहार अच्छा न लगा। प्लीज सो जाओ। उसने चेहरा दूसरी तरफ घुमा लिया। जल्द ही वह गहरी नींद के आगोश में समा गई। मनोहर कसमसाकर रह गया। सुबह मनोहर का मूड उखड़ा हुआ था। एक तो रागिनी का अक्सर देर से आना उस पर सिर घुमाकर सो जाना। जब ऐसी ही जिंदगी जीनी थी तो क्या जरूरत थी शादी करने की? रागिनी बहुत जल्दी में थी। आज उसे सुबह नौ बजे तक ऑफिस पहुंच जाना था। सिंगापुर से कुछ डेलीगेट आ रहे थे। उनके साथ जरूरी मीटिंग थी। तुम्हारी वहां क्या जरूरत है? मनोहर बोला। मेरे पास तुम्हारी बकवास सुनने का वक्त नहीं। प्रोफेशन में आगे बढ़ने के लिए बहुत कुछ छोड़ना पड़ता है। साड़ी ठीक करते हुए रागिनी बोली। पति को भी? मनोहर चिढ़ा। तुम कहां जाने वाले हो, कमाने वाली बीवी जो लाए हो। बस इतना रहम करो, सवाल करके छोड़ दो। बदले में मैं तुम्हारे हाथ में अच्छी खासी रकम लाकर देती रहूंगी। मैं कहूं कि मुझे सिर्फ तुम चाहिए, तब? सिर्फ रात गर्म करने के लिए। सुबह तो तुम्हें 15 लाख सालाना कमाने वाली बीवी चाहिए। रागिनी ने तंज कसा। ‘वैसे अब मैं काफी दूर निकल चुकी हूं। पीछे लौटना आसान नहीं। बाल ठीक करते हुए रागिनी बोली। क्यों नहीं आसान, नौकरी छोड़ दो। उसके बाद मैं क्या करूंगी? घर संभालो, बच्चे पैदा करो। सब कुछ तुम्हारी मर्जी से होगा? तुम्हें पहले सोचना चाहिए था कि एक स्त्री क्या-क्या करेगी। नौकरी करे, बच्चे पाले, तुम्हें समय से नाश्ता-खाना दे। मगर नहीं तुम्हें तो प्रोफेशन लड़की चाहिए थी। जहां मेरा रिश्ता जाता लड़के वाले कहते लड़की सादा-सादा बीए है, ऐसा नहीं चलेगा। फिर मैंने एमबीए किया। उसके बाद नौकरी, ताकि मेरा रिश्ता हो जाए। किंचित वह भावुक हो उठी। मनोहर ने सपने में भी नहीं सोचा था कि रागिनी इस कदर प्रोफेशनल हो जाएगी। रागिनी कंपनी की गाड़ी से ऑफिस के लिए निकल गई। थोड़ी देर बाद मनोहर भी ऑफिस के लिए निकल गया। आज उसका मन ऑफिस में नहीं लगा। खिन्न तो काफी दिनों से था मगर जिस तरीके से रागिनी ने अपने तेवर दिखाए वह असहनीय था। यह सत्य था कि उसे कमाऊ पत्नी चाहिए थी, मगर इस कीमत पर नहीं कि उसकी अंगुलियां भी बेमानी लगे। आज यही तो स्थिति थी। जिस्म की बात तो दूर वह बालों को भी हाथ लगाने नहीं देती। वजह वही, थकी हूं, मूड नहीं है, मुझे सोने दो। रागिनी के हेड का नाम हेमंत था, वहीं रागिनी उसकी डिप्टी हेड। उसकी खुद की कार थी। यूं तो वह अपने स्कूटी से ऑफिस जाती मगर जब देर होती तो स्कूटी वहीं ऑफिस में छोड़ देती, फिर हेड की कार से घर आती। अगले दिन हेड उसे रिसीव करके ऑफिस ले आता। रागिनी ने पांच सालों में काफी तरक्की की थी। सामान्य मैनेजर से सीधे डिप्टी हेड तक पहुंच गई और सेलरी पूरे डेढ़ लाख महीना। यह कोई आसान काम नहीं था। मनोहर खुश था। उसके पास अच्छी खासी रकम आ रही थी। मगर जिस तरीके से रागिनी में बदलाव आने लगा वह उसके लिए नागवार था। रागिनी का देर से आना। मनोहर को कोई अहमियत न देना। घर के काम में रंचमात्र दिलचस्पी न लेना। तरक्की और हेड यही रह गया था उसके लिए मुख्य। बाकी सब गौण। मनोहर जितना सोचता दिल उतना ही डूबने लगता। वह परिवार बढ़ाना चाहता था, वहीं रागिनी इन पर चर्चा तक नहीं करना चाहती थी। रागिनी पीछे लौटने वाली नहीं थी। 15 लाख सालाना किसी को काटता है? तलाक देना आसान नहीं। देने की कोशिश भी करता हूं तो अच्छी खासी आमदनी से वंचित होना पड़ेगा। वह मंझधार मे पड़ गया था। न उगलते बन रहा था न ही निगलते। रागिनी दिन-प्रतिदिन हाथ से निकलते जा रही थ। उसे सिर्फ अपने काम के आगे कुछ नहीं सूझ रहा था। बच्चे की बात करता तो कहती अभी जल्दी क्या है। कहते-कहते सात साल गुजर गए। वह आज भी बच्चे के नाम से कतराती है। धन-दौलत किस काम का अगर बच्चे ही न हो। शाम ऑफिस से मनोहर आया तो उसका दिल उचाट था। नौकरानी ने उसे चाय नास्ता दिया। वह आठ बजे तक खाना बनाकर चली जाती। उसके बाद उसके पास सिवाय रागिनी के इंतजारी के कुछ नहीं रहता। कितनी देर टीवी देखे। वह चाहता था कि उसके पास रागिनी बैठे, बातें करे, कुछ अपनी सुनाए कुछ अपनी कहे। वह रागिनी को अपनी बांहों में भरना चाहता था। उस पर खूब प्यार बरसाना चाहता था। मगर इससे उलट वह पास बैठने से भी कतराती। मानो उसके जिस्म से बू आ रही हो। ‘क्या मैं सिर्फ नाम का पति रह गया हूं? क्या रागिनी के जीवन में कोई और आ गया है? मेरे प्रति वितृष्णा की और क्या वजह हो सकती है? यह ख्याल मनोहर के जेहन में उभरे। उसकी बेचैनी बढ़ जाती है। आज वह रात दस बजे आई। कल से एक घंटे पहले कपड़े उतारकर सीधे बेड रूम में सोने चली गई। अति हो गई? मनोहर फट पड़ा। मुझे सोने दो। मैं कल बात करूंगी रागिनी ने मुंह फेर लिया। आज क्यों नहीं? मुझे नींद आ रही है। कहां से गुलछर्रे उड़ा कर आ रही हो? दिल की बात जुबान पर आ ही गई। तुम भी उड़ाओ, मैंने कब मना किया। मगर अभी मुझे सोने दो। रागिनी ने कान पर तकिया रख लिया। मनोहर बड़बड़ाता रहा। सुबह मनोहर का सिर भारी था। रागिनी हमेशा की तरह ऑफिस के लिए तैयार हो रही थी। मानो कुछ हुआ ही न हो। मनोहर तिलमिलाकर रह गया। आज रागिनी स्कूटी से नहीं गई। उसने छत से देखा कुछ दूरी पर एक कार खड़ी थी। कार में एक शख्स बैठा था। कौन हो सकता है? मनोहर के दिमाग में शक के कीड़े कुलबुलाने लगे। तुम्हारे साथ कौन था? जैसे ही रागिनी ऑफिस पहुंची मनोहर ने फोन मिलाया। अचानक जिज्ञासा की वजह? रागिनी के स्वर में व्यंग्य का पुट था। क्या मुझे इतना भी जानने का हक नहीं? हां-हां क्यों नहीं। पति जो ठहरे। रागिनी ने आगे कहा, ‘वे मेरे हेड थे। कल रात अपनी स्कूटी ऑफिस में ही छोड़ आई थी। रागिनी ने फोन काट दिया। मनोहर को काटो तो खून नहीं। हो न हो यही आदमी रागिनी को प्रमोट कर रहा है। ‘क्यों? कुछ तो वजह होगी? वर्ना इतनी जल्दी-जल्दी वह इतनी ऊंचाई पर नहीं पहुंचती। कहीं दोनों में? मनोहर चाह कर भी रागिनी का कुछ बिगाड़ पाने में सक्षम न था। पुरुष होने के नाते उसका आत्मसम्मान जागता मगर अगले ही पल हारे हुए जुआरी की तरह बैठ जाता। दो दिन बाद रागिनी ने यह कहकर उसे चौंका दिया कि वह ऑफिस के काम से सिंगापुर जा रही है। अकेले? हालांकि यह सवाल बेमानी था, तो भी एक पति होने के नाते जुबान से निकल ही आता। नहीं मेरे साथ हेमंत भी जा रहे हैं। हेमंत! हेमंत नाम ने नाक में दम कर रखा है। मनोहर चीखा। चिल्लाओ मत, वह मेरा हेड है। आज तुम जो निश्चिंत जीवन गुजार रहे हो वह सब उसी की देन है। उसी ने एमडी से मेरी सिफारिश करके यहां तक पहुंचाया है। बदले में तुमने क्या दिया? चलो बता देती हूं, छिपाना क्या? मैं उसकी एक्सट्रा मेटेरियल अफेयर हूं। धोखेबाज। कह सकते हो। आगे बढ़ने के लिए अगर वह मुझे अपनी अंकशायिनी बना लेता है तो हर्ज ही क्या है। मैं नहीं बनूंगी तो कोई दूसरी तैयार हो जाएगी। वह आगे बढ़ जाएगी और मैं मामूली सी मैनेजर बनकर रह जाऊंगी। कारपोरेट सेक्टर में आगे बढ़ने का यही फंडा है, जो तुम्हारे सरकारी विभाग में नहीं। रागिनी, मैं सोच भी नहीं सकता था कि तुम इतना गिर सकती हो? गिरा कौन रहा है? सफलता पतिव्रता बनने से नहीं आती। फिर ये फंडा सिर्फ स्त्री पर ही क्यों? क्या पुरुष नहीं गिरते? मैं गिरी तो चरित्रहीन और पुरुष गिरे तो पुरुषार्थ। यह अन्याय नहीं है तो क्या है। वैसे भी एक स्त्री कमाने के लिए बाहर निकलती है तो उसे यह सब सहना पड़ता है। यही काम मैं करूं तो? बेशक करो। तब एक स्त्री सिवाय लड़ने झगड़ने के और कर भी क्या सकती है? क्या तुम मानोगे? तुम तो यही कहोगे सब कुछ तो दिया, रहने के लिए फ्लैट, कार, गहनें, अच्छे लिबास साथ में खर्च करने के लिए रुपयें। रागिनी कहती रही, ‘मैं भी तो यही कर रही हूं। जमाना बदल चुका है। बाहरी तड़क-भड़क को ही लोग महत्व देते हैं। हम दोनों रुपया कहां से लाते हैं यह कोई नहीं देखता। वैसे भी बाहर निकलने वाली महिलाएं कितनी भी चरित्रवान हो उन पर आरोप लगते ही हैं। शादी के पहले मैं जिस कंपनी में काम करती थी वहां के पुरुष एक भी महिलाओं को लांक्षित करने से नहीं चूकते। उनका एक ही फंडा था, मिली तो ठीक वर्ना पीठ पीछे कह दिया रंडी है। इतना जानने के बाद शायद ही कोई पुरुष अपनी पत्नी को अपनाए। पर यह सवाल सिर्फ स्त्री के लिए ही क्यों? पुरुष नौकरानी तक से संबंध बनाकर पति बना रह सकता है तो पत्नी क्यों नहीं। दोहरे मापदंड क्यों? सिर्फ इसीलिए न कि पुरुष कमाते हैं, लिहाजा उसे मनमानी की छूट है। तब तो रागिनी भी छूट के दायरे में आती है। ‘निकल जाओ मेरे घर से। मनोहर चीखा। मर्द होने