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  • क़दम मिला कर चलना होगा

    अटल बिहारी वाजपेयी क़दम मिला कर चलना होगा बाधाएँ आती हैं आएँ घिरें प्रलय की घोर घटाएँ, पावों के नीचे अंगारे, सिर पर बरसें यदि ज्वालाएँ, निज हाथों में हँसते-हँसते, आग लगाकर जलना होगा। क़दम मिलाकर चलना होगा। हास्य-रूदन में, तूफ़ानों में, अगर असंख्यक बलिदानों में, उद्यानों में, वीरानों में, अपमानों में, सम्मानों में, उन्नत मस्तक, उभरा सीना, पीड़ाओं में पलना होगा। क़दम मिलाकर चलना होगा। उजियारे में, अंधकार में, कल कहार में, बीच धार में, घोर घृणा में, पूत प्यार में, क्षणिक जीत में, दीर्घ हार में, जीवन के शत-शत आकर्षक, अरमानों को ढलना होगा। क़दम मिलाकर चलना होगा। सम्मुख फैला अगर ध्येय पथ, प्रगति चिरंतन कैसा इति अब, सुस्मित हर्षित कैसा श्रम श्लथ, असफल, सफल समान मनोरथ, सब कुछ देकर कुछ न मांगते, पावस बनकर ढलना होगा। क़दम मिलाकर चलना होगा। कुछ काँटों से सज्जित जीवन, प्रखर प्यार से वंचित यौवन, नीरवता से मुखरित मधुबन, परहित अर्पित अपना तन-मन, जीवन को शत-शत आहुति में, जलना होगा, गलना होगा। क़दम मिलाकर चलना होगा। *****

  • शिक्षक सम्मान

    डॉ कृष्णकांत श्रीवास्तव "सुनो, आज चार तारीख हो गई, पेंशन लेने का समय आ गया है। बैंक जा रहा हूँ, आने में देर हो जाए तो परेशान मत होना। युवाओं को समय की कद्र कहाँ, छोटे-छोटे काम में भी घंटों लगा देते हैं।" पत्नी को कहकर रामनिवास जी बाहर जाने लगे तो पत्नी ने पीछे से कहा, "आपके इतने सारे विद्यार्थी हैं, उन्हीं में से किसी को क्यों नहीं कह देते?" "ज़माना बदल गया है। पहले जैसे विद्यार्थी अब कहाँ जो अपने गुरु का मान करें। उन्हें तो मेरा नाम भी याद नहीं होगा।" पत्नी को जवाब देकर वे बैंक चले गये। महीने का पहला सप्ताह होने के कारण बैंक में भीड़ थी। एक खाली कुर्सी देखकर वे बैठ गये और फार्म भरकर कैशियर वाले डेस्क के सामने खड़े हो ही रहें थें कि एक स्टाफ़ ने उन्हें आदर-सहित कुरसी पर बैठा दिया और स्वयं फ़ार्म लेकर कैशियर के केबिन में चले गये। वे कुछ समझ पाते तब तक बैंक का चपरासी उनके लिए चाय ले आया। उन्होंने यह कहकर मना कर दिया कि वे बिना चीनी के चाय पीते हैं। चपरासी बोला, "साहब ने बिना चीनी वाली का ही आर्डर दिया है।" कहकर उसने रामनिवास जी के हाथ में चाय की प्याली थमा दी। रामनिवास जी ने घड़ी देखी, दस बजकर पाँच मिनट हो रहें थे। सोचने लगे, चाय पिलाया है, लगता है दो घंटे से पहले मेरा काम न होगा। तभी एक बत्तीस वर्षीय सज्जन ने आकर उनके पैर छुए और विड्रा की गई राशि उनके हाथ पर रख दिया। इतनी जल्दी काम पूरा होते देख रामनिवास जी चकित रह गए। उन्होंने उन सज्जन को धन्यवाद देते हुए परिचय पूछा तो उन्होंने कहा, "सर, मैं इस बैंक का नया मैनेजर हूँ, एक सप्ताह पहले ही मैंने ज्वॉइन किया है लेकिन उससे पहले मैं आपका विद्यार्थी हूँ।" "विद्यार्थी!" रामनिवास जी ने आश्चर्य से पूछा। उन्होंने कहा, "जी सर, सन् 2004 में आप सहारनपुर के उच्च माध्यमिक विद्यालय में नौवीं कक्षा के विद्यार्थियों को गणित पढ़ाते थें। मैं भी उन्हीं में से एक था। गणित मुझे समझ नहीं आती थी। परीक्षा में पास होने के लिए मैंने नकल करना चाहा और पकड़ा गया। प्रिंसिपल सर मुझे रेस्टीकेट कर रहें थें तब आपने उनसे कहा था कि नासमझी में विद्यार्थी तो गलती करते ही हैं। हम शिक्षक हैं, हमारा काम उन्हें शिक्षा देने के साथ-साथ सही राह दिखाना भी है। संजीव की यह पहली गलती है, रेस्टीकेट कर देने से तो इसका पूरा साल बर्बाद हो जाएगा जो मेरे विचार से उचित नहीं है। आपने उनसे विनती की थी कि मुझे माफ़ी देकर अगली परीक्षा में बैठने दिया जाए। प्रिंसिपल सर ने आपकी बात मान ली थी, आपने अलग से मुझे ट्यूशन पढ़ाया और मैं परीक्षा में अच्छे अंकों से उत्तीर्ण होकर आज आपके सामने खड़ा हूँ। आपका बहुत-बहुत धन्यवाद सर!" हाथ जोड़कर मैनेजर साहब ने अपने गुरु को धन्यवाद दिया और ससम्मान उन्हें बाहर तक छोड़ने भी गए। घर लौटते वक्त रामनिवास जी सोचने लगे, ज़माना चाहे कितना भी बदल जाए, जीवन भले ही मशीनी हो जाए लेकिन विद्यार्थियों के दिलों में शिक्षक का सम्मान हमेशा रहेगा, यह आज बैंक मैनेजर संजीव ने दिखा दिया। ******

