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  • कुछ सवाल

    मधु मधुमन रीत कैसी ये जग में चलाई गयी, नातवां पर ही उँगली उठाई गई, भूल बेटे भी करते हैं अक्सर तो फिर, क्यूँ बहू ही हमेशा सताई गयी। एक धोबी के छोटे से शक़ पर फ़क़त, जानकी को सज़ा क्यूँ सुनाई गई। त्याग लक्ष्मण का सबने ही देखा मगर, उर्मिला की तपस्या भुलाई गयी। युद्ध तो कौरवों पांडवों में था फिर, दाँव पर द्रौपदी क्यूँ लगाई गयी। कृष्ण की प्रेम गाथाएँ गाते हैं सब, रुक्मणी की व्यथा क्यूँ न गाई गई। दोष तो इंद्र का था अनाचार में, फिर अहिल्या क्यूँ पत्थर बनाई गई। इम्तिहां की कसौटी पे ‘मधुमन‘ सदा, एक नारी ही क्यूँ आज़माई गई? ******

  • नीली चिड़िया

    अंकिता शाम्भवी कई बार तुम्हें पढ़ते हुए मैं ख़यालों के समंदर में डूबने-उतराने लगती हूँ जब बिल्कुल डूबने को होती हूँ— तुम्हारी कविताएँ मुझे कसकर थाम लेती हैं और तट पर लाकर छोड़ नहीं जातीं, बल्कि मेरे साथ ही वहीं बैठ जाती हैं। वे मुझे क़िस्से सुनाती हैं उस नीली चिड़िया के जो तुम्हारे दिल में छुपकर बैठी हुई थी जिसे तुम इस डर से बाहर नहीं आने देते कि वह तुम्हारी रचनाओं को नुक़सान न पहुँचा दे, काम न बिगाड़ दे जिस पर तुम व्हिस्की उँड़ेल दिया करते और तमाम वेश्याएँ, तमाम साक़ी, तमाम किराने के दुकान-मालिक ये नहीं जान पाते कि वह नीली चिड़िया तुम्हारे दिल के कोटर में न जाने कब से बंद है तुमने सचमुच उस प्यारी नीली चिड़िया पर बहुत ज़ुल्म किया वह हौले-हौले गाती रही कुछ जिसे सिर्फ़ तुमने सुना, तुमने ही समझा, उसे मरने नहीं दिया और तुम दोनों यूँ ही साथ सोते रहे उसने तुम्हारे सब राज़ छुपा रखे थे तुम नहीं चाहते थे इस दुनिया में कोई भी किसी से नफ़रत करे फिर भी लोगों ने नफ़रत की तुम्हारी शक्ल से, मेरी शक्ल से, हम सबकी शक्ल से, क्योंकि उन्हें अपनी शक्ल से भी प्यार नहीं था! तुम जानते थे इस दुनिया में अमीर ख़ुश नहीं न ही वंचित यहाँ कोई किसी से प्यार नहीं करता पर तुम्हारे मस्तिष्क ने तुम्हें पल भर भी चैन नहीं लेने दिया तुम बेचैन हो उठते रातें जागकर बिताते और देर तक टाइपराइटर पर उँगलियाँ टिपटिपाते तुम्हारी कविताओं में वेश्याएँ थीं, जिनसे तुमने प्रेम की उम्मीद की दलाल थे, कवि थे, प्रकाशक थे, उनकी माँएँ, पत्नियाँ, दोस्त, भाई सब थे जिनसे तुमने कभी कोई उम्मीद नहीं की सभी ने तुम्हें निराश किया सभी को तुमने धिक्कारा अपनी कविताओं में उन्हें बार-बार लताड़ा तुम्हारी उँगलियों और टाइपराइटर के बीच ईमान का रिश्ता था। तुम्हें दुनिया की सबसे मामूली चीज़ें पसंद आईं और मामूली लोगों से प्यार हुआ, किसी गली में शराब के नशे में झूमता हुआ ठठेरा, पहली बार परीक्षा में बैठा एक लड़का, किसी बाड़ के किनारे अपने घोड़े का नेतृत्व करता खिलाड़ी, अपनी आख़िरी कॉल पर लगा हुआ साक़ी, कोई महिला वेटर जो रेस्तराँ में कॉफ़ी परोस रही है, किसी उजाड़ घर की दहलीज़ पर सोया हुआ नशेड़ी, एक सूखी हड्डी चबाता हुआ कुत्ता, किसी सर्कस के तम्बू में गोज़ करता हाथी, रास्ते में शाम छह बजे लगी हुई जमघट, या फिर, किसी डाकिये का फूहड़ मज़ाक़ ये मामूली लोग अपनी आख़िरी साँस तक तुम्हारी कविताओं में ज़िंदा रहे; पर वेश्याओं ने तुम्हें कभी प्यार नहीं किया, और संपादकों ने तुम्हारी रचनाएँ वापिस कर दीं। ******

