top of page

Search Results

978 results found with an empty search

  • दायित्व बोध

    चंद्रकांत आप गाड़ी लेकर निकलिए किसी भी त्यौहार पर, तो कुछ दृश्य आपको बहुतायत में मिल जायेंगे खासकर भाई-बहन वाले त्यौहारों पर, फिर चाहे वो भैया-दूज हो या रक्षाबन्धन। पश्चिमी उत्तरप्रदेश की सड़कों पर तो ऐसे त्योहारों पर जैसे मोटरसाइकिलों की बाढ़ सी आ जाती है। कोई बहन पति के पीछे बैठकर भाई के घर जा रही है, तो कोई भाई अपने परिवार के साथ बहन के घर जा रहा है। चूँकि इन त्यौहारों में भेंटों का आदान प्रदान बहुत ज्यादा होता है, तो पूरी बाइक सामान से भरी होती है। कभी स्त्री थैले पकड़कर बैठती है, तो कभी सारा सामान बाइक पर बांध लिया जाता है। जहाँ बच्चे भी चलने की जिद पकड़ ले तो स्त्री की जिम्मेदारी बच्चे के लिए हो जाती है और पुरुष थैले को पेट से बांध लेता है और पूरे रास्ते कमर सीधे किये हुए सधकर बाइक चलाता है। कार में बैठे हुए व्यक्ति को 100-120 की गति में ये सब लोग बहुत ही खतरनाक लगते हैं क्योकि ये उसकी गति के सामने बार-बार आते हैं। अक्सर वो इनके उत्साह को देखकर चिढ़ता हुआ भी निकलता है। कुछ कार वालों के मन में चिंता का भाव भी होता है और वो ये सोचता है कि ये लोग कैसे सुरक्षा को दाँव पर लगाकर इतना लोड होकर निकल रहे हैं। इस मिश्रित से भावों में अक्सर वो इन्हें लापरवाह भी समझ लेता है और अगर वो कोई लन्दन या अमेरिकी रिटर्न्स या जातिविज्ञानी गिरोह से हो तो इन सबके साथ-साथ भारत के त्यौहारो की निंदा करते हुए लंबी सी पोस्ट भी लिख सकता है और उन्हें इस सब में यूरोप की तारीफ करने का मौका भी मिल जाता है। पर सड़कों पर उमड़ा ये बाइकर्स का जनसैलाब इन सबसे इतर है। जिसमें न कोई सुरक्षा के बारे में सोचता, न ही कोई धूल मिट्टी की चिंता करता और न ही कोई 2-3 घण्टे अकड़कर बैठने की। सबको बस अपने भाई-बहन के पास पहुँचने की ललक होती है। सबको मोह है अपने सहोदर के परिवार के पास जाने का। वहाँ जायेंगे तो बहन-भाई मिलेंगे, सुख-दुःख बांटेंगे और जीजा-साले बैठकर गप्पे मारेंगे तो ये सब थकान उतर जायेगी। इस सब आपाधापी में सिर्फ भाव ही बड़ा है, जिसके सामने सब गौण दिखता है। इन दोनों त्यौहारों में न कोई दीवाली जैसी अतिरिक्त चमक और न ही कोई होली जैसी मस्ती। पर दो परिवारों के मध्य दायित्व बोध का भाव इन त्यौहारो में सबसे ऊपर रखता है। *****

  • धब्बा

    संगीता अग्रवाल “जब तक आप दस लाख का इंतज़ाम नही करते फेरे नही होंगे।" जयमाला के बाद लड़के का पिता बेहयाई से बोला। "पर इतना पैसा अचानक कहाँ से आएगा आप कुछ तो सोचिये?" लड़की का पिता लाचारी से बोला। "देखिये हमें कुछ नही सोचना जो सोचना है। आप सोचिये लड़की ब्याहनी है या नही।" लड़के का पिता फिर बोला। लड़की का पिता कुछ बोलता उससे पहले वहाँ एक आवाज़ गूंजी "नही।" सबने घूम कर देखा दुल्हन खड़ी थी वहाँ। "बेटा तू यहाँ क्यों आई और ये क्या बोल रही है?" लड़की की माँ बोली। "माँ मैं इनके बेटे से शादी नही करना चाहती। इसलिए आप इन्हें फूटी कौड़ी नही देंगे।" लड़की गुस्से मे बोली। "नही बेटा ऐसा नही बोलते मंडप से बारात लौट जाने का धब्बा लग गया तो कौन शादी करेगा तुमसे। हम पैसों का इंतज़ाम करते हैं। तुम जाओ यहाँ से।" माँ बोली। "नही माँ, एक पैसा नही देना इन्हें और कैसा धब्बा लगेगा। बारात लौट नही रही हम लौटा रहे हैं। इन दहेज़ के लालचियों से शादी करके वैसे भी कौन सा मैं खुश रहूंगी। और रही धब्बा लगने की बात वो तो इनके माथे पर भी लगेगा ना। क्योकि दहेज़ माँगने के जुल्म में सजा तो इन्हें मिलेगी।" लड़की बोली। "क्या सजा!!" लड़के के इतना बोलते ही वहाँ कुछ पुलिस वाले आये और लड़के के पिता, भाई और उसे धर दबोचा। अगले दिन के अखबार मे लड़की की बड़ी सी फोटो लगी थी और पंक्तियाँ छपी थी। "एक साहसी लड़की ने दहेज़ के लालचियों को पहुँचाया जेल। वही लड़के वालों की फोटो के साथ छपा था। "दहेज़ के रूप मे भीख मांगने वाले भिखारी" अब दोनों पक्षों को समझ आ गया था कि धब्बा किसके माथे लगा है। *****

