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  • मेरी मां

    पुष्पा कुमारी "पुष्प" "सुनिए! आजकल माँ जी खाना ठीक से नहीं खाती।" रसोई से निपट कर कमरे में आकर पति के बगल में बैठते हुए रजनी ने यह बात अपने पति को बताना जरूरी समझा लेकिन रजनी की बात सुन उसका पति रूपेश तनिक हैरान हुआ। "मैं कुछ समझा नहीं?" "माँ जी इधर हफ्ते भर से हर रोज अपनी थाली से में रखी चार रोटियों में से दो रोटी निकालकर अलग कर लेती हैं।" "तुम कहना क्या चाहती हो?" "घर के डस्टबिन में घर के लोग रोटियों को फेंका हुआ देख लेंगे सोचकर आंचल में समेट मां जी सोसायटी के गेट की ओर चली जाती हैं।" "मतलब तुम कहना चाहती हो कि मां को घर के भोजन की कद्र नहीं है।" "मैंने ऐसा कुछ नहीं कहा! लेकिन आजकल मांजी सिर्फ दो रोटियां ही खाती हैं, उनकी सेहत खराब होने की चिंता लगी रहती है मुझे इसलिए मैंने यह बात आपको बता दी बस।" यह कहते हुए रजनी कमरे से निकलकर वापस रसोई की ओर चली गई लेकिन पत्नी की बात सुनकर रूपेश सोच में पड़ गया कि आखिर मां ऐसा क्यों कर रही हैं। रुपेश की मां शारदा जी बहुत ही सुलझी हुई शांत प्रवृत्ति की महिला थी। रुपेश और उसकी पत्नी रजनी शारदा जी का पूरा ख्याल रखते थे इसलिए बहू या बेटे से नाराज होने का कोई सवाल ही नहीं उठता था। खैर रूपेश ने अपनी मां के मन की बात जानने की ठान ली। उस दिन रविवार होने की वजह से रुपेश के दफ्तर की छुट्टी थी इसलिए वह घर पर ही था। नियत वक्त पर रूपेश की मां शारदा जी स्नान-ध्यान कर भोजन के लिए बैठी थी लेकिन रुपेश की निगाहें अपनी मां पर ही टिकी रही। आज भी शारदा जी ने थाली में पड़ी चार रोटीयों में से दो रोटी थोड़ी सब्जी के साथ निकाल कर अलग रख ली और बाकी की दो रोटियों को बड़े प्रेम से खा लिया और भोजन के तुरंत बाद.. "थोड़ी देर बाहर टहल कर आती हूँ!" कह कर शारदा जी उन दोनों रोटियों को अपने आंचल में समेट घर के मुख्य द्वार से बाहर निकल गई। शारदा जी के घर से निकलने के थोड़ी देर बाद जिज्ञासावश रूपेश भी अपनी मां के पीछे हो लिया। शारदा जी बिना कहीं रुके सोसाइटी के मुख्य द्वार की ओर बढ़ रही थी और रुपेश उनके पीछे-पीछे चला आ रहा था। सोसायटी के मेन गेट पर सोसाइटी का बुजुर्ग दरबान अपनी ड्यूटी पर मौजूद था और शारदा जी को देखते ही उसने हाथ जोड़कर अभिवादन किया। शारदा जी ने अपने आंचल में रखी दोनों रोटियां उस दरबान की ओर बढ़ा दिया और सोसाइटी के मेनगेट से बाहर टहलने निकल गई। दरबान ने रोटियों को ऐसे ग्रहण किया मानो वह दो रोटियां सिर्फ रोटीयां नहीं जैसे भगवान का प्रसाद हो लेकिन रूपेश पर नजर पड़ते ही दरबान कृतज्ञ भाव से बोल उठा। "साहब! माताजी को तो मैं रोज प्रणाम कर लेता हूँ लेकिन मैडम को आप मेरी तरफ से धन्यवाद कह दीजिएगा।" "किस बात के लिए?" उस बुजुर्ग दरबान की बात सुनकर रूपेश को हैरानी हुई लेकिन वह बुजुर्ग दरबान रूपेश को बताने लगा। "एक दिन मैं चक्कर खाकर माताजी के सामने ही यहां गिर गया था।" "आपको कहीं चोट तो नहीं आई! आपकी तबीयत तो ठीक है ना?" रूपेश को दरबान के प्रति फिक्र हुई लेकिन दरबान मुस्कुराते हुए आगे बताने लगा। "नहीं साहब अब मैं ठीक हूँ! असल में मेरा बेटा और बहू दोनों महीने भर के लिए गाँव गए हैं इसलिए मैं रोज सुबह बिना कुछ खाए ही ड्यूटी पर चला आता हूँ! उस दिन यह जानने के बाद माताजी ने शायद मैडम को यह बात बता दी और मैडम हर रोज माता जी के हाथ से मेरे लिए दो रोटी भेज देती हैं! मैडम बहुत दयालु है साहब।" इतना कहते-कहते दरबान की आंखें नम हो आईं और दरबान की बात सुनकर रूपेश उल्टे पाँव अपने घर की ओर लौट गया। घर पहुंचकर रूपेश ने रजनी को अपने पास बुला कर सारी बात बताई। तभी दरवाजे पर हल्की दस्तक सी हुई, शारदा जी बाहर से टहल कर घर वापस आ चुकी थी। "मांजी! आप हफ्ते भर से रोज सिर्फ दो रोटी खा रही हैं लेकिन आपने मुझे कभी नहीं बताया कि आप ऐसा क्यों कर रही हैं! क्या मैं इतनी पराई हूँ।" रजनी की आंखें भर आई लेकिन शारदा जी ने आगे बढ़कर बहू को बाहों में भर लिया। "नहीं बहू! ऐसी कोई बात नहीं है, तुम मेरी इतनी सेवा करती हो कि तुम पर और अधिक बोझ डालना मुझे अच्छा नहीं लगता इसलिए।" "नहीं मांजी! यह बोझ नहीं पुण्य का काम है, मैं कल से दो रोटी ज्यादा बनाकर अलग से पैक कर दिया करूंगी ताकि आप भरपेट भोजन कर तन से और दूसरों के प्रति दया भाव रखकर मन से सेहतमंद रहे।" अपनी मां की संतुष्टि और अपनी पत्नी की समझदारी देख रूपेश का हृदय बिना भोजन किए ही अचानक तृप्त हो उठा। ******