  • ध्वज के रंग

    डॉ. कृष्णा कांत श्रीवास्तव एक दिन कक्षा में गुरुजी ने बच्चों से पूछा- "बच्चों, बताओ तो भारत के राष्ट्रीय ध्वज में कितने रंग होते है?" "तीन" सारे बच्चों के स्वर कक्षा में एक साथ गूंजा। शोर थमने के बाद एक सहमा-सा बच्चा धीरे-धीरे खड़ा होकर विनम्र स्वर में बोला....." जी नहीं गुरुजी, पांच " सारे बच्चे यह सुन कर जोर-जोर से हँसने लगे। गुरुजी अपने गुस्से को दबाने की कोशिश करते हुए बोले, "चलिए, आप ही सबको बता दीजिए कौन-कौन से पाँच रंग है हमारे तिरंगे में?" तिरंगे के नाम सुनने के बाद भी बच्चा धीरे-धीरे बोलने लगा- "सबसे ऊपर केसरिया, उसके नीचे सफेद, सबसे नीचे हरा और बीच में एक चक्र जिसका रंग नीला है।" गुरुजी ने अपने हाथ दायें-बायें हिलाते हुए हल्के से ऊंची आवाज में पूछा- "फिर भी तो चार ही हुआ। ये पांचवां रंग कौन सा है....बताओ?" मासूम बच्चे ने आंख झुकाए सरलता से उत्तर दिया- "वो है पूरे ध्वज में फैला हुआ लाल-लाल रक्त का धब्बा, मुझे याद है गुरुजी, जब मैंने अपने पिताजी को अंतिम बार देखा था, जब वो आतंकवादियों के साथ एक मुठभेड़ के दौरान शहीद हो गए थे।" घर के आंगन में एक ताबूत के अंदर पिताजी एक वैसे ही ध्वज को ओढ़ कर सोये हुए थे...चिरनिद्रा में, हमेशा के लिए औऱ मेरी माँ के साथ पूरे परिवार की आँखें बेहद नम थीं।" कक्षा का शोर अचानक थम सा गया। पल भर में सन्नाटा पसर गया। गुरुजी का गुस्सा अचानक गायब हो चुका था। उनका गला भर आया था। वे कुछ बोल नहीं पा रहे थे। सिर्फ हाथ के इशारे से सबको शाँत बैठने को कह कर अपना सिर झुकाए कक्षा के बाहर निकल आए और भीगी आँखों से आसमान के तरफ़ देखते हुए सोंचने लगे- "तिरंगे में लगे हमारे शहीद हुए वीर जवानों के खून के उन लाल धब्बों को हम कैसे भूल सकते है भला? नमन हर उस वीर जवान को जो मातृभूमि के लिए अपना सबकुछ छोड़ देता है। अपना पूरा जीवन न्योछावर कर देता है....देश के लिए। जय हिन्द जय भारत। ******