  • वो दूरी

    गीता गुप्ता अक्सर मैं पूछती उनसे, अर्पिता जी आपका तलाक क्यों हुआ? हमेशा वो टाल जातीं। मुझे लगता शायद किसी लत का शिकार होगा या बेरोजगार। पर ऐसा कुछ नही था, सरकारी नौकरी थी पति की, अच्छे खानदान में विवाह हुआ था उनका। एक बार उन्होंने कहा "जरूरी नही सरकारी नौकरी और अच्छे खानदान के लड़के में संस्कार अच्छे ही हो।" उन्होंने बताया, छोटी मोटी कहा सुनी पर अक्सर कहता "सरकारी नौकरी है मेरी, तेरी जैसी दस ले आऊंगा।" ससुराल छोड़कर आते वक्त मैंने उनसे कहा "अब तुम मेरी जैसी दस के साथ ही रहो। मैंने उनसे आज तक तलाक नही लिया है, कौन कोर्ट के चक्कर काटे। और ना ही बच्चे की परवरिश के लिए पैसा लिया। जिन्दगी के पच्चीस साल गुजर गए। ना पति लेने आया ना वो गईं। बेटे की शादी हो चुकी है। बेटा पिता की शक्ल भी नही जानता, अर्पिता जी ने वापिस मायके आने के पश्चात बी-एड किया था, नौकरी हासिल करके बेटे को पढ़ाया लिखाया, कभी बेटे ने पिता के बारे में माँ से कोई सवाल नही किया, ना ही पिता के पास जाने की इच्छा जाहिर की। पति ने दूसरा विवाह नही किया, ना ही अर्पिता जी ने। पति ने रिटायर्मेंट के वक्त फोन किया, फोटो वगैरहा भी मांगे पर अर्पिता जी ने कुछ नही भेजा। उन्होंन सब ठुकरा दिया। कभी-कभी कुछ बातें किसी के दिल को इतना घायल कर देती हैं कि उसके आगे पैसा कोई मायने नही रखता और ना ही रिश्ता। कुछ भी बोलने से पहले सोचना जरूरी है, क्योंकि हर किसी में सहन शक्ति हो, जरूरी नही। *****