  • हलवे का कटोरा

    डॉ. कृष्ण कांत श्रीवास्तव एक दिन मेरे पिता ने हलवे के 2 कटोरे बनाये और उन्हें मेज़ पर रख दिया। एक के ऊपर 2 बादाम थे, जबकि दूसरे कटोरे में हलवे के ऊपर कुछ नहीं था। फिर उन्होंने मुझे हलवे का कोई एक कटोरा चुनने के लिए कहा, क्योंकि उन दिनों तक हम गरीबों के घर बादाम आना मुश्किल था। मैंने 2 बादाम वाले कटोरे को चुना। मैं अपने बुद्धिमान विकल्प पर खुद को बधाई दे रहा था, और जल्दी-जल्दी मुझे मिले 2 बादाम हलवा खा रहा था। परंतु मेरे आश्चर्य का ठिकाना नही था, जब मैंने देखा कि मेरे पिता वाले कटोरे के नीचे 4 बादाम छिपे थे। बहुत पछतावे के साथ, मैंने अपने निर्णय में जल्दबाजी करने के लिए खुद को डांटा। मेरे पिता मुस्कुराए और मुझे यह याद रखना सिखाया कि, आपकी आँखें जो देखती हैं वह हरदम सच नहीं हो सकता, उन्होंने कहा कि यदि आप स्वार्थ की अपनी आदत बना लेते हैं तो आप जीत कर भी हार जाएंगे। अगले दिन, मेरे पिता ने फिर से हलवे के 2 कटोरे पकाए और टेबल पर रक्खे एक कटोरा के शीर्ष पर 2 बादाम और दूसरा कटोरा जिसके ऊपर कोई बादाम नहीं था। फिर से उन्होंने मुझे अपने लिए कटोरा चुनने को कहा। इस बार मुझे कल का संदेश याद था, इसलिए मैंने शीर्ष पर बिना किसी बादाम वाली कटोरी को चुना। परंतु मेरे आश्चर्य करने के लिए इस बार इस कटोरे के नीचे एक भी बादाम नहीं छिपा था। फिर से, मेरे पिता ने मुस्कुराते हुए मुझसे कहा, मेरे बच्चे, आपको हमेशा अनुभवों पर भरोसा नहीं करना चाहिए, क्योंकि कभी-कभी, जीवन आपको धोखा दे सकता है या आप पर चालें खेल सकता है। स्थितियों से कभी भी ज्यादा परेशान या दुखी न हों, बस अनुभव को एक सबक के रूप में समझें, जो किसी भी पाठ्यपुस्तकों से प्राप्त नहीं किया जा सकता है। तीसरे दिन, मेरे पिता ने फिर से हलवे के 2 कटोरे पकाए। पहले 2 दिन की ही तरह, एक कटोरे के ऊपर 2 बादाम, और दूसरे के शीर्ष पर कोई बादाम नहीं। मुझे उस कटोरे को चुनने के लिए कहा जो मुझे चाहिए था। लेकिन इस बार, मैंने अपने पिता से कहा, पिताजी, आप पहले चुनें, आप परिवार के मुखिया हैं और आप परिवार में सबसे ज्यादा योगदान देते हैं। आप मेरे लिए जो अच्छा होगा वही चुनेंगे। मेरे पिता मेरे लिए खुश थे। उन्होंने शीर्ष पर 2 बादाम के साथ कटोरा चुना, लेकिन जैसा ही मैंने अपने कटोरे का हलवा खाया। कटोरे के हलवे के एकदम नीचे 8 बादाम और थे। मेरे पिता मुस्कुराए और मेरी आँखों में प्यार से देखते हुए, उन्होंने कहा - मेरे बच्चे, तुम्हें याद रखना होगा कि, जब तुम भगवान पर सब कुछ छोड़ देते हो, तो वे हमेशा तुम्हारे लिए सर्वोत्तम का चयन करेंगे। और जब तुम दूसरों की भलाई के लिए सोचते हो, अच्छी चीजें स्वाभाविक तौर पर आपके साथ भी हमेशा होती रहेंगी। शिक्षा : बड़ों का सम्मान करते हुए उन्हें पहले मौका व स्थान देवें, बड़ों का आदर-सम्मान करोगे तो कभी भी खाली हाथ नही लौटोगे। *****

  • रौनक

    मीनाक्षी चौहान कितने दिन हो गये थे फिर भी मम्मी जी बात-बात पर भावुक हो कर रो पड़तीं। नानी सास को गुजरे महीने भर से ज्यादा हो गया था पर जब-तब मम्मी जी की आँखों में आँसू देखकर मेरा मन भी भर आता। इधर मम्मी जी और उधर मेरी अपनी दादी दोनों के लिये ये बड़ा कठिन समय था। मम्मी जी की माँ थीं तो मेरी दादी की बेस्ट फ्रेंड। दादी और नानी सास दोनों कॉलेज के दिनों की साथी थी। उन दोनों ने ही अपनी दोस्ती को मेरी शादी से रिश्तेदारी में बदला। दो दिन बाद करवाचौथ है। एक तो घर में कोई रौनक नहीं ऊपर से आज माँ ने फ़ोन करके मेरी ससुराल आने से मना कर दिया। हर साल तो करवाचौथ पर आतीं हैं इस बार उनका यूँ मना कर देना मेरी समझ से परे था। बेमन सी मैं काम निपटा रही थी कि बैल बजी, दरवाजा मम्मी जी ने खोला। ये क्या......दादी इस समय यहाँ पर। मम्मी जी मेरी दादी से लिपट कर बिलख पड़ी। "रोती क्यूँ है....मैं हूँ ना।" उनके बेकाबू आँसुओं को दादी ने अपने आँचल में समेट लिया। मम्मी जी थोड़ा सहज हुईं। "देख तो तेरे लिये क्या लायी हूँ।" दादी कागज के थैले से लाल-पीली लहरिया गोटेदार साड़ी निकाल कर मम्मी जी को देते हुए बोलीं। "ये साड़ी.........।" मम्मी जी चौंक सी गईं। "क्या हुआ?" दादी ने हैरानी से पूछा। "बिल्कुल ऐसी ही साड़ी का मन था मेरा। माँ से इस बार देने के लिये बोलती पर माँ तो....... ।" "दिल छोटा नहीं करते, समझ ले तेरी माँ ही लायी है। त्योहार का समय है ना बस खुशी-खुशी उसकी तैयारी कर।" दादी मम्मी जी सिर पर प्यार से हाथ फेरते हुए बोलीं। "और दादी मेरी साड़ी।" "ओह! तेरे लिये तो लाना ही भूल गयी।" "पर आप मुझे तंग करना कभी नहीं भूलोगी।" कहते हुए मैनें झट से दूसरे थैले से अपनी वाली साड़ी निकाल ली। हम दोनों दादी-पोती की चुहलबाजी देखकर मम्मी जी मुस्कुरा पड़ी। हाय! उनकी इस मुस्कुराहट पर तो मैं वारी-वारी जाऊँ। आखिर घर की रौनक मम्मी जी की मुस्कुराहट के साथ धीरे-धीरे वापस जो आ रही थी। ******