  • तिरंगा हम फहरायेंगे

    पिंकी सिंघल झंडा ऊंचा रहे हमारा, लगता सबसे एकदम न्यारा, तीन रंगों से सजकर ये झंडा, दिखता देखो कितना प्यारा। हरा रंग हरियाली बतलाता, त्याग करना केसरिया सिखलाता, धवल रंग जो सजे बीच में, शांति का पैगाम वो लाता। आन बचाता भारत की ये, बान दिखाता भारत की ये, आंच न इस पर आने दें हम, शान बढ़ाता भारत की ये। प्राण अपने गंवा देंगे हम, सर्वस्व अपना लुटा देंगे हम, भारी हर विपदा पर भारत, दुश्मन को आज बता देंगे हम। हर सिम्त इसे हम लहरायेंगे, प्रेम सुधा बस बरसायेंगे झुकने देंगे न कुछ भी हो जाए, हर घर तिरंगा हम फहरायेंगे। ******

  • खुद्दारी

    डॉ. कृष्णा कांत श्रीवास्तव दो जवान बेटे मर गए। दस साल पहले पति भी चल बसे। दौलत के नाम पर बची एक सिलाई मशीन। सत्तर साल की बूढी ममता गाँव भर के कपड़े सिलती रहती। बदले में कोई चावल दे जाता, तो कोई गेहूँ या बाजरा। सिलाई करते समय उसकी कमजोर गर्दन डमरू की तरह हिलती रहती। दरवाजे के सामने से जो भी निकलता वह उसे ‘राम–राम‘ कहना न भूलती। दया दिखाने वालों से उसे हमेशा चिढ रहती। छोटे–छोटे बच्चे दरवाजे पर आकर ऊधम मचाते, लेकिन ममता उनको कभी बुरा भला न कहकर उल्टे खुश होती। प्रधान जी कन्या पाठशाला के लिए चन्दा इकट्ठा करने निकले, तो ममता के घर की हालत देखकर पिघल गए — क्यों दादी, तुम हाँ कह दो, तो तुम्हें बुढ़ापा पेंशन दिलवाने की कोशिश करूँ। ममता घायल – सी होकर बोली भगवान ने दो हाथ दिए हैं। मेरी मशीन आधा पेट रोटी दे ही देती है। मैं किसी के आगे हाथ क्यों फैलाऊँगी। क्या तुम यही कहने आये थे? मैं तो कन्या पाठशाला बनवाने के लिए चन्दा लेने आया था। पर तेरी हालत देखकर। तू कन्या पाठशाला बनवाएगा? ममता के झुर्रियों भरे चेहरे पर सुबह की धूप-सी खिल गई। हाँ, एक दिन जरूर बनवाऊँगा दादी। बस तेरा आशीष चाहिए।” ममता घुटनों पर हाथ टेक कर उठी। ताक पर रखी जंग खाई संदूकची उठा लाई। काफी देर उलट-पुलट करने पर बटुआ निकला। उसमें से तीन सौ रुपये निकालकर प्रधान जी की हथेली पर रख दिए बेटे, सोचा था मरने से पहले गंगा नहाने जाऊँगी। उसी के लिए जोड़कर ये पैसे रखे थे। तब ये रुपये मुझे क्यों दे रही हो? गंगा नहाने नहीं जाओगी? बेटे, तुम पाठशाला बनवाओ। इससे बड़ा गंगा–स्नान और क्या होगा” - कह कर ममता फिर कपड़े सीने में जुट गई। ******

  • नमन मां शारदे

    मुक्ता शर्मा पालते हैं जिद सभी बेकार की। बस यही तो है वजह तक़रार की जब से ऑंगन में लगी दीवार है। रौशनी आती नहीं उस पार की। बस अभी तो हम किनारे से लगे। बात मत छेड़ो अभी मंझधार की। दिल की‌‌ बातों को हमेशा मानकर। जिंदगी की राह क्यों दुश्वार की। फुर्सतें किसको हैं इतनी देखिए। खैरियत जो पूछ लें बीमार की। सब इमारत के कंगूरे देखते। ईंट कब किसको दिखी आधार की। लड़कियां अव्वल हैं हर मैदान में। आजकल सुर्खी है ये अख़बार की। ******