के नाते इतना तो हक बनता है। स्त्री का तो कोई घर होता नहीं जो इतने स्वाभिमान से कह सके निकल जाओ मेरे घर से। ‘सोच लो, नुकसान तुम्हारा होगा। यह फ्लैट मेरे लोन से खरीदा गया है, बेघर तुम होगे, मुझे क्या, मैं किसी और के साथ घर बसा लूंगी। सब नहीं पूछते अपनी बीवी से कि रात कहां से बिता कर आई हो। सब कुछ जानकर भी अंजान बने रहते हैं। मैट्रोपोलिटन सिटी में रहना होगा तो दौलत चाहिए। कितना कमा लोगे जो दिल्ली में फ्लैट खरीद सको। मनोहर के पास इसका कोई जवाब नहीं था। परसों रागिनी सिंगापुर चली गई। पांच दिन बाद आई। काफी फ्रेश लग रही थी। काफी कुछ महंगे सामान खरीद कर लाई थी। मनोहर मूर्तिवत उसे देखता रहा। जब तंद्रा लौटी तो लगा जैसे उसके भीतर कुछ मर सा गया। वह एक-एक कर उन सामानों को बटोरता रहा, जो रागिनी उसके लिए लाई थी। सचमुच महंगे थे, जो उस जैसे आम आदमी के लिए असंभव थे। ‘रागिनी, मुझे तुमसे कोई शिकायत नहीं। ‘सचमुच? वह मेरे गले लिपट गई। वह आगे कही, ‘तुम्हें मुझसे कोई शिकायत नहीं? ‘बिल्कुल नहीं? बस एक शिकायत थी सोचा कह दूं। ‘वह क्या? वह मेरे बदन से छिटकर दूर खड़ी हो गई। ‘हेड क्यों? एमडी क्यों नहीं? वह हंस पड़ी। ‘मैंने तुमसे झूठ बोला था। रागिनी की आंखें खुशी से चमक उठी। वह आगे कही, ‘इस बार एमडी ही था। मैंने हेड को दरकिनार करवा दिया। अब वह नहीं, मैं हेड हूं। इसके आगे मेरे पास कुछ पूछने के लिए बचा ही नहीं था। मनोहर ने अधेड़ नौकरानी को हटाकर जवान रख लिया। अब उसे रागिनी से कोई शिकायत नहीं थी। समय के साथ चलने में ही बेहतरी थी। इसे वह बखूबी समझ चुका था। *****
- तसला और कटोरा
डॉ. कृष्ण कांत श्रीवास्तव यह कहानी उस वक्त की है, जब किसी आंदोलन के कारण महात्मा गांधी बड़ौदा जेल में बंद थे। इस वक्त तक गांधी जी का नाम काफी सुर्खियों में रहने लगा था। उनकी गिनती स्वतंत्रता संग्राम के अग्रिम पंक्तियों के नेताओं में होती थी। गांधी जी के लाखों अनुयायी उनके एक आवाहन पर एकत्रित हो जाया करते थे। उस वक्त बड़ौदा जेल का सुपरिटेंडेंट मेजर मार्टिन था। मेजर मार्टिन, गांधीजी की ख्याति से भलीभांति परिचित था। गांधी जी के बड़ौदा जेल में आते ही मेजर मार्टिन ने उनके लिए कुछ आवश्यक वस्तुओं का प्रबंध करवाना आरंभ किया। गांधीजी ने सुपरिंटेंडेंट से पूछा, “ये सारी वस्तुएँ किसके लिए आ रही हैं?” सुपरिटेंडेंट ने उत्तर दिया, “आपके लिए। मैंने सरकार को लिखा था कि इतने महान् पुरुष पर कम से कम तीन सौ रुपए महीने का खर्च तो होना ही चाहिए।” गांधीजी ने कहा, “आपको बहुत-बहुत धन्यवाद। जो आपने मेरे लिए इतना सोचा, परंतु मैं यहां पर भोग विलास के लिए नहीं आया हूं। मैं तो एक साधारण स्वतंत्रता संग्राम सेनानी हूं। मुझे जेल में किसी विशेष सुविधाओं की आवश्यकता नहीं है। मैं भी अपने दूसरे स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के साथ ही एक साधारण इंसान बनकर जेल में रहूंगा। मेरे ऊपर भी सिर्फ उतना ही पैसा खर्च होना चाहिए जितना कि दूसरे कैदियों के ऊपर खर्च किया जा रहा है। इस वक्त हमारा स्वास्थ्य ठीक नहीं है। यदि मैं स्वस्थ होता तो खाना भी ‘सी क्लास’ का ही खाता।” गांधी जी की बातों को सुनकर सुपरिटेंडेंट मेजर मार्टिन आश्चर्यचकित रह गया। उसने गांधी जी को प्रणाम किया और गांधीजी के आग्रह पर वे सारी वस्तुएँ वापस कर दी। उनके स्थान पर वही तसला और कटोरा आ गया, जो सामान्य कैदी को दिया जाता था। इसके बाद बड़ौदा जेल में गांधी जी ने अपनी पूरी सजा एक आम कैदी की भांति ही पूरी की। सीख - महान वही होता है जो अपने को साधारण मनुष्य से अलग नहीं समझता। ********
- प्रेम भाव