  • पांव के निशान

    अंचल अग्रवाल कुछ दिन पहले एक परिचित के घर गया था। जिस वक्त घर में मैं बैठा था, उनकी नौकरानी घर की सफाई कर रही थी। मैं ड्राइंग रूम में बैठा था और मेरे परिचित फोन पर किसी से बात कर रहे थे। उनकी पत्नी चाय बना रही थीं। मेरी नज़र सामने वाले कमरे तक गई जहां नौकरानी फर्श पर पोछा लगा रही थी। अचानक मेरे कानों में आवाज़ आई। “बुढ़िया अभी ज़मीन पर पोछा लगा है, नीचे पांव मत उतारना। मैं बार-बार यही नहीं करती रहूंगी।” मैंने अपने परिचित से पूछा, “मां कमरे में हैं क्या?” हां जब तक चाय बन रही है, मैं मां से मिल लेता हूं। हां, हां, लेकिन रुकिए, अभी-अभी शायद पोछा लगा है, सूख जाए, फिर जाइएगा। क्यों? गीला है तो नौकरानी दुबारा लगा देगी। नहीं लगाएगी तो थोड़े निशान रह जाएंगे फर्श पर। क्या फर्क पड़ेगा? परिचित थोड़ा हैरान हुए, भैया ऐसा क्यों कह रहे हैं? तब तक मैं कमरे में चला गया था। गीले पर्श पर पांव के खूब निशान उकेरता हुआ। मैं मां के पास गया। मैंने उनके पांव छुए और फिर उनसे कहा, “चलिए आप भी ड्राइंग रूम में, वहां साथ बैठ कर चाय पीते हैं। चाय बन रही है। भाभी रसोई में चाय बना रही हैं।” मैंने इतना ही कहा था कि मां एकदम घबरा गईं। अरे नहीं, अभी फर्श पर पांव नहीं रखना है, फर्श गीला है ना, मेरे पांव के निशान पड़ जाएंगे। पांव के निशान पड़ जाएंगे? वाह! फिर तो मैं उनकी तस्वीर उतार कर बड़ा करवा कर फ्रेम में लगाऊंगा। आप चलिए तो सही। पर मां बिस्तर से नीचे नहीं उतर रही थीं। उन्होंने कहा, “तुम चाय पी लो बेटा।” तब तक मेरे परिचित भी मां के कमरे तक आ गए थे। उन्होंने मुझसे कहा, “मां सुबह चाय पी चुकी है, आप आइए भैया।” नहीं, मां के साथ मैं यहीं कमरे में चाय लूंगा। चमकते हुए टाइल्स पर मेरे जूते के निशान बयां कर रहे थे कि मैंने जानबूझ कर कुछ निशान छोड़े हैं। वो समझ नहीं पा रहे थे कि आखिर मैंने ऐसा किया क्यों? उन्होंने मुझसे तो कुछ नहीं कहा लेकिन नौकरानी को उन्होंने आवाज़ दी, “बबिता, जरा इधर आना। इधर भैया के पांव के निशान पड़ गए हैं, उन्हें साफ कर देना।” बबीता ने गीला पोछा फर्श पर लगाया। जैसे ही फर्श की दुबारा सफाई हुई मैं फिर खड़ा होकर उस पर चल पड़ा। दुबारा निशान पड़ गए। अब बबिता हैरान थी। मेरे परिचित भी। तब तक उनकी पत्नी भी कमरे में आ चुकी थीं। उन्होंने कहा, “भैया, आइए चाय रखी है।” मैंने परिचित की पत्नी से कहा, "बुढ़िया" के लिए चाय यहीं दे दीजिए।” मेरे परिचित ने मेरी ओर देखा। मैंने कहा, “हैरान मत होइए।” वो चुप थे। मैंने कहा, “मुझे ऐसा लगता है कि आप लोग मां को "प्यार" से "बुढ़िया" कहकर बुलाते हैं।” नौकरानी वहीं खड़ी थी। सन्न। परिचित की पत्नी वहीं खड़ी थी, सन्न। परिचित ने पूछा, “क्या हुआ भैया?” हुआ कुछ नहीं, मैंने खुद सुना है कि आपकी बबिता मां को बुढ़िया कह कर बुला रही थी। उसने मां को बिस्तर से उतरने से धमकाया भी था। यकीनन काम वाली ने मां को बुढ़िया पहली बार नहीं कहा होगा। बल्कि वो कह भी नहीं सकती उन्हें बुढ़िया। उसने सुना होगा बेटे के मुंह से, बहू के मुंह से। बिना सुने वो नहीं कह सकती थी। जाहिर है आप लोग प्यार से मां को इसी नाम से बुलाते होंगे। तभी तो उनसे कहा। पल भर के लिए धरती हिलने लगी थी। गीले फर्श पर हज़ारों निशान उभर आए थे। मेरे परिचित के छोटे-छोटे पांव के निशान वहां उभरे हुए हैं। बच्चा भाग रहा है। मां खेल रही है बच्चे के साथ-साथ। एक निशान, दो निशान, निशान ही निशान। मां खुश हो रही है। बेटे के पांव देख कर कह रही है, देखो तो इसके पांव के निशान। बेटा इधर से उधर दौड़ रहा था। दौड़ता जा रहा था, पूरे घर में बुढ़िया रो रही थी। बहू की आंखें झुकी हुई थीं। बबिता चुप थी। भैया, गलती हो गई, अब नहीं होगा ऐसा, भैया बहुत बड़ी भूल थी मेरी। मेरे परिचित अपनी आंखें पोंछ रहे थे। मैं चल पड़ा, सिर्फ इतना कह कर कि आँखें ही पोंछनी चाहिए, उस फर्श को तो चूम लेना चाहिए जहां मां के पांव के निशान पड़े हों। ******