  • भाग्य

    डॉ. कृष्ण कांत श्रीवास्तव यात्रियों से भरी बस चली जा रहा थी, जब अचानक मौसम बदला और भारी बारिश चालू हो गयी और बिजली भी चारों तरफ चमकने लगी। सभी देख रहे थे कि बिजली कभी भी बस को चपेट में ले सकती है। रोशनी से बचने के 2 या 3 कठिन प्रयास के बाद, चालक ने पेड़ से पचास फुट की दूरी पर बस बंद कर कहा - "हमारे पास बस में कोई है जिसकी मृत्यु आज निश्चित है।" उस व्यक्ति की वजह से बाकी सब लोग भी आज मारे जाएंगे। अब ध्यान से सुनिये जो मैं कह रहा हूं। मैं चाहता हूं कि प्रत्येक व्यक्ति बस से उतर एक-एक कर बाहर जाकर पेड़ के तने को स्पर्श करे और वापस आ जाए। "जिसकी मौत निश्चित है वह बिजली से पकड़ा जाएगा और मर जाएगा और बाकी सभी को बचा लिया जाएगा।" उसने पहले व्यक्ति को जाने और पेड़ को छूने और वापस आने के लिये कहा। वह अनिच्छा से बस से उतर गया और पेड़ को छु आया। उसका दिल प्रसन्न हो गया जब कुछ भी नहीं हुआ और वह अभी भी जीवित था। यही क्रम बाकी यात्रियों के लिए जारी रहा और उन सभी को राहत मिली जब वे पेड़ को छु कर लौटे और कुछ भी नहीं हुआ। लेकिन जब आखिरी यात्री की बारी आई, तो सभी उसे आँखों से घूरने लगे। वह यात्री बहुत डर गया और अनिच्छुक था क्योंकि वही केवल अकेला बचा था। सभी ने उसे नीचे उतरने और पेड़ को छूने के लिए मजबूर किया। मृत्यु के 100% भय के साथ, अंतिम यात्री पेड़ के पास गया और उसे छुआ। उसी समय वहाँ गड़गड़ाहट की एक बड़ी आवाज़ गूँजी और बिजली ने बस को चपेट में ले लिया - हां, बिजली के चपेट में आने से बस के अंदर सभी मारे गये। इस घटना से यह स्पष्ट हो गया कि पूरी बस इस आखिरी यात्री की उपस्थिति के कारण सुरक्षित थी। कई बार, हम अपनी वर्तमान उपलब्धियों के लिए स्वयं श्रेय लेने की कोशिश करते हैं, लेकिन यह भूल जाते हैं कि यह हमारे साथ जूडे एक व्यक्ति के कारण है। शायद उस व्यक्ति की वजह से हम अपनी वर्तमान खुशी, सम्मान, प्रेम, नाम, प्रसिद्धि, वित्तीय सहायता, शक्ति, स्थिति और क्या नहीं आनंद ले रहे हैं। अपने चारों ओर देखिए - शायद आपके माता-पिता, आपके पति या पत्नी, आपके बच्चे, आपके भाई-बहन, आपके मित्र आदि के रूप में आपके आस-पास कोई है, जो आपको नुकसान से बचा रहे हैं। इसके बारे में सोचिये और उस आत्मा को धन्यवाद दीजिए। *****

  • इंकलाब लिखता हूँ।

    अमरेन्द्र मैं जो भी लिखता हूँ, इंकलाब लिखता हूँ। किसी के दुख-दर्द से, जुड़ा सवाल लिखता हूँ। मैं तो बस इतना ही, काम करता हूँ। हर अन्याय के विरुद्ध, मैं कलम चलाता हूँ। मैं गंदे विचारों से, हमेशा दूर रहता हूँ। जिससे सबका हो भला, वही विचार रखता हूँ। मैं टूटे को जोड़ने का, प्रयास करता हूँ। जो भटक गया है, उसे सही रास्ते पर, लाना चाहता हूँ। मैं इस धरती को स्वर्ग से, बेहतर देखना चाहता हूँ। मैं एक इंसान हूँ, इंसानियत से वास्ता रखता हूँ। मैं सोए को आज, जगाने को लिखता हूँ। मैं जो भी लिखता हूँ, इंकलाब लिखता हूँ। *****

