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निःशब्द

रमा शंकर शर्मा

"आज कैसी तबीयत है?"
मां ने रोज की तरह सुबह उठते ही मेरा हाल चाल जानने के लिए फोन लगाया। कई दिन से मेरी तबीयत खराब चल रही थी। ना बच्ची पर ध्यान दे पा रही थी और ना ही घर संभालने पर। पतिदेव भी जितना सहयोग हो पा रहा था, कर रहे थे।
मैंने मां से कहा - "मां ! आज तो अचानक ही मेरी तबीयत में काफी सुधार महसूस हो रहा है। लग रहा है कि जैसे कुछ हुआ ही नहीं था मुझे।"
मां के कलेजे को तसल्ली पड़ी मेरे यह शब्द सुनकर। बोलीं - "शुक्र है माता रानी का... मेरा बताया हुआ काढ़ा आखिर असर कर ही गया, चल ठीक है तू अपना ध्यान रख।"
पतिदेव ऑफिस में लाख व्यस्त रहते, लेकिन लंच के समय बाहर का खाना उन्हें मेरी याद दिला देता और वह खाने से पहले मेरा हाल चाल जानने के लिए फोन करते। वे भी आज मेरी काफी सुधार महसूस होने की बात सुनकर खुश होकर बोले - "मैंने कहा था ना पहले वाली दवाइयां सूट नहीं कर रही हैं। जब से दूसरे डॉक्टर को दिखाया है तब से सुधार हुआ है, तुम मान नहीं रही थीं ना मेरी बात!"
पड़ोस वाली निधि भी घर आकर कुछ ना कुछ सहायता के लिए पूछ जाती थी। आज जब उसे फोन पर बताया कि आज तो मुझे ऐसा लग रहा है कि मैं बीमार हुई ही नहीं... तो वह भी चहक कर बोली - "अरे यार! मुझे पता था मेरे चाचा जी के गांव के वैध की दी हुई पुड़ियाओं का ही असर है। चलो बहुत अच्छी बात है, तुम ठीक हो गई हो।"
मैं नहा धोकर अपनी छोटी सी बेटी के सिरहाने बैठी और उसे दुलारने लगी। उसने आंख खुलते ही पूछा - "मम्मा... आप कैसे हो?"
मैंने कहा- "आज तो मैं एकदम ठीक हूं मेरी गुड़िया रानी!" इतने दिनों से उससे जी भर कर प्यार भी नहीं कर पा रही थी कि उसे कोई संक्रमण ना हो जाए।
मेरे गले में झूलते हुए और मुझे चूमते हुए उसने बताया - "मम्मा, मैं कल रात भगवान जी के सामने बहुत देर तक बैठी रही और उनसे जिद की कि जब तक आप मेरी मम्मा को ठीक नहीं करोगे मैं आपसे बात नहीं करूंगी।"
मैं निःशब्द थी.... जान गई थी कि आज अचानक तबीयत में सुधार किस वजह से था।

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