  • भाई-भाई

    रमाकांत शुक्ल यूं तो वह दोनों बहनें हैं और खुशकिस्मती से दोनों सगे भाइयों से ब्याही गई थी। मगर शादी के बाद घर में दोनों देवरानी-जेठानी के रुतबे की वजह से दोनों का अहम बीच में आने लगा था। दोनों एक-दूसरे को नीचा दिखाने से कभी नहीं चूकती थी। आए दिन की नौकझौक छोटी-छोटी से बडी लड़ाइयों में तब्दील होते हुए समय नहीं लेती। दोनों की वजह से कलह तक इतनी बढ़ गयी कि बड़े भाई को ना चाहते हुए भी छोटे के लिए अलग मकान खरीदना पड़ा। बड़े भाई को डर सता रहा था कि कहीं रोज-रोज की कलह से कोई बड़ा हादसा ना हो जाए। उसपर माता-पिता की मृत्यु के बाद घर का बड़ा था वो और उसका छोटे भाई। उसके लिए बेटे जैसा वहीं उसकी पत्नी, उस की बेटी समान बहु। मगर यदि वह उन दोनों का पक्ष लेता तो पत्नी नाराज हो जाती। वहीं पत्नी का पक्ष लेने पर छोटा भाई और उसकी पत्नी उन्हें ही बड़े होकर पक्षपात करने का आरोपी बना देते। आखिरकार समस्या के निवारण के लिए उसने छोटे भाई को एक मकान खरीदकर दे दिया। मगर पत्नी को यही कहा कि छोटे ने अपनी कमाई और कुछ लोन उठाकर मकान लिया है। मुझे तो बड़ा होने की वजह से सही ग़लत के चलते बस वहां खड़ा कर दिया था। उसकी पत्नी ने उससे पूछा, “अच्छा, वैसे कहाँ लिया मकान उन दोनों ने? बहूत दूर है उनका मकान, इतना कहते हुए उसकी आवाज भर्रा गई और आगे वह कुछ नहीं कह पाया। अगले कुछ दिनों में नाजाने कैसे घूमते फिरते उसकी पत्नी ने पता लगवा लिया छोटे देवर देवरानी के मकान का। उसी शाम पति के घर आते ही वह उस पर बरसते हुई बोली, “तुम तो कहते थे, बहुत दूर लिया है मकान और ये दो गली छोड़कर ही खरीद लिया मकान, अपने ही ब्लाक में। तुम मना नहीं कर सकते थे। जब बड़ा बनना था तो दूर किसी और दूसरी कालोनी में मकान नहीं दिलवा सकते थे। यही हमारी छाती पर मूंग दलवानी थी। वह लगातार जाने क्या अनाप-शनाप बके जा रही थी। वहीं बड़ा भाई चुप था क्योंकि उसे तो अपने ही ब्लाक की दो गली की दूरी मीलों जैसे दूर लग रही थी। अब उसे सुबह उठने पर या शाम को फैक्ट्री से लौटकर आने पर अपने बेटे जैसे छोटे भाई का मासूम चेहरा देखने को भी नहीं मिलेगा। उसके दिल से कोई पूछे ये दूरी.....कितनी दूर है...!! ******