  • यादगार करवाचौथ

    वन्दना पुरोहित सुनीति अपने पति राकेश को खाना खिलाते हुए हमेशा की तरह बड़ी उत्सुकता से पूछती "आज काहे का डेकोरेशन करके आए हो।" राकेश जल्दी-जल्दी खाना खाते हुए" बेबी शावर" सुनीती "अरे वाह!" जब भी राकेश के डेकोरेशन का एल्बम देखती तो उसे महिलाओं के विशेष प्रोग्राम का डेकोरेशन देख बहुत खुशी होती सोचती वो महिलायें कितनी खुशनसीब हैं जिनके लिए स्पेशल प्रोग्राम इतनी तैयारी के साथ होता है। कभी-कभी तो राकेश को कहती "मुझे भी कभी साथ लेकर जाओ मैं भी देखूँगी।" राकेश अपनी दमदार आवाज में कहता "वहाँ तुम्हारा क्या काम।" सुनीता मुँह लटका कर बैठ जाती एक दिन राकेश को फ्लावर डेकोरेशन करना था। तो फूल वाली चमेली की दुकान गया और उससे ऑर्डर के अनुसार फूल व फूल मालाये पैक करने को अपनी रौबदार आवाज में कहा। चमेली हमेशा की तरह मुस्कुराती हुई ऑर्डर पैक करने लगी। आज वह भी पूछ बैठी "साहब कौन से प्रोग्राम का डेकोरेशन है?" “राकेश" करवा चौथ “चमेली" आप सभी त्यौहार बड़ी साज सज्जा से मनाते हो। “राकेश" भाई आर्डर है। लोगों के लिए काम करता हूँ। चमेली उसके तनाव भरी आवाज से चुप हो गई और ऑर्डर पैक कर उसे पकड़ा दिया। राकेश थैला उठाकर अपनी मोटरसाइकिल पर टांग रहा था तभी चमेली दौड़ कर पास आयी और एक थैली पकड़ायी। उसने आश्चर्य से पूछा" यह क्या?" चमेली "साहब, मेम साहब के लिए।" राकेश ने अपने बैग में थैली रख ली और डेकोरेशन के लिए निकल पड़ा। वहाँ पहुंचा और अपने स्टाफ के साथ डेकोरेशन में लग गया। शाम 6:00 बजे तक पूरा डेकोरेशन तैयार था। पूजा करने वाली महिलाएं अपने पति के साथ आयी हुई थी। सभी महिलाएं सोलह सिंगार कर सजी थी। उनके चेहरे भी खुशी से चमक रहे थे। वहां का माहौल डेकोरेशन से और भी खूबसूरत लग रहा था। पूजा कर चाँद के इंतजार में महिलाओं के चेहरे देखने लायक थे। चाँद बादलों की ओट में जा चुका था जैसे उनके प्रेम की परीक्षा ले रहा हो। आखिर चाँद निकल आया सभी का इंतजार पूरा हुआ। सभी के लिए स्टाफ ने खाने की टेबल सजाई और जोड़े से बैठाया गया। सभी पतियों ने अपनी-अपनी पत्नियों को पहले पानी फिर मिठाई खिलाकर व्रत पूरा करवाया। उनमें महिलाओं के चेहरे पर व्रत पूर्ण कर सकून दिखाई दे रहा था। सभी हंसी ठहाका करते हुए अपने-अपने घर को चल दिए। राकेश व स्टाफ भी अपना शेष कार्य पूर्ण कर घर को चल दिए। घर पहुंचा तो देखा सजी सँवरी सुनीति पूजा कर थाली लिए राकेश के इंतजार में बैठी थी। राकेश के आते ही उसका चेहरा खिल उठा चाँद के अर्ग का लोटा लिए दौड़ कर राकेश के पास गयी "राकेश बहुत प्यास लगी है। पानी पिला दो ना।" राकेश ने घड़ी देखी रात के 1:00 बज गए थे और अपने आप को अपराधी सा महसूस कर हल्के से मुस्करा कर पहले सुनीति को पानी पिलाया फिर अपना बैग लेकर चमेली की दी हुई थैली निकाली और उसमें से फूलों का गजरा लेकर अपनी सुनीति के बालों में सजाने लगा, सुनीति का चेहरा खिल उठा। प्रेम से राकेश को निहारती हुई उसकी बाहों में सिमटती सुनिति बोली "तुम हमारा कितना ख्याल रखते हो। इतना काम होने के बाद भी तुम हमारे लिए गजरा लेकर आये।" राकेश मन ही मन चमेली को धन्यवाद कर रहा था कि आज चमेली के कारण उसकी पत्नी की करवाचौथ यादगार बन गयी। राकेश ने मुस्कराते हुए पूछा "सुनीति तुम्हें भूख नहीं लगी क्या? चलो, आज दोनों साथ खाना खाते हैं। तुम बैठो मैं तुम्हारे लिए खाना लगाता हूँ।" सुनीति राकेश के इस बदलाव को अचरज से देखती रह गयी। राकेश ने खाना लगाया। पहला कौर सुनीति को खिलाया और उसके चेहरे को निहारते हुए बोला "तुम्हें पूरा दिन भूखे रहने में कितनी तकलीफ होती होगी।" सुनीति खाना खाते हुए बोली "नहीं, बिल्कुल भी नहीं। तुम नहीं समझोगे।" राकेश की इस चिंता ने उसे और भी अभिभूत कर दिया। दोनों खाना खाकर कमरे में आ गए। सुनीति आज अर्से बाद अपने स्पेशल फिलिंग के स्वप्न को महसूस कर राकेश की बाहों में खो गयी। राकेश उसे निहारता हुआ सोच रहा था मेरी सुनीति तो छोटी-छोटी बात में ही खुशी ढूंढ लेती है। मैं सच में कितना खुशनसीब हूँ। सोचते-सोचते सुनीती के बाल सहलाते हुए न जाने कब दोनों मीठे सपनों में खो गये। *****