  • दरार

    अंचल सिन्हा कमल बाबू को लगता है कि वे टूट से गए हैं। अबतक वे अपनों से दूर होते गए थे, तो भी किसी तरह अपने को सहेजे हुए थे। भाई, बहन और बाकी रिश्ते तो कब के टूट चुके थे। मां और पिताजी बरसों पहले स्वर्ग सिधार चुके थे। कैसे-कैसे कमल बाबू ने अपने को अबतक संभाले रखा था, सिर्फ इस उम्मीद में कि उनके बच्चों के बीच प्यार बना रहे। उनके बच्चे अच्छे हैं भी। दोनों भाई बहन एक दूसरे से सारी बातें शेयर करते रहे हैं। दोनों के बच्चे भी बहुत प्यारे हैं। कमल बाबू को लगता था कि चलो, उनकी अपने परिवार की दुनिया तो नहीं बन सकी, बच्चों के साथ वाली दुनिया ही सुखद हो। लेकिन आज अचानक उन्हें लगा कि उनकी आज की दुनिया भी अब बचेगी नहीं। छोटी-छोटी सी बात में बहू को परेशानी होने लगी है। पिछले दिनों बहुत छोटी सी बात पर बहू ने बेटी को जाने क्या-क्या कह दिया। बेटी ने रो कर कमल बाबू को कहा -- मेरा इरादा भाभी को किसी तरह से दुःखी करने का नहीं था, हल्का सा मज़ाक ही तो किया था, वह नाराज हो गयी। "कोई बात नहीं, "कमल बाबू ने बेटी को समझाया। फिर एक अभिभावक की तरह बहू को भी समझाने की कोशिश की, पर वह जैसे अड़ी सी रही। कमल बाबू चुप हो गए थे। वह समझते थे कि बेटा कुछ भी कह नहीं सकता। वह खुद अपनी जवानी के दिनों में यही सब झेल चुके थे। वह थके क़दमों से अपने कमरे की ओर चल पड़े। उन्हें लगा कि जल्दी ही उनका यह परिवार भी टूटने वाला है। उनके जीवन का कोई मतलब बचा है क्या? वह जल्दी से जल्दी इस दुनिया को अलविदा कहना चाहते हैं, कई बार ईश्वर से कहा भी, पर ईश्वर हो तब तो सुने। कमल बाबू का ईश्वर से भी भरोसा टूट चुका था। ईश्वर ने उनकी कौन सी बात सुनी। जवानी से आज तक कमल बाबू ने अपनी मानसिक शांति के लिए जो कुछ भी माँगा, उन्हें नहीं मिला। हां, ईश्वर ने इतना ज़रूर किया कि उन्हें और उनके परिवार को मरने नहीं दिया, खाने पीने और जीने का रास्ता बनाते रहे। लेकिन क्या जीवन केवल यही होता है? कमल बाबू थकी नज़रों से बस खिड़की के उस पार देखते रहे, देखते रहे। ******

  • भ्रम

    आचार्य जहान भ्रम का भ्रम ही रहना भला है। कुछ न होने से कुछ होना भला है। भ्रम टूटा तो टूटेगी और सरहदें बिखर जाएंगे तेरे सपने दूर हो जाएंगे तेरे अपने भ्रम सच और झूठ के बीच का क्रम इसीलिए तो भ्रम है। हर फूल में खुशबू न तलाशना ही भला है। उसकी मुस्कान दूर से देखना क्या बुरा है। रिश्तों में साफ चेहरे मत ढूंढना जहान बिगड़ते बनते चेहरे को देखना ही भला है। धुंधला आयना रखना भी क्या बुरा है। भ्रम का भ्रम ही रहना भला है। ******