  • लाडली बेटी

    ऋतु सिंह सारा दिन घर में पड़ी रहती हो "एक काम ढंग से नहीं करना चाहती।" तुम्हें कितनी बार बोला है, मेरे तैयार होने से पहले नाश्ता टेबल पर रख दिया करो, तुम्हें ये एक ही बात रोज़ बतानी पड़ती हैं। शादी के 27 साल हो गए, पर तुम्हारी बेवकूफी कम नहीं हुई। तुम्हें तो घर पे बैठना रहता हैं, मुझे तो काम पर जाना है। अगर ये सब तुम जानबूझ कर करती हों तो याद रखना मुझसे बुरा कोई नहीं होगा। आज भी राहुल का गुस्सा सातवें आसमान पर चढ़ा हुआ था। इन कटु शब्दों में अपना गुस्सा उतारते हुए, गीला तौलिया कुर्सी पर फेकते हुए राहुल "गुस्से से शोभा की तरफ देखने लगा।” शोभा के लिए राहुल का बेवजह का गुस्सा करना कोई नई बात नही थी। वह महीने में तीन चार बार शोभा पर बेवजह बरस पड़ता था। अगर शोभा अपनी जरूरत के लिए राहुल से कुछ पैसे मांगती तो, वो भी इतना अहसान जता कर देता, जैसे मानो उस पैसे पर शोभा का कोई हक नही हो। धीरे-धीरे शोभा ने अपने सारी जरुरते और ख्वाहिशें उस घर की चार दीवारों में दफ्न कर दी थी। सिर्फ नौकरों की तरह काम करना, और बेवजह राहुल के गुस्से को खून का घूंट पी कर रह जाना। शोभा की आदत बन गई थी, पहले शादी के 4,5 साल शोभा ने इसका विरोध किया पर कुछ सुधार नहीं हुआ, तो अपनी किस्मत समझ कर समझौता कर लिया, अपनी छोटी मोटी जरुरते जो राहुल के दिए हुए पैसों से पूरा कर लेती थी। जब राहुल में कोई बदलाव नहीं हुआ तो शोभा ने खुद को ही बदल दिया। अब राहुल के कुछ भी कहने से शोभा को कोई फर्क नही पड़ता था। राहुल की हर बात को वो नीचे सिर झुकाए सुन लेती थी। शादी के 5 साल तक शोभा ने पूरी कोशिश की थी, कि राहुल को बदला जाए, लेकिन फालतू का गुस्सा करना शोभा को भला बुरा कहना, मानो राहुल की आदत बन गई थी। कोई भी बात विवाद होता, राहुल शोभा को सीधा बोल देता, ज्यादा तकलीफ हो तो चली जाओ अपने मां बाप के घर, क्यों रहती हो मेरे साथ? इतना सब कुछ होने के बाद भी शोभा राहुल के साथ ही रहती थी। क्योंकि उसे अपनी बेटी की फिक्र थी। और वह जाती भी तो कहाँ? इस उम्र में वह अपने बूढ़े मां को परेशान नहीं करना चाहती थी। समाज और लोग क्या कहेंगे यह भी तो उसे सोचना पड़ता था। वह इतनी पढ़ी लिखी भी नही थी कि अपना और अपनी बेटी का पालन पोषण कर सके। शोभा को अब अपनी फिक्र नहीं थी। उसे फिक्र थी तो अब अपनी शादी होने लायक बेटी की। शोभा नहीं चाहती थी, कि पति पत्नी के झगड़े की वजह से पूजा डिस्टर्ब हो। पूजा की पढ़ाई पूरी हो चुकी थी। अब उसके लिए अच्छी शादी का इंतजार था, शोभा ने कई रिश्ते देखें। लेकिन उसको अपनी बेटी लायक रिश्ता नहीं दिखता तो इनकार कर देती, दो तीन महीने बाद एक अच्छा रिश्ता आया। रिश्तेदारों और परिवार के लोगों ने भी बहुत तारिफ की थी। राहुल एक शाम अपनी बेटी के पास बैठकर बताने लगा। पूजा बेटा बहुत अच्छा लड़का है। पढ़ा लिखा है, बहुत बड़ा घर है, उस घर में तुम्हें कोई तकलीफ नहीं होगी, लड़के की बहुत अच्छी नौकरी हैं। ऐसे रिश्ते बार-बार नही आते बेटा। बस इस बार मना मत करना। पूजा अपने पिता से ज्यादा बात नही करती थी। शायद डरती थी, या नफरत करती थी। लेकिन आज वो अपनी पूरी हिम्मत इक्कठा कर बोली, "मुझे अभी शादी नहीं करना हैं, पापा। मैं नौकरी करना चाहती हूं। खुद के पैरों पर खड़ा होना चाहती हूं। मैं आत्मनिर्भर बनना चाहती हूं। तो उसमें क्या बड़ी बात है। मैंने बात की है लड़के से वह तैयार है। वह तुम्हें किसी बात से नही रोकेगा। पर मेरा नौकरी करना