  • खुशी के वो पल

    सविता पाटील खुशी के वो पल, ज़िन्दगी में… कुछ इस तरह से दबें रहते हैं, जैसे समंदर की गहराइओं में… खजाने छिपे रहते हैं ! हम रहते हैं किनारों तक, नज़रें पहुंचती हैं लहरों तक, हो सके तो… पंहुचों उन खज़ानों तक ! जो खामोशी से बैठे हैं इंतज़ार में, कि, उठा लोगे इन्हें… संजोकर रख लोगे इस सफ़र में ! जैसे शहद है फूलों में जैसे मुस्कान है गालों में जैसे बारिश है बादलों में खुशी के वो पल छिपे हैं ज़िन्दगी के इन्हीं पलों में *****

  • संगत का परिणाम

    डॉ. कृष्णकांत श्रीवास्तव एक बार एक शिकारी शिकार करने एक जंगल में गया, दिनभर भटकने के बाद भी उसे शिकार नहीं मिला, थकान हुई और एक वृक्ष के नीचे आकर सो गया। पवन का वेग अधिक था, तो वृक्ष की छाया, डालियों के यहाँ-वहाँ हिलने के कारण, कभी कम-ज्यादा हो रही थी। वहीं से एक अतिसुन्दर हंस उड़कर जा रहा था, उस हंस ने देखा कि वह व्यक्ति बेचारा परेशान हो रहा हैं, धूप उसके मुँह पर आ रही हैं, जिसके कारण वो ठीक से सो नहीं पा रहा हैं। तो परोपकार की इच्छा से वह हंस पेड़ की डाली पर अपने पंख खोल कर बैठ गया, ताकि उसकी छाँव में वह शिकारी आराम से सो सके। जब वह सो रहा था तभी एक कौआ आकर उसी डाली पर बैठा जिसपर हंस पहले से ही बैठा था। कौवे ने इधर-उधर देखा और बिना कुछ सोचे-समझे शिकारी के ऊपर अपना मल विसर्जन कर दिया और वहाँ से उड़ गया। तभी शिकारी उठ गया और गुस्से से यहाँ-वहाँ देखने लगा। उसकी नज़र पेड़ पर पंख फैलाए बैठे हंस पर पड़ी। क्रोध में आकर शिकारी ने तुरंत धनुष बाण निकाला और उस हंस को मार दिया। हंस नीचे गिरा और मरते-मरते हंस ने कहा : मैं तो आपकी सेवा कर रहा था, मैं तो आपको छाँव दे रहा था, आपने मुझे ही मार दिया? इसमें मेरा क्या दोष? उस समय शिकारी ने कहा : यद्यपि आपका जन्म उच्च परिवार में हुआ, आपकी सोच आपके तन की तरह ही सुंदर हैं, आपके संस्कार शुद्ध हैं, यहाँ तक कि आप अच्छे इरादे से मेरे लिए पेड़ की डाली पर बैठ मेरी सेवा कर रहे थे। लेकिन आपसे एक गलती हो गयी, कि जब आपके पास कौआ आकर बैठा तो आपको उसी समय उड़ जाना चाहिए था। उस दुष्ट कौए के साथ एक घड़ी की संगत ने ही आपको मृत्यु के द्वार पर पहुंचाया है। सार: संसार में संगति का सदैव ध्यान रखना चाहिये। जो मन, कर्म और बुद्धि से परमहंस हैं, उन्हें कौओं की सभा से दूरी बनायें रखना चाहिये। ******