  • जीवन की मिठास

    डॉ. कृष्णा कांत श्रीवास्तव एक प्रोफ़ेसर क्लास ले रहे थे। क्लास के सभी छात्र बड़ी ही रूचि से उनके लेक्चर को सुन रहे थे। उनके पूछे गये सवालों के जवाब दे रहे थे। लेकिन उन छात्रों के बीच कक्षा में एक छात्र ऐसा भी था, जो चुपचाप और गुमसुम बैठा हुआ था। प्रोफ़ेसर ने पहले ही दिन उस छात्र को नोटिस कर लिया, लेकिन कुछ नहीं बोले। लेकिन जब 4-5 दिन तक ऐसा ही चला, तो उन्होंने उस छात्र को क्लास के बाद अपने केबिन में बुलवाया और पूछा, “तुम हर समय उदास रहते हो। क्लास में अकेले और चुपचाप बैठे रहते हो। लेक्चर पर भी ध्यान नहीं देते। क्या बात है? कुछ परेशानी है क्या?” “सर, वो…..” छात्र कुछ हिचकिचाते हुए बोला, “….मेरे अतीत में कुछ ऐसा हुआ है, जिसकी वजह से मैं परेशान रहता हूँ। समझ नहीं आता क्या करूं?” प्रोफ़ेसर भले व्यक्ति थे। उन्होंने उस छात्र को शाम को अपने घर पर बुलवाया। शाम को जब छात्र प्रोफ़ेसर के घर पहुँचा, तो प्रोफ़ेसर ने उसे अंदर बुलाकर बैठाया। फिर स्वयं किचन में चले गये और शिकंजी बनाने लगे। उन्होंने जानबूझकर शिकंजी में ज्यादा नमक डाल दिया। फिर किचन से बाहर आकर शिकंजी का गिलास छात्र को देकर कहा, “ये लो, शिकंजी पियो।” छात्र ने गिलास हाथ में लेकर जैसे ही एक घूंट लिया, अधिक नमक के स्वाद के कारण उसका मुँह अजीब सा बन गया। यह देख प्रोफ़ेसर ने पूछा, “क्या हुआ? शिकंजी पसंद नहीं आई?” “नहीं सर, ऐसी बात नहीं है। बस शिकंजी में नमक थोड़ा ज्यादा है।” छात्र बोला। “अरे, अब तो ये बेकार हो गया। लाओ गिलास मुझे दो, मैं इसे फेंक देता हूँ।” प्रोफ़ेसर ने छात्र से गिलास लेने के लिए अपना हाथ बढ़ाया। लेकिन छात्र ने मना करते हुए कहा, “नहीं सर, बस नमक ही तो ज्यादा है। थोड़ी चीनी और मिलायेंगे, तो स्वाद ठीक हो जायेगा।” यह बात सुन प्रोफ़ेसर गंभीर हो गए और बोले, “सही कहा तुमने। अब इसे समझ भी जाओ। ये शिकंजी तुम्हारी जिंदगी है। इसमें घुला अधिक नमक तुम्हारे अतीत के बुरे अनुभव है। जैसे नमक को शिकंजी से बाहर नहीं निकाल सकते, वैसे ही उन बुरे अनुभवों को भी जीवन से अलग नहीं कर सकते। वे बुरे अनुभव भी जीवन का हिस्सा ही हैं। लेकिन जिस तरह हम चीनी घोलकर शिकंजी का स्वाद बदल सकते हैं। वैसे ही बुरे अनुभवों को भूलने के लिए जीवन में मिठास तो घोलनी पड़ेगी ना। इसलिए मैं चाहता हूँ कि तुम अब अपने जीवन में मिठास घोलो।” प्रोफ़ेसर की बात छात्र समझ गया और उसने निश्चय किया कि अब वह बीती बातों से परेशान नहीं होगा। ******