विद्याशंकर एक करोड़पति बहुत अड़चन में था। करोड़ों का घाटा लगा था, और सारे जीवन की मेहनत डूबने के करीब थी। नौका डगमगा रही थी। कभी मंदिर नहीं गया था, कभी प्रार्थना भी न की थी। फुरसत ही न मिली थी। पूजा के लिए उसने पुजारी रख छोड़े थे, कई मंदिर भी बनवाये थे, जहां वे उसके नाम से नियमित पूजा किया करते थे लेकिन आज इस दुःख की घड़ी में कांपते हाथों वह भी मंदिर गया। सुबह जल्दी गया, ताकि परमात्मा से पहली मुलाकात उसी की हो, पहली प्रार्थना वही कर सके। कोई दूसरा पहले ही मांग कर परमात्मा का मन खराब न कर चुका हो। बोहनी की आदत जो होती है, कमबख्त यहां भी नहीं छूटी....सो अल्ल-सुबह पहुंचा मन्दिर। लेकिन यह देख कर हैरान हुआ कि गांव का एक भिखारी उससे पहले से ही मन्दिर में मौजूद था। अंधेरा था, वह भी पीछे खड़ा हो गया, कि भिखारी क्या मांग रहा है? धनी आदमी सोचता है, कि मेरे पास तो मुसीबतें हैं; भिखारी के पास क्या मुसीबतें हो सकती हैं? और भिखारी सोचता है, कि मुसीबतें मेरे पास हैं। धनी आदमी के पास क्या मुसीबतें होंगी? एक भिखारी की मुसीबत दूसरे भिखारी के लिए बहुत बड़ी न थी । उसने सुना, कि भिखारी कह रहा है --हे परमात्मा । अगर पांच रुपए आज न मिलें तो जीवन नष्ट हो जाएगा। आत्महत्या कर लूंगा। पत्नी बीमार है और दवा के लिए पांच रुपए होना बिलकुल आवश्यक हैं। मेरा जीवन संकट में है। अमीर आदमी ने यह सुना और वह भिखारी बंद ही नहीं हो रहा है; कहे जा रहा है और प्रार्थना जारी है। तो उसने झल्लाकर अपने खीसे से पांच रुपए निकाल कर उस भिखारी को दिए और कहा - जा ये ले जा पांच रुपए, तू ले और जा जल्दी यहां से। अब वह परमात्मा से मुखतिब हुआ और बोला -- प्रभु, अब आप ध्यान मेरी तरफ दें, इस भिखारी की तो यही आदत है। दरअसल मुझे पांच करोड़ रुपए की जरूरत है।” भगवान मुस्करा उठे बोले -- एक छोटे भिखारी से तो तूने मुझे छुटकारा दिला दिया, लेकिन तुझसे छुटकारा पाने के लिए तो मुझको तुमसे भी बढा भिखारी ढूंढना पड़ेगा। तुम सब लोग यहां कुछ न कुछ मांगने ही आते हो, कभी मेरी जरूरत का भी ख्याल आया है? धनी आश्चर्यचकित हुआ बोला - प्रभु आपको क्या चाहिए? भगवान बोले - प्रेम। मैं भाव का भूखा हूँ। मुझे निस्वार्थ प्रेम व समर्पित भक्त प्रिय है। कभी इस भाव से मुझ तक आओ; फिर तुम्हे कुछ मांगने की आवश्यकता ही नही पड़ेगी। ******
- समर्पण
स्नेह लता अग्रवाल ये कहानी है सुरभि की, जो भोपाल की रहने वाली थी। सुरभि की शादी के बाद वो अपने ससुराल ग्वालियर पहुंची। शादी की रौनक खत्म हो चुकी थी, और धीरे-धीरे सभी मेहमान विदा ले चुके थे। लेकिन उसकी जेठानी, अनिता, अपने दो बच्चों के साथ दो दिन और रुक गई थीं। सुरभि के सास-ससुर का पहले ही देहांत हो चुका था, और अनिता ने ही शादी के सारे इंतजामों में खूब मेहनत की थी। अनिता ने सुरभि को बहुत स्नेह दिया ताकि उसे सास की कमी न खले। उन दो दिनों में, सुरभि ने धीरे-धीरे घर के कामकाज संभालना शुरू कर दिया। अपनी शांत और सौम्य स्वभाव से उसने हर किसी का दिल जीत लिया। अनिता ने भी मन ही मन सोच लिया कि उनके भाई को एक बेहतरीन जीवनसंगिनी मिल गई है। फिर वह समय आया जब अनिता को लौटना था। विदा लेते समय, अनिता ने सुरभि को गले लगाकर कहा, "सुरभि, मेरा भाई बहुत अच्छा इंसान है, वो तुम्हें कभी कोई तकलीफ नहीं देगा। तुम उसका ख्याल रखना। और हाँ, कभी भी कोई परेशानी हो तो मुझसे बेझिझक बात करना। ग्वालियर से भोपाल ज्यादा दूर नहीं है। मैं आती रहूंगी।" सुरभि ने नम्रता से उनके पैर छुए और मुस्कुराकर कहा, "दीदी, आप निश्चिंत रहें। मैं इनका और इस घर का पूरा ध्यान रखूंगी।" अनिता तो कार में बैठ गईं, लेकिन उनके बच्चे वहीं खड़े रहे। सुरभि ने हैरानी से कहा, "अरे, जाओ ममा के साथ बैठो।" अनिता मुस्कुराई और बोली, "अब तुम आ गई हो, तो ये यहीं रहेंगे..." इतना कहकर वह अचानक चुप हो गईं। सुरभि के दिल में एक हलचल सी मच गई। क्या दीदी अपने बच्चों की जिम्मेदारी मुझ पर छोड़कर जा रही हैं? कहीं ऐसा तो नहीं कि भोपाल में उनके बच्चों की पढ़ाई में कोई दिक्कत आ रही है? उसने ये बातें अपने मन में ही रखीं और पति अमन का ऑफिस से लौटने का इंतजार करने लगी। जैसे ही अमन घर आया, सुरभि ने उसे चाय दी और धीरे-धीरे बातों में पूछ ही लिया, "अमन, दीदी के बच्चे यहीं हमारे साथ रहेंगे?" अमन ने शांत स्वर में जवाब दिया, "ये दीदी के बच्चे नहीं, मेरे अपने बच्चे हैं। मेरी पहली पत्नी के निधन के बाद दीदी ने ही इन्हें पाल-पोसकर बड़ा किया है।" सुरभि का चेहरा फक हो गया। उसे समझ ही नहीं आया कि क्या बोले। गुस्से और नाराजगी में वो बोली, "आपने ये बात मुझसे क्यों छिपाई? क्या आप मुझसे झूठ बोले?" अमन ने गहरी सांस लेते हुए कहा, "सुरभि, मैंने तुम्हारे भाई को सब कुछ बता दिया था। उन्होंने तुम्हें