  • मिशन करवाचौथ

    पूनम अग्रवाल मोनिका करवाचौथ से हफ़्ता भर पहले बड़े ज़ोर शोर से त्यौहार की तैयारी में लगी थी। आई लैशेज़ और नेल्स एक्सटेंशन तो उसने पहले ही करवा लिया था। महँगी कामदार साड़ी और ब्रांडेड गाउन कल ही खरीदा, साथ ही डायमंड के ईयर रिंग्स भी। सबसे फेमस मेहंदी वाला भी बुक हो चुका था। अब तो बस रोज़ पार्लर जा जा कर खुद को चमकाने निखारने के मिशन जोरों पर था। कुल मिलाकर मोटी रकम खर्च हो चुकी थी, और हाँ ...अभी करवाचौथ व्रत का गिफ़्ट क्या होगा, ये मोनिका ने डिसाइड नहीं किया। वैसे इस बार उसका मन विदेश में छुट्टियां मनाने का है। तो जब वो चाँद की पूजा करके अपने पति योगेश के हाथों पानी पी कर व्रत खोलेगी तो उससे हफ़्ते भर का विदेश में टूर गिफ़्ट में मांग लेगी। जगह जो योगेश को पसन्द हो। आखिर उसी की लम्बी आयु के लिए तो मोनिका ने ये व्रत किया है, तो इतना हक़ तो योगेश का भी बनता है कि उसी की पसन्द की जगह पर घूमने जाया जाए। बस थोड़ा ही वक़्त बचा था कि जब चन्द्र देव उदित हो कर सब सुहागिनों की मुराद पूरी करेंगे। मोनिका ने आईने में खुद को देखा और मेकअप का फाइनल टच दे कर योगेश के कमरे की ओर मुड़ चली। कमरे से आती योगेश की आवाज़ ने मोनिका को चौकन्ना कर दिया। वो किसी से फ़ोन पर धीरे-धीरे बातें कर रहा था। उत्सुकता वश मोनिका दरवाजे से कान लगा कर खड़ी हो गई। "हूँ....हाँ...." "यार क्या बताऊँ पिछले पन्द्रह दिनों से मेरी रेल बनी पड़ी है, कभी यहाँ शॉपिंग के लिए चलो तो कभी वहाँ... कभी ये पसन्द नहीं आया तो कभी वापस उसी शो रूम पर चलो।" "...." "ख़र्चा....? उसकी तो पूछ ही मत, मैडम की फरमाइशें पूरी करते-करते मेरी जेब तो खाली हो गई है, उस पर तुर्रा ये के तुम्हारी लम्बी आयु के लिए ही तो व्रत रख रही हूँ, और अभी तो करवाचौथ गिफ्ट का कोई ठीक नहीं के क्या मांग ले। मुझे तो लगता है फॉरेन ट्रिप ही बोलेगी। अगर ऐसा हुआ तो अगले महीने की emi भरने में मेरे तोते उड़ जाएंगे। "...." "अरे क्या बात कर रहा है, मना? कैसे मना कर दूं भाई, घर की सुख शांति का सवाल जो है। कसम से ये करवाचौथ निबटे तो चैन की सांस आये। बहुत बड़ा मिशन है ये करवाचौथ मेरे जैसे साधारण तबके के पति के लिए। याद है तेरी और मेरी माएँ कितनी सादगी और भावना से करती थीं ये व्रत। सुबह ही माँ थोड़ी सी मिट्टी भिगोकर रख देती थीं और शाम को उस मिट्टी से गौरा जी की प्रतिमा बना कर, उन्हें सिंदूर बिंदी चढ़ा कर लाल चुनर उड़ाती थीं और हम बच्चों को भी साथ लेकर कहानी सुना कर पूजा करती थीं। कितना सात्विक वातावरण होता था। मुझे तो मेरी सीधी सादी माँ में उस समय गौरा जी की छवि दिखती थी। "...." "चल-चल अब मैं रख रहा हूँ, मोनिका मुझे बुलाने आती ही होगी।" ये सब सुन कर मोनिका के मन में कुछ दरक गया, वो जल्दी-जल्दी वहाँ से खिसकने लगी। अपने कमरे की बालकनी में आ कर खड़ी हो गई, उसके कानों में योगेश के शब्द गूंज रहे थे। तभी उसकी नज़र कम्पाउंड में बने सर्वेंट क्वाटर की छत पर गई, जहां उनकी नौकरानी लक्ष्मी और उसका ड्राइवर पति बाबूलाल खड़े थे। उनकी बातचीत साफ़-साफ़ सुनाई दे रही थी पर वो इस बात से बेखबर थे कि मालकिन उन्हें देख रही हैं। "कैसी लग रही हूँ मैं?" लक्ष्मी ने लजाते हुए पूछा। गुलाबी रंग की सीधे पल्ले की साड़ी, माथे पर बड़ी सी बिन्दी और सिंदूर की गहरी लाली से सजी मांग ने लक्ष्मी के रूप को अलग ही आभा प्रदान कर दी थी। "बिल्कुल नई नवेली दुल्हन ..." जैसे ही बाबूलाल ने कहा तो लक्ष्मी मेहंदी रची हथेलियों में अपना चेहरा छुपा कर बोली, "हाय दईया" तभी बाबूलाल उसके हाथ पकड़ कर बोला, "जरा देखूँ तो हमारी रानी ने हमारा नाम कहाँ लिखा है।" "अरे हम तो खुद ही बाजार से कीप ला कर ऐसे ही टेढ़ा मेढ़ा लकीरें खींच दिए, हमको कोन्हों डिजाइन फिजाइंन बनाने नहीं आता।" "अरे डिजाइन कौन देखता है लछमी रानी हम तो बस तुम्हारे ये मेहंदी रचे हाथों की लाली देखना चाहते हैं।", कहकर बाबूलाल ने लक्ष्मी के हाथ चूम लिए। "लक्ष्मी मैं तुम्हें ज़िंदगी के ऐशोआराम नहीं दे पाया, फिर भी तुम मुझे इतना प्रेम करती हो। मालिक तो मालकिन की हर तमन्ना मुँह से निकलते ही पूरी...." "चुप बुधुडे...प्रेम का सम्बंध अमीरी गरीबी से नहीं बल्कि मन से होता है। का हम जानती नहीं कि तुम हमारे लिए कितनी मेहनत करते हो।" "अच्छा सुनो! तुम हमसे क्या गिफ्ट लोगी करवाचौथ का?" "गिफ्ट...हाँ ऊ तो हम सोचे ही नहीं" लक्ष्मी ठोड़ी पर उँगली टिकाकर सोचने का अभिनय करने लगी, "सुनो बालम! ई गिफट विफट में का धरा है, तुम्हारा हमारी जिंदगी में होना ही सबसे बड़ा गिफट है। तुमसे ही ये रूप, ये सिंगार है, ये सौभाग्य है। हमको और कुछ न चाहिए।" लक्ष्मी ने भावुक हो कर कहा। "और ये...ये तो चाहिए न?" कहते हुए बाबूलाल ने महकता हुआ मोगरे का गजरा लक्ष्मी के बालों में सजा दिया। "वो देखो चाँद निकल आया" लक्ष्मी बोली और दोनों उत्साह पूर्वक पूजा करने में लग गए। "मोनिका ....डार्लिंग ...कहाँ हो तुम" योगेश की आवाज़ से जैसे मोनिका स्वप्न से जागी। "अरे चलो भई ...चाँद निकल आया, पूजा करो।" मोनिका पूजा की सब सामग्री ले कर योगेश के साथ छत पर आ गई। उसने चाँद को छलनी से देख पूजा की, योगेश ने उसे पानी पिला कर व्रत खुलवाया और बोला, "आज तो मेरा चाँद आसमान के चाँद से भी ज़्यादा खूबसूरत लग रहा है। बोलो आज क्या गिफ्ट लोगी?" "गिफ्ट, कल शाम को तुम एक सुंदर सा गजरा लाना, उसे अपने हाथों से मुझे पहनाना और फिर हम लॉन्ग ड्राइव पर चलेंगे। शहर के पास जो झील है वहाँ कुछ देर सुकून से बैठेंगे।" योगेश आश्चर्य मिश्रित खुशी से मोनिका को देख रहा था । ******