  • जीवन का चक्र

    रमाकांत शुक्ल विश्वा की नई-नई शादी हुई थी। ससुराल से एक महीने बाद जब वह वापस मायके लौटी। तो मां के सामने रोने लगी और बोली मां, मुझे किस घर में पटक दिया। वहां तो मेरी कोई इज्जत ही नहीं है। सारा दिन नौकरानी की तरह रसोई में खड़ी रहती हूं। सास-ससुर की रोटी पकाना। ननद और दो छोटे देवर की रोटियां पकाना। आए दिन सासू मां के रिश्तेदार आते रहते हैं। उनको नाश्ता कराना। आराम ही नहीं मिलता। जिंदगी नरक सी बन गई है। मुझे अपने पति पर बहुत गुस्सा आया। जब उन्होंने महीने की पूरी तनख्वाह सासू मां के हाथों में रख दी। और मुझसे कहा, “तुम्हें जो भी चाहिए एक पर्ची पर लिख देना। मैं शाम को ड्यूटी के बाद ले आऊंगा।” ये सब सुनकर सुनीता की मां ने कहा, “तुम्हारे पास दो रास्ते हैं। एक तो तुम वहीं रहो और उनकी सेवा करो। क्योंकि परिवार भी तुम्हारा है। और दूसरा कि तुम अपने पति को किसी किराए के मकान में ले जा सकती हो। वहां तुम्हें किसी का खाना नहीं बनाना पड़ेगा। किसी के कपड़े नहीं धोने पड़ेंगे। पूरी तनख्वाह तुम्हें मिलेगी। लेकिन एक बात याद रखना। जब तुम्हारा कोई बेटा होगा। तुम्हारी भी बहू आएगी। उस वक्त तुम भी यही चाहोगी कि मेरा बेटा बहू मेरे साथ रहे। मेरे पोते मेरे साथ खेलें। प्यास लगने पर पानी लेकर आएं। खाना बन जाने पर बुलाने आए कि दादी आओ सब साथ खाएं। मां ने कहा जिन कामों को तुम दुख बता रही हो। यही जीवन के महत्वपूर्ण क्षण हैं। एक ग्रहणी अपने काम को सरल बनाकर निपटा देती है। यही जीवन का चक्र है। जो आज मां है, वही कल सास बनती है। इसलिए आज तुम जो अपनी सास और परिवार के लिए करोगी, वही कुछ समय बाद तुम्हारे साथ भी होगा। ******

  • पिता....

    पिता.... तुम और मैं पति पत्नी थे, तुम माँ बन गईं मैं पिता रह गया। तुमने घर सम्भाला, मैंने कमाई, लेकिन तुम "माँ के हाथ का खाना" बन गई, मैं कमाने वाला पिता रह गया। बच्चों को चोट लगी और तुमने गले लगाया, मैंने समझाया, तुम ममतामयी बन गई मैं पिता रह गया। बच्चों ने गलतियां कीं, तुम पक्ष ले कर "understanding Mom" बन गईं और मैं "पापा नहीं समझते" वाला पिता रह गया। "पापा नाराज होंगे" ये कह कर तुम बच्चों की बेस्ट फ्रेंड बन गईं, और मैं गुस्सा करने वाला पिता रह गया। तुम्हारे आंसुओं में मां का प्यार और मेरे छुपे हुए आंसुओं मे मैं निष्ठुर पिता रह गया। तुम चंद्रमा की तरह शीतल बनतीं गईं, और पता नहीं कब मैं सूर्य की अग्नि सा पिता रह गया। तुम धरती माँ,भारत मां और मदर नेचर बनतीं गईं, और मैं जीवन को प्रारंभ करने का दायित्व लिए सिर्फ एक पिता रह गया...