ना करना उसके ऊपर क्यू डिपेंड रहेगा पापा?" पूजा ने पूछा। मैं कह रहा हूं ना वहाँ तुम्हें किसी भी चीज की कोई कमी नहीं होगी, ऐसे रिश्ते बार-बार नही आते। मत ठुकरा बेटा, बहुत खुश रहोगी तुम वहाँ। पापा क्या मैं उतनी ही खुश रहूंगी, जितनी इस घर में मम्मी खुश है।" पूजा ने तंज कसते हुए कहा। आज तुम्हारी जुबान कुछ ज्यादा नही चल रही, राहुल गुस्से से आंखें बड़ी करते हुए बोला। पर पापा मुझे शादी ही नही करनी है, शादी के बाद अगर वो लड़का आपके जैसे निकला तो, मैं क्या करूंगी। मुझे आपके जैसा लड़का नही चहिए, जो बिना बात के मुझपर चिल्लाए, मुझे कुछ भी अपने पसंद का लेना हो तो,10 बार सोचना पड़े, कही वह नाराज ना हो जाए, मेरी तबीयत कैसी भी हो, उसे फर्क ना पड़े, रोटी थोड़ी मोटी हो जाए तो वह घर सिर पर उठा ले, उसकी चेक बुक ना मिले तो मुझे गवार बोले उसका दोष भी मेरे सिर मढ दे। हर छोटी मोटी बात में मायके जाने के लिए कहे। मैं इस घर के लिए पराई हूं। अगर मेरा जीवनसाथी भी आपके जैसे बात बात में मायके जाने को कहे तो बताइए मेरा अपना घर कौन सा है। जिसे वो अपना घर कहे। राहुल का गुस्सा 4 सातवें आसमान पर था। पर उसके मुंह से एक शब्द भी नही फूटे, वह बस पूजा की बात सुन रहा था। "पूजा उतना ही बोलकर चुप नही हुई, आज पहली बार वह अपने पापा के सामने इतना कुछ कहने की हिम्मत जुटा पाई थी। पापा आपने हमेशा मम्मी के साथ गलत व्यवहार किया है। आप हमेशा अपने ऑफिस का गुस्सा मां पर उतार देते हैं। कभी इस बात की परवाह नही करते कि उन्हें कैसा लगता होगा, आपकी बातें सुन सुन कर मां ने अपना स्वाभिमान खो दिया है। पूजा ने राहुल का हाथ पकड़ा और बोली, पापा आप सिर्फ एक सवाल का जवाब दे दो क्या आप चाहेंगे कि मेरा जीवनसाथी ऐसा हो? अगर हां तो मैं शादी के लिए तैयार हूं। कर दीजिए मेरा रिश्ता आज ही। और ना बनने दीजिए मुझे आत्मनिर्भर। राहुल कुछ भी न बोल पाया चला गया। आज उसे शोभा के सामने जाने में शर्म आ रही थी। वह शोभा के साथ किए गए व्यवहार पर पछता रहा था। अगर मैं नही चाहता कि मेरी बेटी को ऐसा जीवनसाथी मिले जो उसे सुख ना दे सके, तो मैं शोभा के साथ मैं ऐसे कैसे कर रहा था, वो भी तो किसी की लाडली बेटी हैं। राहुल चलते यह भी सोच रहा था, और उसकी आंखों से आँसू बह रहे थे। शोभा को कुछ ही दिनों में अपने पति के अंदर काफी बदलाव दिखे, शोभा सोच रही थी, जो हिम्मत आज पूजा ने दिखाई, वह मैंने दिखाई होती तो आज परिस्थिति कुछ और होती। अब पूजा पढ़ लिख कर अच्छी नौकरी कर रही हैं। तीन साल बाद, उसके लिए अच्छा रिश्ता आया था, आज उसकी विदाई है। आज उसके विदाई पर पापा बोले बेटा तू हमेशा खुश रहेगी, क्योंकि तेरा पति तेरे पापा जैसा नहीं है, हो सके तो मुझे माफ कर देना। पूजा और शोभा को राहुल की यह बात सुनकर दोनो की आंखो से आँसू बहने लगे। आज भी समाज में, मेरे और आप जैसे लोग हैं, गलत बात पर राय रखना या अपनी मन की बात कहना, औरतों का भी अधिकार होना चाहिए। आज सभी मां बाप से निवेदन है कि बेटी को आत्मनिर्भर बनने देना चाहिए, क्योंकि जरूरी नहीं परिस्थिति हमेशा एक जैसी हो। कभी किसी स्थिति में अगर उसको अपने लिऐ कुछ करना हो तो, वापस मां बाप का दरवाज़ा ना खटखटाना पड़े। यह भी जरूरी नहीं कि उसके लिए आपने जिसको चुना है। वह सही ही हो, जिस लड़की को अपने मां बाप की परवाह है। या तो वह उस घर में घुटते-घुटते रह जाएगी, या नही सह पाई तो जान दे देगी। हत्यारा बनने से बदलाव कही ज्यादा अच्छा है। *****