  • नूर

    डॉ. कृष्णा कांत श्रीवास्तव माँ आप जल्दी से अच्छी सी साड़ी पहन लो और हाँ जरा सा फेस पैक लगा लो, आपका रंग बहुत गहरा होता जा रहा है। अपनी पत्नी नीरजा को आवाज लगाते हुए श्री ने कहा-" सुनो! माँ को जरा सी क्रीम पाउडर भी लगा देना। आज शाम मेरी कंपनी के मालिक चाय पर आ रहें हैं।" माँ बिल्कुल स्मार्ट लगनी चाहिए।" जी.... इतना कहकर नीरजा सासु माँ के कमरे की तरफ बढ़ गयी। वह सासु माँ को साड़ी बदलने का, चेहरा चमकाने का पुरजोर प्रयास कर रही थी। मगर सासु माँ अपनी जिद्द पर अड़ी थी -"मुझे कुछ नहीं करना। जब शृंगार करने की उम्र थी तब क्रीम पाउडर न लगाया... जा तू अपना नाश्ते की तैयारी कर ... हाँ श्री को कह दियो कि अगर माँ को माँ कहने में शर्म आती है तो मैं अपने कमरे से बाहर नहीं आऊंगी। जब मेहमान चले जाएं तब बुला लेना बाहर.... ।" नीरजा तो सासु माँ की आदत से भलीभाँति परिचित थी। 10 साल में वह खूब समझती थी कि माँ नारियल सी हैं ऊपर से कड़क... अंदर से ममता का सागर.... आखिर 30 सालों तक अध्यापिका के रूप में काम किया है। शिक्षक तो स्वभाव से ही अनुशासित होते हैं। वह सासु माँ के कहे अनुसार बाहर आकर किचन में काम निबटाने लगी। कुछ ही देर में श्री के साथ लगभग उसी की हमउम्र समीर ने प्रवेश किया। नीरजा ने चाय नाश्ते की मेज सजा दी। कुछ देर में समीर ने कहा- "श्री! क्या आज माताजी कहीं गयी हुई हैं? उनके भी दर्शन हो जाते तो.... " श्री को बोलने से पहले ही नीरजा ने कहा- "माँ अपने कमरे में ही हैं। मैं बुलाती हूँ।" समीर ने कहा- "अरे! मैं वहीं माताजी से मिल लूँगा। उन्हें परेशान क्यों करना? श्री संकोच के साथ माँ के कमरे की तरफ चल दिया। श्री ने आवाज लगाते हुए कहा- "माँ! देखो आपसे समीर सर मिलने आए हैं।" माँ किताब को एक तरफ रखते हुए बोली- "आओ बेटा! मुझे लगा कि बच्चों के बीच में मैं क्या बात करूंगी बस इसीलिए.... समीर ने सादर प्रणाम कहा और चरण स्पर्श करने के बाद साथ पड़ी कुर्सी पर बैठ गया। बातों का सिलसिला शुरू हुआ तो बातों-बातों में माँ ने गीता के श्लोक, कबीर की साखियाँ कितने प्रेरक प्रसंग कह डाले। समीर ने कुछ याद करने की कोशिश करते हुए पूछा - "आप लोग यहाँ कितने समय से हैं?" माँ ने कहा- "यहाँ आए तो चार पाँच साल ही हुए हैं। पहले हम आगरा में रहते थे। वहीं सरकारी स्कूल में मैंने 25 सालों तक पढ़ाया। समीर एकाएक बोल उठा - "क्या आप दीपिका मैम..... माँ हैरान होते हुए बोली... तुम मेरे नाम से कैसे.... मैम मैं भी उसी स्कूल में सिमर मैम की कक्षा में था। आपने मुझे कभी पढ़ाया नहीं पर मैंने आपको बहुत सुना है। आज भी वही आवाज, वही उर्जा वही विश्वास.... ये सब सुनकर माँ के चेहरे का विश्वास दोगुना हो गया। समीर ने चलते-चलते श्री से कहा - "मैम के ज्ञान की लौ से आज भी उनके चेहरे पर अनोखा नूर है।" श्री माँ की प्रशंसा सुनकर कुछ देर पहले की बात को याद कर मन ही मन खुद को छोटा महसूस कर रहा था। *****