  • इनसे बचके रहना

    डॉ ममता मुझे एक बात समझ नहीं आती। अगर किसी परिवार का शादीशुदा बेटा अच्छा नहीं कमाता तो उसकी पत्नी के साथ नौकरानी जैसा व्यवहार क्यों किया जाता है। क्या ऐसे लड़के के परिवार को शादी से पहले पता नहीं चलता कि उनका सपूत अपना घर नहीं चला पाएगा? पर ऐसे लोगों का मानना होता है कि बेटे की शादी कर दो बस फिर सब ठीक हो जाएगा। मतलब जो मां बाप उसकी परवरिश करते हुए अच्छे संस्कार देने में नाकाम रहे। अब उनकी आने वाली बहू को वो काम करना है। फिर अगर शादी के बाद भी बेटे की हालत नहीं सुधरती तो दूसरे घर की लड़की पर दोष मढ़ दिया जाता है। जो लड़की कल तक अपने पिता के घर में राजकुमारी की तरह रहती थी, अब नौकरानी की तरह रहती है। ऐसे लोग झूठ बोलकर अपने बेटे की शादी मध्यम वर्गीय परिवार की लड़की से कर देते हैं। ताकि कोई जल्दी से उनके खिलाफ आवाज उठाने की कोशिश न कर सके। मेरे जानने वालों में एक पढ़े लिखे मध्यम वर्गीय परिवार की बेटी है। उसकी शिक्षा और संस्कार के साथ में सुन्दरता में भी कोई कमी नहीं है। जब उसकी शादी की बात चल रही थी तब लड़के वाले बहुत मॉडर्न सोच दिखा कर मिले थे। लड़की ने शादी से पहले ही बता दिया था कि वो घर का सारा काम नही कर पाएंगी क्योंकि उसे जॉब भी जारी रखनी थी। लड़के वालों को इस बात पर कोई आपत्ति नहीं थी क्योंकि उनके घर में सब मिलजुल कर काम कर लेते थे। वैसे भी हर काम की कामवाली भी आती थी। लड़की के घर वालों को वो लोग बहुत ही अच्छे और सच्चे लगे। उन्होंने कोई जांच पड़ताल नही की और शादी हो गई। शादी के बाद लड़की को पता चला कि सब कुछ गलत बताया गया था। घर में एक भी कामवाली नही आती थी। ऊपर से लड़के की पढ़ाई तक सही नहीं बताई गई थी। लड़की को जॉब जाने से पहले सारा काम करके जाना पड़ता था और आकर फिर से काम पर लगना होता था। लड़की के घर के संस्कार ऐसे थे कि उसने लड़ाई झड़ने करना उचित नहीं समझा। उसकी गर्भावस्था के आठवें महिनें में ससुराल से कोई सहायता न मिलने से उसे जॉब भी छोड़ना पड़ा था क्योंकि वो सारा काम नही कर पा रही थी। उन्हीं दिनों उसे पता चला कि उसके पति के शादी से पहले तीन चार लड़कियों के साथ संबंध रहे थे और उनमें से दो से अभी भी बात जारी है। इस बात कर विरोध करने पर दोनों में कहा सुनी हो गई और पति ने गुस्से में उसे थक्का मार दिया और वो दीवार से टकरा कर गिर गई। किस्मत से सिर में थोड़ी चोट आई, पर बच्चा सलामत था। सास ने बहू को यह कह कर समझाया कि "कभी-कभी पति को गुस्सा आ जाता है। हमें ही धीरज रखना चाहिए। लड़के उड़ते भंवरे की तरह होते है कभी यहां.. कभी वहां...बैठते रहते है।" यहां मेरा एक सवाल है। क्या उस समय सास को अपने बेटे को जोरदार थप्पड़ नही जड़ देना चाहिए था? लड़की के घरवालों ने भी निर्णय लड़की पर ही छोड़ दिया क्योंकि अब वो मां बनने वाली थी और उसका फैसला बच्चे की जिंदगी को भी प्रभावित करने वाला था। आज भी हमारे समाज में तलाक़ लेना इतना आसान नहीं होता, जितना दिखता है। हर कोई इतनी हिम्मत नही दिखा पाता। अपने बच्चे के बारे में सोच-सोच कर वो यह कदम नहीं उठा पाई और अवसाद में रहने लगी। आज भी वो पति के साथ तो रहती है पर क्या दिल से उसे सम्मान दे पाती होगी? और ऐसी सास को तो अपनी झूठी शान दिखाना बंद ही कर देना चाहिए। एक औरत ही औरत को न समझे तो इससे बड़े दुख की बात तो कुछ भी नही हो सकती। अंत में यह कहना चाहूंगी कि अपनी बेटी की शादी करते समय लड़के वालों से हर एक बात साफ-साफ करे। लड़के के सारे दस्तावेज़ और वेतन पर्ची जरूर चेक करे। परिवार के बारे में पूरी जांच पड़ताल भी करे। सबसे जरूरी है बेटी को आत्मनिर्भर और निडर बनाए। *******