  • गीत नहीं गाता हूँ।

    अटल बिहारी वाजपेयी बेनक़ाब चेहरे हैं, दाग़ बड़े गहरे हैं टूटता तिलिस्म आज सच से भय खाता हूँ गीत नहीं गाता हूँ। लगी कुछ ऐसी नज़र बिखरा शीशे सा शहर अपनों के मेले में मीत नहीं पाता हूँ गीत नहीं गाता हूँ। पीठ में छुरी सा चांद राहू गया रेखा फांद मुक्ति के क्षणों में बार-बार बंध जाता हूँ गीत नहीं गाता हूँ। *****

  • संस्कार

    रूप किशोर श्रीवास्तव एक समय पर विजयगढ़ भारत का एक विशाल साम्राज्य था। वहां के राजा वीरेंद्र प्रताप सिंह बहुत ही दयालु प्रकृति के थे। उनके राज्य की प्रजा बहुत सुखी थी। राज्य में किसी प्रकार की कोई कमी नहीं थी। राजा समय-समय पर अपने दरबारियों के साथ नगर में विचरण करते थे और प्रजा की सुख, शांति और संपन्नता की पूर्ण जानकारी रखते थे, तथा आवश्यकता पड़ने पर यथोचित कार्यवाही भी करते थे। एक दिन राजा अपने मुख्य दरबारियों के साथ नगर में घूम रहे थे। अचानक राजा की नज़र एक भिखारिन पर पड़ी। भिखारिन अत्यंत सुंदर थी, राजा उस भिखारिन के सौंदर्ये को देखते रह गए। यद्पि राजा वापस अपने महल मे लौट आए परंतु उस भिखारिन के सौंदर्ये को नहीं भुला सके। राजा वीरेंद्र प्रताप सिंह उस भिखारिन से इस कदर प्रभावित थे कि उसे देखने के लिए नित्य उस स्थान पर भ्रमण को जाने लगे। अत्याधिक व्याकुलता के कारण एक दिन राजा ने अपने सेनापति को बुलाया और उस भिखारिन के प्रति अपने मन में उपजे उद्वेग को सेनापति को बताया। राजा ने सेनापति को अपना सबसे विश्वासपात्र सेवक मानकर उस भिखारिन से विवाह करने की इच्छा भी व्यक्त की। राजा को कौन मना कर सकता था। व्यवस्था की गई और उस भिखारिन को राजा अपनी रानी के रूप में महल में ले आए। राजा बहुत प्रसन्न रहने लगे और उस नई महारानी के साथ अधिक से अधिक समय व्यतीत करने लगे। राजा ने एक बात पर गौर किया कि महारानी जब खाना खाने राजा के साथ बैठती तो लगभग बिना कुछ खाये ही भोजन समाप्त कर देती। कई दिनों तक निरंतर यह देखकर राजा दुखी हुए कि बिना भोजन महारानी कैसे जिंदा रहेगी। राजा ने राज वैध को बुलाया और रानी का स्वास्थ्य परीक्षण करने को कहा। राज वैध ने बताया कि महारानी जी निरंतर भोजन कर रही हैं और वह किसी प्रकार की कोई बीमारी से ग्रसित नहीं हैं। राजा को अब और भी आश्चर्य हो गया। क्या राजमहल में रहते रानी खाना खाने बाहर जाती हैं या बाहर से मंगाती हैं। दूसरे दिन राजा ने अपने द्वारपालों को बुला कर पूछा कि महारानी जी महल से किसी समय बाहर जाती है या बाहर से कुछ म्ंगाती हैं। द्वारपालों ने बताया महारानी जब से आई हैं, कभी महल के बाहर गई ही नहीं और न ही किसी से कुछ मंगाया। अब राजा का आश्चर्य और बढ़ गया। अंततः राजा को इस काम के लिए अपने गुप्तचरों का सहारा लेना पड़ा। राजा ने गुप्तचरों को महारानी पर 24 घंटे गुप्त रूप से नज़र रखने को कहा। रात्रि के समय जब रानी, राजा के साथ भोजन के उपरांत अपने कमरे मे आई तो उन पर नज़र रखने के लिए गुप्तचर पहले से ही कमरे में छिप गया। फिर जो द्र्श्य उसने देखा उससे वह अचंभित रह गया। महारानी भोजन कक्ष से भोजन का एक थाल छुपा कर अपने महल में ले आई थी। थाल में छुपा कर लाए भोजन के थोड़े-थोड़े हिस्से को उसने अपने शयनकक्ष के अलग-अलग स्थानों पर रख दिया। फिर महारानी भिखारिन का रूप रखकर भोजन रखें स्थान पर जाती और भीख मांगती। भीख मांगने के बाद उस स्थान पर रखें भोजन को ग्रहण कर लेती थी। अगले दिन गुप्तचर ने सारी बात राजा को बता दी। राजा आश्चर्य चकित हो गए। अगले दिन राजा ने पूरी घटना विस्तार से अपने राजगुरु को बतलाई और इसका कारण पूछा। राजगुरु ने बताया महाराज मनुष्य अपने संस्कारों से आसानी से मुक्त नहीं हो पाता। उसके संस्कार लंबे समय तक उसका पीछा करते हैं। क्योंकि महारानी पिछले कई वर्षों से एक भिखारिन के रूप में भिक्षा ग्रहण करके अपना जीवन यापन कर रही थी। इस कारण भिक्षावृत्ति उनके संस्कारों में समाहित हो गई और महारानी को भिक्षा मांग कर भोजन ग्रहण करने में अधिक सुख का अनुभव होता। हमारे छोटे-छोटे कर्म जो हम अपने जीवन में सामान्य रूप से करते हैं वही धीरे-धीरे हमारी आदत बन जाते हैं। कालांतर में वही संस्कार बन जाते हैं। अतः मनुष्य को समय-समय पर अपने भीतर उपजी आदतों, कर्मों और व्यवहार का परीक्षण अवश्य करते रहना चाहिए। कहीं ऐसा ना हो कि हमारी कोई बुरी आदत या बुरा गुण धीरे-धीरे इतना विस्तारित हो जाए कि वह हमारा संस्कार बन जाए। *****