नहीं बताया? मैंने तुमसे कोई बात नहीं छिपाई। फिर भी, अगर तुम्हें ये रिश्ता निभाना मुश्किल लगे तो तुम चाहो तो इस रिश्ते से आज़ाद हो सकती हो।" सुरभि के लिए ये शब्द चौंकाने वाले थे। उसे एक पल के लिए लगा जैसे जमीन खिसक गई हो। अब उसके सवाल और उलझ गए थे। क्या उसका अपना भाई उससे ये बात छिपा सकता है? वह चुपचाप सोफे पर बैठ गई, और मानो सारे सपने बिखरते हुए देख रही थी। अगली सुबह सुरभि की जेठानी, अनिता, का फोन आया। उन्होंने प्यार से कहा, "बेटा, हमने तुम्हारे भाई से कुछ भी नहीं छिपाया था। लेकिन अगर तुम्हें बच्चों से कोई परेशानी हो तो मैं इन्हें अपने पास ही रखूंगी। बस अपने भाई को मत छोड़ना, वो तुम्हें बहुत चाहता है।" सुरभि की आँखें भर आईं। उसने दिल पर हाथ रखकर सोचा कि अमन की कोई गलती नहीं है। अगर मेरे भाई ने ये बात मुझसे छिपाई, तो ये उसकी जिम्मेदारी थी, अमन की नहीं। धीरे-धीरे उसके मन में एक समझदारी का भाव आ गया। उसने सोच लिया कि प्यार और समझदारी से जिंदगी को बेहतर बनाया जा सकता है। सुरभि ने तुरंत फोन उठाया और अनिता को कहा, "दीदी, आप चिंता मत करें। मैं यहीं रहूंगी, और बच्चे भी मेरे साथ ही रहेंगे।" उसकी बात सुनकर अनिता ने राहत की साँस ली। सुरभि ने जैसे ही फोन रखा, देखा कि अमन दरवाजे पर खड़ा मुस्कुरा रहा था। उसकी आंखों में राहत और स्नेह दोनों थे। उनकी नजरें मिलीं और सुरभि शरमा कर मुस्कुरा दी। उस दिन दोनों ने समझ लिया था कि उनके रिश्ते में विश्वास और समर्पण ही सबसे बड़ा आधार है। *******
- सकारात्मक संगति में रहें
डॉ. कृष्णकांत श्रीवास्तव “संगति का असर गहरा होता है, या तो यह आपको ऊँचाइयों पर पहुँचा सकती है या फिर गर्त में गिरा सकती है।” हमारे जीवन में संगति का प्रभाव बहुत बड़ा होता है। यह कहावत आपने ज़रूर सुनी होगी – "जैसी संगत वैसी रंगत।" इसका अर्थ यही है कि हमारे आस-पास के लोगों का प्रभाव हमारे विचारों, व्यवहार और भविष्य तक पर पड़ता है। सकारात्मक संगति यानी उन लोगों के साथ रहना जो उत्साह, प्रेरणा, समझदारी और आत्मविश्वास से भरे हों। ऐसे लोग जो आपके सपनों का मजाक नहीं उड़ाते, बल्कि उन्हें पूरा करने के लिए आपको प्रोत्साहित करते हैं। आइए हम समझते हैं कि सकारात्मक संगति क्या है, इसके क्या लाभ हैं, नकारात्मक संगति से कैसे बचें, और हम अपने जीवन में इसे कैसे अपना सकते हैं। · सकारात्मक संगति का अर्थ क्या है? सकारात्मक संगति का अर्थ है – ऐसे लोगों के साथ रहना जो: अच्छे विचारों वाले हों, प्रेरणादायक हों, आपकी अच्छाइयों को पहचानें, आपकी कमज़ोरियों पर हँसने की बजाय उन्हें सुधारने में मदद करें, आपको ऊर्जावान और आत्मनिर्भर बनाएं। सकारात्मक संगति केवल दोस्तों तक सीमित नहीं होती, बल्कि यह परिवार, सहकर्मियों, शिक्षकों, मार्गदर्शकों और यहाँ तक कि उन किताबों, वीडियो या सोशल मीडिया कंटेंट तक फैली होती है जो आपके दिमाग को प्रभावित करते हैं। · क्यों ज़रूरी है सकारात्मक संगति? सकारात्मक लोग आपको आपकी क्षमताओं की याद दिलाते हैं। जब आप थकते हैं या हार मानने की सोचते हैं, तो यही लोग आपको प्रेरित करते हैं और विश्वास दिलाते हैं कि आप कर सकते हैं। नकारात्मक संगति आपको थका देती है, लेकिन सकारात्मक संगति आपको ऊर्जावान और उत्साही बनाती है। उनके साथ समय बिताकर आप तनाव से मुक्त महसूस करते हैं। जब जीवन में कोई बड़ा निर्णय लेना हो, तो सही संगति आपको तटस्थ और विवेकपूर्ण सलाह देती है जो आपके हित में होती है। सकारात्मक संगति अच्छे विचार, आदर्श और अनुशासन सिखाती है जो जीवन भर काम आते हैं। सकारात्मक लोग आपको न केवल प्रेरित करते हैं, बल्कि आपकी सोच को दिशा भी देते हैं जिससे आप अपने लक्ष्यों के प्रति ज्यादा समर्पित रहते हैं। · नकारात्मक संगति से नुकसान जहाँ एक तरफ सकारात्मक संगति आपको ऊपर उठाती है, वहीं नकारात्मक संगति आपको नीचे गिराने में कोई कसर नहीं छोड़ती। ये वे लोग होते हैं जो: हमेशा शिकायत करते हैं, आपको हतोत्साहित करते हैं, आपकी सफलताओं से जलते हैं, आपकी असफलताओं पर हँसते हैं, गॉसिप, आलोचना और आलस्य में डूबे रहते हैं। ऐसी संगति से व्यक्ति का आत्मविश्वास कमजोर होता है, वह अपने सपनों को छोड़ देता