  • नेक प्रयास

    रूप किशोर श्रीवास्तव बात पुराने समय की है जब राजा, महाराजा और साहूकार होते थे। एक शहर में सेठ गिरधारीमल नाम का साहूकार था। ईश्वर की कृपा से उनके दो पुत्र थे अमन और नमन। अमन बड़ा था और पढ़ाई लिखाई में तेज एवं बुद्धिमान था। बुद्धिमान होने के कारण उनको नियम कानून एवं दुनियादारी का जितना ज्ञान था उतना ही वो डरता भी था। दूसरी ओर नमन मस्त रहता और दिमाग से ज्यादा दिल पसंद काम करता था। करोड़पति होने के कारण धन की कोई कमी नहीं थी। सेठ जी ने अपने पुत्रों के लिए इतना कर दिया था कि कई पुश्तों तक आराम से जीवन यापन कर सकते थे। वानप्रस्थ अवस्था आने पर सेठ ने अपनी सारी दौलत हीरे जवाहरात दोनों बच्चों को सौंप तीर्थ स्थान पर चले गए। अमन बुद्धि का तेज था तो सोचने लगा कि इतना धन है, इसको संभालना सबसे आवश्यक है। उन्होने सारे धन को एक स्थान पर एकत्र कर लिया। फिर कारीगर बुलाकर एक बड़ी सी तिजोरी बनवाई। अपने खाने-पीने भर का थोड़ा सा धन निकाल शेष तिजोरी में रख दिया। तिजोरी की बात धीरे-धीरे सारे शहर में फैल गई और लोगों ने सोचा कि यह तिजोरी किस लिए बना रहा है। दूसरी ओर नमन ने दौलत मिलते ही अपनी और अपने परिवार की सभी जरूरतों को पूरा करते हुए धन का पूरी तरह उपयोग किया। काफी पैसा होने के कारण उसने शहर में कुछ फल एवं छाया देने वाले पेड़ लगवाए। गरीब बीमारों की मुफ्त चिकित्सा के लिए चिकित्सालय बनवाए। गरीब बच्चों की मुफ्त शिक्षा के लिए विद्यालय बनवाए। इसी बीच पेड़ों में आए फलों की बिक्री से जो धन मिला उसको भी नमन ने इसी कार्य में लगाया। अब यह सब जैसे उसका एक शौक हो गया। कुछ लोगों ने भी अपना सहयोग दिया। मुफ्त खाना देने के लिए भोजनालय भी बनवाये और घर विहीन लोगों के लिए शेल्टर होम भी खोले। इन सब कार्यों से नमन पूरी प्रजा के दिल स्नेही व परम प्रिय हो गया। हर व्यक्ति सदैव नमन के ही गुणगान करता था। दूसरी ओर अमन ने सारा धन तिजोरी में रख तो दिया परंतु उसकी सुरक्षा को लेकर उनको चिंता सताने लगी। उन्होने तिजोरी की सुरक्षा के लिए दो सुरक्षा गार्ड तैनात कर दिये। अब तो लोगों को पूरा विश्वास हो गया कि अमन के पास बहुत दौलत है। सबकी निगाहें उसकी दौलत पर लगने लगी। अमन सुरक्षा गार्डों पर भी अधिक दिनों तक भरोसा नहीं कर सका एवं उनको हटाकर खुद ही तिजोरी की सुरक्षा में लग गया। अब तो सभी को पूरा निश्चय हो गया कि अमन के पास बहुत दौलत है। एक रात जब अमन तिजोरी की सुरक्षा करते करते निद्रा अवस्था में हो गया तो मौका पाकर कुछ लोगों ने उनकी तिजोरी खाली कर दी। अमन अपनी सारी धन दौलत गँवा बैठे। इसी बीच उस शहर के राजा जो वानप्रस्थ अवस्था में थे, उनके शरीर छोड़ने का समय आया तो संतान विहीन होने के कारण उन्होंने किसी जनप्रिय व्यक्ति को राजा बनाने का निर्णय लिया। उस समय सबसे ज्यादा लोकप्रिय और जनप्रिय नमन पाये गए और उन्हें ही उस शहर का राजा घोषित कर दिया गया। कहानी का अभिप्राय है कि यदि आपके पास आवश्यकता से अधिक धन है तो उसको अपनी व अपने परिवार की सभी इच्छाओं को पूरा करने में उसका उपभोग करें, भविष्य के लिए सुरक्षित करें। उसके बाद नेक कार्यों में प्रयोग करते हुए सभी की दुआएं प्राप्त करें। क्योंकि प्रत्येक कार्य जब हमारे प्रयासों के बाद भी पूर्ण नहीं होता तो दुआएं ही अंत में काम आती हैं। *****

  • बहू का दर्द

    डा. मधु आंधीवाल आज सुनीता बहुत खुश थी क्योंकि कल उसके इकलौते बेटे संचित की शादी थी। वह तो भाग-भाग कर सबको बता रही थी कि सबको बहू प्राची का स्वागत किस तरह करना है। उसके पति मोहन लाल उसकी प्रसन्नता को महसूस कर रहे थे। वह रात को सब इन्तजाम और मेहमानो के आराम की व्यवस्था करके अपने कमरे में आई। बहुत थकी हुई थी। मोहन लाल ने कहा तुम आराम करो अभी बहुत काम करना है। सुनीता बोली हां अभी एक जरूरी काम रह गया वह आप करोगे। वह है दोनों बच्चों के मिलन की प्रथम रात्रि के लिए अच्छे होटल में व्यवस्था। कल सुबह सबसे पहले कमरा बुक कराना और दूसरे दिन उसकी बहुत सुन्दर सजावट और यह कह कर वह अपनी बीती हुई जिन्दगी के उन पन्नों को खगालने लगी जो दर्द भरे थे। सुनीता की शादी छोटी उम्र में हुई। पति की उम्र भी अधिक नहीं थी। सुनीता शहर में पली थी। ससुराल छोटे कस्बे में थी। घर में कोई अधिक शिक्षित नहीं था सिवा पति के क्योंकि वह शहर में पढ़े थे और वहीं सर्विस करते थे। बहुत मधुर सपने लेकर ससुराल पहुँची। कार से उतर भी नहीं पाई थी कि पति से छोटी ननद एक दम बोलीं अरे मुंह खोल कर आई हो घूंघट करो। वह एकदम सकपका गयी मायेके में बहुत लाडली और बिन्दास जीने वाली लड़की। उसके बाद गृह प्रवेश हुआ। बक्सा खोलने की रस्म होनी थी। सबकी साड़ियां नाम लगा कर रखी थी पर ननदों को तो उसकी साडि़यां पसंद आई जिनको उसके भाई बड़े प्यार से उसके लिये लाये थे। वह मन ही मन डर गयी थी। आंखो में चुपचाप आंसू लिये घूंघट में से देख रही थी। वह बस अपने प्रियतम से मिलने की प्रतीक्षा में थी कि कैसे भी उनसे मिल कर अपना मन हल्का करे। जैसे-जैसे रात होने लगी बड़ी ननद और बुआ सास ने फरमान जारी कर दिया की अभी पांच दिन तक ये सबके पास सोयेगी जब तक पूजा ना हो जाये। मोहन लाल ने देखा रात के 2 बजे हैं पर सुनीता जगी हुई विचारों में खोई हुई है। वह बोले सो जाओ कल बहुत काम है। सुबह से ही घर में बहुत चहल पहल थी। आज का दिन बहुत हर्षदायक था उसके लिये। बस कल उसके घर की रौनक आ जायेगी। फेरे हो गये थे। विदा होकर प्राची घर आ गयी। बस उसकी दोनों ननद शुरू हो गयी कि अरे पल्लू सर पर नहीं है। वह फिर भी चुप रही। जब बक्सा खुलने की रस्म की बात आई तब सुनीता ने कहा कोई जरूरी नहीं सबकी साड़ियां पहले ही आ गयी हैं। जब रात को उसने होटल भेजने का इन्तजाम किया तब सब कहने लगी कि जरा भी शर्म नहीं रही थोड़ा तो बड़े लोगों का लिहाज करो। बस सुनीता एक दम चिल्ला पड़ी "बस बहुत हो गया।" मेरी बहू वह सब नहीं झेलेगी जो मैने झेला था। ******