  • भाग्यवान

    कविता भड़ाना सुलेखा कई दिनों से देख रही है कि उसकी छोटी बेटी रिया बहुत उदास और सबसे खींची-खींची सी रहने लगी है, पहले जहां सारा घर रिया की शरारतों से गुलज़ार रहता था वही उसकी ये चुप्पी घर में सब को खल रही थीं। पति सिद्धार्थ, सास-ससुर और दो बेटियां, बड़ी बेटी टीना जिसका विवाह हों चुका है और छोटी बेटी रिया, जो अभी कॉलेज में है, छोटा सा खुशहाल परिवार है सुलेखा का। आज रिया जब कॉलेज से घर आई तो सुलेखा ने उससे बड़े प्यार से पूछा, बेटा इतने दिनों से देख रही हूं कि तू बहुत परेशान हैं। कोई बात है तो, मुझे बता, मां का प्यार और स्नेहिल स्पर्श मिलते ही रिया फूट-फूट कर रोने लगी और बोली "मां क्या आपको भी दूसरा बच्चा बेटा ही चाहिए था।" सुलेखा ने हैरान होकर पूछा ये क्या कह रही है रिया? किसने कहा तुमसे ये सब? "अभी दो हफ्ते पहले जब हम बड़ी बुआ के घर शादी में गए थे तो बुआ वहां सब से कह रही थी कि मेरे भाई के तो कर्म ही खराब निकले जो दो-दो बेटियां दे दी। एक भतीजा होता तो आज भात के समय भाई भतीजे का साथ तिलक करती मैं, और मुझे वहां सब बड़ी बेचारगी से देख रहे थे। जैसे मैं ही जिम्मेवार हूं, हिचकियां लेते हुए रिया बोली।" ओह तो ये बात है, सुलेखा ने रिया का हाथ पकड़ा और सभी घरवालों को इक्कठा करके सारी बातें बताई। तो सबको बड़ी बुआ पर बहुत गुस्सा आया। रिया की दादी ने उसे अपने पास बिठाया और बोली, बेटा इस तरह "कान का कच्चा" नही होना चाहिए। जिस बुआ की बात को तू इतना दिल से लगा रही है ना उसने अपनी बहू के तीन बार गर्भपात सिर्फ लड़की होने की वजह से कराएं थे और आज दो पोते होने पर इतरा रही है। अरे तेरी मां को गंभीर समस्या होने पर डॉक्टरों ने तेरे समय गर्भपात कराने की सलाह दी थी और साफ साफ कह दिया था कि इसमें इनकी जान को भी खतरा हो सकता है। और जब बच्चे की शारीरिक और मानसिक विकास की स्थिति जानने के लिए अल्ट्रासाउंड में जांच द्वारा तेरे होने का पता चला, तो इसने अपनी जान की परवाह ना करके तुझे जन्म दिया। ये बात हम सबको पहले ही पता चल गई थी कि दूसरी भी लड़की ही है। तभी सुलेखा वो सब रिपोर्ट्स लेकर आई, जिससे सब कुछ साफ हो गया कि रिया अवांछित नहीं है। रिया के दिल से भी अब बोझ उतर चुका था, वह अपने भाग्य पर इतरा उठी। जो उसे ऐसा परिवार मिला, जहां दूसरी कन्या को बोझ नहीं, ईश्वर का आशीर्वाद समझा गया है। ****

  • औकात

    सिमरन पोते की मालिश करते हुए दादी की नज़र उसके खाली गले पर पड़ी तो वह गुस्से से चीख़ पड़ी, ‘‘बहू, ओ बहू....कहाँ मर गई.....अरे...मुन्ने के गले की चेन कहाँ गई?’’ आँगन में पड़े ढेर सारे जूठे बर्तनों को साफ़ करती बहू के हाथ रुक गए। उसने जल्दी से नल खोलकर हाथ धोया और फिर दौड़ी हुई आई, ‘‘माँजी, कल मुन्ने के हाथ में फँस कर चेन टूट गई थी। इसके पापा से सुनार के यहाँ भेज कर बनवा दूँगी।’’ ‘‘बड़ी आई बनवाने वाली, तेरी माँ से इतना भी नहीं हुआ कि कम से कम मुन्ने को तो कायदे की चीज़ देते। अरे उन कँगलों ने तुझे कुछ नहीं दिया। मेरे बेटे और मैंने तो अपने खोटे भाग्य पर संतोष कर लिया, पर यह मुन्ना? बड़ा होकर यह भी उन भिखमंगों पर शर्मिन्दा होगा। दे मुझे यह चेन, इसे बेच कर मैं दूसरी बनवा दूँगी अपने मुन्ना राजा को।’’ बहू आँचल से खोलकर अपनी सास को चेन दे ही रही थी कि तभी दरवाजे़ जोर की दस्तक हुई। उसने जाकर दरवाजा खोला तो अवाक रह गई। सामने अपना सूटकेस लिए एकदम फटेहाल उसकी ननद खड़ी हुई थी। ननद ने भाभी को सामने देखा तो लिपट कर फफक पड़ी, ‘‘भाभी, माँ ने सचिन के जन्म पर जो सामान भेजा है, उसे खराब और सस्ता कहकर उन लोगों ने वापस कर दिया है और कहा है कि जबतक मैं बच्चे व उसके पापा के लिए सोने की मोटी चेन, घर के हर सदस्य के लिए पाँच जोड़ी कपड़े, बच्चे का पालना आदि, सासू और ननद के लिए डायमण्ड की अगूँठी और इक्कीस टोकरी–फल अपनी माँ से लेकर न आऊँ, घर वापस न लौटूँ। भाभी, अब तुम्ही मेरा सहारा हो। भैया से कहकर तुम्हीं कुछ कर सकती हो। मुझे मेरे बच्चे से अब तुम्हीं मिला सकती हो। माँ से तो कुछ होने से रहा अब।’’ ननद को वह सांत्वना दे ही रही थी कि तभी सासू माँ एकदम फट पड़ी, “हरामजा़दे, लड़के वाले है या लुटेरे। अरे, यहाँ कोई खजाना गड़ा है जो उन्हें लुटा दें। जितनी हैसियत होगी, आदमी उतना ही तो करेगा। देखती हूँ तुझे वापस कैसे नहीं बुलाते। दहेज उत्पीड़न में फँसा न दिया तो मैं तेरी माँ नहीं।’’ ननद को अंदर कमरे की तरफ ले जाते हुए वह सोच रही थी कि अपनी बेटी पर बात आई तो एक माँ के चेहरे पर चढ़ा सास का यह मुखौटा कितनी जल्दी उतर गया। *****