है, और धीरे-धीरे अपनी पहचान खो बैठता है। · सकारात्मक संगति को पहचानें कैसे? अक्सर लोग सोचते हैं कि कौन सही संगति है और कौन नहीं। इसके लिए कुछ संकेत हैं: जिन के साथ आपका मन हल्का और खुश महसूस करता है उनके साथ समय बिताइये। वे आपकी अच्छाइयों की सराहना करते हैं और बुराइयों पर प्यार से ध्यान दिलाते हैं। वे आपके सपनों में विश्वास रखते हैं और उनका मज़ाक नहीं उड़ाते। वे सकारात्मक सोच और समाधान पर बात करते हैं, न कि केवल समस्याओं पर। वे प्रेरणादायक किताबें पढ़ते हैं, अच्छे विचार साझा करते हैं और आपको आगे बढ़ने की प्रेरणा देते हैं। · सकारात्मक संगति कैसे बनाएँ? आप जैसे होंगे, वैसे ही लोग आपके पास आएँगे। खुद को ईमानदार, विनम्र, और प्रेरणादायक बनाइए। सकारात्मक सोच अपने आप आकर्षण का केंद्र होती है। अगर आपके आसपास वैसे लोग नहीं हैं तो प्रेरणादायक किताबें पढ़िए, पॉडकास्ट सुनिए, मोटिवेशनल वीडियोज़ देखिए। आज के डिजिटल युग में सीखने और जुड़ने के बहुत रास्ते हैं। अपना समय उन लोगों के साथ बिताइए जो आपको बेहतर बनाते हैं। जो लोग आपकी ऊर्जा चूसते हैं उनसे धीरे-धीरे दूरी बनाइए। सेवा, सामाजिक कार्य, अध्ययन समूह, या सकारात्मक मंचों से जुड़िए जहाँ अच्छे विचारों का आदान-प्रदान होता है। हर किसी को खुश करना जरूरी नहीं। अगर कोई आपकी सोच या आत्मा को नुकसान पहुँचा रहा है, तो उसे ‘ना’ कहना सीखें। · सफलता के लिए संगति का प्रभाव बहुत से महान व्यक्तियों ने संगति का महत्व स्वीकार किया है। स्वामी विवेकानंद कहते थे – “हम वही बनते हैं, जो हम सोचते हैं। और हमारी सोच हमारी संगति से बनती है।” डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने अपने जीवन में हमेशा अच्छे गुरुओं और सकारात्मक सोच रखने वाले लोगों का साथ अपनाया। उन्होंने कहा था – “आपका भविष्य उस संगति पर निर्भर करता है जिसमें आप समय बिताते हैं।” महात्मा गांधी, नेल्सन मंडेला, रतन टाटा, और संदीप माहेश्वरी जैसे व्यक्तियों की सफलता में उनकी संगति, उनके मार्गदर्शक और प्रेरणास्रोतों की बड़ी भूमिका रही है। आज के युग में युवा सोशल मीडिया, दोस्तों और बाहरी दुनिया से अत्यधिक प्रभावित हैं। ऐसे में उन्हें अपने आस-पास की संगति का चयन बहुत सोच-समझकर करना चाहिए। जो दोस्त आपको गलत रास्ते पर ले जाएँ, उनसे दूर रहें। जो आपको पढ़ाई, करियर और आत्मविकास के लिए प्रेरित करें, उनके साथ समय बिताइए। जो बातें आपके आत्मबल को कमजोर करती हैं, उन्हें छोड़िए। याद रखें – आप पाँच लोगों का औसत हैं, जिनके साथ आप सबसे अधिक समय बिताते हैं। सकारात्मक संगति केवल एक विकल्प नहीं, बल्कि एक आवश्यकता है। यह जीवन की दिशा तय करती है। यह आपको आपके सपनों की ओर ले जाती है, आपको विश्वास देती है, और आपके जीवन को सुंदर बनाती है। तो आज ही निर्णय लीजिए – मैं नकारात्मक संगति से दूरी बनाऊँगा। मैं सकारात्मक सोच वाले लोगों के साथ रहूँगा। मैं खुद एक प्रेरणास्त्रोत बनूँगा, दूसरों को प्रेरित करूँगा। क्योंकि सकारात्मक संगति सिर्फ संगति नहीं, सफलता की सीढ़ी है। "रंग तो हर फूल में होता है, लेकिन बाग़ वही महकता है जहाँ अच्छी मिट्टी हो। संगति भी मिट्टी जैसी है, जो आपको या तो महका देती है या मुरझा देती है।" ******
- रोज कुछ नया जीवन में उतारें
डॉ. कृष्णकांत श्रीवास्तव जीवन एक निरंतर बहती नदी है, जो कभी नहीं रुकती। हर दिन हमारे जीवन में एक नया अवसर लेकर आता है – कुछ नया सीखने, कुछ नया करने, और कुछ नया बनने का। लेकिन कई लोग इस अवसर को पहचान नहीं पाते और रोज़ की एक जैसी दिनचर्या में उलझे रहते हैं। जबकि सच्चाई यह है कि जो व्यक्ति हर दिन कुछ नया सीखता है, वही आगे बढ़ता है, वही जीवन को वास्तव में जीता है। आइए हम समझते हैं कि "रोज कुछ नया जीवन में उतारना" क्यों ज़रूरी है, यह कैसे किया जा सकता है, और इसके क्या अद्भुत लाभ होते हैं। · जीवन में बदलाव क्यों ज़रूरी है? आपने देखा होगा कि प्रकृति खुद हर दिन नया रूप धारण करती है – सूरज हर सुबह नई रोशनी लेकर आता है, मौसम बदलते हैं, पेड़ अपने पुराने पत्ते गिराकर नए पत्तों से सजते हैं। प्रकृति से ही हमें सीखना चाहिए कि बदलाव जीवन का नियम है। अगर हम हर दिन कुछ नया