  • वापसी

    गुलशन नंदा का उपन्यास (1) “नो इट्स इम्पॉसिबल, मेजर रशीद, तुम्हें ज़रूर कोई ग़लतफ़हमी हुई है.” “सर, मेरे आँखें एक बार धोखा खा सकती हैं, बार-बार नहीं. मैं पूरी ज़िम्मेदारी से कह रहा हूँ. आप तक बात पहुँचाने से पहले मैंने कई दिनों तक गौर से उस कैदी की जांच कर ली है.” “ओह! आई सी…क्या नाम है उसका?” ब्रिगेडियर उस्मान ने अपनी आदत के मुताबिक भवों को सिकोड़ते हुए पूछा. “रणजीत!” “रैंक?” “कैप्टन!” “रेजिमेंट?” “मराठा…थर्टी थ्री मराठा!” “लेकिन तुम जानते हो मेजर, यह क़दम तुम्हें मौत के मुँह में ले जा सकता है. तुम अपने आप ही दुश्मन का शिकार बन सकते हो.” ब्रिगेडियर उस्मान ने मेजर रशीद की आँखें में झांकते हुये कहा. फ़ौज में भर्ती होने से पहले मैंने इस बात पर अच्छी तरह गौर कर लिया था सर…सिपाही तो हर वक़्त कफ़न बांधे रहता है. वतन की खातिर मर जाने से बढ़कर और कौन सी शहादत हो सकती है.” मेजर रशीद जोश में आकर भावुक स्वर में बोला. ब्रिगेडियर उस्मान चुपचाप इस नौजवान को देखता रहा, जो अपनी जान देने पर तुला हुआ था. जब ब्रिगेडियर ने उसकी बात का कोई उत्तर नहीं दिया, तो मेजर रशीद ने पूछा, “तो फिर अपने क्या सोचा सर?” ब्रिगेडियर उस्मान की भवें कुछ ढीली हुई. मेजर रशीद के दृढ़ साहस ने उसे कुछ सोचने पर विवश कर दिया था. उसने पूछा, “तुम्हारे उस कैदियों वाला जत्था किस दिन लौट रहा है?” “अगले जुम्मे के दिन.” “लिस्टें जा चुकीं?” “जी हाँ.” “कोई फ़ैसला करने से पहले मैं ख़ुद उस कैदी को देखना चाहूंगा.” “बड़ी ख़ुशी से सर.” मेजर रशीद प्रसन्न चित्त होकर बोला.उसे अपने सोचे हुए प्लान की सफलता की आस बंधने लगी थी. थोड़ी ही देर बाद मेजर रशीद, ब्रिगेडियर और कर्नल रज़ा अली उस पुराने किले की ओर रवाना हो गये, जहाँ भारत के क़ैदी नज़रबंद थे, इस कैंप का कमांडर स्वयं मेजर रशीद था. जैसे ही ब्रिगेडियर की फ्लैग कार किले के गेट पर पहुँची, गार्ड ने सावधान की पोज़ीशन में बंदूकों से सलामी दी. शताब्दियों पुराना काले पत्थरों का बना यह किला अंधेरी रात में एक बड़ा मकबरा-सा प्रतीत हो रहा था. अंदर की तरफ़ कांटेदार तारों का एक सिलसिला दूर तक चला गया था. बाहर राइफलें उठाये फ़ौजी पहरेदार दे रहे थे. ब्रिगेडियर की फ्लैग कार के पीछे मेजर रशीद की जीप थी. गाड़ियाँ रुकते ही तीनों अफ़सर नीचे उतर आये. सामने खड़े सूबेदार ने एड़ियों पर खटाक की आवाज़ से सैल्यूट किया और आगे बढ़कर मेजर रशीद से बोला, “सब ठीक है साहब!” “किसी क़ैदी ने भागने की कोशिश तो नहीं की?” “नो सर.”