  • दुख

    विपिन बंसल सुख में न जीना आया ! दुख ने सिखाया जीना !! दुख भला हो तेरा ! जो पत्थर बन गया हीरा !! सुख में न जीना आया ! दुख ने सिखाया जीना !! सुख में खुद को भी भुला ! दुख में जहॉं को पहचाना !! सुख में इसां बन न पाया ! दुख में इसां मैं बन पाया !! दुख भला हो तेरा ! जो छूटा आदम डेरा !! सुख में न जीना आया ! दुख ने सिखाया जीना !! दुख के गंगा जल से ! पाप धुल गए मेरे सारे !! दुख की गंगा में डूबा चोला ! माया पर्दे हट गए सारे !! दुख भला हो तेरा ! जो छूटा नौ महीनो का फेरा !! सुख में न जीना आया ! दुख ने सिखाया जीना !! जब से दुख तू जीवन में आया ! राम बस गए मेरे घट में !! प्यार के ऐसे बंधन में जकड़ा ! अब सिया राम हैं मेरे वश में !! दुख भला हो तेरा ! जो छूटा मोह का डेरा !! सुख में न जीना आया ! दुख ने सिखाया जीना !! मेरे मन को जिसने घेरा ! उसमें वासना का डेरा !! मन हुआ मेरा खाली ! जब दुख ने दस्तक दे डाली !! दुख भला हो तेरा ! जो निर्मल मन है मेरा !! सुख में न जीना आया ! दुख ने सिखाया जीना !! आनंद अब होगा सुख में ! जब दुख आँगन में आया !! जीवन अब तुझको समझूंगा ! जब मौत से मिलके आया !! दुख भला हो तेरा ! जो निगला मन का अधेंरा !! सुख में न जीना आया ! दुख ने सिखाया जीना !! *****

  • तलाक

    बालक राम त्रिवेदी पति पत्नी दोनों डाक्टर थे। पत्नी ने तलाक़ का मुकदमा दायर कर दिया था। फैमिली कोर्ट में फैसले से एक दिन पूर्व जज ने, एक और अंतिम मौक़ा देते हुए दोनों से पृथक्-पृथक् अकेले में सवाल जवाब किये। जज साहब ने डॉ0पति को तो इस बात के लिए तैयार कर लिया कि वह पत्नी के साथ रहने को तैयार है, किन्तु डॉ0 पत्नी को तैयार नहीं कर पाये। आखिर तलाक हो गया। एक दिन अस्पताल में जज साहब और महिला डॉ0 मिल गये। औपचारिकतावश महिला डॉ0 ने अपने चेम्बर में उन्हें चाय पर आमंत्रित कर लिया। चाय पीते हुए वे बोले- डॉ0 साहिबा, अब यहाँ मैं न जज हूँ, और न आप वादी, आपका तलाक़ हो चुका है, लेकिन मैं आपकी खामोशी का राज़ नहीं समझ पाया। आप द्वारा तलाक़ का मूल कारण वह नहीं था, जो साक्ष्यों और घटनाओं से सिद्ध हुआ है। वह तलाक़ की वज़ह कतई नहीं थे। आपको कोई एतराज न हो, तो मैं अब वास्तविकता जानना चाहता हूँ। “मुझे इससे भी कोई फ़र्क नहीं पड़ता जज साहब, कल उसके साथ कुछ भी घटे, उसे सज़ा हो, मुझे कोई फ़र्क नहीं पड़ता। मैं बस उस वहशी से मुक्त होना चाहती थी। मैं नहीं चाहती थी कि मेरे तलाक़ के कारण उसका जीवन, उसकी नौकरी ख़तरे में पड़ जाये। मैं घाव को नासूर नहीं बनने देना चाहती थी।” डॉ0 महिला ने कहा। 'फिर तो अवश्य ही कोई गम्भीर मामला था।' 'हम दोनों ही डाक्टर हैं, मैं चार माह से गर्भवती हूँ, एक तो मैं नहीं चाहती थी, कि मेरा गर्भ नौ महीने में, मेरे तनाव के कारण अपाहिज या कोई अनोखी बीमारी लेकर पैदा हो। मैं यह समय बहुत ही शांति और खुशी-खुशी बिताना चाहती थी। हर तनाव मुझे स्वीकार था, किन्तु हद तो तब हो गयी जब -----' वह रुक गई, उसका गला भर्राने लग गया था। संयत हो कर वह फिर बोली- 'वे लड़का चाहते थे और उसके लिए भ्रूण परीक्षण पर जिद कर रहे थे, जिसे करवाना हमारे लिए बहुत आसान था, लेकिन यह मेरा अपमान था और भ्रूण परीक्षण एक सामाजिक अपराध भी है।' 'ओह!' जज साहब के मुँह से निकला। 'हाँ, इसीलिए मैंने तलाक़ का यह कारण नहीं लिखा था, मुझे तो आसानी से तलाक़ मिल जाता, किन्तु उन्हें सज़ा हो जाती, उनका भविष्य अंधकारमय हो जाता। अपने पेशे से वे बहुत मेहनती और ईमानदार हैं, इसलिए मैंने मूल कारण को अलग रखा। सज़ा उन्हें दिलवानी थी, उनके पेशे को नहीं। इसके अलावा भी डॉक्टर होने के साथ-साथ पारिवारिक सामंजस्यथता के अभाव से भी मैं, उनसे ही नहीं परिवार से भी बहुत प्रताड़ित हो रही थी, इसलिए इस कारण को गौण रखते हुए, मैंने तलाक़ का अन्य कारण लिखा था। यह हथियार तो मेरे पास ब्रह्मास्त्र की तरह कभी भी इस्तेमाल करने के लिए सुरक्षित था।' डॉक्टर ने कहा। 'इतना होने पर भी तुमने उस आदमी को बचा लिया, जो भविष्य में किसी दूसरी स्त्री के लिए अभिशाप बन सकता है।' जज साहब बोले। 'हम सामाजिक प्राणी हैं, ईश्वर पर आस्था रखते हैं, भविष्य के सुंदर स्वप्न देखते अवश्य हैं, किन्तु जीते वर्तमान में हैं, 'कर्मण्ये वाधिकारस्ते----' गीता के इस संदर्भ को ध्यान में रखते हुए भविष्य के अच्छे बुरे कर्मों का हिसाब किताब ईश्वर पर छोड़ देते हैं। मुझे तो बस गर्भ में पल रही इस विलक्षण प्रतिभा के भविष्य के ताने-बाने बुनना है, किंतु वर्तमान तनाव रहित और खुशनुमा जीना है।' उसने आगे कहा- 'ऐसी ही अन्य कुरीतियों के लिए नारी को ही पहल करनी होगी।' ऑपरेशन का बुलावा आ गया था। जज साहब से क्षमा माँगते हुए वह आपरेशन थियेटर की ओर चल दी। जिस समय जज साहब चेम्बर से बाहर निकल रहे थे, वे उसकी महानता के बारे में सोच रहे थे। ******