नहीं सीखते या नहीं अपनाते, तो हम रुक जाते हैं – और रुकना मतलब पीछे रह जाना। · 'रोज कुछ नया' का मतलब क्या है? यह जरूरी नहीं कि आप हर दिन कोई बहुत बड़ा बदलाव करें। “कुछ नया” का अर्थ है – एक नई आदत अपनाना, कोई नई चीज़ पढ़ना या जानना, एक नया कौशल सीखना, किसी नए व्यक्ति से मिलना, कोई नई सोच अपनाना, या फिर पुराने तरीके से कुछ नया करना। यह नया अनुभव आपके दिमाग को तरोताज़ा करता है, जीवन को जीवंत बनाता है, और आपको बेहतर इंसान बनने की राह पर आगे बढ़ाता है। · 'रोज कुछ नया' अपनाने के लाभ व्यक्तित्व में निखार आता है। जब हम हर दिन कुछ नया सीखते हैं, तो हमारी सोच विकसित होती है। हम और अधिक समझदार, विनम्र और आत्मनिर्भर बनते हैं। आत्मविश्वास बढ़ता है। हर नई सीख या सफलता आपको यह यकीन दिलाती है कि आप और भी कुछ कर सकते हैं। नए अवसरों के लिए तैयार रहते हैं। दुनिया तेजी से बदल रही है। जो लोग नए बदलावों को अपनाते हैं, वे हर चुनौती का सामना आसानी से कर लेते हैं। मन और मस्तिष्क सक्रिय रहता है। हर दिन नई चीजें करने से दिमाग की सक्रियता बनी रहती है और मानसिक थकान दूर होती है। जीवन में उद्देश्य और प्रेरणा मिलती है। रोज़ कुछ नया करने की आदत से आपको हर दिन के लिए एक लक्ष्य मिलता है, जिससे जीवन रोचक और उद्देश्यपूर्ण बनता है। · हर दिन नया क्या करें? अब सवाल उठता है – हम रोज क्या नया कर सकते हैं? आइए कुछ सरल और उपयोगी उपाय जानते हैं: हर दिन कोई नया हिंदी या अंग्रेज़ी शब्द याद करें, या किसी महान व्यक्ति का विचार पढ़ें। रोज कोई भी अच्छी पुस्तक, जीवन कथा, प्रेरणात्मक लेख का केवल एक पेज पढ़ना भी आपके सोचने का तरीका बदल सकता है। रोज नए लोगों से बात करके उनके अनुभवों से बहुत कुछ सीखा जा सकता है। रोज कोई छोटा कौशल सीखें : जैसे टाई बाँधना, जल्दी उठना, डिजिटल टूल्स सीखना, एक नई रेसिपी बनाना – ये छोटे कदम आपके आत्मनिर्भरता को बढ़ाते हैं। रोज एक अच्छी आदत डालें जैसे – समय पर उठना, मोबाइल कम चलाना, दूसरों की बात ध्यान से सुनना, समय प्रबंधन आदि। · जीवन के उदाहरणों से सीखें ü डॉ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम ने जीवनभर हर दिन कुछ नया सीखा – चाहे वो वैज्ञानिक प्रयोग हों या अध्यात्म। उन्होंने कहा था – “सपने वो नहीं जो हम नींद में देखते हैं, सपने वो हैं जो हमें सोने नहीं देते।” और ऐसे सपनों को सच करने के लिए हर दिन नया प्रयास ज़रूरी है। ü महात्मा गांधी कहते थे – “खुद वो बदलाव बनिए जो आप दुनिया में देखना चाहते हैं।” यह बदलाव तभी संभव है जब हम अपने जीवन में रोज़ नया सुधार और सीख को अपनाएं। ü स्टीव जॉब्स हर दिन खुद से पूछते थे – “अगर आज मेरा आखिरी दिन होता, तो क्या मैं वही करता जो मैं करने जा रहा हूँ?” यह सवाल ही हमें हर दिन कुछ नया करने की प्रेरणा देता है। प्रिय युवाओं, आपके पास समय है, ऊर्जा है और दुनिया को बदलने की क्षमता है। इस समय को सिर्फ सोशल मीडिया, मनोरंजन या दोस्तों में न गंवाएँ। हर दिन खुद से एक सवाल पूछिए – "क्या मैंने आज कुछ नया सीखा?" अगर जवाब हाँ है – तो आप बढ़ रहे हैं। अगर नहीं – तो कुछ नया करने की शुरुआत अभी करें। याद रखें – "हर दिन एक नया अवसर है, खुद को बेहतर बनाने का।" · 'रोज नया' के लिए अनुशासन कैसे लाएँ? सुबह के समय 15 मिनट केवल अपने विकास के लिए निकालें – पढ़ने, सोचने या योजना बनाने के लिए। डायरी या नोट्स बनाएं – हर दिन आपने क्या नया सीखा, इसे लिखें। हर हफ्ते अपने 'नए अनुभव' का मूल्यांकन करें – इससे प्रेरणा बनी रहेगी। दूसरों को भी प्रेरित करें – खुद की सीख दूसरों से साझा करें। सीख बाँटने से दो गुना असर होता है। हर व्यक्ति एक खास मकसद के लिए इस दुनिया में आया है। लेकिन उस मकसद तक पहुँचने के लिए निरंतर विकास आवश्यक है। और यह विकास तभी संभव है जब हम हर दिन कुछ नया सीखें, समझें और जीवन में उतारें। "रोज कुछ नया" जीवन को न केवल सुंदर बनाता है, बल्कि आपको आत्मनिर्भर, आत्मविश्वासी और प्रेरणादायक बनाता है। छोटे-छोटे बदलाव ही आगे चलकर बड़े परिवर्तन बनते हैं। तो आइए, आज से ही ठान लें – मैं हर दिन कुछ नया सीखूँगा, हर दिन खुद को थोड़ा बेहतर बनाऊँगा। क्योंकि जीवन तब ही सार्थक है जब हम ठहरते नहीं, बढ़ते रहते हैं। "हर दिन उठो एक नई उम्मीद के साथ, हर शाम सोओ एक नई सीख के साथ।" "जो रोज़ कुछ नया करता है, वही इतिहास बनाता है।" *******