  • गुरु-शिष्य मिलन

    मुकेश ‘नादान’ नरेंद्र के लिए रामकृष्ण देव का मन मानो नरेंद्रमय हो गया था। उनके मुख से नरेंद्र के गुणानुवाद के सिवाय और कोई दूसरी बात नहीं निकलती थी। उन्होंने कहा था, “देखो, नरेंद्र शुद्ध् सत्त्वगुणी है। मैंने देखा है कि वह अखंड के घर के चार में से एक और सप्तर्षियों में से एक है।” इतना कहते-कहते श्रीरामकृष्ण देव पुत्र-विरह से व्याकुल माता के समान रोने लगे। बाद में किसी तरह अपने को सँभाल नहीं पाने के कारण वे बरामदे में चले गए और करुण स्वर में कहते-कहते रोने लगे, “माँ, उसे देखे बिना मैं रह नहीं सकता।” कुछ क्षण के बाद अपने को कुछ सँभालकर वे कमरे में आए और बोले, “इतना रोया, परंतु नरेंद्र नहीं आया। उसे एक बार देखने के लिए मेरे हृदय में बड़ी पीड़ा होती है। छाती के भीतर मानो मरोड़ उठ रहा है, परंतु मेरे खिंचाव को वह नहीं समझता।” ऐसा कहते-कहते वे फिर बाहर जाकर रोने लगे और फिर आकर कहने लगे, “मैं बूढ़ा आदमी उसके लिए बेचैन हो रहा हूँ, इतना रो रहा हूँ, मुझे देखकर लोग क्या कहेंगे, तुम्हीं लोग बताओ। तुम सब अपने हो, तुम्हारे सामने कहने में लज्जा नहीं आती, किंतु दूसरे लोग क्या सोचेंगे? मैं किसी तरह भी अपने को सम्हाल नहीं सकता।" इस घटना के दुबारा सान्याल महाशय ने नरेंद्र के लिए रामकृष्ण देव की व्याकुलता का जिस तरह प्रत्यक्ष प्रमाण पाया था, तब एक दिन नरेंद्र के आने से श्रीरामकृष्ण के आंदोललास को देखकर भी वे उसी प्रकार विस्मित हो गए थे। उस दिन श्रीरामकृष्ण की जन्मतिथि पर भक्तगण उन्हें नए बत्र, फूल, चंदन आदि से सजाकर आनंदित हो कीर्तन कर रहे थे। नरेंद्र के नहीं आने से रामकृष्ण उद्विग्न हो गए थे। कभी-कभी चारों ओर देखते हुए भक्तों से कहते थे, “नरेंद्र तो आया नहीं।” दोपहर के समय नरेंद्र ने आकर रामकृष्ण देव के चरणों में प्रणाम किया। तभी रामकृष्ण उछलकर उसके कंधे पर जा बैठे और भावह्विल हो गए। बाद में सहज अवस्था प्राप्त होने पर रामकृष्ण देव नरेंद्र से बातचीत करने तथा उसे खिलाने-पिलाने में लग गए। उस दिन फिर उनका कीर्तन सुनना नहीं हुआ। नरेंद्रनाथ का मन विचारप्रवण था। ऐसे आंतरिक प्रेम के अधिकारी होकर भी बिना सोचे-विचारे वे कुछ भी ग्रहण नहीं करते थे। ऐसे निश्चल स्नेह पर भी नि:संकोच होकर वे अपनी तीक्ष्ण समालोचना का अत्र चलाते। पहले-पहल तो वे समझ ही नहीं पाते थे कि रामकृष्ण देव उनके लिए इतना प्रयत्न करते क्यों हैं। फिर उनका यह स्नेह रामकृष्ण देव को दूसरों की दृष्टि में हेय बना सकता है, इस खयाल से भी वे उद्विग्न हो जाते थे। इसी से कभी-कभी वे ऐसी कठोर बात भी कह बैठते थे, “अंतकाल में आपकी अवस्था राजा भरत की भाँति न हो जाए। राजा भरत दिन- रात अपने पालित हिरण की बात सोचते हुए मरने के बाद हिरण हो गए थे।” बालक सदृश सरल-चित्त रामकृष्ण देव इन बातें को सुनकर गहरी चिंता में डूब गए थे और उन्होंने कहा था, “तू ठीक कहता है, ठीक ही तो है, तो फिर क्या होगा, मैं तो तुझे देखे बिना रह नहीं सकता।" अत्यंत दुखी होकर वे माँ (श्री जगदंबा) के चरणों में गए, किंतु कुछ क्षणों के बाद ही हँसते हुए लौट आए और बोले, “ओरे मूर्ख, मैं तेरी बात नहीं मानूँगा। माँ ने कहा-तू उसको (नरेंद्र को) साक्षात्‌ नारायण समझता है, इसीलिए प्यार करता है, जिस दिन उसके (नरेंद्र के) भीतर नारायण को नहीं देखेगा, उस दिन उसका मुख देखने की भी तुझे इच्छा नहीं होगी।” *****