  • नसीहत

    के. कामेश्वरी कालिंदी अपनी बेटी दीपा की शादी एक ऐसे घर में करती है, जहाँ तीन लड़कियों के बीच एक ही लड़का है। वे बहुत ही पैसे वाले थे और उनके घर में माता-पिता तीन बहुत ही खूबसूरत लड़कियाँ और लड़का वरुण था। यही उनका परिवार था। वरुण बहुत ही बड़ा वकील था। कालिंदी ने सोचा लड़कियाँ तो शादी करके चली जाएँगी तो परिवार में सिर्फ़ माता-पिता वरुण और बेटी दीपा ही रहेंगे। मेरी बेटी ही उस घर की मालकिन बन जाएगी। इसलिए उसने लड़की का ब्याह वरुण से करा दिया था। वरुण की शादी होने के एक साल के अंतराल में ही दीपा की बड़ी ननद सुनंदा की शादी हो गई थी। सुनंदा की ही शादी में दूसरी ननद अलका के लिए रिश्ता तय हो गया था। इस तरह दीपा की शादी के तीन साल में तीनों नन्दों की शादियाँ भी हो गई थी। वे सब भाभी को बहुत मानती थी। सास ससुर भी सोचते थे कि बहू के शुभ कदम घर में पड़ते ही तीनों लड़कियों की शादियाँ हो गई हैं। उन्होंने बहू को ही घर की सारी ज़िम्मेदारियाँ सौंप दी थी। इन सबको देख कालिंदी बहुत खुश हो गई थी। उनकी ख़ुशियों को शायद किसी की नज़र लग गई थी। दूसरी ननद अलका को जब पता चलता था कि उसके पति का चरित्र अच्छा नहीं है साथ ही वह सडिस्ट है तो वह अपने ससुराल और पति को छोड़कर वापस मायके चली आई। वह पढ़ी लिखी तो थी ही इसलिए नौकरी करने लगी थी। वरुण वकील था तो उसने जीजा पर गृह हिंसा का केस दर्ज कर दिया था। कालिंदी ने जब यह सुना तो उसको यह पसंद नहीं आया। उसने फ़ोन पर ही दीपा को नसीहत दे डाली कि अपनी ननद को घर से बाहर भेज दे या फिर तू अपने पति के साथ अलग घर में रहने के लिए चली जा। दीपा जब से शादी करके आई है उसने ससुराल वालों की अच्छाई ही देखी थी। उसकी ननदें भी बहुत अच्छी थीं। इसलिए उसे माँ की यह बात अच्छी नहीं लगी। उसका जी खट्टा हो गया था वह सोचने लगी कि माँ ने ऐसे कैसे सोच लिया कि मैं कभी ऐसा करूँगी। बचपन से वह और उसकी बहन परिवार के लिए तरसती रही। शादी के बाद उसे परिवार का प्यार मिला है जिसे वह माँ की बातें सुनकर खोना नहीं चाहती थी। उसने माँ से कहा कि— माँ आपकी ग़लत नसीहत ने मेरा मेरा दिल दुखाया है। मैं आपकी कोई भी बात नहीं सुनना चाहती हूँ। आपने अपने ससुराल में यही भूल की थी। आपके कारण ही पापा की मृत्यु हो गई थी। आज मैं और सीमा बिना बाप के मामा के घर में पल कर बड़े हुए हैं। आप पापा को लेकर अलग घर नहीं बसाती तो आज पापा जीवित रहते। यह तो हमारी क़िस्मत समझिए कि मामा मामी अच्छे थे। उन्होंने हमें पढ़ाया लिखाया और आपको नौकरी भी दिलाई। आज मुझे इतना प्यार करने वाला ससुराल मिला है तो प्लीज़ आप मेरे घर के मामले में दख़लंदाज़ी मत कीजिए मैं अपने परिवार के साथ बहुत खुश हूँ। उसकी इन बातों को ससुर ने सुन लिया था। उन्हें बहुत ही गर्व हुआ कि उनकी बहू के इतने उच्च विचार हैं। कालिंदी ने तब से दीपा के ससुराल वालों के बारे में उससे बात करना बंद कर दिया था। उसे मालूम हो गया था कि यह मेरी बात मानने वाली नहीं है। इस तरह से दीपा ने अपनी समझदारी से काम लिया और अपने परिवार को बचा लिया था। मजे की बात यह है कि जिस घर से कालिंदी ने बेटी को दूर करना चाहा अंत तक उसी दामाद और उनके परिवार ने उसका साथ दिया था। ******

  • एक जादुई घर

    शशि गुप्ता एक दिन एक लेखक की पत्नी ने उससे कहा कि तुम बहुत किताबें लिखते हो। आज मेरे लिए कुछ लिखो तो फिर मुझे विश्वास होगा कि तुम सच में एक अच्छे लेखक हो। फिर लेखक ने लिखा.. मेरा जादुई घर मैं, मेरी पत्नी और हमारे बच्चे, एक जादुई घर में रहते हैं। हम अपने गंदे कपड़े उतार देते हैं, जिन्हें अगले दिन साफ ​​कर दिया जाता है। हम स्कूल और ऑफिस से आते ही अपने जूते उतार देते हैं, फिर अगली सुबह हम साफ सुथरे पॉलिश वाले जूते पहनते हैं। हर रात कूड़े की टोकरी कचरे से भरी होती है और अगली सुबह खाली हो जाती है। मेरे जादुई घर में खेलते समय बच्चों के कपड़ों से बदबू आती है, लेकिन अगले ही पल वे साफ हो जाते हैं और उनके खेल उपकरण जल्दी से अपने बक्से में फिर से व्यवस्थित हो जाते हैं। मेरे जादुई घर में हर दिन मेरे और मेरे बच्चों के लिए पसंदीदा खाना बनता है। मेरे जादुई घर में, आप सुन सकते हैं "माँ, मम्मी मम्मा" हर दिन लगभग सौ बार पुकारा जाता है। मम्मा नेल क्लिपर कहाँ है? माँ, मेरा गृहकार्य पूरा करो। मम्मा, भाई मुझे पीट रहा है। मम्मा, आज मेरा स्कूल लंच बॉक्स बनाना मत भूलना, माँ आज ही हलवा पूङी बनाओ। माँ, मुझे आज चींटी नहीं मिल रही है, वह यहां रोज एक लाइन में चलती है। माँ मेरे लिए एक सैंडविच बनाओ, मुझे भूख लगी है। माँ मुझे वॉशरूम जाना है। मम्मा, मुझे पहले भूख लगी थी। अभी नहीं रात को सोने से पहले जो आखिरी शब्द सुना वो है "माँ" और सबसे पहला शब्द सुना है "माँ" जब मैं सुबह अपने जादुई घर में उठता हूँ। बेशक, इस जादुई घर की ओर अब तक कोई भी आकर्षित नहीं हुआ है, हालांकि सभी के पास यह जादुई घर है। और शायद ही कभी किसी ने इस घर के "जादूगर" का धन्यवाद किया होगा। इन जादुई घरों का जादूगर कोई और नहीं बल्कि हर "पत्नी और मां" है। जो अपने ही घरों में करते हैं ऐसा जादू। भगवान हर उस "पत्नी और मां" को आशीर्वाद दें, जिनके "धैर्य और अनंत कर्म" हर घर में समृद्धि लाते हैं। *****

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