  • गुरु की व्याकुलता

    मुकेश ‘नादान’ नरेंद्रनाथ के दक्षिणेश्वर आगमन के कुछ दिनों बाद बाबूराम (भविष्य में स्वामी प्रेमानंद) का आवागमन शुरू हुआ। एक दिन वे रामदयाल बाबू के साथ संध्या के समय दक्षिणेश्वर पहुँचे और बहुत देर तक धर्म-चर्चा करने के उपरांत भोजन के बाद श्रीरामकृष्ण देव के कमरे में पूर्व की ओर काली मंदिर के आँगन के उत्तरी बरामदे में वे रामदयाल बाबू के साथ सो गए। तदुपरांत नरेंद्र के लिए श्रीरामकृष्ण देव की व्याकुलता उन्होंने अपनी आँखों से देखी तथा उस संबंध में उन्होंने स्वयं अपने श्रीमुख से इस प्रकार वर्णन किया था, “सोने के बाद एक घंटा भी न बीता होगा कि श्रीरामकृष्ण देव अपनी पहनी धोती को बच्चों की तरह बगल में दबाए हमारे पास आकर रामदयाल बाबू को “पुकारकर कहने लगे-घअजी, सो गए?” हम दोनों चौंककर उठ बैठे और कहा, “जी नहीं।” सुनकर श्रीरामकृष्ण देव कहने लगे, “देखो नरेंद्र के लिए मेरा हृदय मानो अँगोछा निचोड़ने के समान हो रहा है, उसे एक बार भेंट करने के लिए कहना। वह शुद्ध सत्त्नगुण का आधार और साक्षात्‌ नारायण है। बीच-बीच में उसे देखे बिना मैं रह नहीं सकता।” रामदयाल बाबू कुछ समय पहले से दक्षिणेश्वर आया-जाया करते थे। इसलिए श्रीरामकृष्ण देव का बालक सा व्यवहार उन्हें ज्ञात था। उनका बालक सा आचरण देखकर वे समझ गए कि श्रीरामकृष्ण देव भावविभोर हो गए हैं। सुबह होते ही नरेंद्र से मिलकर उसे यहाँ आने के लिए वे कहेंगे, यदि कहकर वे श्रीरामकृष्ण देव को शांत करने लगे। परंतु उस रात को श्रीरामकृष्ण देव का भाव जरा भी शांत नहीं हुआ। फिर यह सोचकर कि हमारी निंद्रा में बाधा पड़ रही है, वे बीच-बीच में थोड़ी देर के लिए अपने बिस्तर पर लेट जाते थे, परंतु कुछ देर बाद उस बात को भूलकर पुन: हमारे पास आते और बहुत ही करुण भाव से कहते कि नरेंद्र को देखे बिना उनके हृदय में कैसी यंत्रणा हो रही है। ******

  • फूल पलाश के ले आना

    सुनीता मुखर्जी "श्रुति" लौट आना फगुआ से पहले सँग फूल पलाश के ले आना बेरंग पल बीत रहे बन दुष्कर सुर्ख गुलाल बन बिखरा जाना। हर लम्हें गुजरे पतझड़ बनकर नव उमंग पल्लवित कर जाना बेजान शुष्क पथरीली राहों में नेह अथाह सप्तसिंधु बन जाना। मुरझाई साख मुस्काने लगी पुष्प, पात टहनी लगे सजाने कुदरत भांप गई द्रुम मनोदशा कानन हरित बयार लगे बहाने। सतरंगी इंद्रधनुष के रंगों से चंद रंग चुरा कर तुम ले आना ओढ़ी विरहनी मर्म चुनरिया रंगों से सरोबार तुम कर जाना। लज्जा से रंग गए सुर्ख कपोल मधुमास की मादकता ले आना सब मिल पिय संग खेले होली तुम फूल पलाश के ले आना। ******

bottom of page