- ऐसी होती हैं बेटियां
जमुना प्रसाद मिश्र लड़कियों के एक विद्यालय में आई नई अध्यापिका बहुत खूबसूरत थी, बस उम्र थोड़ी अधिक हो रही थी लेकिन उसने अभी तक शादी नहीं की थी। सभी छात्राएं उसे देखकर तरह-तरह के अनुमान लगाया करती थीं। एक दिन किसी कार्यक्रम के दौरान जब छात्राएं उसके इर्द-गिर्द खड़ी थीं तो एक छात्रा ने बातों बातों में ही उससे पूछ लिया कि मैडम आपने अभी तक शादी क्यों नहीं की...? अध्यापिका ने कहा- "पहले एक कहानी सुनाती हूं। एक महिला को बेटे होने की लालच में लगातार पांच बेटियां ही पैदा होती रहीं। जब छठवीं बार वह गर्भवती हुई तो पति ने उसको धमकी दी कि अगर इस बार भी बेटी हुई तो उस बेटी को बाहर किसी सड़क या चौक पर फेंक आऊंगा। महिला अकेले में रोती हुई भगवान से प्रार्थना करने लगी, क्योंकि यह उसके वश की बात नहीं थी कि अपनी इच्छानुसार बेटा पैदा कर देती। इस बार भी बेटी ही पैदा हुई। पति ने नवजात बेटी को उठाया और रात के अंधेरे में शहर के बीचों-बीच चौक पर रख आया। मां पूरी रात उस नन्हीं सी जान के लिए रो रोकर दुआ करती रही। दूसरे दिन सुबह पिता जब चौक पर बेटी को देखने पहुंचा तो देखा कि बच्ची वहीं पड़ी है। उसे जीवित रखने के लिए बाप बेटी को वापस घर लाया लेकिन दूसरी रात फिर बेटी को उसी चौक पर रख आया। रोज़ यही होता रहा। हर बार पिता उस नवजात बेटी को बाहर रख आता और जब कोई उसे लेकर नहीं जाता तो मजबूरन वापस उठा लाता। यहां तक कि उसका पिता एक दिन थक गया और भगवान की इच्छा समझकर शांत हो गया। फिर एक वर्ष बाद मां जब फिर से गर्भवती हुई तो इस बार उनको बेटा हुआ। लेकिन कुछ ही दिन बाद ही छह बेटियों में से एक बेटी की मौत हो गई, यहां तक कि माँ पांच बार गर्भवती हुई और हर बार बेटे ही हुए। लेकिन हर बार उसकी बेटियों में से एक बेटी इस दुनियां से चली जाती।"
- गलत धारणा
रवि शंकर गुप्ता "लीजिए भाभी मुंह मीठा कीजिए।" आशीष जी ने अपनी भाभी रमीला जी को मिठाई देते हुए कहा। रमीला जी मिठाई मुंह में रखकर बोली। "देवर जी किस चीज की मिठाई बाटी जा रही है। लगता है अबकी बार तो बेटा हुआ है देवरानी जी को।" "नहीं भाभी बेटा नहीं दूसरी भी लक्ष्मी ही आई है। और उसके आने की खुशी में ही मिठाई बांट रहा हूं।" आशीष जी ने खुश होकर अपनी भाभी से कहा। बेटी का नाम सुनकर रमीला जी का मानो मुंह कड़वा हो गया हो। मानो उन्होंने मिठाई ना खा कर कुछ कड़वी बुरी चीज खाली हो। वह एकदम मुंह बनाकर बोली..... "बेटी के होने की कौन मिठाई बांटता है। वह भी दूसरी बेटी होने की। मिठाई तो बेटों के होने की खुशी में बांटी जाती है। बेटियां तो शादी होकर ससुराल चली जाती है। बेटे ही तो वारिस होते हैं। बुढ़ापे मां बाप को देखते हैं, उनकी देखभाल करते हैं। अब देखो हमारे दो बेटे हैं। हमारे बुढ़ापे का सहारा।" रमीला जी को अपने दो बेटे होने पर बहुत घमंड था। उसी घमंड के आगे वह अपने देवर जी को नीचा दिखाना चाहती थी। लेकिन आशीष जी ने बुरा नही माना और कहा.... "कोई बात नहीं भाभी मेरे बेटा नहीं हुआ तो क्या हुआ मेरी तो यही बेटियां मेरे बुढ़ापे का सहारा बनेगी। और यह कह कर अपने घर आ गए। उधर आशीष की पत्नी मनीषा अस्पताल से डिस्चार्ज होकर घर आ गई। अब वह दोनों अपनी बेटियों को बड़े प्यार से पालने लगे। उन्हें इतने प्यार से बेटियों की परवरिश करते देखकर रमीला जी मुंह बनाती और कहती थी। "देखो कितने लाड लड़ाए हैं जा रहे हैं। जितने भी लाड लड़ा लो बेटे ही नाम रोशन करते हैं। और बेटे ही बुढ़ापे का सहारा होते हैं। बेटियों का क्या है कितने ही नखरे उठाओ लेकिन यह शादी होकर अपने ससुराल चली जाती हैं। मनीषा तुम एक बार फिर से देख लो क्या पता आपके बेटा हो जाए।" तब मनीषा उनकी बात सुनकर कहती। "भाभी बेटा होना होता तो अब तक हो जाता और वैसे भी मुझे तो मेरी दोनों बेटियां ही बहुत है। हम उनकी परवरिश करके ही अपने सारे सपने पूरे कर लेंगे। हम बेटे और बेटी में कोई फर्क नहीं मानते। मनीषा का जवाब सुनकर रमीला जी मुंह बनाती और कहती।