  • कमाई

    अनुज सिंह एक बुढ़िया एक दिन हाथ में एक रुपया लेकर सेठ की दुकान पर गयी और काफी देर तक आते जाते ग्राहकों को देखती रही, जब सेठ की नजर उस बुढ़िया पर पड़ी तो उसने पूछा तुम क्या देख रही हो? बुढ़िया बोली सेठ जी तुम कितना कमा लेते हो? सेठ ने चश्मा ऊपर करते हुए उसे पूरी तरह निहारा और विश्वास जम जाने पर कहा साल में दुगने हो जाते हैं, पर तुम यह क्यों पूछ रही हो ? बुढ़िया बोली सेठ जी मैं बहुत गरीब हूँ, जैसे-तैसे कर यह एक रुपया बचाकर लायी हूँ, सोच रही हूँ, कि यदि आप इसे अपने व्यापार में लगा लो तो मेरा भी कुछ भला हो जाए। सेठ को दया आ गयी, उसने अपने मुनीम को बोला इस बुढ़िया का एक रुपया बही खाते में जमा कर लो। बुढ़िया बहुत खुश हुई और जाते-जाते बोली सेठ जी मैं 25 साल बाद आऊँगी और अपनी अमानत लाभ सहित आपसे ले लूँगी। सेठ ने भी कहा ठीक है। बात आयी गयी हो गयी। 25 साल बाद बुढ़िया सेठ से अपने रुपए वापिस लेने आई, सेठ जी ने मुनीम को बोला कि इसे 10 रूपये दे दो। बुढ़िया बोली नहीं सेठ जी, जो मेरा हिसाब हो सो दे दो। सेठ ने बात को ख़त्म करने के अंदाज मे कहा मुनीम जी इसे 100 रूपये देकर छुट्टी करो। लेकिन बुढ़िया इस बार भी बोली कि नहीं सेठ जी, जो मेरा हिसाब बना हो सो दो। हारकर सेठ ने मुनीम को हिसाब लगाने को कहा। हिसाब लगाने के बाद मुनीम का सिर चकराया और उसने सेठ जी के कान में कुछ कहा, सुनकर सेठ के होश फाख्ता हो गए। अब आप सभी के लिए यह प्रश्न है, कि मुनीम ने कितने रूपये का हिसाब बताया? जी हां यदि प्रतिवर्ष पैसे को दोगुना कर दिया जाए तो 25 वर्ष में यह एक रुपया बढ़कर 3,35,54,432/- रूपये हो जाएगा। इसे कहते हैं बुजुर्गों का ज्ञान। *****

  • लक्ष्य

    नेतराम भारती अगर-मगर की तोड़ दिवारें, चल उठ जो भी ठाना है। स्वेद-लहू की बूँद-बूँद का, फल तुझको मिल जाना है। व्योम-शिखर तक होड़ लगाते, पंछी उड़ते जाते हैं, सीखो लक्ष्य अचल-सा इनसे, लक्ष्य-भेद फिर आना है। सफ़ल वही इस जीवन में है, जिसने समझा जीवन को, जीवन क्या है एक तमाशा, सुख-दुख हँसना गाना है। पथ कंटक का, या फूलों का, धूप मिले या छाँव खिले, नेह-मोह में पथ के प्यारे, मंज़िल नहीं भुलाना है। छल-बल-कल का या चोरी का, प्रेम-स्नेह या सेवा का, याद रखो है सत्य जगत का, जो बोया वह पाना है। कड़वे-मीठे, झूठे-सच्चे, सब हैं तेरी वाणी में, सोच-समझकर बोल शब्द को, व्यर्थ नहीं बरसाना है। एक जनम भी थोड़ा है यदि, पाना प्रेम-अमर को है, दूर क्षितिज गंतव्य भले हो, पर पग सतत बढ़ाना है। ****

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