  • पहला मानसून

    एम.एस.ठाकरे आज खरीददारी करने मार्केट गई थी। सराफा से निकली तो मुझे अकेला पाकर उसने मुझे आवाज दे दी। मयूरी ,,,,,मयूरी , रुक जाओ ... मैं तो डर गई। शादी के पहले भी सबके सामने उससे मिलने से डर लगता था। जाने सब किस नजर से देखते थे और आज तो यहां ससुराल में। मैंने उसे नजरअंदाज किया। तो वो फिर से मेरे सामने आ गया। रुक जा जरा। फिर ...मैंने नजरे चुराते हुए कहा.. नहीं बाबा जाने दो...। लेकिन वह बिल्कुल पहले की तरह धीट था। धीरे-धीरे कदमों से मेरे साथ ही चल रहा था। एक बात तो बता। इतनी डरती क्यों हो मुझसे, उसने कहा। किसने कहा मैं डरती हूं। मैंने भी थोड़ा धीट बनते हुए उसे बोला। बताओ फिर भाग क्यों रही हो। वो बोला, “मैं कहां भाग रही हूं। बस तुम आने से पहले बताते नहीं हो ना। मैंने भी मन की बात कही। क्या मतलब कुछ भी जैसे कि अगर बताता तो मुझसे मिलने बड़ी सज धज के आने वाली थी। तुम भी ना ....मैं थोड़ी उससे चिढ गई थी। और उसको नजरअंदाज करके आगे कदम बढ़ा दी। मन तो बहुत हो रहा था कि उसके साथ चलते-चलते बात करूं पर कुछ सोचते हूए तेज चलने लगी। अरे .....मतलब बड़ी धीट हो तुम। हर साल मेरे लिए बचपन में लव लेटर लिखती थी। आज तो नहीं छोडूंगा तुम्हें और थोड़ा मेरे आगे आकर रास्ता रोक लिया। अरे मेरे सिरफिरे आशिक उसे लव लेटर नहीं। ऐसे (essay) कहते थे जो टीचर लिखवाती थी। मैंने सर को हाथ मारते हुए कहा, जाने दो मुझे। एक तो आज एक भी गाड़ी नहीं दिखाई दे रही। बस कुछ साधन मिल जाए नहीं तो यह मुझे पक्का पकड़ लेगा। फिर उसे चिढ़ाते हुए मैंने कहा, गाड़ी ना सही सामने टपरी है तो वहां पर चली जाती हूं। मैंने जीत की खुशी मनाते हुए कहा। लोग भी है वहां पर,,, हाथ जोड़कर कह रही हूं तिरछी मुस्कान के साथ वहां मत आ जाना मुझे शर्मिंदा करने। मैंने उसे आंख दिखाकर डराना चाहा। इन लोगों से डर नहीं लगता तुम्हें मुझसे तो बड़ा डर रही है। वो थोड़ा नाराज होते हुए बोला। अगर तुम्हारे साथ रहूंगी तो ऐसे भी यह लोग मुझे नहीं छोड़ेंगे। हां, वो तो है मेरे साथ तुम्हारी जोड़ी लगती भी तो खास है। उसने थोड़ा इतराते हुए कहा, “अब तो तुम्हें गले लगा ही लेता हूं। और वो धीरे-धीरे मेरे पास आ ही गया। मैं भी उसे मना नहीं कर पाई। आखिर चाहत तो मेरे मन में भी थी। मैंने भी मुस्कुराते हुए कहा तुम नहीं सुधरोगे।” सारी लोग-लाज छोड़कर मैं उसके साथ हो ली। थोड़ी देर बाद, अब जाने भी दो, मैंने कहा। ऐसे कैसे ....याद है तुम्हें एक बार स्कूल से छूटने के बाद तुम्हें और तुम्हारी सारी की सारी सखीओं को कैसे मजा चखाया था। उसने झूमते हुए कहा। हंसते हुए मैंने कहा, “हां ...हां ...याद आ गया। पता नहीं कहां-कहां मुंह छुपाए घूम रहे थे हम सब उस दिन, घर आने पर मम्मी ने मुझे और दीदी को कितना डांटा था। मतलब तुम्हारी मां भी हद करती है मुझे कोई कोरोनावायरस हूआ था जो मेरे साथ खेलने भरसे ही तुम लोग बीमार हो जाती‌। लगता है तुम्हारी मां को भी मुझे मजा दिखाना होगा। उसने मस्ती में कहा। अरे यार उनकी उम्र का तो लिहाज करो। वैसे पता है मेरे सिरफिरे मजनू यहां मां नहीं सासु मां है मेरी। हां पता है वहीं ना जिन्हें आचर पापड़ बनाना अच्छा लगता है। उसने असमंजस में कह दिया। तुम्हें कैसे पता। मैंने उसे डर से पूछा। अभी-अभी तुम्हारे घर से ही आ रहा हूं। तुम्हारी सास, देखो रिस्पेक्ट से जरा, मैंने आंख दिखाते हुए कहा। मेरे डर के छत के चक्कर काट रही है। तुम्हारी सासू मां। शरारती मुस्कान के साथ उसने कहा। क्या तुम मेरे घर पर चले गए थोड़ा तो तरस खाते कुछ किया तो नहीं। मैंने परेशान होते हुए पूछा - नहीं नहीं बस डरा कर आया हूं। उसने मेरे इर्द-गिर्द घूमते हुए कहा। अच्छा चलो अब जाने दो मुझे प्लीज। हां मैं क्या जाने दूंगा वहां देखो तुम्हारा जानू आ रहा है तुम्हें मुझसे बचाने मेरा दुश्मन लेकर छाता लेकर। जा उसके साथ वरना ये टपरी वाले देख ही रहे हैं। उसकी बातों में मेरे लिए चिंता थी। इतना कह वो जाने लगा तो मैंने उसे चिल्ला कर कहा रुक जाओ ना इनसे तो मिलो। तो मुझसे बोला दिखाई नहीं दे रहा उसे मुझसे कितना डर लगता है रेनकोट पहन के आया है। इसका तो बदला लूंगा जब गुस्से में रहूंगा। मैंने भी उसे हंसते हुए अलविदा किया। मेरा पहला प्यार मेरा मानसून जिसका हर बार मुझे बेसब्री से इंतजार रहता है। *******

