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दरार

अंचल सिन्हा

कमल बाबू को लगता है कि वे टूट से गए हैं। अबतक वे अपनों से दूर होते गए थे, तो भी किसी तरह अपने को सहेजे हुए थे। भाई, बहन और बाकी रिश्ते तो कब के टूट चुके थे। मां और पिताजी बरसों पहले स्वर्ग सिधार चुके थे। कैसे-कैसे कमल बाबू ने अपने को अबतक संभाले रखा था, सिर्फ इस उम्मीद में कि उनके बच्चों के बीच प्यार बना रहे। उनके बच्चे अच्छे हैं भी।
दोनों भाई बहन एक दूसरे से सारी बातें शेयर करते रहे हैं। दोनों के बच्चे भी बहुत प्यारे हैं। कमल बाबू को लगता था कि चलो, उनकी अपने परिवार की दुनिया तो नहीं बन सकी, बच्चों के साथ वाली दुनिया ही सुखद हो।
लेकिन आज अचानक उन्हें लगा कि उनकी आज की दुनिया भी अब बचेगी नहीं। छोटी-छोटी सी बात में बहू को परेशानी होने लगी है। पिछले दिनों बहुत छोटी सी बात पर बहू ने बेटी को जाने क्या-क्या कह दिया। बेटी ने रो कर कमल बाबू को कहा -- मेरा इरादा भाभी को किसी तरह से दुःखी करने का नहीं था, हल्का सा मज़ाक ही तो किया था, वह नाराज हो गयी।
"कोई बात नहीं, "कमल बाबू ने बेटी को समझाया। फिर एक अभिभावक की तरह बहू को भी समझाने की कोशिश की, पर वह जैसे अड़ी सी रही। कमल बाबू चुप हो गए थे। वह समझते थे कि बेटा कुछ भी कह नहीं सकता। वह खुद अपनी जवानी के दिनों में यही सब झेल चुके थे।
वह थके क़दमों से अपने कमरे की ओर चल पड़े। उन्हें लगा कि जल्दी ही उनका यह परिवार भी टूटने वाला है। उनके जीवन का कोई मतलब बचा है क्या? वह जल्दी से जल्दी इस दुनिया को अलविदा कहना चाहते हैं, कई बार ईश्वर से कहा भी, पर ईश्वर हो तब तो सुने। कमल बाबू का ईश्वर से भी भरोसा टूट चुका था। ईश्वर ने उनकी कौन सी बात सुनी। जवानी से आज तक कमल बाबू ने अपनी मानसिक शांति के लिए जो कुछ भी माँगा, उन्हें नहीं मिला। हां, ईश्वर ने इतना ज़रूर किया कि उन्हें और उनके परिवार को मरने नहीं दिया, खाने पीने और जीने का रास्ता बनाते रहे। लेकिन क्या जीवन केवल यही होता है? कमल बाबू थकी नज़रों से बस खिड़की के उस पार देखते रहे, देखते रहे।

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