  • मौत से ठन गई

    अटल बिहारी वाजपेयी ठन गई! मौत से ठन गई! जूझने का मेरा इरादा न था, मोड़ पर मिलेंगे इसका वादा न था, रास्ता रोक कर वह खड़ी हो गई, यों लगा ज़िन्दगी से बड़ी हो गई। मौत की उमर क्या है? दो पल भी नहीं, ज़िन्दगी सिलसिला, आज कल की नहीं। मैं जी भर जिया, मैं मन से मरूँ, लौटकर आऊँगा, कूच से क्यों डरूँ? तू दबे पाँव, चोरी-छिपे से न आ, सामने वार कर फिर मुझे आज़मा। मौत से बेख़बर, ज़िन्दगी का सफ़र, शाम हर सुरमई, रात बंसी का स्वर। बात ऐसी नहीं कि कोई ग़म ही नहीं, दर्द अपने-पराए कुछ कम भी नहीं। प्यार इतना परायों से मुझको मिला, न अपनों से बाक़ी हैं कोई गिला। हर चुनौती से दो हाथ मैंने किये, आंधियों में जलाए हैं बुझते दिए। आज झकझोरता तेज़ तूफ़ान है, नाव भँवरों की बाँहों में मेहमान है। पार पाने का क़ायम मगर हौसला, देख तेवर तूफ़ाँ का, तेवरी तन गई। मौत से ठन गई। *****

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